उथल-पुथल वाली खतरनाक स्थिति के बाद से बांग्लादेश अराजक ही बना हुआ है. वहाँ
के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों, हमलों, उनकी हत्याओं के चलते ऐसा लग रहा है कि वहाँ
की प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाये जाने के बाद बनी अंतरिम सरकार का कोई
नियंत्रण नहीं है. आन्दोलन, हिंसा,
अराजकता के लम्बे दौर के बाद अब बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं.
वहाँ के चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए बताया कि देश में 12 फ़रवरी को राष्ट्रीय चुनाव
होंगे. यहाँ विशेष बात यह भी है कि इसी दिन देश में जनमत संग्रह भी होगा. यह चुनाव
बांग्लादेश में हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहली बार होने जा रहे हैं.
यद्यपि बांग्लादेश में चुनावों की घोषणा से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगी है
तथापि वर्तमान हालातों को देखते हुए उम्मीद की किरण पर संकट के बादल भी मँडराते नजर
आ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति लम्बे समय से टकराव
वाली रही है. वहाँ हमेशा से ही सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष चलता रहा है. मुख्य
दलों में से एक का कट्टरपंथ की तरफ झुकाव होने, भारत के प्रति नकारात्मक भाव रखने और दूसरे का लोकतान्त्रिक
व्यवस्था में विश्वास होने, भारत के प्रति सद्भाव रखने के कारण वहाँ वैचारिक विभेद
भी खुलकर सामने आता रहा है. इसी के चलते वहाँ के चुनावों की निष्पक्षता पर आये दिन सवाल उठते
रहे हैं. वैचारिक विभेद सिर्फ विरोध के स्तर पर ही नहीं रहा बल्कि इसका स्वरूप
हिंसात्मक भी रहा, जिसके
चलते बांग्लादेश में अकसर राजनीतिक तनाव, हिंसात्मक गतिविधियाँ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश आदि देखने को
मिलता रहा है. ऐसे वातावरण से समाज में,
जनसामान्य में भय और असुरक्षा का माहौल दिखाई पड़ता रहा है.
विगत समय के राजनीतिक संक्रमण, सामाजिक तनाव और आर्थिक दबावों के बीच देश आगामी चुनावों की ओर बढ़ रहा है.
तनाव, हिंसा, अराजकता के बीच के जो भी हालात
बने उसने केवल सत्ता परिवर्तन ही किया और उसके पश्चात् बांग्लादेश को अराजक बना
दिया. ऐसे घटनाक्रमों ने बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य, सामाजिक
ताने-बाने और क्षेत्रीय स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित किया है. अतीत की उपजी राजनीतिक
अनिश्चितता का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. राजधानी ढाका के
साथ-साथ अन्य शहर सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में हैं, इसके बाद भी हिंसात्मक
गतिविधियों में कमी नहीं आई है. जनसामान्य में, हिन्दुओं में, अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण बना हुआ है. अब जबकि चुनावों की घोषणा हो
चुकी है तब वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र की बहाली जैसे विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने हुए
हैं. आन्दोलन के बाद उपजी हिंसा की आग और अब चुनावी लहर के माहौल में वहाँ की
अंतरिम सरकार को, चुनाव आयोग को,
सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरफ की लापरवाह स्थिति
अब वहाँ पनपने न पाए. इस तरह के संवेदनशील माहौल में किसी भी तरह की लापरवाही घातक
सिद्ध हो सकती है.
बांग्लादेश के खतरनाक हालातों के स्थायी समाधान के लिए समावेशी राजनीति,
पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों के सम्मान आदि की आवश्यकता है.
यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ये हालात देश की स्थिरता और विकास के लिए
और भी गम्भीर खतरा बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देशों की नजरें भी
बांग्लादेश पर टिकी हैं. शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव न केवल देश के भीतर विश्वास
बहाल करेंगे बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को भी मजबूत करेंगे. आगामी माह में सम्भावित
चुनावों के पश्चात् बांग्लादेश की स्थिति का असर भारत पर भी सकारात्मक अथवा
नकारात्मक रूप में पड़ेगा, इसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. अंतरिम सरकार बनने के बाद भी जिस
तरह से अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार हो
रहे हैं, वह चिंता का विषय है. पिछले दिनों बांग्लादेश की
अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद युनुस द्वारा पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल
साहिर शमशाद मिर्ज़ा को एक पुस्तक (आर्ट ऑफ़ ट्रायंफ: बांग्लादेश द न्यू डॉन) और
विवादित मानचित्र का उपहार में दिया जाना भारत के प्रति उनकी मानसिकता को ही
दर्शाता है. उस मानचित्र में बिहार, झारखंड, ओड़िशा, असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के रूप
में दिखाया गया है. इस तरह का कृत्य निश्चित रूप से भारत के प्रति द्वेषपूर्ण
भावना रखने के कारण ही अंजाम दिया गया है. ऐसे में भारत को अत्यंत सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है.
कुल मिलाकर बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके अनुसार वहाँ शांति बहाली का
रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है. ऐसी स्थिति में वहाँ के संवेदनशील जनप्रतिनिधियों
को आगे आकर राजनीतिक समझदारी, संस्थागत पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी. आम जनमानस में
सरकार के, लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाना होगा और उनकी
सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा. देश के युवाओं को समझाना होगा कि लोकतान्त्रिक
मूल्यों और शांति बहाली से ही उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं. आने वाला
समय यह तो तय करेगा ही कि बांग्लादेश अस्थिरता की ओर बढ़ेगा या लोकतांत्रिक मजबूती की
ओर, इसके साथ ही यह भी निर्धारित हो सकेगा कि वह भारत के लिए किस रूप में सामने आ
रहा है, मित्र रूप में अथवा शत्रु रूप में.

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