01 June 2021

संवेदनहीन होकर हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. हमने खुद इस शीर्षक को लिखने के पहले बहुत सोचा मगर सच यही लगा कि हम सबने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि इस कोरोना के विषम समय में भी लोग मौत की खबरों का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. मौतों का होना एक तरह की घटना है जो उससे सम्बंधित व्यक्ति को जोड़ती है तो बहुत से लोगों को परेशान भी करती है. ऐसा समझने के बाद भी यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती.


हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. ऐसा गलत न लगे तो खुद देखिये आजकल सोशल मीडिया पर मौतों की खबरों को. ऐसे-ऐसे लोगों के बारे में लोग खबरें लगाने में लगे हैं जिनसे उनका सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है. बात यहाँ तक कुछ ठीक भी मान ली जाये मगर कुछ लोग इससे आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगे, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं? कोरोना से होने वाली मौतों, श्मशान घाट के चित्र, वीडियो, चिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है.




इधर ऐसा समझ आ रहा है कि आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.

 

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2 comments:

  1. बिलकुल सही लिखा है आपने। संवेदनाएं मर चुकी है क्योंकि नीचता की हद जो पार हो चुकी है।

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  2. ऐसा नहीं कि सभी कि संवेदनाएँ मर चुकी हैं. परन्तु यह भी सही है कि मृत्यु की ख़बर दहशत फैलाती है. जिनका अपना कोई चला गया दुःख तो उनके लिए होता ही है परन्तु जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से जानते उनके लिए भी होता है. अगर पत्रकारिता की बात करें तो निःसंदेह वे सभी इस माहौल को और भी चटकारे के साथ परोसते हैं, जो दुखद है. कई बार गलत खबर भी प्रचारित हो जाता है. सही कहा आपने कि मौत को लोग एन्जॉय करने लगे हैं. अन्यथा मृत्यु की खबर इतनी बिकती नहीं.

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