श्रीराम जन्मभूमि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
श्रीराम जन्मभूमि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


30 दिसंबर 2024

रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से ही मन में अभिलाषा थी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर जाने की, रामलला के दर्शन करने की. इसके पीछे किसी तरह के भक्तिभाव से ज्यादा अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों, राष्ट्रीय भाव-बोध के संवाहक के दर्शन करने का भाव था. भीड़-भाड़ के दौरान उत्पन्न होने वाली अनेकानेक दिक्कतों से बचने के लिए ही प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन अयोध्या जाने का कार्यक्रम नहीं बनाया था. बहरहाल, लगभग एक वर्ष की समयावधि में ही रामलला के दर्शन करने का अवसर स्वतः ही सामने आ गया. छोटे भाइयों की व्यापारिक-व्यावसायिक मीटिंग का केन्द्र अयोध्या होने पर उनके द्वारा साथ चलने का स्नेहिल प्रस्ताव सामने रखा गया, जिसे बिना एक पल की देरी किये हमने लपक लिया. वर्ष 2024 के निपट अंतिम दिनों में बिना किसी पूर्व-योजना के अयोध्या धाम पहुँचना हो गया.

 





29 दिसम्बर की शाम को अयोध्या धाम में प्रवेश करने के बाद छोटे भाई तो अपनी व्यावसायिक मीटिंग के लिए निकल गए, हम चल दिए रामलला के दर्शन की इच्छा लिए, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर देखने की इच्छा में. समय का तारतम्य कुछ ऐसा रहा कि रामलला के दर्शन तो आज नहीं हो सके मगर वहाँ से सम्बंधित तमाम सारी जानकारियाँ एकत्र कर ली गईं, ताकि अगली सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यहाँ आने पर किसी तरह की दिक्कत न हो. रात को नौ बजे के बाद भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु, दर्शनार्थी मंदिर परिसर में नजर आ रहे थे. अगले दिन सुबह-सुबह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्रांगण में रामलला के दर्शन हेतु पहुँचना हो गया. आरम्भिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम लोगों के कदम आगे की तरफ चल पड़े.

 

श्रीराम जन्मभूमि प्रांगण में आने के बाद कदम-कदम पर न चाहते हुए भी आँखें सजल हो उठतीं. हर कदम पर याद आता वो दौर जब कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. कैसे तुष्टिकरण की राजनीति ने अनेकानेक कारसेवकों को मौत की नींद सुला दिया था. मंदिर की तरफ़ बढ़ता हर कदम याद दिलाता कि किस तरह के कष्ट-अपमान सहने के बाद ये गर्व का क्षण देखने को मिला है. श्रीराम मंदिर विरोधी बात-बात पर बाबरी ढाँचे के ध्वंस को महज राजनीति बताते और कटाक्ष करते. ऐसे ही दौर में जबकि रामलला को एक टेंट की छाया उपलब्ध कराई जा रही थी, श्रीराम मंदिर के, रामलला के दर्शन हेतु अयोध्या जाना हुआ था. तत्कालीन प्रदेश सरकार की व्यवस्था इस तरह से थी जैसे रामलला के दर्शन के स्थान पर कोई अपराध करने आ गए हों. सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों का व्यवहार, उनकी बातचीत, भाषा-शैली को कोई भी सामान्य व्यक्ति सुनना पसंद नहीं करेगा. उनके अन्दर ऐसा भाव था ही नहीं कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति, रामलला के दर्शन करने को आया श्रद्धालु किसी भी तरह की सामान्य जानकारी ही माँग रहा है, न कि किसी तरह का अपराध कर रहा है.

 





सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस कर्मियों की अतिवादिता, अहंकार, अभद्र कार्य-शैली के चलते किसी दिन उस तंग गली के भीतर से टेंट में विराजमान रामलला के दर्शन हेतु पहुँचने को नकार दिया था. उन पुलिस कर्मियों के कथित अहंकार के ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का गर्वीला भाव प्रचंड रूप में हावी था. उनके व्यवहार, भाषा-शैली के बाद वहीं तुरंत ही उनके अधिकारियों के समक्ष एक जिद को पकड़ लिया. उनसे स्पष्ट भाषा में कहा कि अब उसी दिन रामलला के दर्शन करने आयेंगे जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग हमारी सुरक्षा व्यवस्था में होंगे या फिर उस दिन आयेंगे जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन जायेगा. उस दिन अपनी जिद में रामलला के दर्शन किये बिना वापस लौट आए थे मगर मन में एक विश्वास था कि किसी न किसी दिन हम मंदिर के भीतर पहुँचकर रामलला के दर्शन करेंगे. उन तंग, सँकरी गलियों के स्थान पर चौड़ी, चमचमाती सड़कें हजारों-हजार श्रद्धालुओं को सहज भाव से आगे चलते रहने का स्थान उपलब्ध करवा रही थीं. किसी दिन पूरे अहंकारी भाव में तैनात खाकी सेना अब पूरे आदर-भाव के साथ एक-एक जानकारी देने को तत्पर थी. बात-बात पर सर-सर की अनुगूँज, हँसते-मुस्कुराते हुए हजारों की भीड़ को आगे का रास्ता बनाती सुरक्षा व्यवस्था से लग रहा था कि आज हिन्दू वास्तविक रूप में अपनी संस्कृति के प्रांगण में है.

 

उस सुसज्जित, भव्य प्रांगण में खड़े होकर स्मरण हो आया वो दौर जब छात्र-जीवन में कंठ से स्वर गूँजता था

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे”

बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का”


उस समय में जबकि रामलला के दर्शन करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की औपचारिता से बाहर निकले तो खुद को उसी प्रांगण के साथ समाविष्ट करने का भाव जागा. मोबाइल, कैमरे के द्वारा पावन परिसर को सदैव के लिए सुरक्षित कर लेने का भाव जागा. ऐसी स्थिति में भाव-व्हिवल मन-संवेदन, आँखों की नमी और कैमरे में सामंजस्य बिठाना कठिन हो रहा था. दोनों का समन्वय न बन पाने से ज़्यादा मुश्किल हो रहा था ख़ुद का उस पावन भूमि के साथ तादाम्य स्थापित कर पाना. बहरहाल, “तारीख़ नहीं बतायेंगे” जैसी कटुक्ति सुनने के दौर को सहने के बाद अब स्वतः ही “रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं” की गर्वोक्ति निकलनी स्वाभाविक थी और हजारों की भीड़ के बीच स्वतः प्रस्फुटित हुई भी.

 

जय श्रीराम

 


22 जनवरी 2024

समग्र विश्व का राममय होना कल्याणकारी संकेत

पञ्च तत्वों- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश का समन्वित स्वरूप ही सृष्टि है. इस सृष्टि के गोचर-अगोचर, दृश्य-अदृश्य, चर-अचर आदि विविध रूपों के द्वारा इसका सञ्चालन निर्बाध गति से होता रहता है. इन्हीं पञ्च तत्वों की अलौकिकता ने रामलला की जन्मभूमि पर अपना उत्कर्ष प्राप्त किया. देश की सांस्कृतिक चेतना और मर्यादा की शुचिता के मानक रूप रामलला अपनी जन्मभूमि पर, अपने प्रासाद में पूर्ण वैभव, पूर्ण दिव्यता के साथ विराजमान हुए. पृथ्वी की भांति क्षमा, अग्नि की भांति प्रकाशमान, जल की भांति शीतल, वायु के जैसे सुगंधि प्रवाह और आकाश की भांति सकल स्वरूप में विस्तारित श्रीराम को किसी अवतार से अधिक आस्था, श्रद्धा, भक्ति का केन्द्र स्वीकारा गया. अपने इन्हीं समन्वित और अलौकिक गुणों के कारण ध्वंस किये गए मंदिर से लेकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न उठाये जाने के तक भी रामलला टेंट की छाया से समग्र सृष्टि को संचालित करते रहे.

 



भारतवर्ष की सनातन संस्कृति और परम्परा के पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का प्राण-प्रतिष्ठा के साथ अपनी जन्मभूमि में आना मात्र एक संघटना नहीं है. देशकाल, परिस्थितियों के साथ उद्घाटित होते रहने वाली ध्वंस-निर्माण की, पुनर्स्थापन की प्रक्रिया जनमानस को उद्द्वेलित करती रही. संस्कृति, धर्म, आस्था के परमपूज्य रूप में श्रीराम की जन्मभूमि के लिए कंठ-कंठ से निकले प्रण ने, संकल्प ने सोयी हुई चेतना को जगाने का कार्य किया. वर्षों-वर्षों से अपनी ही धरती, अपनी भी संस्कृति में अपनी सांस्कृतिक विरासत को पददलित होते देख, उसके प्रति नकारात्मकता देख बहुत बड़े हिन्दू समाज ने बारम्बार अपने को अपमानित महसूस किया. काल की अविरल गति के परिणामस्वरूप विधि का ऐसा विधान निर्मित हुआ कि हिन्दुओं की वर्षों से चली आ रही साध पूरी हुई. श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला के भव्य-दिव्य मंदिर की संकल्पना साकार होने तक युवाओं ने, वृद्धों ने, साधू-संतों ने बलिदान ही बलिदान दिए हैं.

 

सम्पूर्ण विश्व में यह अपनी तरह का प्रथम उदाहरण कहा जायेगा जहाँ जेहादी और बर्बर आक्रान्ताओं के चंगुल से किसी समाज ने अपनी धार्मिक भूमि को, अपनी आस्था के केन्द्र को मुक्त करवाया है. ऐसे में श्रीराम मंदिर का निर्माण मात्र मंदिर का निर्माण नहीं है बल्कि सकल विश्व के लिए एक सन्देश भी है. मंदिर का निर्माण सन्देश है समानांतर रूप से विश्व की उन सभी जेहादी और बर्बर ताकतों को, जो किसी अन्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; जो विलग पहचान और संस्कृति को कुचलने के लिए निम्न से निम्नतर स्तर तक जाने को ही वीरता समझते हैं; जो सोचते हैं कि खून से रंगी हुई तलवार के बल पर न्याय को मिटाया जा सकता है. श्रीराम मंदिर का निर्माण, श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा सन्देश है उनके लिए भी जो नफरत का वातावरण निर्मित कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं; जो उन्माद और हिंसा के द्वारा अपनी वैचारिकी की सत्ता का सञ्चालन चाहते हैं. श्रीराम मंदिर निर्माण के प्रत्येक चरण में रामभक्तों में उन्माद भले ही परिलक्षित हुआ हो मगर उसमें कट्टरता समाहित नहीं थी. सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे के द्वारा उनका प्रण दृष्टिगोचर हुआ मगर उसके द्वारा हिंसा का परिचालन नहीं हुआ. रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के नारे से जनसमुदाय के संकल्प का प्रकटीकरण हुआ मगर उसने किसी और की आस्था-श्रद्धा पर चोट नहीं की.

 

इसी आस्था का, विश्वास का, सहिष्णुता का, उदारता का सुखद परिणाम रहा कि अकेले अयोध्या या उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रीराम के प्रति जनसमुदाय को भाव-व्हिवल होते देखा गया. हिन्दू समाज के इन्हीं अलौकिक गुणों के कारण अकेले भारतवर्ष ने ही नहीं वरन विश्व के बहुसंख्यक देशों ने श्रीराम को आराध्य मानते हुए राममय वातावरण निर्मित किया. श्रीराम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा के सुअवसर तक सम्पूर्ण देश ने अपनी सहभागिता की. किसी राज्य की पावन मिट्टी ने नींव में मिलकर शक्ति का स्वरूप निर्मित किया. सुदूर क्षेत्रों की नदियों के जल ने जन्मभूमि को पवित्र करने का महती कार्य किया. जाति-धर्म के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करते हुए अनेकानेक नागरिकों ने अपने-अपने स्तर से अपना अभीष्ट देने का प्रयास किया. किसी ने पताका प्रेषित करके धर्म-ध्वजा फहराने में अपना योगदान दिया तो किसी ने धूप-समिधा के द्वारा वातावरण को सुगन्धित किया. कहीं से पुष्पों ने आकर रामलला का श्रृंगार करने का मनोरथ पाया तो कहीं से भक्त मंडली ने आकर भक्ति के सागर को लहराया. उत्तर से दक्षिण तक, हिमालय से कन्याकुमारी तक सर्वत्र राम ही राम दृश्यमान रहे. जन-जन भक्तिभाव में लीन रहकर अपनी सामाजिकता में, अपने कर्तव्यों में मगन रहा. इससे पहले समग्र में राममय वातावरण नहीं देखा गया, न ही महसूस किया गया.

 

मंदिर शब्द का उच्चारण निश्चित ही एक ऐसे दृश्य को उकेरता है जहाँ धार्मिक कृत्य परिलक्षित हो रहे हैं, धार्मिकता का आवरण है, अनुष्ठान आदि विधि-विधान से सम्पन्न हो रहे हैं. इस शब्द के साथ ही स्थापत्य कला का, मूर्ति कला का, ऐतिहासिकता का दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक है. भारतीय सनातन संस्कृति में सदैव से मंदिरों को लेकर एक श्रद्धा-भाव, आस्था, विश्वास आदि का समन्वित स्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों में उनके मतानुसार अपने पूर्ण बिम्ब-विधान के साथ आरोपित होता रहा है. इन सभी रंगों को अपने में समाहित करने के साथ-साथ गौरव, संस्कृति, प्रतिष्ठा, सम्मान, वैभव, स्वाभिमान का भी आरोपण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में परिलक्षित है. भारतीय सनातन संस्कृति का, जनमानस का, समग्र विश्व का राममय होना निश्चित ही कल्याणकारी संकेत है. जिस प्रकार श्रीराम ने अपने वनवासकाल में असुरों का सर्वनाश करते हुए उत्तर से दक्षिण तक सनातन संस्कृति की स्थापना की थी, धर्म-ध्वजा को फहराने का पुनीत कार्य किया था, उसी प्रकार से राममय वातावरण सनातन संस्कृति की प्रतिस्थापना को संकल्पित दिख रहा है. जय श्रीराम! 





 

20 जनवरी 2024

सांस्कृतिक वैभव की प्रतिष्ठा

श्रीराम के साथ मीडिया, सोशल मीडिया पूरी तरह से एकाकार हो चुका है. प्रत्येक प्राणी, एक-एक मंच राममय दिख रहे हैं. जो रामभक्त हैं वे उनका जयगान कर रहे हैं, जो इसके विरोधी हैं वे भी रामनाम जप रहे हैं. रामनाम की पावनता, उसकी दिव्यता, भव्यता आज सम्पूर्ण विश्व में प्रकीर्णित हो रही है. जन्मभूमि स्थल पर ही श्रीराममंदिर का निर्माण निश्चित ही गौरवान्वित करने वाला है.




22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा, घर-घर दीपोत्सव के सम्मोहन में जन-जन सम्मोहित है, आह्लादित है. अभिभूत होते इस गौरवशाली क्षण में आँखें बार-बार नम होती हैं. इसका कारण एक तरफ़ जहाँ अपने सांस्कृतिक वैभव को प्रतिष्ठित होते देखना है वहीं दूसरी तरफ़ नब्बे के दौर में इस प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से ओत-प्रोत नागरिकों का संघर्ष भी देखा है.


संघर्ष से वैभव की इस कठोर यात्रा में चटकती धूप के बाद मिली शीतल छाँव निश्चित ही उन सभी बलिदानियों की आत्मा को शांति पहुँचा रही होगी, जो इस जन्मभूमि के लिए नींव का पत्थर बन श्रीराममंदिर की विशालता को धारण कर चुके हैं.

उन सभी को बारम्बार नमन. जय श्रीराम.




 

06 दिसंबर 2022

अध्यापन के सत्रह साल

06 दिसम्बर को कोई भारतीय कभी नहीं भूल सकता है. यह वो तारीख है जिस दिन भारतीय सांस्कृतिक पहचान पर जबरिया थोपे गए निशान को हटाया गया था. यह तिथि इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जानी चाहिए क्योंकि भले ही न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह सिद्ध हो जाता कि अमुक स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है मगर शायद कोई भी न्यायालय उस पर बने निर्माण को गिराने की अनुमति नहीं देता, वो भी तब जबकि वह किसी मजहब विशेष से सम्बंधित हो. ऐसे में सबूतों के आने के पहले उस विवादित ढाँचे के गिर जाने ने रामलला के जन्मस्थान को पुनर्स्थापित का अवसर सुलभ करवाया.


यह तिथि और भी कारणों से अन्य लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है. हमारे लिए भी यह तिथि इसलिए भी स्मरणीय है क्योंकि इसी दिन हमने उस क्षेत्र में लगभग स्थायी रूप से कदम रख दिया था, जिस क्षेत्र में कभी भी जाने का सोचा नहीं था. प्रत्येक बच्चा अपने बचपन से लेकर कैरियर बनाने तक किसी न किसी रूप में अपने आपको स्थापित करता रहता है. कभी वह डॉक्टर को देखकर डॉक्टर बनने का सपना पाल लेता है, कभी पुलिस वाले को देखकर पुलिस सेवा में जाने का मन बना लेता है. कभी वह अध्यापक बनना पसंद करता है तो कभी उसके सपने में कोई व्यापारी आने लगता है. हमारे साथ भी ऐसा बहुत कुछ हुआ मगर कभी भी न ख्वाब में, ना वास्तविकता में यह आया कि अध्यापक बनना है. ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में कोई स्पष्ट स्मृति नहीं है.




समय का खेल देखिये, जिस क्षेत्र में नहीं आना चाहते थे, उस क्षेत्र में आज की तारीख में आने को मिला. एक तरफ इस तारीख में संस्कृति पर कब्ज़ा करने वाला निशान ध्वस्त हुआ था और एक हम इसी तिथि में उस पहचान को अपने ऊपर स्थापित करने वाले थे जिसे हम पसंद नहीं करते थे. इसी को समय, भाग्य, तकदीर आदि कह सकते हैं कि जिस क्षेत्र को, जिस काम को पसंद नहीं करते रहे, आज उसी में आधिकारिक रूप से काम करते हुए पूरे सत्रह वर्ष बीत गए. इन सत्रह वर्षों में इस क्षेत्र में स्वयं के द्वारा की गई बहुत सारी उठापटक को किया भी, देखा भी मगर इस क्षेत्र से पीछा नहीं छूटा. अब जबकि इस पहचान पर स्थायी होने का ठप्पा लग गया है तब इससे पीछा छुड़ाना और भी कठिन हो गया है. यह सोच कर कि बहुत बार काम अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए किये जाते हैं, बस उसी सोच के साथ यहाँ काम हो रहा है. देखा जाये तो यह सही भी है क्योंकि इसके द्वारा बहुत से ऐसे काम जो हमसे संभव नहीं थे, वे यहाँ से हो जाते हैं.


लोगों की सहायता के लिए शायद समय ने हमें इस क्षेत्र में बनाये रखा है, यही सोचकर अठारहवें साल में प्रवेश कर लिया है. यह समयावधि कहाँ तक ले जाएगी, यह देखने का विषय है. 





 

21 जुलाई 2020

रामलला हम आ रहे, अबकी मंदिर ही बना रहे

इधर लगातार खबरें आ रही हैं कि पाँच अगस्त को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की आधारशिला रखी जानी है. इस खबर में कितनी सत्यता है, कितनी नहीं ये तो खबर प्रसारित करने वाले जानें मगर दिल को बहुत शांति मिली इस खबर के बाद. पिछले कई दशकों में अपने ही देश में अपने ही आराध्य को लेकर जिस तरह की जलालत झेलनी पड़ी है, वह असहनीय रही. इस खबर के बाद याद आ रहा है वह दौर जबकि किसी भी व्यक्ति के लिए अपना कैरियर बनाने का समय होता है. उस दौर में हमारे समय के लोगों को एक तरफ आरक्षण सम्बन्धी कानून की मार से जूझना पड़ा साथ में अपने मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को बचाने के लिए लड़ना पड़ा.



उन दिनों को याद करते हुए आँखों में बार-बार नमी आ जाती है जबकि उन दिनों के अपने मित्रों के, अपने कार्यों को याद करते हैं. ये ईश्वर का आशीर्वाद कहा जायेगा कि हम लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण देखने के लिए जीवित हैं, बहुत से कारसेवक ऐसे हैं जो किसी और के नेत्रों से इस दृश्य को देख रहे होंगे. उन दिनों जैसे जूनून सिर पर हावी था. कारसेवकों की सूची बनानी हो, लोगों को अयोध्या के सम्बन्ध में जागरूक करना हो, श्रीराम जन्मभूमि के बारे में जानकारी देना हो सब ऐसे होता था जैसे ये जीवन के लिए अनिवार्य हो. ऐसा नहीं कि सभी साथी इसी में अपने आपको झोंक दिए हों मगर कुछ साथी ऐसे थे जिनके लिए यही एकमात्र काम था. न भविष्य की चिंता, न कैरियर की चिंता, न नौकरी की चिंता बस दिमाग में एक ही बात रहती कि कैसे भी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का सपना सच करवाना है.

हमारे हॉस्टल के बहुत से साथियों ने अपना सक्रिय योगदान इसमें दिया. बहुत से लोग दिन-रात एक करके इसी में लगे हुए थे. छोटे-छोटे ग्रुप बनकर सपने को सच करवाने के लिए लगे हुए थे. उस समय बस एक सपना सच हुआ कि एक विवादित ढाँचा गिरा. उसके बाद सपनों भरी आँखों ने और अधिक सपने सजा लिए. अबकी उन सपनों में मंदिर का निर्माण था. सपने समय के साथ सच होते हैं, ऐसा सुना था मगर आज देख लिया. तमाम कानूनी दांवपेंच, अवरोध दूर होते रहे और अब खबर आने लगी श्रीराम मंदिर निर्माण की. इन्हीं आँखों ने विवादित ढाँचा गिरते देखा था, यही आँखें श्रीराम मंदिर निर्माण भी देखेंगी.

जय श्रीराम


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 फ़रवरी 2020

श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु ट्रस्ट की घोषणा


रामजन्मभूमि मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात् सभी की दृष्टि राममंदिर ट्रस्ट निर्माण की ओर लगी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर ट्रस्ट बनाने की घोषणा की। इस ट्रस्ट को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जायेगा। गृहमंत्री अमित शाह ने बाद में बताया कि इस ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी होंगे जिसमें एक दलित समाज का सदस्य होगा। केंद्र सरकार ने ट्रस्ट में प्रयागराज के ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को शामिल किया गया है। इसके अलावा ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी स्थान दिया गया है, लेकिन अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास को ट्रस्ट की मीटिंग में वोटिंग का अधिकार नहीं होगा।


ये होंगे ट्रस्टी

1. के पाराशरण:
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील के. परासरन ट्रस्ट के अध्यक्ष होंगे। उन्होंने रामलला विराजमान की ओर से अयोध्या मामले में लंबे समय तक पैरवी की। 92 वर्षीय परासन ने सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर बहस की जबकि उन्हें कुर्सी पर बैठने अनुमति दी गई थी। वह रामसेतु समुद्रम परियोजना पर भी मुकदमा लड़ चुके हैं। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। सबरीमाला मामले में भगवान अयप्पा के वकील रहे परासरन को भारतीय इतिहास, वेद पुराण और धर्म के साथ ही संविधान का व्यापक ज्ञान है। राम मंदिर मामले के दौरान उन्होंने स्कंध पुराण के श्लोकों का जिक्र करके राम मंदिर का अस्तित्व साबित करने की कोशिश की। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकार में अटॉर्नी जनरल रहे।

2. जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वतीजी महाराज (प्रयागराज):
बद्रीनाथ स्थित ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य। हालांकि, इनके शंकराचार्य बनाए जाने पर विवाद भी रहा। ज्योतिष मठ की शंकराचार्य की पदवी को लेकर द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने हाईकोर्ट में केस दाखिल किया था।

3. जगतगुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्व प्रसन्नतीर्थ जी महाराज:
कर्नाटक के उडुपी स्थित पेजावर मठ के 33वें पीठाधीश्वर हैं। दिसंबर 2019 में पेजावर मठ के पीठाधीश्वर स्वामी विश्वेशतीर्थ के निधन के बाद पदवी संभाली।

4. युगपुरुष परमानंद जी महाराज:
अखंड आश्रम हरिद्वार के प्रमुख। वेदांत पर 150 से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने साल 2000 में संयुक्त राष्ट्र में आध्यात्मिक नेताओं के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया था।

5. स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज:
महाराष्ट्र के अहमद नगर में 1950 में जन्म हुआ। रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत और अन्य पौराणिक ग्रंथों का देश-विदेश में प्रवचन करते हैं। स्वामी गोविंद देव महाराष्ट्र के विख्यात आध्यात्मिक गुरु पांडुरंग शास्त्री अठावले के शिष्य हैं।

6. विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा:
अयोध्या राजपरिवार के वंशज। रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य और समाजसेवी। 2009 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, हारे। इसके बाद कभी राजनीति में नहीं आए।

7. डॉ. अनिल मिश्र, होम्पयोपैथिक डॉक्टर:
मूलरूप से अंबेडकरनगर निवासी अनिल अयोध्या के प्रसिद्ध होम्योपैथी डॉक्टर हैं। वे होम्योपैथी मेडिसिन बोर्ड के रजिस्ट्रार हैं। मिश्रा ने 1992 में राम मंदिर आंदोलन में पूर्व सांसद विनय कटियार के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अभी संघ के अवध प्रांत के प्रांत कार्यवाह भी हैं।

8. श्री कामेश्वर चौपाल, पटना (एससी सदस्य):
संघ ने कामेश्वर को पहले कारसेवक का दर्जा दिया है। उन्होंने 1989 में राम मंदिर में शिलान्यास की पहली ईंट रखी थी। राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका और दलित होने के नाते उन्हें यह मौका दिया गया। 1991 में रामविलास पासवान के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा।

9. बोर्ड ऑफ ट्रस्टी द्वारा नामित एक ट्रस्टी, जो हिंदू धर्म का हो।

10. बोर्ड ऑफ ट्रस्टी द्वारा नामित एक ट्रस्टी, जो हिंदू धर्म का हो।

11. महंत दिनेंद्र दास:
अयोध्या के निर्मोही अखाड़े के अयोध्या बैठक के प्रमुख। ट्रस्ट की बैठकों में उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं होगा।

12. केंद्र सरकार द्वारा नामित एक प्रतिनिधि, जो हिंदू धर्म का होगा और केंद्र सरकार के अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का अफसर होगा। यह व्यक्ति भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद से नीचे नहीं होगा। यह एक पदेन सदस्य होगा।

13. राज्य सरकार द्वारा नामित एक प्रतिनिधि, जो हिंदू धर्म का होगा और उत्तर प्रदेश सरकार के अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का अफसर होगा। यह व्यक्ति राज्य सरकार के सचिव के पद से नीचे नहीं होगा। यह एक पदेन सदस्य होगा।

14. अयोध्या जिले के कलेक्टर पदेन ट्रस्टी होंगे। वे हिंदू धर्म को मानने वाले होंगे। अगर किसी कारण से मौजूदा कलेक्टर हिंदू धर्म के नहीं हैं, तो अयोध्या के एडिशनल कलेक्टर (हिंदू धर्म) पदेन सदस्य होंगे।

15. राम मंदिर विकास और प्रशासन से जुड़े मामलों के चेयरमैन की नियुक्ति ट्रस्टियों का बोर्ड करेगा। उनका हिंदू होना जरूरी है।

जो ट्रस्टी हैं उनकी ओर से (क्रम दो से आठ तक के) 15 दिन में सहमति मिल जानी चाहिए। ट्रस्टी नंबर एक इस दौरान ट्रस्ट स्थापित कर अपनी सहमति दे चुका होगा। उसे सीरियल नंबर दो से सीरियल नंबर आठ तक के सदस्यों की तरफ से ट्रस्ट बनने के 15 दिन के अंदर सहमति ले लेनी होगी।

09 नवंबर 2019

रामलला हम आयेंगे...


26 वर्ष 11 माह 3 दिन की समयावधि बहुत लम्बी होती है. देश की संस्कृति पर एक काले धब्बे की तरह बना ढाँचा, जो बार-बार दर्शाता था एक विदेशी आक्रान्ता के आने और भारतीय संस्कृति के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि पर अपने निशान बना जाना. वर्षों तक हिन्दुओं-मुसलमानों में विवाद की स्थिति बनी रही. दुखद यह रहा कि देश में रहने के बाद भी मुस्लिम समुदाय द्वारा देश की संस्कृति के प्रति सद्भाव व्यक्त न किया गया. यह जानते-समझते हुए भी उस विवादित ढांचे को किसी भारतीय ने नहीं वरन एक विदेशी आक्रान्ता ने हिन्दुओं की आस्था-विश्वास के केंद्र को तोड़कर बनवाया था, कभी राम मंदिर के पक्ष में आवाज़ न उठाई गई. राजनैतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि नब्बे के दशक के आरंभिक वर्षों में देश भर में श्री राम जन्मभूमि के प्रति एक तरह की संवेदनात्मक लहर दिखाई देने लगी. परिणाम यह हुआ कि उस जोश ने विवादित ढाँचे को हवा में धूल बनाकर उड़ा दिया. 6 दिसम्बर 1992 के उस दिन के बाद श्री राम जन्मभूमि मामला अदालत में भटकने लगा. लगातार राजनीति का शिकार होकर भी आस्था-विश्वास नहीं डिगा और अंततः लम्बी समयावधि के बाद हिन्दुओं को अपना गौरव पुनः प्राप्त हुआ. आस्था-विश्वास की जीत हुई.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा जब आज इस निर्णय को सुनाया जा रहा था, तो उसे टीवी पर देखते समय फ़ैजाबाद यात्रा की एक घटना का स्मरण सहज ही हो आया. उस दिन श्री राम जन्मभूमि पहुँच कर, रामलला के द्वार पहुँच कर भी उनके दर्शन न हो सके थे. विचार आया कि हो सकता है कि उन पुलिस अधिकारियों को हमारी बात याद आई हो आज, जब उन्होंने हमारे कृत्रिम पैर के चलते रामलला के दर्शन न करने दिए थे.श्री राम जन्मभूमि के द्वार पर हम अपने एक मित्र के साथ दर्शनार्थ पहुंचे थे. प्रशासनिक औपचारिकताओं से कभी भी विरोध नहीं किया क्योंकि हमारा मानना है कि ये हम लोगों की सुविधा के लिए ही किया जाता है. उस समय की प्रशासनिक औपचारिकताओं के चलते मोबाइल सहित बहुत सारा सामान अन्दर ले जाना प्रतिबंधित सा. सबकुछ स्वीकारने-मानने के बाद भी हम अपनी छड़ी पर तैयार नहीं हो पा रहे थे. वहां तैनात कुछ पुलिसवालों को अपनी तकलीफ के बारे में बताया, अपने न चल पाने को लेकर समझाया मगर वे अपनी सहमति देने को तैयार नहीं हो रहे थे. छड़ी के बजाय अपने मित्र के कंधे का सहारा लेना एक विकल्प हमारी ही तरफ से रखा गया मगर कृत्रिम पैर का कोई विकल्प हम उनके सामने नहीं दे सके. समझ नहीं आ रहा था कि आखिर घुटने के ऊपर से कटे एक पैर के बाद हम चलकर कैसे जा सकेंगे? 

 काफी देर की झिकझिक के बाद एक अन्य अधिकारी ने मन बनाया पर तब तक हमारा मन इतना खिन्न हो चुका था कि सब कुछ रामलला पर ही छोड़ दिया. सम्बंधित अधिकारी ने अपनी औपचारिकता को निभाते हुए हमारे ऊपर स्थिति को छोड़ते हुए अन्दर जाने के लिए अपने उच्चाधिकारियों से बात करने की बात कही. मन में दर्शन करने की इच्छा जैसे अचानक से मर गई थी. जिस ताजगी, उत्साह के साथ वहां तक पहुंचे थे वह ठंडा पड़ चुका था. प्रशासनिक कार्यालय में बैठे हुए ही हमने सम्बंधित अधिकारी को किसी भी उच्चाधिकारी से बात न करने की बात कहते हुए कहा कि "अब हम तभी आयेंगे, जबकि रामलला चाहेंगे. हम या तो उनको भव्य स्वरूप में देखने आयेंगे या तब जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग ही हमारी अगवानी करोगे." तब एक कटाक्ष हुआ था कि भाईसाहब, राजनीति हो रही इस पर. ये मुद्दा कभी न सुलझेगा. किसी समय युवा जोश में जब इस आन्दोलन से जुड़े थे तब भी विश्वास था, उस दिन जबकि रामलला के द्वार पर खड़े थे और बिना दर्शन के वापस लौटने को तैयार थे तब भी मन में विश्वास था. मन का विश्वास बना रहा और आज विश्वास की जीत हुई. अब न सही हैलीकॉप्टर से पर भव्य स्वरूप निर्माण के बाद अवश्य ही जा सकेंगे.

उस दिन हमारे मित्र डॉ० डी के सिंह भारी मन से अकेले दर्शन करने चले गये, हमारी जिद से. भारी मन से इसलिए क्योंकि वे अकेले दर्शन को जाना नहीं चाह रहे थे. वैसे भी लगभग आधा घंटे चले प्रकरण के बाद मन से उत्साह ख़त्म हो चुका था. बहरहाल, वे दर्शन करके लौट आये. हम अपनी बात पर विश्वास के साथ अडिग रहे. अब निर्णय रामलला के पक्ष में आया है. मंदिर भी अपनी भव्यता के साथ बनेगा. अब हम उनके साथ जायेंगे, हर्ष से, उत्साह से, भव्य स्वरूप में.

10 जनवरी 2019

अदालती पचड़े में फँसा श्रीराम मंदिर मामला


श्रीराम जन्मभूमि मालिकाना हक़ से सम्बंधित मामला विगत कई वर्षों से भारतीय अदालती प्रक्रिया के चक्कर में फँसा हुआ है. किसी भारतीय फिल्म के एक संवाद, तारीख पे तारीख की भेंट चढ़ता हुआ उच्च न्यायालय पर एक निर्णय पर पहुँचा था लेकिन वहाँ भी गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी कहने वालों को वह निर्णय हजम नहीं हुआ. उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में आ गया. यहाँ भी अदालती संस्कार ज्यों के त्यों देखने को मिले. अभी तक की कार्यवाही में महज इतना तय हो सका था कि उस मामले की सुनवाई कबसे करनी है. सोचने वाली बात है कि अभी यही तय हो पाया है कि सुनवाई की तारीख क्या होगी.


बहरहाल, तारीख पे तारीख गुजरते-गुजरते 10 जनवरी 2019 सर्वोच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि अधिकार का मामला उस जगह आ गया जहाँ सुनवाई होनी थी. यहाँ आने के पहले विगत दिवस के चंद सेकेण्ड बहुत प्रभावी रहे जिनकी कार्यवाही के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया. इस संवैधानिक पीठ का बनाया जाना अदालती गंभीरता का सूचक जान पड़ा था. लग रहा था कि अब सुनवाई टाली न जाएगी वरन किसी दिशा की तरफ जाएगी. अबकी चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यू०यू० ललित 1994 में कल्याण सिंह की ओर से अदालत में पेश हुए थे. इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू०यू० ललित ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है. राजीव धवन द्वारा इसके साथ-साथ पीठ के तीन सदस्यीय से पाँच सदस्यीय किये जाने पर भी सवाल उठाया.

आज जिस तरह का प्रकरण उठाकर मामले को फिर लटकाया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि न्यायालय इस मामले को सुलझाने के मूड में दिख नहीं रहा है. हालाँकि ऐसे संकेत पहले भी दिए जा चुके थे जबकि न्याय के मंदिर में कहा जा चुका था कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील द्वारा उठाया गया मुद्दा ऐसा नहीं था जिसके लिए सुनवाई की तारीख आगे सरकाई जाती. इस बिंदु पर आकर न केवल तारीख टाली गई है वरन अब संवैधानिक पीठ का पुनर्गठन किया जायेगा. न्यायमूर्ति ललित ने स्वयं को इस पीठ से अलग कर लिया है. ऐसे में आवश्यक नहीं कि अगली तारीख पर सुनवाई हो ही जाये क्योंकि मुस्लिम पक्षकार मामले को लटकाने में जितना महत्त्व दे रहे हैं, उतना ही कांग्रेस की तरफ से भी इसे हवा दी जा रही है. देखा जाये तो जनवरी 2019 तक इस मामले को सरकाने की कांग्रेस से सम्बंधित एक वकील साहब की मंशा तो पूरी हो ही गई है.

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो श्रीराम का सवाल महज हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं वरन इस देश की संस्कृति, परम्परा का भी सवाल है. देखा जाये तो वे भारतीयता के प्रतीक हैं, भारतीय संस्कृति के मर्यादा शिखर-पुरुष हैं. विगत काफी समय से न केवल हिन्दू पक्षकारों की तरफ से वरन मुस्लिम समुदाय की तरफ से तथा बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, कलाकारों सहित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्वों की तरफ से भी बात उठाई जा रही है कि इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाया जाये. बहुत से नामचीन लोगों द्वारा अपील की जा रही है कि मुस्लिम इसे देश की सांस्कृतिक एकता के लिए श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष से कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. विद्रूपता इस बात की है कि आये दिन कोई न कोई इस मामले में अनर्गल बयान देकर मुद्दे को विवादित बनाने की चेष्टा करने लगता है. समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि यह हिन्दुओं की सहनशीलता का परिचायक है कि वे ख़ामोशी से अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद भी हिन्दुओं को ही सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.

अब अगली तारीख 29 जनवरी निर्धारित की गई है. ऐसे में विचारणीय यह है कि जिस तरह से मुस्लिम पक्षकार वकील की तरफ से न्यायमूर्ति पर महज इसलिए सवाल उठाया गया कि वे किसी समय भाजपा के कल्याण सिंह की तरफ से अदालत में आये थे, क्या न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर उनके पिता का कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के कारण सवाल नहीं उठाया जा सकता? फ़िलहाल अब मामला 29 जनवरी तक सरका दिया गया है, उस दिन का इंतजार है.