06 December 2013

अविश्वास के कारण सामाजिकता में गिरावट




लगातार उन्नति करते समाज में अविश्वास का माहौल किस कदर बढ़ता जा रहा है कि अब लोगों को आपस में बातचीत करने में डर लगने लगा है. किसी के साथ जाने का डर, किसी के साथ बैठने का डर, बाज़ार अकेले जाने में डर, ऑफिस में डर, बस में डर, घूमने में डर, घर में डर, कभी अपना डर, कभी अपने पारिवारिक सदस्य को लेकर डर. इसके अलावा भी और तमाम तरह के डर, अनेक तरह के भय. इन सब तरह के डर-भय के पीछे हम सभी के बीच पनपता अविश्वास का माहौल ही जिम्मेवार है. पास-पड़ोस के लोगों के साथ अविश्वास के साथ-साथ निकट सम्बन्धियों के बीच भी, रक्त-सम्बन्धियों के बीच भी अविश्वास का माहौल बनता दिख रहा है. सामाजिक भौतिकवाद ने जिस तरह से उन्नति की है, उसी तेजी से सामाजिक मर्यादाओं में कमी आई है. अब रिश्तों का आधार संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा से इतर भौतिकतावाद पर निर्भर होने लगा है.
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भौतिकता की तरफ अंधी दौड़ बनाये ये समाज रिश्तों की मर्यादा को पूरी तरह से भुलाता जा रहा है. प्रगतिशीलता के नाम पर कुतर्कों को सामने रखा जाता है; फैशन के नाम पर अश्लीलता सामने आ रही है; मनोरंजन के नाम पर नग्नता को दिखाया जा रहा है. इसके लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्था को आरोपी बनाना कतई सही नहीं है. मूल रूप से देखा जाये तो ऐसे कारकों के पीछे आपसी विश्वास का कम होते जाना/समाप्त सा होते जाना है. आज अभिभावकों का अपने बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण सम्बन्ध नगण्य रूप में दिख रहा है; पति-पत्नी के आपसी विश्वास में निरंतर गिरावट आ रही है; शासन-प्रशासन, सरकार-जनता, चिकित्सक-मरीज, शिक्षक-शिक्षार्थी आदि के साथ-साथ समाज के विभिन्न आपसी तानेबाने को अविश्वास का शिकार होना पड़ रहा है. यही अविश्वास रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर रहा है; महिलाओं-बच्चियों के प्रति आपराधिक प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है; पुरुषों को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहा है; युवाओं में भटकाव पैदा कर रहा है; परिवार को-समाज को विखंडित कर रहा है.
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साम्प्रदायिकता को, आपसी तनाव को, वैमनष्यता को, दुराचार को, अपराध को लगातार कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं; इनसे निपटने के तरीके सोचे जा रहे हैं किन्तु नतीजा शून्य ही बना हुआ है. ऐसे संक्रमण भरे समय में समाज में आपसी विश्वास को बढ़ाने की जरूरत है; किसी बिल की नहीं, किसी अध्यादेश की नहीं वरन भाईचारे की-स्नेह की-प्रेम की-विश्वास की आवश्यकता है. आने वाली पीढ़ी को यदि सभ्य समाज देना है; भविष्य को स्वर्णिम बनाये रखना है; रिश्तों के मध्य तनावरहित सम्बन्ध स्थापित करना है; सामाजिक मान्यताओं को बचाए रखना है तो बहुत तेजी से फैलते जा रहे अविश्वास को जड़ से समाप्त करना ही होगा.
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1 comment:

Kuldeep Thakur said...

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 09/12/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।

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