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10 जनवरी 2026

भारत के लिए भावी बांग्लादेश : मित्र या शत्रु?

उथल-पुथल वाली खतरनाक स्थिति के बाद से बांग्लादेश अराजक ही बना हुआ है. वहाँ के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों, हमलों, उनकी हत्याओं के चलते ऐसा लग रहा है कि वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाये जाने के बाद बनी अंतरिम सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. आन्दोलन, हिंसा, अराजकता के लम्बे दौर के बाद अब बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं. वहाँ के चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए बताया कि देश में 12 फ़रवरी को राष्ट्रीय चुनाव होंगे. यहाँ विशेष बात यह भी है कि इसी दिन देश में जनमत संग्रह भी होगा. यह चुनाव बांग्लादेश में हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहली बार होने जा रहे हैं.

 

यद्यपि बांग्लादेश में चुनावों की घोषणा से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगी है तथापि वर्तमान हालातों को देखते हुए उम्मीद की किरण पर संकट के बादल भी मँडराते नजर आ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति लम्बे समय से टकराव वाली रही है. वहाँ हमेशा से ही सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष चलता रहा है. मुख्य दलों में से एक का कट्टरपंथ की तरफ झुकाव होने, भारत के प्रति नकारात्मक भाव रखने और दूसरे का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास होने, भारत के प्रति सद्भाव रखने के कारण वहाँ वैचारिक विभेद भी खुलकर सामने आता रहा है. इसी के चलते वहाँ के चुनावों की निष्पक्षता पर आये दिन सवाल उठते रहे हैं. वैचारिक विभेद सिर्फ विरोध के स्तर पर ही नहीं रहा बल्कि इसका स्वरूप हिंसात्मक भी रहा, जिसके चलते बांग्लादेश में अकसर राजनीतिक तनाव, हिंसात्मक गतिविधियाँ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश आदि देखने को मिलता रहा  है. ऐसे वातावरण से समाज में, जनसामान्य में भय और असुरक्षा का माहौल दिखाई पड़ता रहा है.

 



विगत समय के राजनीतिक संक्रमण, सामाजिक तनाव और आर्थिक दबावों के बीच देश आगामी चुनावों की ओर बढ़ रहा है. तनाव, हिंसा, अराजकता के बीच के जो भी हालात बने उसने केवल सत्ता परिवर्तन ही किया और उसके पश्चात् बांग्लादेश को अराजक बना दिया. ऐसे घटनाक्रमों ने बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य, सामाजिक ताने-बाने और क्षेत्रीय स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित किया है. अतीत की उपजी राजनीतिक अनिश्चितता का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. राजधानी ढाका के साथ-साथ अन्य शहर सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में हैं, इसके बाद भी हिंसात्मक गतिविधियों में कमी नहीं आई है. जनसामान्य में, हिन्दुओं में, अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण बना हुआ है. अब जबकि चुनावों की घोषणा हो चुकी है तब वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र की बहाली जैसे विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने हुए हैं. आन्दोलन के बाद उपजी हिंसा की आग और अब चुनावी लहर के माहौल में वहाँ की अंतरिम सरकार को, चुनाव आयोग को, सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरफ की लापरवाह स्थिति अब वहाँ पनपने न पाए. इस तरह के संवेदनशील माहौल में किसी भी तरह की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है.

 

बांग्लादेश के खतरनाक हालातों के स्थायी समाधान के लिए समावेशी राजनीति, पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों के सम्मान आदि की आवश्यकता है. यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ये हालात देश की स्थिरता और विकास के लिए और भी गम्भीर खतरा बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देशों की नजरें भी बांग्लादेश पर टिकी हैं. शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव न केवल देश के भीतर विश्वास बहाल करेंगे बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को भी मजबूत करेंगे. आगामी माह में सम्भावित चुनावों के पश्चात् बांग्लादेश की स्थिति का असर भारत पर भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप में पड़ेगा, इसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. अंतरिम सरकार बनने के बाद भी जिस तरह से अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, वह चिंता का विषय है. पिछले दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद युनुस द्वारा पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल साहिर शमशाद मिर्ज़ा को एक पुस्तक (आर्ट ऑफ़ ट्रायंफ: बांग्लादेश द न्यू डॉन) और विवादित मानचित्र का उपहार में दिया जाना भारत के प्रति उनकी मानसिकता को ही दर्शाता है. उस मानचित्र में बिहार, झारखंड, ओड़िशा, असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के रूप में दिखाया गया है. इस तरह का कृत्य निश्चित रूप से भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने के कारण ही अंजाम दिया गया है. ऐसे में भारत को अत्यंत सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है.

 

कुल मिलाकर बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके अनुसार वहाँ शांति बहाली का रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है. ऐसी स्थिति में वहाँ के संवेदनशील जनप्रतिनिधियों को आगे आकर राजनीतिक समझदारी, संस्थागत पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी. आम जनमानस में सरकार के, लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाना होगा और उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा. देश के युवाओं को समझाना होगा कि लोकतान्त्रिक मूल्यों और शांति बहाली से ही उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं. आने वाला समय यह तो तय करेगा ही कि बांग्लादेश अस्थिरता की ओर बढ़ेगा या लोकतांत्रिक मजबूती की ओर, इसके साथ ही यह भी निर्धारित हो सकेगा कि वह भारत के लिए किस रूप में सामने आ रहा है, मित्र रूप में अथवा शत्रु रूप में.


25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


25 मई 2025

सरकार की प्रतिबद्धता से मिटेगा नक्सलवाद

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्टको अभी तक देश में चलाये गए नक्सल विरोधी अभियानों में सबसे बड़ा और सफल अभियान माना जा रहा है. 21 दिनों तक चले सबसे बड़े नक्सल विरोधी अभियान में सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता प्राप्त की. 21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक संचालित ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को नक्सली समूहों के गढ़ तथा रणनीतिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले कर्रेगुट्टालु पहाड़ी क्षेत्र में चलाया गया. इस अभियान में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और राज्य पुलिस बलों का संयुक्त प्रयास सुखद परिणाम तक पहुँचा. इनके सकारात्मक-समन्वित सहयोग के परिणामस्वरूप 31 माओवादियों को मार गिराया. अभियान सञ्चालन के दौरान मिली कामयाबियों के साथ-साथ अभियान पूरा होने के बाद भी नक्सलवाद के मिटने के संकेत मिलते रहे. ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.

 



इसी तरह छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने बीजापुर-नारायणपुर सीमा पर एक मुठभेड़ में 27 खूँखार माओवादियों को मार गिराया. मारे जाने वालों में सीपीआई-माओवादी का महासचिव, शीर्ष नेता और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू भी शामिल है. बसवराजू के मारे जाने को सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है क्योंकि विगत कई दशकों में यह पहला अवसर है जबकि नक्सलियों का महासचिव स्तर का कोई नेता मारा गया. बसवराजू देश में प्रमुख माओवादी हमलों का मास्टरमाइंड रहा. 2003 के अलीपीरी बम हमले में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. आतंकी हमलों का सबसे घातक हमला इसी के निर्देशन में हुआ था जबकि 2010 में दंतेवाड़ा में किये गए हमले में 76 सीआरपीएफ कर्मी मारे गए. इसके अलावा आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की हत्या का प्रयास भी इसके द्वारा किया गया था. बसवराजू की मौत सीपीआई (माओवादी) के लिए बहुत बड़ी क्षति है साथ ही नक्सली आन्दोलन के लिए सामरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा झटका है.

 

दरअसल नक्सलवाद को एक तरह के वामपंथी उग्रवाद के रूप में भी देखा जाता है. यह हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी और गम्भीर चुनौतियों में से एक है. पश्चिम बंगाल में 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से उत्पन्न यह आंदोलन हिंसात्मक रूप लेकर सामानांतर शासन-सत्ता के रूप में फ़ैल गया. इसने केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को अपनी हिंसात्मक गिरफ्त में ले लिया. नक्सलियों ने इन राज्यों के सुदूरवर्ती, अविकसित और जनजातीय-बहुल क्षेत्रों को अपने कब्जे में लेकर अपनी गतिविधियों को संचालित करने का काम किया. ये लोग भले ही हाशिए के लोगों, जनजातीय समुदायों के हितार्थ लड़ने का दावा करते हों किन्तु उनके द्वारा सशस्त्र हिंसा, जबरन वसूली, बुनियादी ढाँचे को नष्ट करना किया जाने लगा. इस तरह की गतिविधियों का उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह करते हुए लोकतांत्रिक संस्थानों को निशाना बनाना तथा अपनी शासन-सत्ता को स्थापित करते हुए भारतीय राज्य व्यवस्था को कमजोर करना है.

 

विगत कुछ समय से केन्द्र सरकार की सुरक्षा, अखंडता, समावेशी विकास, सहभागिता, सामुदायिकता आदि की नीति के चलते अनेकानेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इसी क्रम में केन्द्र सरकार द्वारा नक्सलवाद समाप्ति के लिए सतत प्रयास किये जा रहे हैं. सरकार ने स्पष्ट रूप से देखा और समझा कि नक्सलवाद के कारण सुदूरवर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में विकास अवरोधित है. इसके चलते ये क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग, मूलभूत ढाँचा आदि से अछूते हैं. ऐसे में केन्द्र सरकार ने प्रतिबद्ध होकर 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने की रणनीति बनायी है. इसके लिए गृह मंत्रालय की समग्र रूपरेखा ‘समाधान – SAMADHAN’ को निम्न घटकों के अन्तर्गत क्रियान्वित किया जाना है.

S Smart leadership (कुशल नेतृत्व)

A Aggressive strategy (आक्रामक रणनीति)

M Motivation & Training (अभिप्रेरणा एवं प्रशिक्षण)

A Actionable Intelligence (अभियोज्य गुप्तचर व्यवस्था)

D Dashboard based Key performance indicators and key result area (कार्ययोजना आधारित प्रदर्शन सूचकांक एवं परिणामोन्मुखी क्षेत्र)

H Harnessing Technology (कारगर प्रौद्योगिकी)  

A - Action Plan for each threat (प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना)

N No access to financing (नक्सलियों के वित्त-पोषण को विफल करने की रणनीति)

 



सरकार की ठोस एवं स्पष्ट नीतियों के कारण नक्सलवाद को पर्याप्त क्षति पहुँची है. इससे नक्सल प्रभावित अनेक जिले राष्ट्र की मुख्यधारा में फिर शामिल हो सके हैं. नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या अप्रैल 2024 में 38 रह गई. ऐसे जिले जो पूर्णतः नक्सलवाद की चपेट में थे, उनकी संख्या 12 से घटकर 6 रह गई. इनमें छत्तीसगढ़ के चार जिले-बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा; झारखंड का एक-पश्चिमी सिंहभूमि और महाराष्ट्र का एक जिला-गढ़चिरौली शामिल है. वर्ष 2016 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए आरम्भ की गई ‘सड़क आवश्यकता योजना’ अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रही है. 2024 तक नक्सल प्रभावित इलाकों में लगभग बारह हजार किमी हाईवे का निर्माण और बीस हजार किमी के आसपास ग्रामीण सड़कें बनाई गईं. सड़क व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सरकार द्वारा पुलिस को मजबूत करने की दृष्टि से ‘विशेष अवसंरचना योजना’ द्वारा नक्सल प्रभावित राज्य के संवेदनशील जिलों में किलेबंद पुलिस स्टेशनों का निर्माण किया गया. इससे नक्सलवाद से जुड़ी हिंसा की घटनाओं में बीते वर्षों की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत तक की कमी आई है. 2024 में इस तरह की कुल घटनाओं की संख्या 374 रह गई. इसी एक वर्ष में 290 नक्सलियों को निष्प्रभावित किया गया; 1090 गिरफ्तार किये गए और 881 ने आत्मसमर्पण किया. सुरक्षा बलों की सक्रियता के कारण नक्सली या तो मारे जा रहे हैं अथवा वे आत्मसमर्पण कर रहे हैं. इसका परिणाम यह हुआ है कि नक्सलवाद अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.

 

इसमें कोई दोराय नहीं कि नक्सलवाद देश के लिए एक गम्भीर समस्या बनी हुई है. इस आन्दोलन के आरम्भ होने से लेकर आज तक नक्सलवाद आन्दोलनकारियों का प्रयोजन पूरा नहीं हुआ है. किसी समय भूमिहीन किसानों के द्वारा सामंती व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ आन्दोलन आज सरकार के, सुरक्षा बलों के विरुद्ध संचालित किया जाने लगा है. अपने आन्दोलन के मूल उद्देश्य से भटककर नक्सली नेताओं द्वारा सरकारी व्यवस्था के समानांतर अपनी शासन-सत्ता स्थापित की जाने लगी. वर्तमान केन्द्र सरकार देश की सुरक्षा, अखंडता के लिए खतरा बनती किसी भी स्थिति का सफाया करने के लिए दत्तचित्त होकर पूरी गम्भीरता से कार्य कर रही है. सरकार के समन्वित सैन्य और विकासात्मक दृष्टिकोण ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक रूप से बदल दिया है. नक्सलवाद जैसी कई दशकों पुरानी अत्यंत गम्भीर समस्या को एक निश्चित समयावधि में पूर्णतः समाप्त करना भले असम्भव प्रतीत हो रहा हो किन्तु जिस तरह निरन्तर सतर्कता, सामुदायिक सहभागिता और राजनीतिक संकल्प के साथ ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को अंजाम तक पहुँचाया गया उससे नक्सलवाद-मुक्त भारत का लक्ष्य सम्भव भी लगता है, पहुँच के भीतर भी लगता है.

 


13 मई 2025

समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

दरअसल जनता का मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.

 



सरकार ने अपनी नीति, अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.

 

बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले, आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.

 

ऐसे अपराधियों के मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए, जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने परिवार का  स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा होता है.

 

देश के वीर सैनिक तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?


27 अप्रैल 2025

नफरत फ़ैलाने वाले भी तुम

अनुभव कीजिए कि क्या पहलगाम हत्याकांड के ठीक पहले मिनट तक किसी ने पोस्ट किया कि पहलगाम के मुसलमानों की सेवा न ली जाए?


दो चार मुसलमानों की तात्कालिक सहायता के वशीभूत क्या ये भुला दिया जाएगा कि उन आतंकियों ने ही हिन्दू, मुस्लिम की पहचान करने के बाद ही गोली मारी?


पर्यटकों को घुमाने और अन्य सेवायें देने वाले स्थानीय मुसलमान जो अब सीना ठोंक कर सहायता करने का झंडा गाड़ रहे, उस समय मिलकर आतंकियों का मुक़ाबला करने का दम क्यों न दिखा पाए?


हिन्दू मुस्लिम उन आतंकियों ने शुरू किया था, उसका विरोध बंद हो गया, क्यों?


इस घटना ने आतंकियों को अब नया ढंग दे दिया है हत्याएं करने का. अब वे विशुद्ध काफिरों को ही मार सकेंगे. अपने मजहबियों की हत्या करने का दोष अब उनके सिर नहीं आयेगा.


इस घटना के दौरान या बाद में सम्भव है कि स्थानीय लोगों में सहायता की होगी पर क्या मात्र इसी कारण से भुला दिया जाए कि जो लोग मारे गए, उनको मुसलमान न होने के कारण मारा गया?


फिर हिन्दू मुसलमान कौन कर रहा?


आँखें खोलिए और सजग, सचेत, सुरक्षित रहिए. ज़्यादा भावनाओं में बहने से पहले आतंकवाद का इतिहास देख लें, कट्टरपंथियों की मानसिकता देख लें. यहाँ वक़्फ़ के ख़िलाफ़ बोलने पर शहर भर आग में जलने लगता है. एक पोस्ट लगाने पर दर्जी का गला काट दिया जाता है. क्रिकेट के विवाद में मुहल्ले भर में मारा-काटी मचा दी जाती है.


और आप सब कहते हो कि नफ़रत हम फैलाते हैं. सच को पहचानो और उसे सामने लाने की कुव्वत रखो.


23 अप्रैल 2025

हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश

पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा जाये, भले ही इसे पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

 

पहलगाम की इस घटना के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के बाद से भारतीय सेना ने, यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा था.

 



जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था. पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक है.

 

इधर जाँच में सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी. पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना बनाना था. इसमें भी उनके निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए, पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.


19 अप्रैल 2025

शांतिदूत लिखने का सन्दर्भ भी समझो

'शांतिदूत' शब्द का प्रयोग करना बंद करो.

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यदि खुलकर मुस्लिम समुदाय के हमलावरों, आतातायी लोगों, उत्पात मचाते युवकों के खिलाफ हत्यारे, बवाली, हिंसक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते तो कुछ न लिखो.... चुपचाप रहो.... मगर 'शांतिदूत' लिखकर उनको भविष्य के लिए वाकई शांतिदूत माने जाने का रास्ता न बनाओ.


वर्तमान इंटरनेट युग में इस शब्द के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश जायेगा वहीं भविष्य में इसी एक शब्द के द्वारा इन वर्तमान मुस्लिम आक्रान्ताओं को, हमलावरों को वास्तविक रूप में शांतिदूत माना-स्वीकारा जाने लगेगा.


क्या पता तब आज की तरह से फिल्मों के द्वारा सच दिखाने वाले लोग जिंदा भी मिलें या नहीं?


11 मार्च 2025

स्वतंत्र होने की राह पर बलूचिस्तान?

पाकिस्तान में ट्रेन अगवा करने की खबर से बलूचिस्तान चर्चा में है. यहाँ के अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिब्रेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाकों ने 500 यात्रियों को क्वेटा से पेशावर ले जा रही जफर एक्सप्रेस को अगवा कर लिया. उन्होंने ट्रेन में सवार महिलाओं, बुज़ुर्गों, बच्चों और बलूच लोगों को सुरक्षित रिहा कर दिया किन्तु 20 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया तथा सैकड़ों यात्रियों को बंधक बना लिया है. बीएलए ने ट्रेन के बंधकों को छोड़ने के बदले बलूच राजनीतिक कैदियों और गायब किए गए व्यक्तियों की बिना शर्त रिहाई की माँग की है. इस घटना के बाद भारत, पाकिस्तान सहित अन्य देशों में बलूच लड़ाकों, बलूचिस्तान का नाम फिर चर्चा में है. भारत में इससे पहले अगस्त 2016 में बलूचिस्तान का मुद्दा जबरदस्त तरीके से चर्चा में आया था जबकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में बलूच नागरिकों पर पाकिस्तान के अत्याचारों का जिक्र किया था. बलूच एक जातीय समूह है जो बलूचिस्तान के मूल निवासी हैं. यह क्षेत्र पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ है. इनका आरोप है कि पाकिस्तान उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है और बदले में उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है. इस कारण बलूचिस्तान में लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. ट्रेन को अगवा करने वाली घटना को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है.

 



पाकिस्तान के विरोध में बलूचिस्तान के अनेक संगठन शांतिपूर्ण आंदोलन करते रहे हैं तो कई संगठनों ने हथियारबंद आंदोलन किये हैं. ऐसे हथियारबंद संगठन आए दिन पाकिस्तान के सैन्य और नागरिक ठिकानों पर हमला करते रहते हैं. विगत लम्बे समय से एक हथियारबंद संगठन बीएलए सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है, जिसने पाकिस्तान को लगातार नुक़सान भी पहुँचाया है, उसे परेशान भी किया है. बीएलए को बलूचिस्तान के मरी, बुगती, मेंगल और अन्य बलोच कबीलों का समर्थन मिला हुआ है. इसके छह हजार से अधिक लड़ाके बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से लगे क्षेत्रों में सक्रिय हैं. यद्यपि पाकिस्तान ने 2006 में बीएलए पर पाबंदी लगा दी थी तथापि विगत कुछ वर्षों में बीएलए ने बलूचिस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना अच्छा नेटवर्क बना लिया है.

 

बलूचिस्तान के गठन के बाद से ही वहाँ के लोग लगातार पाकिस्तान के विरुद्ध संघर्ष करते रहे हैं. दरअसल पाकिस्तान बनने पर उसमें कई रियासतों का विलय हुआ, कई का विलय दबाव से करवाया गया और कुछ पर कब्जा भी किया गया. पाकिस्तान ने अपने गठन के बाद मार्च 1948 को कलात रियासत का जबरन विलय कर लिया. इसके बाद तीन अन्य रियासतों को मिलाकर बलूचिस्तान प्रांत बना दिया. इससे नाराज होकर बलूच लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिए, जिन्हें पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति से दबाता रहा. एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 से अब तक दस हजार से ज्यादा बलूच लापता हो चुके हैं. बलूच लोगों का मानना है कि वो या तो पाकिस्तान की कैद में हैं या उन्हें मार दिया गया है. बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि वे लोग अपनी मर्जी से पाकिस्तान में नहीं मिले. उनका आरोप है कि पाकिस्तान ने कब्जा करने के बाद बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का भारी दोहन किया है, बदले में बलूच लोगों को कुछ नहीं मिल रहा. यहाँ क्रोमाइट, फ्लोराइट, संगमरमर, सोना, गैस, लोहा और पेट्रोलियम सहित प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं. इसके साथ ही 1100 किमी सीमा समुद्र से लगती है जो समुद्री संसाधनों और व्यापार की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बलूचिस्तान के साथ पाकिस्तान के भेदभाव को इससे ही समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत होने के बाद भी बलूचिस्तान सबसे कम जनसंख्या वाले और सबसे गरीब प्रांतों में से एक है. पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 44 प्रतिशत हिस्सा होने के बाद भी कुल जनसंख्या का मात्र 6 प्रतिशत ही बलूचिस्तान में है.

 

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान का गठन अवश्य किया मगर उसे सदैव हाशिये पर रखा गया. यहाँ के निवासियों को सेना सहित राजनीति में अपेक्षित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण असंतोष बना रहा. पाकिस्तान सरकार द्वारा बलूचिस्तान की प्रांतीय परिषद को ज्यादातर बर्खास्त किये जाने के कारण यहाँ स्वायत्तता, स्वतंत्रता, जातीय संघर्ष को बल मिला. इसका परिणाम यह हुआ कि बलूचिस्तान में स्थानीय लोगों द्वारा बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे संगठन बना लिए गए. ये संगठन स्वयं को स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं जबकि पाकिस्तान द्वारा इनको आतंकवादी संगठन बताया जाता है. इन स्थानीय संगठनों के अलावा अलकायदा, क्वेटा शूरा-ए-तालिबान, तहरीक तालिबान आदि जैसे कई कट्टरपंथी संगठन भी यहाँ सक्रिय हो गए हैं. इन समूहों की गतिविधियों ने संघर्ष की स्थिति को जटिल बना दिया है. यहाँ की अस्थिर रणनीतिक स्थिति और बिगड़ी अर्थव्यवस्था ने इन संगठनों को मजहबी कट्टरता के साथ संगठित अपराधों की तरफ बढ़ाया है.

 

पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान की लगातार अनदेखी करने के कारण बढ़ते असंतोष, संघर्ष और पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति देखकर लगता है कि जल्द ही बलूचिस्तान अपने स्वतंत्र होने की घोषणा कर सकता है. इस तरह का अंदेशा फरवरी 2025 में पाकिस्तानी सांसद मौलाना फजलुर्रहमान ने व्यक्त करते हुए कहा था कि उनका देश एक बार फिर से टूट सकता है. बलूचिस्तान प्रांत के एक हिस्से में पाकिस्तान से लोग खुश नहीं हैं. ये अलग होने का फैसला लेकर एक बार फिर 1971 जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जब पाकिस्तान टूट गया था और बांग्लादेश बना था. यद्यपि भारत द्वारा पाकिस्तान अथवा किसी दूसरे देश की आंतरिक स्थिति में दखल न देने की कूटनीति अपनाई जाती रही है तथापि वर्तमान सन्दर्भ में उसे निश्चित रूप रूप से ऐसे हालात पर सजग रहने की आवश्यकता है.  


09 सितंबर 2024

मणिपुर में अंतरराष्ट्रीय साजिश की आशंका

मणिपुर में पिछले साल शुरू हुई हिंसा की स्थिति यह है कि राज्य में हालात अब भी सामान्य नहीं हुए हैं. हिंसा ने अब और भी भयानक रूप ले लिया है. विगत एक साल से अधिक समय से चल रही हिंसा में विद्रोहियों द्वारा पहली बार ड्रोन का, रॉकेट का इस्तेमाल किया गया. अब स्थिति को और ज्यादा ख़राब इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि स्थानीय पुलिस ने दावा किया है कि राज्य में ताज़ा हिंसा में अत्याधुनिक ड्रोन और आरपीजी (रॉकेट प्रोपैल्ड गन अर्थात कंधे पर रखकर रॉकेट दागने वाली बन्दूक) का उपयोग किया गया है. यह खतरनाक है स्थिति क्योंकि ऐसे हथियारों का प्रयोग आमतौर पर युद्ध में किया जाता है. सुरक्षाबलों और आम नागरिकों के विरुद्ध इसका इस्तेमाल खतरनाक संकेत देता है. कुकी समुदाय के खतरनाक इरादों को इसी से समझा जा सकता है कि उनके द्वारा 6 सितंबर को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मैरेम्बम कोइरेंग के घर पर रॉकेट बम फेंका गया. इस हमले में एक बुजुर्ग की मौत हो गई और पाँच लोग घायल हो गए. दरअसल मणिपुर के जिरीबाम में कुकी उग्रवादियों द्वारा असम की सीमा से सटे मोंगबुंग गाँव में घुसकर मैतेई समुदाय के एक बुजुर्ग की हत्या किये जाने के बाद वहाँ हिंसा भड़क गई.

 



मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य है. जिसमें बहुसंख्यक रूप में मैतेई समुदाय के लोग निवास करते हैं, जबकि लगभग 43 प्रतिशत जनसंख्या कुकी और नगा समुदाय के लोगों की है. यहाँ तीन मई 2023 को मैतेई (घाटी बहुल समुदाय) और कुकी (पहाड़ी बहुल समुदाय) के बीच हिंसा शुरू हुई थी. मैतेई समाज की माँग थी कि उनको भी कुकी की तरह राज्य में अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया जाए. इस माँग के सापेक्ष मणिपुर उच्च न्यायालय ने 27 मार्च 2023 को राज्य सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने पर विचार करने को कहा. इस आदेश के कुछ दिन बाद ही राज्य में जातीय हिंसा भड़क गई और कई लोगों की जान भी गई. मैतेई समुदाय की इस माँग को हिंसा के पीछे का मुख्य कारण बताया जा रहा है. उनकी इस माँग का विरोध मणिपुर के पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले कुकी जनजाति के लोग कर रहे हैं.

 

मणिपुर हिंसा को लेकर कुकी समुदाय के साथ-साथ भाजपा विरोधी राजनैतिक दलों ने वहाँ की भाजपा सरकार पर आरोप लगाये हैं. असल में मणिपुर में भाजपा का शासन है और मुख्यमंत्री बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से आते हैं, इस कारण से कुकी समुदाय का आरोप है कि नशीले पदार्थों के व्यापार को ख़त्म करने की आड़ में उनको निशाना बनाया जा रहा है. इसके उलट वहाँ कुकी समुदाय के लोग राज्य के विद्रोही समूहों को सरकार, मैतेई समुदाय के विरुद्ध भड़काने, धर्मान्तरण करवाने, नशीले पदार्थों का व्यापार आदि जैसे कार्यों में संलिप्त बताये जा रहे हैं. मैतेई जनजाति का मानना है कि वर्षों पहले उनके राजाओं ने म्यांमार से कुकी समुदाय के लोगों को युद्ध लड़ने के लिए बुलाया था. उसके बाद ये लोग स्थायी रूप से यहीं बस गए. स्थायी नागरिक के रूप में रहते हुए कुकी समुदाय के लोगों ने राज्य को नुकसान ही पहुँचाया है. इन लोगों ने रोजगार के लिए जंगल काटे और अफीम की खेती करनी आरम्भ की. इससे मणिपुर नशीले पदार्थों की तस्करी का अड्डा बन गया है.

 

मणिपुर हिंसा भले ही मैतेई और कुकी समुदाय के बीच का संघर्ष लगे मगर इसके मूल में एक तरह का षड्यंत्र ही है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे संकेत मिलते रहे हैं कि बांग्लादेश, म्यांमार और भारतीय पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय और मणिपुर को मिलाकर ईसाई देश बनाने की साजिश रची जा रही है. इस साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि नागालैंड, मिजोरम, मेघालय ईसाई बहुल हो चुके हैं और जिस तरह से धर्मान्तरण का खेल पूर्वोत्तर में चल रहा है, उसे देखते हुए निकट भविष्य में मणिपुर भी ईसाई बहुल हो जायेगा. मणिपुर का मैतेई समुदाय जहाँ एक तरफ नशे कारोबार का विरोध कर रहा है दूसरी तरफ ईसाइयत की राह में रोड़ा बना हुआ है.

 

इस हिंसा को पूर्वोत्तर में अंतरराष्ट्रीय साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. मैतई और सेना निरन्तर कुकी विद्रोहियों के निशाने पर है. अंतरराष्ट्रीय ड्रग रैकेट और पूर्वोत्तर राज्यों को भारत से अलग करने की मंशा रखने वाली विदेशी शक्तियाँ भी इसमें सक्रिय हैं. अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति इसका संकेत है. अभी बांग्लादेश में जो कुछ हुआ उसे मणिपुर की पूर्वपीठिका कहा जा सकता है. ऐसे में न केवल राज्य सरकार को बल्कि केन्द्र सरकार को मणिपुर जनता की मदद से कुकी समुदाय के अवैध अप्रवासियों की चुनौतियों का एकजुट होकर सामना करना चाहिए. यह राज्य के साथ-साथ वहाँ के मूल नागरिकों के हित में है. यहाँ पर एनआरसी की अनिवार्यता महसूस हो रही है. सरकार इसे लागू करके सभी वास्तविक मणिपुर निवासियों को उनके अधिकार प्रदान करे. मतदाता सूची, दस्तावेजों का प्रमाणीकरण करके घुसपैठियों को चिन्हित करने का कार्य किया जाये. अवैध लोगों को बाहर करने का अभियान चलाया जाये. उग्रवादियों के रूप में चिन्हित कुकी सशस्त्र समूहों और संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जाये. जिस तरह से पिछले कुछ समय से चीन और अमेरिका भारत के पड़ोसी देशों में सक्रिय हुए हैं; श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश के आंतरिक हालात जिस तरह के हुए उसे देखते हुए मणिपुर में चल रही हिंसा को महज दो समुदायों का संघर्ष समझना भारी भूल हो सकती है.  


04 अगस्त 2024

बांग्लादेश की हिंसा से भारतीय नागरिकों को सतर्क रहने की आवश्यकता

एक अपील या एक निवेदन सभी से.

 

सोशल मीडिया पर आप सब जितना समय देते हैं, बिलकुल दें, उसे कम न करें मगर अब अपने आसपास भी ध्यान देने की आवश्यकता है. बांग्लादेश के घटनाक्रम के बाद और भी सजग होने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के हालात के केन्द्र में आरक्षण या कहें कि कोटा सिस्टम है. एक ऐसा कोटा सिस्टम जो कतिपय राजनैतिक सोच के चलते, राष्ट्रवादी सोच को स्थापित करने की दृष्टि से उन परिवारों को प्रदान किया जा रहा था जो बांग्लादेश मुक्ति वाहिनीं से सम्बंधित थे.

 

वहाँ जिस कोटा सिस्टम के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही की गई, यदि एक नजरिये से देखें तो वह कोटा वहाँ की राष्ट्रवादी सोच से सम्बंधित है, उस मुक्ति वाहिनी के परिजनों के लिए है जिन्होंने बांग्लादेश निर्माण में अपना साथ दिया. स्पष्ट है कि वे लोग ही उस कोटा के खिलाफ होंगे जो बांग्लादेश राष्ट्रवाद सोच के विरुद्ध होंगे. निश्चित ही इसके पीछे पाकिस्तानी समर्थकों का बहुत बड़ा हाथ होगा क्योंकि बांग्लादेश बनने का सबसे बड़ा कष्ट तो उसी को है. इस पूरे आन्दोलन को छात्र आन्दोलन का नाम लेकर न केवल उकसाया गया बल्कि उसे आक्रामक, हिंसात्मक रूप भी प्रदान किया गया. इसके पीछे स्पष्ट रूप से वे ताकतें दिखाई दे रही हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहती हैं.

 



आपके इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर व्यस्त बने रहने के साथ-साथ सजग, सतर्क रहने की आवश्यकता इस कारण से है क्योंकि बांग्लादेश की तरह की भूमिका अपने देश में भी बनती नजर आ रही है. राष्ट्रवादी सोच का लगातार विरोध किया जा रहा है. पाकिस्तान, फिलिस्तीन के पक्ष में खुलेआम नारेबाजी करने वाले इसी देश में हैं. पाकिस्तान समर्थक यहाँ अपना काम स्लीपर सेल के रूप में पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं, ऐसी खबरें हम सभी आये दिन पढ़ते-सुनते हैं. अब बस आप सब सजग रहिये. अपने आसपास के ऐसे तत्त्वों को पहचानिए.


26 मई 2024

अपराध की तरफ बढ़ते नौनिहाल कदम

विगत कुछ समय में बच्चों, किशोरों से संदर्भित जिस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, उनको देखकर ऐसा महसूस हो रहा है कि भले ही समाज में विकास का क्रम बना हुआ है मगर नैतिकता में, सामाजिकता में निरंतर गिरावट आ रही है. सामाजिक और नैतिक रूप से इस पीढ़ी को उस तरह से अनुशासित नहीं किया जा सका है, जैसी कि समाज में अपेक्षा होती है. इस पीढ़ी को नैतिक रूप से वैसा जिम्मेवार नहीं बनाया गया है जैसा कि किसी इंसान के लिए अपेक्षित होता है. सामाजिकता के नाम पर भी यह पीढ़ी संज्ञा-शून्य ही नजर आती है. ऐसा नहीं है कि वर्तमान समय के समस्त बच्चों, किशोरों के सन्दर्भ में ये सही है मगर बहुतायत में इस पीढ़ी के साथ यही समस्या बनी हुई है. उसके लिए नैतिकता, सामाजिकता से कहीं अधिक बड़ी बात उनका अपना मनोरंजन, अपना पैशन हो गया है. इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार बैठे होते हैं, बिना ये जाने-समझे कि उनका एक गलत कदम किसी की जान भी ले सकता है.

 



इस तरह से भाव-विहीन होती जा रही पीढ़ी के किशोरों, बच्चों द्वारा की गई हरकतों की संख्या उँगलियों में गिने जाने से बहुत आगे निकल चुकी है. बीते दिनों में हुई ऐसी कुछ घटनाओं को समाज अभी भूला नहीं होगा. पुणे का हालिया केस देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है जहाँ एक किशोर की तेज रफ़्तार कार से दो व्यक्तियों की मृत्यु हो गई. यहाँ गौरतलब ये है कि उस किशोर को जरा सा भी भय समाज का अथवा अपने परिवार का नहीं था कि उसके द्वारा नशे में कार को तेज रफ़्तार से चलाया जा रहा है, जबकि वह खुद नाबालिग है और अभी उसका कार ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं बना है. ऐसी गैर-कानूनी स्थिति से उस लड़के के भयभीत न होने की स्थिति उस समय स्पष्ट हो गई जबकि वह अपने अमीर पिता के रसूख के चलते न केवल जमानत पा गया बल्कि मेडिकल टेस्ट में भी एल्कोहल न होना पाया गया. इससे भी बड़ी बात ये हुई कि अदालत द्वारा उसको तीन सौ शब्दों का निबंध लेखन, कुछ दिनों यातायात पुलिस के साथ नियम-कानून सीखने का काम सजा के तौर पर मिला. एक और घटना के रूप में उत्तराखंड के एक स्कूल की घटना का जिक्र करना भी यहाँ आवश्यक हो जाता है जहाँ पर एक लड़के द्वारा अपनी ही कक्षा की चौदह वर्ष की लड़की का अश्लील वीडियो बनाकर वायरल कर दिया गया. बदनामी के डर से उस लड़की ने आत्महत्या कर ली. इस मामले में अदालत द्वारा उस लड़के को इस आधार पर जमानत नहीं दी गई क्योंकि अदालत ने उसे अनुशासनहीन माना और जमानत पर उसकी रिहाई को समाज के लिए खतरा बताया. 

 

ऐसी यही दो घटनाएँ ही नहीं हैं बल्कि लगभग रोज ही इस तरह की घटनाएँ हमारे आसपास हो रही हैं. यदि इन घटनाओं के मूल में देखें तो स्पष्ट रूप से समझ में आएगा कि जिस तरह की जीवन-शैली वर्तमान में होती जा रही है, उससे परिवार में, समाज में एक-दूसरे के लिए अब समय ही नहीं रह गया है. संयुक्त परिवारों के बिखरने के साथ-साथ सामाजिक ढाँचे में हुए विघटन ने भी अपने पड़ोसियों से संबंधों में मधुरता का, दायित्व का लोप करवा दिया है. इसके चलते भी मोहल्ले में, आसपास के घरों में बच्चों पर ध्यान दिए जाने की सामाजिकता समाप्त ही हो चुकी है. सामाजिक विकास के क्रम में अब जबकि ये पढ़ाया जाने लगा हो कि अभिभावक और बच्चे अब दोस्त हैं, बचपन की गोद में खेलते बच्चों को भी उनके स्टेटस का, उनकी इज्जत-बेइज्जती का पाठ सिखाया जाने लगा हो तो स्वाभाविक सी बात है कि बच्चों में, किशोरों में खुद में एक तरह का जिम्मेवार होने का भाव जागने लगता है. देखा जाये तो यह भाव-बोध उनको एक तरह की नकारात्मकता की तरफ ले जाता है. यही कारण है कि कम उम्र में नशे का शिकार हो जाना, तेज रफ़्तार से वाहन चलाना, शारीरिक संबंधों का बनाया जाना, रोमांचकता के लिए जीवन को खतरे में डालना, अपने शौक और थ्रिल के लिए आपराधिक कृत्य में संलिप्त हो जाना आदि सहजता से समाज में दिखने लगा है.

 

दरअसल कोरोनाकाल में लॉकडाउन के दौरान जिस तरह शिक्षा के लिए मोबाइल, कम्प्यूटर, इंटरनेट को बच्चों के लिए अनिवार्य सा बना दिया गया था, वह लॉकडाउन की समाप्ति के बाद यथावत बना हुआ है. इसका सुखद परिणाम सामने भले ही न आया हो मगर अनेकानेक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ मानसिक समस्याओं ने, सामाजिक समस्याओं ने, आपराधिक घटनाओं ने अवश्य ही जन्म ले लिया है. चौबीस घंटे इंटरनेट की, मोबाइल की उपलब्धता ने बच्चों, किशोरों को अपनी उम्र से पहले ही युवा कर दिया है. इसके इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, हैवानियत, नृशंसता, क्रूरता आदि का समावेश होता जा रहा है. इसकी दुखद परिणति हिंसक, आपराधिक घटनाओं के रूप में हम सभी आये दिन देख रहे हैं. समाज को जल्द से जल्द इस पर विचार करते हुए संस्कारित, सामाजिक वातावरण का निर्माण अपने ही परिवार से करना पड़ेगा. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा.


26 मार्च 2024

रूस पर बड़ा आतंकी हमला

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत वाली जीत के बाद रूस के और अधिक शक्तिशाली रूप में उभर कर आने का विश्वास व्यक्त किया था. इस दावे के साथ ही उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो सेनाओं के शामिल होने के अपने विश्वासपरक दावे के सापेक्ष दुनिया को विश्वयुद्ध से एक कदम दूर बताया था. पुतिन की विश्वयुद्ध की सम्भावित चेतावनी नाटो सेनाओं, पश्चिमी देशों के लिए थी. इन सबके पीछे रूस की सशक्त सेना, पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था, सजग सुरक्षा एजेंसियों का होना माना जा रहा था मगर चंद आतंकियों ने रूस के, पुतिन के इस विश्वास को हिला डाला. चार आतंकियों ने मॉस्को के नज़दीक स्थित क्रोकस कॉन्सर्ट हॉल में घुसकर सोवियत काल के रॉक बैंड ग्रुप पिकनिक के एक म्यूजिक कॉन्सर्ट के दौरान गोलियों की बौछार कर दी थी. एके 47 से की गई अंधाधुंध गोलीबारी में सैकड़ों लोगों की जान गई और घायल हुए.

 



जहाँ इस हमले की जिम्मेवारी एक तरफ इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान प्रान्त (ISIS-K) ने ली वहीं दूसरी तरफ पुतिन इस आतंकी हमले को यूक्रेन की साजिश बता रहे हैं. पुतिन के इस संदेह का कारण आतंकियों का यूक्रेनी सीमा से यूक्रेन में प्रवेश करने की कोशिश करना रहा है. एक तरफ रूसी राष्ट्रपति इस्लामिक आतंकी संगठन को, यूक्रेन को इसके लिए जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, दूसरी तरफ जैसै-जैसे इस आतंकी हमले की जाँच आगे बड़ रही है वैसे-वैसे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इस आतंकी हमले में संलिप्त चारों आतंकियों सहित कुल ग्यारह लोगों को पकड़ने का दावा रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने किया है. इन सभी गिरफ्तार व्यक्तियों का सम्बन्ध अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट की खोरासान शाखा से बताया गया है. इससे इस हमले में तुर्किये का सम्बन्ध होना सामने आया है. रूस की संघीय सुरक्षा एजेंसी (FSB) ने दावा किया है कि पहले भी मॉस्को में इसी तरह के दो आतंकी हमले की कोशिशों को नाकाम किया गया है. इस हमले में तुर्किये कनेक्शन सामने के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन को अपना दोस्त बताने वाले तुर्किये राष्ट्रपति एर्दोगन क्या अब धोखा दे रहे हैं?

 

रूस में हुए इस आतंकी हमले में अलग-अलग दृष्टिकोण से अलग-अलग पेंच और सम्बन्ध दिखाई देते हैं. हमले की जिम्मेवारी सबसे पहले इस्लामिक आतंकी संगठन ने ली थी. रूसी सुरक्षा एजेंसियों की जाँच से तुर्किये कनेक्शन दिखाई दिया. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले को यूक्रेन की साजिश बताया. इस संदेह के चलते ही यूक्रेन को पुतिन के गुस्से का खामियाजा उठाना पड़ा. रूस ने यूक्रेन के बाईस से ज्यादा शहरों में हमले किए. यूक्रेन के इस हमले में शामिल होने के दावे का असर अमेरिका पर पड़ता दिख रहा है. पुतिन के नजदीकी विश्वस्त अफसरों को संदेह है कि अमेरिका को इस तरह का आतंकी हमला होने की जानकारी थी लेकिन उसने रूस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. रूसी अधिकारियों द्वारा इस तरह का संदेह उठाये जाने का एक कारण अमेरिका द्वारा सात मार्च का वह अलर्ट है जिसमें अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों से कहा था कि वे मॉस्को में होने वाली बड़ी सभाओं और कार्यक्रमों से दूर रहें. इस अलर्ट के बीस दिनों के भीतर ही आतंकी हमला होने का सीधा मतलब यही लगाया जा रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी हमले को लेकर जानकारी थी.  

 

आतंकी हमले के तार कहाँ-कहाँ, किस-किस से जुड़े हैं ये तो आने वाले समय में होने वाली जाँच से पता चलता रहेगा मगर अब अंदेशा रूस के हमलावर होने का है. ऐसा होता नजर आने भी लगा है. सुरक्षा एजेंसियों ने देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है. सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है. यूक्रेन पर हमले बढ़ गए हैं, देखा जाये तो ये बढ़े हुए हमले कहीं का कहीं अमेरिका और नाटो सेनाओं के विरुद्ध क्रोध का संकेत हैं. दरअसल वर्ष 2002 में चेचन अलगाववादियों द्वारा नॉर्ड-ओस्ट थियेटर में बंधक बनाये जाने के बाद से यह सबसे बड़ा आतंकी हमला है. उस हमले में एक सौ सत्तर के आसपास लोग मारे गए थे. रूस अभी तक उस आतंकी हमले को भुला नहीं पाया है. इसके अलावा इसमें कोई संदेह नहीं कि पुतिन अपने नेतृत्व में रूस से इस्लामिक, कट्टरपंथी आतंकवाद का एक तरह से सफाया कर दिया है. ऐसे में पुतिन की प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत वाली जीत ने उनके विरोधियों में नाराजगी और निराशा पैदा कर दी.

 

यह आतंकी हमला इसी निराशा और हताशा का परिणाम हो या न हो किन्तु यह हमला पुतिन के विश्वास और स्वाभिमान पर अवश्य है. इस आतंकी हमले के बाद रूस आक्रामक मुद्रा में है और अमेरिका द्वारा यूक्रेन को बेगुनाह बताते हुए क्लीन चिट दी जा रही है. विश्व की इन दो महाशक्तियों द्वारा उठाये जा रहे कदमों, बयानों का अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है किन्तु इस आतंकी घटना ने एक तरह का वैश्विक भय अवश्य पैदा कर दिया है. इस आतंकी हमले ने विश्व की दो महाशक्तियों के बीच खतरनाक संघर्ष के शुरू होने का बीज बो दिया है. 






 

07 दिसंबर 2023

मानसिक विद्रूपता फैलाती फ़िल्में

इन दिनों फिल्मों को केन्द्र में रखकर चर्चाओं का दौर बना हुआ है. विगत कुछ वर्षों में आये तकनीकी परिवर्तन ने फिल्मों को कल्पनाशीलता से भी ऊपर लेकर एक अलग ही रंग दिया है. जबरदस्त कम्प्यूटर इफेक्ट के चलते भी फिल्मों ने खुद को वास्तविकता के करीब बताने के बाद भी वास्तविकता से बहुत दूर कर दिया है. समाज की कहानी होने के बाद भी एक तरह की फैंटेसी अब फिल्मों में देखने को मिलने लगी है. फिल्मकारों द्वारा कहानी को, फिल्मांकन को, संवादों को, दृश्यों को इस तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा है कि वे अब दर्शकों की मानसिकता से खेलते नजर आने लगे हैं. देशभक्ति के नाम पर बनी फ़िल्में हों, दो देशों के बीच प्रेम-संवाद की स्थापना को दिखाती फिल्म हों या फिर समाज की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हकीकत को सामने लाने वाली फ़िल्में हों सभी में वास्तविकता से कहीं अधिक उस मनोस्थिति का चित्रण होता है जिसे दर्शक देखना पसंद करता है.




फिल्म क्षेत्र में लगातार बदलाव आते रहे हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है मगर इस बदलाव ने अब हिंसा, विकृति, यौन-संबंधों को इस तरह परोसना शुरू कर दिया है जैसे यही समाज की हकीकत हो. फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विकास आरंभिक दौर से ही हो रहा था और अपनी तरह का नया स्वरूप भी सामने आ रहा था. इसी का परिणाम था कि गूँगी फिल्मों को आवाज मिली. बोलती फिल्मों की तकनीक विकसित होते ही फिल्म निर्माण का ढर्रा भी बदला. अनेक फिल्म कम्पनियों के द्वारा प्रयोजनपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया जाने लगा. हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बनी रोटी, साहित्यिक कृति पर बनी चित्रलेखा, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर आधारित धरती के लाल आदि फिल्मों का निर्माण सोद्देश्यपूर्ण विषय-कहानी जैसी विचारधारा रखने वालों के कारण ही हो सका था.


इन सबके बीच कुछ निर्माताओं-निर्देशकों ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए प्रशासनिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार को सामने रखते हुए वास्तविकता को प्रदर्शित करने का हौसला दिखाया. अपने आसपास के भ्रष्टाचार, अत्याचार का पर्दे पर समाधान होता देखकर दर्शकों ने इसे पसंद किया तो निर्माता-निर्देशकों ने वास्तविकता का, जीवन की सच्चाई की ताना-बाना कसते हुए इस सार्थकता के बीच भौंड़ापन पसार कर रख दिया. जीवन की सच्चाई दिखाने के नाम पर आम आदमी का पर्दे के पीछे का जीवन पर्दे पर उभरने लगा. सेक्स का, देह का खुला प्रदर्शन, अश्लील गीतों-नृत्यों-भावभंगिमाओं के साथ अश्लील संवादों की अतिरंजिता फिल्मों में दिखाई देने लगी. कभी अश्लील और द्विअर्थी संवादों के लिए विवादास्पद रहे दादा कोंड़के से भी ऊपर जाकर वर्तमान फिल्मकारों ने इस अश्लीलता और द्विअर्थी शब्दावली को सीधे-सीधे फिल्मों में स्थान दे दिया. चोली के पीछे क्या है, एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे, सरकाय लेओ खटिया, ए गनपत चल दारू लगा जैसे गानों के बोल और फिल्मों की संवाद अदायगी ने बोलती फिल्मों को वाचाल स्वरूप प्रदान किया.


यही सिनेमाई शक्ति, विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार आज कम होता दिख रहा है. जहाँ रंग दे बसंती, तारे जमीं पर, थ्री इडियट्स, वेलकम टू सज्जनपुर, न्यूयार्क जैसी साफ सुथरी और विषय-विशेष को आधार बनाकर बनी फिल्मों से सुखद अनुभूति होती दिखती है वहीं कमीने, कम्पनी, एनिमल, कबीर जैसी फिल्मों की प्रेतछाया डराती भी है. इसी प्रेतछाया से अब एक और नया शब्द अपने अत्यंत हिंसात्मक स्वरूप में समाज के बीच जगह बनाने लगा है. जबरदस्त हिंसा और नकारात्मकता को अपने में समेटे एनिमल फिल्म के द्वारा अल्फ़ा मेल की उपस्थिति हुई. अपने मूल अर्थ से बहुत दूर इस शब्द को फिल्मकार ने हिंसात्मक रूप में प्रदर्शित किया है.


ऑक्सफोर्ड लर्नर्स डिक्शनरी के मुताबिक, किसी खास समूह का वह शख्स जिसके पास सबसे अधिक ताकत हो, वो अल्फा मेल कहलाता है या यूँ कहें कि एक ऐसा व्यक्ति, जो सामाजिक और व्यावसायिक स्थितियों पर अपनी पकड़ रखता है, वह अल्फा मेल है. यदि इस परिभाषा के सापेक्ष फ़िल्मी अल्फ़ा मेल की छवि देखेंगे तो दर्शकों को, समाज को निराशा ही हाथ लगेगी. अल्फा मेल शब्द का प्रयोग 1960 के दशक से पहले नहीं किया जाता था. एनिमल किंगडम से लिए गए इस शब्द को बाद में इंसानों पर अप्लाई किया गया. जो पावरफुल व्यक्ति के व्यवहार को बताने के लिए था. सामान्य रूप में अल्फा पुरुष को अपने समूह के नेता के रूप में जाना जाता है. वह ऐसा व्यक्ति होता है जिसका प्रत्येक व्यक्ति आदर करता है. अल्फा गुण जन्मजात नहीं होते बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन, सकारात्मकता और सहानुभूति के द्वारा कोई भी अल्फा बन सकता है. इस सन्दर्भ में फ़िल्मी अल्फ़ा समाज में नकारात्मकता फ़ैलाने का ही काम कर रहा है. एक पल को रुक कर सोचिये कि विगत वर्षों में जिस तरह से फिल्मों ने समाज को प्रभावित किया है, अपनी वेशभूषा, जीवन-शैली से युवाओं को आकर्षित किया है उसी तरह से यह फ़िल्मी अल्फ़ा युवाओं को, समाज को किस रास्ते ले जायेगा?


पारिवारिक हिंसा, हत्या, अत्याचार, अपराध आदि के द्वारा जिस अल्फ़ा को चित्रित किया गया है वह मानसिक विकृति का सूचक है. हिंसा, अत्याचार, अपराध से घिरा समाज ऐसे फ़िल्मी अल्फ़ा मेल के चलते सुधार के रास्ते तो नहीं ही जायेगा. ऐसी स्थितियों से दर्शक ही भयभीत नहीं है वरन् अच्छी फिल्में भी इनके भय से विलुप्त सी हो रही हैं. सामाजिक विद्रूपता को फिल्मकार द्वारा एक नये प्रकार का चमकदार मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. बुद्धिजीवी सुसुप्तावस्था में पड़े फिल्मों की वाचालता देख समाज में होता व्याभिचार देख रहे हैं. खामोशी समाज के जागरूक वर्ग के होठों पर है और समाज की वास्तविकता का मायाजाल दिखाकर समाज को भरमाने वाले फिल्मकारों की जुबान बोलती है और कहती है- गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है.




 

03 जुलाई 2023

हिंसा के मूल में मानवीय स्वभाव

फ्रांस में सत्रह वर्षीय किशोर नाहेल की मौत के बाद देश में हुई हिंसक घटनाएँ अभी भी जारी हैं. पुलिस के द्वारा अभी तक तीन हजार से अधिक लोगों की गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जो इन हिंसक घटनाओं में शामिल रहे हैं. बताया जा रहा है कि नाहेल पुलिस द्वारा की जा रही वाहन चेकिंग के लिए रुका नहीं. उसने अपनी कार आगे बढ़ा दी, इस पर पुलिसकर्मियों ने पॉइंट-ब्लैंक पर उसे गोली मार दी. इससे नाहेल की मौत हो गई. इस घटना ने फ्रांस को झकझोर कर रख दिया. इस घटना के बाद सही-गलत को एक पल के लिए हाशिये पर रखते हुए इसका आकलन किया जाये कि क्या मानवीय समाज इतना व्यग्र, संयमहीन हो चुका है कि ऐसी किसी भी घटना के लिए शासन-प्रशासन से न्याय की उम्मीद करने से बेहतर खुद ही हिंसा करना समझता है? क्या फ़्रांस में जिस तरह से विगत कई दिनों से हिंसक घटनाएँ हो रही हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, उससे क्या नाहेल को न्याय मिल गया?

 

असल में फ़्रांस की ये वर्तमान हिंसा हो अथवा ऐसी किसी भी घटना पर सम्पूर्ण विश्व में होती हिंसा हो, सभी के मूल में सम्बंधित व्यक्ति के लिए न्याय पाना नहीं होता है बल्कि ये समाज के द्वारा अपनी मानसिकता को सार्वजनिक करना होता है. इस तरह की हिंसक वारदातें, चाहे वे बड़े रूप में हों या फिर छुटपुट घटनाओं के रूप में, अपने देश में भी आये दिन होती हैं. किसी घटना का सहारा लेकर धर्म, जाति आदि के लोगों पर हमला बोल देना, सार्वजनिक संपत्ति को लूटना, उसका नुकसान कर देना आदि समाज की उस क्रूर मानसिकता के कारण होता है जिस पर लोगों का ध्यान बहुत कम ही जाता है.  

 



क्या हम लोगों ने कभी इस पर विचार किया कि इंसानी स्वभाव के मूल में क्या है? क्यों उसे सदियों से प्रेमसौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है? बावजूद इसके वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है. फ़्रांस जैसी व्यापक हिंसक घटना को छोड़ भी दें तो भी एक ऐसे समाज में जहाँ सड़क चलती महिलाओं, लडकियों, बच्चियों को छेड़ा जाता हो; जहाँ बेटी समाज के साथ-साथ गर्भ तक में असुरक्षित हो; जहाँ पल-पल में महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा हो; जहाँ डकैती, हत्याएँ, अपराध आम बात हो गई हो; जहाँ खुलेआम घरों में घुसकर कब्ज़ा ज़माने की प्रवृत्ति काम कर रही हो; जहाँ भेदभाव अपने चरम पर हो; जहाँ व्यक्ति-व्यक्ति में धार्मिक, क्षेत्रीय, जातीय भावनाएँ फूट डाल रही हों वहाँ पर सभ्य समाज की परिकल्पना बेमानी सी लगती है. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जा सकता. दरअसल हिंसाअत्याचारक्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. इसे किसी समाजविज्ञानीमनोविज्ञानी की दृष्टि से समझने की आवश्यकता तो है ही साथ ही सामान्य इंसान के रूप में भी इसे देखा-समझा जाना चाहिए. यदि इतने विस्तृत फलक को न देखते हुए हम पारिवारिक माहौल में देखें तो छोटे-छोटे बच्चों को अकारण ही जमीन पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़ों को मारते देखा जा सकता है. मोहल्ले की गलियों में जरा-जरा से बच्चों को गलियों में टहलते जानवरों के पीछे डंडा लेकर उन्हें भगानामारना सहज रूप में दिखाई देता है. इंसानी जीवनक्रम में मारपीटलड़ाईगाली-गलौज सहज रूप में उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिखाई देने लगती है. इस व्यवहार में कमी न होकर वृद्धि ही होती रहती है.

 

देखा जाये तो वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैंअपने आदर्श हैंअपने विचार हैंअपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारासबके आदर्श दूसरे की विचारधाराआदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठताहीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो चुकी हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. महज ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ बना लेने से, मँहगी-मँहगी कारों में सफ़र कर लेने से, उन्नत किस्म की तकनीकी के सहारे जीवन व्यतीत कर लेने मात्र से ही समाज की सभ्यता का पता नहीं लगता है. संवेदनाओं, सहयोग, समन्वय, परोपकार आदि भावनाएँ मृत सी दिख रही हैं. अपनी आने वाली पीढ़ी को हम बताना भूल गए कि जीवन-मूल्य क्या हैं. उसे हम बताना भूल गए कि इंसानी बस्ती में स्नेह, प्रेमभाव आदि ही वे भावनाएँ हैं जिनके द्वारा समाज सभ्य कहलाता है. जरा-जरा सी बात पर उग्र हो जाना, इंच-इंच भूमि के लिए हत्याएँ कर देना आदि हमें कबीलाई संस्कृति की तरफ ले जा रहे हैं. 

 

समाज अनादिकाल से शांति, अहिंसा, सौहार्द्र, स्नेह आदि-आदि सिखाने वाला रहा है और उसी के सापेक्ष समाज में अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का भी समावेश बना रहा है. यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. उसे सबके साथ प्रेम से रहना है. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया वह कार्य न केवल भली-भांति सीख रखा है वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं. विडम्बना ये है कि यही सब अपने हमलावर भी बने हुए हैं.