समाधान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समाधान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 सितंबर 2025

जल के साथ न खेलें खेल

हम सभी को संभवतः याद हो कि कुछ समय पूर्व खबर आई थी कि चेन्नई देश का पहला ऐसा शहर हो गया है जहाँ भूमिगत जल पूरी तरह से समाप्त हो गया है. यह खबर चौंकाने से ज्यादा डराने वाली होनी चाहिए थी मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. इस खबर ने हम लोगों को न ही चौंकाया और न ही डराया. इसे एक समाचार की तरह, एक जानकारी की तरह देखने-सुनने के बाद जल के साथ खेल करना जारी रखा. यह असंवेदनशीलता तब है जबकि हम सभी को जानकारी है कि धरती के सत्तर प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी मात्र एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. ऐसा अनुमान है कि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इस अनुपलब्धता के कारण संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष पैंतीस लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है.

 

जल-संकट की स्थिति को यदि अपने देश के सन्दर्भ में देखे तो वर्तमान में लगभग बीस करोड़ भारतीयों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हो पाता है. नगरों में भूगर्भीय जल का अत्यधिक दोहन होने के कारण शहरी क्षेत्र जल-संकट से परेशान हैं. पेयजल की कमी होने से एक तरफ पेयजल संकट बढ़ा है वहीं दूसरी तरफ पानी की लवणीयता भी बढ़ी है. देश में औद्योगीकरण ने, जनसंख्या की तीव्रतम वृद्धि ने जल-संकट उत्पन्न किया है. प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या के आँकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद प्रतिव्यक्ति पानी की उपलब्धता में साठ प्रतिशत की कमी आयी है. सरकार के नीति आयोग ने जल संकट के प्रति आगाह करने वाली कंपोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स, ए नेशनल टूल फॉर वाटर मेज़रमेंट, मैनेजमेंट ऐंड इम्प्रूवमेंट नामक एक रिपोर्ट  में माना था कि भारत अपने इतिहास के सबसे भयंकर जल संकट से जूझ रहा है. देश के क़रीब साठ करोड़ लोगों अर्थात पैंतालीस प्रतिशत जनसंख्या को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. इसी रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2020 तक देश के इक्कीस प्रमुख शहरों में भूगर्भ जल समाप्त हो जाएगा. वर्ष 2030 तक देश की चालीस प्रतिशत आबादी को पीने का पानी उपलब्ध नहीं होगा.

 



चेन्नई के साथ-साथ दिल्ली, हैदराबाद, बेंगलुरु आदि को भूगर्भ जल संकट के रूप में चिन्हित किया जाना नीति आयोग के आँकड़ों की भयावहता को दर्शाता है. इस भयावहता की तरफ आज भी लोग संवेदित नहीं हो सके हैं. जिस देश में जहाँ सदानीरा नदियाँ बहा करती थीं, कुँए, तालाब, झीलें जल के परंपरागत स्त्रोत हुआ करते थे, वहाँ जल-संकट उत्पन्न होना वहाँ के नागरिकों द्वारा उठाये जाने वाले असंवेदित कदम ही हैं. नगरीकरण ने परंपरागत जल-स्त्रोतों- कुँओं, तालाबों और झीलों को निगल लिया है. देश में वर्तमान में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 2000 घनमीटर है. यदि हालात न सुधरे तो आगामी वर्षों में जल की उपलब्धता घटकर 1500 घनमीटर रह जायेगी. वैज्ञानिक आधार पर जल की उपलब्धता का 1680 घनमीटर से कम हो जाने का अर्थ पेयजल से लेकर अन्य दैनिक उपयोग के लिए पानी की कमी का होना है.

 

पानी की दिन पर दिन विकराल होती जा रही समस्या के समाधान के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जल की उपलब्धता लगातार कम हो रही और उसके उलट इसकी माँग लगातार बढ़ती जा रही है. देखा जाये तो जल का चौतरफा उपयोग किया जाता है. कृषि में, घरेलू कार्यों में, उद्योगों में तो मुख्य रूप से जल का उपयोग होता ही है, इसके अलावा रासायनिक क्रियाओं में, पर्यावरणीय उपयोग में भी जल का बहुतायत उपयोग किया जाता है. अतः सरकारों और समुदायों को उचित जल प्रबंधन की ओर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है. देश में प्रतिवर्ष बारिश के द्वारा लगभग चार हजार अरब घनमीटर जल की उपलब्ध होता है किन्तु मात्र आठ प्रतिशत जल ही संरक्षित हो पाता है. वर्षा जल को तकनीक के माध्यम से एकत्र किया जा सकता है. इसके लिए बरसात के पानी को खुले में रेन वाटर कैच पिट बनाकर उसे धरती में समाहित कर सकते हैं. इससे एक तो वर्षा जल की बहुत बड़ी मात्रा बर्बाद होने से बचेगी साथ ही जल संचयन के द्वारा भूगर्भ जल स्तर भी बढ़ाया जा सकता है. शहरों में प्रत्येक आवास के लिए रिचार्ज कूपों का निर्माण किया जाना चाहिए, जिससे वर्षा का पानी नालों में न बहकर जमीन में संचयित हो जाये. इसके अलावा प्रत्येक मकान में आवश्यक रुप से वाटर टैंक बनाये जाने चाहिए, जिनमें वर्षा जल को संरक्षित किया जा सके. जल-संकट के दौरान या फिर घरेलू उपयोग की अन्य अवस्था में इस पानी का उपयोग किया जा सकता है.

 

वास्तव में आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जल के किसी भी रूप का पूरी तरह से संरक्षण करें. यह जल भले ही भूगर्भ के रूप में हो, वर्षा जल हो, घरेलू, औद्योगिक रूप से उपयोग का जल हो. इन सभी का पूर्ण रूप से संचय करना होगा. आवश्यकता इसके प्रति लोगों की मानसिकता विकसित करने की, लोगों को प्रोत्साहित करने की. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. अब जल को बचाए जाने की आवश्यकता है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाने के साथ-साथ नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी करना होगा. भविष्य की भयावहता को वर्तमान हालातों से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी. अब समय है कि जल से होने वाले खेल को रोका जाये.

 


12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


.

08 जनवरी 2021

ऐतिहासिक निकली हरे रंग की स्याही

कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, उसे कोई न कोई शौक भी होता है। ये बात और है कि बहुत से लोगों को प्रतिभा निखारने का, उसे दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता, इसी तरह बहुत से लोग किसी न किसी कारण से अपने शौक भी पूरे नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों के लिए आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि पक्ष भी जिम्मेवार होते हैं। इसके साथ-साथ व्यक्ति किस स्थान, किस शहर, किस परिस्थिति में रह रहा है, यह भी शौक एवं प्रतिभा के संदर्भ में महती भूमिका निभाते हैं। 

बचपन से ही फाउण्टेन पेन से लिखने की आदत बनी और कालांतर में यही आदत शौक के रूप में भी विकसित हो गई। आज भी मोबाइल, कम्प्यूटर के दौर में प्रतिदिन फाउण्टेन पेन से लिखना होता है। लिखने के शौक के साथ-साथ अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करना भी शौक जैसा ही है। लिखने के साथ-साथ फाउण्टेन पेन का प्रयोग स्केचिंग के काम में, कैलीग्राफ़ी में भी कर लिया जाता है। ऐसे में भी अलग-अलग रंग की स्याही की आवश्यकता होती है। 

ऐसे दौर में जबकि पेन का, विशेष रूप से फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा हो, उरई जैसी छोटी जगह पर तो यह कमी और भी महसूस की जाती है। इस कमी के बीच फाउण्टेन पेन की स्याही की माँग करना एक तरह की ज्यादती ही कही जाएगी। काली, नीली स्याही की उपलब्धता तो फिर भी हो जाती है पर लाल, हरी स्याही की माँग करना आसमान के तारे माँगने जैसा हो जाता है। इसमें भी हरे रंग की स्याही तो उरई में नामुमकिन स्थिति को प्राप्त कर जाती है। कोरोनाकाल और लाॅकडाउन जैसी परिस्थिति के पहले तो उरई से बाहर कहीं बड़े शहर जाने पर स्याही ले आया करते थे। इस बार न हमारा जाना हो सका और अन्य किसी की सुलभता, सहजता न होने के कारण भी हरे रंग की स्याही उपलब्ध न हो सकी।



इधर हरे रंग की स्याही लगभग समाप्ति पर थी। पिछले दो महीने से उरई की दुकानों के चक्कर लगाए जा रहे थे पर हरी स्याही की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी। बिक्री न होने के कारण दुकानदारों की अपनी मजबूरी थी। काफी भागदौड़ और लगभग रोज की पूछताछ के बाद आज अंततः एक दुकान से दो शीशियाँ प्राप्त हो ही गईं। यद्यपि दोनों शीशियों से कुछ स्याही बह भी चुकी है तथापि हाल-फिलहाल लिखने का, स्केचिंग का, कैलीग्राफ़ी का काम बाधित न होगा। समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही हरी स्याही के कारण इन कामों को हरे रंग से करना रोकना, कम करना पड़ा था। 

आज हरी स्याही का मिलना खुशी दे गया तो उनकी पैकिंग तिथि ने आश्चर्यचकित कर दिया। मई 1997 की पैक ही हुई स्याही को सही ठिकाना मिला जनवरी 2021 में। इस स्याही को धैर्य के साथ इस्तेमाल किया जाएगा और सुरक्षित रख लिया जाएगा क्योंकि एक तरह से ये ऐतिहासिक हरी स्याही हो गई। हरी स्याही मिलने के बाद भी हरी स्याही की खोज जारी रहेगी। वैसे जल्द ही कहीं न कहीं सैर को निकला जाएगा और बोरा भरकर हरी स्याही खरीद ली जाएगी। 



.
वंदेमातरम्

26 दिसंबर 2020

समय का स्वागत कर उसे सुखद बनाने का प्रयास हो

बाजार में रोज की तरह सैर-सपाटा करने के दौरान आज एक परिचित से मुलाकात हुई. इधर-उधर की बातों, हालचाल के बाद उनके सामने एक सवाल उछाल दिया. वैसे जो सवाल हमने उनकी तरफ उछाला वो सवाल वैसे प्रतिवर्ष उनकी तरफ से उछाला जाता था. जी हाँ, यह सच है. चूँकि बाजार में उनसे लगभग रोज ही मुलाकात हो जाया करती है. इसी में दिसम्बर माह के अंतिम दिनों में उनकी तरफ से एक सवाल हर बार सामने आता है कि नए साल के लिए क्या संकल्प लिया है? नए वर्ष में क्या नया करने का विचार है? आज बहुत देर तक बातचीत करने के बाद भी उनकी तरफ से ऐसा कोई सवाल नहीं आया तो जरा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस कारण हुआ कि दिसम्बर समाप्ति में अब चार-पाँच दिन शेष रह गए हैं फिर भी उनकी तरफ से शून्यता क्यों?




उनकी तरफ से किसी तरह की पहल न होते देख हमने ही इस बार उनकी जिम्मेवारी का निर्वहन करने का मन बनाया. उनकी तरफ सवाल उछाला कि आने वाले साल के लिए क्या संकल्प कर रहे हो? जवाब में बहुत बुरा सा मुँह बनाते हुए, लगभग नजरंदाज करने जैसा अंदाज दिखाते हुए बोले कुछ नहीं. अब संकल्प-बंकल्प लेना बंद. हमारा प्रश्नवाचक स्वरूप देख कर वे आगे बोले कि इस साल भी कुछ सोचा था, कुछ संकल्प लिए थे मगर इस साल की तो पूरी तरह से रगड़ लग गई. सारे के सारे संकल्प धराशाही हो गए. इसलिए अब आगे से कोई संकल्प नहीं. समय का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या हो जाये. हमें समझ आ गया कि कोरोना के चलते वे इस वर्ष को कोसने में लगे हैं और उसी के चलते आने वाले वर्षों के लिए किसी तरह के संकल्प की नीति पर नहीं चल रहे.


हमने हँसते हुए उनको दिलासा दिलाई कि एक साल ऐसा निकल गया, इसका ये मतलब तो नहीं है कि आने वाले सभी वर्ष ऐसे ही निकलेंगे. हो सकता है कि आने वाला साल या फिर उसके बाद के आने वाले साल बहुत बेहतरीन निकलें. संभव है कि जो-जो सोचा जाये, जो भी संकल्प लिया जाये वो सब आने वाले वर्षों में पूरे हो जाएँ. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव न दिखने पर उनके सामने फिर सवाल उछाला कि अच्छा चलो, यह साल ख़राब निकल गया. पिछले सालों में तुमने अपने कितने संकल्प पूरे कर लिए? पिछले वर्षों में तुम्हारे सोचे हुए कितने काम पूरे हुए? वे साल तो इस साल जैसे बुरे नहीं थे. उनमें तो इस वर्ष जैसी कोई बीमारी नहीं फैली थी. उनकी तरफ से कोई जवाब न आता देख समझाया कि समय के हाथों में बहुत कुछ है जो हमारे हाथ में नहीं मगर हमारे हाथ में इसके बाद भी इतना कुछ है जो समय को बदल सकता है. संकल्प लेना न लेना तुम्हारा अपना निजी मसला हो सकता है मगर किसी एक वर्ष के बुरे निकल जाने के कारण से आने वाले समूचे समय को बुरा समझने लगना नितांत नकारात्मक सोच है. इस नकारात्मकता से बाहर निकलने की जरूरत है.


उनके चेहरे की मुस्कराहट से लगा कि बात सही जगह पहुँच सकी है. ये हम सभी को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो समय निकल गया जरूरी नहीं कि आने वाला समय भी वैसा ही निकले. निश्चित ही यह साल बहुत ही ख़राब रहा मगर इसके बाद भी इसमें बहुत कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलीं. देखा जाये तो प्रत्येक वर्ष अच्छे और बुरे का संयोग लेकर आता है. हम अपने ऊपर घटित होने वाली घटनाओं के अनुसार उस वर्ष का आकलन करने लगते हैं. वास्तविक रूप में तो हमें समय का स्वागत करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सभी अपने कदमों से, अपने कार्यों से, अपने प्रयासों से उस समय को सुखद, खुशनुमा, बेहतर बना सकें.


.
वंदेमातरम्

22 दिसंबर 2020

बॉल पेन की पहेली का समाधान

उस दौर में जबकि जीवनशैली एकदम सामान्य थी, न बहुत तामझाम, न बहुत चमक-धमक, न बहुत शोर-शराबा, उस समय कोई भी नई चीज अजूबा सी दिखाई पड़ती थी. आप लोगों से इस बारे में एक बार कायनेटिक होंडा स्कूटर के बारे में अपना मजेदार अनुभव शेयर कर ही चुके हैं. उस समय बचपना भी था जो आज के बच्चों की तरह नहीं था. उन दिनों के लोग, समाज, आसपास का परिवेश भी एकदम पारिवारिक हुआ करता था. खैर, बात इसकी नहीं, यहाँ आज बात एक अजूबे से पेन की. जी हाँ, पेन मगर फाउंटेन पेन नहीं बल्कि एक बॉल पेन की.


उन दिनों फाउंटेन पेन से ही लिखना हो रहा था. यदि बॉल पेन मिलता था तो एक शार्प का बॉल पेन आया करता था, पूरी बॉडी पारदर्शी होती थी और उस पर नीले रंग का ढक्कन लगा हुआ करता था. इसके अलावा एक और बॉल पेन का उपयोग हमें करने की याद है जो रंगीन (कोई एक रंग का) बॉडी का हुआ करता था. एक पेन कभी-कभी चाचा या पिताजी का, घर में उपयोग कर लेते थे, शायद Jotter पेन था. यह पेन ऊपर से क्लिक करके खुलता और बंद होता था. इनके अलावा बाजार में और भी अच्छे बॉल पेन हुआ करते थे मगर उन दिनों इतना जेबखर्च भी नहीं मिलता था कि हम खुद कोई पेन खरीद सकें. इसके लिए घर पर निर्भरता बनी हुई थी. ऐसे में बॉल पेन की माँग होने पर इन्हीं दो पेन की सहायता से आपूर्ति की जाती थी.




शायद कक्षा छह में होंगे, एक दिन हमारे मित्र अभिनव ने एक बॉल पेन दिखाया जो अभी तक हमारे द्वारा उपयोग किये गए पेन से एकदम अलग. खिलते हुए रंग में (था ये भी एक ही रंग का) बॉल पेन मगर उसमें कोई ढक्कन नहीं, न खींच कर खोलने के लिए, न चूड़ीदार. इसके ऊपर आमतौर पर देखी जाने वाली क्लिक बटन भी नहीं थी, जिसे चटर-पटर करके रिफिल निकाली जा सके, लिखा जा सके. इसमें ऊपर एक बटन जिसे दबाने से वह वहीं बने छेद में फँस जाती और रिफिल निकल आती. बाद में उसी को दबाने से रिफिल अन्दर चली जाती अर्थात पेन बंद हो जाता. यह बहुत अजूबा सा नहीं लगा. अजूबा इसमें रिफिल डालने-निकालने वाला सिस्टम लगा.


इस पेन में कहीं से भी ऐसी जगह नहीं दिख रही थी जिसे खोलकर उसमें से रिफिल निकाली जा सके, रिफिल डाली जा सके. यह हमारे लिए आश्चर्य की बात थी. अभिनव ने कहा कि ये बताओ कि इसमें रिफिल कहाँ से डलेगी? पेन के मामले में हम बचपन से ही नशेबाज जैसी स्थिति में रहे हैं. उससे कहा कि बस पाँच मिनट को पेन हमारे हवाले करो, अभी इसकी पूरी साइंस तुम्हारे सामने रखते हैं. ये तो मालूम था कि रिफिल इसमें डली है तो कहीं का कहीं से डाली ही गई होगी. उस समय तक हमारा सामना यूज़ एंड थ्रो पेन से नहीं पड़ा था, इसलिए ये समझते थे कि पेन फेंका नहीं जायेगा.


उस अजूबा से पेन को हमने अपने हाथ में लिया. दो-चार बार इधर-उधर पलता. दो-चार बार उसकी क्लिक बटन को दबाया. इसी में समझ आ गया कि इसमें रिफिल कहाँ से डाली जाएगी. बस एक झटके में उस क्लिक बटन के उस हिस्से को जो छेद में फँसता था, अँगूठे से दबाकर ऊपर खींच दिया. क्लिक बटन बाहर और उसी से रिफिल डालने की जगह बन गई. शायद कम्फर्ट कंपनी का बॉल पेन था वह. उस पेन के बाद उसके बहुत से पेन उसी तरह के निकले, खूब सारे पेन धीरे-धीरे करके इकट्ठे भी कर लिए गए जो समय के साथ काल-कलवित हो गए. एक बॉल पेन बचा रह गया जो बॉल पेन, फाउंटेन पेन की सफाई के दौरान मिला. उसे देखकर वे दिन फिर याद आ गए.


.
वंदेमातरम्

08 जुलाई 2020

एक बार अंतिम युद्ध कर लो, शायद जीत जाओ

फिल्म इंडस्ट्री में एक कलाकार ने आत्महत्या क्या की, ऐसा लगने लगा जैसे देश की पहली आत्महत्या है. कुछ लोग इसे हत्या भी बता रहे. एक पल को इस पर विचार कर लिया जाये, तब भी जिस तरह से समाज की युवा पीढ़ी इस पर अपना दिमाग केन्द्रित किये है, लग रहा है जैसे देश में पहला केस है जो हत्या से संदर्भित है. इसी अवधि में कई और हत्याएँ हो चुकी हैं. पूरे के पूरे परिवार को नृशंस तरीके से मौत के घाट उतार दिया है मगर एक कलाकार के लिए धरती हिला देने वालों के दिमाग पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा इन हत्यायों से.


बहरहाल, सभी का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है, सभी से अपनी तरह का लगाव होता है, संभव है कि उस कलाकार से भी वैसा लगाव रहा हो. इस एक आत्महत्या की घटना के पहले भी और इसके बाद भी समाज में इधर आत्महत्याओं का एक सिलसिला सा चल पड़ा है. कहीं किसी शिक्षक द्वारा, कहीं किसी पत्रकार द्वारा, कहीं किसी बेरोजगार द्वारा, कहीं किसी परिवार के मुखिया द्वारा ऐसा किये जाने की खबरें आ रही हैं. सबके अलग-अलग हालात रहे होंगे, इससे इंकार नहीं मगर एक सवाल उठता है कि उसके आत्महत्या करने से क्या हालात सुधर गए होंगे? क्या जिन परिस्थितियों से हारकर उसने आत्महत्या की होगी, वे स्थितियाँ अब सही हो गई होंगीं? परिवार को जिस कष्ट में न देख पाने के कारण किसी व्यक्ति ने अपनी जान ले ली क्या अब वे परिजन उस कष्ट से मुक्त हो गए होंगे? यहाँ बस इतना हुआ कि व्यक्ति स्वयं जिस कारण से परेशान रहा होगा वह उनसे मुक्त हो गया. उसके बाद उसके परिजन किस कष्ट से जूझ रहे होंगे, उसे अब कोई चिंता नहीं. उसके बीवी, बच्चे अब किस गली में भीख माँग रहे होंगे, उसे किसी की चिंता नहीं. उसके बूढ़े माँ-बाप किसके सहारे अपना जीवन गुजारेंगे इसके बारे में भी कोई फ़िक्र नहीं.


आत्महत्या करके वह व्यक्ति खुद को सभी कष्टों से मुक्त कर लेता है या कहें कि कायराना हरकत दिखाते हुए दुनिया से, समाज से मुँह छिपा लेता है. अपने आपको कमजोर साबित करते हुए अपनी भी परेशानियों को अपने परिजनों के सिर पर थोप जाता है. हमारी नजरों में यह निश्चित ही कोई वीरतापूर्ण कदम नहीं कहा जायेगा, शेष सबकी अपनी राय. इसी संबंध में हमारा मानना है कि हारने या आत्महत्या के पहले एक बार अंतिम युद्ध कर लो, शायद जीत जाओ.

.

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 जून 2020

कोरोना संक्रमण से सम्बंधित कुछ प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा

कोरोना संक्रमण को लेकर बहुत सी बातें लगातार सामने आ रही हैं. सामाजिक, शारीरिक दूरी बनाये जाने की बातें की जा रही हैं. हाथ धोने के तरीके बताये जा रहे हैं. इन सबके बीच कुछ शंकाएँ हैं, मन में. शंकाएँ इसलिए क्योंकि जो प्रश्न मन में उठते हैं उनके बारे में समाधान खुद से ही खोज लेते हैं मगर उनके बारे में स्पष्ट उत्तर मिलते नहीं.



सवाल ये हैं कि कोरोना संक्रमण फैलने का मूल कारण क्या है?
+
यदि दो व्यक्ति एकसाथ सटे हुए बैठे/खड़े हैं. उनमें एक व्यक्ति पॉजिटिव है और दूसरा स्वस्थ. वे आपस में किसी तरह की बातें न करें (ड्रॉपलेट सम्बन्धी कोई कारण न हो) तो भी क्या दूसरा व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
+
किसी स्वस्थ व्यक्ति ने किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया या फिर किसी संक्रमित वस्तु को छू लिया तो क्या वो पॉजिटिव हो जायेगा?
+
यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति/वस्तु को छूने के बाद अपने हाथ को आँख, नाक, मुँह में नहीं लगाता तो भी क्या वह संक्रमित हो जायेगा?
+
ऐसी स्थिति में कितने देर रहने के बाद उसकी हथेली संक्रमण मुक्त हो जाएगी, यदि उसे साबुन न मिले, सेनेटाइजर न मिले? या वह संक्रमित ही बनी रहेगी?
+
यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी ऐसी जगह बैठ जाए जिसे किसी संक्रमित व्यक्ति ने छू लिया हो या वहाँ कोई संक्रमित व्यक्ति बैठा रहा हो तो क्या वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
+
कोरोना संक्रमित व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से से छूने से संक्रमण फैलेगा? क्या पॉजिटिव व्यक्ति का पूरा शरीर संक्रमित हो जाता है?
+
कहा जा रहा है कि संक्रमण मुँह, आँख, नाक के सहारे फेफड़ों तक ही हो रहा है, ऐसे में किसी संक्रमित व्यक्ति का पूरा शरीर किस तरह/किस कारण संक्रमित हो जाता है?
+
संक्रमित व्यक्ति जो कपड़े पहने होता है क्या उसका ऊपरी हिस्सा भी संक्रमित रहता है, जिसे उसने अपनी हथेलियों से न छुआ हो?

सवाल तो बहुत सारे हैं मगर सब इन्हीं के आसपास घूमते-टहलते हैं. इनका जवाब इसलिए भी आवश्यक है, ये जरूरी नहीं कि हमें मिलें बल्कि सबको पता होने चाहिए क्योंकि कोरोना के नाम से जिस भय का व्यापार अब हो रहा है वह खतरनाक है. आज ज्यादातर डॉक्टर्स किसी मरीज को देखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं. वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे बीमार व्यक्ति अपनी आँखों से कोरोना फेंक रहा है.

इन सवालों के जवाब इसलिए भी मालूम होने चाहिए क्योंकि जिस तरह से लोगों का बाहर निकलना हो रहा है, जिस तरह से सभी कार्यालय, संस्थान अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं उससे कोरोना संक्रमण बढ़ने की ज्यादा सम्भावना है. मास्क को लेकर, हाथ धोने को लेकर, ड्रॉपलेट को लेकर, मौसम को लेकर, वायरस के जीवित रहने को लेकर जिस तरह से अलग-अलग बातें निकल कर सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं. ऐसे में इस तरह के और दूसरे सवालों को उठाया जाना चाहिए, उनका समाधान खोजना चाहिए. सुरक्षा तो अपनी जगह है, संभव है कि ऐसे सवालों से प्राप्त जानकारी से भी सावधानी बढ़ाई जा सके.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

13 जून 2020

समय और यादों की साजिश है गलतियों का एहसास करवाना

आजकल निपट खाली बैठे हैं. जब लॉकडाउन लगा था तो सोचा था कि तमाम अधूरे काम निपटा लिए जायेंगे मगर आज तक सिर्फ सोचना ही हो रहा है. इस सिर्फ सोचने भर ने जीवन में बहुत नुकसान किया है हमारा. बहुत से बनते काम इसी सोचने के चक्कर में बिगड़ गए हैं. सोचने का काम इतनी तल्लीनता से होता है कि सम्बंधित विषय के ऐसे-ऐसे बिन्दुओं तक पर सोच लिया जाता है जिनका दूर-दूर तक कोई भविष्य, वर्तमान नहीं. बहरहाल, इसी खाली बैठे रहने में बहुत सी बातें याद आती हैं. बहुत सी यादें दिल-दिमाग में फिर से अंकुरित होकर खुद के आसपास उनका एहसास करवाने लगती हैं.


ये यादें भी बड़ी अजब सी स्थिति है. समझ नहीं आता कि ये दिल की स्थिति है या फिर दिमाग की? भूतकाल से जुड़े होने के बाद भी यादें वर्तमान को प्रभावित करती हैं साथ ही भविष्य की राह पर भी अपने निशान बनाने का दम रखती हैं. इन दिनों तमाम ऐसी यादों से दो-चार हो रहे हैं जो सुखद एहसास नहीं दे रहीं. बार-बार कोशिश होती है कि उन यादों को अपने आसपास फटकने न दें मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है. हमारे अपने जीवन में बहुत कम ऐसा हुआ है जबकि हम परेशान रहे हों या फिर किसी स्थिति-परिस्थिति से हम खुद को बाहर न निकाल पाए हों. इस बार समझ नहीं आ रहा है कि हम कहाँ कमजोर पड़ रहे हैं? यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इन यादों को हम अपने सामने खड़ा होने से क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? कई बार लगता है कि ऐसा तो नहीं कि इनको हम खुद ही छूट दिए हों हमारे सामने खड़े होने की? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन यादों के सहारे हम उन दिनों में फिर जाना चाहते हों जो हमारे हाथ से निकल गया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्हीं यादों के रूप में हम अपनी तमाम गलतियों का पश्चाताप करना चाह रहे हों?


बार-बार सोचने, विचार करने के बाद भी निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर असल सत्य क्या है? ये नहीं कहते कि जो समय बीत चुका उसमें हमने कोई गलती नहीं की थी. ये भी नहीं कहते कि वे गलतियाँ हमने जानबूझ कर कीं या फिर किसी को परेशान करने के लिए कीं. इसके बाद भी यदि वही समय सामने खड़ा होकर सवाल-जवाब करे तो कष्ट होना स्वाभाविक है. यह जानते-समझते हुए कि हमारा कोई भी कदम किसी भी तरह से नियोजित नहीं था किसी को भी परेशान करने के लिए, उसके बाद भी आरोपी बनाया जाना, दोषी सिद्ध किया जाना उन्हीं यादों का खेल है. वे यादें अक्सर सामने आकर एहसास करवाती हैं कि हमने कहीं न कहीं गलती की हैं. वे इसका आभास करवाती हैं कि हम कहीं न कहीं दोषी हैं. वे यादें ये भी साबित करती हैं कि अब हमारे हाथ में कुछ नहीं, अब हमें सिर्फ उन्हीं यादों के हाथों परेशान होना है. अब हमें उन्हीं यादों के द्वारा निर्धारित दंड भुगतना है.

ऐसा लगता है कि ये समय की और यादों की मिलीभगत है जो हमें हमारी गलतियों का बार-बार आभास करवाते हुए हमें दण्डित करना चाहते हैं. हम मानते हैं, स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमने गलती की है मगर हम ये भी जानते हैं, ये समय भी जानता है, यादें भी जानती हैं कि अब उन गलतियों का कोई पश्चाताप नहीं. या कहें कि पश्चाताप करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि यदि फायदा होना होता तो उसी समय मिल गया होता जबकि पूर्व में कई-कई बार पश्चाताप किया, अपना दोष स्वीकारा.

आज फिर स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमसे गलतियाँ हुईं हैं मगर इसका समाधान क्या है? क्या समय, यादें हमें ऐसे ही परेशान करती रहेंगी? क्या ये ऐसे ही हमें आभास करवाती रहेंगी हमारी गलतियों की? यदि ऐसा है तो क्या वाकई इतनी बड़ी गलतियाँ हुई हैं हमसे? क्या वाकई इतने बड़े दोषी हैं हम?

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 मई 2020

तेरे संग जीने को, बदलना होगा आदतों को

जब चीनी वायरस कोरोना ने हंगामा काटना शुरू किया था तो लोगों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया था. अपने देश में तो इसे गंभीरता से लेना तो अभी भी शुरू नहीं किया गया है. पता नहीं इस देश के लोग किस मिट्टी के बने हैं जो गंभीर मसलों पर गंभीरता नहीं दिखाते और अनावश्यक मामलों में बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं. गंभीर न रहने की इसी मानसिकता ने संकट खड़ा कर दिया है. जिस तरह से इस वायरस के बारे में कहा जा रहा है यदि सभी लोग पूरी तरह से लॉकडाउन का पालन करते तो स्थिति इतनी भयावह न होती.


वैश्विक भयावहता देखने के बाद बहुत सारे लोग कहने लगे हैं कि अब सभी को इस वायरस के साथ जीवन जीने की आदत डाल लेनी चाहिए. सही भी है. अभी जिस तरह से इसकी वैक्सीन बनाये जाने का काम चल रहा है, दवा, टीका आदि के बारे में जिस तरह के प्रयोगों की स्थिति है उसे देखते हुए लग रहा है कि इसके अंतिम रूप से आने में समय लगेगा. तब तक क्या व्यक्ति को भय के साथ जीना पड़ेगा? क्या तब तक समाज में भेदभाव जैसा माहौल दिखेगा? क्या समन्वय बनाने वाली बात की जगह एक-दूसरे को शक की निगाह से देखना पड़ेगा?


आने वाला समय कैसा होगा, इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी. आने वाले समय में लोग किस तरह की जीवनशैली अपनाएँगे, इसे भी ठीक-ठीक कहना मुश्किल है. लॉकडाउन के पहले दो दौर के बाद जब तीसरे दौर में सरकार की तरफ से शराब की दुकानों को खोलने के आदेश आये तो लोग ऐसे टूट पड़े जैसे कोरोना वायरस की दवा बाजार में आ गई हो. इस शराब की दुकानों के अलावा लोगों को सामान्य खरीददारी के लिए, सब्जी के लिए इस तरह भीड़ लगाते देखा है जैसे अपने देश में कोरोना जैसा कोई संकट ही नहीं है. ये स्थिति इतना बताने के लिए पर्याप्त है कि जो लोग घर में रह रहे हैं उनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो बस पुलिस की मार से बचने के लिए. अनेक राज्यों में बाजारों के तमाम दृश्य देखने के बाद लगता नहीं कि आने वाले समय में इन्सान सहनशीलता दिखायेगा, संयम रखेगा.

ऐसे में, संभव है कि हमारे कुछ सुझाव हास्यास्पद लगें (लगें तो हँस लेना क्योंकि इस लॉकडाउन में लोग हँसना भूल गए हैं) मगर हम यहाँ दे रहे हैं. यदि इसी वायरस के साथ जीवन बिताना है, इसकी आदत डालनी ही है तो तकनीकी क्षेत्र से जुड़े हुए लोग ऐसी कोई मशीन का आविष्कार करें जो कोरोना को नापने का काम करे. आखिर दिल की धड़कन नापने की, बीपी नापने की, शुगर नापने की, हीमोग्लोबिन नापने की, आँखों का प्रेशर नापने की, इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिक उपकरणों की क्षमता नापने आदि की मशीन तो हैं ही.  इसी तरह की कोई मशीन आनी चाहिए ताकि वो व्यक्ति जो इस मामले में संवेदित है वह सम्बंधित वस्तुओं में कोरोना को नाप सके, लोगों में कोरोना नाप सके.

इसके अलावा बाजार की दुकानों को अलग-अलग वस्तुओं के हिसाब से अलग-अलग दिनों में खोले जाने जैसे कदम उठाये जाएँ. किसी भी शहर में दिव्यांगजनों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं के अलावा किसी अन्य को सार्वजनिक वाहन इस्तेमाल करने से रोका जाना चाहिए. बाजार आने अथवा एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए निजी वाहन (इसमें भी यदि साइकिल को मान्यता दी जाये तो बेहतर रहेगा) अथवा पैदल को वरीयता दी जाये. इससे एकसाथ कई-कई लोगों के बैठने की संभावना पर अंकुश लगेगा.

अब इसी तरह के उपाय खोजने होंगे, अमल में लाना होंगे, यदि वाकई इसी वायरस के साथ जीना है तो.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 दिसंबर 2019

अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ बनना ही लिखा हो


कई बार सामान्य सी बातचीत भी असामान्य चर्चा की तरफ मुड़ जाती है. ऐसी चर्चा किसी निर्धारित बिन्दुओं के आधार पर अथवा किसी निश्चित विषय निर्धारण के द्वारा रास्ता नहीं पकड़ती है. बस बात की बात निकलते-निकलते कहाँ चली जाती है, समझ नहीं आता है. पिछले दिनों अपने मित्र सुभाष के साथ मैसेज के द्वारा चैटिंग हो रही थी. बातचीत का रास्ता अचानक से दूसरों की समस्या की चर्चा करते-करते खुद पर केन्द्रित हो गया. अकारण, बिना बात बातचीत में एक तरह का गाम्भीर्य दिखाई देने लगा. लगा कि दिल-दिमाग की उथल-पुथल कई बार शब्दों के द्वारा ज़ाहिर होने के लिए कोई न कोई माध्यम खोजती है. सत्य क्या है? इसका अभीष्ट क्या है? बातचीत का आधार बने बिना इस तरह की चर्चा का सूत्र किसके हाथों में रहा? सवालों के बीच अनेक बार इसे पढ़ने के बाद भी निरुत्तर रहे. सो लगा कि बस अब समाधान मिले, जो किसी भी रूप में मिले. मन की, दिल-दिमाग की उलझन, उथल-पुथल को विश्राम मिले. पर फिर वही सवाल कि क्या वाकई मनोस्थिति को, उलझन को, उथल-पुथल को कभी विश्राम मिला है, किसी के जीवन में भी?



= ऐसे में अगले ने अपना विश्वास हम पर रखा है... कम से कम हम खुद की नज़रों में अपराधी नहीं होना चाहते हैं. बहुत जगहों पर हम दोषी हैं पर वे नितांत हमारी हैं, व्यक्तिगत.
+ जीवन दोषो से भरा हुआ है लेकिन दोषों को स्वीकार करना ही दोष का शमन है मनुष्य जीवन में. मनुष्य होने की सीमाएं हैं. 
= हमारे दोषों का शमन नहीं, कई जगह विश्वास तोड़ा है.
+ हमें उन सीमाओं का ज्ञान हो जाये उतना ही काफी है. जीवन इतना थोड़ा सा है भाईसाहब कि कुछ भी अभीष्ट प्राप्त नही होता.
= सही बात, मगर जो सुधारा न जा सके और ये भी जानकारी हो कि खुद के कारण बिगड़ा है तो....?
+ कम से कम सच को खुद को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस लाना चाहिए. बस खुद की नजरों में न गिरें. स्वीकारोक्ति भी निश्छलता का ही पर्याय है.
= कम से कम हम अपने बारे में जानते हैं, सो समझते हैं. कुछ गलतियाँ चाह कर भी सुधारी न जा सकती हैं.
+ निश्छलता हर दोष के कलंक को कम करती है. गलतियां नही सुधरती, गलतियां तो घटनाएं हैं. घटना की पुनरावृत्ति न हो यही सुधार है बस. गलतियां तो जीवन का अभिन्न चरण हैं.
= कोशिश यही है.....
+ मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी मनुर्भव का लक्ष्य शायद इसीलिए स्थापित किया गया हमारे ऋषियों द्वारा.
= जब खुद की गलती से किसी और को सजा भुगतते देखते हैं तो ये सारी फिलोसोफी गायब हो जाती है.
+ फिलोसोफी की काट केवल फिलोसोफी ही है वरना मनुष्य मन सिवा बेचैनी की खान के सिवा और क्या है? या तो खाओ पीओ सड़ते रहो, बस. जरा सा चैतन्य हुए तो गलतियां मुंह बाए खडी. फिर यही फिलोसोफी ही तिनके का सहारा है.
= कुछ स्थितियाँ समझ के बाहर हैं, खुद हमारे.
+ आप हर घटना का भौतिक समाधान करते हैं, एकदम जमीनी, प्रशासन की तरह जबकि कुछ घटनाएं राजनैतिक समाधान मांगती हैं.
= कई बार लगता है कि दुनिया जहां की स्थितियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं और खुद गलतियों के पाताल में खड़े हैं.
+ यही आपकी जीत है कि आप अनुभव करने की योग्यता रखते हैं.
= या खुद को भ्रमित करने की?
+ कह सकते हैं.
= यही सत्य है.
+ सत्य भी कहाँ एक है? सबके अपने-अपने हैं
= ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि बहुत सी जगह खुद को आज तक माफ़ न कर सके. कोशिश करते हैं कि और किसी के साथ गलत न होने दें.
+ गलतियों से खुद को बांधे रखना भी तो एक बन्धन ही है. बन्धन सदा दुख आमन्त्रित करता है. गलितयों को स्वीकारोक्ति ही शमन है.
= खुद की गलतियों से  मुक्ति भी चाहिए.
+ यही जीवन भर का सन्धान शेष रह जाता है. ये तो अनवरत है, यात्रा जैसे. और कम से कम आप यात्रा में हैं.
= यही कष्ट भी है.
+ हमें यात्रा शुरू करनी है. सत्य, लेकिन कष्ट ही मुक्ति भी है शायद. सेल्फ हेल्प डिवाइस.
= कष्ट मुक्ति नहीं, प्रायश्चित है.
+ मुक्ति तो किसी ने देखी नहीं.
= गलती का दुःख कोई और भी सह रहा. उसे कहाँ मुक्ति मिली तो खुद को मुक्ति कैसे?
+ मृत्यु को मुक्ति कह नहीं सकते.
= बात मृत्यु की नहीं.
+ हम समझ रहे.
= अभी एक दिन हमने खुद के मरने का सपना देखा. हम मरे हैं, ठठरी बनी है और हम ही जिन्दा हैं, बता रहे अगले को कि कौन मर गया. समझ न सके कि है क्या ये? क्या चल रहा अचेतन में?
+ इस स्वप्न का कोई विशेष अर्थ होता होगा शायद?
= क्या जानें?
+ आप साक्षी भाव से जीवन की यात्रा में जा रहे शायद, जीवन से मोह भंग मतलब जीवन के उपक्रम से. आत्महत्या नहीं ये.
= ये कह सकते हैं. जीवन से किसी तरह का कोई मोह नहीं. खुद से मरना भी नहीं चाहते, आत्महत्या जैसा. पर कोई डर नहीं कि हमारे बाद सबका क्या होगा.
+ हम समझ रहे. जीवन का अभीष्ट शून्य ही है ये सच है. आपकी इच्छाओं की मृत्यु के सूचक हैं ये स्वप्न.
= ऐसा लग रहा, जैसे बस जी रहे. सच कहें तो इच्छाएं रही ही नहीं. बस किये जा रहे, जो मन में आया.
+ यही तो इच्छाओं की मृत्यु है. हम सब समझ पा रहे. इसी शून्य से जीवन जन्म लेता ही और इसी शून्य में.
= बस इस समय खुद से लड़ रहे, पिछले लगभग दस-बारह साल से.
+ यही तो आपके इच्छाओ की मृत्यु है क्रमशः. इसी लड़ाई से आपको अमृत मन्थना है. आप नितांत अकेले हैं इस यात्रा में. कोई आपको छू भी नहीं सकता. चाह कर भी कोई साथ नहीं चल सकता.
= पता नहीं अमृत मथेगा या हम खुद ही?
+ खुद तो सब ही मथते हैं। आप खुद के साथ साथ अमृत भी मथोगे यही आपका अभीष्ट है. अमृत तो आपको निकालना ही पड़ेगा क्योंकि आप मांग नहीं सकते भगवान से. जो भगवान से नहीं मांग सकता उसे अपना कुंआ खुद खोदना पड़ेगा. ये बात अलग है भगवान उसमें भी टेक्स लेंगे.
= बस अब समाधान चाहते हैं अपनी समस्याओं का, अपनी गलतियों का, अपने आपको मथने का. जो निकलना है, निकल आये अमृत या विष. अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ ही बनना लिखा हो? 

+++++++++++

(बातचीत में ‘=’ चिन्ह से हमारी बात और ‘+’ के द्वारा हमारे मित्र सुभाष की)

07 जून 2019

पर्यावरण संरक्षण हेतु छोटे-छोटे कदमों की आवश्यकता


वर्तमान दौर में पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल वॉर्मिंग है. इस कारण से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे मानव जीवन के कदम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में अगर हमने पर्यावरण को बचाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा. पर्यावरण संरक्षण के लिए हम सभी के बहुत छोटे-छोटे प्रयास भी बहुत बड़े साबित हो सकते हैं. इसके लिए हम सभी निम्न कदम अपना सकते हैं - 

(1) नागरिकों को पौधारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाये. भले ही कम पौधे लगाये जाएँ किन्तु उनकी विधिवत देखभाल की जाये. अपने पारिवारिक सदस्यों के जन्मदिन या किसी भी यादगार क्षण पर पौधे लगाकर उन यादों को चिरस्थायी बनाया जाये.
(2) मकान बनाते समय पेड़-पौधारोपण के लिए अतिरिक्त जगह छोड़ी जा सकती है. जहाँ वर्तमान में जगह नहीं है वहां अपने आंगन में थोड़ी सी जगह में गमलों के द्वारा हरियाली की जा सकती है. यही तापमान कम करेगी.
(3) पॉलिथीन से प्रदूषण फैलता है अत: पॉलिथीन का उपयोग न करते हुए रद्दी-पेपर से बनी थैलियों और कपड़े से बनी थैली और बैग्स का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए.
(4) पर्यावरण जागरूकता हेतु जल-संरक्षण भी आवश्यक है. इसके लिए हम सभी को कम से कम पानी का उपयोग करना चाहिए. शॉवर की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाएं. आंगन या फर्श सीधे पानी से धोने की बजाए झाडू लगाकर बाद में पोंछा लगा सकते हैं.
(5) घर में नल को टपकने न दें. प्लम्बर बुलाकर तुरंत ठीक करवाएं. इसके साथ-साथ सार्वजनिक जगहों में बहते नल को बंद करके पानी बचाया जा सकता है.
(6) घर के कचरे को बाहर खुले में फेंकने से बचा जाये. इसके साथ-साथ गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग जगहों पर एकत्रित किया जाना चाहिए.
(7) जल-संरक्षण के साथ-साथ बिजली की बजट करके भी पर्यावरण जागरूकता लाई जा सकती है. ऑफिस हो या घर बिजली का किफायती उपयोग करें. कमरे से बाहर निकलते समय बिजली से चलने वाले सभी उपकरण बंद कर दें.
(8) एसी, फ्रिज खरीदते समय ध्यान रखें कि ऐसे उपकरण पर्यावरण को नुकसान न पहुँचायें. विद्युत उपकरणों का समय-समय से रखरखाव करें.
(9) इसके साथ-साथ घर-घर जाकर लोगों को पर्यावरण बचाने के प्रति जागरूक किया जा सकता है. जिससे लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने से प्रकृति की रक्षा करने में मदद मिलेगी.
(10) इसी तरह नई पीढ़ी को प्रकृति, पर्यावरण, पानी व पेड़-पौधों का महत्व समझाएं. उनको इसके प्रति संवेदनशील बनायें. पृथ्वी हरी भरी होगी तो पर्यावरण स्वस्थ होगा, पानी की प्रचुरता से जीवन सही अर्थों में समृद्ध व सुखद होगा.

++

पर्यावरण संरक्षण हेतु आवश्यक नहीं कि सिर्फ एक दिन विशेष पर ही जागरूक हुआ जाये. रोज ही छोटे-छोटे कदमों से, सामान्य से उपायों के द्वारा पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है.  आइये हम सब एकसाथ आगे बढ़ें. 

15 अप्रैल 2019

तेरा कष्ट मेरे कष्ट से बड़ा कैसे


समस्याएं सबसे साथ होती हैं पर हमें सिर्फ अपनी समस्या ही सबसे बड़ी क्यों लगती है? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही कष्ट को, अपनी समस्या को हम किसी दूसरे के कष्ट पर, दूसरे की समस्या पर आरोपित करना चाहते हैं. ऐसा संभव है कि उस स्थिति में होता हो जबकि हम अपने कष्ट में, अपनी समस्या में घिरे नितांत अकेले बैठे हों. जब हम किसी दूसरे के कष्ट में भागीदार नहीं बनेंगे, किसी दूसरे की समस्या के साथ खुद को जोड़ने का काम नहीं करेंगे तब तक किसी और के कष्टों, दुखों, समस्याओं को न ही समझ सकेंगे, न ही उनको बड़ा समझ सकेंगे. कष्ट, समस्या, दुःख किसी भी रूप में किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का कारक नहीं बनते. उनके होने पर किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति नहीं होती है. इसके बाद भी ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति अपने कष्टों, अपनी समस्याओं को लगभग पालने-पोसने का काम करते हैं. किसी न किसी तरह, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में समाज में अपने कष्ट, अपनी समस्या को प्रकट करने का अवकाश खोजते हैं.


व्यक्ति समाज का एक हिस्सा है, उसी के द्वारा समाज का निर्माण हुआ है. ऐसे में सभी व्यक्तियों का दायित्व बनता है कि वे एक-दूसरे के साथ तारतम्यता बनाये रखें, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाये रहें. यदि व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होता है तो वह एक-दूसरे के सुखों का आनंद भी उठा सकता है, एक-दूसरे के दुखों, कष्टों, समस्याओं को भी मिलकर सुलझा सकता है. मिलजुल कर रहने के कारण, सामूहिकता की भावना होने के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना कष्ट किसी दूसरे के कष्ट के आगे बहुत बड़ा नहीं लगेगा. कष्ट की, समस्या की स्थिति में वह हमेशा दूसरे के कष्टों को, समस्याओं को दूर करने के लिए आगे ही आगे रहेगा. इससे व्यक्ति को समझ में आएगा कि समाज में एकमात्र वही नहीं है जिसके पास समस्याएं हैं, कष्ट हैं. उसके जैसे, उससे बुरी स्थिति में बहुत से लोग हैं जो कष्टों में, समस्याओं में रहने के बाद भी अपने जीवन को सहजता से संचालित कर रहे हैं. 

व्यक्ति को अपनी गंभीरता, अपने धैर्य, अपनी हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. इनके द्वारा वह आत्मविश्वास में वृद्धि करता रहता है. इसी आत्मविश्वास के चलते वह सदैव कष्टों पर विजय पा सकता है, समस्याओं का समाधान खोज सकता है, दुखों से मुक्ति पा सकता है. बस उसे ध्यान रखना होगा कि उससे ज्यादा कष्ट वाले, समस्या वाले इस समाज में हैं. उसे ध्यान रखना होगा कि उसके पास आत्मविश्वास है जो उसे हारने नहीं देगा.

12 अप्रैल 2019

ग़लतफ़हमी और अविश्वास में दरकते सम्बन्ध


कतिपय सार्वभौमिक सत्यों की तरह यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि ग़लतफ़हमी के चलते संबंधों के बिगड़ने में देर नहीं लगती है. इसके लिए किसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह अनादिकाल से सत्य होता चला आ रहा है. दो लोगों के आपसी संबंधों में बिखराव का एक कारण उनके बीच होने वाली ग़लतफ़हमी होती है. यह ग़लतफ़हमी कई तरह से संबंधों के बीच पनपने लगती है. आज के आपाधापी के दौर में, भागमभाग की स्थिति में सभी के पास सीमित समय रह गया है या कहें कि व्यक्तियों ने खुद को खुद में ही सीमित कर लिया है, इस कारण भी समय सीमित रह गया है. ऐसी स्थिति में लोगों के बीच आपसी वार्तालाप के अवसर बहुत कम आने लगे हैं. लोग जानबूझ कर भी आपस में मिलने से बचने लगे हैं. एक-एक व्यक्ति के भीतर अनेक-अनेक समाज पनप चुके हैं, वह उनको सँभालते-सँभालते ही अपने आपमें इतना परेशान हो जाता है कि किसी और जगह समय देने की स्थिति में नहीं रहता है.


ग़लतफ़हमी के साथ-साथ विश्वास-अविश्वास की स्थिति भी आपसी मनमुटाव का कारण बनता है. दो लोगों के मध्य अविश्वास का जन्म भी इसी ग़लतफ़हमी के कारण होता है. देखा जाये तो ग़लतफ़हमी और अविश्वास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन दोनों का सह-सम्बन्ध भी है. एक के होने से दूसरे का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में चाहे पहले अविश्वास जन्म ले तो वहाँ ग़लतफ़हमी भी जन्म लेती है और यदि पहले ग़लतफ़हमी हो जाये तो वहाँ अविश्वास का जन्म हो जाता है. इधर देखने में आ रहा है कि वर्षों पुराने सम्बन्ध भी अचानक से जरा-जरा सी बात पर ग़लतफ़हमी का शिकार हो रहे हैं. अचानक से वर्षों पुराने संबंधों में अविश्वास पैदा हो जा रहा है. ये समझने का विषय है कि आखिर वर्षों पुराने संबंधों में एकदम से अविश्वास कहाँ, क्यों और कैसे उत्पन्न हुआ? यहाँ यह भी समझने वाली बात है कि यदि किसी स्थिति के चलते अविश्वास जैसी स्थिति आई भी, ग़लतफ़हमी का शिकार हुआ भी गया तो क्या आपसी सूझ-बूझ से, आपसी तालमेल से, आपसी बातचीत से उसे सुलझाने की कोशिश न की गई? ग़लतफ़हमी को दूर करने की कोशिश नहीं की गई?

इस तरह की स्थितियों से हमें स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अनेक बार दो-चार होना पड़ता है जबकि अपने करीबी मित्रों, सहयोगियों, रिश्तेदारों के बीच उत्पन्न अविश्वास, ग़लतफ़हमी को दूर करने के प्रयास करने पड़ते हैं. ऐसा देखने में आया है कि बहुत बार अकारण जन्मे अविश्वास, ग़लतफ़हमी के पीछे कभी उनका अहं, कभी उनके बीच अबोल की स्थिति, कभी किसी पुरानी घटना को लेकर बना तनाव मुख्य कारण होता है. ऐसा ही कुछ हाल के दिनों में भी हुआ जबकि हमारे दो मित्रों के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को, अविश्वास की स्थिति को दूर करने का प्रयास किया गया. यहाँ हवन करते हाथ जलने वाली बात हमारे साथ सत्य बैठ गई. दोनों मित्रों की चुप्पी के बीच हँसी-हँसी के वातावरण में हमने सुलझाव लाने की कोशिश की, इसी कोशिश में पता नहीं कहाँ से अविश्वास का, किसी पुरानी बात का, तनाव का, ग़लतफ़हमी का साया आ टपका. बस, एक झटके में बात बनने के बजाय बिगड़ने की दिशा में चली गई. दोनों तरफ से बात अपने-अपने स्तर पर सही समझ आ रही थी, मगर ऐसा सिर्फ भावनात्मक तौर पर ही सत्य समझ आ रहा था. भावनात्मक आधार पर निर्मित इमारत का व्यावहारिक स्वरूप निर्मित होता दिख नहीं रहा था. ऐसी स्थिति में पता नहीं उन दोनों के बीच बात सुलझी या और उलझ गई मगर हमारा प्रयास निरर्थक ही निकला. 

इस प्रयास में एक बात और स्पष्ट हुई कि शायद अभी भी हमें अपना विश्वास जमाने की आवश्यकता है क्योंकि बिना विश्वास के ऐसे मामले हल नहीं किये जा सकते हैं. दिल से, दिमाग से यही चाहा था कि दोनों दोस्तों के बीच का मसला सुलझ जाए, दोनों के बीच की तनाव की, अबोल की स्थिति समाप्त हो जाए और उन दोनों सहित हम भी सुखद स्थिति का अनुभव कर सकें. आखिर एक जिम्मेवारी सी समझ आ रही थी, उन दोनों मित्रों के बीच कॉमन मित्र बने होने के नाते. मित्रता का एक आधार जहाँ का तहाँ है, एक आधार शायद खिसक चुका है. बस उस आधार को बचाने के पहले अभी हमें खुद का ही विश्वास बचाना है. अपने विश्वास को पहले से भी अधिक ऊँचाई पर ले जाने का, पहले से अधिक मजबूत कर लेने का विश्वास तो हमें है बस कामना उन दोनों मित्रों के लिए है. जय हो....

16 फ़रवरी 2019

छोटी-छोटी समस्याओं के निपटने में बड़ी समस्या का निदान


उन दिनों छत्रपति शिवाजी मुगल सल्तनत के खिलाफ जंग छेड़े हुए थे. उनकी छापामार गुरिल्ला युद्ध नीति से मुग़लों में भय-परेशानी का भाव बना हुआ था. इसके बाद भी छत्रपति शिवाजी को बड़ी विजय नहीं मिल पा रही थी. कई जगहों पर शिवाजी को सफलता मिल जाती तो कई जगह से उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता. युद्ध के ऐसे ही दिनों में एक बार वे किसी गाँव से गुजर रहे थे. रात का समय था, भोजन की इच्छा से वे एक घर के सामने रुके. 


उस घर में एक वृद्धा रहती थी. उन्होंने खुद को छत्रपति शिवाजी का सैनिक बताते हुए उस वृद्धा को से भोजन करवाने का निवेदन किया. शिवाजी महाराज के प्रति श्रद्धा-सम्मान भाव होने के कारण उस वृद्धा ने उनके लिए जल्द से जल्द खिचड़ी बनाई. कुछ ही देर मे उस वृद्धा ने गरमा-गरम खिचड़ी छत्रपति शिवाजी के सामने परोसी. शिवाजी बहुत जल्दी मे थे, सो उन्होंने थाली सामने आते ही एकदम से उसे खाने की कोशिश की. खिचड़ी के गरम होने के कारण उन्हें अपना हाथ खींच लेना पड़ा. यह देखते ही वृद्धा बोली तू भी अपने महाराज की तरह बावला है. एकदम से बीच के राज्यों पर हमला करते हैं वे भी और तूने भी खिचड़ी को बीच में से खाना शुरु करके अपना हाथ जलवा लिया.

शिवाजी महाराज समझ नहीं पाए कि वह वृद्धा क्या कहना चाहती है. उन्होंने उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखा तो उसने सैनिक समझ उन्हें समझाया, तू खिचड़ी को किनारे से खाना शुरु कर, इससे खाना ठंड़ा भी हो जायेगा और तू आराम से खा भी पायेगा. इसी तरह अपने महाराज को चाहिये कि वे पहले छोटी-छोटी जगहों पर विजय प्राप्त करें. राजधानी के रास्ते में आने वाली जगहों पर विजय प्राप्त करें ताकि पीछे से हमला होने की आशंका समाप्त हो जाये. इसके बाद पूरी ताकत से राजधानी पर टूट पड़ें.

छत्रपति शिवाजी अपने इस नये गुरु का मुंह देखते रह गये. खिचड़ी समाप्त कर उन्होंने वृद्धा के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़ गये. इतिहास गवाह है कि इसके बाद युद्ध में फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

+

ये महज एक कथा नहीं अपने आपमें एक सीख है दुश्मनों से निपटने की. इससे सीख लेने की आवश्यकता है. अक्सर हम सभी लोग जल्दबाजी में गलत निर्णय ले लेते हैं और बाद में उनके गलत परिणाम सामने आने पर बस पछताते रहते हैं. किसी भी स्थिति का, किसी भी समस्या का दीर्घकालिक समाधान चाहने वालों को धैर्य, संयम से काम लेने की आवश्यकता होती है. दुश्मनों से निपटने के पहले छिपे हुए दुश्मनों को पहचानने, समाप्त करने की जरूरत होती है. ये दुश्मन देश के भी हो सकते हैं, आपके भविष्य के भी हो सकते हैं, आपके कैरियर के भी हो सकते हैं, आपके परिवार के भी हो सकते हैं, आपके विकास के भी हो सकते हैं. ये आप पर निर्भर है, हम पर निर्भर है कि इन दुश्मनों से कैसे और किस तरह निपटना है.



16 दिसंबर 2018

आम जनमानस समझता है अपनों का दर्द

विगत एक वर्ष से अधिक होने को आया जबकि हम व्यक्तिगत रूप से उरई में संचालित बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक से सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं. वर्ष 2017 में एक नवम्बर को इसका शुभारम्भ डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में हुआ. उनको इसकी प्रेरणा वाराणसी में डॉ० राजीव श्रीवास्तव के निर्देशन में संचालित विश्व के पहले अनाज बैंक से मिली. इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी बहिन अनिला राणावत की स्मृति में उनकी पहली पुण्यतिथि पर अनाज बैंक का सञ्चालन उरई में आरम्भ किया. कोई भी भूखा न सोये के उद्देश्य के साथ अनाज बैंक वाराणसी ने अपना पुनीत कार्य आरम्भ किया था. अपनी ईमानदारी, पारदर्शिता, निष्पक्षता के चलते जल्द ही उसने गरीब, मजबूर महिलाओं के बीच अपनी पहचान स्थापित की. अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह पांच किलो अनाज गरीब, मजबूर, असहाय महिलाओं को प्रदान किया जाता है. वाराणसी, प्रधान कार्यालय के अनुसार ही उरई अनाज बैंक संचालित है. प्रतिमाह कुछ गरीब महिलाओं को मदद करके मन में एक सुकून यही मिलता है कि इस बैंक के माध्यम से किसी की सहायता करने का सौभाग्य मिल रहा है. इसके बाद भी बहुत बार ऐसी स्थिति होती है कि मन में उथल-पुथल मच जाती है.


अनाज बैंक द्वारा गरीब, मजबूर महिलाओं को ही अनाज के द्वारा मदद की जाती है. इसमें भी बहुत स्पष्ट कदम उठाकर उनके बारे में जानकारी एकत्र करने के बाद यह मदद उपलब्ध करवाई जाती है. ऐसा करने के पीछे मकसद महज इतना होता है कि जनता से प्राप्त सहयोग का कहीं गलत इस्तेमाल न हो जाये. प्रतिमाह होने वाले वितरण में अनेक बार ऐसी स्थिति आती है जबकि समझ आता है आज़ादी के सत्तर से अधिक वर्षों के बाद भी समाज में ऐसी स्थिति है कि लोगों को दो समय का भोजन नहीं मिल पा रहा है. सम्मानित नागरिकों की सहायता से उपलब्ध अनाज के वितरण द्वारा कुछ महिलाओं की मदद कर पाने के बाद भी दुःख बना रहता है कि सबकी मदद नहीं कर पा रहे हैं. विगत एक वर्ष से अधिक के समय ने उरई अनाज बैंक को अलग ही पहचान दी है. इससे कम से कम उरई की अनेक गरीब महिलाओं में एक तरह का आशा का संचार हुआ है. उनकी आशा कहीं न कहीं हमारे लिए दुःख का कारण बन जाती है. एकाधिक स्थितियाँ ऐसी बनती हैं जबकि अनाज बैंक की टीम चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाती है. उनकी पारिवारिक स्थिति, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी होने के बाद एक स्थिति तक मदद कर दी जाती है मगर लगता है कि समाज में कितना बड़ा विभेद है.

इस विभेद को जातिगत विभेद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में आज महज जातिगत विभेद ही नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि उसके ऊपर आर्थिक विभेद दिखाई देने लगा है. देखा जाये तो आज समाज में दो तरह के वर्ग बने हुए हैं. एक अमीर और दूसरा गरीब. इन्हों दो वर्गों के हिसाब से ही समाज में बहुतायत स्थितियाँ नियंत्रित हैं, उनका सञ्चालन है. अनाज बैंक के शुभारम्भ होने से लेकर आज के दिन तक हर वितरण में ऐसी स्थिति सामने आती है जबकि आँखें नम होती हैं. समझ नहीं आता है कि आखिर इतने सालों से सरकारें का कर रही हैं, जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं, प्रशासन क्या कर रहा है जो कि एक व्यक्ति की एक समय की भूख भी नहीं मिटाई जा सकी है? आखिर ऐसे कौन से हालात बने जबकि जो काम सरकार को, शासन को, प्रशासन को करने चाहिए वे काम स्वयंसेवी लोग संचालित कर रहे हैं. आये दिन ऐसी महिलाओं की स्थिति से सामना होता है जिनके परिवार के नाम पर या तो बस वही हैं या फिर कोई नाबालिग संतति. काम करने का, कमाई का, रोजगार का कोई माध्यम नहीं. सरकार अपने आपमें व्यस्त है, जनप्रतिनिधि अपनी कमाई में व्यस्त हैं, प्रशासन प्रमुख लोगों की व्यवस्था में, सुरक्षा में व्यस्त है तब इन गरीब लोगों की तरफ कौन ध्यान दे?

अनाज बैंक आम जनमानस की सहायता से लगातार आगे बढ़ रहा है. आमजनमानस समझता है कि जनता को वास्तविक दर्द किस बात का है. ऐसे में उसके द्वारा उपलब्ध सहायता को जनता के लिए ही उपयोग करने का ध्येय अनाज बैंक द्वारा बनाया गया है. व्यक्तिगत रूप से अपने अनुभव से कह सकते हैं कि जब तक इस देश में आम जनमानस है, तब तक कोई आम जनमानस भूखा नहीं सो सकता, अनाथ नहीं रह सकता.

09 दिसंबर 2018

भ्रष्ट बन रोको भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार भरे समाज में सभी लोग परेशान हैं कि देश में भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा है. इसको रोकने के उपाय खोजे जा रहे हैं पर सबके सब नाकाम से दिखाई दे रहे हैं. नाकामी इसलिए भी है क्योंकि भ्रष्टाचार को लेकर, भ्रष्टाचार करने वालों को लेकर सवाल उठता है कि किसे भ्रष्ट कहेंगे और किसे नहीं? एक छोटा सा उदाहरण कि आपका कोई काम है और वह मात्र इस कारण से टल रहा है कि आपने उसको करने वाले को मात्र 500 रुपये नहीं दिये. अब आप परेशान हैं कि काम नहीं हो रहा है और दूसरे आपको टोकेगे कि आप बड़े मूर्ख हैं जो मात्र 500 रुपये में अपने काम को लटकाये पड़े हैं. इसी तरह कोई अपना बड़े से बड़ा काम भी कुछ पैसों की दम पर करवा लेता है तो ऐसे ताल ठोंकता है जैसे उसने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो. वैसे आज के जमाने में पैसे देकर भी अपना काम करवा लेना तीर मारने से कम नहीं है. अब ऐसे में उसकी तारीफ हो रही है जो पैसे देकर काम करवा लाया और पैसे ने दे पाने के कारण काम रुकवाए व्यक्ति को बेवकूफ बताया जा रहा है. 


ऐसे में कोई भ्रष्टाचार को कहाँ और कैसे रोकेगा? कभी-कभी समाचार सुनने को मिलता है कि फलां व्यक्ति रिश्वत लेते पकड़ गया. इस पर एक पल को सभी की राय बनती है कि अपने अधिकारियों को नहीं खिला रहा होगा. आज हालत ये है कि पग-पग पर भ्रष्टाचार है. समस्या इसके समाप्त करने को लेकर है. इसके बाद भी देखा जाये तो हम लोग ही इसको रोकने के लिए काम नहीं कर रहे हैं. हमारा जहाँ जैसा हाथ चलता है हम भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं. भ्रष्टाचार-इसका सीधा सा तात्पर्य है कि भ्रष्ट आचरण करने वाला. हम छोटे स्तर पर सक्षम होते हैं तो वहाँ भ्रष्टाचार कर लेते हैं. रेलवे का साधारण श्रेणी का टिकट लिया और जा बैठे स्लीपर में, एसी में. अब टिकट चेकर के आने पर कुछ छोटी सा मुद्रा उसके हाथ में थमा दी, और आराम से पैर फैला कर यात्रा शुरू. क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?

भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सबसे बड़ी बाधा है समाज के कुछ लोगों का पूरी तरह से भ्रष्ट न हो पाना. जी हाँ, आपको ये बात बड़ी अजीब लग रही होगी पर सत्य यही है. जब तक समाज में एक आदमी भी भ्रष्टाचार से मुक्त है तब तक भ्रष्टाचार को रोक पाना सम्भव नहीं. असल में यह एक प्रक्रिया है और इसमें सभी का शामिल होना जरूरी है. मान लीजिए कि सभी लोग भ्रष्ट हो गये हैं तब....? तब आपने कोई करवाने का कुछ पैसा लिया, अब आप किसी काम को करवाने गये और उसने भी पैसा लिया. वह अपने किसी काम से कहीं जाये और उसे भी पैसा देना पड़े. यह क्रम सभी के साथ चलता रहे. सब पैसा कमा भी पा रहे हैं किन्तु देना भी पड़ रहा है. कहीं कम कहीं ज्यादा, परिणामतः किसी के भ्रष्ट होने से मात्र उसे ही लाभ नहीं हो पा रहा है. इससे सम्भावना है कि भ्रष्टाचार रुके क्योंकि तब उसके द्वारा कमाया गया भ्रष्ट या ऊपरी धन भ्रष्टाचार में, ऊपरी धन के रूप में ही खर्च होए लगेगा.

वैसे भी यह सब आपसी सहमति का मामला बनता है तो इसे भी समलैंगिकता की तरह से कानूनी स्वरूप दे दिया जाये? आपसी सहमति! जब तक नहीं रुक रहा तब तक इसे भी राष्ट्रीय सम्पदा मान कर पोषित, पल्लवित करते रहिये. खुद भी नोंचिये और दूसरों को भी नोचते रहिये. साथ में बोलिये जय भ्रष्टाचार.

12 जून 2018

सिर्फ कानून समाधान नहीं बालश्रम का


बालश्रम को रोकने के लिए बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 सदन में पारित हुआ. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु कार्य करती हैं. देश का संविधान भी बाल श्रम उन्मूलन की बात करता है. इसके अनुच्छेद 23 में खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया गया है. भारत सरकार ने बाल श्रम को समाप्त करने हेतु 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया. कानून बनते रहे, उनमें संशोधन भी होते रहे. इन्हीं कानूनों का सहारा लेकर बहुत से लोग काम करते दिखे और बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त करते दिखे. इन सबके बाद भी देश में बालश्रम की समस्या ज्यों की त्यों है. इसके बाद भी होटलों, ढाबों, ऑटो रिपेयरिंग दुकानों के साथ-साथ घरेलू नौकरों के रूप में बच्चे कार्यरत दिखते हैं. इन कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं.


सड़क किनारे कूड़ा-करकट, खाली बोतलें, पॉलीथीन, रैपर आदि समेटते बच्चे किसी एक शहर में नहीं वरन लगभग सभी शहरों में मिल जायेंगे. बच्चों का कूड़ा बीनने के साथ-साथ भीख माँगने में, अनेक जगहों पर काम करने में लगा देखा जा सकता है. ये समस्या आज़ादी के बाद से ही एक प्रमुख समस्या के रूप में सामने रही है; विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर अनेक कार्य किये हैं, विभिन्न योजनायें संचालित की हैं किन्तु उनका यथोचित लाभ बच्चों को नहीं मिल सका है. पढने-लिखने, खेलने-कूदने की उम्र में ये बच्चे इस तरह की गतिविधियों में लिप्त रह कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने को मजबूर रहते हैं. अच्छे कपड़े, अच्छा भोजन, अच्छे खिलौने इन बच्चों के लिए स्वप्न समान ही रहते हैं. इन स्थितियों पर आज पुनः इस कारण विचार किये जाने, गंभीरता से विचार किये जाने की जरूरत है क्योंकि दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित और बड़ा पुरस्कार-सम्मान नोबल भारतीय समाजसेवी को साझा रूप में मिला है. ये साझेदारी का बँटवारा बच्चों के प्रति जिम्मेवारी को और भी बढ़ा देता है क्योंकि भारतीय समाजसेवी की साझीदार पाकिस्तानी बच्ची है जिसको बच्चियों की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाला बताया गया है. नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भारतीय समाजसेवी के पास तो अस्सी हजार बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त करवाने का आँकड़ा है, इसके बाद भी ऐसे हालात बने हुए हैं जो दर्शाते हैं कि बच्चे अभी भी कूड़ा-करकट में घिरे हैं, मजदूरी के शिकार हैं, कामकाजी जाल में फँसे हैं.


ऐसे हालातों में फंसे बच्चे पहले तो अपने बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं होते हैं और यदि किसी तरह से वे अपने बारे में बताते हैं तो उनका जीवन घनघोर अभावों-संघर्षों की गाथा समझ आता है. कहीं माता-पिता जीवित नहीं हैं और वे अपने किसी रिश्तेदार के सहारे हैं या फिर अनाथ हैं; किसी के पिता शराबी हैं तो किसी के माता-पिता दोनों ही नशा करते हैं; किसी के माता-पिता बीमार-असहाय हैं तो किसी के लिए यही काम परिवार के भरण-पोषण का सहारा है. यहाँ सरकारों के लिए, समाजसेवियों के लिए, बच्चों के हितार्थ ठेकेदार बनते लोगों को समझने की जरूरत है कि ऐसे बच्चों को ऐसे कार्यों से महज निकाल लेना, इन कार्यों को करने से महज रोक देना ही समस्या का समाधान नहीं है. वास्तविकता ये है कि इन बच्चों की प्राथमिकता परिवार का, अपना भरण-पोषण करना है; धनोपार्जन करना है; अपने आपको जीवित रखना है. ऐसे में इन बच्चों के लिए जबतक व्यावहारिक योजना नहीं बनाई जाती है तब तक किसी भी योजना का, किसी भी कार्यवाही का कोई अर्थ नहीं निकलता है.

++
चित्रलेखक द्वारा स्वयं निकाले गए हैं... पहला चित्र उरई (जालौन) उ०प्र०, सितम्बर २०१४ माह का है तथा दूसरा (दो बच्चों वाला) चित्र छतरपुर, म०प्र०, अक्टूबर २०१४ माह का है....