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20 जुलाई 2026

हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती...

कॉलेज टाइम में सींकिया टाइप लौंडों को रंगबाजी दिखाते समय काव्य-पंक्तियाँ स्वतः ही उभरती थीं....

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

......"

आज ये पंक्तियाँ फिर अनायास ही उभर आईं, जब कोकरोचों के विरोध प्रदर्शन में देखने-सुनने को मिला कि संसद को उखाड़ देंगे, देश को नेपाल बना देंगे, प्रधानमंत्री को संसद में घुस कर मारेंगे, रंडुओं को देश कैसे दे दिया आदि-आदि. ऐसे विचार रखने वाले कथित प्रेशर ग्रुप के सामने शिक्षा मंत्री का ही क्या, किसी छात्र-संघ के पदाधिकारी का भी इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए. विपक्षी दलों की चाल एक बार फिर सरकारी दृढ़ता के सामने विफल हुई, ये अच्छी बात है. कम से कम पढ़े-लिखे लोगों को इस बात को समझना चाहिए.

 

एक तरफ इसरो जैसी सरकारी, स्थायी नौकरी को छोड़कर 35-36 वर्ष के दो युवकों ने अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान को सिद्ध किया, दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं जिनको कोकरोच बने रहने में गर्व हो रहा है; संसद उखाड़ने के मंसूबे हैं; देश को नेपाल बनाने की मानसिकता है. ऐसे युवाओं में पुलिस की लाठी के साथ-साथ जनमानस के जूते भी पड़ने चाहिए थे.

 

इन्हीं के लिए फिर कहेंगे...

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

19 जुलाई 2026

प्रेरणास्रोत हैं ये दो युवा

युवाओं के लिए आदर्श होने चाहिए ये दो युवा और इनकी पूरी टीम.

 

स्काईरूट एयरोस्पेस के द्वारा 'विक्रम-1' को 18 जुलाई 2026 को प्रक्षेपित किया गया. यह भारत का पहला पूर्णतः निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट है. श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसका सफल परीक्षण किया गया. इसके पहले स्काईरूट का पहला ऐतिहासिक सब-ऑर्बिटल मिशन विक्रम-एस था. इसे 18 नवंबर 2022 में 'प्रारंभ' नामक मिशन के अंतर्गत प्रक्षेपित किया गया था. इस प्रोजेक्ट ने भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए रास्ते खोले थे.

 

आपको बताते चलें कि स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक इसरो के दो पूर्व युवा वैज्ञानिक पवान कुमार चंदना (उम्र- 35 वर्ष) और नागा भरत डाका (उम्र- 36 वर्ष) हैं. उन्होंने 2018 में हैदराबाद स्थित प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप की शुरुआत की थी.

 

एक ये ज़ेन-जी हैं और एक वे हैं जो कॉकरोच बने घूम रहे हैं.

 


23 अगस्त 2023

चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

करोड़ों-करोड़ों देशवासियों ने साँसों को थामकर, अपनी धड़कनों की तीव्रगति को महसूस करते हुए खुद को गौरवशाली पल का साक्षी बनाया. अपने निर्धारित समय चंद्रयान 3 ने जैसे ही चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया वैसे ही हम वैश्विक स्तर पर चौथे देश हो गए जिन्होंने अपने यान को चंद्रमा पर उतारा है. इस उपलब्धि में भले ही हम चौथे स्थान पर रहे हों मगर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी भी उतारने वाले हम पहले देश बने. आज से चार वर्ष पूर्व सन 2019 में भी हमारे वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 को दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था मगर चंद्रमा की सतह से कुछ पहले ही विक्रम का संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया था. यद्यपि प्रथम दृष्टया चंद्रयान 2 असफल समझ आ रहा हो तथापि उसके ऑर्बिटर के आज भी कार्य करने के कारण उसको आंशिक रूप से सफल कह सकते हैं. चंद्रयान 2 अभियान से जुड़े लैंडर विक्रम की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने और फिर ऑर्बिटर से उसका संपर्क टूट जाने बाद इसरो प्रमुख के. सिवन भाव विह्वल हो गए थे. उनका अपने आँसू न रोक पाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको गले लगाकर उनका हौसला बढ़ाना आज भी भारतवासी भूले नहीं हैं. उन आँसुओं के पीछे छिपी भावनात्मकता को आज की सफलता के बाद उमड़े आँसुओं से समझा जा सकता है, आज की स्वर्णिम गौरवमयी गाथा को समझा जा सकता है. 




चंद्रयान 3 अब किस तरह से चंद्रमा के, अंतरिक्ष के रहस्यों को उजागर करेगा; कैसे उसके द्वारा नवीनतम खोजों को आधार मिलेगा; कैसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान 3 भारत का नाम रोशन करेगा; कैसे हमारा देश अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की राह पर लगातार उन्नति के पथ पर बढ़ सकेगा; कैसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए अन्य देशों को अपने यान प्रक्षेपित करने के लिए विश्वसनीय मंच उपलब्ध हो सकेगा आदि पर लगातार मंथन होता रहेगा, विमर्श होता रहेगा. इन सबके सापेक्ष चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय आकलन भी अत्यावश्यक है. इस अभियान की सफलता ने सबसे प्रमुखता से सिखाया है कि किसी एक-दो असफलताओं से खुद को निराश नहीं किया जाना चाहिए. मात्र चार साल की अल्पावधि में जिस तरह से इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग की निराशा से बाहर निकल कर सफलता का झंडा चंद्रमा पर लहराया है, वह अनुकरणीय है. देश के भीतर और बाहर इस तरह की मानसिकता को बहुंख्यक लोगों में गहरे से बैठा दी गई है कि देश में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कोई मानक स्थापित नहीं किया जा सकता है. विगत की अनेकानेक अव्यवस्थाओं, असफलताओं को उदाहरण बनाकर इस तरह से प्रचार किया जाता है कि देश में सिर्फ और सिर्फ अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है. इस अभियान ने सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट सन्देश दिया है कि हम वे भारतवासी हैं जो अपनी असफलता से भी सीख लेते हुए पुनः पूरी ताकत के साथ सफलता के लिए खड़े होते हैं.


चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग के बाद से लेकर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के बीच वैज्ञानिकों के धैर्य, उनकी मेहनत, आत्मविश्वास की कहानी उन बच्चों को अवश्य ही सुनाई जानी चाहिए जो किसी एक प्रतियोगी परीक्षा की असफलता के बाद हताशा, निराशा, अवसाद के अंधकार में जाकर अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. देश का एक शहर कोटा लम्बे समय से जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए प्रसिद्द रहा है वहीं अब वह बच्चों के द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं के लिए कलंकित हो रहा है. अभिभावकों को कोटा अथवा अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हौसला, हिम्मत बननी चाहिए. अभिभावकों को समझाना और समझना चाहिए कि दो-चार प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता ही ज़िन्दगी का अभीष्ट नहीं है. ज़िन्दगी इसके भी बहुत आगे तक है. सफलताओं के लिए और भी रास्ते हैं, और भी मंच हैं.




इस अभियान की सफलता उनके लिए भी उदाहरण बन सकती है जो बात-बात पर संसाधनों की कमी का, तनाव का, दबाव का रोना रोते हैं. यहाँ समझना चाहिए कि अंतरिक्ष अभियान में केवल वैज्ञानिक मेधा ही खर्च नहीं होती है वरन उनका समय, श्रम, देश का धन और अनेक संसाधनों का भी उपयोग होता है. चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के वित्तीय बजट से इसे सहजता से समझा जा सकता है. चंद्रयान-2 मिशन पर 978 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इसमें से 603 करोड़ रुपये ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर, नेविगेशन और ग्राउंड सपोर्ट नेटवर्क पर तथा 375 करोड़ रुपये सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल पर खर्च किए गए थे. चंद्रयान 3 में इस बजट में अभूतपूर्व कमी आई. इसके लिए लगभग 615 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया. इसके लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल में लगभग 250 करोड़ रुपये व्यय होने का तथा लॉन्च सर्विस पर अतिरिक्त 365 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया. एक ऐसे देश के लिए जहाँ पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है; गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या भी अधिक है; जनहितकारी योजनाओं में धन की कमी नहीं रहने दी जाती है; प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी खजाने से बिना किसी भेदभाव के सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वहाँ स्पष्ट है कि न केवल आर्थिक संसाधनों पर बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर, मानवजन्य संसाधनों पर भी एक तरह का दबाव बन जाता है. संभव है कि अनेकानेक भावी योजनाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया गया होगा. संभव है कि अनेक संचालित योजनाओं के बजट को रोककर इस महत्त्वाकांक्षी अभियान को सफलता की राह ले जाया गया होगा.



इन स्थितियों का दबाव न केवल सरकार पर वरन वैज्ञानिकों पर भी रहता होगा. एक अभियान की असफल लैंडिंग का तनाव लेकर, देश की अनेकानेक परेशानियों, समस्याओं को जानते-समझते हुए, वैश्विक जगत में खुद को स्थापित करने के दबाव को लेकर भी हमारे वैज्ञानिकों ने महान उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने दिखाया है कि हम भारतीय महज कीर्तिमान रचने के लिए नहीं वरन दुर्गम्य को सहज बनाने, अलभ्य को सुलभ बनाने के लिए पूर्ण मनोयोग, आत्मविश्वास से कार्य करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि एक असफलता जीवन मे संभावनाओं का अंत नहीं करती है, बस हमें ही अपनी हिम्मत बनाये रखनी चाहिए. मिशन चंद्रयान के बाद गगनयान और सूर्य मिशन के बारे में वही विचार कर सकता है जो हौसला बनाये रखेगा. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की ये पंक्तियाँ ‘क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ निश्चित ही कर्मशील लोगों की कहानी कहती हैं.    





 

06 अगस्त 2023

अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता के लिए उड़ान

14 जुलाई 2023 को दोपहर बाद प्रक्षेपित किया गया चंद्रयान-3 चंद्रमा की कक्षा में पहुँच चुका है. सब कुछ सही रहा तो चंद्रमा की सतह पर 23 अगस्त को इसकी सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी. इसके लिए इसकी गति को लगातार कम किया जायेगा. चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण चंद्रयान की वर्तमान गति, जो लगभग चालीस हजार किमी प्रति घंटा है, को कम करते हुए 3600 किमी प्रति घंटे पर लाया जाएगा. इसके लिए इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान की गति की विपरीत दिशा में थ्रस्ट फायर किये जायेंगे. चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर जिस स्थान पर लैंड कराये जाने की योजना है वह स्थान लगभग उसी तरह का है जैसा कि चंद्रयान-2 की लैंडिंग का था. यदि चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर उतरने में कामयाब रहा यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला मिशन बन जाएगा. 




इस मिशन की विशेष बात यह है कि चंद्रयान-3 चंद्रमा की दक्षिणी सतह पर उतरेगा. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र वहाँ का दुर्गम क्षेत्र है, जहाँ के अनेक भागों में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुँचती है. पूरी तरह से अँधेरे में रहने के कारण यहाँ का तापमान दो सौ डिग्री सेल्सियस भी से नीचे चला जाता है. रोशनी का न होना और अत्यंत निम्न तापमान के कारण इस क्षेत्र में उपकरणों के संचालन में कठिनाई होती है. इसके अलावा यह क्षेत्र बड़े-बड़े गड्ढों वाला है, इस कारण भी यहाँ सॉफ्ट लैंडिंग एक चुनौती होती है. अभी तक चंद्रमा पर उतरने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में उतरे हैं. भूमध्य रेखा से कोई भी अंतरिक्ष यान सबसे दूर गया यान चीन का चांग-ई-4 था जो 45 डिग्री अक्षांश के पास उतरा था. चंद्रमा के भूमध्यरेखा क्षेत्र के पास किसी भी यान का उतरना आसान और सुरक्षित है. यहाँ की सतह चिकनी है, ढलान न के बराबर हैं और यहाँ पर पहाड़ियाँ, गड्ढे भी नहीं हैं. इसके साथ-साथ सूर्य की रौशनी भी पर्याप्त मात्रा में इस क्षेत्र में उपलब्ध रहती है.  


भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान-3 के पहले भी दो मिशन के द्वारा चंद्रमा के रहस्यों को खोजने का प्रयास किया गया है. चंद्रयान कार्यक्रम की घोषणा वर्ष 2003 में 15 अगस्त को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. यह भारत का पहला चंद्रमा मिशन बना. चंद्रयान-1 ने सॉफ्ट लैंडिंग न होने के बाद भी 14 नवंबर 2008 को सफलतापूर्वक चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया. इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह की खनिज संरचना, ध्रुवीय क्षेत्र में बर्फ के पानी की उपलब्धता और चंद्रमा की सतह पर हीलियम 3 और विकिरण प्रभावों का पता लगाना था. इसके बाद 22 जुलाई 2019 को चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान को स्वदेशी जीएसएलवी रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था. जीएसएलवी की यह पहली परिचालन उड़ान थी. यह इसरो का पहला मिशन था जिसमें लैंडर भी गया था. विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला था कि 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह से उतरने के पूर्व लगभग दो किमी की दूरी पर लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया. इसका आर्बिटर अभी भी चंद्रमा की कक्षा में मौजूद है, इसलिए एक दृष्टि से चंद्रयान-2 को सफल भी कहा जा सकता है.


पृथ्वी से निर्मित होने और इसके सबसे निकट होने के कारण चंद्रमा के रहस्यों को समझने से पृथ्वी और ब्रह्मांड की बेहतर समझ विकसित हो सकेगी. चंद्रयान-3 की सफलता से भारत को दुनिया के सामने अपनी क्षमता दिखाने का मंच मिल जाएगा. रॉकेट लॉन्च, अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी, स्किल्ड मैनपावर की दिशा में बेहतरीन काम किए जा सकेंगे. ऐसा माना जाता है कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (स्‍पेस इकॉनमी) सन 2020 तक 9.6 अरब डॉलर की थी, इसके सन 2025 तक बढ़कर 13 अरब डॉलर हो जाने के संकेत हैं. आज भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए भी खुला है. देश में डेढ़ सौ से अधिक स्‍पेस-टेक स्‍टार्टअप हैं, इनमें गूगल, स्‍कायरूट, सैटश्‍योर, ध्रुव स्‍पेस और बेलाट्रिक्‍स जैसी कंपनियाँ शामिल हैं. ये कंपनियाँ दैनिक जीवन में काम आने वाली तकनीक के लिए सैटेलाइट आधारित फोन सिग्‍नल, ब्रॉडबैंड, ओटीटी से लेकर 5जी और सौर ऊर्जा क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग के अवसर खोज रही हैं. निजी निवेशकों की बढ़ती लालसा देखकर भारत सरकार भी अंतरिक्ष उद्योग में निजी सहभागिता को अधिक से अधिक प्रोत्साहित कर रही है. इसी उद्देश्य से भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 को मंजूरी दी है जो निजी क्षेत्र के लिए भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं को बढ़ाएगी. चंद्रयान-3 की सफलता से अंतरिक्ष क्षेत्र में तो भारत की धाक बढ़ेगी ही साथ ही धरती पर जियो-पॉलिटिक्‍स के रूप में भी प्रभाव बढ़ेगा.


यद्यपि चंद्रयान-1 ऑर्बिटर का मून इम्पैक्ट प्रोब 14 नवंबर 2008 को जब चंद्रमा की सतह पर उतरा था तो भारत चंद्रमा पर अपना झंडा लगाने वाला चौथा देश बन गया था तथापि चंद्रयान-2 लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो जाने पर भारत ऐसा करने वाला चौथा देश होता. 2019 के सितंबर महीने में चंद्रयान-2 के वैज्ञानिकों की आँखें आँसुओं से भर गई थीं जबकि ग्यारह वर्ष की मेहनत और लम्बा रास्ता तय करने के बाद चंद्रमा की सतह के नजदीक ही लैंडर विक्रम क्रैश हो गया था. अब चार साल बाद उसी पल की प्रतीक्षा है, जब वैगानिकों की आँखें ख़ुशी के आँसुओं से भरी होंगी. यह सफलता भारत को अमेरिका, रूस और चीन के साथ दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में खड़ा कर देगी.