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20 जुलाई 2026

हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती...

कॉलेज टाइम में सींकिया टाइप लौंडों को रंगबाजी दिखाते समय काव्य-पंक्तियाँ स्वतः ही उभरती थीं....

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

......"

आज ये पंक्तियाँ फिर अनायास ही उभर आईं, जब कोकरोचों के विरोध प्रदर्शन में देखने-सुनने को मिला कि संसद को उखाड़ देंगे, देश को नेपाल बना देंगे, प्रधानमंत्री को संसद में घुस कर मारेंगे, रंडुओं को देश कैसे दे दिया आदि-आदि. ऐसे विचार रखने वाले कथित प्रेशर ग्रुप के सामने शिक्षा मंत्री का ही क्या, किसी छात्र-संघ के पदाधिकारी का भी इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए. विपक्षी दलों की चाल एक बार फिर सरकारी दृढ़ता के सामने विफल हुई, ये अच्छी बात है. कम से कम पढ़े-लिखे लोगों को इस बात को समझना चाहिए.

 

एक तरफ इसरो जैसी सरकारी, स्थायी नौकरी को छोड़कर 35-36 वर्ष के दो युवकों ने अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान को सिद्ध किया, दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं जिनको कोकरोच बने रहने में गर्व हो रहा है; संसद उखाड़ने के मंसूबे हैं; देश को नेपाल बनाने की मानसिकता है. ऐसे युवाओं में पुलिस की लाठी के साथ-साथ जनमानस के जूते भी पड़ने चाहिए थे.

 

इन्हीं के लिए फिर कहेंगे...

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




03 मार्च 2026

होली पर नए संकल्प

इस होलिका दहन पर अपनी
पुरानी दुश्मनी, पुराने मतभेद,
पुरानी रंजिश, पुराने विवाद,
पुरानी लड़ाई, पुराने झगड़े आदि
जला देंगे, भुला देंगे, मिटा देंगे....

+

अगले दिन से
नई दुश्मनी, नये मतभेद,
नई रंजिश, नये विवाद,
नई लड़ाई, नये झगड़े आदि
याद रखे जायेंगे, निपटाये जायेंगे....

+

#छीछालेदर_रस में भीगने वाले तैयार रहें.





30 नवंबर 2024

चाटुकारिता दिवस

 


आज से एक नए दिवस का आरम्भ. चाटुकारिता दिवस का आयोजन अचानक से नहीं बना बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के साथ ही इसका आयोजन निर्धारित किया गया. ऐसा करने वाले भली-भांति जानते हैं कि चाटुकारिता में किस तरह का आनंद है, किस तरह का स्वाद है. इस स्वाद में, आनंद में वे पूरी तरह से लहालोट होने का मन बना चुके थे. इसमें किसी तरह की कोई कोर-कसर बाकी रखने का, छोड़ने का भी विचार नहीं था.

 

ऐसे में जबकि चाटुकारिता दिवस मनाये जाने का पूरी तरह से मन बना लिया गया हो तो उसके सन्दर्भों पर भी विचार करना स्वाभाविक है. जब इसके पहलुओं पर विचार किया गया तो जानकारी हुई कि ये चाटुकारिता दिवस एकांगी नहीं है, एकपक्षीय भी नहीं है. इसके एक उच्च पदस्थ के प्रति चाटुकार भाव तो था ही साथ ही दूसरे पदस्थ के प्रति भी चाटुकारी को प्रदर्शित करने का भाव छिपा हुआ था. द्विपक्षीय चाटुकारिता निभाने का आयोजन किया गया था किन्तु उच्चस्तरीय प्रक्रिया में अवरोध आने के कारण एक पक्ष की चाटुकारिता असफल हो गई.

 

जिस हेतु सारा चक्र रचा गया, जिस सन्दर्भ में सारे तामझाम बिठाये गए हों, जिसके लिए चाटुकारिता की सभी हदों को पार कर लिया गया हो वही अदृश्य बना हुआ था. जिस आनंद में, जिस स्वाद में लहालोट होने की मंशा थी, वह कहीं किसी भय के वशीभूत दब गई. चाटुकारी का एक पक्ष निराशा के आगोश में जा चुका था किन्तु दूसरा पक्ष अपने आका को खुस करने में, उसकी चाटुकारी में पूरी तन्मयता से संलिप्त था.

 

कहा जा सकता है कि दूसरे पक्ष ने अपने सतत प्रयासों से अपनी चमचई के बल पर अपनी चाटुकारिता की मंज़िल को प्राप्त कर लिया. चमचत्व सफलता-असफलता के बीच झूल रहा है. इसलिए निश्चित रूप से जल्द ही एक और आयोजन होगा.


23 अक्टूबर 2024

लला तुम फिरऊ न माने

कॉलेज टाइम की एक लय याद आ गई...

++++

लला के बब्बा बोले

होए

लला की दादी बोली

होए

लला की अम्मा बोली

होए

लला के बाप बोले

होए

लला बवाली से बचियो

होए

लला तुम रगड़े जैहो

होए

लला तुम फिरऊ न माने

होए

लला तुम अपनी पे अड़ गए

होए

लला तुमने अत्तई धर लई

होए

लला फिर बवाली न मानो

होए

लला वो अपनी पे आ गओ

होए

लला तुम गाली खा गए

होए

लला तुमाई कनपटी सिक गई

होए

लला तुम रगड़ के धर दए

होए

लला तुम चीं न कर पाए

होए

लला तुमाई ऐसी-तैसी

होए

लला अब जूते खैहो

होए

लला तुम अभऊँ मान जाओ

होए

लला तुम हार गए

होएएएएए

++++++++++++++

अब रगड़ाई रोज के रोज


20 जुलाई 2024

एक पौधा माँ के नाम

एक पौधा ‘माँ’ के नाम लगाकर, फ़ोटो-वीडियो बनवा कर, सोशल मीडिया में लाइव चलवा कर, हाथ-पैर फटकार कर महाशय जैसे ही आगे बढ़े वैसे ही हल्की-हल्की हवा चलने लगी. महाशय मुस्कुराए कि माँ ने पौधा स्वीकार लिया.


तभी कहीं से उड़ती हुई एक चप्पल उनकी पीठ पर पड़ी. हल्की हवा आँधी में बदलती सी लगी. आसमान में गड़गड़ाहट सी समझ आई. पलट कर अभी तुरंत लगाये पौधे की तरफ़ देखा.


पीठ पर पड़ी चप्पल की जलन, हवा की तेज़ी, बादलों की गड़गड़ाहट में जैसे ‘माँ’ की तेज आवाज़ सुनाई दी- “पौधा तो लगा दिया, पानी क्या तेरा ‘बाप’ डालेगा?”


पीठ को सहलाते हुए लपक कर पौधे में पानी डालते हुए महाशय अपने बचपन को याद करने लगे. साथ ही अग़ल-बग़ल देखते जा रहे थे कि कहीं से झाड़ू, डंडा तो आकर उन पर न चिपक जाए.

😄

#छीछालेदर_रस भरा मात्र व्यंग्य ही.

 


17 जनवरी 2024

खेलने-कूदने वाली यात्रा

हमारे शहर में किसी समय एक बहुत बड़े धनपति हुए थे. कहते हैं कि उनके यहाँ आगे की पीढ़ी में जब संपत्ति का, धन, जेवरात आदि का बँटवारा हुआ तो तौल कर हुआ था, कई दिन तक ये बँटवारा चला था. बहरहाल, सत्यता जो भी हो, हमने उस दौर को देखा नहीं था इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कह सकते हैं. संपत्ति, जायदाद के बँटवारे में भले एक परिवार के भीतर कई हिस्से बन गए हों मगर अब शहर में एक बड़े धनपति की जगह पर कई-कई बड़े धनपति हो गए थे. उन्हीं धनपतियों की आगे बढ़ती पीढ़ी में से परिचय भी हुआ, उनकी प्रतिष्ठा, वैभव, सम्पदा आदि को देखने का अवसर मिला. देखने के बाद कहा जा सकता है कि एक बड़े धनपति वाकई में बहुत बड़े धनपति रहे होंगे. 




उन बड़े धनपति की आगे आने वाली पीढ़ी के बहुत से लोगों का बाजार पर कब्ज़ा जैसा हुआ करता था. मीटरों क्या किलोमीटरों के हिसाब से बाजार का भाग उनका हुआ करता था. दुकानों की संख्या के बजाय इधर से उधर तक के रूप में गिना जाता था. ये उस दौर की कहानी है जबकि बाजार वैश्वीकरण के कब्जे में नहीं आया था, आर्थिक उदारीकरण का शिकंजा इस पर नहीं था. बाजार के साथ-साथ व्यवहार भी सुचारू रूप से चला करता था. तब धनपति के बच्चों और दुकानदार के बच्चों में फर्क महसूस नहीं हुआ करता था. सभी एकसमान रूप से सड़क पर निर्भीक, निर्द्वंद्व खेल-कूद में व्यस्त रहा करते थे. वाहन आज की तरह नहीं थे, भीड़ आज के जैसी नहीं थी, वैमनष्यता आज के जैसी नहीं थी इसलिए क्या घर का आँगन और क्या बाजार की सड़क, सब एक जैसे हुआ करते थे या कहें कि नजर आते थे.


इसी एक जैसे दिखने वाले वातावरण में कुछ की स्थिति ऐसी हुआ करती थी जो धनपतियों की निगाह में सबसे आगे रहना चाहते थे. उनकी आर्थिक स्थिति ऐसा करने पर मजबूर करती थी तो कभी-कभी धनपति का अति-विशेष होने का लोभ भी ऐसा करवाता था. इसी आगे रहने की कारगुजारी में उनके द्वारा धनपतियों के नन्हे-नन्हे बच्चों को वे अपने प्यार-दुलार के दायरे में लाया करते. उन नन्हे-मुन्नों के लिए वे कभी बाबा हुआ करते, कभी चाचा हुआ करते, कभी भैया हुआ करते. यही स्व-घोषित बाबा, चाचा, भैया कभी घोड़ा बनकर नन्हे-मुन्नों को सड़क पर सैर कराते दिखते, कभी किसी बच्चे का मुक्का खाकर बेहोश होने का नाटक रचते. कभी दौड़ लगाने के खेल में जानबूझकर हारते तो कभी बच्चों के मनपसंद खाद्य पदार्थों की पूर्ति के लिए दौड़ लगाते दिखते. यद्यपि इन सबके पीछे उद्देश्य धनपति की निगाह में आने का रहता तथापि किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं रहती.


अब देखने में आ रहा है कि आजकल भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. एक धनपति परिवार मिल गया है कुछ लोगों को, उस धनपति परिवार में से एक युवराज भी बना डाला है इन्हीं लोगों ने. अब ऐसे लोग मिलकर उसके साथ खेल-कूद में व्यस्त हैं. कभी वह नन्हा युवराज किसी जोड़-घटाने की यात्रा पर निकलता है तो कभी न्याय माँगने चल पड़ता है. यह सब धनपति परिवार में निगाह में बने रहने वाले दुकानदार आयोजित करते हैं. मासूम युवराज किसी बाबा, किसी चाचा, किसी भैया की पीठ पर बैठकर उसे घोड़ा समझ दौड़ाता है; कभी किसी के पेट पर मुक्का मारकर उसका झूठमूठ गिरता देखकर खुश होता है. ये समझना कठिन होता जा रहा है कि यहाँ ऐसी तमाम यात्राओं में युवराज खेलने का आनंद उठा रहा है या फिर वे कथित दुकानदार जो किसी भी चुनाव में आने के पूर्व सक्रिय हो जाते हैं?





 

03 दिसंबर 2023

डाइट का छीछालेदर रस

कम खाने के बाद भी वजन लगातार बढ़ने के कारण डॉक्टर से मिलकर बताया,

डॉक्टर साहब, दिन में दो-तीन बजे क़रीब भोजन करते समय सिर्फ़ एक ही रोटी खाता हूँ फिर भी वजन लगातार बढ़ रहा है.


डॉक्टर ने कहा,

दिन भर में एक ही रोटी खाना सही नहीं. सुबह नाश्ता किया करो. अन्यथा दिक़्क़त हो जाएगी.


इस पर डॉक्टर को बताया,

नाश्ता तो करते हैं. चार अंडे का आमलेट, दो पराठे, आधा लीटर दूध. पिछली बार आपने कम रोटी खाने को बोला था तो अब एक ही खाते हैं.

 

डॉक्टर भी इस डाइट के छीछालेदर रस को समझ न सका.


04 नवंबर 2023

लातों के भूत बातों से नहीं मानते

एक कहावत बचपन से सुनते चले आ रहे कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते. इस कहावत में दो बातें बहुतों को पसंद नहीं आती. इनमें एक तो है लातों और दूसरा है भूत. ऐसा अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह रहे. ऐसे लोग दिखावे के लिए आदर्शवादी बनते हैं और उसके साथ-साथ कुछ लोग महाज्ञानी. इन लोगों के लिए लातों का सन्दर्भ यहाँ हिंसा से लिया जाता है, ज़ाहिर सी बात है कि आदर्शवाद का ढोंग करने वालों के लिए, अहिंसा को लेकर भाषण फेंकने वालों के लिए किसी भी तरह की हिंसा में विश्वास नहीं. अब जब बात लातों से समझाने की होगी तो इन लोगों को कष्ट होगा ही. इसी तरह भूत-प्रेत जैसी किसी भी शब्दावली पर विश्वास न करने वाले भी इस कहावत के भूत शब्द से आपत्ति जताते हैं. उनके लिए ऐसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं. अब भूत अस्तित्व में है या नहीं, इसे तो हम स्वयं भी नहीं कह सकते क्योंकि अभी तक ऐसा कोई मेल-मुलाकात का अनुभव नहीं रहा. ऐसा ही कुछ अनुभव भगवान, ईश्वर जैसी चीज से है. मेल-मुलाकात उससे भी नहीं है, बावजूद इसके बहुत सारे लोग इसका अस्तित्व स्वीकारते हैं.




बहरहाल, ऐसे लोगों की बातों को ऐसे लोगों के पास ही रहने देते हैं और आगे चलते हैं हम अपनी बात पर. इतनी बात तो बस एक दिन बात की बात में निकल आई थी, आज भी निकल कर आई तो सोचा कि कह ही डालें. ये लातों वाले भूत जिन्दा भूत हैं जो अपनी लातों का इस्तेमाल करते हैं चलने के लिए और दूसरे अपनी लातें इस्तेमाल करते हैं इन पर गिराने के लिए. ऐसे लोग आमजीवन में हम सबके करीब, हम सबके आसपास पाए जाते हैं. इनके क्रियाकलाप, इनकी कार्यपद्धति संतोषजनक नहीं होती है. ऐसे लोग खुद को सबसे अलग और सबसे बुद्धिमान समझते हैं. ऐसे ही एक महाशय हमारे आसपास भी आजकल पाए जा रहे हैं. समय ने कुछ ऐसा चक्र चलाया कि इन महाशय को बैठे-बिठाये सत्ता हाथ लग गई. यहाँ उन महाशय का नाम, दायित्व जानबूझकर नहीं खोला जा रहा है. ऐसा नहीं कि ऐसा करने से हम डरते हैं, किसी कानूनी प्रक्रिया से या किसी विधिक कदम से बल्कि ऐसा करने के पीछे हमारी व्यक्तिगत सोच है. हमारा मानना है कि कुछ लोग लातों के भूत होने के साथ-साथ बिल्ली का गू भी होते हैं, जिसके द्वारा न तो घर-आँगन को लीपा-पोता जा सकता है और न ही उससे कंडे पाथे जा सकते हैं.


ऐसे ही एक बिल्ली के गू को जब लातों की सेवा करने का सन्देश भिजवाया तो तीन महीने से रुका हुआ काम आनन-फानन मात्र दो दिन में हो गया. ऐसा नहीं कि अगले के पास सिर्फ लातों वाला सन्देश भिजवाया हो, बल्कि बातों के द्वारा भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समझाने की भरपूर कोशिश की. इसके बाद भी अगला सिर्फ लातें खाने के मूड में ही दिखा. बहरहाल, अब समस्या का हालिया समाधान होने के आसार बन गए हैं. लातों के भूत लातों की वास्तविकता को जान चुके हैं. इसके आगे की कहानी दो-चार दिन बाद.

 






 

28 मार्च 2023

प्याज भी खाए और जूते भी

कभी-कभी कुछ लोग सयाना बनने-दिखाने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही सयानापन दिखा जाते हैं और फिर हाल ये होता है कि वे कहीं के नहीं रहते हैं, हँसी का पात्र बनते हैं, सो अलग से. ऐसे लोगों के सम्बन्ध में एक कथा बड़ी प्रचलित है, जिसके अनुसार कहा जाता है कि प्याज भी खाया, जूते भी खाए और अंत में रुपये भी देने पड़े. इसके पीछे की जो कहानी है वो है तो बहुत छोटी सी मगर बड़ी ही रोचक है.

 

ऐसा कहा जाता है कि किसी समय में एक राज्य में एक अपराधी को किसी अपराध के लिए पकड़ा गया. वहाँ के नियमानुसार उसे दंड के लिए राजा के सामने पेश किया गया. जिस तरह का अपराध उस अपराधी का था, उसे देखते हुए राजा ने सज़ा सुनाई कि वह व्यक्ति सौ प्याज़ खाए या सौ जूते या फिर सौ रुपये दंड स्वरूप कोष में जमा करे. अपराधी को ये अवसर दिया गया कि वह अपने मनमाफिक सजा को चुन ले.

 

अपराध करने वाला व्यक्ति खुद को बहुत ही सयाना समझता था. उसने सोचा कि आखिर सौ रुपये क्यों बेकार में खर्च किये जाएँ. वह रोज ही भोजन में चार-छह प्याज खा लेता है, तो धीरे-धीरे खाते हुए सौ तो खा ही लेगा. उसे सौ जूते खाने या सौ रुपये देने से ज्यादा आसान प्याज़ खाना लगा. ऐसा सोच कर उसने सौ प्याज़ खाने की सज़ा चुन ली. अभी वह दस-बारह प्याज़ प्याज ही खा सका था कि उसकी कड़वाहट से मुँह में जलन होने लगी. उसके लिए अब एक और प्याज खाना बहुत ही मुश्किल समझ आ रहा था. उसे लगने लगा कि यदि अब एक और प्याज खाया तो मर जायेगा.

 

अब उसने विचार किया कि इससे बेहतर है कि जूते खा लिए जाएँ तो उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएँ. अभी उसको दस-बारह जूते ही पड़े होंगे कि वह दर्द से बिलबिला उठा. अगले पल उसे लगा कि प्याज या जूते खाने से कहीं ज्यादा सहज है कि सौ रुपये दंड के तौर पर कोष में जमा कर दिए जाएँ. जूते मारने वाले से उसने विनती करके जूते न मारने को कहा और झटपट जेब से सौ रुपये निकाल कर जमा कर दिए.

 

सयानेपन के चक्कर में उस अपराधी ने प्याज भी खाए, जूते भी खाए और अंत में उसे सौ रुपये देने पड़ गए. 





 

02 अगस्त 2022

नंगत्व के पीछे की तार्किकता

एक अगले ने बिना कपड़ों के कुछ फोटो क्या दिखा दीं, सबके आदर्श सामने आ गए. अरे समझो-सीखो कुछ. परिधानयुक्त समाज में परिधान-मुक्तता अपने आपमें एक आन्दोलन है. आदिमानव ने जितनी मेहनत के बाद वस्त्रों का निर्माण करके मनुष्य को परिधानयुक्त बनाया, मानव ने उतनी ही सहजता से स्वयं को वस्त्र-विहीन करने का कदम उठाया. इस वस्त्र-विहीनता को भी विभिन्न तरीके से, विभिन्न विद्वतजनों ने, विभिन्न परिभाषाओं में आबद्ध किया है. पूर्णतः वस्त्र-विहीन विचरण करने वालों को जानवर की संज्ञा से सुशोभित किया गया. 


इसी प्रकार से एक अन्य प्रजाति है, जो वस्त्र-युक्त होते हुए भी गाहे-बगाहे वस्त्र-विहीन होने की कोशिश करती है. कलाकारों की श्रेणी में विचरण करता यह नग्न प्राणी स्वयं वस्त्र-मुक्त होकर खुद को मॉडल के रूप में प्रदर्शित करता है. इन्हीं के बीच कभी-कभी एक ऐसी भी प्रजाति देखने को मिल जाती है जो परिधानों से सुसज्जित होने के बाद भी परिधान-विहीन दिखाई देती है. इस प्रजाति के लिए परिधानों का होना, न होना एक समान भाव में होता है. इसके परिधान कभी अपने आप ढलक जाते हैं, तो कभी-कभी इनके उठने-बैठने से इनको परिधान-विहीन बना देते हैं. ये अत्यंत उच्च श्रेणी की प्रजाति होती है जो पेज थ्री पर शोभायमान होती है. इसके लिए परिधान-विहीन होना स्टेटस सिम्बल माना जाता है.




वस्त्र-विहीनता की इन स्थितियों को सभ्यता का मुलम्मा चढ़ाकर नग्न, अर्द्ध-नग्न, टॉपलेस आदि-आदि के नामों से पुकारा-पहचाना जाता है, वहीं आम, अनौपचारिक बातचीत में ये सभी वस्त्र-विहीन प्रजातियाँ ‘नंगे’ ही कहे जाते हैं. कई बार लगता है कि वस्त्र-विहीन होने को आतुर प्रजातियों को, वे चाहे स्त्री हों या पुरुष, प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है. समाज का बहुत-बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो समूची देह को वस्त्रों के बंधन में रखता है. प्राकृतिक आबो-हवा से दूर रखना भी देह के साथ ज्यादती ही है और किसी भी देश का कानून किसी की भी देह के साथ ज्यादती करने की अनुमति नहीं देता है.


समस्या इनके वस्त्र-विहीन होने में नहीं बल्कि लोगों की सोच में है. कभी कुछ किया हो खुल्लमखुल्ला, तब तो उसका मजा समझें. अरे लोग क्या जानें खुलेआम कुछ भी करने का मजा. ये उस ज़माने की संतानें नहीं जो घनघोर बंदिश में रहती थीं. ये तो उस ज़माने में जन्मे हैं जहाँ खुलापन ही इसकी विशेषता है, जहाँ आधुनिकता में रचे-बसे दिखना ही इनकी महानता है, जहाँ पर्दों को फाड़ देना, बंदिशों को तोड़ देना इनकी खासियत मानी जाती है. ये समझे बिना लोगों को जब देखो शुरू हो जाना है सभ्यता, संस्कृति, शालीनता, अश्लीलता, आधुनिकता का लेक्चर देने. ये करना सही है, वो करना गलत है; ये करने से संस्कृति खतरे में पड़ेगी, वो करने से संस्कृति का विकास होगा; ये करना शोभा नहीं देता, वो करना सही है. क्या यार! हर बात में नुक्ताचीनी, हर काम में टांग अड़ाना, कभी तो फ्री होकर कुछ करने दिया करो.


अरे, बेवजह नुक्ताचीनी करते लोगों को इनके इस काम में नग्नता, अश्लीलता, नंगई दिखाई देती है. मैदान में, पार्क में, बाज़ार में, मॉल में, पार्टी में, पब में, बार में, स्कूल में, ऑफिस में, सड़क में, मेट्रो में, बस में, ट्रेन में, कार में, बाइक में... जहाँ भी जैसे भी हो इनको नंगई दिखाने का मौका मिल ही जाता है. अब ये मौके का इंतज़ार नहीं करते बल्कि मौके इनके इंतज़ार में बैठे होते हैं.


वैसे देखा जाये तो ये लोग कहीं न कहीं अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं. आखिर हम सभी लोग मानते हैं कि इंसान आधुनिक होते जाने के चलते अपनी जड़ों से कटता जा रहा है. ये तमाम प्रजातियाँ भले ही मॉडलिंग के नाम पर, भले ही कलाकारी के नाम पर, भले ही कलात्मकता के नाम पर वस्त्र-विहीन ही क्यों न हो रही हों किन्तु अपनी जड़ों से समाज के बहुसंख्यक वर्ग को जोड़ने का कार्य कर रही हैं. परिधान के बंधनों से परिधान-मुक्तता की ओर बढ़ता, आधुनिकता से अपनी जड़ों की ओर लौटता इनका आन्दोलन सफलता की राह पर अग्रसर है. आखिर इन्हीं जैसे चंद लोग संस्कृति, सभ्यता का नित्य ही बलात्कार कर पाशविकता को जन्म दे रहे हैं. काश! परिधान इनको बंधन का नहीं अलंकरण का पर्याय समझ आता?


.


04 अक्टूबर 2020

ईर, बीर, फत्ते की सोशल मीडिया की कहानी

एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
बीर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
फत्ते बोले चलो शिकार कर आबें,
हमऊँ बोले हाँ चलो शिकार कर आबें.

ईर ने मारी एक चिरैया,
बीर ने मारी दो चिरैयाँ,
फत्ते मारे तीन चिरैयाँ,
और हम???? हम मारे एक चुखरिया.


हा हा हा....हा हा हा.... हा हा हा...
अबे चुप......... का समझे हो, चुखरिया मारबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.



समय बदला, ईर, बीर, फत्ते की कहानी भी बदली. एक दिन ईर, बीर, फत्ते ने कुछ अलग ही कहानी गढ़नी शुरू कर दी. 


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.


ईर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
बीर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
फत्ते बोले चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
हमऊ कहा चलो सोशल मीडिया पर आया जाए.

ईर बनाए अपना प्रोफाइल,
बीर बनाए अपना प्रोफाइल,
फत्ते बनाए अपना प्रोफाइल,
और हम???? हम तो अभै साइनइन करबे में लगे रहे.

हा हा हा..... हा हा हा...... हा हा हा....
अबे चुप..........दूसरे की आई डी हैक कर साइन इन करबो आसान है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो कछु लिखो जाए,
बीर कहें चलो कछु लिखो जाए,
फत्ते बोले चलो कछु लिखो जाए,
हमऊ कहा चलो कछु लिखो जाए.

ईर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
बीर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
फत्तेऊ लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
और हम???? हम लिखे खाली टाइटिल.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप..........पूरी पोस्ट पढ़ता कौन है, सबईं टाइटिलई तो देखत हैं.


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
बीर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
फत्ते बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
हमऊ बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ.

ईर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
बीर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
फत्तेऊ ने बटोरी खूबईं लाइक-कमेंट,
और हम???? हमाई पोस्ट रह गई निपट खाली-छूँछी.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप.......बिना लाइक-कमेंट मिले भी बराबर लिखत रहबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 जुलाई 2020

मुंडी न मटके और काम भी हो जाए

कुछ लोग नमस्कार करते समय अपनी गर्दन, सिर को इतना ही हिलाते हैं कि बस उसके मन को मालूम चलता है कि नमस्कार की गई।


बेचारी गर्दन और बेचारे सिर को तो पता ही नहीं चल पाता कि उनके मालिक ने किसी को नमस्कार करने में उनका दुरुपयोग कर लिया।

जिसको नमस्कार की गई उसकी जानकारी की बस कल्पना करिए।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

(आज मूड नहीं कुछ लिखने का, गंभीर टाइप, सो बस इतना ही... शेष कल)

21 मई 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 


आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.


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20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया.

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है), पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँ, किसी को यदि कोई विशेष उपाधि, सम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.

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04 मई 2020

जलेबियाँ बनी लॉकडाउन काल की वायरस

आँख खुलते ही श्रीमती जी को चाय के लिए आवाज़ लगाई. सुबह से तीसरी बार आँख खुली है. लॉकडाउन के कारण न सुबह का समय रह गया और न रात का. रात को जल्दी सोने की कोशिश में देर रात तक बिस्तर पर जाना हो पाता है. जल्दी सोने की कोशिश इसलिए क्योंकि सुबह जल्दी उठकर फिर सोना होता है. लॉकडाउन कुछ और करवा ही नहीं रहा. बस सो जाओ, जाग जाओ, फिर सो जाओ, फिर जाग जाओ. इसी सोने-जागने के बीच में खाना-पीना भी हो जाता. समझने वाली बात है, पीना-खाना नहीं हो पा रहा था, बंदी के कारण. बस खाओ और पियो. कभी पानी, कभी चाय.


कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन में घरबंदी में दिन-रात आराम से गुजर रहे थे. लोगों को लग रहा था कि वे संक्रमण से बचे हुए हैं मगर ऐसा नहीं था. कोरोना से ज्यादा खतरनाक वायरस लॉकडाउन में भी घर के अन्दर घुस चुका था. यकीन नहीं आपको? देखिएगा अपने आसपास, कहीं आप भी तो उस वायरस की चपेट में तो नहीं आ गए? ये वायरस है जलेबियाँ बनाने का. चौंक गए न? आप भी संक्रमित हैं क्या इससे?


लॉकडाउन में घर के पलंग तोड़ते, सोफों का आकार बिगाड़ते, कुर्सियों को रुलाते हुए सोशल मीडिया का जमकर दोहन किया जा रहा है. इसी में जलेबी वायरस ने घुसकर सबको संक्रमित कर दिया. जिसे देखो वो जलेबियाँ बनाने में लगा हुआ है. अरे बनाने को और भी बहुत कुछ है. पूरी बना लो, रोटी बना लो, सब्जी बना लो, बहुत ज्यादा क्रिएटिव करने का मन है तो हलवा बना लो, खीर बना लो, रायता बना लो मगर नहीं, जनाब बनायेंगे तो जलेबी ही. समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा कैसा जलेबी-प्रेम है इनका कि महीने, दो महीने रुका न जा रहा. ऐसा लग रहा जैसे रोज जलेबी ही खाते रहे हैं. ठीक है भाई, बनाना है खूब बनाओ, खाना है खूब खाओ पर क्या जरूरी है उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने की. पर नहीं, खुद तो मौज ले नहीं रहे, दूसरों को मौज में जीने नहीं दे रहे.

समझ नहीं आ रहा था कि लोग संक्रमण से बचने के लिए अपने घरों में कैद हैं या दूसरों के घरों में कलह पैदा करने के लिए? लॉकडाउन में पकवान, व्यंजन बनाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो ये लॉकडाउन वीर हलवाइयों का, रेस्टोरेंट वालों का, छोटे-मोटे खोमचे वालों का व्यापार बर्बाद करवा के ही मानेंगे. अरे करमजलो, ध्यान रखो, ये लॉकडाउन तुमको कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लाया गया है हलवाइयों का व्यापार चौपट करने के लिए नहीं, लोगों की शांत ज़िन्दगी को तहस-नहस करने के लिए नहीं.

अभी तक तो ठीक था पर इस जलेबी वायरस ने आकर सब छिन्न-भिन्न कर दिया. घर में जलेबी वायरस ने अपनी घुसपैठ कर ली. कोरोना वायरस से बचाव का तरीका लॉकडाउन या फिर क्वारंटाइन तो है मगर इस जलेबी वायरस से बचने का कोई तरीका नहीं. इसका सोर्स भी हमने पता कर लिया. सोर्स भी अपने ख़ास हैं जो रोज पता नहीं किस तकनीक से जलेबी बनाकर अपनी भाभी जी को भेजकर हमारे जी का जंजाल बनाये देते हैं.

अब कोस रहे उस पल को जब हमने अपने दोस्तों को सपत्नीक एक ग्रुप से जोड़ते हुए सबके बीच प्रेम, समन्वय, स्नेह पैदा करने का विचार किया था. आज उसी ग्रुप में हमारे सबसे आलसी, नाकारा मित्र का वीडियो पड़ा था, जलेबी वायरस से संक्रमित होने का. जब तक ये वीडियो नहीं आया था तब तक तो इस जलेबी वायरस से किसी न किसी तरह खुद को बचा रखा था मगर आज इसने अपनी तीव्रता दिखा ही दी.

आँख खोलते ही जैसे चाय की माँग हुई वैसे ही धमाका हुआ पहले जलेबी बनाने का. पलंग से गिरते-गिरते बचे. ये कहो कि कुर्सी पर या सोफे पर नहीं थे वर्ना गिर ही जाते. सामान के न होने, खमीर न उठने की, तकनीक न जानने की तमाम दवाओं का सहारा लिया मगर जलेबी वायरस ने पूरी तरह से श्रीमती जी को अपनी गिरफ्त में ले रखा था. सब कुछ तैयार है, बस जलेबी बनाना भर है का फरमान सुनाया गया. इसके साथ ताना ये मारा गया कि जब आपके ये मित्र बना सकते हैं तो आप काहे सकुचा रहे?

हमें अपने मित्र की काबिलियत पर भरोसा था सो वीडियो को कई-कई बार देखा. याद आ गया कि पिछले साल उसके घर में किसी कार्यक्रम के दौरान जलेबी बनाते हलवाई को अलग कर उसने बनी-बनाई जलेबी के साथ अपना वीडियो बनवाया था. श्रीमती जी को हकीकत बताते हुए बहुत समझाया कि ये खाना बनाने आया हलवाई बना रहा है न कि हमारा दोस्त मगर जलेबी वायरस के संक्रमण ने उन्हें नहीं छोड़ा.

आज की चाय और भोजन जलेबी बनने के बाद ही के अल्टीमेटम के बाद तो हमें वेंटिलेटर पर चढ़ाने जैसे हालात बन गए. जलेबी वायरस से बचने के लिए, लॉकडाउन में एक और लॉकडाउन झेलने के तनाव से बचने के लिए हामी भर दी. किचन से श्रीमती जी के द्वारा चाय बनाने की खटर-पटर सुनाई देने लगी और हम गुस्से में मोबाइल के द्वारा उस नामाकूल मित्र को ग्रुप में कोडवर्ड के द्वारा और पर्सनल पर सीधे-सीधे भयंकर-भयंकर वाली गालियाँ टाइप करने लगे.

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26 अप्रैल 2020

फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?

कुछ लोगों की आदत होती है दूसरे की नक़ल करने की. उनके जैसी हरकतें करने की. दूसरों की देखा-देखी वैसे ही काम करने की. इस चक्कर में बहुत बार नकलची को मुँह की खानी पड़ जाती है. नकलचियों द्वारा जब ऐसा कदम उठा लिया जाता है, तब उन्हें आभास होता है कि वे कर क्या गए. बिना बिचारे काम कर जाना, कदम उठा जाना और फिर पछताना. इसका परिणाम यह होता है कि नकलचियों को भुगतना पड़ता है क्योंकि पछताने का कोई फायदा नहीं होता है.


इस बारे में आज कुछ कहने का विचार नहीं. एक चुटकुला जैसी कथा याद या गई, आप लघुकथा भी कह सकते हैं उसे. उसी को पढ़िए और आनंद लीजिये.


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एक हवाई जहाज आसमान में अपनी रफ़्तार से उड़ान भर रहा था. उसके अन्दर सभी सवारियाँ अपने-अपने में मगन गंतव्य तक पहुँचने का इंतजार भी कर रही थीं. उन्हीं सवारियों में एक तोता भी बैठा हुआ था. किसी बड़े रंगबाज़ का तोता था सो उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए हवाई यात्रा का सहारा लिया गया था.

बहुत देर से अन्दर बैठे-बैठे वह तोता ऊबने लगा. जब उसे कुछ समझ नहीं आया तो उसने सीट के सामने लगा स्विच दबा दिया. अगले ही पल एयर होस्टेस उपस्थित हुई और बोली, जी सर. क्या सेवा कर सकती हूँ?

तोता मुस्कुराया और बोला, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस को बुरा लगा मगर यात्री का सम्मान करते हुए वह वापस लौट गई. कुछ देर बाद उस तोते ने फिर से स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई, फिर वही सवाल किया. तोते ने भी वही जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस फिर वापस लौट गई.

तोते को ऐसा करते देख बगल वाले एक ठरकी यात्री ने पूछा, ये क्या कर रहे हो?

तोता बोला, बहुत मौज आती है. करके देखो.

अब उस ठरकी यात्री ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई और अपना सवाल दोहराया. अबकी यात्री ने तोते वाला जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ. एयर होस्टेस को बहुत गुस्सा आया.

अब वो तोता और ठरकी यात्री मिलकर ऐसा करने लगे. उन दोनों ने दो-तीन बार ऐसा फिर किया तो एयर होस्टेस ने पायलट से शिकायत की. पायलट ने कहा, अगली बार दोनों ऐसा करें तो जहाज के बाहर फेंक देना.

बस, फिर क्या था. जैसे ही तोते और ठरकी ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस के आने पर जवाब दिया कि कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहे. एयर होस्टेस ने दोनों को बाहर फिंकवा दिया.

अब वे दोनों जहाज से बाहर आसमान में थे, बिना पैराशूट के. तोता बहुत जोर से हँसा और बोला, क्यों प्यारे, उड़ लेते हो?

ठरकी यात्री बोला, नहीं.

तोता और तेज हँसा और बोला, फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?



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28 जनवरी 2020

दिल की नागरिकता के लिए भी बने एक नागरिकता कानून


अपने कॉलेज में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर होने वाले कार्यक्रम में विचार रखना हैं, इसी सन्दर्भ में नेट पर इधर-उधर कुछ वेबसाइट को उलटा-पलटा जा रहा था. कई-कई बिंदु एक जैसे ही मिले और उनका सार यही निकला कि 30 दिसम्बर 2014 तक जो अवैध प्रवासी देश में आ चुके हैं, यदि वे नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं तो उनके प्रार्थना-पत्र पर सरकार विचार करेगी. इसके साथ-साथ मुख्य रूप से जो बिंदु इसमें सर्वाधिक विवाद का विषय बना हुआ है वह है कि छह गैर-मुस्लिमों को ही देश में नागरिकता के लिए पात्र माना गया है. इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारत में नागरिकता नहीं दी जाएगी. संशोधनों में यह भी शामिल किया गया है कि अब ऐसे प्रवासी शरणार्थी बारह वर्ष की जगह मात्र छह वर्ष रहने के बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र हो जायेंगे. इसके अलावा और भी अनेकानेक बिंदु हैं जो इस कानून के साथ जुड़े हुए हैं.


नागरिकता संशोधन कानून के प्रावधानों को पढ़ते समय महसूस हुआ कि ऐसा कोई कानून दिल सम्बन्धी मामलों के लिए भी होना चाहिए. किसे दिल के मामले में घुसपैठ करनी है, कौन दिल के मामले में नागरिकता का आवेदन करेगा, कितने वर्ष दिल में रहने के बाद कौन आवेदन का पात्र होगा, किसे दिल सम्बन्धी मामलों के लिए आवेदन का, नागरिकता लेने का अधिकार नहीं होगा यह सबकुछ कानूनी रूप से निर्धारित होना ही चाहिए. दिल का हाल भी अपने देश के जैसा कर दिया है. जिसे देखो वह मुँह उठाये चला आता है और आने के बाद वह यहीं की नागरिकता का दावा भी करता है. ऐसे में समस्या दिल के मालिक को नहीं वरन उसे अवश्य होती है जो दिल की नागरिकता पहले से हासिल किये है. ऐसे में विवाद होना ही होना है. यहाँ एक बात और प्रमुख है जो सभी विवादों की जड़ में है और वो है पहली नजर का मिलना, उसका आकर्षण होना. दिल के मामले में आँखों को अहमियत देने का दुष्परिणाम यही होना था. आँखों का क्या है, सुबह से शाम तक सैकड़ों से मिलती-जुलती हैं, उनकी आँखों में आँखें डाल कर बातें करती हैं, ऐसे में पहली नजर का आकर्षण हो जाना कोई आश्चर्य नहीं.

अब जबकि पहली नजर के आकर्षण को, प्रेम को स्वीकारोक्ति मिली है तो इसका सीधा सा मतलब है कि उसके लिए किसी न किसी ने एक कानून बना रखा है. अब ऐसे कानून का लाभ उठाकर ये पहली नजर वाले सीधे दिल में अपनी नागरिकता के लिए सक्रिय हो जाते हैं. यहाँ मुश्किल तो ये हो जाता है कि जो वर्षों से दिल की नागरिकता लिए बैठा है उस पर ये पहली नजर वाले ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं. इसका कारण ये है कि जो स्थायी रूप से अपनी नागरिकता लेकर बैठा है वह संख्याबल में कम है और इसके उलट पहली नजर वालों की संख्या तो रोज ही बढ़ जाती है. ये संख्या घुसपैठिया रूप में बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में अराजकता फैलनी ही है. पहली नजर वालों को एकजुट होकर उपद्रव करना ही है. इस उपद्रव में रोज वे भी शामिल हो जाते हैं जो उस दिन के पहली नजर वाले होते हैं. ऐसे में दिल को किसी तरह के उत्पात से बर्बाद होने से बचाने के लिए कोई न कोई कानून अपेक्षित है. ऐसा इसलिए भी जल्दी किया जाना चाहिए क्योंकि देरी होने की स्थिति में कोई जहीन काण्ड, हसीन बाग़ हो गया तो स्थायी नागरिकता वालों को मुश्किल हो जाएगी. आखिर पहली नजर वाले घुसपैठिया रोज ही बढ़ते जा रहे हैं.

31 मार्च 2019

क्लोजिंग उत्सव का आयोजन


मार्च माह का अंतिम दिन है. देश भर में सभी कार्यालयों में अपनी तरह से क्लोजिंग मनाई जा रही है. देश में इसे भी एक उत्सव की तरह से मनाया जाता है. कई-कई कार्यालयों में, सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों में हफ़्तों पहले से इस आयोजन को मनाया जाने लगता है. लोगों की भागदौड़, व्यस्तता, शारीरिक-मानसिक हालत ऐसी दिखती है जैसे कि सम्पूर्ण देश के विभागों की क्लोजिंग का काम इन्हीं को दिया गया है. यह अस्त-व्यस्त भाव-भंगिमा किसी के सामने ही दिखती है, किसी जिम्मेवारी को उठाने से बचने के लिए दिखती है. आमतौर पर ऐसे लोग सुबह अपने उसी पूरे इत्मिनान से उठते हैं जैसे कि अन्य सामान्य दिनों में उठा करते हैं. उसी तरह की रेंगती-घिसटती दिनचर्या के साथ अपने ऑफिस के लिए निकलना होता है, जैसे कि आम दिनों में होता है. इन दिनों चूँकि क्लोजिंग के आयोजन का विशेष महत्त्व दर्शाना होता है, इस कारण इन्हें भी कुछ अलग सा दिखना होता है. ऐसा दिखाई देना मजबूरी भी कही जा सकती है क्योंकि क्लोजिंग आयोजन से जुड़े लोग विशेष ही होते हैं. हरेक के भाग्य में क्लोजिंग आयोजन से जुड़ना नहीं लिखा होता है.


क्लोजिंग का आयोजन उनके लिए महत्त्वपूर्ण होता है जो किसी न किसी रूप में आर्थिक क्षेत्र से जुड़े होते हैं. ऐसे लोगों में जिन-जिन की किस्मत में धन-सम्पदा जुड़ी होती है वे इन दिनों उसे खपाने के पूरे तरीके उपयोग में लाते दिखते हैं. वर्तमान में रहते हुए कैसे अतीत की यात्रा की जा सकती है, कैसे अतीत को वर्तमान में खड़ा किया जा सकता है, इसका उदाहरण इसी समय देखने को मिल जाता है. कैसे जो काम नहीं हुए वे भी कागजों में संपन्न हो जाया करते हैं. कैसे जिन कामों के लिए कोई लगाया तक नहीं गया उनके भुगतान हो जाया करते हैं. कैसे प्रकृति की चाल को रोकते हुए दिन-रात का भेद इन दिनों समाप्त कर दिया जाता है. क्लोजिंग आयोजन में बहुत से लोगों को महारथ हासिल होती है. वे न केवल अपने विभाग की वरन दूसरे कई अन्य विभागों तक की क्लोजिंग करवाने का ठेका अपने हाथ में लेते हैं. इस ठेके की गंभीरता देखिये कि वे न केवल अपने विभाग के क्लोजिंग उत्सव को सम्पूर्ण सफलता से आयोजित करते हैं बल्कि दूसरे सभी विभागों के क्लोजिंग उत्सव को भी सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ा आते हैं. इस तरह के उत्सवधर्मी लोगों का अपना ही महत्त्व होता है जो मार्च के महीने में ही सबके सामने आता है अन्यथा की स्थिति में ऐसे लोग वर्ष भर स्लीपर सेल की भांति सामान्य सा जीवन गुजारते रहते हैं.

अबकी क्लोजिंग उत्सव का आना बड़े ही शुभ मुहूर्त में हुआ है. ऐसे स्लीपर सेल इस समय बहुत ही शिद्दत से याद किये जा रहे हैं. इसका कारण है कि इसी समय देश अपने सबसे बड़े संवैधानिक आयोजन में व्यस्त है. चुनावी आयोजन के कारण सबके सभी प्रकार के उत्सवों पर ग्रहण सा लग जाता है मगर इस बार क्लोजिंग होने के कारण ऐसे सफेदपोश जिनकी निधियां अभी तक कुछ जीवित अवस्था में पड़ी-पड़ी कोमा का शिकार होने जा रही थीं, वे इस क्लोजिंग उत्सव में कुछ साँस लेती दिखाई देने लगी हैं. इस उत्सव के महारथियों ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र निकाल कर उमने धार लगाना शुरू भी कर दिया था. ऐसा उसी दिन से होने लगा था जैसे ही आदर्श आचार संहिता का लगना हुआ था. आखिर ऐसे समय में वर्तमान को, भविष्य को पीछे धकेलते हुए अतीत में ले जाना होता है. जाने कितने-कितने वे काम जो अब कागजों में ही समेटे जाने हैं उनको सम्पूर्ण करवाना होता है. पूरी ईमानदारी के साथ बेईमानी की क्लोजिंग करवानी होती है. चुनावी दौर में जहाँ एक तरफ निधिदार अपने-अपने प्रचार में लगे हैं तो उनके सिपहसालार उनके पीछे क्लोजिंग उत्सव के सफल आयोजन के लिए कृत-संकल्पित हैं. 

यही विशेषता है इस लोकतंत्र की. क्लोजिंग भी पूरी ईमानदारी से निपट जानी है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा आयोजन भी निपट जाना है. दोनों जगह सभी के खाते अपनी-अपनी तरह से निपटाए जाने हैं. दोनों जगह कुछ के खाते बंद किये जायेंगे, कुछ के खाते लाभ में रहेंगे, कुछ घाटे का शिकार हो जायेंगे. अंततः दोनों ही जगह फिर एक बार वही पुराना ढर्रा चालू हो जायेगा. लाभ वाला और लाभ के लिए मारा-मारी करने लगेगा. घाटा वाला लाभ की तरफ जाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाने लगेगा. खातों के एक-दूसरे में विलय होना शुरू हो जायेगा. सबकुछ फिर वैसे ही होने लगेगा, जैसे कि सामान्य दिनों में होता रहता है. बस इस क्लोजिंग के उत्सव के समय सक्रिय लोग फिर सुसुप्तावस्था में चले जायेंगे. वे फिर से क्लोजिंग उत्सव के समय ही याद आयेंगे, भले ही वो क्लोजिंग विभागों के आर्थिक खातों की हो या फिर देश की संवैधानिक व्यवस्था वाले खाते की.