11 अप्रैल 2019
चित्रों और शब्दों के संयोजन से उभरे शब्द-चित्र
14 जनवरी 2019
खुद को खुद के साथ जिन्दगी बनाकर जियो
09 फ़रवरी 2018
अश्कों को दिल में छिपाने का हुनर लाया हूँ
29 अगस्त 2011
शब्द-चित्र = चित्र भी बोलते हैं, शब्दों का भी आकर होता है
07 फ़रवरी 2009
नयी कविता के बहाने से
आज एक लेख नयी कविता पर लिख रहे थे। इस लेख के लिए थोड़ा सी जो सामग्री रखी थी उसके आधार पर लेख को तैयार किया। इसमें कुछ कवियों के काव्य अंश उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किये हैं। कुछ कविताओं के अंशों ने मन को गहराई तक प्रभावित किया, सोचा आप सबके साथ उसको भी बाँटा जाये। हालांकि कुछ कविता-अंशों पर आपत्ति भी है क्योंकि वे हमारे देश की, हमारे लोगों की उस स्थिति का चित्रण प्रस्तुत करते हैं जो वीभत्स सी दिखता है। कहा जाता है कि कविता के द्वारा मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है किन्तु इस तरह के काव्यांश मन को व्यथित कर देते हैं।
यह बात सत्य है कि हमारे समाज में ज्यादातर विसंगतियाँ ही व्याप्त हैं पर क्या उनका निस्तारण कविताओं, लेखों, चित्रों आदि के माध्यम से उनको दर्शा कर किया जा सकता है? हम स्वयं इस बात पर आपत्ति दर्शाते रहते हैं कि विदेशी देश में पर्यटन के बहाने आकर हमारी गरीबी, हमारी विसंगति को फोटो रूप में लेजाकर उसका व्यापारिक रूप से प्रयोग करते हैं। यह उनको धनराशि तो प्रकट करवाती है साथ ही हमारे देश की छवि को भी धूमिल करती है।
एक ओर हम अपने कारनामों से देश की स्थिति को सुधार तो पा नहीं रहे हैं और जो विदेशी इस बिगड़ी दशा को मजाक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं उनका भी सामना नहीं कर पा रहे हैं उस पर विद्रूपता ये कि हम खुद किसी न किसी रूप में अपने देश की बिगड़ती स्थिति को विदेशियों के सामने परोस देते हैं। बहरहाल ये बहस का विषय हो सकता है पर यहाँ बहस नहीं कुछ कवितांशों का मजा लीजिए-
(1)
‘मैं एक्सट्रा हूँ
एक्सट्रा यानि कि फालतू
गिनती से ज्यादा
फिलहाल बेकार
बेजरूरत।’
(2)
‘कोई हँसती गाती राहों में अंगार बिछाये ना-
पथ की धूल है ये, इससे प्यार मुझको
कोई मेरी खुशहाली पर खूनी आँख उठाये ना-
मेरा देश है ये, इससे प्यार मुझको!’
(3)
‘याद तो होगा तुम्हें वह मधु-मिलन क्षण
जब हृदय ने स्वप्न को साकार देखा।’
(4)
‘तुम्हारी रेशमीन जुल्फों को सहलाती
मेरे प्यार की लालायित अँगुलियों पर
शोषण के भयंकर भुजंगम दम तोड़ रहे हैं।’
(5)
‘और जब मैं तुम्हें अपनी गोद में लिटाये हुए
तुम्हारे केशों में अपनी अँगुलियाँ फिरा रहा होता हूँ
मेरे विचार हाथों में बंदूकें लिए
वियतनाम के बीहड़ जंगलों में घूम रहे होते हैं।’
(6)
‘झाड़ी के एक खिले फूल ने
नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने
आज मुझे काट लिया
ओठ से
और मैं अचेत रहा
धूप में!’
07 सितंबर 2008
काव्य-पंक्तियों के द्वारा
आज इप्टा के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. संवेदनाओं का सूखा और बुंदेलखंड का किसान विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन भी किया गया था. शहर के प्रबुद्ध वर्ग के लगभग सभी लोग वहां उपस्थित थे. अच्छे वक्ता, अच्छे कवि, अच्छे श्रोता भी अपनी उपस्थिति दर्शा रहे थे. ऐसे अवसर एक बार में मित्रों के मेल-मिलाप के मंच का निर्माण भी करते हैं. अपने साहित्यिक मित्रों, सांस्कृतिक साथियों और अन्य लोगों के साथ विविध विषयों पर चर्चा भी हुई.
बात-बात के बीच, गोष्ठी में वक्ताओं द्वारा, कवियों, शायरों द्वारा काव्य रचनाओं, पंक्तियों को भी सुनाया गया. कुछ ने अपनी लिखी सुनाईं, कुछ ने विषय के अनुरूप दूसरे रचनाकारों की रचनाएं सुनाईं. कुछ पंक्तियाँ ऐसी होतीं हैं कि दिल को छू जातीं हैं। यहाँ भी कुछ पंक्तियों ने दिल को छू लिया. ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ आपके साथ भी बाँटना चाह रहे हैं. गौर फरमाइयेगा-
एक मित्र ने आज के हालातों पर बात करते-करते कुछ पंक्तियाँ पढीं, आज के सन्दर्भ में बड़ी ही सार्थक लगीं-
राजा ने कहा रात है,
रानी ने कहा रात है,
प्रजा बोली रात है........
ये सुबह-सुबह की बात है।
जावेद की कविता गाँवों के किसानों, कुम्हारों, मजदूरों का मार्मिक चित्रण करती दिखी। उसकी कुछ पंक्तियाँ आपकी नजर हैं।
कोई लेता नहीं घडे, दीवाली के दिए।
अब किसानों ने सदा को चाक धोकर रख दिए।
पनघट सूने, पनिहारिन भी दिखती नहीं।
अब पथिक भी जा रहे हाथ में थर्मेस लिए।
किसानों की दशा को दिखाते एक मित्र की पंक्तियाँ थी कि
कोई नहीं आकर गाँवों की ख़बर है लेता,
भूखे पेट सोते उसी के बच्चे, जो सभी को अन्न है देता।
कार्यक्रम का सञ्चालन कर रहे युशुफ इश्तिहाक ने बीच-बीच में काव्य पंक्तियों से गोष्ठी को प्रभावी बना दिया। एक दो पंक्तियाँ उनकी भी अच्छी लगीं.
उनको तो अपना घर सजाना था,
मेरे घर का लुटना एक बहाना था।
इसके अतिरिक्त बहुत सारी पंक्तियों ने अपना रंग दिखाया। बाक़ी कभी बाद में। आज की अपनी पोस्ट का समापन बुन्देलखण्ड की गरिमा, उसके शौर्य आदि को दर्शाते एक गीत के मुखड़े से (ये पूरा गीत यहाँ गया गया, कभी आपको भी सुनवायेंगे, ये गीत बुन्देलखण्ड की अपनी अलग कहानी कहता है)
बुन्देलखण्ड की सुनो कहानी,
बुंदेलों की बानी में।
पानीदार यहाँ का पानी,
आग यहाँ के पानी में।









