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11 जुलाई 2025

गूगल अर्थ पर एक क्लिक ने खोल दी मौत की गुत्थी

गूगल अर्थ पर एक क्लिक ने खोल दी मौत की गुत्थी।

1997 की एक रात। फ्लोरिडा का रहने वाला 40 वर्षीय विलियम मोल्ड्ट (William Moldt) एक नाइटक्लब से अपने घर लौट रहा था। रात करीब 9:30 बजे उसने अपनी गर्लफ्रेंड को कॉल करके बताया कि वह घर के लिए निकल चुका है। लेकिन वह कभी घर नहीं पहुँचा। न कोई सुराग, न कोई चश्मदीद। बस एक रहस्यमय गुमशुदगी, जो अगले दो दशकों तक बिना जवाब के रह गई।

 

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

2019: गूगल अर्थ पर एक क्लिक और खुलता है 22 साल पुराना राज़

2019 में एक व्यक्ति जो पहले उस इलाके में रहता था, गूगल अर्थ पर अपने पुराने मोहल्ले को देख रहा था। वह यूँ ही नज़ारे देख रहा था, ज़ूम इन कर रहा था, जब उसकी नज़र एक तालाब पर पड़ी — और फिर, वह ठिठक गया। पानी के अंदर कुछ अजीब-सा था। वह किसी कार की आकृति लग रही थी।

 



शक होने पर उसने यह तस्वीर स्थानीय लोगों को दिखाई। फिर अधिकारियों को खबर दी गई। पुलिस मौके पर पहुँची और गोताखोरों की मदद से उस तालाब से एक पुरानी कार को बाहर निकाला गया। कार के भीतर मानव अवशेष मिले। जब डीएनए परीक्षण हुआ, तो सच्चाई सामने आई — वो विलियम मोल्ड की ही लाश थी।

 

वो तालाब, जो कभी सुनसान था। जिस तालाब में कार मिली, वह एक रिहायशी इलाक़े के पीछे था। लेकिन जब मोल्ड गायब हुआ था, उस समय वहाँ कोई कॉलोनी नहीं बनी थी। यानी वह इलाका सुनसान और विकास से दूर था। समय के साथ वहाँ मकान बन गए, सड़कें आ गईं, पर तालाब वहीं का वहीं रहा — और उसके भीतर दफन था एक लापता आदमी का राज।

 

गूगल अर्थ की तस्वीरों में 'वो कार' सालों से दिख रही थी

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वो कार, जिसमें मोल्ड की लाश मिली, गूगल अर्थ की सैटेलाइट इमेज में कई सालों से दिखाई दे रही थी। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। न कोई ज़ूम इन किया, न किसी को शक हुआ — जब तक कि वो एक व्यक्ति यूँ ही नज़ारे देखने नहीं बैठा।

 

एक अनजाने क्लिक ने 22 साल का रहस्य सुलझा दिया

कभी-कभी एक छोटी-सी नज़र, एक छोटी-सी खोज, एक गूगल अर्थ पर किया गया ज़ूम — वो कर दिखाता है जो सालों की पुलिस जांच नहीं कर पाती। विलियम मोल्ड का परिवार आज जवाबों के साथ जी सकता है, लेकिन यह कहानी हमें यह भी बताती है कि कितने रहस्य हमारे आसपास ही छिपे होते हैं — बस उन्हें देखने वाली नज़र चाहिए।


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उक्त जानकारी फेसबुक की एक पोस्ट से ज्यों की त्यों कॉपी है. इसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है. 

13 जून 2025

ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट

मृत्यु अटल सत्य है, जो सम्बंधित व्यक्ति के परिजनों को दुःख-आँसू ही देती है लेकिन अहमदाबाद में 12 जून 2025 को हुई हवाई जहाज दुर्घटना दुखद तो है ही, झकझोरने वाली भी है. इस दुर्घटना से सम्बंधित चित्र, वीडियो, दिवंगत हो गए लोगों के परिजनों के आँसू देखकर मन विचलित है. इनको देखकर जीवन-मृत्यु को संचालित करने वाली शक्ति से इतनी ही प्रार्थना है कि इस दुर्घटना जैसी मृत्यु किसी के जीवन में न लिखे. कारण यह नहीं कि यह दुर्घटना भयावह थी बल्कि इसलिए क्योंकि इस दुर्घटना में हमेशा को चले जाने वाला व्यक्ति वास्तविक में हमेशा को ही चला गया.

 

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह व्यक्ति सदा-सदा को चला जाता है, उसे फिर कभी वापस नहीं आना होता है. इस दुर्घटना में भी मृतकों को कभी वापस नहीं आना है मगर उनके परिजनों के हिस्से में भी न भुलाया जाने वाला दर्द सदा-सदा को आ गया है. उस पल की कल्पना करके ही आँखें नम हो जा रहीं जबकि हँसकर परिवार वालों ने अपनों को विदा किया होगा. एक पल को भी किसी को आभास भी नहीं हुआ होगा कि वे उनको अंतिम विदाई दे रहे हैं. हँसते-मुस्कुराते विदा करते लोगों से फिर मिल पाना सम्भव न होगा, उनको कुछ पलों बाद पहचान पाना भी सम्भव न होगा.

 



सामान्य मृत्यु की स्थिति में परिजन साथ होते हैं. आँखों में दुःख होने के साथ-साथ एक संतोष का भाव होता है. अंतिम संस्कार को पावन कृत्य के रूप में स्वीकार्य मानने के पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि परिजन अपने जाने वाले सम्बंधित व्यक्ति को संतोषी भाव से मुक्त करें, उसे अनंत यात्रा के लिए प्रस्थान करने दें. इस हवाई जहाज दुर्घटना में किसी को भी एक पल के लिए झूठे भी ख्याल नहीं आया होगा कि ये उसकी अंतिम यात्रा है. किसी के परिवार वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि वे अपने प्रिय को अंतिम यात्रा के लिए हँसते हुए विदा कर रहे हैं. आँखों में कितने सपने होंगे. दिल में कितनी खुशियाँ होंगी. भविष्य के लिए बहुत सारी आशाएँ सजा रखी होंगी. सबकुछ एक झटके में स्वाहा हो गया.

 

परिवार वाले दूर जाते परिजन का हाथ थाम कर उससे कुछ कह न सके. हमेशा के लिए सबसे दूर जाता व्यक्ति आँखों में संतोष लेकर नहीं जा सका. पता नहीं उस चले गए व्यक्ति की अपने ही किसी परिजन से लम्बे समय से मुलाकात न हुई होगी. न जाने कितने परिजनों, मित्रों, सहयोगियों से अगली यात्रा में आकर मिलने का वादा किया होगा. न जाने कितने परिजनों ने अगली बार अपने घर आने का न्यौता दिया होगा. न जाने क्या-क्या, बहुत कुछ आपस में तय किया गया होगा, निर्धारित किया गया होगा मगर नियति को कुछ और ही निर्धारित करना था. उसने सब एक झटके में निर्धारित करके सबकी आँखों के सपने छीन लिए, परिवार की खुशियाँ मिटा दीं, भविष्य की आशाओं पर पानी फेर दिया.

 

जाने वाला तो चला ही गया, शेष रह गया परिजनों के हिस्से में आया दुःख, आँसू, खाली हाथ, अफ़सोस और ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट.




27 दिसंबर 2024

काश! जीवित रहते तारीफ कर देते

मनमोहन सिंह की जितनी तारीफें, उपलब्धियाँ अब उनके निधन के बाद सुनाई जा रहीं हैं, काश! उनको जीवित रहते सुना दी गईं होतीं.

 

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि वे ही परमाणु सम्बन्धी मामले के अगुआ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि उनके कारण ही भारत आर्थिक रूप से सक्षम हुआ है.

=>> कम से कम उनको एहसास होता कि मौन रहने के बाद भी वही भारतीय राजनीति की रीढ़ थे.

=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि वे ही एकमात्र विद्वान थे जिन्होंने आर्थिक नीतियों को सही से देश में लागू करवाया.




26 नवंबर 2024

सभी का जीवन-मरण के इस चक्र में बार-बार आना तय है

मौत और मृत्यु, इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है पर मौत शब्द से भयावहता तथा मृत्यु से एक तरह की आध्यात्मिकता परिलक्षित होती है. मृत्यु ही जीवन का एकमात्र सत्य है जो व्यक्ति के जन्म से ही निश्चित हो जाता है. किसी भी व्यक्ति के भविष्य को लेकर यही एकमात्र स्थिति है जो दावे से कही जा सकती है.


इस बारे में जब भी विचार करते हैं, वैसे दार्शनिक रूप में दिन भर विचार आता रहता है, ग़नीमत है कि आपराधिक रूप में नहीं आता है, बहरहाल, विचार आने पर लगता है कि संसार के सभी व्यक्तियों का पुनर्जन्म होता होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इस एक जीवन में किसी भी व्यक्ति की इच्छाओं की, अभिलाषाओं की पूर्ति तो हो नहीं पाती है. ऐसा सबके साथ होता है.




सांसारिक व्यक्ति अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है तो साधू-संन्यासी-तपस्वी आदि मोक्ष की लालसा से काम करते रहते हैं. स्पष्ट है कि कोई भी लालसा व्यक्ति को मुक्ति नहीं देती है, या कहें कि मुक्त नहीं होने देती.


इसलिए सभी का जीवन-मरण के इस चक्र में बार-बार आना तय है, निश्चित है.

17 सितंबर 2024

रियल लाइफ के लिए जानलेवा बनती रील लाइफ

मोबाइल को किसी भी सदी का सबसे बड़ा अविष्कार माना जा सकता है. इसने ही एक साधेसब सधे की अवधारणा को पूरा किया है. बातचीत के लिए बनाये गए इस यंत्र ने अपने तंत्र में इतना कुछ समेट लिया है कि कई बार तो समझ ही नहीं आता है कि इसका उपयोग किसके लिए प्रमुखता से किया जाता हैखुद मोबाइल कम्पनियाँ भी अब बातचीत को प्राथमिकता में रखने के बजाय कैमरे को प्राथमिकता में रख रही हैं. पहले ऐसा नहीं था क्योंकि तब मोबाइल का नशा न था. मोबाइल से रील बनाने का फैशन न था. जरा-जरा सी बात पर सेल्फी लेने का चलन न था. किसी समय आपस में बातचीत करने का माध्यम बना मोबाइल अब बातचीत करने से ज्यादा सेल्फी लेने के लिए, रील्स बनाने के लिए प्रयोग होने लगा है. बाजारवाद से घिरे समाज में अब ऐसा लगता है जैसे सबकुछ विज्ञापनमय होता जा रहा है. व्यावसायिक दुनिया तो पहले से ही विज्ञापन के सहारे चल रही थी, अब व्यक्ति की निजी ज़िन्दगी भी विज्ञापन जैसी होती जा रही है. ऐसा होने के पीछे हरसमय सेल्फी लेने की मानसिकता, बिना आगा-पीछा सोचे रील बनाने की सनक का सवार होना है. 

 



सेल्फी ने, रील्स ने मोबाइलयुक्त व्यक्तियों का चाल-चलन एकदम ही बदल दिया. लोगों का सेल्फी-प्रेम किसी से भी छिपा नहीं है. हालत ये है कि कहीं भी, कुछ भी किया जा रहा हो तो पहले सेल्फी बना लो, रील बना लो. किसी पर्यटन स्थल पर घूमने गए हो तो रील डाल दो. बस मेंट्रेन मेंहवाई जहाज मेंसाइकिल मेंपैदल कहीं भी किसी रूप में हो प्राथमिकता में रील बनाकर उसे अपलोड करना है, उसके बाद ही आगे बढ़ना है. सेल्फी लेना अथवा रील बनाकर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करना गलत नहीं है मगर जैसा कि कहा जाता है कि अति हर चीज की बुरी होती है, बस उसी अति ने आज सेल्फी लेने के चलन को, रील बनाने, अपलोड करने के कदम को जानलेवा स्थिति तक पहुँचा दिया है. इस शौक के नशे ने बहुतों के दिमाग को विक्षिप्त सा कर दिया. मोबाइल हाथ में हो तो कई बार ऐसे दिमागी असंतुलन वाले लोग भूल जाते हैं कि कहाँ सेल्फी लेनी है कहाँ नहीं. कहाँ वीडियो बनाना सुरक्षित है, कहाँ नहीं. उनको ध्यान भी नहीं रहता है कि अपने इस नशे के चक्कर में वे अपनी और अपने साथ के लोगों की जान तो खतरे में नहीं डाल रहे. ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. रोमांचकहैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊँची पहाड़ी की चोटी परकभी बीच नदी की धार मेंकभी बाइक पर स्टंट करते हुएकभी ट्रेन से होड़ करते हुए, कभी खतरनाक जीव-जंतुओं के साथ ऐसे लोग रील बनाते नजर आते हैं. सोशल मीडिया, स्मार्टफोन, सेल्फी, रील के इस नशे में लोग आये दिन अपनी जान गँवा रहे हैं. आजकल तो लगभग रोज ही ऐसी ख़बरों से दो-चार हुआ जा रहा है.

 

दरअसल बाजार के बढ़ते प्रभाव ने ज़िन्दगी को विज्ञापन की तरह से चकाचौंध से भरा हुआ साबित करने का प्रयास किया है. एक तरह की होड़ को ही, भीड़ से अलग दिखने की मानसिकता ने, किसी भी क्षेत्र में सबसे ऊपर रहने की दौड़ ने, सोशल मीडिया के आभासी लाइक-शेयर के नंबर-गेम ने व्यक्तियों को एक तरह की मशीन बना दिया है. पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से सफलता की परिभाषा बदली गई है, जिस तरह से व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया बदली गई है, प्रसिद्ध होने के रास्ते बदले गए हैं उसके बाद प्रत्येक कदम, प्रत्येक कार्य को सही ही ठहराया गया है. सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने इस मनोदशा को मीठे जहर के रूप में व्यक्तियों में प्रवेश कराया है. देखा जाये तो यह भी एक तरह से मानसिक विकार है, एक रोग है. दो-चार रील के द्वारा, कुछ हजार-लाख लाइक, शेयर की चाह में एक झटके में प्रसिद्धि पाने की तृष्णा आखिर किसलिए? आखिर खतरनाक रील्स के द्वारा लोग खुद को किसलिएकिसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश करते हैंक्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए रील बनाने की कोशिश की जाती हैक्यों तेज रफ़्तार बाइक परतेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर क्या सिद्ध किया जाता हैइस मनोविकार के चलते रियल लाइफ पर रील लाइफ हावी होकर लोगों की जान लेती जा रही है.

 

इस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा. मोबाइल के आने ने क्रांति की नई परिभाषा लिखीयह तो समझ आया मगर उसके साथ आये कैमरे और उस कैमरे से पैदा सेल्फी नामक नशा संवेदनहीनताबेशरमाईअशालीनता भी लिख देगासोचा नहीं था. 

30 अप्रैल 2024

ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना

अक्सर समय के गुजरने के साथ-साथ लोग ज़िन्दगी का गुजरना जोड़ लेते हैं. इस तरह का गणित न केवल जीवन का गणित बिगाड़ देता है बल्कि ज़िन्दगी को गुजारने के तरीके का समीकरण भी ख़राब कर देता है. ज़िन्दगी का गुजरना एक बात है और ज़िन्दगी को गुजारना दूसरी बात है. देखने-पढ़ने-सुनने में ये बात लगभग एक जैसी ही लग रही होगी किन्तु एक जैसी है नहीं. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. जीवन एक तरह की आइसक्रीम है, जो आपके हाथ में आ गई है. इसका स्वाद ले लेंगे तो स्वाद आएगा अन्यथा की स्थिति में यह पिघल कर ख़त्म हो जाएगी.

 


ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह की स्थिति में रहती है. ऐसा नहीं है कि ऐसा व्यक्ति की आर्थिक-सामाजिक स्थिति देखकर निर्धारित होता हो. व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, सामाजिक हो या फिर असामाजिक अथवा किसी अन्य प्रस्थिति का, ज़िन्दगी सबके साथ एक जैसा व्यवहार करती है. जन्म लेते ही उसकी गति आरम्भ हो जाती है जो मृत्यु होने तक निरंतर गतिमान रहती है. इस बीच की अवधि में व्यक्ति अपने कर्मों से ज़िन्दगी का सुख उठा लेता है और कोई व्यक्ति अपने ही कर्मों से ज़िन्दगी को दुखद बना लेता है. यहाँ समझने वाली बात यह है कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी न करे, किसी भी तरह से अपनी सक्रियता का उदाहरण प्रस्तुत न करे तो भी एक निश्चित समयावधि के बाद उसका जीवन समाप्त हो जायेगा. इसमें उसकी क्रियाशीलता की, निष्क्रियता की कोई भूमिका नहीं रहती है.

 

बस यही हम सबको जानने-समझने की आवश्यकता है कि जिंदगी तो गुजर ही रही है, उसे गुजर ही जाने देना है या फिर गुजारना है?






 

21 जुलाई 2023

सोशल मीडिया और मौत का जश्न

शायद शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य के साथ-साथ अजीब सी अनुभूति हुई हो? आश्चर्य किये बिना एक पल को अपने आसपास फैलाते सोशल मीडिया जाल के बारे में विचार करिए तो आपको ये सच लगने लगेगा. क्या ऐसा नहीं हो रहा है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व उसकी शारीरिक अवस्था कादुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं? मौत की खबरों का बिना सोचे-समझे शेयर करना बताता है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर कुछ लोगों को मौतों पर कार्टून, मीम्सजोक्स बनाकर मस्ती करते तक देखा जा सकता है. क्या ये सोशल मीडिया पर मौत का जश्न नहीं है?  




इस तरह की मानसिकता अचानक से उत्पन्न नहीं हुई है बल्कि सोशल मीडिया को नशे की तरह से इस्तेमाल करने से ऐसा होने लगा है. देखा जाये तो ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गयाखेल का सामान हमारे लिए बन गया सोशल मीडिया पर चरितार्थ हो रही है. अब घटना सुखद हो या फिर दुखदविषय हास्य का हो या फिर विषाद का कार्यक्रम का आयोजन हो या फिर दुर्घटना की भयावहतासबकुछ सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइलहर हाथ में इंटरनेटहर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


अब ये जानकारी ही नहीं कि प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज परसमाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. लोगों को इसका भी भान नहीं है कि उनके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों सेप्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. हम रोज ही सोशल मीडिया के माध्यम से हिंसाबलात्कारहत्यादुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स दृश्यों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शवफंदे पर लटकती देहदुर्घटना में क्षत-विक्षत शरीर सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर गुजर जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर काकिसी देह काकिसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता होगाकिसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता होगा किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


सबसे पहले सूचना देने के लोभ में ऐसे-ऐसे चित्रों कावीडियो का प्रसारण होने लगता है जिसे नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे ऐसे दौर में जबकि रिश्तों कासंबंधों कासंस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. कभी ऐसे चित्रों का प्रकाशन-प्रसारण निषिद्ध माना जाता थाऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करना समझा जाता थाक्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस माना जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे जागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है. तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. ऐसे में स्वयं नागरिकों कोसोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या पोस्ट किया जायेक्या प्रतिबंधित रखा जाये. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरेंवीडियो शुरू में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैंसंवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देता है. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों का अभ्यस्त होना संवेदनाओं समाप्त होना है. घटना के प्रतिदुर्घटना के प्रतिमरने वाले के प्रतिशोषित के प्रतिमृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्याबलात्कारआत्महत्याहिंसादुर्घटना आदि की खबरेंदृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैंसूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्याबलात्कारदुर्घटनामृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैंकब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर जश्न मनाना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्तिइससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत पर हम जश्न कर सकें. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता कावीभत्सता काविकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.

 







 

25 मार्च 2023

भावनात्मकता से दूर होता समाज

आये दिन खबरें आ रही हैं युवाओं की मौत की. बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार बन रहे युवाओं में बहुत कम ऐसे हैं जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए मौत की नींद सो गए. समाचारों, जानकारियों के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में अवसाद के कारण, किसी बीमारी के कारण, हार्ट अटैक के कारण, आत्महत्या करके युवा मौत का शिकार बन रहे हैं. इन युवाओं की उम्र बहुत अधिक नहीं है. इनमें से बहुत तो किशोरावस्था के होंगे. बहरहाल, इन युवाओं की उम्र कुछ भी रही हो, वह चिंता का विषय हो उससे बड़ी चिंता का विषय उनका असमय चले जाना होना चाहिए. किसी भी युवा की मौत पर कुछ दिन का मातम मना लिया जाता है, उसके कामों के कारण उसे याद कर लिया जाता है और फिर सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. इस तरफ ध्यान देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौत क्यों हो रही है? सभी युवा आत्महत्या नहीं कर रहे हैं मगर बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है हो हार्ट अटैक का शिकार बने हैं. ये भी सोचने का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसी किस तरह की जीवन शैली समाज में चलन में आती जा रही है कि तीस से चालीस वर्ष तक के युवा भी हृदयाघात का शिकार होने लगे हैं?




वैसे यदि हम सकारात्मकता के साथ अपने आसपास निगाह डालें, अपनी ही दिनचर्या पर विचार करें, अपने संपर्क और लोगों से मेल-मुलाक़ात पर ध्यान दें तो हमें खुद एहसास होगा कि किस तरह से हम सभी लगातार एकाकी जीवन जीने की तरफ बढ़ रहे हैं. दिन-दिन भर सोशल मीडिया पर आभासी संपर्क भले बना रहे मगर व्यक्तिगत रूप से हम लोग आपस में बहुत कम मिल रहे हैं. बातचीत तो लगभग बंद सी ही है. अब बातचीत का सहारा सोशल मीडिया के तमाम मंच बन गए हैं. सुबह-शाम के सन्देश पर उसी के अनुसार स्माइली भेजकर सामने वाले को जवाब भी दे दिया जाता है. जिस औपचारिकता से सन्देश भेजा गया होता है, उसी औपचारिकता से भेजी गई स्माइली को भी स्वीकार कर लिया जाता है. एक पल रुक कर यह भी विचार नहीं किया जाता है कि कम से कम एक बार सामने वाले को फोन लगाकर बात कर ली जाये, उसके हालचाल ले लिए जाएँ.


यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के मन का, उसकी मानसिकता का, हावभाव का पता मोबाइल पर भेजे जाने वाले, पाए जाने वाले संदेशों से, स्माइली से कदापि नहीं हो सकता है. सन्देश, फोटो, वीडियो या स्माइली आदि किसी भी तरह से व्यक्ति के तात्कालिक मनोभावों को नहीं बता सकते. इसका अंदाजा तो बस आपस में बातचीत के द्वारा हो सकता है. बात करने के लहजे से, सामने वाले के बोलने के अंदाज से समझ में आसानी से आता है कि वह खुश है या दुखी है. बातचीत को हम सभी लोग जैसे समाप्त ही कर चुके हैं. मोबाइल के युग में, इंटरनेट के युग में आज एक ही घर में आपस में बातचीत न के बराबर हो रही है. ऐसे में जाहिर है कोई युवा, किशोर यदि किसी भी तरह की समस्या में घिरा है तो इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अनेक तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ता है. किसी को पढ़ाई की समस्या है तो किसी के सामने कैरियर की दिक्कत है. कोई पारिवारिक समस्याओं से दो-चार हो रहा है तो कोई आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है. ऐसे में भावनात्मक सहारा, संबल न मिल पाने के कारण युवा, किशोर या तो अवसाद में ग्रसित हो जाते हैं या फिर वे हताशा में कोई गलत कदम उठा लेते हैं.


जीवन सिर्फ जिन्दा रहने के लिए नहीं है वरन खुलकर आनंद लेने के लिए है. हताशा, निराशा, असफलता के दौर तो सबके साथ आते जाते हैं मगर यदि उसको भावनात्मक संबल मिल जाये तो वह इन सबसे सहजता से उबर आता है. अपने युवाओं को, किशोरों को असमय मौत के मुँह में जाने से रोकने के लिए आइये हम सब फिर से उसी दुनिया को बनाने का प्रयास करें जहाँ मोबाइल, इंटरनेट ने हमारे रिश्तों को, संबंधों को, भावनात्मकता को नहीं खाया था. 







 

14 सितंबर 2022

मोक्ष की अवधारणा और कुछ सवाल

सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा को लेकर बहुत सी बातें कही गईं हैं. जीव के जीवन-मरण से मुक्ति का मार्ग मोक्ष को स्वीकारा गया है. इसी की प्राप्ति के लिए ऐसा माना जाता है कि तमाम सारी प्रजातियों में मनुष्य जन्म मिलना सौभाग्य की बात होती है और इसी जन्म में ऐसे कर्म कर लेने चाहिए कि व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाये. मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा की सहज स्वीकार्यता के कारण ही मनुष्यों को सत्कर्म करने के प्रति प्रेरित किया जाता है. उनको सभी प्रकार की बुराइयों से दूर रहने का प्रवचन दिया जाता है. इसी के साथ-साथ उनको भगवान की भक्ति करने, परोपकार करने, ईश्वर का नाम लेने की सलाह दी जाती है.


यहाँ एक बात समझने वाली ये है कि क्या मोक्ष की लालसा में किये जाने वाले सद्कार्य लालच की श्रेणी में नहीं आते हैं. जिस सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा है, उसी में कहा गया है कि किसी फल की आशा में कार्य नहीं करना चाहिए. यहाँ तो ईश्वर का नाम, भगवान-भक्ति, परोपकार आदि मोक्ष की कामना के साथ किये जा रहे हैं. देखा जाये तो यह विशुद्ध लालच ही है. ऐसे में एक लालच के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है? यहीं एक सवाल और मन में उभरता है कि आखिर मोक्ष की प्राप्ति किसके लिए, किसलिए? क्या किसी को अपने जन्म के पहले के जन्मों या जन्म का भान है कि उसे कष्ट मिले थे या सुख? यदि ये मान लिया जाये कि बहुत से लोग अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर गए होंगे तो क्या उनको इसका एहसास होगा कि वे जन्म-मरण से मुक्ति पा गए हैं? वे अब मोक्ष प्राप्त कर गए हैं?




एक पल को सारी बातों को दरकिनार करते हुए मान लिया जाये कि सभी जीवों द्वारा किसी भी तरह का बुरा काम, गलत कर्म करना बंद कर दिए गए. सभी अपनी-अपनी तरह से ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगे, परोपकार करने लगे. ये भी मान लिया जाये कि सभी को अपने इन्हीं सद्कर्मों से मोक्ष मिल गया तो क्या ये प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं है? क्या इससे सृष्टि सञ्चालन की व्यवस्था अवरुद्ध नहीं हो जाएगी? ऐसा इसलिए कि यदि सभी जीवों को मोक्ष मिल जायेगा, सभी को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी तो फिर इस सृष्टि में जन्म किसका होगा? इस प्रकृति का सञ्चालन कैसे होगा?


संभव है कि हम अल्पज्ञानी की समझ से बाहर हों उक्त बातें किन्तु मन की जिज्ञासा को शांत करना चाहते हैं.  

 





 

06 मई 2022

नमन संजू भैया

 


परिवार को एक और आघात. जिस तरह की घटनाएँ कभी सोची भी न हों, कभी सपने में भी उस तरह की घटनाओं का आना न हो वैसी परिवार में वास्तविकता में घटित हो जाएँ तो मन व्यथित रहता है. बस, कुछ कहने का मन नहीं. विगत एक वर्ष से लगातार किसी न किसी रूप में आघात पहुँच रहा है, भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं.

नमन संजू भैया.


11 जनवरी 2022

आखिर शास्त्री जी के साथ क्या हुआ था?

11 जनवरी, देश के दुर्भाग्य की तारीख. इस दिन देश के लाल ने विदेशी धरती पर अंतिम साँस ली थी. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं. देश के दूसरे और अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में ही ये बात कही गई. वर्ष 1966 को ताशकंद किस कारण से शास्त्री जी का जाना हुआ, वहाँ समझौते के बाद की उनकी गतिविधियाँ क्या रहीं, रात को कैसे भगदड़ मची इस बारे में बहुत बार वही सामान्य सी बात लिखी जा चुकी है, हम सभी के द्वारा बराबर पढ़ी भी जाती रही है. किसी भी सरकार की तरफ से शास्त्री जी की सामान्य और असामान्य मृत्यु के बीच की बारीक सी रेखा न मिटाई जा सकी, झीना सा पर्दा गिराया न जा सका. ऐसा क्यों होता रहा, क्यों हुआ ये बस सवाल बने हुए हैं मगर इनके जवाब मिलते न तब दिखे थे और न अब दिख रहे हैं.


शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े तमाम सारे मुद्दों, पहलुओं को अत्यंत नजदीक से अध्ययन करने वाले अनुज धर कुछ समय पूर्व आई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स से बहुत आशान्वित दिखाई दे रहे इसके पीछे वे अमेरिका की एक फिल्म का हवाला देते हैं, जिसके आने के बाद से अमेरिका में खलबली मच गई थी. यह फिल्म जॉन एफ. कैनेडी की हत्या से सम्बंधित तमाम दावों पर आधारित थी. बताया जाता है कि इस फिल्म के आने के बाद अमेरिका में कैनेडी की हत्या की सच्चाई जानने के लिए लोगों का दबा आक्रोश बाहर निकल आया था. ‘द ताशकंद फाइल्स फिल्म के आने के बाद ऐसा कुछ भारत देश में तो दिखाई नहीं दिया. क्या इसलिए कि यहाँ कि जनता वास्तविक जीवन पर बनी ऐसी फिल्मों को भी मनोरंजन की दृष्टि से देखती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ फिल्मों का सम्बन्ध नाचने-गाने से जोड़ दिया गया है? कहीं ऐसा भी तो नहीं कि फिल्मों का तात्पर्य कमाई करना, करोड़ों रुपयों के क्लब में शामिल होना बना हुआ है? या फिर देशवासी शास्त्री जी की मृत्यु का सच जानने के इच्छुक नहीं?




इस फिल्म की बात को एक तरफ कर भी दिया जाये तो ऐसा सच जान पड़ता है कि आम भारतीय नागरिक अब किसी भी रूप में देश की दो संदिग्ध मौतों के खुलासे के लिए लालायित नहीं है. उसे इसकी फ़िक्र नहीं कि देश के दो अत्यंत लोकप्रिय व्यक्तित्वों की मृत्यु का सच सामने आये. शास्त्री जी की तरह ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का सच अभी भी परदे के पीछे छिपा हुआ है. बहरहाल, आज चर्चा शास्त्री जी की. एक पल को सोचिये कि देश का प्रधानमंत्री देश से बाहर किसी समझौते के लिए जाए और वहाँ से उसका जीवित आना न हो. मृत्यु भी सामान्य सी स्थिति में न हुई हो. उस व्यक्ति का पार्थिव शव जब विदेश से अपनी धरती पर लाया जाये तो उसका पोस्टमोर्टेम न करवाया जाये. शव भी देखने में सामान्य न समझ आ रहा हो. ऐसी तमाम स्थितियों के बाद सबकुछ सामान्य तरीके से गुजर गया. इतने वर्षों के बाद भी शास्त्री जी के परिजन कैसे अपने दिल को समझाते होंगे? कैसे उस समय में देश की सरकार ने चुप्पी साध ली होगी? कैसे अभी तक तमाम सरकारें ख़ामोशी बनाये बैठी हैं?


और भी बहुत सारे सवाल हैं जो मन को व्यथित कर जाते हैं. दिल-दिमाग में उथल-पुथल उस समय और बढ़ जाती है जबकि अनुज धर की पुस्तक ‘शास्त्री के साथ क्या हुआ था? में दिए गए तथ्यों, विचारों, रिपोर्टों, बयानों आदि को गंभीरता से पढ़ा जाता है. पृष्ठ दर पृष्ठ बहुत कुछ सामने आता रहता है. चूँकि किसी भी पुस्तक के साथ वैधानिकता का सवाल जुड़ा होता है, ऐसे में उस पुस्तक के अंश यहाँ दे पाना हमारे लिए सहज नहीं. इसके बाद भी कह सकते हैं कि अनुज धर ने बहुत से तथ्यों के आलोक में बहुत सी स्थितियों को स्पष्ट किया है. बहुत से उपायों, कदमों की भी सम्भावना व्यक्त की है.


फिलहाल तो हम सभी शास्त्री जी को बस श्रद्धांजलि ही दे सकते हैं. सच कितना क्रूर हो सकता है, ये तो उसी समय पता चलेगा जबकि झीना सा पर्दा गिरे या फिर वो बारीक सी रेखा मिटे.

01 अक्टूबर 2021

भयावह माहौल का इंतजार

सितम्बर माह का भी समापन होने को है। इस साल के नौ महीने बीत जायेंगे कुछ घंटों बाद। वर्ष 2020 खतरनाक आहट के साथ आया था और वर्ष 2021 ने खतरनाक रूप दिखाया भी। इस खतरनाक रूप को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते हैं मगर ऐसा लगता है कि जैसे लोग सबकुछ भूल चुके हैं। याद करिए पिछले वर्ष 2020 को अगस्त सितम्बर से सबकुछ सामान्य होने लगा था। इस सामान्य होती दिनचर्या को तगड़ा झटका इस साल लगा। अचानक से भयावहता दिखने लगी। एकदम से ऑक्सीजन की कमी होने लगी। भयावह तरीके से मौतों की संख्या बढ़ने लगी।


रुकिए, रुक कर सोचिए, विचार करिए कि क्या ये सब महज एक बीमारी के कारण हुआ? फिर सोचिए कि इस साल के आरम्भ में वैक्सीनेशन भी शुरू हो गया था। सबकुछ सामान्य था फिर एकदम से ये भयावह रूप? मानवजनित बीमारी के बाद क्या ये सम्भव नहीं कि मानवजनित माहौल बना दिया गया हो, लोगों के मरने के लिए? क्या ये सम्भव नहीं कि जानबूझकर ऑक्सीजन की कमी कर दी गई हो? चिकित्सकों की लापरवाही तो हमने व्यक्तिगत स्तर पर देखी, अनुभव की थी। बहरहाल, जो हुआ सो हुआ पर अब क्या करना है? क्या अब तीसरी लहर के रूप में एक और साजिश का, एक और मानवजनित माहौल का सामना करना है?


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08 सितंबर 2021

संवेदनहीन इंसान का विनाश निश्चित है

पिछले साल जब कोरोना की पहली दस्तक देश में हुई थी तो उसके बाद लगे लॉकडाउन के समय लोगों के विचार ऐसे बने जैसे अब वे बहुत कुछ सीख चुके हैं. इसके बाद जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई वैसे ही सब पुराने ढर्रे पर वापस आ गया था. इसके बाद जैसे ही दूसरी खतरनाक, जानलेवा लहर समाज में दिखाई दी तो लगा कि शायद अब इंसान कुछ सीखने की कोशिश करेगा. आपसी संबंधों को लेकर, एक-दूसरे की मदद करने को लेकर, संपत्ति के प्रति तृष्णा को लेकर, धन संग्रह की प्रवृत्ति को लेकर हो सकता है कि इंसान कुछ सीखे. बहुत से लोगों के विचारों को जानने-समझने का अवसर मिला. उससे लगा कि न सही सबके सब मगर कुछ हद तक इंसान अपने आपको बदलने की कोशिश करेगा.




इधर विगत कुछ महीनों से कोरोना से डर-भय जैसी स्थिति जैसे समाप्त ही है. इसी समाप्ति ने बहुत कुछ समाप्त कर दिया है. जिन दिनों आसपास मौत दिख रही थी, अपनों के दूर चले जाने की खबरें आ रही थीं, उस समय बहुतायत लोगों को दार्शनिक की मुद्रा में देखा था, माया-मोह के बंधनों से मुक्त होते देखा था. अब फिर वही कोरोना के पहले की स्थिति दिखाई देने लगी है. इससे एक बात तो समझ आती है कि इंसानी फितरत मूल रूप से अपनी भयावहता को भूल जाने की है. उसके मूल में किसी तरह से न सुधरने की स्थिति छिपी हुई है. देखा जाये तो यह स्थिति खतरनाक है. यदि इंसान सीखने की कोशिश में आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर किस तरह से नए-नए मानकों को स्थापित किया जायेगा?


पिछले वर्ष से लेकर अभी तक की जो स्थिति निकली है, जो समय गुजरा है उसमें इंसान ने बहुत कुछ अनुभव किया है. पाया कम है और खोया ज्यादा है. इसके बाद भी ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का लालच, आपदा से गुजर रहे लोगों से भी मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति इस समय देखने को मिली. चिकित्सा से सम्बंधित सामग्री की, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कालाबाजारी देखने को इसी समय मिली. ये सब यह बताने को काफी है कि इंसान दर्द का अनुभव तभी करता है जबकि वह स्वयं उससे गुजरता है. उसके पहले उसके लिए दूसरे का कष्ट अनुभव करने वाला मामला नहीं बल्कि उससे लाभ लेने वाला मसला होता है. समझने वाली बात है कि यदि व्यक्ति इस कष्टकारी दौर में भी नहीं सुधरा है, इस आपत्तिकाल में भी उसके अन्दर का मानव नहीं जाग सका है, आपदा के इस दौर में भी वह संवेदित नहीं हो सका है तो ऐसे इंसान का पल-पल विनाश की तरफ बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति के लगातार बने रहने से समाज का भी विनाश निश्चित है, समाज का ध्वंस भी निश्चित है.


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26 अगस्त 2021

सेल्फी का जानलेवा पागलपन

अभी हमारे एक मित्र का फोन आया कि सेल्फी को लेकर युवाओं में छाये पागलपन पर कुछ लिखो. इधर बहुत लम्बे समय से कुछ मनःस्थिति ऐसी है कि कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा. ऐसी स्थिति में कुछ नया न लिख पा रहे थे. कई बार कोशिश की कि मित्र के लिए ही कुछ लिख दिया जाये मगर दिल-दिमाग ने साथ न दिया. ऐसे में एक पुरानी पोस्ट याद आई. उसी को भेज दिया उसके उपयोग के लिए. बाद में विचार किया कि उस पोस्ट को आज फिर लगाया जाये, आखिर आज भी सेल्फी का जूनून सिर चढ़ कर बोल रहा है. 


दूरसंचार तकनीक में आई क्रांति ने घर के किसी कोने में रखे फोन को मोबाइल में बदला और उसी तकनीकी बदलाव ने मोबाइल को बहुतेरे कामों की मशीन बना दिया. विकासशील देश होने के कारण अपने देश में स्मार्टफोन का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. यहाँ मोबाइल को आजकल बातचीत के लिए कम और सेल्फी फोन के रूप में ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है. कम्पनियाँ भी मोबाइल को  सेल्फी के विभिन्न लाभों के साथ बाजार में उतार रही हैं. इस कारण नई पीढ़ी तेजी से इस तरफ आकर्षित हुई है.  इसकी सशक्तता यहाँ तक तो ठीक थी मगर सोशल मीडिया के बुखार ने सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. खुद को अधिक से अधिक प्रचारित, प्रसारित करने के चक्कर में मोबाइल कैमरे का उपयोग सामने वाले की, प्राकृतिक दृश्यों के चित्र खींचने से अधिक सेल्फी लेने के लिए होने लगा है. जगह कोई भी हो, स्थिति कोई भी हो, अवसर कोई भी हो व्यक्ति सेल्फी लेने से चूकता नहीं है. 



ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. देश की गंभीर समस्याओं में से एक प्रमुख है मोबाइल कैमरे के द्वारा सेल्फी लेने में दुर्घटना होना. नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह फँस चुकी है. आज हर कोई रोमांचकहैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊंची पहाड़ी की चोटी परकभी बीच नदी की धार मेंकभी बाइक पर स्टंट करते हुएकभी ट्रेन से होड़ करते हुए. वे अपनी मनचाही तस्वीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इसमें उनमें फैशन और आधुनिक होने के भाव झलकते हैं. यह हरकत इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि ये काम पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा किया जा रहा है.

देश में पर्यटन केन्द्रों पर इस तरह के सूचना बोर्ड लगाने का काम तेजी से चल रहा हैजिसमें पर्यटकों से अनुरोध किया गया है कि वे सेल्फी लेते वक्त सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें. इसके बाद भी रोज ही दुर्घटनाएं हो रही हैं. यह समझ से पर है कि खुद को किसलिएकिसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश की जाती हैक्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए सेल्फी लेने की कोशिश की जाती हैक्यों तेज रफ़्तार बाइक परतेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर खुद को क्या सिद्ध किया जाता हैइस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा.

01 जून 2021

संवेदनहीन होकर हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. हमने खुद इस शीर्षक को लिखने के पहले बहुत सोचा मगर सच यही लगा कि हम सबने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि इस कोरोना के विषम समय में भी लोग मौत की खबरों का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. मौतों का होना एक तरह की घटना है जो उससे सम्बंधित व्यक्ति को जोड़ती है तो बहुत से लोगों को परेशान भी करती है. ऐसा समझने के बाद भी यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती.


हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. ऐसा गलत न लगे तो खुद देखिये आजकल सोशल मीडिया पर मौतों की खबरों को. ऐसे-ऐसे लोगों के बारे में लोग खबरें लगाने में लगे हैं जिनसे उनका सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है. बात यहाँ तक कुछ ठीक भी मान ली जाये मगर कुछ लोग इससे आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगे, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं? कोरोना से होने वाली मौतों, श्मशान घाट के चित्र, वीडियो, चिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है.




इधर ऐसा समझ आ रहा है कि आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.

 

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20 मई 2021

यदि मृत्यु पूर्व निर्धारित है तो.....

समाज में, परिवार में मृत्यु किसी की भी हो वो दुखद होती है. परिवार से इतर किसी व्यक्ति का निधन होने पर यदि उस व्यक्ति से परिचय होता है तो लोग दुखी हो जाते हैं और सम्बंधित व्यक्ति के साथ सीधे परिचय न होने की स्थिति में लोग मृत्यु की खबर देने वाले व्यक्ति से संवेदना प्रकट कर लेते हैं. जिस परिवार के साथ यह दुखद घटना घटित होती है वास्तविक रूप में वही अपने परिजन की मृत्यु से प्रभावित होता है. भारतीय समाज में तमाम सारे धर्म-मजहब अपने रीति-रिवाजों के अनुसार कर्मकांड करते हैं. ऐसा करना कितना आवश्यक है, इसका उद्देश्य क्या है, मरने वाले के प्रति, उसके परिजनों के प्रति उसकी क्या उपयोगिता है ये एक अलग विषयही किन्तु सनातन धर्म में, हिन्दू धर्म में इस तरह के कर्मकांड, रीतिरिवाज सम्बंधित परिवार को, परिजनों को व्यस्त रखते हैं, उन्हें एक तरह के मानसिक कष्ट से दूर रखते हैं.


सनातन संस्कृति में मृत्यु से सम्बंधित कई क्रिया-कलाप हैं. वैसे भी इसे एक संस्कार के रूप में स्वीकार किया गया है. ऐसी स्थिति होने के बाद भी कई तरह की ऐसी स्थितियाँ हैं जो भ्रमित कर सकती हैं. फिलहाल, औरों को करती हों या न करती हों मगर व्यक्तिगत रूप से हमें इनके प्रति कई बार प्रश्नवाचक मुद्रा सी बन जाती है. हमारे समाज में, संस्कृति में आम मान्यता है कि किसी भी व्यक्ति के लिए प्राकृतिक अथवा ईश्वरीय विधान में निश्चित साँसें प्रदान की गई हैं. इन साँसों के पूरा होने के पश्चात् व्यक्ति को यह संसार त्यागना पड़ता है. व्यक्ति के जीवन का अंत कब हो कहा नहीं जा सकता है. इसी अनिश्चय के चलते बहुत से लोगों ने जीवन को क्षण-भंगुर भी माना है.




यह बिलकुल सत्य है कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि कब व्यक्ति को अंतिम साँस लेनी पड़े. जीवन की इसी अनिश्चितता को निश्चित करने की दृष्टि से, मानवीय मन को सांत्वना देने की दृष्टि से कहा जाता है कि व्यक्ति का समय, स्थान, परिस्थिति आदि पूर्व निर्धारित है. उसी के अनुसार व्यक्ति को अपना शरीर त्यागना पड़ता है. यदि ऐसा है, यदि मौत की स्थिति, समय, स्थान आदि निर्धारित है तो फिर किसी भी मौत को अकाल मौत के रूप में परिभाषित क्यों किया जाता है. ऐसा बहुधा कहा जाता है कि जिनका अल्पायु में निधन हो, जो आत्महत्या के द्वारा, दुर्घटना के द्वारा मौत के मुँह में चले जाते हैं, उनकी मृत्यु अकाल मृत्यु कहलाती है. प्रचलित मान्यताओं के रूप में देखें तो आत्महत्या, दुर्घटना, अल्पायु से मृत होने वाले व्यक्ति के लिए वही सब निर्धारित रहा होगा तो उसे अकाल मृत्यु कैसे कहा जा सकता है?


इसके साथ-साथ यदि किसी भी व्यक्ति की मौत का कारण, स्थिति पूर्व निर्धारित है तो फिर किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के लिए किसी परिस्थिति, किसी व्यक्ति आदि को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? कभी संसाधनों को दोष दिया जाता है, कभी समय को, कभी व्यक्ति को. यदि व्यक्ति का जीवन-मरण पूर्व निर्धारित है तो फिर किसी को भी इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. हाँ, ये और बात है कि न्याय व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नियम-कानून बनाये गए हैं, उनका पालन किया-करवाया जाता है मगर कभी-कभी सामान्य मौत के पीछे भी सम्बंधित व्यक्ति के परिजन किसी न किसी दोषी को, किसी न किसी दोष को तलाशते रहते हैं.


फिलहाल, यहाँ यह लिखने का उद्देश्य किसी तरह का विवाद पैदा करना नहीं बल्कि अपनी व्यक्तिगत जिज्ञासा का समाधान खोजना है. संभव है कि किसी न किसी पाठक के द्वारा मौत से सम्बंधित, संस्कारों से सम्बंधित कोई आधिकारिक, पुष्ट जानकारी प्राप्त हो सके.

 

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06 मई 2021

मौत की दहशत को अपने में भरते लोग

वर्ष २०२० में कोरोना वायरस के आने के बाद लोगों में सुरक्षा को लेकर सजगता भी दिखाई दी थी और एक तरह का डर भी. उस समय डर होने का एक कारण इस बीमारी का नया-नया होना तो था ही साथ ही जिस तरह से मीडिया में इसके वैश्विक स्वरूप को दिखाया गया वह डराने वाला था. इसके साथ-साथ आये दिन आने वाले आँकड़ों, वीडियो आदि ने भी जनमानस को भयभीत कर रखा था. भय के माहौल में लोगों ने राहत लेते हुए वर्ष २०२१ में प्रवेश किया. इसी अवधि में चाक-चौबंद व्यवस्था दिखाई दी, वैक्सीन के बन जाने के समाचार आये, साथ ही कोरोना के असर का कम होना भी दिखाई दिया. इसके बाद अचानक से कोरोना वायरस ने पुनः हमला कर दिया. लोग एकदम से संक्रमित होने लगे. अचानक से कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ने लगी. सामान्य से चलते जीवन में एकदम से उथल-पुथल सी मच गई.


एकदम से संक्रमितों की संख्या बढ़ी साथ ही उससे होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ने लगी. कोरोना से होने वाली मौतों की सत्यता-असत्यता के पीछे की सबकी अपनी कहानी है मगर इसके द्वारा लोगों में दहशत पैदा होने लगी. डर का माहौल बुरी तरह से लोगों को भयानक वातावरण का एहसास कराने लगा. इस तरह के वातावरण को बनाने में जहाँ मीडिया पीछे नहीं रही वहीं सोशल मीडिया से जुड़े लोगों ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी. मौत का तांडव, लाशों के ढेर, चिताओं के मेले, मौत का नंगा नाच आदि जैसे शब्दों से समाचारों को लिखा जाने लगा. ऐसा लगने लगा जैसे लोगों को डराने के लिए, उन्हें दहशत में लाने के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा हो. समाचार, वीडियो जानकारी से अधिक हॉरर मूवी समझ आने लगे.




इन मौतों की खबरों के कारण जिस तरह का भय समाज में दिखाई दे रहा था उससे ज्यादा डर इस कारण भी बना हुआ है क्योंकि लोग अपने आसपास ही नहीं किसी दूसरे शहर में होने वाली किसी भी मौत से स्वयं को जोड़ ले रहे हैं. लोग सोशल मीडिया के द्वारा अनावश्यक रूप से मौत की खबरों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं. कुछ लोगों के लिए ऐसा करना जानकारी का संप्रेषण है तो कुछ लोग इसके पीछे सरकार की, शासन-प्रशासन की विफलता दिखाना चाहते हैं. लोगों की मंशा कुछ भी मगर इससे आमजनमानस में दहशत भरने लगी. लोग जान-परिचित वालों की मौत पर तो दुखी हो रहे हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है किन्तु बहुतायत में अब लोग अपरिचितों की मौत से भी खुद को जोड़ने लगे हैं. दिन भर की ही नहीं, अपने पड़ोस, अपने शहर की ही नहीं वरन दसियों दिन पुरानी, दूसरे शहरों-राज्यों की मौतों को अब लोग अपने सिर पर लादे घूमने लगे हैं. मौतों के ये समाचार लोगों को जानकारी देने से ज्यादा मौत के करीब ले जाने लगे हैं.


लोग अपने आसपास की मौतों से खुद को जोड़ते हुए भयाक्रांत हो रहे हैं. पिछले हफ्ते हमारे एक मित्र का फोन आया. शाम का समय था, उसकी आवाज़ में एक तरह का डर, निराशा जैसा समझ आया. उसे टोका तो उसने बताया कि वह बहुत घबराया हुआ है, कोरोना से. उसने बताया कि उसकी कॉलोनी में उस दिन तीन लोगों की मौत हो गई. पूछने पर उसी ने बताया कि तीन लोगों में दो लोग पैंसठ वर्ष से अधिक के थे और एक पचपन वर्ष के थे. इसमें भी एक बात उसने बतायी कि इन तीन लोगों में कोरोना से एक का निधन हुआ, पैंसठ वर्ष वालों का.


उसके साथ दो-चार संवेदना भरे वाक्यों के बाद पूछने पर जानकारी हुई कि वह दस-बारह साल से उस कॉलोनी में रह रहा है. उससे यह पूछने पर कि इन दस-बारह सालों में क्या उसकी कॉलोनी में किसी का निधन नहीं हुआ? उसने बताया कि इस दौरान लगभग बीस-पच्चीस लोगों का निधन हो चुका है. उसी ने बताया कि पिछले साल ही तीन लोगों का निधन हुआ.


उसकी यही बातें पकड़ते हुए हमने उससे कहा कि क्या पिछले साल की अथवा पिछले दस-बारह सालों में हुई मौतों की खबर तुमने हमें दी? क्या उन मौतों पर कभी तुमने परेशान होकर, डर कर हमें फोन किया? उसके मना करते ही उसके साथ जरा तेज़ आवाज़ में बात करते हुए कहा कि यही वो स्थिति है जो अनजाने डर को अपने में समाहित करके दहशत पैदा करती है. इसी दहशत को तुम्हारे जैसे लोग फैलाने का काम करते हैं. तुम्हारे जैसे लोग ही ऐसी खबरों से डरते नहीं बल्कि उनका प्रसारण करते हो. तुम जिसे लोग अपने डर को दूसरों के चेहरे पर भी देखना चाहते हैं ताकि समाज में सभी लोग दहशत में जीते रहें.


इसके बाद उसे बहुत से उदाहरणों से समझाते रहे, उसकी हिम्मत बढ़ाते रहे. अब वह डर से कितना बाहर आया यह तो वही जाने पर वास्तविकता यही है कि लोग अपने आपको लेकर कम डर रहे हैं और अनजाने लोगों की मौतों को अपने सिर में लाद कर डर से आगे निकल दहशत को अपने अन्दर भरते जा रहे हैं. इस समय जो माहौल है उसमें हम सभी को अनावश्यक रूप से ऐसी खबरों के प्रसारण से बचना चाहिए जो डर का पैदा करती हों. ऐसी खबरों से न केवल स्वस्थ व्यक्ति घबराता है बल्कि उनको इनसे ज्यादा खतरा है जो कोरोना संक्रमित हैं. ऐसी खबरों से लगता है जैसे चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मौतें हो रही हैं. यदि स्वस्थ होने वालों और मौतों का आँकड़ा देखें तो स्पष्ट अंतर दिखाई देता है. हमारे देश में कोरोना संक्रमण से स्वस्थ होने वालों की संख्या बहुत अधिक है और मौतों की संख्या दो प्रतिशत से अधिक नहीं है.


इस विपत्ति के समय में यदि किसी का सहयोग नहीं किया जा सकता है तो कम से कम किसी को डराने का काम तो न किया जाये. समझ से परे है कि आखिर इस भय का ऐसा माहौल क्यों बनाया जा रहा है? कहीं इसके पीछे भी आपदा में अवसर बनाने वाला बाज़ार तो नहीं?


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वंदेमातरम्

28 अप्रैल 2021

डराने का ट्रेंड चल पड़ा है सोशल मीडिया पर

कोरोनाकाल फिर एक बार सबको डराने में लगा है. इस डर के पीछे एक कारण लोगों का अनावश्यक रूप से दहशत फैलाना भी है. बहुतेरे लोग ऐसा जानबूझ कर करने में लगे हैं और बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसा अनजाने में करने में लगे हुए हैं. कोरोना संक्रमित लोगों में से बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस आये हैं. सरकारी आँकड़ों पर ध्यान न देकर यदि अपने आसपास ही नजर दौड़ाएं तो हमें बहुत से लोग ऐसे मिल जायेंगे जो स्वस्थ हो गए हैं. इसके बाद भी हम सभी को सोशल मीडिया पर लोगों के निधन की खबरें ही बहुतायत में देखने-सुनने को मिल रही हैं. इससे एक दहशत भरा माहौल सोशल मीडिया पर बना हुआ है.






दरअसल इसे भी एक ट्रेंड की तरह से देखा जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान समय में सबकुछ बाजार की तरह से हमारे सामने आता है. यही बाजार अब हर एक काम के लिए एक तरह का ट्रेंड बना देता है. यही ट्रेंड आजकल चल पड़ा है कि यदि किसी की मृत्यु की सूचना दी जाती है तो तमाम ऐसे लोगों में शोक संवेदना व्यक्त करने की होड़ मच जाती है जो उस दिवंगत व्यक्ति की बीमारी की खबर पाकर उसका फोन भी नहीं उठाते थे. दिवंगत के अपरिचित होने के बाद भी ये भेड़चाल मची रहती है. ठीक है, हमारी संस्कृति, परम्परा में दिवंगत के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना है मगर बहुत से काम देशकाल, परिस्थिति के अनुसार भी करने चाहिए.


समस्त संवेदनशील लोगों से अनुरोध है कि विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त शोक संदेश को सूचना के तौर पर पढ लें और मन ही मन ईश्वर से आत्मा की मोक्षप्राप्ति की प्रार्थना करें. लगातार ॐ शान्ति, दुखद, RIP इत्यादि लिखकर अस्वस्थ लोगों का मनोबल न गिराएं. बेहतर हो कि दिवंगत के परिजनों से मिलकर या उन्हें फोन कर उनके समक्ष अपनी भावनाएँ व्यक्त करें.


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वंदेमातरम्

26 अप्रैल 2021

आत्मविश्वास और जिजीविषा से ज़िन्दगी को जीवन देना

ज़िन्दगी उतनी भी हसीन नहीं जितनी हम समझते हैं और मौत उतनी भी भयानक नहीं जितनी हमने मान रखा है. ऐसा अपने अनुभव के आधार पर ही कहा जा सकता है. ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने जिन्दगी को करीब से जिया है, महसूस किया है वह समझ सकता है. असल में हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी जीना भूल चुके हैं या कहें कि ज़िदगी जीना ही नहीं जानते. आज भी बहुतायत लोग खाने-कमाने को ही ज़िन्दगी माने बैठे हैं. यही कारण है कि ऐसे लोगों की सोच के कारण न केवल इनकी ज़िन्दगी वरन सम्पूर्ण समाज का ढाँचा विकृत स्थिति में पहुँच गया है. इन लोगों के लिए सुबह उठने से लेकर रात सोने तक सिर्फ अपने परिवार के चंद लोगों की चिंता करना ही ज़िन्दगी है. ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ में संकुचित रहना ही ज़िन्दगी है. यही लोग वे हैं जो ज़िन्दगी को एक निश्चित दायरे से बाहर जाने देना नहीं चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही ज़िन्दगी दिव्य और भव्य होती है. देखा जाये तो ज़िन्दगी इससे कहीं अधिक बड़ी है, विस्तृत है. ज़िन्दगी का तात्पर्य सिर्फ अपना परिवार नहीं. ज़िन्दगी का मतलब अपने परिजन नहीं. ज़िन्दगी का मतलब चंद लोग नहीं हैं.




अपने आपमें व्यापक अवधारणा और विस्तृत सन्दर्भ को अपने में संजोये रखती है ज़िन्दगी. उसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक परिवार का कोई मोल नहीं. असल में ज़िन्दगी एक व्यक्ति से आरम्भ होकर अपने में सम्पूर्ण का प्रसार करती है. वह आरम्भ तो होती है किसी एक व्यक्ति के द्वारा और फिर अपना विस्तार करते हुए उसे सन्दर्भ प्रदान करती है. ज़िन्दगी का विस्तार और संकुचन भले ही संदर्भित व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में सुखद दिखाई देता हो मगर मूल रूप में वह अत्यंत कष्टप्रद होता है. जिसने ज़िन्दगी का सन्दर्भ व्यापकता में देखा हो उसे ज़िन्दगी कष्टप्रद ही नहीं भयावह नजर आती है. विगत कुछ दिनों में न केवल हमने बल्कि हम जैसे अनेक भाइयों ने ज़िन्दगी की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-महसूस किया है. ज़िन्दगी के आनंद के क्षणों को कहीं गायब होते देखा है. पल-पल ज़िन्दगी के रूप में मौत को पास आते देखा है. ऐसा हमने हर उस स्थिति में महसूस किया है जबकि हमने ज़िन्दगी को आपस में एक-दूसरे से जोड़ कर देखा है.


आज किसी भी फोन की घंटी पर सहम जाना, किसी भी मैसेज की आवाज़ पर सिहर जाना, बातचीत का सिरा पकड़ते हुए आवाज़ में कम्पन आना सब कुछ ऐसा होता जा रहा है जो बता रहा था कि हम सब एक हैं मगर कहीं न कहीं भीतर से डरे हुए हैं. इस एक होने के बाद भी हम सब ज़िन्दगी का संगठित रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे. बहुत से लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी के अनमोल पलों में से बहुत सारा जीवन जरूरतमंद लोगों को देने को तैयार बैठे हैं मगर ज़िन्दगी के द्वारा ज़िन्दगी नहीं दी जा सकती है. यही कारण है कि सुखद होने के बाद भी ज़िन्दगी अत्यंत भयानक है. जहाँ एक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी का सुखद पल अपने साथ लिए बैठा होता है और उसी का अभिन्न भाई ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी का एक-एक पल अपने लिए तलाश रहा होता है. ये तो विश्वास, संयम, हिम्मत रखने वाली बात है, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से अलग नहीं होने देने का जज्बा है कि बहुतेरे लोग आज भी अपने आत्मविश्वास, अपनी जिजीविषा के चलते ज़िन्दगी को सुरक्षित रख ले जा रहे हैं. विश्वास, स्नेह, आशीर्वाद की दम पर ज़िन्दगी को अपने बगल में बैठा लेने पर मजबूर कर देने वाले अपने सभी परिचितों, अपरिचितों, मित्रों, परिजनों, सहयोगियों के दीर्घायु होने की कामना.


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वंदेमातरम्

11 जनवरी 2021

शास्त्री के साथ क्या हुआ था?

जब साल 1966 के अप्रैल में ताशकंद में आए एक विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों जानें चली गयी, तब सलामत बचे लोगों में कुछ को ऐसा लगा कि जैसे ईश्वर भारतीय प्रधानमंत्री की उनके यहाँ उसी साल हुई मौत से नाराज थे. कुछ महीनों बाद आँखों में आँसू लिए ललिता शास्त्री उस विला को देखने को पहुँचीं, जहाँ उनके पति को ठहराया गया था. एक महिला कर्मचारी उन्हें उस बेडरूम तक ले गई, जहाँ शास्त्री ने अपनी आखिरी साँस ली थी. शास्त्री का कमरा दिखाते वक्त वो उज्बेकी महिला अपनी भवों में सिलवटें डालकर गंभीरता से फुसफुसाई... “कोई टेलीफोन नहीं”- यानी अपने आखिरी वक्त में भारतीय प्रधानमंत्री एक तरह से बाकी दुनिया से कटे हुए थे.


लोगों को संदेह था कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बारे में आधिकारिक तौर पर जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ न कुछ जरूर छिपाया गया था. शास्त्री की मौत से जुड़ी शंकाओं के बारे में जहाँ ताशकंद में दबी जुबान में बातें होती थीं, तो वहीं उन दिनों भारत में यही चर्चा सबसे बड़ा विषय था. आज भी ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यमई हालत में लापता होना देश के सबसे विवादित सियासी मसले हैं.


शास्त्री की मौत हमारे दिलो-दिमाग में आज भी कुछ ऐसे बसी है कि जब भी उनका जिक्र होता है, चर्चा खुद-ब-खुद जनवरी 1966 के उस घटनाक्रम तक पहुँच जाती है. आखिर उस दिन ताशकंद में क्या हुआ था? शास्त्री जी जैसे महान व्यक्तित्व को किसी किस्म के प्रचार की जरूरत नहीं है. उनकी सादगी और ईमानदारी हमारे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज है. लेकिन ये सवाल आज भी चुभता है कि आखिर हमारे प्रधानमंत्री की किसी विदेशी जमीन में संदिग्ध मौत पर कभी कोई जाँच क्यों नहीं की गई? जबकि यह हमारे अब तक के इतिहास का इकलौता ऐसा मामला है.


ऐसा भी नहीं है कि ये मामला कभी देश के सामने नहीं लाया गया हो. संसद में शास्त्री के लिए शोक सन्देश पढ़े जाने के फ़ौरन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा था: “ताशकंद में क्या हुआ? क्या उनकी मृत्यु को टाला नहीं जा सकता था? क्या यह संभव नहीं था कि बिस्तर से बिना उठे ही वह अपने डॉक्टर को और नौकर को बुला सकते? क्या यह संभव नहीं था कि वहाँ ऑक्सीजन की व्यवस्था होती? जो पाँच या सात मिनट मिले थे, उसमें अगर उचित प्रबंध होता, तो शायद हम उन्हें बचा पाते?”


लेकिन भला कौन था-जो शास्त्री जी को मृत देखना चाहता था? उनके बचपन के दोस्त टीएन सिंह के मुताबिक वो ‘अजातशत्रु’ (जिसका कोई शत्रु न हो) थे. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए भी मानती थी कि 40 साल के सियासी सफ़र में शास्त्री के न के बराबर ही दुश्मन थे. ऐसे में कौन था जिसको शास्त्री की मौत से फायदा होता? आखिर भारत के खिलाफ ऐसे खतरनाक अपराध की सोच के पीछे भी भला क्या मकसद हो सकता था?




उनकी मौत पर कभी कोई जाँच नहीं हुई, क्योंकि सरकार हमेशा यही कहती रही कि शास्त्री की मृत्यु हार्ट अटैक से ही हुई है. उनके अनुसार शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. कुछ लोगों ने ‘दाल में कुछ काला’ होने के आरोप भी लगाये, लेकिन सरकार ने इस मामले में अपने आधिकारिक स्टैंड को बदलना दूर उस पर दोबारा गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा. जाँच को लेकर उठी आवाजें धीरे-धीरे खामोश हो गईं. बीच-बीच में सुभाष चन्द्र बोस के लापता होने के विवाद के साथ ये मामला भी उठाया जाता रहा. कुछ वक्त बाद दोनों ही मसले एक ही चश्मे से देखे जाने लगे. 1970 में जब समर्थकों के दवाब में सरकार बोस के मामले की न्यायिक जाँच कराने को तैयार हो गई, तब शास्त्री के समर्थकों ने भी (इनमें से ज्यादातर लोगों ने बोस के मामले में भी आवाज़ उठाई थी) उनके केस की जाँच के लिए भरसक कोशिशें की, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं हुआ. उसी साल से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.


तो फिर हम आज साल 2019 में इस मामले को लेकर इतना गंभीर क्यों हैं? शास्त्री के निधन के 54 सालों बाद उस घटना को कुरेदने से भला क्या हासिल होगा? दरअसल मेरा मकसद है कि इस मुद्दे पर पूर्णतः विराम लगना चाहिए, जो कि आज तक नहीं हो पाया है. ऐसा तभी संभव होगा जब इस घटना की तह तक पहुँचने की कोशिश की जाये, ताकि उस रात की एक मुकम्मल तस्वीर सामने आ सके. आज भी कई लोग हैं जो उस घटना की पूरी सच्चाई जानना चाहते हैं. खासकर शास्त्री जी के परिजन, जो आज भी उस हादसे से उबर नहीं सके हैं. उस भयावह रात के बारे में सोचकर अभी भी उनके दोनों बेटों की आँखें डबडबा आती हैं. उस रात फोन पर शास्त्री जी की हालत नाजुक होने का संदेशा मिलने के बाद उनके परिवार के लोग अगले आधे घंटे तक भगवान के आगे प्रार्थना करते रहे, लेकिन...


सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े विवाद पर एक मशहूर किताब लिखने के बाद मुझे ‘शास्त्री’ की संदिग्ध मौत पर लिखने के लिए भी कई सुझाव दिए गए. मैं उन सुझावों को टालता रहा. दरअसल मेरे पास ऐसा न करने की दो वजहें थीं. एक तो यह कि ‘बोस’ के मामले के उलट शास्त्री की मौत के केस में आधिकारिक तौर पर कुछ जानकारियाँ नहीं थीं. इसको लेकर दाखिल की गई मेरी आरटीआई (शास्त्री की मौत से जुड़े मामले में दाखिल की गई ये पहली RTI थी) से भी बस कुछ खबरों और लेखों के लायक जानकरी ही हासिल हो सकी थी. भले ही दोनों मामलों में चर्चा एक साथ की जाती हो लेकिन नेता जी और शास्त्री जी के मृत्यु के मामले एक लिहाज में बिलकुल अलग हैं – एक तबके का मानना रहा है कि नेताजी अपनी मृत्यु की अधिकारिक तारीख के बहुत बाद भी जिन्दा थे, जबकि शास्त्री जी की मृत्यु यकीनन ताशकंद में ही हो गई थी. लिहाजा नेताजी के मामले में खोजबीन के लिए भी काफी कुछ था. जबकि शास्त्री के केस में सिर्फ यही तय करना था, कि क्या उनकी मौत प्राकृतिक थी या नहीं? बिना पर्याप्त जानकारी और तथ्यों के इस घटना को लेकर एक ठोस, सटीक और संवेदनशील कहानी बुनना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम मुश्किल नहीं था.


इस किताब को न लिखने के पीछे मेरा दूसरा तर्क था कि कहीं मेरी पहचान राष्ट्रीय नेताओं की मौत पर लिखते रहने वाले लेखक के तौर पर न बन जाए! हालाँकि मेरा मकसद ऐसी गुत्थियों को सुलझाने का है. इसलिए शास्त्री केस पर कई बेहद चर्चित और सराहे गए लेखों को लिखने के बाद भी मैं इस मुद्दे पर किताब लिखने को लेकर इच्छुक नहीं था.


लेकिन कुछ महीनों पहले मैं दिल्ली में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री के साथ खाने की मेज पर बैठा था. इसी दौरान पहली बार मेरे दिमाग में इस किताब को लिखने का ख्याल आया. अग्निहोत्री इसी मामले को लेकर ‘द ताशकंद फाइल्स’ के नाम से एक फिल्म ला रहे हैं. उनकी इस फिल्म के लिए जरूरी तथ्य जुटाने के बाद कुछ सार्थक और बेहतर करने की चाह में मैंने अपनी हिचकिचाहट को दरकिनार कर इस किताब पर काम शुरू किया, ताकि फिल्म के साथ बने माहौल के बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मसले को एक अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाया जा सके.



(अनुज धर जी की प्रसिद्द पुस्तक शास्त्री के साथ क्या हुआ था? का प्राक्थन, साभार, लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर)
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वंदेमातरम्