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03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


24 जुलाई 2024

ये विषय आस्था का है

व्रत-उपवास-पूजन आदि की सामग्री को लेकर बहुसंख्यक हिन्दू परिवारों में सदैव से एक अलग स्थिति रही है. दुकान पर मिठाई अथवा अन्य पूजन सामग्री वाला भले ही दो दिन से न नहाया हो, मुँह में गुटखा भरे हो मगर वही सामग्री घर में आने के बाद पूज्य हो जाती है. उसे बिना नहाए छुआ नहीं जा सकता है, बिना पूजन के उसे खाया नहीं जा सकता है, जूठे मुँह उसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है. ये सब कोई ढकोसला नहीं बल्कि एक विश्वास है, एक आस्था है. ये अलग बात है कि आधुनिक बनने के चक्कर में, वामपंथ को चचोरते रहने के कारण बहुतेरे हिन्दू इन सब बातों को सार्वजनिक रूप से नहीं मानते. (ये और बात है कि ऐसे बहुतेरे हिन्दू अंदरूनी रूप में कहीं न कहीं ऐसी बातों का पालन करते हैं.)

 

यदि कांवड़ मार्ग में हिन्दू श्रद्धालुओं के भोज्य पदार्थों के साथ शुचिता बनाये रखने के लिए कोई आदेश आया था तो मुसलमानों को उसका स्वागत करना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ क्योंकि इनका मूल कर्म हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाना है, हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों, कृत्यों पर हमला बोलना है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश पर मुसलमानों से ज्यादा वे लोग उचकने में लगे हैं जो मुस्लिम वोटों के कारण जिंदा हैं. ऐसे लोग भी जानते हैं कि हिन्दू आस्था, श्रद्धा का तात्पर्य क्या है, मगर वे अपनी मानसिकता के हाथों बंदी बने हुए हैं.

 


03 जनवरी 2023

आपसी सहयोग, विश्वास को नहीं छोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया.


अब जबकि पुराने साल को पीछे छोड़कर हम सब नए साल में पहुँच गए हैं तब हमें अपने डरावने अतीत और उसकी भयावहता को पीछे छोड़ने की आवश्यकता है. लोगों ने सब कुछ भूल कर नए वर्ष का स्वागत पूरे जोश, उत्साह, उमंग से किया है, ये सुखद है मगर इसी सुखद के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 






 

29 दिसंबर 2022

आपसी विश्वास नहीं तोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया. 


अब जबकि ये साल अपनी निपट अंतिम अवस्था में है. लोग फिर एकबार सबकुछ भूल कर नए वर्ष के स्वागत के लिए तत्पर दिखने लगे हैं तब उसी के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 





 

25 नवंबर 2022

विश्वास के प्रति विश्वास

विश्वास एक ऐसा शब्द है जिसका स्थान बहुत मुश्किल से बना पाता है किन्तु उसके टूटने में एक पल भी नहीं लगता है. आज विश्वास को लेकर बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं किन्तु उनके प्रति लोगों में खुद ही विश्वास देखने को नहीं मिलता है. इसके लिए किसी भी रूप में एकपक्षीय अवधारणा काम नहीं करती है बल्कि इसके प्रति गंभीरता, संवेदनशीलता के लिए दोनों पक्षों का ईमानदार होना आवश्यक है. विश्वास के लिए एक-दूसरे के प्रति किसी भी रूप में शंका का, लेशमात्र भी संदेह का कोई अवसर नहीं होना चाहिए. यदि ऐसा होता है तो समझिये कि उस जगह पर, उन दो व्यक्तियों के बीच में किसी भी रूप में विश्वास तो है ही नहीं, विश्वास कभी था भी नहीं.


बात समझने योग्य ही है, न कि समझाने योग्य. इसका एहसास किया जाना चाहिए कि व्यक्ति किस तरह दूसरे पर विश्वास कर रहा है और किस तरह दूसरे के मन में अपने प्रति विश्वास जगा रहा है. ऐसी स्थितियाँ बहुत हद तक सामने आती हैं जबकि व्यक्ति चाहता है कि सब उस पर विश्वास करें किन्तु वह कहीं न कहीं दूसरे के प्रति शंकालु बना रहता है. यह किसी भी रूप में सकारात्मक नहीं है. विश्वास के लिए दोनों पक्षों का समान रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पित होना अनिवार्य जैसा ही है. बिना इसके विश्वास के लिए विश्वासपरक भावना पैदा नहीं की जा सकती है.

 







 

11 नवंबर 2022

संबंधों में दिखावा

संबंधों के चलन में विगत लगभग दो दशक से बहुत ज्यादा दिखावा होने लगा है. संबंधों के निर्वहन में एक तरह की बनावट भी आ चुकी है. ऐसा नहीं है कि सभी तरह के संबंधों में अथवा सभी लोगों के संबंधों में ऐसा होता है किन्तु बहुतायत में ऐसा देखने को मिल रहा है. कुछ लोग लगभग प्रत्येक व्यक्ति जे जीवन में ऐसे होते हैं जो उनके बहुत ख़ास होते हैं. उनके अत्यंत निकट के होते हैं. ऐसे लोगों से किसी तरह का कोई औपचारिक सम्बन्ध नहीं होता है. उनके सामने भी उसी तरह का व्यवहार होता है, जैसा कि उनके पीछे. इसे उलट रूप में भी समझा जा सकता है कि उनके प्रति जैसी सोच और मानसिकता उनके पीछे होती है, ठीक वही उनके सामने भी होती है. इसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होता है. 




इसके ठीक उलट ऐसे सम्बन्ध भी अस्तित्व में आ चुके हैं जहाँ जबरदस्त तरीके से बनावट है. सामने मिलने पर ऐसे मुलाक़ात की जाती है मानो इनसे बड़ा कोई ख़ास है ही नहीं. मिलने वाले जिगरी सम्बन्धी समझ आते हैं. एक-दूसरे के लिए जान देने वाला इनसे बड़ा और कोई नहीं संसार में, ऐसा दिखाई देता है. और जब यही लोग एक-दूसरे के पीठ पीछे होते हैं तो यही एक-दूसरे की काट करने वाले होते हैं. यही एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाले, एक-दूसरे को हराने की मानसिकता रखने वाले होते हैं.


हो सकता है कि ऐसी मानसिकता वर्षों से समाज में अपना अस्तित्व बनाये हुए हो मगर जिस तरह से पिछले दो-ढाई दशकों में ऐसा होते दिखा है, वो आश्चर्यचकित करने वाला है. इधर संबंधों के बनाने में, उनके निर्वहन में स्वार्थ को प्रमुखता से अपनाया गया. जहाँ से भी लाभ मिलने की उम्मीद दिखी, वहीं संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की कोशिश शुरू हो गई. संबंधों का ये निर्वहन उसी स्थिति तक गति पाता रहता है, जहाँ तक कि लाभ की स्थिति बनी रहती है. ऐसे सम्बन्ध अल्पकालिक रहते हैं किन्तु दिखावे के कारण बहुतेरे लोग संबंधों को खींचते रहते हैं. यही लोग वे होते हैं जो सामने आने पर आत्मीयता का चरम दिखाते हैं और पीठ पीछे यही लोग विश्वासघात करने का काम करते हैं. आज के समय ऐसे लोगों से बच कर रहने की आवश्यकता है. 






 

08 नवंबर 2022

अपना विश्वास खोने न दें

किसी भी व्यक्ति के जीवन में यदि उसकी सबसे ज्यादा और सबसे कड़ी परीक्षा कोई लेता है तो वो है उसकी ज़िन्दगी. एक ज़िन्दगी पूरे जीवन भर न जाने कितनी बार परीक्षा लेती है. इस परीक्षा की प्रक्रिया में ज़िन्दगी भले न थके किन्तु बहुत बार व्यक्ति थक जाता है. यही थकान उसे ज़िन्दगी के प्रति नकारात्मक बना देता है. नकारात्मक भाव का आना ही पहली हार होती है, किसी भी व्यक्ति के जीवन में. सामाजिक जीवन में सक्रियता के कारण अनेक बार ऐसे मौके सामने आते हैं, अनेक लोग ऐसे मिलते हैं जहाँ साफ़-साफ़ समझ आता है कि यहाँ नकारात्मकता का माहौल अधिक है. ऐसे लोग अक्सर इसका उपाय भी खोजा करते हैं या फिर पूछा करते हैं. इस बिंदु पर हमारा व्यक्तिगत मानना है ये ज़िन्दगी है तो समस्याएँ भी आयेंगी, किसी के पास कम तो किसी के पास ज्यादा. यहाँ व्यक्ति को अपनी कोशिश करते रहना चाहिए. ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए. खुद में आत्मविश्वास से भरा रहना चाहिए. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे




जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? सुख और दुःख मन की अवस्था होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु यह व्यावहारिक जगत की भी एक स्थिति है. इस स्थिति को स्वीकारते हुए एक सत्य यह भी स्वीकार करना चाहिए कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा. दुःख जाने के बाद आया सुख भी स्थायी अवस्था के साथ नहीं आता है, वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए किसी भी व्यक्ति द्वारा मान लिया जाता है कि ऐसा होना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 


ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.





 

07 सितंबर 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.  





 

17 दिसंबर 2020

प्यार को प्रेम-स्नेह-विश्वास से देखने की आवश्यकता

 किसी से प्रेम हो जाना, किसी के प्रति आकर्षण होना, किसी का पसंद आने लगना, कोई दिल को अच्छा लगने लगता है आदि-आदि बातें लगभग सभी के साथ होती हैं. ये और बात होती है कि बहुतायत लोग अपनी पसंद, अपने आकर्षण को प्रदर्शित नहीं करते हैं, यहाँ तक कि जिसे पसंद करते हैं, जिसके प्रति आकर्षण का भाव रखते हैं उससे भी नहीं कह पाते हैं. ऐसा होने से बचने का भाव रखने वाले अथवा किसी के प्रति आकर्षण, पसंद का भाव न रखने वाले संभवतः संवेदनात्मक रूप से कठोर होते हैं. यहाँ आगे बढ़ने के पहले यह स्पष्ट कर दें कि इस आकर्षण, पसंद, दिल को अच्छा आदि लगने के पीछे विपरीतलिंगियों वाली मानसिकता का पोषण नहीं है बल्कि ऐसा सभी सन्दर्भों में है.


किसी व्यक्ति का पसंद आना उसके शारीरिक  सौन्दर्य के लिए भी हो सकता है, उसकी किसी विशेषता के सन्दर्भ में हो सकता है. किसी का बोलना उसके प्रति आकर्षण का कारण बनता है. किसी का लिखना उसके प्रति आकर्षण का कारण हो जाता है. किसी की कोई कलात्मक अभिव्यक्ति उसके प्रति प्रेम जगाती है. इन सबमें किसी भी रूप में स्त्री अथवा पुरुष रूप पहली बार में नहीं होता है. दरअसल इस तरह का जेंडर आधारित विभेद व्यक्ति उस समय करने लगता है जबकि स्वयं किसी न किसी तरह की ग्रंथि से ग्रसित होता है. समाज में एक आम धारणा है कि प्रेम का आधार सिर्फ स्त्री, पुरुष के बीच ही माना जाता है.




हमारा व्यक्तिगत स्तर पर अपना मानना यह रहा है कि कोई व्यक्ति यदि संवेदना से भरा हुआ है, यदि किसी व्यक्ति के दिल में सबके प्रति कोमल भावनाओं का समावेश है, यदि कोई व्यक्ति किसी को दुखी नहीं कर सकता है, यदि कोई व्यक्ति सबके साथ सहयोग की भावना रखता है, यदि किसी व्यक्ति में पावनता का गुण है तो वह सभी के साथ प्रेम की अभिव्यक्ति ही करता है. प्रेम की अभिव्यक्ति में, आकर्षण में किसी तरह की बुराई तब तक नहीं है जब तक कि उसमें आसक्ति न आये, जब तक कि उसमें दुर्विचार न आये. ऐसा होने की स्थिति में फिर वहाँ पावनता का लोप हो जाता है इसके चलते कोई भी व्यक्ति सही, गलत का भाव खो देता है.


समाज के बीच जिस तरह से प्रेम की पावनता पर चर्चा को गायब किया जा रहा है वह विचारणीय है. आज जिस तरह से एक-दूसरे के प्रति अच्छे लगने वाले भाव को कुत्सित रूप में देखा जाने लगा है वह आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है. आज जिस तरह से व्यक्ति व्यक्ति के बीच में सद्भाव, विश्वास, स्नेह को स्वार्थपूर्ति का साधन माना जाने लगा है उससे लोगों में समन्वय की कमी आई है. इन सब स्थितियों के दुष्परिणाम देखने को लगातार मिल रहे हैं. यही कारण है कि सदियों से प्रेम, स्नेह, प्यार चिल्लाने के बाद भी समाज में इसी एक एहसास की पर्याप्त कमी पाई जा रही है.


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वंदेमातरम्

30 नवंबर 2019

डरते हैं हम बवंडर आने के पहले की अपनी ही ख़ामोशी से


वर्षों पुराने दो परिचित. सामाजिक ताने-बाने के चक्कर में, शिक्षा-कैरियर के कारण चकरघिन्नी बन दोनों कई वर्षों तक परिचित होने के बाद भी अपरिचित से रहे. समय, स्थान की अपनी सीमाओं के चलते अनजान बने रहे. तकनीकी विकास ने सभी दूरियों को पाट दिया तो उन दोनों के बीच की दूरियाँ भी मिट गईं. वर्षों पुरानी दोस्ती फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटने लगी. इस क्रम में समय, परिस्थितियों ने भी अपना असर दिखाया. कुछ ख्वाहिशों ने सिर उठाया, कुछ मजबूरियों ने कदम रोके, कुछ ज्यादा पाने की लालसा, कुछ गलतफहमियों का सामना और फिर जैसा कि होता है कुछ अबोल जैसी स्थिति बनी. दोनों के बीच कॉमन परिचित हम भी रहे. जैसा कि स्वभाव है कि दो दोस्तों के बीच, संबंधों, रिश्तों के बीच आने वाली किसी भी खटास को दूर किया जाये. कोशिश कुछ अच्छा करने की हुई मगर वह गलत साबित हो गई. उन दोनों की अबोल की स्थिति बद से बदतर स्थिति में जाती लगी. प्रयास बराबर किये मगर हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी.

समय ने करवट बदली. उसे शायद उतने बुरे भर से संतोष नहीं था. अभी हमारी झोली में कुछ और ज्यादा बुरा सा उसके द्वारा भेजा जाना था. फिर एक बार वही दोनों दोस्तों का घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजरा. फिर उन दोनों के बीच की स्थिति को अपने स्तर से संवारने की, सुधारने की कोशिश की. सोचा किसी अनावश्यक विवाद को कोई और हवा न दे, सोचा किसी और के दिमाग का संदेह किसी मित्र के जीवन में जहर न घोले मगर सोचना बस सोचना ही रहा. बात सँभालने के चक्कर में और ज्यादा उलझ गई. अबकी हम गलत के साथ-साथ बुरे भी साबित किये गए. हमें खुद समझ नहीं आया कि हम बात को सही से समझा न सके या फिर दोनों दोस्तों के बीच के मतभेद को, मनभेद को हम ही सही ढंग से समझ न सके?


वैसे ये कोई नई बात नहीं कि हम कुछ अच्छा करने निकलें और उसका परिणाम बुरे के रूप में हमारे पास न लौटे. हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि अच्छा करने के प्रयास में बुरा हो जाता है, न केवल बुरा बल्कि बहुत बुरा हो जाता है. किसी के साथ अच्छा करने के पीछे किसी तरह की स्वार्थी भावना भी नहीं रहती है कि एकबारगी ये लगे कि इसी सोच का परिणाम मिला. याद करते हैं अपने बीते दिनों को तो सामाजिक कार्यों के प्रति, लोगों की सहायता के लिए खुद को हरदम तत्पर देखा. उस दौर में जबकि किसी भी युवा के सामने उसका कैरियर महत्त्वपूर्ण होता है, उस दौर में भी लोगों की सहायता के लिए खुद को पीछे नहीं रखा. अपना शहर रहा हो या किसी अनजाने शहर में रहे हों, लोगों की सहायता करने के स्वभाव को न बदला. शहर का कोई भी हिस्सा रहा हो, बाजार हो, कार्यालय को, कॉलेज हो, सफ़र हो, बस हो, ट्रेन हो या फिर कहीं भी हरदम मन में यही भावना रही कि खुद के द्वारा किसी भी जरूरतमंद की जितनी मदद हो सके, कर दी जाये. कभी भी इसके बदले किसी तरह की चाह न रखी. अनेक बार तो सहायता करने के दौरान मुसीबतों से भी पाला पड़ा. लड़ाई-झगड़े की स्थिति तक बनी, कई बार कानूनी पचड़ों में पड़ने तक की नौबत आ गई मगर कहीं न कहीं लोगों की सद्भावना काम आती रही और बिना किसी बड़ी मुसीबत के सहजता से सभी मुश्किलों से निकल लोगों के काम आते रहे.

सहयोग की, अच्छा करने की भावना का कई लोगों द्वारा नाजायज फायदा भी उठाया गया. काम निकल जाने पर ऐसे बहुत से लोगों ने पहचानना भी बंद कर दिया. ऐसे-ऐसे लोगों को जो अपने एक-एक दिन के बहुतायत घंटे हमारे साथ, हमारे घर पर बिताया करते थे, वे भी अनजानों की तरह से व्यवहार करते देखे गए. अच्छा करने की भावना लिए काम करने के बदले में जब आलोचना, धोखा अथवा गलत बातें सुनने को मिलती तो कष्ट होता था. शुरूआती दौर में ऐसी बातें अन्दर तक हिलाकर रख देती थीं मगर समय ने बड़े-बड़े घाव दिए और बड़े-बड़े घावों पर मरहम भी लगाया. कुछ ऐसा यहाँ भी होता रहा. हम अपने स्वभाव के अनुसार लोगों की सहायता करते रहे, क्या अपना क्या पराया, कौन परिचित का, कौन अपरिचित यह बिना जाने-समझे सबके काम आने का प्रयास करते रहे. इस प्रयास के सुफल भी मिले. लोगों की सहायता करने के साथ-साथ सदैव से एक विचार मन में रहा कि किसी के रिश्तों में हमारे कारण खटास न आये. किसी ने यदि हमसे सम्बन्ध बनाये हैं तो वे हमारी तरफ से न बिगड़ें. विगत के अनेक वर्षों में अनेक अवसर ऐसे आये जबकि संबंधों ने, रिश्तों ने जैसे हमारी परीक्षा लेनी चाही. हमारे सबसे करीब बताने से न चूकने वाले भी मौका पड़ने पर मुंह फेरने से न चूके. बिना हमारे एक कदम आगे न बढ़ाने वाले भी हमें पीछे छोड़कर किसी और के साथ आगे निकल लिए. दोस्ती का दंभ भरने वाले लोगों के रिश्तों को बचाने के चक्कर में हम खुद चक्कर खा गए.

जब-जब प्रयास किया कि हमारे कारण लोगों के संबंधों में एकजुटता बनी रहे, हमारे साथ वालों के संबंधों में मजबूती बनी रहे, सभी के बीच आपसी विश्वास-प्रेम-स्नेह बना रहे तब-तब ही हम गलत साबित किये गए. ऐसा कुछ यदि किसी अनजान के साथ हो, अनजान के द्वारा हो तो कष्ट नहीं होता है मगर यदि ऐसा कुछ अपने लोगों के द्वारा किया जाये तो कष्ट होना स्वाभाविक है. हाल की कुछ घटनाओं ने इस बार अन्दर से हिलाकर रख दिया. सोचा न था कि इस बार किसी अपने के द्वारा हमें गलत साबित किया जायेगा. वर्षों के संबंधों को एक झटके में अपरिचित सा साबित कर दिया जायेगा. संबंधों, रिश्तों में समन्वय, विश्वास बनाए रखने की कीमत संबंधों, रिश्तों की समाप्ति जैसी स्थिति से चुकानी पड़ेगी. दो दोस्तों के बीच संबंधों में कटुता न आये उसके लिए उठाया गया कदम हमारे लिए ही घातक साबित होगा समझ नहीं आया था. इसी तरह किसी गलत बात को, अफवाह को रोकने की कोशिश में एक बार फिर अपने आपको ही गलत महसूस किया. 


जीवन में घटित होने वाला कोई भी हादसा, कोई भी घटनाक्रम सीख देता है, ये और बात है कि हम उससे कितना और क्या सीखना चाहते हैं. ऐसी घटनाएँ हमें सदैव एक तरह का पाठ पढ़ाती हैं और हम भी ऐसी किसी भी तरह की घटना से सीखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. किसी भी बात पर अटके रहना हमारी आदत कभी न रही है, जिसके चलते कोई बात बहुत लम्बे समय तक परेशान नहीं कर पाती है. किसी भी बुरी से बुरी घटना भी आत्मविश्वास को, आत्मबल को हिला नहीं पाती है, यही वो शक्ति है जो हमें हर गलत बात से लड़ने के लिए प्रेरित करती है, हमारी ऊर्जा बनती है. ये और बात है कि कुछ समय को अन्दर उथल-पुथल तो मचा ही जाती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. भीतर उठा बवंडर अब शांत है, खामोश है. उठे बवंडर के बाद की ख़ामोशी हमें नहीं डराती, डर लगता है हमें बवंडर आने के पहले अपनी ही ख़ामोशी से. खुद की शक्ति से खुद के बवंडर को खामोश करके पुनः अपने रास्ते चल पड़े हैं क्योंकि हमारी राह में बहुत से लोग ऐसे हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं. बहुत से मजबूर लोग ऐसे बैठे हुए हैं जिन्हें हमारी आवश्यकता है. सहायता, सहयोग, मदद का कार्य चलता रहे, सतत चलता रहे, आत्मविश्वास, आत्मबल कमजोर न पड़े, यही कामना करते हैं खुद के लिए.

09 नवंबर 2019

रामलला हम आयेंगे...


26 वर्ष 11 माह 3 दिन की समयावधि बहुत लम्बी होती है. देश की संस्कृति पर एक काले धब्बे की तरह बना ढाँचा, जो बार-बार दर्शाता था एक विदेशी आक्रान्ता के आने और भारतीय संस्कृति के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि पर अपने निशान बना जाना. वर्षों तक हिन्दुओं-मुसलमानों में विवाद की स्थिति बनी रही. दुखद यह रहा कि देश में रहने के बाद भी मुस्लिम समुदाय द्वारा देश की संस्कृति के प्रति सद्भाव व्यक्त न किया गया. यह जानते-समझते हुए भी उस विवादित ढांचे को किसी भारतीय ने नहीं वरन एक विदेशी आक्रान्ता ने हिन्दुओं की आस्था-विश्वास के केंद्र को तोड़कर बनवाया था, कभी राम मंदिर के पक्ष में आवाज़ न उठाई गई. राजनैतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि नब्बे के दशक के आरंभिक वर्षों में देश भर में श्री राम जन्मभूमि के प्रति एक तरह की संवेदनात्मक लहर दिखाई देने लगी. परिणाम यह हुआ कि उस जोश ने विवादित ढाँचे को हवा में धूल बनाकर उड़ा दिया. 6 दिसम्बर 1992 के उस दिन के बाद श्री राम जन्मभूमि मामला अदालत में भटकने लगा. लगातार राजनीति का शिकार होकर भी आस्था-विश्वास नहीं डिगा और अंततः लम्बी समयावधि के बाद हिन्दुओं को अपना गौरव पुनः प्राप्त हुआ. आस्था-विश्वास की जीत हुई.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा जब आज इस निर्णय को सुनाया जा रहा था, तो उसे टीवी पर देखते समय फ़ैजाबाद यात्रा की एक घटना का स्मरण सहज ही हो आया. उस दिन श्री राम जन्मभूमि पहुँच कर, रामलला के द्वार पहुँच कर भी उनके दर्शन न हो सके थे. विचार आया कि हो सकता है कि उन पुलिस अधिकारियों को हमारी बात याद आई हो आज, जब उन्होंने हमारे कृत्रिम पैर के चलते रामलला के दर्शन न करने दिए थे.श्री राम जन्मभूमि के द्वार पर हम अपने एक मित्र के साथ दर्शनार्थ पहुंचे थे. प्रशासनिक औपचारिकताओं से कभी भी विरोध नहीं किया क्योंकि हमारा मानना है कि ये हम लोगों की सुविधा के लिए ही किया जाता है. उस समय की प्रशासनिक औपचारिकताओं के चलते मोबाइल सहित बहुत सारा सामान अन्दर ले जाना प्रतिबंधित सा. सबकुछ स्वीकारने-मानने के बाद भी हम अपनी छड़ी पर तैयार नहीं हो पा रहे थे. वहां तैनात कुछ पुलिसवालों को अपनी तकलीफ के बारे में बताया, अपने न चल पाने को लेकर समझाया मगर वे अपनी सहमति देने को तैयार नहीं हो रहे थे. छड़ी के बजाय अपने मित्र के कंधे का सहारा लेना एक विकल्प हमारी ही तरफ से रखा गया मगर कृत्रिम पैर का कोई विकल्प हम उनके सामने नहीं दे सके. समझ नहीं आ रहा था कि आखिर घुटने के ऊपर से कटे एक पैर के बाद हम चलकर कैसे जा सकेंगे? 

 काफी देर की झिकझिक के बाद एक अन्य अधिकारी ने मन बनाया पर तब तक हमारा मन इतना खिन्न हो चुका था कि सब कुछ रामलला पर ही छोड़ दिया. सम्बंधित अधिकारी ने अपनी औपचारिकता को निभाते हुए हमारे ऊपर स्थिति को छोड़ते हुए अन्दर जाने के लिए अपने उच्चाधिकारियों से बात करने की बात कही. मन में दर्शन करने की इच्छा जैसे अचानक से मर गई थी. जिस ताजगी, उत्साह के साथ वहां तक पहुंचे थे वह ठंडा पड़ चुका था. प्रशासनिक कार्यालय में बैठे हुए ही हमने सम्बंधित अधिकारी को किसी भी उच्चाधिकारी से बात न करने की बात कहते हुए कहा कि "अब हम तभी आयेंगे, जबकि रामलला चाहेंगे. हम या तो उनको भव्य स्वरूप में देखने आयेंगे या तब जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग ही हमारी अगवानी करोगे." तब एक कटाक्ष हुआ था कि भाईसाहब, राजनीति हो रही इस पर. ये मुद्दा कभी न सुलझेगा. किसी समय युवा जोश में जब इस आन्दोलन से जुड़े थे तब भी विश्वास था, उस दिन जबकि रामलला के द्वार पर खड़े थे और बिना दर्शन के वापस लौटने को तैयार थे तब भी मन में विश्वास था. मन का विश्वास बना रहा और आज विश्वास की जीत हुई. अब न सही हैलीकॉप्टर से पर भव्य स्वरूप निर्माण के बाद अवश्य ही जा सकेंगे.

उस दिन हमारे मित्र डॉ० डी के सिंह भारी मन से अकेले दर्शन करने चले गये, हमारी जिद से. भारी मन से इसलिए क्योंकि वे अकेले दर्शन को जाना नहीं चाह रहे थे. वैसे भी लगभग आधा घंटे चले प्रकरण के बाद मन से उत्साह ख़त्म हो चुका था. बहरहाल, वे दर्शन करके लौट आये. हम अपनी बात पर विश्वास के साथ अडिग रहे. अब निर्णय रामलला के पक्ष में आया है. मंदिर भी अपनी भव्यता के साथ बनेगा. अब हम उनके साथ जायेंगे, हर्ष से, उत्साह से, भव्य स्वरूप में.

28 अक्टूबर 2019

विश्वास को अविश्वास में बदलने से रोकें


विश्वास और अविश्वास के बीच एक अक्षर का अंतर है मगर दोनों की प्रकृति में जमीन आसमान का अंतर है. विश्वास के द्वारा व्यक्ति अपनी प्रस्थिति को मजबूत बना पाता है वहीं अविश्वास के कारण उसके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. विश्वास और अविश्वास के बीच के बारीक अंतर को किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में उसके साथ के लोगों द्वारा सहजता से जाना-समझा जा सकता है. वर्षों के सम्बन्ध, वर्षों का विश्वास एक झटके में अविश्वास में बदल जाता है. सोचने-समझने वाली बात यह है कि आखिर किसी का विश्वास क्यों और कैसे अविश्वास में बदल जाता है? क्यों वर्षों से चले आ रहे विश्वासपूर्ण संबंधों में अचानक अविश्वास का जहर घुल जाता है? संबंधों का, रिश्तों का विश्वासपूर्ण स्थितियों से अविश्वासपूर्ण स्थितियों में बदलने के अपने-अपने कारण हो सकते हैं. इसके बाद भी कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति के साथ वर्षों से विश्वास भरे सम्बन्ध रहे हों, उसके साथ अविश्वास जैसी स्थिति का बनना पूर्व की स्थितियों पर सवालिया निशान लगाना होता है. क्या अभी तक चले आ रहे सम्बन्ध किसी स्वार्थ में लिप्त थे? क्यों अभी तक व्यक्ति के विश्वास पर अविश्वास ने अपना साया न डाला था?

सामाजिक स्थिति में संबंधों का बनाया जाना आसान है मगर संबंधों का निर्वहन कठिन होता है, कुछ उसी तरह से विश्वास का बनाया जाना सरल भले होता है मगर उसका चिरकाल तक अविश्वसनीय बने रहना बहुत कठिन कार्य होता है. ऐसा आज के दौर में और भी कठिन होता जा रहा है जबकि जरा-जरा सी बात पर संबंधों में दरार आने लगी है. छोटी-छोटी बातें बड़े-बड़े रिश्तों, संबंधों के समाप्ति का कारण बनने लगी हैं. ऐसे में समझना मुश्किल होता है कि कब कौन किसका उपयोग कर रहा है, कब कौन किसके साथ संबंधों का निर्वहन कर रहा है. संबंधों के प्रति यही असमंजस की स्थिति ही अविश्वास को जन्म देती है. ऐसे में आवश्यक है कि किसी के बीच के संबंधों में जितना आवश्यक अपनेपन का होना है, उतना ही आवश्यक विश्वास का निष्कलंक होना भी है. इसमें भी ये और भी महत्त्वपूर्ण है कि संबंधों के आपसी निर्वहन, समन्वय का स्तर क्या है. यदि दो लोगों के बीच किसी भी तरह का स्वार्थ काम करता है तो उनके बीच किसी न किसी दिन संबंधों में अविश्वास आ ही जाता है. आज जबकि संबंधों में किसी न किसी स्तर पर स्वार्थ का समावेश होने लगा है, तब अविश्वास का जन्म होना स्वाभाविक है.

विश्वास को अविश्वास में बदलने से रोकने के लिए सबसे पहले संबंधों, रिश्तों को स्वार्थमय होने से रोकना होगा. इनका स्वार्थपूर्ण होने ने ही बहुत सारी समस्याओं को जन्म दिया है.

30 अप्रैल 2019

समय के साथ झूलती ज़िन्दगी


अपनों तक अपनी बात कहने और ग़ैरों तक अपनी बात कहने के बीच के अंतर को समझना आवश्यक होता है. कई बार समय ऐसे हालात पैदा कर देता है कि व्यक्ति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता है. दो व्यक्तियों के बीच के तालमेल को या फिर उनमें पैदा हुए अविश्वास को कोई और नहीं समय पैदा करता है. क्या वाकई ऐसा होता है? क्या वाकई ऐसा ही होता है? क्या सिर्फ समय ही ऐसा होता है जिसके चलते व्यक्ति कुछ कर नहीं पाता है या फिर करने में असमर्थ रहता है? सबसे पहले समझना होगा कि समय आखिर है क्या? क्या समय वही है जो किसी घड़ी के माध्यम से गुजर रहा है? क्या ये समय वही है जिसके चलते किसी व्यक्ति की उम्र बढ़ रही है? या फिर समय एक परिस्थिति है, एक स्थिति है, एक सोच है जिसके द्वारा कोई भी इन्सान कुछ करने के लिए तत्पर रहता है. असल सच यही है. समय तो किसी भी इन्सान के द्वारा अपनी स्थिति से सामंजस्य बनाए रखने का माध्यम है जबकि असल में स्थिति ही किसी इन्सान के कार्यों के सञ्चालन की जिम्मेवार होती है. 


हालातों का पैदा होना, चाहे वे सही हों या फिर गलत हों उनका होना किसी समय के अंतर्गत नहीं बल्कि उसी हालात के पार्श्व में पैदा की गई परिस्थिति से होता है. परिस्थितियाँ ही किसी व्यक्ति को सही गलत के लिए उकसाती हैं. स्थितियाँ ही किसी व्यक्ति के कुछ करने या न करने के लिए प्रेरित करती हैं. ऐसे में जबकि किसी स्थिति के चलते सबकुछ सामान्य सा हो जाये, सबकुछ खुशनुमा हो जाये, सबकुछ सुखद हो जाये तो समय उसी व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देने लगता है. और इसके उलट यदि सबकुछ नकारात्मक हो जाये तो वही समय उस व्यक्ति के विरोध में खड़ा दिखाई पड़ता है. सोचिये इसी बिंदु पर आकर कि व्यक्ति एक है, समय भी वही एक है तो फिर स्थितियों के नकारात्मक, सकारात्मक होने पर वही समय जिम्मेवार कैसे? स्पष्ट है कि अपने आपको संतुष्टि का भाव देने के लिए, खुद के द्वारा पैदा किये गए हालातों का दोष अपने सिर आने से बचने के लिए इन्सान समय को कटघरे में खड़ा कर देता है.

29 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी तू थक जाएगी इम्तिहान लेते-लेते - 1550वीं पोस्ट

ऐ ज़िन्दगी, कितनी बार इम्तिहान लेगी तू हमारा? हो सकता है कि कल को तू इम्तिहान लेती-लेती थक जाए मगर हम नहीं थकेंगे. तुम्हारा काम इन्तिहान लेना है, हमारा इम्तिहान देना. तुम थक जाओगी मगर हम नहीं. यहाँ तो एक उम्र बीत गई इसी में. ज़िन्दगी, तुमने अपने रंग-ढंग बदले मगर हम न बदले. तुम अपनी कोशिश करो, हम अपनी करते हैं. तुम जीत जाओ तो हमें ले जाना, हम जीतें तो बिना हमारी आज्ञा के न जाना. कहो, है मंजूर? ये कोई दर्शन नहीं, ये कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं वरन ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए किसी भी आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति है. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे.


जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? यह सत्य है कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा और वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. इन्सान से अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए मान लिया है कि ऐसा करना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 

ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.


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इस ब्लॉग की 1550वीं पोस्ट 

12 अप्रैल 2019

ग़लतफ़हमी और अविश्वास में दरकते सम्बन्ध


कतिपय सार्वभौमिक सत्यों की तरह यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि ग़लतफ़हमी के चलते संबंधों के बिगड़ने में देर नहीं लगती है. इसके लिए किसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह अनादिकाल से सत्य होता चला आ रहा है. दो लोगों के आपसी संबंधों में बिखराव का एक कारण उनके बीच होने वाली ग़लतफ़हमी होती है. यह ग़लतफ़हमी कई तरह से संबंधों के बीच पनपने लगती है. आज के आपाधापी के दौर में, भागमभाग की स्थिति में सभी के पास सीमित समय रह गया है या कहें कि व्यक्तियों ने खुद को खुद में ही सीमित कर लिया है, इस कारण भी समय सीमित रह गया है. ऐसी स्थिति में लोगों के बीच आपसी वार्तालाप के अवसर बहुत कम आने लगे हैं. लोग जानबूझ कर भी आपस में मिलने से बचने लगे हैं. एक-एक व्यक्ति के भीतर अनेक-अनेक समाज पनप चुके हैं, वह उनको सँभालते-सँभालते ही अपने आपमें इतना परेशान हो जाता है कि किसी और जगह समय देने की स्थिति में नहीं रहता है.


ग़लतफ़हमी के साथ-साथ विश्वास-अविश्वास की स्थिति भी आपसी मनमुटाव का कारण बनता है. दो लोगों के मध्य अविश्वास का जन्म भी इसी ग़लतफ़हमी के कारण होता है. देखा जाये तो ग़लतफ़हमी और अविश्वास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन दोनों का सह-सम्बन्ध भी है. एक के होने से दूसरे का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में चाहे पहले अविश्वास जन्म ले तो वहाँ ग़लतफ़हमी भी जन्म लेती है और यदि पहले ग़लतफ़हमी हो जाये तो वहाँ अविश्वास का जन्म हो जाता है. इधर देखने में आ रहा है कि वर्षों पुराने सम्बन्ध भी अचानक से जरा-जरा सी बात पर ग़लतफ़हमी का शिकार हो रहे हैं. अचानक से वर्षों पुराने संबंधों में अविश्वास पैदा हो जा रहा है. ये समझने का विषय है कि आखिर वर्षों पुराने संबंधों में एकदम से अविश्वास कहाँ, क्यों और कैसे उत्पन्न हुआ? यहाँ यह भी समझने वाली बात है कि यदि किसी स्थिति के चलते अविश्वास जैसी स्थिति आई भी, ग़लतफ़हमी का शिकार हुआ भी गया तो क्या आपसी सूझ-बूझ से, आपसी तालमेल से, आपसी बातचीत से उसे सुलझाने की कोशिश न की गई? ग़लतफ़हमी को दूर करने की कोशिश नहीं की गई?

इस तरह की स्थितियों से हमें स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अनेक बार दो-चार होना पड़ता है जबकि अपने करीबी मित्रों, सहयोगियों, रिश्तेदारों के बीच उत्पन्न अविश्वास, ग़लतफ़हमी को दूर करने के प्रयास करने पड़ते हैं. ऐसा देखने में आया है कि बहुत बार अकारण जन्मे अविश्वास, ग़लतफ़हमी के पीछे कभी उनका अहं, कभी उनके बीच अबोल की स्थिति, कभी किसी पुरानी घटना को लेकर बना तनाव मुख्य कारण होता है. ऐसा ही कुछ हाल के दिनों में भी हुआ जबकि हमारे दो मित्रों के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को, अविश्वास की स्थिति को दूर करने का प्रयास किया गया. यहाँ हवन करते हाथ जलने वाली बात हमारे साथ सत्य बैठ गई. दोनों मित्रों की चुप्पी के बीच हँसी-हँसी के वातावरण में हमने सुलझाव लाने की कोशिश की, इसी कोशिश में पता नहीं कहाँ से अविश्वास का, किसी पुरानी बात का, तनाव का, ग़लतफ़हमी का साया आ टपका. बस, एक झटके में बात बनने के बजाय बिगड़ने की दिशा में चली गई. दोनों तरफ से बात अपने-अपने स्तर पर सही समझ आ रही थी, मगर ऐसा सिर्फ भावनात्मक तौर पर ही सत्य समझ आ रहा था. भावनात्मक आधार पर निर्मित इमारत का व्यावहारिक स्वरूप निर्मित होता दिख नहीं रहा था. ऐसी स्थिति में पता नहीं उन दोनों के बीच बात सुलझी या और उलझ गई मगर हमारा प्रयास निरर्थक ही निकला. 

इस प्रयास में एक बात और स्पष्ट हुई कि शायद अभी भी हमें अपना विश्वास जमाने की आवश्यकता है क्योंकि बिना विश्वास के ऐसे मामले हल नहीं किये जा सकते हैं. दिल से, दिमाग से यही चाहा था कि दोनों दोस्तों के बीच का मसला सुलझ जाए, दोनों के बीच की तनाव की, अबोल की स्थिति समाप्त हो जाए और उन दोनों सहित हम भी सुखद स्थिति का अनुभव कर सकें. आखिर एक जिम्मेवारी सी समझ आ रही थी, उन दोनों मित्रों के बीच कॉमन मित्र बने होने के नाते. मित्रता का एक आधार जहाँ का तहाँ है, एक आधार शायद खिसक चुका है. बस उस आधार को बचाने के पहले अभी हमें खुद का ही विश्वास बचाना है. अपने विश्वास को पहले से भी अधिक ऊँचाई पर ले जाने का, पहले से अधिक मजबूत कर लेने का विश्वास तो हमें है बस कामना उन दोनों मित्रों के लिए है. जय हो....

04 जनवरी 2019

विश्वास को अविश्वास में बदलने से रोकें


विश्वास और अविश्वास के बीच बस एक ‘अ’ होता है. यही एक अक्षर कब किसके विश्वास को अविश्वास में बदल दे कहा नहीं जा सकता. पढ़ने-लिखने-बोलने में महज एक वर्ण है मगर वास्तविकता में देखा जाये तो विश्वास का अविश्वास में बदलना एक लम्बी प्रक्रिया है. यह प्रक्रिया व्यक्ति-व्यक्ति के अंतर्संबंध पर निर्भर होती है. दो व्यक्तियों का आपस में कैसा सम्बन्ध है, उनके बीच कैसा साहचर्य है, उनका तालमेल कैसा है यह विशिष्ट कारक के रूप में कार्य करता है. किसी के प्रति अचानक से ही विश्वास नहीं जागता है ठीक उसी तरह किसी के प्रति अचानक से अविश्वास भी नहीं पनपता है. किसी पर विश्वास का पैदा होना जितनी जटिल प्रक्रिया है, जितनी दीर्घकालिक स्थिति है उससे ज्यादा जटिल है उस विश्वास का बने रहना, उस विश्वास का बनाये रखना. विश्वास का बनना महज एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर भरोसा करना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ कहीं गहराई तक एक-दूसरे को जोड़ लेना भी होता है. ऐसे में विश्वास का दरकना न केवल संबंधों को नुकसान पहुँचाता है बल्कि व्यक्तियों को भी तोड़ देता है. 


विश्वास के साए से उत्पन्न अविश्वास से व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करने लगता है. ऐसा व्यक्ति अवसाद का शिकार भी हो जाया करते हैं. समाज में आये दिन ऐसी बहुत सी घटनाएँ सुनाई देती हैं जिनमें व्यक्ति का अविश्वास से उपजी स्थितियों से संघर्ष न कर पाने के कारण अपने जीवन को समाप्त करते देखा गया है. विश्वास का बनना और फिर उसमें अविश्वास का बीज पड़ जाना वर्तमान जीवन-शैली में बहुतायत में देखने को मिलने लगा है. भौतिकतावाद की अंधी दौड़ में शामिल सारा समाज एकाकी होकर न जाने किस मंजिल को पाना चाहता है. इस चाहना में वह अकेला भी है. उसका कोई साथ देने आगे आता भी है तो वह शंका के घेरे में आ जाता है. आपाधापी, भागदौड़, शंका, संदेह, एकाकीपन आदि के साये में कोई कैसे निर्विकार भाव से सफलता की ओर अग्रसर हो सकता है. ऐसे में किसी व्यक्ति पर विश्वास करना भी क्षणिक प्रक्रिया होती है. ऐसा उस समय तक ही रहता है जब तक कि सामने वाला व्यक्ति किसी तरह की स्वार्थपूर्ति में सहायक सिद्ध होता है. ऐसा न हो पाने की दशा में अथवा किसी तरह से उसके लाभ कि प्रत्याशा में अवरोधक सा बनने की स्थिति में वह तत्काल ही अविश्वास की अवस्था में आ जाता है. विश्वास से अविश्वास की तरफ बढ़ने की यह प्रक्रिया तत्काल प्रभावी हो जाती है.

आज जबकि आर्थिक सशक्तिकरण के दौर में गलाकाट प्रतियोगिता का चरम देखने को मिल रहा है वहाँ विश्वास जैसी कोई भी स्थिति का स्वागत होना चाहिए. व्यक्तियों को चाहिए कि आपस में भी समन्वय की स्थापना करते हुए विश्वास भरे संबंधों में अविश्वास को पनपने न दें. यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो निश्चय ही यह समाज के लिए दुखद ही नहीं चिंताजनक भी है. यहाँ ध्यान रखना होगा कि व्यक्ति तो आने-जाने हैं मगर समाज कल भी था, आज भी है, कल भी रहेगा. न सही अपने लिए, अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए विश्वास को और मजबूत करने की आवश्यकता है.

03 दिसंबर 2018

विश्वास को अविश्वास में न बदलने दो


विश्वास एक ऐसा शब्द है जो बड़ी मुश्किल से पैदा हो पाता है. चाहे व्यक्ति हो या फिर कोई जानवर, सभी के लिए विश्वास का होना, सभी में विश्वास का होना आवश्यक होता है. समाज में बिना विश्वास के एक पल भी व्यक्ति का टिक पाना संभव नहीं होता है. आपसी व्यवहार में दोस्ती, सम्बन्ध आदि के बीच विश्वास का अपना ही महत्त्व है. विश्वास महज एक-दो मुलाकातों का, चंद पलों की दोस्ती का, कुछ समय के संबंधों का प्रतिफल नहीं है वरन इसके पीछे व्यक्ति की मानसिकता, उसकी कार्यशैली, उसकी सोच, उसके व्यवहार की बहुत बड़ी भूमिका होती है. किसी व्यक्ति के प्रति सामने वाले का कैसा व्यवहार रहता है, उसकी भूमिका और व्यक्तित्व को वह कैसे विश्लेषित करता है, इसके आधार पर ही विश्वास जन्मता है. 


असल में विश्वास एक भावना है, एक तरह का आवरण होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित भी समझता है, सहज भी समझता है. विश्वास के चलते ही कोई व्यक्ति किसी अन्य के साथ अपनी बात कहने में अपनी समस्या बताने में, अपना सुख शेयर करने में, अपनी ख़ुशी बाँटने में सबसे आगे रहता है. ये विश्वास ही है जिसके कारण व्यक्ति अपने आपको अकेला नहीं पाता है. यही विश्वास है जो समाज में आपस में संबंधों का विस्तार करता है, संबंधों की, रिश्तों की सुरक्षा करता है. इसके बाद भी कई बार स्वार्थ के चलते अनेकानेक लोग आपसी संबंधों में विश्वासघात कर बैठते हैं. ऐसा करने के पीछे उनकी मानसिकता सिर्फ और सिर्फ अपना लाभ लेने की होती है. वे एक पल को भी ये याद नहीं रखते हैं कि उनके इस कदम से सामने वाले के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा. वर्तमान में जिस तरह के हालात बनते चले जा रहे हैं उससे लोगों में आपसी विश्वास में जबरदस्त तरीके से कमी आई है. आज हालत ये है कि लोग आपसी सगे रक्त-संबंधियों के बीच भी अविश्वास बनाने लगे हैं. कतिपय स्वार्थी लोगों के कारण सभी को अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में आवश्यकता इसकी है कि लोगों के बीच पुनः विश्वास कायम किया जाये. इसके लिए लोगों को न केवल अपनी मानसिकता में सुधार लाना होगा बल्कि आपसी रिश्तों में शुचिता, पवित्रता लानी होगी.