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03 मई 2025

जातिगत जनगणना का राजनैतिक खेल

केन्द्र सरकार ने जातिगत जनगणना की स्वीकृति देकर समूचे देश में राजनैतिक हलचल पैदा कर दी है. जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलते ही विपक्षी दलों ने इसे अपनी जीत घोषित कर दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि विपक्षी दल लम्बे समय से इसकी माँग करते रहे हैं. ऐसे समय में जबकि सभी राजनैतिक दलों के साथ-साथ समूचे देश का ध्यान पहलगाम आतंकी हमले की तरफ था, केन्द्र सरकार का जातिगत जनगणना करवाने का निर्णय न केवल चौंकाने वाला है बल्कि अप्रत्याशित भी है. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि केन्द्र सरकार के इस निर्णय के पीछे बिहार का आगामी विधानसभा चुनाव है. यह एक तरह से सही भी हो सकता है क्योंकि बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव द्वारा जातिगत जनगणना को आधार बनाकर भाजपा के विरुद्ध, नीतीश कुमार के विरुद्ध माहौल बनाया जाना निश्चित था.

 

जातिगत जनगणना देश के लिए अथवा देश के इतिहास की अनोखी घटना नहीं है. अंग्रेजी शासन में 1881 से लेकर 1931 तक जातिगत जनगणना होती रही थी. यदि जातिगत जनगणना की समयावधि को देखें तो लगभग सौ वर्षों के बाद यह पुनः होने जा रही है. यद्यपि स्वतंत्रता के पूर्व 1941 में भी जातिगत जनगणना करवाई गई थी तथापि उसके आँकड़ों को प्रकाशित नहीं करवाया गया था. देश की आज़ादी के बाद भी एक तरह से जातिगत जनगणना होती आई है किन्तु उसे सम्पूर्ण न कहकर आंशिक कहा जा सकता है क्योंकि उसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ही गणना होती रही है. यह गणना 1951 से लेकर 2011 तक होती रही है. 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करवाकर जातिगत आँकड़ों की पहचान करने का प्रयास किया गया था किन्तु इस सर्वेक्षण के जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हो सके थे. विपक्षी दलों द्वारा केन्द्र सरकार पर जातिगत जनगणना करवाए जाने का दबाव लगातार बनाया जाता रहता था किन्तु कांग्रेस द्वारा हमेशा इसका विरोध किया गया. ऐसे में राहुल गांधी का जातिगत गणना के लिए सर्वाधिक सक्रिय रहना, इस माँग के मामले में अन्य विपक्षी दलों को पीछे छोड़ देना हैरान करने वाला है.

 



इस तरह की स्थितियाँ देखने के बाद ऐसा समझ आ रहा है कि विपक्षी दल हों या फिर केन्द्र सरकार, सभी के लिए जातिगत जनगणना एक राजनैतिक खेल है. इसके द्वारा समाज के या कहें मतदाताओं के बहुत बड़े वर्ग को साधने का प्रयास किया जा रहा है. पिछले कुछ सालों में भाजपा द्वारा जिस तरह से ओबीसी में अपना जनाधार मजबूत किया है, वह उन तमाम दलों के लिए परेशानी और चिंता का कारण बना हुआ है जिनके लिए ओबीसी वोट-बैंक रहा है. इसी तरह कांग्रेस, जिसने ओबीसी आरक्षण का हमेशा ही विरोध किया है, के द्वारा ओबीसी को जातिगत जनगणना के, आरक्षण के लाभ समझाना राजनैतिक खेल ही है. यह सही है कि सामाजिक कल्याण के लिए समाज की मुख्यधारा में सभी जातियों, उपजातियों का शामिल होना आवश्यक है. यह भी सही है कि एकमात्र आरक्षण के रास्ते से चलकर समाज का अथवा सभी जातियों-उपजातियों का भला नहीं हो सकता. समाजोत्थान के लिए आवश्यक है कि आरक्षण की नीतियों के साथ-साथ समाज कल्याण की अन्य योजनाओं को भी सबके बीच पहुँचाया जाये.

 

ऐसे में जबकि जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिल चुकी है तब सवाल उठता है कि आरक्षण की सीमा लगातार बढ़ती रही है किन्तु इसका लाभ सभी को प्राप्त नहीं हो सका है तो क्या जातिगत जनगणना का लाभ वास्तविक रूप में मिल सकेगा? विभिन्न सरकारों द्वारा नियमित रूप से ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं कि आरक्षण का लाभ यथोचित वर्ग तक, उपयुक्त व्यक्तियों तक पहुँचे. बावजूद इसके अभी भी पिछड़ों-वंचितों-शोषितों की संख्या पर्याप्त रूप में देखने को मिलती है. अभी भी बहुत बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनके द्वार तक आरक्षण नहीं पहुँच सका है. ऐसे में यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता है कि बिना जातिगत जनगणना के समाज के वंचित वर्ग तक, ओबीसी तक, एससी-एसटी तक आरक्षण सहित अन्य योजनाओं का लाभ नहीं पहुँचेगा. क्या जातिगत जनगणना के बाद प्राप्त आँकड़ों के आधार पर देश के संसाधनों का बँटवारा कर देना ही सामाजिक समस्याओं का समाधान है? क्या देश में अनेकानेक नीतियाँ, परियोजनाएँ जातिगत आँकड़ों के आधार पर बनाई जाएँगी? जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलने के साथ ही इस पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है कि क्या ऐसी गणना सिर्फ हिन्दुओं के सन्दर्भ में ही होगी अथवा इसके दायरे में मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि सहित अनेक समुदायों को भी लाया जायेगा?

 

देखा जाये तो अभी जातिगत जनगणना की स्वीकृति केन्द्र सरकार द्वारा दी गई है किन्तु इसके आँकड़े आने के बाद उसके क्रियान्वयन पर, उसके व्यावहारिक पक्ष की तरफ ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा. इस जनगणना के लाभ-हानि के सम्बन्ध में भी उसी समय उचित रूप में ज्ञात हो सकेगा. एक ऐसे राजनैतिक वातावरण वाले देश में जहाँ सामाजिक कल्याण, सामाजिक न्याय की बात भी जातियों को केन्द्र में रखते हुए की जाती है; जहाँ एक-एक व्यक्ति खुद को जाति विशेष का प्रतिनिधि साबित करते हुए संसद तक पहुँच जाता है; जहाँ जातिगत आधार किसी भी राजनैतिक दल के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है; जहाँ चुनावों में क्षेत्र, विकास, नीति आदि प्रमुख न होकर जाति ही सर्वोपरि हो जाती है वहाँ जातिगत जनगणना सम्बन्धी राजनीति वैमनष्यता को बढ़ावा देने वाली हो सकती है. इस तरह की राजनीति जिसमें कि देश के, समाज के विकास से अधिक महत्त्वपूर्ण जातीय विभाजन हो, राजनैतिक दलों के जनाधार को कमजोर करना हो उससे सामाजिक एकजुटता ही कमजोर होगी.


11 जुलाई 2023

जनसंख्या सिद्धांत और प्राकृतिक आपदाओं का सह-सम्बन्ध

प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है. बढ़ती जनसंख्या के चलते बनने वाले दबाव और उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले नुकसानों पर भी चर्चा की जाती है. इस वर्ष जनसंख्या के सम्बन्ध में चर्चा करना इस कारण भी महत्त्वपूर्ण समझ आ रहा है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषित आँकड़ों के अनुसार भारत ने 1428.6 मिलियन की जनसंख्या के साथ चीन (1425.7 मिलियन) को पीछे छोड़ दिया है. स्पष्ट सी बात है कि बढ़ती जनसंख्या से प्राकृतिक संसाधनों का भी ज्यादा दोहन होगा. इन संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से सतत विकास की प्रक्रिया भी अवरुद्ध होती है. देश की बहुतायत जनसंख्या का कृषि पर निर्भर होने के कारण कृषि क्षेत्र पर भी भार बढ़ेगा. कृषि विकास बाधित होगा, प्रति व्यक्ति आय में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, नागरिकों के हितों की सुरक्षा पर भी संकट आएगा, इसके साथ ही साथ प्राकृतिक आपदाओं के आने की आशंका बढ़ेगी.  




बढ़ती जनसंख्या के बीच बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं वाली बात शायद आश्चर्य सा जगाये किन्तु जनसंख्या सिद्धांत के द्वारा इसे स्पष्ट किया जा चुका है. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है. माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप में होती है अर्थात जनसंख्या 1248163264... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप में अर्थात 123456... की दर से बढ़ते हैं. 


ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था कि उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाएजनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया. पहली, जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो; दूसरी, जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो और तीसरी, जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो. पहली और दूसरी स्थिति में जनसंख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरीमहामारीयुद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालनआत्मसंयमदेर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी. यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?


कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. हम सभी को जनसंख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.

 







 

03 जून 2021

प्राकृतिक आपदाओं का माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत से सह-सम्बन्ध

सकल विश्व वर्तमान में एक चीनी वायरस, कोरोना की चपेट में आया हुआ है. यद्यपि इस सम्बन्ध में यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं द्वारा इसके प्राकृतिक वायरस होने की बात कही गई है तथापि इस थ्योरी पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है. इस अविश्वास का कारण स्वयं चीन है. बहरहाल, अभी इस पर चर्चा नहीं. आज हम चर्चा करते हैं जनसंख्या सिद्धांत की. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है.



माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन (Principle of Population) में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (demographic changes) का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप (Geometrical Progression) में होती है अर्थात जनसंख्या 1248163264128256... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप (Arithmetic Progression) में अर्थात 123456789... की दर से बढ़ते हैं. 

वे अपने सिद्धांत में मानते थे कि प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. इस स्थिति के अनुसार वे आकलन करके बताते हैं कि दो सौ वर्षों में जनसंख्या और संसाधनों में 256 तथा 9 का अनुपात हो जाता है अर्थात दो सौ वर्षों में जनसंख्या में 256 इकाइयों की वृद्धि होती है जबकि संसाधनों में मात्र इकाइयों की. यदि यह बिना नियंत्रण के आगे बढ़ता रहे तो यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा. इस तरह की स्थिति के कारण जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा. इसके चलते भुखमरीकुपोषण सहित अन्य समस्याओं का जन्म होता है.

ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाएजनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया.

1- जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो.
2- जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो.
3- जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो.

पहली और दूसरी स्थिति में जनसँख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरीमहामारीयुद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालनआत्मसंयमदेर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी.

यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. वर्तमान में कोरोना वायरस को इसी रूप में देखा जा सकता है. इसकी पहचान होने के समय मौसम के प्रभावी होने की बात करते हुए कहा जा रहा था कि कोरोना वायरस गर्म क्षेत्रों में ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रहता है. यदि एकबारगी इसे सच मान लें तो हम सभी देख रहे हैं कि आज, मार्च की समाप्ति के बाद भी देश में गर्मी नहीं पड़ी है. लगभग हर दूसरे-चौथे दिन यहाँ बारिश होने के चलते मौसम ठंडा हो जा रहा है. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?

कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. वर्तमान कोरोना परिदृश्य में, भले ही यह चीन द्वारा निर्मित वायरस है, हम सभी को जनसँख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.


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11 जुलाई 2020

विश्व जनसंख्या दिवस पर....

आज विश्व जनसंख्या दिवस है. समझ नहीं आ रहा कि इस दिवस पर बधाई, शुभकामना दी जाएँ या फिर जिस तेजी से हम बढ़ते जा रहे हैं, उसके लिए दुःख प्रकट करें? सोचियेगा, क्या किया जाये? 



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