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18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


10 मई 2023

ऐसे संयोग भी बिरले ही होते हैं - 2300वीं पोस्ट

शिक्षा किसी के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस शिक्षा के द्वारा व्यक्ति न केवल संस्कारित बनता है बल्कि अपनी भावनाओं के प्रकटीकरण को लेकर भी सजग होता है. पता नहीं ये सबके साथ होता है या नहीं मगर हमारे साथ हमारे उन सभी शिक्षण संस्थानों के साथ आत्मिक लगाव रहा है जहाँ से हमने शिक्षा प्राप्त की है. प्राथमिक शिक्षा के लिए संस्थान रहा हो या या फिर उच्च शिक्षा का संस्थान, न उस संस्थान को, न वहाँ के शिक्षकों को हमने विस्मृत किया है.


इसी क्रम में अपनी उच्च शिक्षा से जुड़े एक शिक्षण संस्थान दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का जिक्र करना आज अत्यावाशय्क हो गया है. वैसे इस पोस्ट को हमने 08 मार्च को लिखा था मगर जब बात ख़ास थी तो पोस्ट भी ख़ास होनी चाहिए थी, यही सोचकर इसे रोक रखा था. चलिए, अब दोनों बातें एक-एक करके आपको बताते चलें. पहली बात चूँकि हमारे कॉलेज से जुडी है, इसलिए पहले उसे बताते हैं. विगत दो दशकों से अधिक समय से अध्यापन कार्य से जुड़े होने के बाद भी इस साल पहली बार अवसर मिला कि हमें कहीं बाह्य परीक्षक के रूप में मौखिकी परीक्षा लेने जाना था. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि विगत वर्षों में कई बार ऐसे अवसर आने के बाद भी हम इनकार करते रहे. शायद दस्तावेज के रूप में दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का नाम ही जुड़ना था.




इस महाविद्यालय के प्राध्यापक नीरज, जो हमारे मित्र भी हैं, का फोन आने पर पहले हमने उनको इनकार कर दिया, वो भी इस रूप में कि मित्र की मौज ले ली जाए. असलियत ये थी कि दयानंद वैदिक महाविद्यालय के नाम से हमें इनकार करना ही नहीं था. अब आते हैं इस नाम के आकर्षण के पीछे की कहानी पर. असल में जहाँ ये महाविद्यालय स्थित हैं, वहाँ हमारा निवास स्थान है. और निवास स्थान भी कोई आज का नहीं दशकों पुराना है. उस दौर का है जबकि हम इस महाविद्यालय के प्रांगण का उपयोग अध्यापन के लिए नहीं बल्कि अपने खेलकूद के लिए किया करते थे. उन दिनों का स्मरण आप लोग भी साथ में कीजिये, जबकि हम सन 1985 में रामनगर स्थित अपने मकान में आये और उसके बगल में डीवी कॉलेज को देखा. ये भी एक संयोग था कि तत्कालीन प्राध्यापकों के बच्चे हमउम्र होने के कारण या तो हमारे सहपाठी थे या फिर खेल के मैदान के मित्र थे. इसी कारण से कॉलेज कभी अनजाना सा नहीं लगा. खेलकूद के लिए मैदान का उपयोग करने के साथ-साथ वहाँ की शैक्षिणक सुविधाओं का लाभ लिया गया.


अब जबकि नीरज का फोन आया तो मन में एक लालच था अपने महाविद्यालय में बाह्य परीक्षक के रूप में जाने का. अपना महाविद्यालय इसलिए क्योंकि यहाँ बचपन में खेले तो हैं ही, कालांतर में यहाँ अध्ययन भी किया और उसके बाद अध्यापन कार्य भी किया. ये संयोग एकमात्र हमारे साथ नहीं जुड़ा होगा मगर हमारे लिए तो वाकई बिरला संयोग कहा जायेगा. इस महाविद्यालय में न केवल हमारा बचपन खेलकूद में बीता बल्कि अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद यहीं हमने परास्नातक में प्रवेश लिया था. सन 1995 में अर्थशास्त्र विषय से परास्नातक होने के बाद उसी साल जुलाई से महाविद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था. अर्थशास्त्र विषय से अध्यापन के साथ-साथ वर्ष 1998 से यहीं हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य करने का अवसर भी मिला. अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ यहीं से हमें अपनी दोनों पी-एच.डी. करने का अवसर भी मिला.




ऐसे सुखद संयोग को हम किसी भी रूप में अपने हाथ से गँवाना नहीं चाह रहे थे. नीरज से कुछ मिनट के हँसी-मजाक के बाद बाह्य परीक्षक के लिए हाँ कर दी. 08 तारीख को पोस्ट लिखने के दौरान पोस्ट की संख्या देखी तो लगा कि इसे एक-दो दिन के लिए टाल दिया जाये तो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण घटना के साथ-साथ पोस्ट भी विशेष हो जाएगी. असल में हमारे इस ब्लॉग की ये 2300वीं पोस्ट है. विगत 15 वर्षों से नियमित रूप से ब्लॉग-लेखन का ये सुफल आज दिख रहा है. एकसाथ दो-दो बातों को आप सबके बीच बाँटना बहुत ही अच्छा लग रहा है. बड़ों के आशीर्वाद, छोटों के स्नेह और साथियों के सहयोग का सुखद परिणाम है कि आज हम इस दोहरी ख़ुशी को आप सबके बीच साझा कर रहे हैं. आप सभी लोग अपना स्नेह बनाये रखियेगा. 



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इस ब्लॉग की 2300वीं पोस्ट है ये.



 

03 अप्रैल 2023

मौलिकता, रोचकता के आधार पर एक अवसर देना सही है

एक खबर प्रकाशित हुई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी लोकप्रिय साहित्य के अंतर्गत गुलशन नंदा, वेदप्रकाश, सुरेन्द्र मोहन के उपन्यास पढ़ सकेंगे. इनमें इब्ने सफी की जासूसी दुनिया, गुलशन नंदा के नीलकंठ, वेदप्रकाश शर्मा के वर्दी वाला गुंडा को स्थान दिया गया है. इस खबर के आते ही साहित्य जगत में शालीनता की खेती करने वाले बहुतेरे छुपे रुस्तमों के पेट में मरोड़ उठना शुरू हो गई. इस मरोड़ उठने का एक कारण तो ये भी है कि अभी तक हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है कि तर्ज़ पर ऐसे लेखकों ने गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों-उपन्यासकारों की कृतियों को लुगदी साहित्य का नाम देकर चलन से बाहर कर रखा था. बावजूद इसके इन लेखकों की, इनके उपन्यासों की माँग जबरदस्त रूप से रहती है. इनके पाठकों की संख्या लाखों में है.




छटपटाहट से भरे ऐसे तमाम लेखकों ने इस निर्णय का विरोध किया. सामग्री, साहित्यकार, शालीनता आदि का वास्ता देकर इनको कूड़े का बताना शुरू कर दिया गया. संभव है कि लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इन उपन्यासों में अश्लीलता जबरन ठूंसी जाती रही हो मगर सभी उपन्यासों में ऐसा होता है ऐसा नहीं है. इन्हीं में से बहुतेरे उपन्यास ऐसे हैं जिन पर हिन्दी फिल्म बनी हैं और बहुत लोकप्रिय भी रही हैं. जहाँ तक सामग्री की, शालीनता की बात है तो ऐसा लगता है कि इन विरोधी स्वर उचारते लेखकों ने, पाठकों ने उन लेखकों को नहीं पढ़ा है जो स्वयंभू रूप में साहित्य में सबसे ऊपर होने का दावा करते हैं मगर उनकी रचनाओं में रति-क्रिया का वर्णन किसी अश्लील साहित्य से कम नहीं. जिन विरोधी आवाजों ने मित्रो मरजानी, दिल्ली, चाक, पीली छतरी वाली लड़की आदि को पढ़ लिया होगा वे कहना भूल जाएँगे कि शालीनता क्या होती है.


रही बात लोकप्रियता के नाम की तो क्या ये आवश्यक है कि प्रत्येक कालखंड में सदियों पुराने, दशकों पुराने लेखकों को ही पढ़ते रहा जाए? क्या तकनीक के इस दौर में शालीनता पर वैसा ही पर्दा पड़ा हुआ है जैसा कि आज से कोई दो-तीन दशक पहले पड़ा हुआ था? फिल्मों, धारावाहिकों में सत्यता, वास्तविकता के नाम पर जिस तरह से अश्लीलता, गालियों का आना हुआ है वह ये बताने को पर्याप्त है कि अब किसी से कुछ भी गोपन नहीं है. विश्वविद्यालय के परास्नातक के विद्यार्थी किशोरावस्था के नहीं हैं. संभवतः उनमें सही-गलत को समझने का नजरिया होगा. आज हर हाथ में स्मार्ट फोन, इंटरनेट ने अश्लीलता को, पोर्नोग्राफी को सर्वसुलभ बना दिया है. ऐसे में इस साहित्य के द्वारा अश्लीलता का फैलना सिवाय गाल बजाने के कुछ और नहीं लगता है. कम से कम इन उपन्यासों की मौलिकता, रोचकता देखकर एक बार इनको अवसर दिया जाना उचित है. 





 

04 अक्टूबर 2022

भाषा और कला के द्वारा समावेशी गुणों का विकास

शिक्षा किसी भी मानव को एक न्यायसंगत और समाज के विकास की राष्ट्रीय अवधारणा के लिए प्रेरित करती है. यह उसे वैश्विक मंच तक ले जाती है. एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वैश्विक मंच पर सामाजिक न्याय, समानता, उन्नति आदि के मार्ग खोलती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य देश के विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है. आज समूचा विश्व एक व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि के द्वारा वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर डाटा साइंस, कंप्यूटर, गणित, विज्ञान आदि क्षेत्रों में ऐसे कुशल लोगों की आवश्यकता है जो विभिन्न क्षेत्रों में विविध विषयों में मानक योग्यता रखते हों. इसी को दृष्टिगत रखते हुए नई शिक्षा नीति में भारतीय परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों को आधार बनाते हुए इस प्रकार के लक्ष्य शामिल किए गए हैं जो सभी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ भाषा, कला, संस्कृति, इतिहास से भी परिचित करा सकें.


वर्तमान शिक्षा नीति के द्वारा तर्कसंगत विचार, कार्य करने की क्षमता, करुणा, सहानुभूति, वैज्ञानिक चिंतन, रचनात्मक कल्पनाशीलता, नैतिक मूल्य आदि के समावेशी गुणों से ओतप्रोत इंसान का विकास करना है. इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा अवधारणात्मक हो ना कि रटंत पद्धति वाली. इसी से अध्ययन-अध्यापन कार्य में भाषा की शक्ति को प्रोत्साहन दिया गया है. उसमें सीखने के सतत मूल्यांकन पर जोर दिया गया है. सभी पाठ्यक्रमों और शिक्षण शास्त्रों में स्थानीय संदर्भों की विविधता और सांस्कृतिकता पर विशेष बल दिया गया है. यह कदाचित सत्य भी है कि कोई व्यक्ति जितनी सहजता से स्थानीय भाषा में, अपनी संस्कृति में किसी ज्ञान को सीख सकता है, किसी अन्य भाषा में उतनी सहजता से नहीं सीख सकता है.




शिक्षा के द्वारा ऐसे व्यक्तियों को तैयार किया जाए जो एक से अधिक विशिष्ट क्षेत्रों में गहन स्तर पर अध्ययन करने में सक्षम हों और जिनमें नैतिक चरित्र, संवैधानिक मूल्यों, बौद्धिक जिज्ञासा, वैज्ञानिक रचनात्मकता, सेवा की भावना, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, मानविकी, भाषा आदि की क्षमताओं को सहेजने की क्षमता भी हो. इसके लिए ऐसे शिक्षा संस्थान निर्मित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो स्थानीय एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा के कार्यक्रम को बढ़ा सकें. इस बात पर भी बल दिया गया है कि बहु-विषयक शिक्षा व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए जाएं. शिक्षा नीति के प्रस्ताव में बतलाया गया है कि भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई है, जिसके कारण देश ने विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित कर दिया है. वे भाषाएँ जिनकी लिपि नहीं है, विलुप्त होने की कगार पर हैं. जनजाति और समुदायों की भाषा भी विलुप्त हो रही है. भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन हेतु शिक्षा को प्रभावी माना जा रहा है. इसी कारण से ऐसे पाठ्यक्रमों को विकसित करने पर जोर है, जिनमें भारतीय भाषाओं, तुलनात्मक साहित्य, सृजनात्मक लेखन, कला, संगीत, दर्शनशास्त्र आदि के कार्यक्रमों का निर्माण और विकास किया जा सके. स्थानीय संगीत, कला, भाषा आदि के प्रति विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनको स्थानीय संस्कृति और ज्ञान से परिचित करवाना भी एक प्रभावी कदम है. इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए शिक्षण संस्थानों में मातृभाषा, स्थानीय भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग में लाये जाने पर जोर दिया गया है.


विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति समझ विकसित करने के लिए स्थानीय पर्यटन, विरासत, संग्रहालय आदि के प्रति भी जागरूक दृष्टि अपनाये जाने को प्रमुखता दी गई है. इसके लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया गया है. एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना के अंतर्गत देश के 100 स्थलों की पहचान कर वहाँ विद्यार्थियों को इन क्षेत्रों के बारे में ज्ञानवर्धन करने, उनके ऐतिहासिक, वैज्ञानिक योगदान, परंपराओं, स्वदेशी साहित्य और ज्ञान आदि का अध्ययन करने के लिए भेजा जायेगा. यहाँ इस बात पर भी बल दिया गया है कि इन सभी स्थलों के इतिहास, संस्कृति, ज्ञान आदि का सभी भारतीय भाषाओं और उससे संबंधित स्थानीय कला एवं संरक्षण हेतु दस्तावेजीकरण किया जाए. इसमें स्थानीय भाषा में बोलना, कहानियाँ सुनाना, कविता पाठ करना, नाटक खेलना, लोक गायन, लोक नृत्य करना आदि शामिल है.


भाषाई विकास एवं संरक्षण हेतु भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित किये जाने का भी प्रस्ताव शिक्षा नीति में रखा गया है. इसमें प्रत्येक भाषा से श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलने वाले लोग शामिल करने का विचार है ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द-भंडार निर्मित करने में सहायता मिल सकेगी. इसके अलावा इससे नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किया जा सकेगा तथा शब्दकोश और शब्द-भंडार को भी विकसित किया जा सकेगा. इसके लिए भाषाई विद्वानों के साथ-साथ शिक्षकों और विद्यार्थियों का भी सहयोग लिया जाये. इससे उनके अपने विषय से संबंधित शब्द-भंडार और शब्दकोश को न केवल निर्मित करवाया जा सकता है बल्कि उसे लगातार विकसित भी करवाया जा सकता है.


अभी तक देखने में आता रहा है कि न केवल संस्थान का बल्कि शिक्षक और शिक्षार्थी का उद्देश्य कैसे भी करके अपने पाठ्यक्रम को समाप्त कर लेना भर था. उनका ध्यान स्थानीय भाषा, बोली अथवा स्थानीय संस्कृति, इतिहास की जानकारी करना, उसका विकास अथवा संरक्षण करना नहीं होता था. मानविकी, कला, संगीत से लगातार दूर होता जाता विद्यार्थी सिर्फ और सिर्फ अच्छे अंक लाने के लिए, डिग्री प्राप्त करने की दिशा में ही दौड़ता रहता था. यह स्थिति उसे तनावग्रस्त करती जा रही थी. इसका दुष्परिणाम समाज में युवाओं का अवसाद में चले जाने, नशे का शिकार होने, निराशा-हताशा के चलते आत्महत्या करने के रूप में सामने आ रहा था. नई शिक्षा नीति में जिस तरह से पाठ्यक्रम में विज्ञान, कला, मानविकी, संगीत, संस्कृति, इतिहास आदि का समावेशी और वातावरण अनुकूलित स्वरूप निर्मित किया गया है, इससे विद्यार्थियों के समग्र विकास की दिशा का बहुत हद तक निर्धारण संभव है. 





 

25 सितंबर 2022

पुस्तकों से दूर होता युवा

इंसानों ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में खुद को और अधिक विकसित करने के लिए तकनीक का चयन किया, उसके द्वारा विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया. निश्चित ही ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य जीवन-शैली को सहज ढंग से चलाना रहा होगा. इसी सहज जीवन की संकल्पना में मोबाइल भी बनाया गया होगा. मोबाइल ने इंसानों की ज़िन्दगी को कितना आसान किया या कितना कठिन किया, इस बारे में सबकी अलग-अलग राय है. इसके बाद भी एक बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मोबाइल के आने ने, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से, समाज से जैसे अलग कर दिया है. प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल के साथ अपने ही बने-बनाए एक खाँचे में बंद नजर आ रहा है. कहीं भी निकल जाइए, किसी भी जगह नजर दौड़ाइए, हर कोई मोबाइल में तल्लीन दिखाई दे रहा है. बड़े हों या बच्चे, युवा हों या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, अधिकारी हो या व्यापारी सभी के सभी मोबाइल में ऐसे मग्न समझ आते हैं जैसे बिना मोबाइल के उनका एक पल काटना मुश्किल है.


मोबाइल किसके लिए कितना उपयोगी है, कितना नहीं यह उसकी स्थिति और उसके कार्य पर निर्भर करता है. इधर देखने में आ रहा है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी भी मोबाइल का बुरी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें से शायद ही इक्का-दुक्का होंगे जो अपने पाठ्यक्रम से सम्बंधित जानकारियों को मोबाइल पर खोजते होंगे. महाविद्यालय में घुसते ही चारों तरफ हरियाली मन प्रसन्न कर देती है और उसी हरियाली के बीच जगह-जगह लड़के-लड़कियों के छोटे-छोटे झुण्ड सेल्फी लेने में तल्लीन दिखाई देते हैं. अध्ययन संस्थाओं के अलावा भी बाजार में, टैम्पो में, बस में, ट्रेन में, रिक्शे आदि में भी लड़के, लड़कियों का मोबाइल से चिपके रहना दिखाई देता है. अब सफ़र के दौरान या फिर कहीं फुर्सत के समय में युवाओं का किताबों से दोस्ती करते दिखाई पड़ना लगभग विलुप्त सा हो गया है.




सफ़र के दौरान, ट्रेन या बस का इंतजार करने के समय, खाली समय में पहले की तरफ अब इक्का-दुक्का लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते हैं जो किसी पुस्तक के साथ हैं. युवा वर्ग बहुतायत में अपने मोबाइल में ही मगन है. तकनीकी ने ही पुस्तकों का विकल्प किंडल संस्करण के रूप में उतारा था. इसके प्रति भी युवाओं का रुझान बहुत ज्यादा देखने को नहीं मिलता है. समझ नहीं आता है कि आखिर कोई युवा बिना पढ़े कैसे अपने आपको भविष्य के लिए तैयार कर रहा है? इस आश्चर्य से ज्यादा आश्चर्य की बात यह लगती है कि अध्यापन से जुड़े हुए बहुतेरे लोग भी किताबों से दूरी बनाये हुए हैं. अपने आसपास के लोगों में, अपनी मित्र-मंडली में बहुत कम ही मित्र ऐसे मिलते हैं जो पुस्तक पाठन के प्रति आकर्षण बनाये हुए हैं. आये दिन प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के सम्बन्ध में चर्चा करने पर जानकारी मिलती है कि न तो युवा वर्ग के लोग पुस्तक पढ़ना चाहते हैं और न ही बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. 


असल में पठन-पाठन के प्रति रुचि को जागृत करना पड़ता है. समाज में जिस तरह से मोबाइल के अथवा अन्य आधुनिक उपकरणों के आने से व्यक्तियों ने अपने आपको उसी में व्यस्त रखना शुरू कर दिया है, उससे भी पुस्तकों के प्रति लोगों की अरुचि देखने को मिलती है. मोबाइल और इंटरनेट की सहज उपलब्धता में युवा वर्ग तेजी से सोशल मीडिया की तरफ मुड़ा है. उसका बहुतायत समय इसी पर गुजरने लगा है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर उसकी लेखकीय सक्रियता देखने को मिलती है किन्तु यह भी सीमित शब्दों में बनी हुई है. इन सीमित शब्दों की लेखकीय यात्रा में भी ज्यादातर युवा कॉपी-पेस्ट की तकनीक के सहारे अपना काम चला रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि जब पढ़ा ही नहीं जा रहा है तो लिखा कैसे जा सकता है? लिखने के पहले बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता होती है. सच तो यह है कि अब घरों से ही धीरे-धीरे पढ़ने की, पुस्तकें-पत्रिकाएं लाने की प्रक्रिया ही समाप्त होती जा रही है.


चूँकि एक धारणा लगभग सभी ने बना रखी है कि मोबाइल के, तकनीक के इस दौर में आज सबकुछ इंटरनेट पर उपलब्ध है. इसने भी पढ़ने के प्रति सक्रियता को कम किया है. किसी भी जानकारी के लिए, तथ्यात्मक खोज के लिए बजाय पुस्तकों के युवा वर्ग अब मोबाइल की तरफ जाना पसंद करने लगे हैं. यही कारण है किंडल संस्करण एकसाथ, एक जगह पर हजारों-हजार पुस्तकों को उपलब्ध करवाने के बाद भी युवा वर्ग में पुस्तक पाठन के प्रति शौक पैदा नहीं कर पा रहा है. इसका एक बहुत बड़ा कारण बचपन से ही बच्चों में किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित न कर पाना रहा है. आज बच्चे जिस शौक के साथ मोबाइल को अपना साथी बना रहे हैं, यदि उन्हें किताबों का महत्त्व समझाएं, उसकी उपयोगिता के बारे में बताते हुए किताबें पढ़ने को प्रोत्साहित करें तो संभव है कि वे इस ओर आगे बढ़ें. बच्चों को समझाना होगा कि अपने देश की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, महापुरुषों आदि के बारे में जानने-समझने के लिए किताबों से अच्छा कोई साथी नहीं. वास्तव में यदि समझ आ जाये तो पुस्तकों से बेहतर कोई मित्र नहीं. सफ़र हो, घर को, भीड़ हो, अकेलापन हो या कहीं, कैसी भी स्थिति सभी में किताबें मित्रवत साथ निभाती हैं.




 

27 जनवरी 2022

रुके अकादमिक कार्यों को फिर शुरू करना है

अकादमिक रूप से अनिवार्य चार सप्ताह के फैकल्टी इंडक्शन प्रोग्राम में दिसम्बर 2021 के आखिरी सप्ताह से जुड़ना हुआ. यह कार्यक्रम 22 जनवरी 2022 तक चला. इस अवधि में प्रतिदिन चार सेशन होते थे, जिनमें देश के अलग-अलग हिस्सों से, अलग-अलग विद्वानों के व्याख्यान से परिचय हुआ. इस प्रोग्राम में देश भर के तीस प्रतिभागी ऑनलाइन ही जुड़े हुए थे. कोरोना के कारण से विगत दो वर्षों में बहुतायत गतिविधियाँ ऑनलाइन ही सम्पन्न हो रहीं हैं. इनके यदि अपने फायदे हैं तो इनके नुकसान भी हैं. ऑनलाइन रहने से लोगों को आवागमन की समस्या नहीं रही, सम्बंधित संस्थान को तमाम व्यवस्थाएँ नहीं करनी पड़ीं मगर इसी ऑनलाइन का नुकसान यह हुआ कि देश के विभिन्न प्रदेशों से, विभिन्न फैकल्टी के आये लोगों से मिलने का अवसर न मिला. दिन भर के व्याख्यान सत्रों के बीच के समय में सभी प्रतिभागी एक-दूसरे से संपर्क बना कर आपस में वैचारिक आदान-प्रदान करते.


कार्यक्रम समाप्ति तक विभिन्न विद्वानों के विचारों से, उनके ज्ञान से परिचित होने का अवसर मिला. अपने विषय के साथ-साथ अन्य विषयों के बारे में भी जानकारी हुई. बहुत से ऐसे बिन्दुओं के बारे में भी गहराई से जानने-समझने का अवसर मिला, जिनके बारे में पढ़ रखा था मगर ऊपरी स्तर पर. इस अवधि में खुद अपने ज्ञान को जाँचने-परखने का भी मौका मिला. लगा कि कितना कुछ ऐसा है जो अभी तक जाना ही न था, कितना कुछ ऐसा है जिसके बारे में जानते हुए भी लगा कि कुछ नहीं जानते हैं. ज्ञान के अपार, अथाह सागर में हम जैसे किनारे पर भी बैठे हुए से नहीं हैं. महसूस हुआ कि जैसे बहुत दूर बैठे इस ज्ञान-सागर की छवि को निहार रहे हैं.


इस फैकल्टी इंडक्शन प्रोग्राम का क्या और कितना लाभ मिलेगा ये तो भविष्य की बात है मगर इसका लाभ हुआ कि विगत काफी लम्बे समय से तमाम अकादमिक कार्यों में अवरोध जैसा या कहें कि रुकावट ही आ गई थी, उसे पुनः आरम्भ करने का मन बन गया है. मन फिर से भटक पर अपनी पुरानी अवस्था में न चला जाये, इससे पहले खुद को और मन को तत्परता से अकादमिक कार्यों की तरफ ले जाना है.

02 दिसंबर 2020

कुतर्क भरे समाज की भटकती दिशा

समझ नहीं आता है कि जैसे-जैसे हम लोग साक्षर होते जा रहे हैं, पढ़ते-लिखते जा रहे हैं वैसे-वैसे ही क्यों दिमागी रूप से कुंद होते जा रहे हैं? इधर बहुत सोच-विचार कर इस बारे में लिखने का मन बनाया. कुछ दिनों से देश की राजधानी पर किसान आन्दोलन का संकट दिख रहा है. इस आन्दोलन के बहाने से जिस तरह से खालिस्तान समर्थन के, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लग रहे थे, वे ज्यादा चिंताजनक लगे. कृषि से सम्बंधित कानूनों पर किसानों की आपत्ति है या नहीं इसे बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है मगर बहुत से राजनैतिक दलों में आपत्ति देखने को मिली. केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से आये दिन देश के किसी न किसी हिस्से से राजनैतिक दलों के विरोधी स्वर सुनाई देने लगते हैं. ऐसा उस समय और भी तेजी से होता है जबकि कहीं से चुनावी आहट सुनने को मिलती है. बहरहाल, अभी दिल्ली में जमे किसानों और उससे जुड़े कुछ बिन्दुओं पर.


कृषि से सम्बंधित कानूनों के विरोध में दिल्ली में मुख्य रूप से पंजाब का किसान एकत्रित हुआ है. इधर आन्दोलन शुरू होने के समय बहुत से लोगों ने जैसी कि आशंका व्यक्त की थी, कुछ वैसा देखने को भी मिला. आन्दोलन में किसानों की शक्ल में कुछ खालिस्तान समर्थक और कुछ पाकिस्तान समर्थक भी दिखाई देने लगे. इस बारे में सोशल मीडिया पर कई वीडियो भी दिखाई दिए. इनके साथ-साथ किसान रूप में जमा आन्दोलनकारियों द्वारा सड़क से गुजरने वाले कुछ लोगों से अभद्रता करते भी दिखाया गया है. जब इस बारे में सोशल मीडिया में अपने विचार व्यक्त किये तो बहुत से लोगों ने किसानी से, खेती से जुड़ा न होना बताते हुए इस मुद्दे से हमें जैसे बाहर ही कर दिया. इधर बहुत से ऐसे लोग अपनी राय देते दिख रहे हैं जिनका न इन कानूनों से मतलब है और न ही उनको इसका भान है कि कानूनों में परिवर्तन के बाद और पहले की स्थिति में मूल अंतर क्या आया है? इधर कुछ समय से एक लीक सी बन गई है कि जैसे ही सामने वाला आपके तर्कों से हारने लगता है, उसके पास आपके सवालों का जवाब नहीं रहता है तो सीधे-सीधे आपको सम्बंधित क्षेत्र से जुड़ा हुआ न बताकर आपको ख़ारिज करने का काम करने लगता है.


इधर इस किसान आन्दोलन पर टिप्पणी करने पर कुछ ऐसा ही हमारे साथ हुआ. जो लोग अनर्गल तरीके से लिखने में लगे थे, उनसे इन कानूनों के लाभ-हानि पूछ लिए, उनके द्वारा इन संसोधनों का पढ़ा हुआ होना पूछ लिया, बस बात यहीं बिगड़ गई. हमें किसानी, किसान, खेती आदि के बारे में बताया जाने लगा. इन सब क्षेत्रों में हमारा अनुभव जाना जाने लगा. ये सत्य है कि जमीनी रूप से हम कृषि कार्यों से बहुत दूर हैं. हमने कभी खेतों में काम नहीं किया, कभी हल नहीं चलाया, कभी पानी नहीं लगाया, कभी रात में खेतों की रखवाली नहीं की. ये सब न करने का ये मतलब नहीं कि हमें किसानों के दर्द का भान नहीं. इसका ये अर्थ नहीं कि हमें जानकारी नहीं कि खेती कैसे होती है.


ऐसे लोगों की जानकारी के लिए इतना ही काफी है कि जमींदार परिवार से होने के बाद भी आज भी हमारे भाई खेती-किसानी का काम स्वयं करते हैं. खेतों में उनके द्वारा किसी सामान्य किसान की तरह पसीना बहाया जाता है. यह काम अकेले हमारे पैतृक गाँव में ही नहीं होता बल्कि हमारे ननिहाल में भी होता है. इसके साथ-साथ हमारे कई अभिन्न मित्र खेती के कार्य में संलग्न हैं. इन सबके द्वारा हमें खेती के, किसानों के अनुभवों से सहजता से परिचय मिल जाता है. और जहाँ तक बात कानूनों को, स्थितियों को, परिस्थितियों को, नियमों को समझने की है तो हमने स्वयं कृषि से सम्बंधित शोध-कार्य के पश्चात् पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की है. इस उपाधि को प्राप्त करने में हमने सिर्फ टेबल वर्क ही नहीं किया है बल्कि किसानों से मिलकर, खेती की, कृषि की स्थिति को देखकर अपना कार्य पूरा किया है.


इधर ऐसा लग रहा है जैसे कि अब मुद्दा विषय का, विषय से सम्बंधित अध्ययन का रह ही नहीं गया है. अब बात विचारधाराओं की होने लगती है. जो जिसके पक्ष का है, उसी के पक्ष की बात को सुनना, कहना पसंद करता है, शेष लोग उसके लिए बेकार हो जाते हैं. पता नहीं ऐसी एकतरफा स्थिति समाज को किस दिशा में ले जा रही है, किस अंत पर ले जाकर खड़ा कर देगी?


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वंदेमातरम्

05 सितंबर 2017

वर्तमान दौर में शिक्षकों की जिम्मेवारी बढ़ी है

समाज ने लगातार विकास के नए-नए आयामों को प्राप्त किया है. कई-कई नए-नए मानक स्थापित भी किये हैं. इन्हीं में एक मानक शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थापित किया गया है. इक्कीसवीं सदी तक आते-आते शिक्षा क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, कई अत्यावश्यक कदमों को उठाया गया. शिक्षा व्यवस्था ने कई तरह के परिवर्तनों को देखते-समझते हुए अपना स्वरूप भी बदला. आज शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. उसके द्वारा कितना भी विकास कर लिया गया हो, इसके बाद भी समाज से शिक्षकों की महत्ता कम नहीं मानी जा सकती है. तकनीकी विकास ने संस्थागत अनेकानेक बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया हो किन्तु इससे शिक्षकों की जिम्मेवारियाँ और उनका दायित्वों पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. वे समय के साथ कम नहीं हुई हैं वरन बढ़ी ही हैं. एक समय जबकि तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेवारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेवारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

आज ऐसा माना जाने लगा है कि किसी भी शिक्षक का काम किसी संस्थान में, किसी कमरे में बैठे अनेक विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र है. शिक्षक के लिए उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में एक विद्यार्थी का साथ अबसे अधिक एक शिक्षक के साथ ही रहता है. ऐसे में किसी भी स्तर के शिक्षक की जिम्मेवारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. यह विचार करना शायद आज किसी के लिए संभव नहीं हो पा रहा है कि अध्यापन कार्य किसी तरह के व्यवसाय से सम्बंधित करके कभी नहीं देखा गया है. इसके पीछे की मूल भावना सिर्फ इतनी थी कि एक शिक्षक किसी तरह का उत्पाद निर्मित नहीं करता है वरन वह एक नागरिक तैयार करता है, एक व्यक्तित्व का विकास करता है. ऐसे में उसके कार्यों, उसकी भावना, उसकी मानसिकता का प्रभाव उसके विद्यार्थियों पर पड़ता है. किसी भी शिक्षक को अपना आदर्श मानकर एक विद्यार्थी उससे बहुत कुछ सीखता है. उसकी कही बातों को गाँठ बांधकर जिंदगी भर उन पर अमल करने की कोशिश करता है.

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि शिक्षक का कार्य विशुद्ध रूप से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना, उनकी उत्तर-पुस्तिका जाँचकर अंक देना रह गया है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को शिक्षक माना-समझा जाने लगा है. ये किसी भी शिक्षक के सहायक उपकरण तो सिद्ध हो सकते हैं न कि किसी शिक्षक के स्थान पर स्वीकार्य हो सकते हैं. आज विकास की अंधी दौड़ में अभिभावकों के पास समय की अत्यंत कमी देखने को मिलती है. ऐसे में उनके द्वारा प्रयास यही किया जाता है कि शिक्षा का कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जो नितांत उन्हीं के बच्चे पर ध्यान दे सके. मोबाइल क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति ने जैसे अभिभावकों के मन की मुराद पूरी कर दी हो. एक क्लिक पर समस्त जानकारियों को अपने सामने देखकर अभिभावक भी संतुष्टि का एहसास कर रहे हैं. इस बिंदु पर आकर वे यह समझना नहीं चाहते कि ऑनलाइन माध्यम से जानकारी तो मिल सकती है किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का सान्निध्य नहीं मिल सकता है, जो बच्चों को सही-गलत समझा सके. भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने का अर्थ सिर्फ पाठ्यक्रमों का पूरा कर लेना मात्र कभी नहीं रहा है. यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था के किसी भी चरण में नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, हमारे पूर्वजों के बारे में शिक्षा आदि को भी साथ-साथ दिया जाता रहा है. ऐसा माना जाता रहा है कि एक शिक्षक अपने पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों में समाज के प्रति सेवा-भावना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारी का भाव, प्राणीमात्र के लिए परोपकार की भावना, संगठन-शक्ति का विकास, सामूहिकता की स्वीकार्यता आदि गुणों का विकास भी करता है. ऐसे में समझना कतई मुश्किल नहीं है कि मशीनी संस्कृति, मशीनी शिक्षा के द्वारा विषय-सामग्री की उपलब्धता तो हो सकती है किन्तु उससे सम्बंधित विषय पर ज्ञान मिलेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता है.

मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज या फिर कांफ्रेंसिंग के जरिये किसी विषय को सहजता से समझाया भले ही जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों का विकास नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. वर्तमान में विवादास्पद मोबाइल गेम ‘ब्लू व्हेल’ को भी इसी रूप में देखा जा सकता है. ऐसे बच्चों को बताने वाला ही कोई नहीं कि क्या सही है क्या गलत है. ये समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? आज लोगों की जीवन-शैली तकनीकी रूप से, भौतिक रूप से पहले से कहीं अधिक संपन्न हुई है. लोगों को अपने मनमाफिक कार्यक्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई है. ऐसे में समाज में शिक्षकों के प्रति गंभीरता का भाव समाप्त भले ही न हुआ हो किन्तु कम अवश्य हुआ है. तकनीक को सर्वस्व मानने वालों के लिए एक शिक्षक का महत्त्व संस्थान स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति जितना रह गया है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है. किसी भी शिक्षक की स्थान-पूर्ति नहीं कर सकता है.


मशीन ज्ञान दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ऑनलाइन शिक्षा किसी भी विषय पर सामग्री की उपलब्धता सहज करवा सकती है किन्तु उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित नहीं करा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. किसी समय में तकनीक के, सामग्री के, पुस्तकों आदि के अभाव ने शिक्षकों की महत्ता को स्थापित किया होगा किन्तु आज तकनीकी विकास के दौर में भी शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.