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18 अक्टूबर 2015

खो गया बच्चों का नवरात्रि पर्व

घर में जैसे ही साफ़-सफाई जोर-शोर से होते दिखने लगती; बरामदे का एक कोना रगड़-रगड़ कर धोया जाने लगता; अम्मा की सक्रियता आम दिनों की अपेक्षा और अधिक दिखाई देने लगती तो समझ में आने लगता कि नवरात्रि का पावन पर्व आने वाला है. इसकी पुष्टि होते ही हम बच्चों में अम्मा की सक्रियता से अधिक उत्साह झलकने लगता. इसका कारण उन नौ दिनों में देर रात तक जागने, मोहल्ले में टहलने की स्वतंत्रता मिल जाना हुआ करता था. ये आज से कोई तीस साल पहले की बात होगी, उस समय आज की तरह जगह-जगह झाँकियाँ सजाने का कोई रिवाज नहीं हुआ करता था. आज की तरह कानफोडू संगीत में भजन की जगह फ़िल्मी गीतों का आभास सा नहीं हुआ करता था. मोहल्ले में घरों में आँगन में, बरामदे के कोने में, किसी खुली जगह पर कपड़ों, कागज की बेलों, पेड़-पौधों की पत्तियों, फूलों आदि के द्वारा मातारानी के स्थान को सजाया जाता था. पूरे नौ दिनों तक पूर्ण भक्तिभाव से घर की, आसपड़ोस की महिलाओं द्वारा ढोलक, मंजीरा, घुँघरू, झाँझ आदि की मधुर धुन पर लोकगीतों का, भजनों का, अचरी, देवी गीतों आदि का गायन होता था. देर रात तक मद्धिम स्वर में गायन के द्वारा न किसी की नींद में खलल पड़ता और न भजन के स्थान पर किसी फ़िल्मी गीत का आभास होता.
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हम बच्चे नवरात्रि के इस घरेलू आयोजन में पूर्ण भक्तिभाव से सक्रियता दर्शाते. भक्तिभाव में सुबह-सुबह का स्नान शामिल नहीं हुआ करता था और अम्मा द्वारा भी इसकी कोई जिद नहीं की जाती थी. सुबह की हलकी सुनहली ठंडक स्नान करने से रोकने में हम बच्चों की मदद भी करती. (ऐसा भक्ति-भाव चैत्र की नवदुर्गा के समय बनाये रखना लगभग मुश्किल हो जाया करता था.) इस एक काम के अलावा भक्तिभावना पूर्ण चरम पर होती. देवी स्थान को सजाने में, जवारों पर दूध-पानी चढ़ाने में, प्रसाद बाँटने में, मोहल्ले की दादी, चाची, बुआ, भाभी, जिज्जी आदि के साथ देवी गीत गाने में, बिना सुर-लय-ताल ढोलक-मंजीरे-झाँझ आदि को बस पीटने में भक्ति-भावना सबसे ऊपर होती थी. देर रात तक नवदुर्गा पूजन के बहाने से जागना, कभी किसी को  बुलाने के लिए, किसी के घर से कोई सामान लाने के लिए मोहल्ले के कई-कई चक्कर लगा लेने की स्वतंत्रता शेष दिनों में नहीं मिलती थी. एक वर्ष में नौ-नौ दिनों के ये दो अवसर जिंदगी के बेहतरीन दिनों में गिने जा सकते हैं. नन्हे-नन्हे हाथों में भारी-भरकम सी टॉर्च सँभाले मोहल्ले भर का अँधेरा मिटाते घूमते. घर-परिवार के लोग भी निश्चिंतता से अपने-अपने कार्यों में मगन रहते और हम बच्चों की टोली पूरी निर्भीकता से अपने-अपने कार्यों का निष्पादन करती रहती. याद नहीं पड़ता कि किसी भी एक पल को किसी बच्चे के मन में भय उपजा हो; किसी बात का डर पैदा हुआ हो. बच्चों में ही क्या, किसी भी घर के किसी भी व्यक्ति में भी संदेह, आशंका जैसी कोई स्थिति कभी नहीं जन्मी. न किसी बच्ची के साथ शारीरिक दुराचार का खतरा, न किसी बच्चे के अपहरण का भय, न किसी मासूम की जान को खतरा.
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आज गली-गली में बड़े-बड़े, भव्य पंडाल सजे हैं, माँ दुर्गा की विशाल मूर्ति सजी हुई हैं, कई-कई युवा सम्पूर्ण व्यवस्था को सुचारू रूप से, व्यवस्थित ढंग से अंज़ाम दे रहे हैं मगर हमारी तरह से बच्चों की टोलियाँ किसी भी मोहल्ले में घूमती-दौड़ती नहीं दिखती है; हमारे समय की मोहल्ले की दादियाँ कहीं दूर आसमान में सितारा बनकर चमक रही हैं; चाचियाँ हमारे चाचाओं के साथ या तो शहर से दूर हैं या फिर आजकल दादी बनी समय बिता रही हैं; भाभियाँ सास बनकर रुतबा दिखाने में मगन हैं, बुआ-जिज्जियाँ किसी और की चाची, भाभी बनकर किसी और शहर में माँ दुर्गा के आयोजन में व्यस्त हैं. इतने बड़े शून्य को भरने का प्रयास भी नहीं किया गया. नौ दिन तक घर के किसी कोने को मिट्टी, जवारों, कलश, माँ दुर्गा की मूर्ति, जलते दीपकों आदि से घेरे रखना जगह की बर्बादी ही मानी जाने लगी है. सीडी, कैसेट, डीजे आदि के तकनीकी भरे युग में ढोलक, मंजीरे, घुँघरू आदि के साथ लोकगीत, अचरी, भजन, देवीगीत आदि गायन को उबाऊ परम्परा माना जाने लगा है. रात की कौन कहें, शाम को, दिन को बच्चों का मोहल्ले की छोडिये, अपने ही घर के सामने अकेले निकलना भी जुर्म समझा जाने लगा है. भय, अनिश्चितता, आशंका, संदेह आदि के वातावरण में नवदुर्गा का आयोजन कुछ लोगों द्वारा महज परम्परा निर्वहन के लिए हो रहा है तो कुछ लोगों द्वारा व्यापारिक दृष्टिकोण से. जब आपस में मन से मन, दिल से दिल नहीं मिले हैं; अविश्वास का माहौल अपने चरम पर है; भक्ति-भावना का स्थान औपचारिकता ने ले लिया हो तो ऐसे आयोजनों से पावनता गायब दिखती है. और शायद यही कारण है कि बड़े-बड़े, भव्य दुर्गा पंडालों से तेज चीखते भजन भक्ति-भावना जगाने के स्थान पर ‘सरकाए लेओ खटिया, जाड़ा लगे’ की तर्ज़ और उस पर मटकते फ़िल्मी हीरो-हीरोइन का भाव उत्पन्न करने लगते हैं. 
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28 जून 2015

आभासी दुनिया में दोहरा चरित्र


नैतिकता, शालीनता, मर्यादा आदि शब्दों के अनुपालन में इंसान किस कदर दोहरे चरित्र के दर्शन करवाता है ये खुद उस इंसान के लिए ही समझना मुश्किल है. कोई एक ही तरह का कार्य उसके लिए नैतिक होता है और दूसरे के द्वारा करने पर उसे उसमें अनैतिकता दिखाई देने लगती है. घर के भीतर के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा-पहनावा आदि से लेकर सामाजिक क्रियाकलापों तक के निर्वहन में  इंसान द्वारा दोहरे मापदंडों का प्रयोग किया जाता है. किसी भी कदम के लिए उसके द्वारा निर्धारित वर्जनाएँ एक झटके में स्वयं उसी के द्वारा निष्प्रभावी सी कर स्वयं के लिए स्वीकार्य बना ली जाती हैं. समाज में, घर में महिलाओं-पुरुषों के निर्धारित कार्यों, उनके पहनावे, रहन-सहन, अन्य क्रियाकलापों आदि पर दिखने वाले विभेद को एकपल को नजरअंदाज़ कर भी दिया जाए तो भी बहुत कुछ ऐसा है जो पुरुष-पुरुष के क्रियाकलापों में, महिला-महिला के क्रियाकलापों में दोहरे चरित्र को दर्शाता है.
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इस दोहरे चरित्र-निर्वहन को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सहजता से देखा जा सकता है. सामाजिक आयोजनों में, कार्यक्षेत्र में, परिवार में इस तरह की मानसिकता के चलते ही वाद-विवाद की स्थितियाँ पैदा होती हैं. सामाजिक पटल पर इस तरह के दोहरे चरित्र के लोग पहले सहजता से चिन्हित नहीं किये जा पाते थे और उनकी पहचान छिपी रहने के कारण बहुधा विभ्रम की स्थिति बनी रहती थी. कालांतर में सामाजिक विकास ने तकनीक को विकसित किया, व्यक्ति को अपने आपको प्रदर्शित करने के विविध आयाम विकसित किये और उसका परिणाम अथवा दुष्परिणाम ये हुआ कि सोशल मीडिया पर दोहरे चरित्र के लोगों की भरमार देखने को मिलने लगी. ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया के कारण से दोहरे चरित्र के इंसान जन्म लेने लगे, ये फितरत किसी भी इंसान में पहले से विराजमान थी, बस सोशल मीडिया ने उसे सामने ला दिया. इंसान की जिस दोहरी मानसिकता को समझने में वर्षों लग जाया करते थे वे सोशल मीडिया के चलते एक पल में सामने आने लगे. इस तरह की दोहरी मानसिकता वाले लोग अपनी पोस्ट के सहारे, अपने स्टेटस के सहारे, अपनी विविध मुद्राओं में चिपकाई जाने वाली फोटो के सहारे खुद को महान आदर्शवादी, परम सत्यवादी, सद्चरित्र वाला प्रदर्शित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं और यही लोग परदे के पीछे से अपना निकृष्टम, कुंठित, मानसिक दीवालियेपन का चेहरा प्रदर्शित करने लगते हैं. इनमें से बहुत तो इस मानसिकता के होते हैं जो महिलाओं की दृष्टि में भले बनने के चक्कर में सार्वजानिक रूप से महिलाओं को आदर देने वाली पोस्ट लगाते हैं और देर रात महिलाओं के मैसेज बॉक्स में घुस प्रणय निवेदन करने से भी नहीं चूकते. कुछ इस तरह की स्थितियों का भुक्तभोगी पुरुष वर्ग भी होता है जहाँ उसके साथ इस तरह का दोहरा मापदंड महिलाओं द्वारा अपनाया जाता है. महिला-समर्थक बनी ऐसी महिलाएँ पुरुषों को लम्पट होने का, महिला-शोषक होने के साथ-साथ उनके देह के लालची होने तक का आरोप लगाती देखी जा सकती हैं.
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दरअसल देखा जाये तो इस तरह की दोहरी मानसिकता वाले इंसान खुद में न तो पुरुष कहे जाने योग्य हैं और न ही महिला. ऐसी मानसिकता वाले इंसानों का एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी रूप में खुद को सामाजिक प्राणी साबित कर सामने वाले का शोषण करना होता है. क्या घर, क्या बाहर इनके लिए पुरुष-महिला दोनों ही खिलौने सदृश्य होते हैं. ऐसी मानसिकता के इंसान महिलाओं को पुरुष-भोगी, तो पुरुषों को स्त्री-देह का भूखा बताने के अतिरिक्त दोनों को समलैंगिक साबित करने से भी नहीं चूकते हैं. यही वे प्राणी होते हैं जो अपने घरों की मासूम बेटियों, बालकों का यौन शोषण करते हैं; यही वे लोग हैं जो सामाजिक परम्पराओं की दुहाई देते हुए पहनावे, रीति-रिवाजों, रहन-सहन पर उंगली उठाकर सामाजिक वैमनष्यता पैदा करते हैं; यही वे लोग होते हैं जो स्त्री-पुरुष की बराबरी का दम भरते हैं किन्तु मौका मिलते ही दोनों का शोषण करने से नहीं चूकते हैं; यही वे इंसान होते हैं जिनके लिए खुद को ईमानदार, आदर्श, नैतिकता का पुतला साबित किया जाता है और इसी चेहरे की आड़ में काले कारनामे किये जाते हैं. वास्तविकता ये है कि इन दोहरी मानसिकता वाले लोगों ने ही समाज का चाल-चलन बिगाड़ दिया है; सामाजिक सौहार्द्र को ख़राब किया है; इंसान-इंसान के बीच गहरी खाई का निर्माण किया है.
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अब जबकि ऐसे लोगों को सोशल मीडिया के कारण से सहजता से चिन्हित कर लिया जा रहा है; इनको अपनी पहचान छिपाए रखना मुश्किल हो गया है तो लोगों का ये कर्तव्य बनता है कि इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाये. समाज में, सोशल मीडिया में ऐसे लोगों के दोहरे चेहरे को सबूत के साथ उन सबके सामने लाना आवश्यक है जिनको ऐसे लोगों के दूसरे चेहरे की जानकारी नहीं है. ये सोचकर कि ऐसे लोग महज सोशल मीडिया में सक्रिय हैं; मैसेज बॉक्स में जबरन घुसकर; हाय-हैल्लो के बहाने से अश्लील सन्देश भेजने के और क्या कर लेंगे, हम स्वयं ही कहीं न कहीं इनके अपराध को बढ़ाने का, इनको प्रोत्साहित करने का काम कर रहे हैं. देखा जाये तो सोशल मीडिया ऐसे लोगों के लिए एक तरह की प्रयोगशाला के रूप में कार्य करती है, जहाँ ये लोग अपनी विकृत मानसिकता का, अपनी कुंठित सोच का, अपने दोहरे चरित्र का प्रयोग कर उसकी सफलता-असफलता की जाँच करते हैं. न केवल समाज के लिए वरन अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों के लिए, समाज में फैलने वाले विद्वेष को रोकने के लिए, आपसी वैमनष्यता को दूर करने के लिए ऐसे लोगों का बेनकाब होना तो आवश्यक है ही, इनको सजा मिलनी भी आवश्यक है. अब महज ‘सब चलता है’, ‘जो होगा देखा जायेगा’ सोचकर शांत बैठने की आवश्यकता नहीं क्योंकि ऐसे इंसान न केवल समाज को वरन हमारे घरों को भी दूषित कर रहे हैं. आइये उठ खड़े हों और ऐसे दोहरे चरित्र वालों के चेहरे से उनका नकली चेहरा निकाल कर वास्तविक कलुषित चेहरे से समाज को परिचित करवाएं, इनको दण्डित करवाएं.

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08 जनवरी 2015

धार्मिक कट्टरता पर तथा धार्मिक भावना से खिलवाड़ पर हो नियंत्रण





अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर फिर बंदूकों ने कब्ज़ा करने की कोशिश करते हुए कुछ लोगों के जीवन को शांत कर दिया. प्रथम दृष्टया हत्याकांड की किसी भी घटना की तरह इस घटना की भी भर्त्सना की जानी चाहिए, और ऐसा हो भी रहा है. समूचे विश्व से कार्टून के विरोध में पत्रकारों, कार्टूनिस्ट की हत्या की निंदा की जा रही है. इसके बाद भी कहीं कुछ ऐसा है जो समूचे घटनाक्रम को दूसरी तरह से देखने को प्रेरित करता है. इसके लिए बने हुए कार्टूनों को समझने की आवश्यकता है, उसके पीछे की मानसिकता को समझने की जरूरत है. इस्लामिक संगठनों का साफ तौर पर कहना है कि इन कार्टून के माध्यम से मुहम्मद साहब का मजाक बनाया गया है. अब इसी सन्दर्भ में प्रकाशित कार्टून को देखा जाये तो ऐसा प्रतीत भी होता है. यहाँ आकर सवाल खड़ा होता है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी की भी धार्मिक भावनाओं का मजाक बनाया जा सकता है? यहाँ समूचे घटनाक्रम को महज आतंकी हमले की नजर से देखने की आवश्यकता नहीं है.
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फ़्रांस की इस पत्रिका का विवादों से सम्बन्ध रहा है, इसके द्वारा किसी समय में ननों के व्यव्हार, उनकी जीवनशैली को लेकर भी कार्टून बनाये गए थे, जो पर्याप्त विवाद का कारण बने थे. अब जबकि अपने मजहबी कट्टरपन के लिए समूचे विश्व में कुख्यात माने जाने वाले इस्लामिक प्रतीक पर कार्टून बनाना पत्रिका को महंगा पड़ गया. यहाँ किसी भी तरह की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ के सापेक्ष हत्याकांड को सही ठहराया जाने का मंतव्य नहीं है वरन ये दर्शाने की भावना है कि आखिर क्यों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है? वैश्विक स्तर पर ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है. संभवतः इस्लामिक धार्मिक कट्टरता के लिए ऐसा मौका बहुत अधिक बार नहीं आया और उनके द्वारा इसका उग्र, घातक विरोध दर्शा कर भविष्य के लिए भी ऐसे घटनाक्रमों को एक धमकी सी दे दी गई है. इसके उलट यदि देखा जाये तो हिन्दू धर्म को आये दिन लतियाये जाने के प्रकरण सामने आते रहते हैं. विरोध हुआ तो हुआ वर्ना सब समय के साथ अपने आप छिप जाता है, शांत हो जाता है. वैश्विक स्तर पर ही कभी पैंटी पर देवी-देवताओं की चित्रकारी, कभी चप्पलों पर धार्मिक प्रतीकों का प्राकशित किया जाना, कभी किसी मॉडल की नग्न देह किसी धार्मिक कृत्य का आधार बनती है तो कभी कोई कलाकार कला का नाम लेकर नग्न देवी-देवताओं को उकेर कर वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पाने की कोशिश में लग जाता है.
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ये सामाजिक स्तर पर शोध का विषय है कि आखिर किसी भी रूप में अभिव्यक्ति के लिए मजहबी-धार्मिक भावनाओं को ही क्यों आधार बनाया जाता है? इधर फ़्रांस की पत्रिका पर हुए हमले पर रोना-गाना मचा हुआ है वहीं देश में धार्मिक भावनाओं के कारण ही करोड़ों का व्यापर कर चुकी फिल्म को सहजता से स्वीकार किया जा रहा है, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताकर कई राज्यों में टैक्स-फ्री किया जा रहा है. धार्मिक भावनाओं से खेलने की प्रवृत्ति के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है क्योंकि आधुनिक समाज जिस तेजी से विज्ञान की तरफ बढ़ रहा है उसी तेजी से वो धार्मिक कट्टरता की तरफ भी जा रहा है. समूचे विश्व में कट्टरता के दो ध्रुव अब स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं, जिनमें वैज्ञानिक कट्टरता के रूप में पश्चिमी देशों को और धार्मिक कट्टरता के रूप में इस्लामिक देशों को सहजता से देखा जा सकता है. कट्टरता की इस जीवनशैली में यदि बहुत जल्दी ही नियंत्रण न लाया गया तो ये समूचे विश्व के लिए घातक सिद्ध होगा. भारत से बाहर निकलता दिखता इस्लामिक कट्टरपन इसका स्पष्ट संकेत है.

06 दिसंबर 2013

अविश्वास के कारण सामाजिकता में गिरावट




लगातार उन्नति करते समाज में अविश्वास का माहौल किस कदर बढ़ता जा रहा है कि अब लोगों को आपस में बातचीत करने में डर लगने लगा है. किसी के साथ जाने का डर, किसी के साथ बैठने का डर, बाज़ार अकेले जाने में डर, ऑफिस में डर, बस में डर, घूमने में डर, घर में डर, कभी अपना डर, कभी अपने पारिवारिक सदस्य को लेकर डर. इसके अलावा भी और तमाम तरह के डर, अनेक तरह के भय. इन सब तरह के डर-भय के पीछे हम सभी के बीच पनपता अविश्वास का माहौल ही जिम्मेवार है. पास-पड़ोस के लोगों के साथ अविश्वास के साथ-साथ निकट सम्बन्धियों के बीच भी, रक्त-सम्बन्धियों के बीच भी अविश्वास का माहौल बनता दिख रहा है. सामाजिक भौतिकवाद ने जिस तरह से उन्नति की है, उसी तेजी से सामाजिक मर्यादाओं में कमी आई है. अब रिश्तों का आधार संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा से इतर भौतिकतावाद पर निर्भर होने लगा है.
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भौतिकता की तरफ अंधी दौड़ बनाये ये समाज रिश्तों की मर्यादा को पूरी तरह से भुलाता जा रहा है. प्रगतिशीलता के नाम पर कुतर्कों को सामने रखा जाता है; फैशन के नाम पर अश्लीलता सामने आ रही है; मनोरंजन के नाम पर नग्नता को दिखाया जा रहा है. इसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्था को आरोपी बनाना कतई सही नहीं है. मूल रूप से देखा जाये तो ऐसे कारकों के पीछे आपसी विश्वास का कम होते जाना/समाप्त सा होते जाना है. आज अभिभावकों का अपने बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण सम्बन्ध नगण्य रूप में दिख रहा है; पति-पत्नी के आपसी विश्वास में निरंतर गिरावट आ रही है; शासन-प्रशासन, सरकार-जनता, चिकित्सक-मरीज, शिक्षक-शिक्षार्थी आदि के साथ-साथ समाज के विभिन्न आपसी तानेबाने को अविश्वास का शिकार होना पड़ रहा है. यही अविश्वास रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर रहा है; महिलाओं-बच्चियों के प्रति आपराधिक प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है; पुरुषों को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहा है; युवाओं में भटकाव पैदा कर रहा है; परिवार को-समाज को विखंडित कर रहा है.
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साम्प्रदायिकता को, आपसी तनाव को, वैमनष्यता को, दुराचार को, अपराध को लगातार कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं; इनसे निपटने के तरीके सोचे जा रहे हैं किन्तु नतीजा शून्य ही बना हुआ है. ऐसे संक्रमण भरे समय में समाज में आपसी विश्वास को बढ़ाने की जरूरत है; किसी बिल की नहीं, किसी अध्यादेश की नहीं वरन भाईचारे की-स्नेह की-प्रेम की-विश्वास की आवश्यकता है. आने वाली पीढ़ी को यदि सभ्य समाज देना है; भविष्य को स्वर्णिम बनाये रखना है; रिश्तों के मध्य तनावरहित सम्बन्ध स्थापित करना है; सामाजिक मान्यताओं को बचाए रखना है तो बहुत तेजी से फैलते जा रहे अविश्वास को जड़ से समाप्त करना ही होगा.
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05 मार्च 2009

ये वक्त है अमन का, यहाँ पे शान्ति-शान्ति है....

  • सुबह-सुबह आंख खुली तो मौसम बड़ा ही सुहाना लगा। हर ओर बड़ी ही खुशनुमा सी शांति छाई हुई थी। समाचार-पत्र खोल कर देखा, कहीं भी कोई मारपीट, हत्या, बलात्कार, लूट, आगजनी, आतंकी कार्यवाही का समाचार नहीं दिखा। प्रत्येक पेज पर सुख, समृद्धि, शांति, अमन-चैन के समाचार ही दिख रहे थे। एक पल को तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ।
  • देश में चुनावों की स्थिति है और किसी भी तरह के आपसी तल्ख बयान भी नहीं दिखाई दिये। राजनीति करने वालों की दिनचर्या पर निगाह डाली तो पता चला कि सबके सब बहुत ही तन्मयता से कार्य कर रहे हैं, सभी अपने-अपने क्षेत्रों में स्वार्थ को त्याग कर समाज सेवा में मगन हैं। नेताओं की छवि को लेकर भी किसी प्रकार से कोई आक्षेप कोई भी नहीं लगा रहा था। नेता भी बिना किसी अपराध, भ्रष्टाचार के जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुन रहे थे।
  • चुनाव के पहले जैसी भागमभाग बिलकुल भी नहीं दिख रही थी। सब प्रत्याशी बिना किसी तामझाम के अपना-अपना प्रचार करने में लगे हैं। साथ में न कोई बड़ी लग्जरी कार न कोई बंदूकधारी न सैकड़ों की भीड़, बस नेताजी और साथ में चार-छह समर्थक। सारे प्रत्याशी भी बेदाग छवि वाले दिख रहे थे, किसी के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं था, किसी के पास भी अकूत सम्पत्ति नहीं थी।
  • बाजार में भी किसी प्रकार का कोई डर किसी को नहीं लग रहा था। कोई भी आपराधिक तत्व खुलेआम घूमता नहीं दिख रहा था। सब लोग निर्भीक भाव से रात को भी घूमने फिरने में लगे थे। घरों में ताले नहीं डाले जा रहे थे। सब कुछ बहुत ही अच्छा हो गया है।
  • देश की विकास रफ्तार बहुत ही सकारात्मक रूप से ऊपर की ओर चलती चली जा रही थी। पड़ोसी देशों के साथ भी हमारे सम्बन्ध मधुरतम हो गये हैं। विश्व की तानाशाहात्मक शक्तियाँ भी हमें भरपूर सम्मान देने लगीं हैं। किसी प्रकार का कोई भी आतंकवाद हमारे देश के लिए खतरा नहीं रह गया है।
  • चैकिये नहीं, ये कोई हकीकत या सपना नहीं। अब ब्लाग पर इसी तरह की पोस्ट ही लिखी जाया करेगी। हैरानी क्यों हो रही है? देखा नहीं आपने अब विचारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। ब्लाग पर कुछ भी आपत्तिजनक लिखने पर कार्यवाही सम्भव है। तो क्यों लिखें किसी के खिलाफ? ऐसा लिखो जो विवाद न पैदा करे चाहे इसके लिए सच को छिपाना ही क्यों न पड़े?
  • अब सब कुछ अच्छा ही अच्छा है......................

19 अक्टूबर 2008

ऐसा कब तक.......??????

आज एक पत्रिका "समकालीन जनमत" पढ़ रहे थे, अच्छी पत्रिका है। देश के जाने-माने साहित्यकार इसमें अपने कलम का जादू बिखेरते हैं. कुछ नामचीन लोग इसके सम्पादक और संरक्षक मंडल में भी शामिल हैं. ये पत्रिका अपने विशेष कलेवर के कारण मेरी पसंदीदा पत्रिकाओं में है. हर अंक मेरे पास आता है. इस बार नया अंक आया, उत्सुकतावश पहले तो पूरी पत्रिका उलट-पुलट डाली. कवर बड़ा ही आकर्षित कर रहा था, लेकिन जैसे ही अन्तिम हिस्सा देखा (कवर का आख़िर) लगा कि यहाँ भी बस कोसने के अलावा कुछ नहीं है. पृष्ठ के ठीक बीचों-बीच एक तस्वीर है और इबारत लिखी है जिसका तात्पर्य निकलता है कि आतंक का गढ़ आजमगढ़ नहीं अमेरिका है।
ये नजरिये की बात है और किसी के लिए एक बात किसी के लिए दोनों बातें और किसी के लिए इनमें से कुछ भी सही नहीं हो सकता है. किसी दो-चार लड़कों के पकड़ जाने के बाद ये कहने लगना कि आजमगढ़ ही आतंकवाद का गढ़ है ग़लत होगा. ये कोशिश उन लोगों की रहती है जो किसी न किसी रूप में किसी भी घटना से अपनी राजनीति को चमकाना चाहते हैं. याद करिए कुछ दिन पुराना बटाला काण्ड, अब क्या हो रहा है इस पर ये कहने की जरूरत नहीं है. जहाँ तक आजमगढ़ का सवाल है तो जो लोग इसे इसकी साहित्यिक धरोहर के कारण जानते हैं वे तो कटाई ये स्वीकार नहीं करेंगे कि ये आतंक का गढ़ है. इसी के साथ हम सबको जो लोग भी आजमगढ़ के पक्ष में हैं उनको ये भिस्वीकारना होगा कि यहाँ आतंकी घटनाओं में बढोत्तरी अब अधिक हो गई है. इसे कैसे भी रोकना होगा.
उत्तर-प्रदेश इस समय आतंकियों के विशेष निशाने पर है. सभी दलों को स्वार्थ छोड़ कर अब इन ताकतों के खात्मे के लिए काम करना होगा. ये बहुत बड़ा सवाल है कि आम जनता कब तक सौहार्द बनाए रखने में सफल होगी? बनारस के बम धमाके किसी को भूले नहीं होंगे तब भी वहाँ के लोगों ने आपसी सामंजस्य दिखा कर आतंकियों के मंसूबों को कुचल दिया था. कुछ इसी तरह का उदहारण आगे भी देना होगा. जनता तो ये सब कर लेगी पर तथाकथित साहित्यकार, राजनेता, धर्म के ठेकेदार, धर्माचार्य, मुल्ला-मौलवी, कथित धर्मनिरपेक्ष ऐसा कब करेंगे?