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17 सितंबर 2022

तारीखों का एहसास

तारीखों का भी अपना एक अलग एहसास होता है. किसी भी महीने की किसी भी तारीख को किसी ऐसी घटना के घटित होने पर, जो व्यक्ति के दिल-दिमाग पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है, वह तारीख प्रत्येक महीने अपने उसी एहसास के साथ सामने आती है. किसी ख़ुशी की घटना के होने के कारण वह तारीख सुखद एहसास दिलाती है और यदि इसके उलट यदि उस तारीख में कुछ सुखद न हुआ हो तो वह तारीख ग़म का एहसास कराती है. कभी-कभी लगता है कि क्या उन तारीखों में किसी तरह की तासीर होती है या फिर उन घटनाओं में, जो सम्बंधित तारीख आने पर उस घटना का एहसास कराती हैं. ऐसा इसलिए दिमाग में आता है कि यदि एक पल को मान लिया जाये कि किसी वैश्विक योजना का अनुपालन करते हुए यदि कैलेण्डर ही बदल दिया जाये, उनकी तारीखों का क्रम बदल दिया जाये अथवा उनको किसी और नाम से परिभाषित कर दिया जाये तो किसी तारीख विशेष में उस दिन घटित घटना का एहसास किस तरह का होगा?




ये सवाल अपने आपमें काल्पनिक ही हैं मगर व्यक्तिगत रूप से हमें लगता है कि किसी भी घटना का घटित होना एक एहसास तो जगाता ही है मगर उसमें सबसे बड़ी भूमिका उस दिन की, उस तारीख की होती है. हम सबने महसूस किया होगा कि कोई भी घटना हमें पूरे माह याद नहीं आती मगर जैसे-जैसे उस तारीख का नजदीक आना होता है, तो वह घटना बहुत तेजी से अपना एहसास जगाती रहती है. इसके पीछे संभवतः उस तारीख के रूप में उस घटना का केन्द्रित किया जाना प्रमुख हो. देखा जाये तो कैलेण्डर, तिथियाँ आदि का निर्माण ही किसी भी घटना को याद रखने के लिए किया गया होगा. इन्हीं के आधार पर हम सभी अच्छी-बुरी घटनाओं को याद रखते हैं.


तारीखों का होना हम सबके जीवन में एक अलग तरह का एहसास जगाना है. इसमें भी यदि किसी एक ही तारीख को किसी एक ही व्यक्ति के साथ अच्छी और बुरी घटना का जुड़ना एकसाथ हो जाये तो उसके एहसासों में अलग तरह की लहरों का उठना-गिरना होता है. इसमें भी उस तारीख की ही भूमिका प्रमुख होती है. 




 

14 अक्टूबर 2021

प्रेम का मखमली एहसास - 2100वीं पोस्ट (कहानी)

मोबाइल को मेज पर टिका कर वह कुर्सी पर पसर गया. ‘कभी अपने घर को देखते हैं’ की तर्ज़ पर उसने एक नजर ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम पर दौड़ाई. अस्तव्यस्त तो नहीं कहा जायेगा मगर करीने से लगा भी नहीं कहा जा सकता. पढ़ने के अलावा भी तमाम शौक के उसी कमरे में अपना आकार लेने के कारण बहुत सी चीजों ने जगह-जगह कब्ज़ा कर रखा था. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि अकेले प्राणी के लिए क्या ड्राइंग और क्या स्टडी.


चौंकने जैसी स्थिति में वह किताबें, कागज, कलर्स, कैनवास आदि को उनकी जगह देने के लिए उठा. उसके आने के पहले सभी चीजों को यथास्थान कर दिया जाये अन्यथा कमरे में घुसते ही इसी बात पर लेक्चर मिल जायेगा. याद आया उसे, जब पहली बार वह उसके कमरे पर आई थी तो ‘यही सब खाते-पीते हो क्या? इन्हीं पर सोते-बैठते हो? के साथ उसने इधर-उधर बिखरी किताबों, कागजों, पेन आदि को समेटना शुरू कर दिया था. वह दिन याद आते ही एक मुस्कान के साथ उसने हाथ में पकड़ी किताबों को ज्यों का त्यों छोड़ दिया. आज उसके हाथ से स्टडी रूम संवर जाएगा तो बहुत दिनों तक उसकी महक बनी रहेगी.


साढ़े पाँच बजे महकती पवन की तरह उसका आना हुआ. उसके आने की आहट मात्र ने उन दिनों में पहुँचा दिया जबकि वह उसे अपनी सारी ज़िन्दगी में खुशियाँ बिखेरने के सपने देखा करता था. समय का ही खेल है जिसे ज़िन्दगी भर के लिए उसके साथ होना था वह चंद पलों के लिए अपने एहसासों की बारिश करने आई है.


“आदत अभी तक न बदली तुम्हारी. अभी भी कागज, रंग ही खाते हो. इन्हीं को ओढ़ते-बिछाते हो.” स्टडी रूम में कदम रखते ही उसके वर्षों पुराने अंदाज ने उसे भावनाओं से सराबोर कर दिया.


“एक मिनट रुको” कहते हुए वह सोफे से किताबों को उठाने के लिए आगे बढ़ा.


“तुम रहने ही दो. इतने ही काम वाले होते तो कमरा ऐसा न रहता. रुको मैं सही कर देती हूँ.” पूरे अधिकार के साथ वह कमरे को सजाने में जुट गई.




पहले तो वह कमरे के दरवाजे से टिका उसे सामान लगाते और उस पर बड़बड़ाते देख मुस्कुराता रहा फिर उसकी मदद करने लगा. इस दौरान दोनों के बीच पुराने दिनों की तरह हँसी-मजाक, छेड़छाड़ चलती रही. कभी एक हलकी सी मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ती तो कभी ठहाकों के साथ.


“अब लग रहा है जैसे कोई रहता हो यहाँ. आती रहा करो बीच-बीच में इसे भी ज़िन्दगी देने के लिए.” कह कर उसे छेड़ा.


“मैं तो ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी देने के लिए आने वाली थी....” आगे के शब्दों पर होंठों के कंपन ने अवरोध पैदा किया. ख़ामोशी ने चीखना शुरू किया ही था कि “कुछ करना सीख लो या अब भी मेरे भरोसे ही रहोगे? कहते हुए उसने माहौल को खुशनुमा बनाया.


उसके कुछ कहने के पहले ही अन्दर से नौकर चाय लेकर आया.


“चलो जल्दी चाय पी लो फिर कहीं बाहर चलते हैं खाना खाने.....” उसने बात काटते हुए अपनी बात जोड़ी “नहीं, कहीं बाहर नहीं जायेंगे. दो दिन से बाहर का खा-खाकर बोर हो गई हूँ. यहीं कुछ बनाती हूँ मैं.”


उसे बिन माँगे बहुत कुछ मिल गया. काश यह पल यहीं रुक जाए हमेशा के लिए.


“ओ हैलो, इधर ध्यान दो. कुछ है भी तुम्हारी किचन में या ऐसे ही बना रखा है अपने स्टडी जैसा? उसके चेहरे पर अप्रत्याशित ख़ुशी, चमक और उसे कहीं खोया सा देख उसने टोका.


थोड़ी देर बाद किचन में उसके प्यार, स्नेह की रेसिपी अपनी खुशबू बिखरने लगी. किचन के एक कोने से टिका मंत्रमुग्ध सा उसे निहारे जा रहा था. इस समय उसके विचारों पर, पूरे व्यक्तित्व पर वही छाई हुई थी. बातों का जवाब न मिलने पर उसने पलट कर देखा तो खुद को ऐसे निहारते देखने पर एक पल को वह भी असहज हो गई.


“ऐसे क्या घूरने में लगे हो? पहली बार देख रहे हो?


“कुछ नहीं. बस.... ऐसे ही....”


“अच्छा चलो, ज्यादा नौटंकी नहीं. चलो, भागो यहाँ से. डायनिंग टेबल सही करो और हाँ सलाद काट लो.” कहते हुए उसने धक्का देकर उसकी नजरों को अपने चेहरे से हटाया.


अपनी बाँहों पर उसकी उँगलियों का एहसास लेकर वह हँसते हुए डायनिंग टेबल की तरफ चल दिया.

 


13 अक्टूबर 2021

संबंधों के बीच एहसासों की डोर

संबंधों, रिश्तों का बनाया जाना जितना आसान है, जितना सहज है उनका निर्वहन करना या कहें कि उनका पूरी ईमानदारी से निर्वहन करना उतना ही कठिन है. किसी भी सम्बन्ध, रिश्ते में निर्वहन की समस्या उसी समय से आनी शुरू हो जाती है जिस समय से उनसे किसी तरह की अपेक्षा की जाने लगती है. यदि संबंधों को, रिश्तों को अपेक्षाओं से मुक्त रखा जाये तो वे निर्वहन के प्रति समस्या नहीं बनते हैं. संभवतः इसी कारण से कहा भी जाता है कि संबंधों को, रिश्तों को किसी भी तरह के बंधन में नहीं बांधना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो रिश्तोंसंबंधों की कोई परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकतीदूसरे यदि संबंधों और रिश्तों को किसी तरह के बंधन में बाँध दिया जाये तो उसमें एक तरह की बोझिलता आने लगती है. किसी भी सम्बन्ध को, किसी भी रिश्ते को किसी भी तरह की परिभाषा से नहीं बल्कि उनको निभाने की गंभीरता से समझा जा सकता है. असल में सम्बन्ध अथवा रिश्ते किसी के भी जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण एहसास होता हैजिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना अत्यंत कठिन होता है.


किसी भी व्यक्ति के जीवन में एहसासों से भरे रिश्ते एक तो मानवजनित होते हैं और दूसरी तरह के वे रिश्ते है जो स्वतः उसे मिलते हैं. एक रिश्ते उसके जन्म के साथ उससे जुड़ जाते हैं और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो वह इन्सान स्वयं बनाता हैउनसे जुड़ता है. जन्मते ही मिलने वाले रिश्तों और स्वयं बनाये गए रिश्तों में मूलतः बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है क्योंकि सभी तरह के रिश्तों का आधार आपसी विश्वासआपसी एहसास होता है. किसी भी तरह के संबंधों में महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें उसका निर्वहन कैसे करना है. संबंधों का बनाया जाना जितना सहजआसान होता है उससे कहीं ज्यादा कठिन कार्य होता है संबंधों का निर्वहन करना. दरअसल संबंधों की प्रकृति मखमली ओस की भांति होती है जो जरा सी धूप पाते ही समाप्त हो जाती है. शांतशीतलचाँदनी रात की तरह की एहसास भरी प्रकृति संबंधों में मासूमियत भरती है. इन संबंधों पर यदि किसी भी तरह से अविश्वासआपसी द्वेषकटुता आने लगती है तो फिर संबंधों की शीतलतामधुरता समाप्त हो जाती है. इसके बाद भी इन्सान उन संबंधों को भले ही बनाये रखे मगर वह एक तरह से उनको ढोता ही रहता हैउनका निर्वहन नहीं करता है. 




जो रिश्ते इन्सान को स्वाभाविक रूप से मिलते हैं उनका अपना ही अलग रंग-रूप है किन्तु जो रिश्ता वह खुद बनाता है उसके प्रति वह अपनी समझ-बूझअपने दिल की पसंदअपने दिमाग की सोच आदि की मदद लेता है. इसके बाद भी सत्य यही है कि संबंधों में औपचारिकता नहीं चल सकती है. ऐसा कोई भी सम्बन्ध जो औपचारिकता के चलते बनता हैकिसी स्वार्थ के चलते बनता है उसमें एकसासों की जबरदस्त कमी होती है. एहसासों की कमी के साथ बनतेपनपते सम्बन्ध न तो मधुरता प्रदान करते हैं और न ही उसमें ख़ुशी मिलती है. सत्यता यह है कि रिश्तेसम्बन्ध के बनने में भले ही इन्सान की अपनी पसंद हो मगर दो लोगों के बीच की कुछ ऐसी स्थिति भी होती है जो उनके बीच एक तरह की बॉन्डिंग का निर्माण करती है. दो लोगों के बीच की मानसिक स्थितिउनके दिल के सामंजस्य की स्थिति या कुछ ऐसी बॉन्डिंग स्वतः निर्मित होने लगती है कि एक इन्सान पहली मुलाकात में ही पसंद आने लगता है. यही कुछ ऐसा भी होता है कि कोई पहली मुलाकात में ही पसंद नहीं आता है. किसी भी इन्सान के शारीरिक हावभावसौन्दर्य भले ही एकबारगी प्रभाव डालते हों मगर बहुधा देखने में आता है कि किसी तरह का अप्रत्यक्ष एहसास सर्वोपरि होकर असरकारक भूमिका निभाता है. पसंद आने वाले उस इन्सान से दिल की बात कहने में भी ख़ुशी मिलती है. उस व्यक्ति से अपने सुख-दुःख बाँटने में भी किसी तरह का संकोच नहीं होता है. एहसासों से बंधे रिश्ते में आपस में किसी तरह की औपचारिकता नहीं रह जाती है. ऐसे लोगों से अपने दिल की बात बताने का मन करता हैउनके दिल की बात सुनने की इच्छा होती है.


संबंधों के बीच एहसासों की डोर का होना अत्यंत आवश्यक है. बिना एहसास रिश्तों का बहुत लम्बे समय तक चलना नामुमकिन है. यह एहसास आपसी विश्वासआपसी सहयोगआपसी समन्वय की भावना से ही निर्मित होता है. ऐसे में जबकि समाज में आपसी संबंधों मेंरिश्तों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही हैहम सभी का दायित्व यही होना चाहिए कि किसी तरह की परिभाषा में बांधे बिना संबंधों कोरिश्तों को एहसासों के साथ जीना शुरू किया जाये. आपस में समन्वयस्नेहविश्वास बनाये रखा जाये.


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09 जनवरी 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

31 जुलाई 2020

पत्रों का सुखद एहसास अब गायब हो गया

आज, 31 जुलाई को लोग कई-कई कारणों से याद रखते हैं. कोई पार्श्व गायक मुहम्मद रफ़ी के कारण याद रखता है तो कोई साहित्यकार प्रेमचंद के कारण. इनके अलावा और भी बहुत से कारण होंगे आज की तारीख को याद करने के. इन्हीं बहुत से कारणों में एक कारण याद रखने का है, इस तिथि को विश्व पत्र दिवस मनाया जाना. हो सकता है कि आपको आश्चर्य हुआ हो कि ऐसा भी कोई दिवस मनाया जाता है. जी हाँ, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि आज ही की तारीख में सबसे पहला पत्र इंग्लैण्ड में लिखा गया. उसके बाद से तकनीक के विकास करने तक पत्र ही वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम बना हुआ था.


विश्व पत्र दिवस का मनाया जाना जितना आश्चर्य का विषय हो सकता है, उतना ही बहुत से युवा साथियों के लिए आश्चर्य का विषय पत्र का लिखा जाना भी हो सकता है. वर्तमान दौर में यदि एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की होगी जिन्होंने पत्रों का लेखन किया है, पत्रों का इंतजार किया है तो एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी होगी जिन्होंने पत्र का इस्तेमाल ही नहीं किया होगा. आज के दौर में तीव्रगति से इधर से उधर अपनी बात पहुँचाने के तमाम माध्यम विकसित हो चुके हैं मगर इसके बाद भी लगता है कि जो एहसास, जो संवेदनाएँ पत्र में छिपी होती हैं वे आज के किसी तकनीकी माध्यम में नहीं हैं.


आज भी याद आता है वो समय जबकि पत्रों का आना, उनको बार-बार पढ़ा जाना, पत्रों का सहेज कर रखा जाना अपने आपमें एक बहुत विशेष बात हुआ करती थी. हम आज भी सैकड़ों की संख्या में पत्रों को अपने पास सुरक्षित रखे हुए हैं. कई बार फुर्सत के समय में, अकेलापन महसूस होने पर इनके साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है. परिजनों के पत्र आने पर सबसे पहले कौन पढ़ेगा को लेकर अक्सर युद्ध जैसी बन जाया करती थी. पत्र में किस-किसको नाम लेकर संबोधित किया गया है, इसको भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता था. किसी विशेष आयोजन पर आने वाले पत्र के समय एक लिफाफे में कई-कई छोटे-छोटे कागजों में पत्रों का आना मनोहारी मौसम जैसा लगता था. बचपन के उस दौर से बाहर आकर युवावस्था में मित्रों के पत्रों का इंतजार, पत्रों में कई बार कोड वर्ड में अपनी बात को कहने की काबिलियत भी दिखा दी जाती थी ताकि यदि धोखे से घरवालों के हाथ पत्र पड़ जाए तो उस कोड वर्ड को समझ न सकें.

ऐसे समय में याद आता है हॉस्टल टाइम में अपने एक मित्र द्वारा पत्रिका में भेजा गया सन्देश और उसके बाद उसके नाम पर रोज ही चालीस-पचास पत्र आने शुरू हो गए. यह कॉलेज के लिए और हॉस्टल के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ था कि आखिर उसके पास इतने पत्र कहाँ-कहाँ से आते हैं. यह सब करामात उसके द्वारा अनु नाम रखकर एक लड़की के रूप में पत्रिका में सन्देश छपवाने के बाद हुई थी. इसी तरह एक बार अपने शहर के मुख्य डाकघर में हमें प्रधान द्वारा बुलवाकर इसकी जानकारी ली गई थी कि हमारे पास इतने पत्र रोज कहाँ से और क्यों आते हैं. ये बात सन 1996-97 के आसपास की होगी, उस समय हमारे पास रोज ही दस-बारह पत्र आया करते थे.

आज हमारे पास पत्र आने की संख्या भले बहुत ही सीमित हो गई हो, हमारे द्वारा भी पत्र लिखने की गति भी कम हो गई हो मगर बंद नहीं हुई है. ई-मेल और सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों ने अपनी बात इधर से उधर पहुँचाने का अलग माध्यम भले ही अपना लिया हो मगर हम आज भी बहुत से परिचितों, अपरिचितों, पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाकारों आदि को पत्र भेजते हैं. उनको पत्र लिखना हम आज भी हस्तलिपि में ही करते हैं. आप भी कोशिश करिए पुनः, अच्छा लगेगा. जो लोग पत्र लिखते रहे हैं, पत्रों का इंतजार करते रहे हैं, वे भली-भांति इसके सुखद एहसास को समझ सकते हैं. जिन लोगों ने कभी पत्र नहीं लिखा, पत्रों के इंतजार करने की अनुभूति नहीं की वे इसका आनंद उठा सकते हैं.

वर्तमान दौर में जबकि सभी लोग खुद में अकेलापन महसूस कर रहे हैं, उस समय आपके हाथ से लिखे दो शब्द आपके अपनो के लिए बहुत बड़ा सुख का माध्यम बन सकते हैं. लिख कर देखिये, हम भी लिख रहे हैं, आप भी लिखिए.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

16 जनवरी 2019

एक एहसास मिलन और जुदाई का


एक एहसास, किसी व्यक्ति विशेष का और वह भी तब जबकि वह किसी न किसी रूप में आपके साथ जिन्दा रहे, इस बात का एहसास कराता है कि व्यक्ति की कितनी महत्ता है. एहसास खालीपन का, एहसास किसी के दूर जाने का, भले ही व्यक्ति आपके साथ न हो पर उसके साथ होने का एहसास ही बहुत होता है. किसी भी व्यक्ति से इसी अनाम रिश्ते का नाम अभी तक दिया जाना समझ में नहीं आया है. कोई अपना न होते हुए भी बहुत अपना सा लगता है, कोई अपना होकर भी कभी अपना सा नहीं लगता है. किसी भी बेगाने का अपना सा एहसास ही उसके दूर हो जाने का एहसास कराता है. किसी ऐसे व्यक्ति का जो अपना न होते हुए भी बहुत करीब हो उसके प्रति एक दूरी का एहसास भी बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है.


यह प्रकृति का नियम है कि मिलन के साथ ही साथ जुदाई होती है. किसी से मिलना, किसी से बिछड़ना साथ-साथ ही होता है. और देखा जाये तो बिछड़ने के दुःख का एहसास भी मिलन के बाद और मिलन की खुशियों का एहसास भी बिछड़ने के साथ होता है. यही ख़ुशी-ग़म, मिलने-बिछड़ने का क्रम हमारे जीवन को एक गति प्रदान करता है. किसी को ख़ुशी, किसी को ग़म, किसी को हँसी, किसी को अश्क, किसी को मिलन, किसी को जुदाई यह सारी की सारी बातें एहसास कराती हैं कि ज़िन्दगी इसी का नाम है. और इसी ज़िन्दगी को, उसके हर रंग को जिंदादिली से जीने का नाम भी ज़िन्दगी है.

17 दिसंबर 2018

दिल के करीब - 1400वीं पोस्ट

एहसास ही हैं जो किसी भी व्यक्ति को जीवंत बनाये रखते हैं. यदि व्यक्ति की ज़िन्दगी से एहसासों को निकाल दिया जाये तो मनुष्य और किसी पत्थर में कोई अंतर नहीं रह जायेगा. एहसास ही हैं जो व्यक्ति को वर्तमान और अतीत से जोड़े रखते हैं. विगत को वर्तमान में लाकर जीवंत बनाये रखने की कला भी किसी इन्सान में इसी कारण पैदा हो पाती है. यह एहसास ही है जबकि महज चंद दिनों की मुलाकात के बाद कोई इन्सान विश्वास के साथ एक आवाज़ दे और उस आवाज़ में अजनबीपन न हो बल्कि एक विश्वास ही हो, एक तरह का अपनापन ही हो तब उस पर भी अविश्वास करने जैसा कुछ शेष नहीं बचता. हाथों में लहराते चंद कागज के टुकड़े और आँखों में विश्वास की चमक के साथ उसके द्वारा चंद शब्दों में कही गई बात ही यह दर्शाने को पर्याप्त है कि कोई व्यक्ति आपके बारे में क्या धारणा रखता है. एक विश्वास के साथ चंद कागजों के रूप में एक एहसास संभाल कर सुरक्षित रख लिए गए. विश्वास ही वह सम्पदा है जो निहायत कोमल है, अत्यंत नाजुक है. जरा सी ठेस भी समूचे विश्वास को दरकाती ही नहीं वरन समूल नष्ट कर देती है. उस समय के महज चंद शब्दों के एहसास से उत्पन्न विश्वास खंडित न हो, चकनाचूर न हो यह प्रयास सदैव बना रहा.


बनते-बिगड़ते पलों के बीच के खुशनुमा पल जिस तेजी से आये, उसी तेजी से चले भी गए. उनमें न कुछ अपना था, न कुछ बेगाना था बस समय को गुजरना था सो गुजर गया. एक एहसास उस समय भी बना हुआ था, एक एहसास आज भी बना हुआ है. चंद शब्द उस दिन भी कागज़ पर जज्बातों को बयान कर रहे थे, चंद शब्द आज भी उन्हीं जज्बातों का बयान थे. समय की गति बराबर बनी हुई थी, तब भी कुछ अलग स्थिति थी, आज भी कुछ अलग स्थिति बनी हुई है मगर शब्दों का कलेवर तब भी वही था, आज भी वही है. इसका कारण भी संभवतः यही होगा कि शब्दों में तब भी एहसास वही थे, उन्हीं शब्दों में आज भी वही एहसास हैं. एहसासों के साये में खुद को आगे बढ़ाते रहने का नाम ही ज़िन्दगी है. एहसासों को ज़िन्दगी के साथ आगे संभाले रखना भी ज़िन्दगी है. यही एहसास है जो दिल के करीब है, दिल का हिस्सा है.
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कोई तो है जो
दिल के आसपास रहता है सदा,
अपने अहसास,
अपनी उपस्थिति को
दर्शाता है सदा।
उसके पास होने का
अहसास मात्र ही
तन्हा नहीं होने देता है कभी,
नहीं होने देता है उदास,
न ही परेशान।
लगा रहता है.......मन में
सदा यही..........कि
उदासी का एक लम्हा ही
उदास कर जाएगा उसे भी,
जो है दिल के आसपास
अपनी याद के सहारे,
एक मीठे अहसास के सहारे।
पर..........इस मीठे अहसास के पीछे भी
एक दर्द है छिपा,
वह.........
बहुत पास होकर भी
बहुत दूर है अभी,
आंखों के सामने है फ़िर भी
हाथों की पहुँच से दूर है अभी।
आवाज़ उसकी, दिल तक हमारे पहुँचती है,
हवा में उड़-उड़ कर
उसकी खुशबू फैलती है।
अहसास के सहारे वह
रहता है आसपास
पर......
हकीकत में बहुत दूर है अभी।
लेकिन यही क्या कम है कि
यादों के सहारे ही सही,
अहसास के सहारे ही सही,
हवा में फैलती खुशबू के रूप में ही सही,
कोई है तो हमारा अपना
जो........
दूर होकर भी बहुत,
दिल के करीब है बहुत।


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इस ब्लॉग की 1400वीं पोस्ट 

15 दिसंबर 2018

एहसासों की डोर से बाँधें संबंधों को

कहा जाता है कि संबंधों को किसी भी तरह के बंधन में नहीं बांधना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो रिश्तों, संबंधों की कोई परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकती, दूसरे यदि संबंधों और रिश्तों को किसी तरह के बंधन में बाँध दिया जाये तो उसमें एक तरह की बोझिलता आने लगती है. देखा जाये तो रिश्तों को किसी परिभाषा से नहीं बल्कि उसके निभाने की गंभीरता से समझा जा सकता है. असल में सम्बन्ध अथवा रिश्ते किसी के भी जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण एहसास होता है, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना अत्यंत कठिन होता है. किसी भी व्यक्ति के जीवन में एहसासों से भरे रिश्ते एक तो मानवजनित होते हैं और दूसरी तरह के वे रिश्ते है जो स्वतः उसे मिलते हैं. एक रिश्ते उसके जन्म के साथ उससे जुड़ जाते हैं और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो वह इन्सान स्वयं बनाता है, उनसे जुड़ता है. जन्मते ही मिलने वाले रिश्तों और स्वयं बनाये गए रिश्तों में मूलतः बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है क्योंकि सभी तरह के रिश्तों का आधार आपसी विश्वास, आपसी एहसास होता है. किसी भी तरह के संबंधों में महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें उसका निर्वहन कैसे करना है. संबंधों का बनाया जाना जितना सहज, आसान होता है उससे कहीं ज्यादा कठिन कार्य होता है संबंधों का निर्वहन करना. दरअसल संबंधों की प्रकृति मखमली ओस की भांति होती है जो जरा सी धूप पाते ही समाप्त हो जाती है. शांत, शीतल, चाँदनी रात की तरह की एहसास भरी प्रकृति संबंधों में मासूमियत भरती है. इन संबंधों पर यदि किसी भी तरह से अविश्वास, आपसी द्वेष, कटुता आने लगती है तो फिर संबंधों की शीतलता, मधुरता समाप्त हो जाती है. इसके बाद भी इन्सान उन संबंधों को भले ही बनाये रखे मगर वह एक तरह से उनको ढोता ही रहता है, उनका निर्वहन नहीं करता है. 


जो रिश्ते इन्सान को स्वाभाविक रूप से मिलते हैं उनका अपना ही अलग रंग-रूप है किन्तु जो रिश्ता वह खुद बनाता है उसके प्रति वह अपनी समझ-बूझ, अपने दिल की पसंद, अपने दिमाग की सोच आदि की मदद लेता है. इसके बाद भी सत्य यही है कि संबंधों में औपचारिकता नहीं चल सकती है. ऐसा कोई भी सम्बन्ध जो औपचारिकता के चलते बनता है, किसी स्वार्थ के चलते बनता है उसमें एकसासों की जबरदस्त कमी होती है. एहसासों की कमी के साथ बनते, पनपते सम्बन्ध न तो मधुरता प्रदान करते हैं और न ही उसमें ख़ुशी मिलती है. सत्यता यह है कि रिश्ते, सम्बन्ध के बनने में भले ही इन्सान की अपनी पसंद हो मगर दो लोगों के बीच की कुछ ऐसी स्थिति भी होती है जो उनके बीच एक तरह की बॉन्डिंग का निर्माण करती है. दो लोगों के बीच की मानसिक स्थिति, उनके दिल के सामंजस्य की स्थिति या कुछ ऐसी बॉन्डिंग स्वतः निर्मित होने लगती है कि एक इन्सान पहली मुलाकात में ही पसंद आने लगता है. यही कुछ ऐसा भी होता है कि कोई पहली मुलाकात में ही पसंद नहीं आता है. किसी भी इन्सान के शारीरिक हावभाव, सौन्दर्य भले ही एकबारगी प्रभाव डालते हों मगर बहुधा देखने में आता है कि किसी तरह का अप्रत्यक्ष एहसास सर्वोपरि होकर असरकारक भूमिका निभाता है. पसंद आने वाले उस इन्सान से दिल की बात कहने में भी ख़ुशी मिलती है. उस व्यक्ति से अपने सुख-दुःख बाँटने में भी किसी तरह का संकोच नहीं होता है. एहसासों से बंधे रिश्ते में आपस में किसी तरह की औपचारिकता नहीं रह जाती है. ऐसे लोगों से अपने दिल की बात बताने का मन करता है, उनके दिल की बात सुनने की इच्छा होती है.

संबंधों के बीच एहसासों की डोर का होना अत्यंत आवश्यक है. बिना एहसास रिश्तों का बहुत लम्बे समय तक चलना नामुमकिन है. यह एहसास आपसी विश्वास, आपसी सहयोग, आपसी समन्वय की भावना से ही निर्मित होता है. ऐसे में जबकि समाज में आपसी संबंधों में, रिश्तों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, हम सभी का दायित्व यही होना चाहिए कि किसी तरह की परिभाषा में बांधे बिना संबंधों को, रिश्तों को एहसासों के साथ जीना शुरू किया जाये. आपस में समन्वय, स्नेह, विश्वास बनाये रखा जाये.