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28 नवंबर 2022

प्रेम के प्रति संकुचित दृष्टिकोण

अक्सर हम मित्रों के बीच प्रेम, प्यार, इश्क को लेकर चर्चा छिड़ जाती है. चर्चा तो इन शब्दों पर न जाने कब से चलती चली आ रही है किन्तु इसका कोई निष्कर्ष निकलता नहीं दिखाई दिया. प्रेम, प्यार जैसे विषय पर जितने लोग उससे कहीं ज्यादा बातें देखने को मिलती हैं. एक ऐसा देश जहाँ प्रेम के प्रतीक राधा-कृष्ण की पूजा होती है वहाँ प्रेम के नाम पर बहुत बड़ा संशय बना हुआ है. खैर, बात इस पर बाद में, जैसी कि पोस्ट का आरम्भ किया था दोस्तों की चर्चा से तो बात वहीं. दोस्तों की चर्चा इस विषय पर इसलिए भी होती है क्योंकि हमारा इस विषय पर बहुत अलग नजरिया है. देखा जाये तो प्रेम, प्यार पर अलग दृष्टि से ही सोचने की आवश्यकता है. हम दोस्तों के बीच भी अक्सर यही बिंदु उभर कर सामने आता है.


यदि इस विषय पर और कोई बात न करते हुए प्यार शब्द को ही देखें तो इसके मायने रिश्तों के अनुसार बदलते भी रहते हैं. यदि एक व्यक्ति कहे कि उसे अपने पिता से प्यार है तो इसके सन्दर्भ अलग होंगे. वही व्यक्ति कहे कि उसे अपनी माँ से प्रेम है तो इसके सन्दर्भ भी अलग हो सकते हैं. इसी तरह यदि वही व्यक्ति कहे कि उसे अपने भाई से, बहिन से, बाबा, दादी, नाना, नानी आदि-आदि से प्रेम है तो इसमें सबके लिए एक स्पष्ट सा नजरिया दिखेगा किन्तु जैसे ही वही व्यक्त कहे कि उसे अपनी सहकर्मी से प्रेम है या उसे अपने साथ में पढ़ने वाले/वाली से प्रेम है तो सुनने वाले की मानसिकता में तुरंत बदलाव दिखाई देगा. ऐसा क्यों? यदि अभी तक विभिन्न रिश्तों, संबंधों में प्रेम किसी तरह से संशय का विषय नहीं बना था तो सहकर्मी या फिर सहपाठी के नाम पर प्रेम शब्द ने अर्थ कैसे बदल लिया?




असल में प्रेम को संबंधों के साथ, रिश्तों के नाम पर बाँट दिया गया है. यही कारण है कि प्रेम का अर्थ शारीरिक संबंधों से, विवाह से लगाया जाने लगा है. ऐसा माना जाने लगता है कि दो व्यक्तियों में उसी स्थिति में प्यार या प्रेम को स्वीकार्यता है जबकि वे स्त्री-पुरुष न हों. यदि ऐसा स्त्री और पुरुष के बीच पाया जाता है तो वो अनैतिक होता है. दोस्तों के बीच की चर्चाओं में इस विषय पर बहुत अलग तरीके से सोचने को, बात करने को मिलता है. देखा जाये तो समाज में अभी भी प्यार के नाम पर बहुत ही संकुचित मानसिकता पाई जाती है. इसे लेकर व्यापक दृष्टिकोण के लिए जरूरी है कि इस विषय पर खुलकर बातचीत हो. समाज में प्रेम के नाम पर जिस तरह की खाँचेबंदी है वह इसे बदनाम करने के और कुछ नहीं कर रही है. अत्यंत पवित्र अवधारणा, पावन परंपरा को संकुचित मानसिकता ने गन्दा कर रखा है.


इक्कीसवीं सदी बदलाव की सदी है, बहुत कुछ बदल भी रहा है मगर प्रेम के प्रति बनी संकुचित मानसिकता में बदलाव नहीं दिखाई दिया है. प्रेम के रूपों में बदलाव आ गया है मगर उसके प्रति बनी धारणा में बदलाव नहीं आया है. तमाम बदलावों, परिवर्तनों के बीच जब तक प्यार, प्रेम को समझने की दशा में, उसके प्रति सोच में बदलाव नहीं आता है तब तक इस विषय के प्रति सोच ऐसे ही संकुचित बनी रहेगी. 





 

23 फ़रवरी 2022

जब प्यार करे दिल तो.....

समय ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से रंगीन से गुजरता हुआ बहुरंगी होता चला गया. सेल्युलाइड की दुनिया वीनस गर्ल से निकल कर धक-धक गर्ल, मिर्ची गर्ल, कांटा गर्ल, चोली गर्ल की राह से गुजरती हुई नग्न-अर्धनग्न कमनीय बालाओं के साथ लगातार आगे बढ़ती रही. इन सबके बीच भी लोगों के स्वभाव बदले, रुचियाँ बदलीं, पसंद बदलीं, पसंदीदा व्यक्ति बदले. बदलाव के इस दौर में यदि कुछ बदलता न दिखा तो वो है अभिनेत्री मधुबाला के प्रति लोगों का आकर्षण. अपने समय में वीनस गर्ल के रूप में मशहूर मधुबाला के प्रशंसक आज भी उतने ही मिल जाते हैं, जितने कि उनके दौर में मिलते होंगे. ऐसा तब है जबकि उनको इस दुनिया को हमेशा-हमेशा को अलविदा कहे हुए आधी सदी से अधिक समय बीत गया है.

 

मधुबाला के प्रति आकर्षण के सम्बन्ध में जब हम खुद अपने को देखते हैं तो आश्चर्य होता है. हमारे इस संसार में आने के चार-पांच साल पहले मधुबाला इस संसार को अलविदा कह गई थी. हमारे समय की और उसके बाद जन्मने वाली पीढ़ी ने मधुबाला को सिर्फ परदे पर ही देखा है, टीवी पर देखा है और अब इंटरनेट के माध्यम से कई-कई सोशल मीडिया मंचों पर देख रही है. इस पीढ़ी ने कभी भी उनको लाइव रूप में नहीं देखा है, किसी कार्यक्रम में उनसे परिचय नहीं हुआ है, किसी समारोह में उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं मिला है, किसी आयोजन में उनके ऑटोग्राफ लेने का मौका भी नहीं मिला है इसके बाद भी मधुबाला की मनमोहक छवि इस पीढ़ी के बीच भी जीवित है.

 

इंटरमीडिएट तक की शिक्षा के दौरान घर-परिवार में ही रहना हुआ. उसी दौरान परिवार के अनुशासन में जितना टीवी, वीडियो देखने को मिला उसी में पुरानी फिल्मों को खूब देखने का अवसर मिला. उस समय बहुत सारे अभिनेता-अभिनेत्रियों के बीच मधुबाला सर्वाधिक आकर्षक महसूस हुईं. हँसने का अंदाज, आँखों की शरारत और उनकी अदाकारी ने उनके प्रति अजब सी दीवानगी पैदा कर दी थी. घर के अनुशासन में, छोटे से घर में कभी हिम्मत ही नहीं कर सके कि मधुबाला के पोस्टर कमरे की दीवारों पर लगा सकते किन्तु पत्रिकाओं में, अख़बारों में कभी-कभी निकलती फोटो किताबों, कापियों की शोभा बनती. किताबों, कापियों के कवर के रूप में भी कभी-कभी मधुबाला का चित्र आँखों के सामने दिखता रहता. बाद में आगे की पढ़ाई के लिए जब बाहर निकलना हुआ तब अपनी इस इच्छा को जीभर कर पूरा किया गया. हॉस्टल के अपने कमरे में अलग-अलग अंदाज में मधुबाला अवतरित होने लगीं. हमारे कमरे में उसका चौबीस घंटे रहना हुआ करता था. जिस तरफ नजर दौड़ते मधुबाला ही मधुबाला नजर आती थी. कमरे की तीन दीवारों पर छोटे-बड़े कई रूपों में मधुबाला उपस्थित रहती थीं और एक दीवाल माधुरी दीक्षित के लिए रख छोड़ी थी.

 

बहुत से लोगों के लिए यह मजाक का विषय बन जाता है कि मधुबाला आज भी हमारे मोबाइल में, लैपटॉप में वॉलपेपर के रूप में उपस्थित रहती हैं. मधुबाला से कब प्रेम सा हो गया पता नहीं मगर जिस दिन से उनसे प्रेम जैसा कुछ हुआउस दिन से उनको अपने से अलग नहीं किया है. स्कूल के दिनों में हमारे कुछ दोस्त मधुबाला से चोरी-छिपे मिलवाने में हमारी मदद कर देते थे. कभी किसी पत्रिका के चित्र, कभी उन दिनों हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले पोस्टकार्ड आकार के कार्ड गिफ्ट करके. चूँकि मधुबाला के प्रति हमारे इस प्रेम या आकर्षण के बारे में हमारे दोस्तों को, हमारे परिजनों को, हमारे सभी परिचितों को भली-भांति जानकारी है, सो गाहे-बगाहे मधुबाला से कोई न कोई किसी न किसी रूप में मुलाकात करवा ही देता है.

 


अभी कुछ वर्षों पहले हमारी भांजी ने हमारे जन्मदिन पर मधुबाला के चित्रों से अलंकृत एक डायरी हमें भेंट करके उससे मुलाकात करवा दी. वह डायरी आज भी हमारी बुक-सेल्फ में इस तरह से लगी हुई है कि उसकी छवि आँखों के सामने बनी रहती है. कई सारे दोस्त इस बात पर हमारी मौज लिया करते कि शादी के बाद मधुबाला की एक फोटो भी न लगा पाओगे, पोस्टर तो बहुत बड़ी बात है. ये दीवानगी ही कही जाएगी कि आज शादी को भी लगभग दो दशक होने को आये हैं मगर कमरे में मधुबाला अपने पूरे सौन्दर्य के साथ ज्यों की त्यों उपस्थित हैं. तकनीकी दौर ने हाथों में मोबाइल पकड़ाया तो मधुबाला कमरे के साथ-साथ वहाँ भी उपस्थित रहने लगीं.

 

संभव है कि आज की एकदम नवोन्मेषी पीढ़ी ने सौन्दर्य के प्रतिमान बदल दिए हों. उसके लिए सौन्दर्य का सम्बन्ध कम वस्त्रों से, कामुक मुद्राओं से, अर्धनग्न प्रदर्शन से, आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता से होने लगा हो किन्तु इसके बाद भी बहुतायत में ऐसे युवा आज भी मिलते हैं जो मधुबाला के प्रशंसक हैं. आज २३ फरवरी को मधुबाला की पुण्यतिथि है. उनको श्रद्धा-सुमन इस आकांक्षा के साथ कि उनका अप्रतिम मनमोहक रूप-सौन्दर्य सदैव समाज में अंकित रहे. वीनस गर्ल के रूप में उनकी छवि और भी चमकती रहे.



(यह इस ब्लॉग की 2150वीं पोस्ट है.)

05 अप्रैल 2021

प्यार उससे तब भी था, आज भी है

बहुत से लोगों के लिए यह मजाक का विषय बन जाता है कि मधुबाला आज भी हमारे मोबाइल में, लैपटॉप में वॉलपेपर के रूप में उपस्थित रहती हैं. मधुबाला आज भी हमारे आसपास किसी न किसी रूप में मौजूद रहती हैं. मधुबाला से कब प्रेम सा हो गया पता नहीं मगर जिस दिन से उनसे प्रेम जैसा कुछ हुआ, उस दिन से उनको अपने से अलग नहीं किया है. अपने छात्र जीवन में जबकि घर में फ़िल्मी कलाकारों के पोस्टर लगाना प्रतिबंधित जैसा था, उस समय स्कूल आने-जाने के समय एक दुकान से फ़िल्मी कलाकारों के प्रिंट वाले पोस्टकार्ड ले लिया करते थे या फिर घर में आई पत्रिकाओं में से मधुबाला के चित्र निकाल लिया करते थे.


स्कूल के दिनों में अपनी मधुबाला से चोरी-छिपे मिल लेते थे. हम दोनों के प्रेम के बारे में हमारे कुछ दोस्तों को भी जानकारी थी सो मिलवाने में वे भी मदद कर देते थे. स्कूल के बाद जब कॉलेज में पढ़ने के दौरान हॉस्टल में रहना हुआ तो उस समय मधुबाला से मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई. हमारे कमरे में उसका चौबीस घंटे रहना हुआ करता था. जिस तरफ नजर दौड़ते मधुबाला ही मधुबाला नजर आती थी. कमरे की तीन दीवारों पर छोटे-बड़े कई रूपों में मधुबाला उपस्थित रहती थीं और एक दीवाल माधुरी दीक्षित के लिए रख छोड़ी थी. मधुबाला की यह उपस्थिति कॉलेज से, हॉस्टल से आने के बाद भी बनी रही. कमरे में, पुस्तकों की दीवार में मधुबाला कभी खुलेआम, कभी छिपकर हमसे मिलने आने लगीं.


(वर्ष 2005 की हमारे स्टडी रूम की फोटो)

कॉलेज से, हॉस्टल से लौट कर आने के बाद हमने अपनी पढ़ाई के लिए एक कमरे का चयन घर में कर लिया. यद्यपि यह कमरा ड्राइंग रूम के रूप में जाना जाता था तथापि ऐसा उसी स्थिति में होता था जबकि कोई पिताजी से मिलने को आता. इसके बिना अन्य किसी भी स्थिति में यह हमारा स्टडी रूम हुआ करता था. इसमें सामने की दीवार पर मधुबाला का बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था. उसके अगल-बगल हमने अपनी कई फोटो लगा रखी थीं. उन्हीं दिनों का एक किस्सा बराबर याद आता है और उसे याद करके खूब हँसी आती है. उन दिनों भोपाल से मामा जी का किसी काम से आना हुआ. बाहर बने उस ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम में उनका बैठना हुआ. स्वाभाविक है कि सामने लगे बड़े से पोस्टर में उनकी नजर भी पड़नी थी. तमाम सारी बातों, मामा-भांजे वाली हँसी-मजाक की बातों के बीच मामा जी ने कहा बच्चू, इसके चक्कर में न पड़ो. ये जिंदा भी होती तो तुमको बुड्ढी मिलती. चक्कर चलाना है तो किसी अपनी उम्र वाली से चलाओ.


उस दिन तो सबने खूब ठहाके लगाये, हमारा मजाक बनाया उसके बाद भी इस बात पर खूब हँसी-मजाक होता रहा. आज भी इस बात पर हमारे साथ छेड़छाड़ हो जाती है. कुछ भी हो मधुबाला आज भी हमारे प्रेम के रूप में हमारे साथ मौजूद है. किसी ने कितना सही लिखा है, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल दिल.


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वंदेमातरम्

09 जनवरी 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

08 जनवरी 2021

दिल से दिल के जुड़ाव में मनोभावों की पावनता

समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबंधों, रिश्तों की परिभाषा को अलग-अलग स्वरूप, अलग-अलग आयाम दिए हैं. गुजरते समय में रिश्ते भी जुड़े होते हैं, सम्बन्ध भी जुड़े होते हैं, इन्सान भी जुड़े होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.




दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.


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वंदेमातरम्

28 दिसंबर 2020

हमारा दिल तो बच्चा है जी

दिल वाकई बच्चा ही होता है. यह किसी फिल्म का डायलाग मात्र नहीं कि दिल तो बच्चा है बल्कि इसे बहुत से लोगों ने अपने जीवन में इस फ़िल्मी डायलाग के पहले भी महसूस किया होगा, इस पंक्ति को कई बार बोला भी होगा. ये भी नहीं कह सकते कि ऐसा सबके साथ होता होगा क्योंकि बहुतेरे लोगों ने अंधी दौड़ में भागते हुए अपने दिल को ही नहीं मारा है बल्कि उसके बचपने को भी मार डाला है. यह आश्चर्य लगेगा आपको मगर यह सत्य है. असल में व्यक्ति की उम्र कितनी भी क्यों न हो जाए, उसके पास अनुभव कितना ही क्यों न हो जाए, वह किसी भी पद पर क्यों न पहुँच जाए मगर उसके अन्दर का बच्चा, उसके दिल का बचपना कभी बड़ा नहीं होता. गौर करिए, मौका मिलते ही, कोई ऐसा अवसर आने पर जबकि बच्चों के साथ घुलने-मिलने का समय हो तो कोई भी व्यक्ति अपना पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा भुलाकर बच्चों के साथ आनंदित होने लगता है, उनके साथ खेलने लगता है.


दिल का यह बचपना, दिल का इस तरह बच्चा होना बहुत से लोग जीवित बनाये रखते हुए अपनी उम्र के साथ-साथ उसे साथ लिए रहते हैं. इसके उलट बहुत से लोग जीवन के एक मोड़ पर उस बच्चे को कहीं पीछे छोड़ देते हैं, उसकी हत्या कर देते हैं. आज बात दूसरों की नहीं बल्कि खुद अपनी. ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद, उम्र का एक बहुत बड़ा भाग निकालने के बाद, सामाजिक जीवन से बहुत सुखद-दुखद अनुभव हासिल करने के बाद भी हम अपने दिल को अकेला नहीं छोड़ सके हैं. दिल आज भी बचपना करता है. आज भी हमारा मन करता है तो सड़क पर चीखते-चिल्लाते हैं, जैसे कि कभी कॉलेज, स्कूल के समय में करते थे. आज भी मन करता है तो किसी भी कार्यक्रम के पसंद न आने पर हूटिंग करते हैं, मुँह में उँगली डालकर सीटी मारते हैं. दिल की ऐसी हरकतों के साथ-साथ आज भी वे हरकतें भी हमारा दिल कर जाता है जो टीनएजर्स की हरकतें कही जाती हैं.




जी हाँ, हमारा दिल आज भी इश्क, मुहब्बत फरमाने से बाज़ नहीं आता है. फ्लर्ट करने जैसी स्थिति भले ही हम न बनने देते हैं मगर आज भी आये दिन पहली नजर का प्रेम हम कर बैठते हैं. इसके अलावा भी हमारा दिल मुहब्बत कर बैठता है. इस मुहब्बत का इजहार, इकरार करना या न करना उसकी नितांत व्यक्तिगत स्थिति है. हो सकता है कि इस पोस्ट को पढ़ने के साथ ही बहुत से लोगों को आपत्ति होने लगेगी. आपत्ति इसलिए क्योंकि जब कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से अपना दायरा बना ले तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो गधे की तरह सिर झुकाए खड़ा रहे, अपने को बौद्धिक बनाये रहे. कोई क्या कहता है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है, हम आज भी वही करते हैं जो हमें अच्छा लगता है, हमारे दिल को पसंद आता है.


इसे पता नहीं हमारी स्वीकारोक्ति समझी जाए या फिर कुछ और मगर सच यही है कि यदि आप किसी को निस्वार्थ भाव से पसंद करते हैं, उसके प्रति गलत ख्याल नहीं रखते हैं तो किसी को प्रेम करना, उसे पसंद करना किसी भी रूप में गलत नहीं, ऐसा हमारा मानना है. कोई न कोई आये दिन अपनी किसी न किसी व्यक्तिगत चारित्रिक विशेषता के कारण, अपने गुणों के कारण, अपने कार्यों के कारण पसंद आता रहता है तो इसमें हमें कुछ भी बुरा नहीं समझ आता है. इन दिनों कुछ ऐसा हो भी रहा है. किसी के प्रति एक आकर्षण सा महसूस हो रहा है. ऐसा एहसास खुद में हो रहा है कि उसका साथ ख़ुशी भी देता है, दिल को संतुष्टि देता है. यह एक सामान्य सी स्थिति है और इसको लेकर किसी भी तरह की असामान्यता, असहजता नहीं है. यदि कहा जाता है कि दिल तो बच्चा है तो ये भी कहा जाता है कि ज़िन्दगी चार दिन की है. बस इन चार दिनों को याद रखते हुए उन्हें खुशनुमा तरीके से गुजारने की कोशिश करनी चाहिए.


ज़िन्दगी एक सफ़र की तरह है. जैसे सफ़र में दसियों लोग लोग मिलते, पसंद आते हैं इसके साथ-साथ वे बिछड़ते भी हैं, दूर भी होते हैं मगर ऐसी स्थिति के कारण हम उनके प्रति या खुद अपने प्रति किसी भी तरह का पूर्वाग्रह नहीं रखते हैं. कुछ ऐसा ही हमारे साथ है, दिल के मामले में. कोई पसंद आता है, किसी से प्यार होता है, कोई पसंद आ रहा है, किसी से प्यार हो रहा है तो महज इसलिए कि हमारा दिल तो आज भी बच्चा है जी.


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वंदेमातरम्

17 दिसंबर 2020

प्यार को प्रेम-स्नेह-विश्वास से देखने की आवश्यकता

 किसी से प्रेम हो जाना, किसी के प्रति आकर्षण होना, किसी का पसंद आने लगना, कोई दिल को अच्छा लगने लगता है आदि-आदि बातें लगभग सभी के साथ होती हैं. ये और बात होती है कि बहुतायत लोग अपनी पसंद, अपने आकर्षण को प्रदर्शित नहीं करते हैं, यहाँ तक कि जिसे पसंद करते हैं, जिसके प्रति आकर्षण का भाव रखते हैं उससे भी नहीं कह पाते हैं. ऐसा होने से बचने का भाव रखने वाले अथवा किसी के प्रति आकर्षण, पसंद का भाव न रखने वाले संभवतः संवेदनात्मक रूप से कठोर होते हैं. यहाँ आगे बढ़ने के पहले यह स्पष्ट कर दें कि इस आकर्षण, पसंद, दिल को अच्छा आदि लगने के पीछे विपरीतलिंगियों वाली मानसिकता का पोषण नहीं है बल्कि ऐसा सभी सन्दर्भों में है.


किसी व्यक्ति का पसंद आना उसके शारीरिक  सौन्दर्य के लिए भी हो सकता है, उसकी किसी विशेषता के सन्दर्भ में हो सकता है. किसी का बोलना उसके प्रति आकर्षण का कारण बनता है. किसी का लिखना उसके प्रति आकर्षण का कारण हो जाता है. किसी की कोई कलात्मक अभिव्यक्ति उसके प्रति प्रेम जगाती है. इन सबमें किसी भी रूप में स्त्री अथवा पुरुष रूप पहली बार में नहीं होता है. दरअसल इस तरह का जेंडर आधारित विभेद व्यक्ति उस समय करने लगता है जबकि स्वयं किसी न किसी तरह की ग्रंथि से ग्रसित होता है. समाज में एक आम धारणा है कि प्रेम का आधार सिर्फ स्त्री, पुरुष के बीच ही माना जाता है.




हमारा व्यक्तिगत स्तर पर अपना मानना यह रहा है कि कोई व्यक्ति यदि संवेदना से भरा हुआ है, यदि किसी व्यक्ति के दिल में सबके प्रति कोमल भावनाओं का समावेश है, यदि कोई व्यक्ति किसी को दुखी नहीं कर सकता है, यदि कोई व्यक्ति सबके साथ सहयोग की भावना रखता है, यदि किसी व्यक्ति में पावनता का गुण है तो वह सभी के साथ प्रेम की अभिव्यक्ति ही करता है. प्रेम की अभिव्यक्ति में, आकर्षण में किसी तरह की बुराई तब तक नहीं है जब तक कि उसमें आसक्ति न आये, जब तक कि उसमें दुर्विचार न आये. ऐसा होने की स्थिति में फिर वहाँ पावनता का लोप हो जाता है इसके चलते कोई भी व्यक्ति सही, गलत का भाव खो देता है.


समाज के बीच जिस तरह से प्रेम की पावनता पर चर्चा को गायब किया जा रहा है वह विचारणीय है. आज जिस तरह से एक-दूसरे के प्रति अच्छे लगने वाले भाव को कुत्सित रूप में देखा जाने लगा है वह आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है. आज जिस तरह से व्यक्ति व्यक्ति के बीच में सद्भाव, विश्वास, स्नेह को स्वार्थपूर्ति का साधन माना जाने लगा है उससे लोगों में समन्वय की कमी आई है. इन सब स्थितियों के दुष्परिणाम देखने को लगातार मिल रहे हैं. यही कारण है कि सदियों से प्रेम, स्नेह, प्यार चिल्लाने के बाद भी समाज में इसी एक एहसास की पर्याप्त कमी पाई जा रही है.


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वंदेमातरम्

04 दिसंबर 2020

प्रेम को बाँधने से प्यार-स्नेह नहीं नफरत-हिंसा ही फैलेगी

ओशो, ये नाम चर्चा में आते ही लोगों के मन-मष्तिष्क में दर्शन, प्रेम न उभरता है बल्कि उभरता है उन्मुक्तता का वातावरण, स्वतंत्र यौन सम्बन्धों पर ओशो की बेबाक राय. बिना ओशो को पढ़े, बिना उनके विचारों की जाने आज भी लाखों लोग ऐसे हैं जो उनके विरुद्ध अनर्गल बयानबाजी करने में लग जाते हैं. फिलहाल, आज हमारी पोस्ट ओशो पर नहीं, प्रेम पर है. ओशो को बहुत वर्षों से पढ़ रहे हैं और हमारा मानना है कि जो व्यक्ति लेखन से जुड़ा है, जो दर्शन को जानना चाहता है उसे ओशो को अवश्य पढ़ना चाहिए. इसके साथ-साथ हमारा ये भी मानना है कि जिनको प्रेम, प्यार, मुहब्बत जैसे शब्दों की गहराई को, इनकी पावनता को जानना-समझना है तो उनको भी ओशो के इन बिन्दुओं पर दिए गए विचारों को अवश्य पढ़ना चाहिए.




बहरहाल, सबके अपने-अपने शौक हैं, अपनी-अपनी पसंद है और उसके लिए किसी को जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता है. पिछले दिनों ओशो के प्रेम सम्बन्धी विचारों को पढ़ रहे थे तो दिमाग में उथल-पुथल मची कि समाज में सबसे पवित्र शब्द के साथ कैसे खिलवाड़ किया गया है. प्रेम को संभवतः समाज का सबसे खतरनाक शब्द बना दिया गया है. विस्तृत और पावन अवधारणा से सुसज्जित शब्द को जबरदस्त तरीके से संकुचित कर दिया गया है. किसी भी चर्चा में, किसी भी बातचीत में प्रेम शब्द के आने पर उसको एक ही दिशा में केन्द्रित कर दिया जाता है. समाज के किसी भी वर्ग के बीच प्रेम का अर्थ दो विषमलिंगियों के मध्य के सम्बन्धों से लगाया जाता है. यही स्थिति समझाने के लिए है कि प्रेम को लेकर किस तरह की स्थिति बनती जा रही है समाज में.


दरअसल प्रेम बंधन का नाम नहीं, किसी रिश्ते का नाम नहीं, किसी सम्बन्ध का नाम नहीं. प्रेम तो विशुद्ध प्रेम है, एक अवधारणा है, खुद को मुक्त कर देने की अवस्था है. यदि प्रेम बंधन पैदा करे, व्यक्ति को कैद करे तो वह प्रेम नहीं आसक्ति है, लालसा है, तृष्णा है. प्रेम बाँधता नहीं है बल्कि स्वतंत्र उड़ान प्रदान करता है, स्फूर्ति पैदा करता है, विश्वास जगाता है. अभी भी प्रेम की इस अवधारणा को समझने वाले न के बराबर हैं. जब तक प्रेम को संकुचित समझा जाता रहेगा, जब तक प्रेम में बंधन जैसी स्थिति बनी रहेगी तब तक प्रेम को लेकर भ्रांति बनी ही रहेगी. यदि व्यक्तियों को प्रेम की पावनता का एहसास करना है तो उनको प्रेम की मुक्तता का, प्रेम की स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा. प्रेम को बाँध कर समाज में प्रेम, स्नेह नहीं बल्कि नफरत, हिंसा ही फैलाई जा सकती है.


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वंदेमातरम्

06 सितंबर 2020

क्या वाकई हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िन्दगी में

‘हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िन्दगी में, खुशनसीब है वो जिसको है मिली ये बहार ज़िन्दगी में’ इस गीत की ये पंक्तियाँ बड़े ही दार्शनिक भाव से आये दिन किसी न किसी मंच से पढ़ने को मिलती हैं. इस दार्शनिक भाव के पीछे प्यार की परिभाषा को कितना संकुचित करके बताया जाता है, इस पर कभी किसी का ध्यान नहीं गया. इस बारे में शायद इन पंक्तियों का उदाहरण देने वालों ने भी विचार नहीं किया होगा और न ही उन लोगों ने विचार किया होगा जो इनके दार्शनिक भाव को बड़ी ही आत्मीयता से ग्रहण करने सहमति में अपनी गर्दन हिलाते दिखते हैं.


इन्हीं पंक्तियों को सुन-सुन कर दार्शनिक बने घुमते लोगों से एक ही सवाल कि उनके लिए प्यार का अर्थ क्या है? यह एक सवाल जब भी हमने इन पंक्तियों पर दार्शनिक बने लोगों से पूछा तो बजाय जवाब देने के वे लोग अगल-बगल ताकते नजर आये. कुछ ऐसा ही हाल उन लोगों का भी रहा जो इन पंक्तियों में बहुत बड़ा दर्शन छिपा देखते हैं. अब एक बार फिर उन पंक्तियों को पढ़िए और गौर करिए कि क्या वाकई प्यार ऐसी चीज है जो सबको नहीं मिलता? या विषमलिंगियों के बीच आपस में होने वाला प्यार सबको नहीं मिलता? दो व्यक्तियों के बीच (वो भी विषमलिंगी) के बीच पनपने वाले प्यार को प्यार की सम्पूर्णता पर लागू क्यों मान लिया जाता है? क्यों प्रेमी-प्रेमिका के बीच के प्यार की स्थिति को प्यार की व्यापक अवधारणा पर स्वीकार कर लिया जाता है?


इन पंक्तियों पर दार्शनिकता उड़ेलने वाले खुद अपने आपको देखें और बताएँ कि क्या वाकई प्यार उनको बिलकुल नहीं मिला? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्यार की परिभाषा को बस लड़का-लड़की के बीच सीमित कर देने के कारण वे प्यार का सन्दर्भ ही भुला बैठे? इस तरह का तथाकथित दर्शन ओढ़े रहने वाले एक बार उन दिनों से अपने जीवन पर निगाह डालना शुरू कर दें, जबसे कि वे कहते हैं कि होश संभाला है, क्या वाकई उन्हें प्यार न मिला? क्या ऐसे लोगों के लिए माता-पिता, भाई-बहिन अथवा उनके परिजनों से मिलने वाले प्यार का कोई महत्त्व नहीं? क्या ऐसे लोगों के लिए उनके दोस्तों के प्यार का कोई अर्थ नहीं? क्या ऐसे लोगों के लिए उनके सहयोगियों, उनके शुभचिंतकों से मिलते प्यार के कोई मायने नहीं?

संभव है कि ऐसा ही हो तभी तो बावली सी सूरत के साथ ऐसी पंक्ति को अपने जीवन का दर्शन बनाये बैठे हैं, ये लोग. ऐसे किसी भी गीत की पंक्तियों को महज आनंद के लिए, संगीत प्रेम के सन्दर्भ में सुना जाना ही सुखद होता है. इन गीतों में अपना ही एक दर्शन छिपा है और उस दर्शन को किसी संकुचित सन्दर्भ में नहीं बल्कि व्यापक सन्दर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है. यह विचारणीय यह है कि यदि कोई दर्शन किसी व्यापक अवधारणा को संकुचित करे तो वह दर्शन नहीं बल्कि क्षणिक मनोभाव है. यही मनोभाव सम्बंधित गीत के लिए भी है क्योंकि उसे सम्बंधित फिल्म के विशेष दृश्य, कहानी की माँग के रूप में लिखा, फिल्माया गया है न कि जीवन-दर्शन के लिए. जीवन का प्यार सम्बन्धी दर्शन इतना है कि प्यार एक व्यापक अवधारणा है जो सर्वत्र सुख का संचार करता है. प्यार स्व की भावना नहीं बल्कि पर की भावना से परिपूर्ण होता है. काश कि गीतों की पंक्तियों में भटकते लोग प्यार का वास्तविक अर्थ समझ पाते, समझने का प्रयास कर पाते.

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05 सितंबर 2020

सबसे बड़ा है प्यार, उसके बाद है संसार

सबसे बड़ा है प्यार,
उसके बाद सारा संसार. 

प्यार के प्रतीक माने जाने वाले राधा-कृष्ण को पूजने के बाद भी प्यार शब्द के साथ भ्रान्ति क्यों? प्यार के साथ संकुचन क्यों? प्यार के साथ एकतरफा व्यवहार क्यों?

क्या समझा है कभी कि प्यार है क्या? क्या जाना है कभी कि प्यार कहते किसे हैं? क्या प्यार का नाम स्त्री-पुरुष से जुड़ा हुआ ही है? क्यों प्यार का सन्दर्भ दो विषमलिंगियों के विवाह से लगाया जाता है?

काश कि समाज भी और प्यार करने वाले भी प्यार को समझ पाते. प्यार का उचित अर्थ जान पाते.


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24 जुलाई 2020

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले.....

एक बहुत पुराना मधुर गीत है, पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही. इस गीत को जितनी बार सुनो, एक अलग तरह का सन्देश देता है. अब यह सन्देश सभी सुनने वालों के लिए एक जैसा होता होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता. इस गीत को दो तरह से समझने की आवश्यकता है. एक तरफ यदि इस गीत को देखा जा रहा है तो यह गीत विशुद्ध रूप से दो व्यक्तियों के बीच की आपसी स्थिति को दर्शाता है. इन दो लोगों में एक प्रेमी है, एक प्रेमिका है; एक स्त्री है, एक पुरुष है. देखने के सन्दर्भ में इस गीत के मायने प्रेमी-प्रेमिका के बीच की स्थिति से जुड़ते हैं. यही दृश्य समूचे गीत को प्रेमी-प्रेमिका वाले प्रेम के साथ संदर्भित भी करता है. देखा जाये तो यह गीत भी इसी तरह के दृश्य की पूर्ति करता हुआ आगे बढ़ता है.



इसके सापेक्ष यदि इस गीत की आरंभिक पंक्ति पर ध्यान दिया जाये तो यह गहन अर्थ का सन्दर्भ देती है. पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही, यह पंक्ति महज प्रेमी-प्रेमिका के दृश्य को उद्घाटित नहीं करती है. यदि इस एक पंक्ति के सन्दर्भ निकाले जाएँ, भावार्थ निकाले जाएँ तो समझ आता है कि प्यार को पाने के लिए कोई व्यक्ति कितना लालायित है, भले ही वह झूठा प्यार ही क्यों न हो. आखिर लोगों के जीवन में प्यार की इतनी कमी कैसे हो गई है? या फिर प्यार का सन्दर्भ महज प्रेमी-प्रेमिका के प्यार से लगाया जाने लगा है? क्या व्यक्ति का एकाकी होना उसके प्यार में कमी का परिचायक बनता जा रहा है? क्या व्यक्ति का अकेलापन उसके भीतर प्यार की कमी का एहसास करवा रहा है?


देखा जाये तो लगता है कि इस कोरोना काल में ही नहीं वरन बहुत पहले से व्यक्ति खुद में निपट अकेलापन महसूस करता रहा है. इस अकेलेपन में उसे कोई ऐसा साथ चाहिए होता है जो उसकी भावनाओं को समझ सके, उसके साथ दो पल हँस कर बिता सके. यहाँ समर्पण, विश्वास, प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है. जिस तरह का समाज, जिस तरह की दुनिया विगत वर्षों में हम बना चुके हैं उसे देखते हुए लगता है कि व्यक्ति अकेले रहने में बहुत स्वतंत्र है, खुश है मगर वास्तविकता इसके कहीं उलट है. जीवन के तमाम सुखद पलों के बीच भी एक पल ऐसा आता है जबकि प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी साथी की, किसी न किसी दोस्त की आवश्यकता महसूस होती है. इसी आवश्यकता के सन्दर्भ में इस गीत की पहली पंक्ति महत्त्वपूर्ण समझ आती है. कोई अकेला व्यक्ति कैसे किसी के प्यार को पाने की चाह रखता है, भले ही वह दो पल का हो, भले ही वह झूठा ही हो.

ये समय ऐसा है जबकि हम सभी निपट अपने में ही समय नहीं बिता रहे हैं या कहें कि बिता नहीं पा रहे हैं. ऐसे में हमें अपने आसपास के लोगों का, अपने साथियों का, अपने दोस्तों का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है. उसे भी हमारे साथ की, हमारे प्यार की आवश्यकता है. उसकी यह आवश्यकता दो पल की न हो, झूठी न हो इसका हमें ध्यान रखना होगा. यदि इतना ध्यान हम सभी रख सके तो सभी एक-दूसरे का प्यार, साथ पा रहे होंगे, वो भी सच्चा वाला, सदा-सदा के लिए.


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15 जुलाई 2020

प्रेम का शबनमी एहसास

पता नहीं लोगों की निगाह में इसे प्रेम माना भी जाता है या नहीं पर हमारे लिए तो प्रेम ही था, आज भी है. उसको जब भी देखा तो ऐसा नहीं हुआ कि देखते ही रह गए हों. ऐसा भी नहीं हुआ कि किसी विशेष आकर्षण भाव से उसे पसंद किया हो. कॉलेज समय की बात थी, देखा और एक-दो मुलाकातों के बाद दोनों लोग अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने काम में लग गए. चूँकि किसी तरह का ऐसा भाव भी नहीं जगा कि कहा जाये कि आपस में प्रेम हो गया है. उस एक छोटी सी मुलाकात के कई साल बाद मिलना हुआ. अबकी हम दोनों ही किशोरावस्था से एक कदम आगे निकल कर युवावस्था के साथ टहलकदमी कर रहे थे. अब हम दोनों की अपनी ही दुनिया थी. अपने-अपने सपने थे और उन सपनों की अपनी-अपनी दुनिया थी.



वास्तविक दुनिया के इस मिलन ने अबकी सपनों की दुनिया में दस्तक दी. दोनों की ऑंखें मिलीं और अबकी लगा कि पिछली बार की तरह सिर्फ परिचय नहीं है, सिर्फ आपसी मुलाकात नहीं है वरन इससे भी आगे जाकर कुछ और भी है. मिलना लगातार भले न होता हो पर लगभग नियमित होता था. मिलने पर खूब हँसी-मजाक, खूब इधर-उधर की बातें, उसके कॉलेज के किस्से, हमारे भविष्य की कहानियाँ. नज़रों और दिल की भाषा को समझ रहे थे मगर सब कुछ कहने, बोलने, बतियाने के बाद बस वही न कहा गया जो कहना बाकी रह गया था. बंधनों में हम दोनों ही जकड़े हुए थे. उसके सामने परिवार, संस्कारों का बंधन था और हमारे सामने पारिवारिकता की, सामाजिकता की मजबूरी थी. प्यार तो एहसासों की धरती पर पल्लवित हो सकता है जो उचित वातावरण न मिलने पर यथार्थ के धरातल पर सूख भी सकता है. आकर्षण का शबनमी एहसास वास्तविकता की धूप में मर जाता है.


बड़े सपनों को पूरा करने की चाह छोटी हकीकत को अपनाने को तैयार नहीं थी. अंततः समाज की बनी-बनाई परम्परा, परिपाटी पर प्यार पिछड़ गया. आँखों में तमाम अनकहे सवाल लिए एक-दूसरे को बस देखते ही रहे, सिर्फ देखते ही रहे. प्यार की सपनों भरी दुनिया से निकल कर जब वास्तविकता से परिचय किया तो दिलों के बीच दूरी भले ही न बढ़ी हो पर बीच में इतनी दूरी हो चुकी थी कि मिलने पर आँखों की शांत मुस्कराहट ही आपस में सारा हाले-दिल बयान करने लगती.

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14 जुलाई 2020

बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता

आज की पोस्ट का बस इतना ही सार है.... 



कोई भी हो हर ख्वाब तो सच्चा नहीं होता,
बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता,
कभी दामन छुड़ाना हो तो मुश्किल हो,
प्यार के रिश्ते टूटें तो, प्यार के रस्ते छूटें तो
रास्ते में फिर वफाएं पीछा करती हैं.


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10 जुलाई 2020

एक गलती की इतनी बड़ी सजा

किसी गलती की क्या सजा हो सकती है? ये गलती पर निर्भर करता है या सजा देने वाले की मानसिकता पर? अब सजा देने वाले के मन की कोई क्या जाने मगर जहाँ तक हमारी व्यक्तिगत राय है तो कोई भी सजा उसकी गलती के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि सजा देने वाले की मानसिकता में परिवर्तन होते रह सकते हैं मगर गलती एक जैसी ही होगी, वह चाहे किसी भी जगह हो, किसी के साथ हो. गलती कई बार जानबूझ कर होती है, कई बार अनजाने में हो जाती है. इसके अलावा कई बार गलती करने के पीछे एक उद्देश्य होता है. यह उद्देश्य दो तरह से हो सकता है, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक. अब आप कहेंगे कि गलती भी की जा रही और वह भी सकारात्मक. जी हाँ, ऐसा होता है.


सकारात्मक गलतियाँ हम सभी ने की होंगी, आज भी करते होंगे. याद करिए अपने बचपन को. याद आया कुछ, जब आप मित्र-मंडली किसी ऐसे काम को करके आते हैं कि जिस पर कुछ न कुछ सजा मिलनी निश्चित है तब उस समय उस गलती की जिम्मेवारी कोई ऐसा व्यक्ति अपने सिर ले लेता है जो कम से कम सजा का भागी बनेगा. एक घटना अपनी याद आती है, जबकि हम लोग स्कूल में से समोसे खाने के लिए अपने मित्र को बाहर निकालते थे. उस गलती कि क्लास छूट रहा, पकडे गए तो सजा उसी मित्र को मिलेगी, हम सभी मित्र करते थे. वह बालपन की अबोध गलती थी, पता नहीं आज इसे गलती कहा जायेगा या कि कुछ और. बहरहाल, उन दिनों की तरह दिल युवावस्था में भी अबोध बना रहा, गलतियाँ करता रहा.


बचपन की तमाम गलतियाँ भुला दी गईं, उनकी कहीं न कहीं माफ़ी भी मिल गई मगर एक गलती ऐसी हो गई जिसकी माफ़ी मिलती न दिख रही. वह गलती भी सकारात्मक विचार के कारण पैदा हुई. असल में स्वभावगत एक कमी हमारे अन्दर हमेशा से रही है कि दोस्ती में सबकुछ कुर्बान कर देने तक की मंशा रखते हैं. हमारे घरवालों को बहुत बार हमारे इस स्वभाव से बहुत ज्यादा परेशानी होती है. इसके बाद भी न घरवाले अपनी आदत से बाज़ आते हैं और न हम ही अपनी आदत छोड़ पाते हैं. इसी आदत के चलते दो दोस्तों या कहें दोस्तों से ज्यादा वाली स्थिति के बीच समन्वय बनाने बैठ गए. अब बैठे तो बस बैठे ही रह गए. इस समन्वय के बीच ऐसी ग़लतफ़हमी उपजी कि हम आज तक अपराधी बने सजा भुगत रहे हैं.

इस बारे में कहना कुछ नहीं क्योंकि हम मानते हैं कि गलती हमारी है. गलती ये कि दो लोगों के बीच में कभी नहीं आना चाहिए भले ही सबकी आपस में मित्रता है. गलती ये कि कभी भी संबंधों को बचाए रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए भले ही सम्बन्ध आपस में ही क्यों न बिखरते हों. गलती ये भी कि कभी ये नहीं समझना चाहिए कि जो आपके करीब है वो आपकी बात को महत्त्व देगा. खुद को हमेशा सबसे अलग हाशिये पर समझना चाहिए और अपने आपको बचाने की कोशिश करनी चाहिए. फ़िलहाल तो सबक मिला है, इस घटना से. आगे अपने स्वभाव को देखते हैं कि नियंत्रण में आता है या नहीं.

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25 जून 2020

भावनात्मकता से जन्मी पावन अवधारणा है प्रेम

प्रेम, प्यार, मुहब्बत, इश्क ये शब्द आज के समय में गंभीरता से नहीं लिए जाते हैं. इनके पीछे कहीं व्यंग्य का भाव, कहीं उपेक्षा का भाव, कहीं अन्योक्ति का भाव छिपा दिखता है. इश्क की चर्चा होने से पहले ही सामने वाला अपने दिमाग में एक छवि उभर कर स्थायी भाव ग्रहण कर लेती है. इस स्थायी भाव में एक लड़का होता है और एक लड़की शामिल हो जाती है. इनके बीच के संबंधों की परिभाषा स्वतः गढ़ी जाने लगती है. इस परिभाषा में भले ही प्रेम शामिल होता ही है मगर इसके साथ ही प्रेम को लेकर बना हुआ नजरिया भी शामिल होता है. यह परिभाषा प्रेम के नाम पर कम बल्कि स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों के नाम पर अधिक बनाई जाने लगती है. लोगों द्वारा ये मान लिया जाता है कि प्रेम करने वाले दो विषमलिंगियों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बने ही बने होंगे. ये भी माना जाने लगता है कि वे दो प्रेम करने वाले आपस में शादी करेंगे ही. इस शादी करने वाले विचार के साथ प्रेम करने वालों के भी विचार अपना साम्य बिठाने लगते हैं. इसके साथ-साथ समाज में ये मान्यता बनी हुई है कि दो प्रेम करने वालों को आपस में शादी करनी ही चाहिए. प्रेम सम्बन्धी मान्यताओं, विचारों को लेकर लोगों में इतना भ्रम है कि आज भी प्रेम का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आ पाया है.


उक्त विचारों और ऐसे ही अनेक विचारों के सन्दर्भ में कई सवाल मन में हमेशा उठते रहे हैं. ये कहाँ लिखा है कि दो प्रेम करने वालों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बने ही होंगे? ये कहाँ लिखा है कि दो प्रेम करने वालों को आपस में शादी करनी ही चाहिए? ये कहाँ की मान्यता है कि बिना शादी किये प्रेम सफल नहीं कहा जाता? ये किस विचारक ने कहा है कि प्रेम का अंतिम स्वरूप शादी ही है? यहाँ प्रेम सम्बन्धी पावन विषय पर बिना किसी पूर्वाग्रह के ध्यान रखना चाहिए कि यह वही समाज है जहाँ राधा-कृष्ण की पूजा की जाती है. यह वही समाज है जहाँ मीरा को स्त्री-सशक्तिकरण का मानक माना जाता है. क्या इन दोनों ने कृष्ण के साथ विवाह किया था? क्या इन दोनों ने कृष्ण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे? क्या दोनों का प्रेम असफल माना जायेगा? यदि दोनों का प्रेम असफल है तो आज भारतीय समाज दोनों की पूजा क्यों करता है? क्यों राधा-कृष्ण के चित्र अपने पूजागृह में लगाये होता है? क्यों नहीं राधा की जगह कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी की तस्वीर लगाई गई होती है?


असल में प्रेम एक विशुद्ध पावन अवधारणा है जो दो चरों के बीच की भावनात्मक स्थिति से जन्मती है. इन दो चरों में दोनों सजीव हो सकते हैं, एक सजीव एक निर्जीव हो सकता है. यहाँ प्रेम करने वालो दो विषमलिंगी भी हो सकते हैं, दो समलिंगी भी हो सकते हैं. प्रेम करने वाले प्रेमी-प्रेमिका हो सकते हैं, अन्य दूसरे रिश्ते वाले भी हो सकते हैं. यहाँ प्रेम का वास्तविक स्वरूप समझने की जरूरत है. प्रेम कोई ऐसा स्त्रोत नहीं जो एक व्यक्ति से करने के बाद सूख जाता है. प्रेम कोई ऐसा धन नहीं जो एक पर खर्च कर दिया गया तो अन्य किसी के लिए शेष नहीं बचता है. प्रेम एक तरह की भावना है, एक तरह की संवेदना है जो एक या अनेक से हो सकती है. एकसाथ कई से हो सकती है. समान रूप से हो सकती है.

यहाँ ध्यान यह रखने की जरूरत होती है कि प्रेम संबंधों में सामने वाले के साथ किसी तरह का विश्वासघात न हो. इसके पीछे कारण यह कि प्रेम आपस में विश्वास की माँग करता है. किसी भी व्यक्ति का यह कहना कि एक बार प्रेम करने के बाद किसी दूसरे से कैसे प्रेम किया जा सकता है, सिद्ध करता है कि उसके दिल में प्रेम नहीं वरन एक व्यक्ति विशेष के प्रति आकर्षण का भाव बना रहा है. प्रेम का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से सामने वाले के प्रति भावनात्मक, सकारात्मक भावना रखना है. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई व्यक्ति एक व्यक्ति के प्रति भावनात्मक रूप से सकारात्मक रहे और अन्य व्यक्तियों के प्रति नकारात्मक हो जाये.

असल में प्रेम को लेकर एक ऐसी मानसिकता बनी रही है जो समय के साथ रूढ़ हो गई है. ऐसा माना जाने लगा है कि जिससे प्रेम किया जाये यदि उससे शादी नहीं होती है तो वह प्रेम असफल माना जायेगा. ये भी माना जाता है कि प्रेम करने वाले व्यक्ति से शादी न हो पाने पर किसी दूसरे व्यक्ति से प्रेम करना अपराध है. ऐसा भी माना जाता है कि इस जीवन में एक ही व्यक्ति से प्रेम किया जा सकता है, यदि एक से अधिक लोगों से प्रेम किया जाता है तो वह भी अपराध है. ये सारी स्थितियाँ समाज में प्रेम के विस्तार पर अंकुश लगाती हैं. प्रेम का सीधा सा सम्बन्ध दो आपसी लोगों में भावनात्मकता का विस्तार है. यहाँ यदि उनके मन में आपस में एक-दूसरे के लिए छल, विश्वासघात, धोखा नहीं है तो प्रेम का यही सफलतम रूप है. देखा जाये तो प्रेम किसी संकुचन का नहीं वरन विस्तार का नाम है. काश! इसे समझा जा सकता, प्रेम करने वालों द्वारा भी, प्रेम संबंधों का निर्धारण करने वालों द्वारा भी.

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25 मई 2020

प्रेम कहानियों पर इतना कौतूहल क्यों

लोगों की रुचि दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने की क्यों होती है? दूसरे की ज़िन्दगी में सुख है या दुःख इससे झाँकने वालों का कोई लेना-देना नहीं होता है, बस वे उसमें झाँकना चाहते हैं. इस ताका-झाँकी में यदि विषय प्रेम का, इश्क का हो तो फिर कहना ही क्या. इस विषय के आगे सभी विषयों को गौड़ कर दिया जाता है. किसी दूसरे के जीवन का कोई प्रेम-प्रसंग हाथ लग भर जाए फिर उसके आगे सारे प्रसंग बौने हो जाते हैं. किसी और के प्रेम-प्रसंगों के लिए, दूसरे की प्रेम-कहानियों को सुनने के लिए लोगों में बेताबी दिखाई देने लगती है. ऐसा किस मानसिकता के कारण होता है? ऐसा किस प्रवृत्ति के चलते लोग करते हैं? कई बार इस विषय पर अपने मित्रों से बातचीत करने की कोशिश की मगर कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया.


अपने जीवन की कुछ घटनाओं को कुछ सच्ची कुछ झूठी के द्वारा सबके बीच लाने का एक प्रयास विगत वर्ष किया था. उसके लेखन का जब आरम्भ किया था तब बहुत से दोस्तों, परिचितों के कई सवालों का सामना करना पड़ा था जो प्रेम-कहानियों से संदर्भित थे. इसके पहले भी बहुत बार लोगों के सवालों, निगाहों का शिकार हुए ऐसे सवालों को लेकर. कई बार हमारे कहीं आने-जाने को लेकर, किसी से दोस्ती को लेकर, किसी से बातचीत को लेकर ऐसे सवालों से सामना करना पड़ा. ऐसे प्रसंगों पर कई बार बात बदलने की कोशिश भी की मगर दूसरी तरफ से घूम-फिर कर बात को प्रेम-प्रसंगों पर लाकर टिका दिया जाता. ऐसा लगता जैसे उस समय किसी भी अन्य विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय लोगों के लिए हमारी प्रेम-कहानी को जानना रहता है. आजतक यह हमारी समझ से बाहर है कि ऐसा आखिर क्यों होता है? क्या उसके पीछे अगले के मन में, अचेतन में छिपी प्रेम करने की भावना रहती है? क्या उसके मन में उसके प्रेम की स्थिति इस बहाने संतुष्टि का एहसास करती है? क्या इसी तरह से वह अपने प्रेम सम्बन्धी समय को पुनः जीना चाहता है?


अब एकबार फिर इसी तरह के सवालों से सामना करना पड़ रहा है. अपनी कुछ सच्छी कुछ झूठी के प्रकाशन पश्चात् एक नई पुस्तक के लेखन में जुट गए थे. पुस्तक प्रेम कहानियों को लेकर है. इसमें कहानियों को शामिल किया गया है. ज्यादातर कहानियाँ हमसे जुड़ी हुई हैं और सत्य हैं. हाँ, इसमें कल्पना का कुछ तड़का लगाते हुए इनको पठनीय बनाने का प्रयास किया है. इसके साथ-साथ प्रयास किया है कि दूसरे व्यक्ति की छवि, उसकी सामाजिकता, पारिवारिकता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े, न सकारात्मक और न ही नकारात्मक. इनमें से कुछ कहानियों को ब्लॉग पर प्रकाशित भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ उनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया जा रहा है. ऐसा किये जाने से इन कहानियों की पहुँच अधिकाधिक लोगों तक हो रही है. इसके चलते बहुत से परिचित लोगों के सवालों की बौछार होने लगी है. अभी तो बस इतना ही कहना है कि इनको बस कहानियाँ मानकर पढ़िए और यदि लगता है कि ये सच हैं तो उनको अपने दिल में बसाये रखिये.

प्रेम ही ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं होता. कभी बासी नहीं होता. कभी विध्वंसक नहीं होता. प्रेम ही ऐसा विषय है जो व्यक्ति को व्यक्ति होना सिखाता है. इन्सान को इंसानियत सिखाता है. दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है. यदि अनुभव करना हो तो पहले-दूसरे प्रेम की बंधी-बँधाई सीमारेखा से बाहर निकल कर देखो. प्रेम की तरह उन्मुक्त हो उड़ कर देखो. निश्चित ही एक नई दुनिया का, सतरंगी दुनिया का अपने आसपास एहसास करोगे.

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20 जनवरी 2020

प्यार दैहिक अवधारणा नहीं है


प्यार, प्रेम, इश्क ऐसे शब्द हैं जिन पर कहीं न कहीं चर्चा देखने-सुनने को मिल जाती है. कोमल भावनाओं को अपने में समेटे इन शब्दों के साथ समाज बहुत ही कठोरता से अपना व्यवहार करता है. प्यार को लेकर आये दिन हमें स्वयं हमारे कुछ मित्रों की तरफ से अनेक सवालों से दो-चार होना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि आखिर प्रेम को लेकर इतना संशय समाज में क्यों है? प्यार को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति क्यों बनी हुई है? समझने वाली बात है कि क्या किसी व्यक्ति को किसी एक व्यक्ति से प्रेम हो जाने के बाद किसी दूसरे से प्यार नहीं होता? क्या एक से अधिक लोगों से प्यार करना असामाजिक है? क्या प्यार की परिणति विवाह होना चाहिए? यदि विवाह न हो सके तो क्या रो-रोकर मर जाना चाहिए?


ऐसे विषय पर जो कहीं न कहीं संवेदनशील भी है, भावनात्मक भी है वहाँ हमारी सोच ये है कि प्रेम वो पवित्र अवधारणा है जो मन से संचालित होती है. प्यार का आधार किसी भी रूप में शारीरिकता नहीं होना चाहिए वरन उसका निर्माण आत्मा, भावना, पवित्रता की आधारभूमि पर होना चाहिए. ऐसा आज के समय में लोगों के लिए विश्वास करना भी कठिन है. जबकि असलियत यही है कि प्रेम यही है. जो विश्वास से उपजता है, उसमे किसी तरह के अविश्वास की कोई जगह ही नहीं. यदि प्रेम में अविश्वास किसी भी तरह से उपस्थित हुआ तो समझो कि वहाँ कभी प्रेम था ही नहीं. ऐसा किसी भी प्यार करने वाले, किसी भी प्रेम करने वाले के साथ है. प्यार के सम्बन्ध में कहा जाये तो हमारी नजर में प्रेम का उत्कर्ष वैवाहिक बंधन नहीं है वरन आपसी भावनाओं को समझने और महसूस करने की स्थिति है.

बहुतेरे लोगों के लिए आज भी प्रेम एक ऐसा विषय है जो एक व्यक्ति से शुरू होता है और उसी एक व्यक्ति पर समाप्त हो जाता है. प्रेम कि यह समाप्ति या तो मिलन पर होती है अथवा बिछड़ने पर. इसे किसी भी रूप में प्रेम का समग्र नहीं कहा जायेगा वरन यह तो प्रेम का एकाकी स्वरूप हुआ, जहाँ बस मैं ही मैं है. प्रेम कभी मैं की बात नहीं करता है. और यही कारण है कि प्रेम को किसी एक बिंदु पर नहीं बांधा जा सकता है? सोच कर देखे कोई भी कि ये कैसे संभव है कि किसी दिल से प्रेम की, प्यार की बारिश हो रही है तो वह बस एक को ही उससे लाभान्वित करे? आखिर कैसे संभव है कि प्रेम से ओतप्रोत दिल प्रेम की बारिश करे और एक के अलावा किसी अन्य को प्रेम-रस से सराबोर न करे? असल में समाज में बहुतेरे लोगों के लिए प्रेम पहली नजर से शुरू होकर देह के मिलन पर ठहर जाने की प्रक्रिया मात्र है. ऐसे लोगों के लिए प्रेम एकाकी भाव को उत्पन्न करता है. यहाँ समझना होगा कि प्रेम और विश्वास का अपना अंतर्संबंध है. प्रेम के साथ विश्वास का होना प्रेम की गंभीरता को, उसके एहसास को और विराट बना देता है. आखिर इसी देश में राधा-कृष्ण का मीरा-कृष्ण का प्रेम ऐसे ही पावन-पूज्य नहीं है.

आज प्रेम क्षणिक आवेग का नाम बनता जा रहा है. प्यार का अर्थ पहली नजर से लगाया जाने लगा है. प्यार को दैहिक आकर्षण के आसपास केन्द्रित कर दिया गया है. प्रेम की पावन-पूज्य अवधारणा के आधार पर हमारे समाज में उसे राधा-कृष्ण के रूप में पूजा भले जाए पर सहज रूप में स्वीकारा नहीं जाता है. यही विभेद ही प्रेम को, प्यार को सशंकित करता है, संकुचित करता है.

08 अप्रैल 2019

काश! प्रेम बस प्रेम ही रह पाता


उम्र के चार दशक से अधिक की यात्रा के बाद भी आये दिन साथियों के, सहयोगियों के, विद्यार्थियों के और खुद के भी एक सवाल से खुद का जूझना होता है कि प्रेम क्या है? इस सवाल से जुड़े हुए और भी बहुत सारे सवाल हो सकते हैं. प्रेम क्यों होता है? क्या प्रेम एक व्यक्ति से ही हो सकता है? प्रेम की सफलता-असफलता क्या है? और भी बहुत से सवालों को इस एक सवाल कि प्रेम क्या है के आसपास घूमते देखा जा सकता है. प्रेम की परिभाषा, प्रेम के अर्थ सभी के लिए अलग-अलग हो सकते हैं, अपने-अपने मापदंडों पर निर्धारित हो सकते हैं. दरअसल प्रेम कोई अवधारणा नहीं है वरन दिल की स्थिति है जो स्वतः प्रस्फुटित होती है. यहाँ दिमाग का कोई काम नहीं होता है. जैसे ही दिल और दिमाग का आपसी तालमेल बना वहीं प्रेम की प्रकृति में बदलाव आ जाता है. प्रेम दिल से अनुभूत की जाने वाली स्थिति है जिस पर दिमाग का कोई प्रभाव न हो. मानवीय देह के इन दोनों तत्त्वों के अपने-अपने कार्य हैं, अपनी-अपनी प्रकृति है और इसी के आधार पर दिल, दिमाग कार्य करते हैं. प्रेम कार्य नहीं वरन खुद व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है. प्रेम में सराबोर वह व्यक्ति चारों तरफ से सिर्फ और सिर्फ आनंद की अनुभूति करता है. वह पूर्णता की प्राप्ति की तरफ अग्रसर होता जाता है और चारों तरफ प्रेम की सुगंध बिखेरता रहता है. 


असल में प्रेमपरक स्थिति में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय का समावेश होता है. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है, दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है. इसी ईमानदारी, इसी शुद्धता के कारण ही प्रेम दो दिलों की ताकत बनकर उभरता है. दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, प्रेम में प्रगाड़ता बढ़ती है. प्रेम एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. यही प्रेम है जिसके लिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि व्यक्ति उसके दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है. यहाँ विचार करने की आवश्यकता है कि इन सारी स्थितियों में दिल ही सर्वोपरि रहता है. यहाँ दिमाग का कोई हस्तक्षेप नहीं, कोई दखल नहीं.

प्रेम कब्ज़ा करके बैठ जाने की अवस्था नहीं वरन लुटा देने की अवस्था है, जहाँ कोई सवाल नहीं होता है, कोई अभिलाषा नहीं होती है, कोई लालसा नहीं होती है. जैसे ही प्रेम में संलिप्त दो दिलों पर अभिलाषा का, लालसा का, पाने का, आधिपत्य करने की भावना का समावेश हुआ वैसे ही उस प्रेम में दिल की जगह दिमाग काम करना शुरू कर देता है. कैसे उसका प्रेम बस उसका होकर रहे, इसका गणित लगना शुरू हो जाता है. कैसे उसके प्रेम में जन्मी अभिलाषा पूरी हो इसकी तत्परता दिखाई देने लगती है. ऐसी स्थिति में दिमाग दिल को एक किनारे लगाने का कार्य करने लगता है. यहाँ आकर प्रेम महज प्रेम न होकर भावनाओं, संबंधों का गुम्फन हो जाता है, जहाँ बहुत कुछ पास होकर भी पास नहीं होता है. बहुत कुछ प्रेमपरक होने के बाद भी प्रेममय नहीं होता है.

प्रेम की स्थिति न केवल दो दिलों को जोड़ती है बल्कि उनके बीच संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता को भी जोड़ती है. दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती. काश! प्रेमपरक संसार प्रेममय ही बना रहता. काश! प्रेम के संसार का निर्माण करते समय दिल ही सर्वोपरि बना रहता और दिमाग उसके बीच किसी भी रूप में समाविष्ट न हो पाता. काश! प्रेम के न पाने की ख़ुशी होती, न खोने की चिंता होती, न उस पर कब्जे की भावना जन्मती. काश! प्रेम बस प्रेम ही रहता.

11 दिसंबर 2018

प्रेम कोई सम्बन्ध नहीं


प्रेम शब्द जितना गलत समझा जाता है, उतना शायद मनुष्य की भाषा में कोई दूसरा शब्द नहीं! प्रेम के संबंध में जो गलत-समझी है, उसका ही विराट रूप इस जगत के सारे उपद्रव, हिंसा, कलह, द्वंद्व और संघर्ष हैं. प्रेम की बात इसलिए थोड़ी ठीक से समझ लेनी जरूरी है. जैसा हम जीवन जीते हैं, प्रत्येक को यह अनुभव होता होगा कि शायद जीवन के केंद्र में प्रेम की आकांक्षा और प्रेम की प्यास और प्रेम की प्रार्थना है. जीवन का केंद्र अगर खोजना हो, तो प्रेम के अतिरिक्त और कोई केंद्र नहीं मिल सकता है. 


समस्त जीवन के केंद्र में एक ही प्यास है, एक ही प्रार्थना है, एक ही अभीप्सा है--वह अभीप्सा प्रेम की है. और वही अभीप्सा असफल हो जाती हो तो जीवन व्यर्थ दिखायी पड़ने लगे--अर्थहीन, मीनिंगलेस, फस्ट्रेशन मालूम पड़े, विफलता मालूम पड़े, चिंता मालूम पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं है. जीवन की केंद्रीय प्यास ही सफल नहीं हो पाती है! न तो हम प्रेम दे पाते हैं और न उपलब्ध कर पाते हैं. और प्रेम जब असफल रह जाता है, प्रेम का बीज जब अंकुरित नहीं हो पाता, तो सारा जीवन व्यर्थ-व्यर्थ, असार-असार मालूम होने लगता है. जब प्रेम सफल होता है, तो जीवन सार बन जाता है. प्रेम विफल होता है तो जीवन प्रयोजनहीन मालूम होने लगता है. प्रेम सफल होता है, जीवन एक सार्थक, कृतार्थता और धन्यता में परिणित हो जाता है. लेकिन यह प्रेम है क्या? यह प्रेम की अभीप्सा क्या है? यह प्रेम की पागल प्यास क्या है? कौन-सी बात है, जो प्रेम के नाम से हम चाहते हैं और नहीं उपलब्ध कर पाते हैं?

प्रेम की आकांक्षा--एक हो जाने की, समस्त के साथ एक हो जाने की आकांक्षा है. प्रेम की आकांक्षा समस्त जीवन के साथ एक हो जाने की प्यास और प्रार्थना है. प्रेम का मौलिक भाव एकता खोजना है. आज तक मनुष्य-जाति शरीर के तल पर एकता और प्रेम को खोजती रही है, इसलिए जगत में प्रेम जैसी घटना घटित नहीं हो पायी.  जैसा मैंने आपसे कहा, यह जो पजेशन और मालकियत की चेष्टा चलती है, स्वभावतः उसके आसपास ईर्ष्या का जन्म होगा. जहां मालकियत है, वहाँ ईर्ष्या है. जहाँ पजेशन है, वहाँ जेलसी है. इसलिए प्रेम के फूल के आसपास ईर्ष्या के बहुत कांटे, बहुत बागुड़ खड़े हो जाते हैं और ईर्ष्या की आग के बीच प्रेम कुम्हला जाता हो, तो आश्चर्य नहीं. जहाँ ईर्ष्या है, वहाँ प्रेम संभव नहीं है. जहाँ प्रेम है, वहाँ ईर्ष्या संभव नहीं है. 

स्मरण रहे, प्रेम, मैंने कहा, एक हो जाने की आकांक्षा है. और एक वही हो सकता है, जो मिटने को राजी हो. जो मिटने को राजी नहीं होता, उसके लिए दूसरी दिशा खुल जाती है. वह अहंकार की दिशा है. तब वह अपने को बनाने को, मजबूत करने को, पुष्ट करने को, ज्यादा सख्त अपने आसपास दीवाल उठाने को, किला बनाने को उत्सुक हो जाता है! अपने मैं को मजबूत करने की यात्रा में संलग्न हो जाता है. प्रेम असफल होता है, क्योंकि हम शरीर के तल पर खोजते हैं.  प्रेम शरीर के तल पर नहीं, चेतना के तल पर घटने वाली घटना है.  शरीर के तल पर जब प्रेम को हम घटाने की कोशिश करते हैं, तो प्रेम आब्जेक्टिव हो जाता है. कोई पात्र होता है प्रेम का, उसकी तरफ हम प्रेम को बहाने की कोशिश करते हैं. वहां से प्रेम वापस लौट आता है, क्योंकि पात्र शरीर होता है, जो दिखायी पड़ता है, जो स्पर्श में आता है. लेकिन प्रेम को अगर आत्मिक घटना बनानी है, अगर प्रेम की कांशसनेस बनाना है, चेतना बनाना है तो प्रेम आब्जेक्टिव नहीं रह जाता, सब्जेक्टिव हो जाता है. तब प्रेम एक संबंध नहीं, चित्त की एक दशा है, स्टेट आफ माइंड है.

जब तक आप प्रेम को एक संबंध समझते रहेंगे, एक रिलेशनशिप, तब तक आप असली प्रेम को उपलब्ध नहीं हो सकेंगे. संबंध की भाषा में नहीं, किससे प्रेम नहीं; मेरा प्रेमपूर्ण होना है. मेरा प्रेमपूर्ण होना अकारण, असंबंधित, चौबीस घंटे मेरा प्रेमपूर्ण होना है. किसी से बंधकर नहीं, किसी से जुड़कर नहीं, मेरा अपने आपमें प्रेमपूर्ण होना हैं. यह प्रेम मेरा स्वभाव, मेरी श्वास बने. श्वास आये, जाये, ऐसा मेरा प्रेम--चौबीस घंटे सोते, जागते, उठते हर हालत में. मेरा जीवन प्रेम की भाव-दशा, एक लविंग एटिटयूड, एक सुगंध, जैसे फूल से सुगंध गिरती है. प्रेम भी आपका स्वभाव बने--उठते, बैठते, सोते, जागते; अकेले में, भीड़ में, वह बरसता रहे फूल की सुगंध की तरह, दीये की रोशनी की तरह, तो प्रेम प्रार्थना बन जाता है, तो प्रेम प्रभु तक ले जाने का मार्ग बन जाता है, तो प्रेम जोड़ देता है समस्त से, सबसे, अनंत से. एकांत में प्रेमपूर्ण होने का प्रयोग करें, खोजें, टटोलें अपने भीतर. हो जायेगा, होता है, हो सकता है. जरा भी कठिनाई नहीं है. कभी प्रयोग ही नहीं किया उस दिशा में, इसलिए ख्याल में बात नहीं आ पायी है. निर्जन में भी फूल खिलते हैं और सुगंध फैला देते हैं. निर्जन में, एकांत में प्रेम की सुगंध को पकड़ें. जब एक बार एकांत में प्रेम की सुगंध पकड़ जायेगी तो आपको खयाल आ जायेगा कि प्रेम कोई रिलेशनशिप नहीं, कोई संबंध नहीं.

प्रेम स्टेट ऑफ़ माइंड है, स्टेट ऑफ़ कांशसनेस है, चेतना की एक अवस्था है.


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ओशो के 'प्रेम, सम्बन्ध नहीं है' से साभार... पूरे आलेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें. 
ओशो के जन्मदिन, 11 दिसम्बर पर श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित...