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07 जनवरी 2020

विद्यार्थियों का नहीं राजनैतिक है जेएनयू विवाद


चुनाव की तिथियाँ घोषित होने के आसार पहले से ही थे और उसी के हेरफेर में आखिरकार उत्पाती गैंग, लोटा गैंग ने अपना कारनामा दिखा दिया. जेएनयू में पंजीकरण के नाम पर उत्पात किया गया उसके बाद उन्हीं उत्पातियों को अपनी तरह से दूसरे गैंग ने सबक भी सिखाया. पंजीकरण रोकने को मचा उत्पात किसी भी तरह से सुर्ख़ियों में नहीं आ सका मगर उसकी प्रतिक्रिया में जब हंगामा मचा तो सबकी निगाहों में आ गया. खून-खराबा हुआ, लड़कियों से, शिक्षकों से भी हाथापाई हुई. दोनों पक्ष अपनी-अपनी तरह से अपने-अपने तर्क रख रहे हैं. बहरहाल, ये हंगामा अब विश्वविद्यालय से संदर्भित कम केन्द्र सरकार से संदर्भित अधिक हो गया है. विश्वविद्यालय के विद्यार्थी गुटों की आपसी तनातनी से अधिक ये केन्द्र सरकार के निर्णयों के विरोध का हो गया है. यदि ऐसा न होता तो फिर उत्पात के बाद बामपंथियों द्वारा फ्री कश्मीर, हिन्दू राष्ट्र विरोधी, ब्राह्मण विरोधी, हिंदुत्व विरोधी नारे क्यों लगाये गए? स्पष्ट सी बात है कि इस उत्पात के बहाने बामपंथियों ने या कहें कि भाजपा-विरोधियों ने चुनावी रंगत को जमाना शुरू कर दिया है.

यदि इस हंगामे को, मारपीट को महज विद्यार्थी गुटों की लड़ाई माना जाये तो वे सारे लोग जो किसी न किसी रूप से हॉस्टल से अथवा विश्वविद्यालय की राजनीति के संपर्क में रहे हैं सहजता से बता सकते हैं कि ये हंगामा विद्यार्थियों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करवाया गया है. यदि ये हंगामा विद्यार्थियों के आपसी तनाव का, विभेद का मसला है तो इसमें वे राजनीतिज्ञ शामिल क्यों हुए जो अब किसी भी रूप में विश्वविद्यालय का हिस्सा नहीं हैं? इस संघर्ष में क्यों वे लोग शामिल होते चले जा रहे हैं जिनका न तो शिक्षा से कोई लेना-देना है और न ही शैक्षिक संस्थान से? स्पष्ट है कि ये दो विद्यार्थी गुटों का नहीं वरन राजनीति का उत्पात है. जो लोग भी हॉस्टल की जीवन-शैली से परिचित रहे होंगे, कॉलेज की गुटबंदी को जिसने पास से देखा होगा उसके लिए समझना आसान है कि ऐसे संघर्ष, ऐसी मारपीट आये दिन गुटों में होती रहती है. किसी दिन कोई एक गुट हावी रहता है, किसी दिन दूसरा गुट हावी हो जाता है. इस संघर्ष में, इस तनाव में किसी तरह का ऐसा मुद्दा मुख्य नहीं होता है जैसा कि इस उत्पात के बाद जेएनयू में दिख रहा है. 

इस तरह के तनाव, उत्पात जहाँ राजनीति के चलते बढ़ते जा रहे हैं वहीं इनके पीछे मीडिया का भी हाथ है. इसमें सोशल मीडिया को कतई दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से ज्यादा दोषी तो वर्तमान में सोशल मीडिया ही है, ऐसे तनाव, संघर्ष के लिए. हर हाथ मोबाइल से लैस है. ऐसे में एक व्यक्ति उत्पात को अंजाम दे रहा होता है, दूसरा व्यक्ति उसको सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में लगा होता है, तीसरा व्यक्ति उसे शेयर करके उसका फैलाव करता है तो चौथा व्यक्ति उस पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके उत्पात को भड़काने का काम करता है. ऐसे न जाने कितने-कितने ग्रुप छोटे-बड़े रूप में बड़े योजनाबद्ध तरीके से कुत्सित मंसूबों को सफल बनाने के प्रयास करते रहते हैं. समाज में लोगों के बीच आग लगाने का काम करते हैं. वर्तमान में जेएनयू विवाद के पीछे विशुद्ध रूप से दिल्ली विधानसभा का होने वाला चुनाव है. इस चुनाव के चलते विद्यार्थियों की आड़ में केन्द्र सरकार के निर्णयों का विरोध करने और मतदाताओं के बीच नकारात्मक सन्देश प्रसारित करने की स्पष्ट मंशा दिख रही है.

11 मार्च 2016

जेएनयू की साख पर बट्टा



कहा जाता है कि बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की. कुछ ऐसा ही हो रहा है अब देश की विश्वप्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थान, जेएनयू के साथ. सरकारी विरोध की मंशा के साथ आयोजित किये गए बरसी कार्यक्रम के साये में जो कुछ भी हुआ वो किसी से छिपा नहीं है मगर इस पर्दादारी के पीछे से जो-जो कुछ अब सामने आ रहा है वो अवश्य ही विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय की साख पर सवाल उठाता है. देश की बर्बादी के नारे, आतंकी को शहीद बताये जाने के बाद गिरफ़्तारी का, आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर चला उसके बाद से प्याज के छिलके की तरह एक-एक करके अनेक परतें उघड़ने लगी. राष्ट्रद्रोह के आरोपी छात्र की गिरफ़्तारी से लेकर जमानत पर उसकी रिहाई के बीच बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ जिसे किसी भी रूप में महज षड्यंत्र नहीं कहा जायेगा वरन स्तरीय विश्वविद्यालय की स्तरीयता में गिरावट अवश्य समझा जायेगा. आरोपी छात्र की रिहाई के पूर्व तो उसे नायक बनाये जाने का कारनामा अनेक लाल सलाम वाले विद्यार्थी संगठन तो कर ही रहे थे साथ ही देश के अनेक बुद्धिजीवी भी उसे नायक बनाये जाने की कवायद करते देखे जा रहे थे. शर्मसार करने वाली बात तो ये रही कि देश के अनेक राजनैतिक दल, संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी उसके समर्थन में खड़े दिखे. ये लोग महज इतने पर ही शांत रहने को तैयार नहीं थे और विश्वविद्यालय अपनी साख के संकट को महसूस भी कर रहा था.
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आरोपी छात्र की जमानती रिहाई के तुरंत बाद का घटनाक्रम किसी भी रूप में सशक्त और स्वस्थ लोकतंत्र की कहानी नहीं कहता है. राष्ट्रद्रोह के आरोपी को नायक बनाये जाने का शिगूफा चलाया जा रहा था. इसी शिगूफे में उस कथित नायक के द्वारा जहाँ सरकार को, प्रधानमंत्री को असफल बताया गया वहीं सेना को बलात्कारी घोषित करवा दिया गया. आरोप-प्रत्यारोप के दौर में बंद मुट्ठी लगातार खुलती रही तो उसके भीतर से कभी कंडोम मिले तो कभी विश्वविद्यालय में अशालीन पोस्टर्स का लगा होना सामने आया. कभी सेना को बलात्कारी बताया गया तो उसी के साये में आरोपी छात्र को यौन शोषण मामले का आरोपी भी बताया गया. छात्र-छात्राओं के अंतरंगता के चित्र सामने आने लगे तो कई-कई स्त्रोतों से संस्थान के भीतर अन्य अवैध संक्रियाओं की संलिप्तता की तस्वीरें भी वायरल होने लगीं. ड्रग्स के मामले, यौन शोषण के मामले, दैहिक संबंधों की उन्मुक्तता के मामले, देश-विरोधी क्रियाओं के लगातार चलते रहने के मामले एक-एक करके विश्वविद्यालय के नाम को अर्श से फर्श पर लाने का काम करने लगे. इन घटनाओं के अलावा जैसा कि जेएनयू के विद्यार्थियों को दिल्ली में रिहाईश की समस्या आने, मकान मालिकों द्वारा मकान खाली करवाए जाने, मकान न दिए जाने की घटनाओं के साथ-साथ बसों, ऑटों, रिक्शा वालों द्वारा भी भेदभाव किये जाने की खबरें सामने आई हैं. ये किसी भी रूप में सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती है. चंद विद्यार्थियों की इस तरह की संलिप्तता ने समूचे संस्थान पर ऊँगली उठा दी है.
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यहाँ समझना कठिन है कि ऐसा किया जाना सही है अथवा इस पर्दादारी का बने रहना ही उचित था? देश-विरोधी प्रदर्शन के बाद, आतंकी के समर्थन में लगते नारों के बाद की कार्यवाही उचित रही या अनुचित? लगातार अमर्यादित टिप्पणियाँ करने, देश के सैनिकों, सेना पर सवाल उठाने से राष्ट्रद्रोह के आरोपी छात्र के जमानत पर रिहा किया जाना उचित रहा या अनुचित? अपने-अपने वर्ग के, अपने-अपने संगठन के अपने-अपने विचार हो सकते हैं किन्तु एक सत्य तो ये है ही कि इस घटना से देश के साथ खड़े लोग और देश के विरोध में खड़े लोग नजर आ गए हैं. देश-हित सदैव सीमा पर बन्दूक लेकर खड़े होना नहीं और देश-विरोध का अर्थ देश के अन्दर आतंकी गतिविधि को अंजाम देना मात्र नहीं है. विश्वविद्यालय में हो रही गतिविधियाँ जिस तरह से एक के बाद एक करके सामने आ रही हैं उन्हें देखकर लगता है कि विश्वविद्यालय में एक बहुत बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर देश को खोखला करने का कार्य कर रहा था, देश को दीमक की तरह चाट रहा था. ये और बात है कि देश की अखंडता, सहिष्णुता, एकता को विदेशी हमलों ने, विदेशी आक्रान्ताओं ने खंड-खंड नहीं कर पाया तो एक संस्थान के कुछ विद्यार्थियों द्वारा ऐसा किसी भी सूरत में नहीं किया जा पाता. बावजूद इस निश्चिंतता के विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थान की भीतरी गतिविधियों के गोपन के अगोपन होने ने जेएनयू की साख पर बट्टा लगाया है.
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