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14 जुलाई 2026

अनावश्यक युद्ध में घिरी वैश्विक व्यवस्था

अमेरिका और ईरान के बीच चले आ रहे तनाव का अंत दिखता नहीं है. वर्तमान परिदृश्य में इनके युद्ध ने समूचे विश्व की नींद उड़ा रखी है. दोनों देश कभी युद्ध में होते हैं तो कभी कूटनीतिक प्रयास में लगे होते हैं. कभी युद्धविराम जैसी स्थिति सामने आती है लेकिन यह स्थायी रूप में नहीं रहती है. युद्धविराम के कुछ दिनों बाद पुनः वही युद्ध का माहौल नजर आने लगता है. दोनों देश अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लग जाते हैं. युद्धविराम का होना और फिर अचानक से युद्ध; एक अस्थायी युद्धविराम और फिर वही दुश्मनी; एक तरह का अनावश्यक युद्ध. आखिर इस युद्ध का मतलब क्या है? यदि युद्ध ही करते रहना है तो थोड़े-थोड़े अन्तराल पर युद्धविराम जैसे कदम क्यों उठाये जाते हैं?

 

अमेरिका और ईरान युद्ध के पीछे उनकी आंतरिक राजनीति, उनका लम्बा संघर्षमय इतिहास समझ आता था. इसमें 1979 की इस्लामिक क्रांति के पश्चात् ईरान ने स्वयं को अमेरिकी विरोधी घोषित कर दिया था. ऐसा करना उसकी शासन व्यवस्था की वैचारिक नींव था. इसी तरह अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण तेल मार्गों पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था. इन दोनों के अपने-अपने निजी मकसद होने के कारण वर्तमान में चल रहे इस युद्ध का कोई स्पष्ट सैन्य मकसद नहीं है. यही कारण है कि दोनों देश बजाय एक-दूसरे को जीतने के, एक-दूसरे को अपनी सैन्य क्षमता दिखा रहे हैं. अब यह युद्ध स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने की लड़ाई बन गया है. अमेरिका भले ही दिखावे के लिए यह चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे किन्तु उसका मूल मकसद तेल मार्ग पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना है. इसी तरह ईरान स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद को नकारता रहता है.

 



दोनों देशों के अपने-अपने नितांत निजी, व्यक्तिगत मकसद होने के कारण यह युद्ध रुकता रहता है, चलता रहता है. दोनों देशों के मध्य युद्धविराम की घटनाओं को देखकर ऐसा आभास होता है कि जैसे ही दोनों में से किसी को भी यह एहसास होता है कि हमले खुद के लिए ही हानिकारक बने हुए हैं तो वे स्वतः ही युद्ध से अपने-अपने को पीछे खींच लेते हैं. ये और बात है कि वैश्विक परिदृश्य में इसे युद्धविराम के रूप में देखा जाने लगता है. तात्कालिक मुद्दों के आधार पर, अपनी-अपनी स्थिति के आकलन के आधार पर बनी व्यवस्था के आधार पर युद्धविराम तो होता है किन्तु किसी तरह की दीर्घकालिक व्यवस्था न होने के कारण युद्धविराम टिक नहीं पाता है. देखा जाये तो दोनों देशों के बीच मतभेद की मूल समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जाता है; परमाणु कार्यक्रम, विस्तारवादी नीति आदि का बना रहना दोनों के लिए ही समस्या बना रहता है. ऐसे में युद्धविराम अस्थायी रूप धारण कर लेता है. किसी भी बिंदु पर टकराहट का, मतभेद का अवसर मिलते ही दोनों देश अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करने लगते हैं.  कभी परमाणु कार्यक्रम के नाम पर, कभी तेल मार्ग होर्मुज़ के नाम पर, कभी तेलवाहक जहाजों के नाम पर युद्ध का दुष्चक्र चलता ही रहता है. ऐसे में लगता है कि इन दोनों देशों का उद्देश्य युद्ध जीतना नहीं है, दूसरे को हराना नहीं है बल्कि सामने वाली शक्ति को कमजोर करते हुए खुद को वर्चस्ववादी साबित करना है. अपने आपको अपने देश के नागरिकों के सामने एक हीरो के रूप में पूरी मजबूती के साथ दिखाना है.

 

इन दोनों देशों के अहं के कारण, इस अनावश्यक संघर्ष के कारण से आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व संकट से घिरा हुआ है. इनके बीच चलते युद्ध का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसके केन्द्र में कच्चे तेल का बना होना है. दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन का बहुत बड़ा भाग मध्य पूर्व द्वारा नियंत्रित किया जाता है. इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के कारण फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा मंडराने लगता है. इन रास्तों से दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल गुजरता है. ऐसे में युद्ध के कारण यहाँ से कच्चे तेलवाहक जहाजों का आवागमन बाधित होता है और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल का मँहगा होना अर्थात परिवहन, विनिर्माण, दैनिक उपयोग की वस्तुओं आदि की कीमतों में वृद्धि हो जाना. यह स्थिति किसी भी विकासशील अथवा गरीब देश के लिए किसी आपदा से कम नहीं होती है. यह युद्ध भले हो दो देशों के मध्य नजर आ रहा है किन्तु ऐसा है नहीं. इसमें कई वैश्विक और क्षेत्रीय ताकतें भी किसी न किसी रूप में शामिल हैं. इस कारण से इस युद्ध के द्वारा किसी तीसरे विश्व युद्ध की आहट लगातार गूँजती ही रहती है. इन दोनों देशों  के मध्य के हमले, मिसाइलों, ड्रोनों का सञ्चालन पूरी मानवता के लिए खतरनाक नजर आते हैं. इसके चलते अनेक देशों का खर्च अपने नागरिकों के जीवन-यापन पर व्यय होने के बजाय हथियारों की खरीद में व्यय होने लगता है. हथियारों की इस अंधी दौड़ ने पूरे विश्व को असुरक्षित बना दिया है.

 

आज जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भुखमरी, आपदाएँ, बीमारियाँ, आर्थिक असमानता आदि जैसी वास्तविक चुनौतियाँ हैं, जिनसे सबको मिलकर लड़ना चाहिए, तब पूरा विश्व किसी बड़े वैश्विक तनाव के साये से गुजर रहा है. यह युद्ध उदाहरण है राजनीतिक हठधर्मिता का, अनावश्यक अहं का, आपसी अविश्वास का, साम्राज्यवादी मानसिकता का. इस तरह के अनावश्यक कदमों से किसी भी देश का भला नहीं होने वाला है, किसी भी देश के नागरिकों का हित नहीं होने वाला है. काश कि ये दोनों देश भी इस बात को समझ लें कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम जय-पराजय के रूप में नहीं निकलना है. इसलिए वैश्विक शांति के लिए एक स्थायी विकल्प तलाशा जाये. जब तक शांति का स्थायी स्वरूप निर्मित नहीं होता है, तब तक यह अनावश्यक नाटक चलता रहेगा. वैश्विक व्यवस्था, निर्दोष नागरिक, निरीह मानवता इसकी कीमत चुकाती रहेगी.

 


10 मार्च 2026

अमेरिका का बड़बोलापन

पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा. ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा. विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा मिली.

 

यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के बयानों को, कार्यों को, आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा. दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर रहा है.

 

ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.

 

इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.

 

ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है. युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.

 

सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता. 


24 जून 2025

इजराइल-ईरान युद्ध का असमंजस

ऐसा समझा जा सकता है कि पर्ल हार्बर की घटना से हम सभी परिचित ही होंगे? ऐसे समय में जबकि विश्वयुद्ध जैसा खतरा मंडरा रहा है तब पर्ल हार्बर घटना याद आना स्वाभाविक है. इसी घटना ने अलग-थलग, खामोश पड़े अमेरिका को न केवल द्वितीय विश्वयुद्ध में घसीटा बल्कि जापान पर परमाणु हमले का आधार भी तैयार किया. दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका तब तक शामिल नहीं हुआ था लेकिन जापान को भय था कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अपने इस नौसैनिक बेड़े के द्वारा जापान के क्षेत्रीय विस्तार को बाधित करेगा. इसी आशंका में जापानी वायुसेना ने अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला करके अमेरिका को सैनिकों, नौसैनिक जहाजों, विमानों का भयंकर नुकसान पहुँचाया.

 

पर्ल हार्बर घटना का स्मरण तब हुआ जबकि इज़राइल-ईरान युद्ध से विश्वयुद्ध का खतरा नजर आया. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपनी जिद के चलते इज़राइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. ऐसे में ईरान ने भी पूरी तीव्रता से इजराइल पर पलटवार किया. युद्ध की इस स्थिति में अमेरिका के असमंजस भरे रुख को देखकर शंका हो रही थी कि कहीं इजराइल ने ईरान पर हमला करके गलती तो न कर दी? शंका से भरे वातावरण में अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों- फोर्दो, नतांज और इस्फहान पर हमला कर दिया. इस हमले में 125 एयरक्राफ्ट, सात बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स के द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर 13,608 किलो वजनी बस्टर बम गिराए गए. युद्ध में शामिल होने के बाद भी अमेरिका ने कहा कि वह ईरान से युद्ध नहीं चाहता है मगर यदि इस हमले का पलटवार ईरान द्वारा किया गया तो उसके परिणाम बहुत बुरे होंगे.

 



अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु संयत्रों पर हमला करने के बाद इस तरह की धमकी भरे अंदाज में बयान देने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि ईरान इसका जवाब नहीं देगा किन्तु जिस तरह से कतर, इराक, कुवैत पर उसने मिसाइलें दागी हैं, उससे ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह अमेरिका की धमकी या उसकी दबंगई से डरने वाला नहीं है. ईरान के इस पलटवार को पर्ल हार्बर की घटना से इसी कारण संदर्भित किया जाने लगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने इस कार्यकाल में विध्वंसक मोड में दिख रहे हैं. आर्थिकी क्षेत्र हो, महाशक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाये रखने का दौर हो, दो देशों के बीच युद्धविराम जैसी स्थिति लागू करवाने सम्बन्धी वार्ताएँ हों, अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ वार्तालाप का कूटनीतिक व्यवहार आदि ही क्यों न हो सभी जगह ट्रम्प आक्रामक रुख अपनाते ही दिखाई दिए. ऐसे में ईरान के पलटवार को विश्वयुद्ध की आहट समझा जा रहा था. यद्यपि ईरान द्वारा छोड़ी गई मिसाइलों से अमेरिकी एयरबेस को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ, किसी भी तरह के जानमाल को भी क्षति नहीं पहुँची है तथापि ये पलटवार अमेरिका के विरुद्ध था इसलिए वैश्विक चिंता होना स्वाभाविक थी.

 

शंकाओं, असमंजस भरे बादल उस समय छँटते नजर आये जबकि ईरान द्वारा अमेरिकी बेस पर मिसाइल दागने के बाद बदला पूरा हो जाने की बात कहे जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के मिसाइल हमले को बहुत कमजोर बताते हुए मजाक उड़ाया. ट्रम्प ने ईरान को धन्यवाद देते हुए कहा कि तेहरान ने अपने परमाणु स्थलों पर अमेरिकी बी-2 स्टील्थ बॉम्बर हमले का जवाब देने का नाटक किया है. अपनी बात को अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि किसी भी अमेरिकी को ईरानी हमले में नुकसान नहीं पहुँचा है. मैं ईरान को हमें पहले से सूचना देने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिससे किसी की जान नहीं गई और कोई भी घायल नहीं हुआ. शायद ईरान अब क्षेत्र में शांति और सद्भाव की ओर बढ़ सकता है. मैं उत्साहपूर्वक इजरायल को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करूँगा. इस तरह की सोशल मीडिया पोस्ट के साथ ही ट्रम्प द्वारा इजराइल और ईरान के मध्य युद्धविराम किये जाने सम्बन्धी पोस्ट भी लगाई गई. इस खबर को संतोषजनक और विश्वयुद्ध की आशंका के अंत के रूप में देखा जा रहा है.

 

इजराइल का ईरान पर हमला, ईरान द्वारा इजराइल को मुँहतोड़ जवाब देना, अमेरिका का असमंजस के बाद भी ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को नष्ट कर देना, ईरान द्वारा अमेरिकी हमले का बदला लेने के लिए अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल हमला करने के भयग्रस्त वातावरण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा इजराइल-ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा करना अल्पकालिक राहत ही समझ आता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इजराइल-ईरान के मध्य युद्ध की स्थिति जिस कारण से बनी थी, अभी उसका समाधान नहीं हुआ है. इस युद्ध के केन्द्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम था, जो फोर्दो परमाणु संयंत्र के पूरी तरह से बर्बाद हो जाने के बाद भी अस्तित्व में है. ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि ईरान ने अमेरिकी हमले से पहले ही संवर्द्धित यूरेनियम को किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया है. यदि यह अंदेशा सही है तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम उसे परमाणु बम बनाने तक ले जा सकता है. निश्चित है कि ऐसी कोई भी आशंका न तो अमेरिका के हित में है न ही इजराइल के. बारह दिनों तक चले युद्ध के बाद भी, अमेरिका के हमले के बाद भी यदि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अस्तित्व में बना रहा तो यह अमेरिका और इजराइल की प्रभुता, उसकी सैन्य क्षमता के लिए भी चुनौती होगी. फ़िलहाल तो देखना यह है कि जिस युद्धविराम की घोषणा ट्रम्प द्वारा की गई है वह कितने समय तक लागू रह पाता है.


09 अप्रैल 2025

टैरिफ वॉर की चपेट में वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये गए टैरिफ वॉर से वैश्विक व्यापारिक जगत में हाहाकार मचा हुआ है. दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम नजर आ रहे हैं. यदि सिर्फ अमेरिकी शेयर बाजार की चर्चा करें तो टैरिफ लगाने के बाद से यहाँ लगभग छह ट्रिलियन डॉलर अर्थात लगभग 516 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं. यदि भारतीय बाजार के सन्दर्भ में देखा जाये तो यह रकम भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के आकार से दोगुनी है. सोचा-समझा जा सकता है कि टैरिफ लगाये जाने की घोषणा से बाजार का जो हाल हुआ है, उससे आगे क्या हाल होने वाला है. बाजार की ऐसी स्थिति के स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बाद भी ट्रम्प अपने फैसले को जबरिया सही सिद्ध करने पर उतारू हैं. दुनिया भर के 60 देशों पर टैरिफ लगाने के बाद अमेरिका सहित एशिया, यूरोप के बाजारों में भयंकर गिरावट दिख रही है, बावजूद इसके ट्रम्प इसकी तरफ से आँखें मूँद कर इसे एक दवा बता रहे हैं. जहाँ एक तरफ वैश्विक स्तर पर तमाम विशेषज्ञ ट्रम्प के इस टैरिफ वॉर की आलोचना कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्‍ट्रपति एक सवाल के जवाब में दो टूक भाषा में टैरिफ विरोध को दरकिनार करते हुए कहते हैं कि मैं किसी चीज में गिरावट नहीं चाहता लेकिन चीजें ठीक करने के लिए दवाई देनी पड़ती है.

 



आखिर ये समझने का विषय है कि किस कारण से ट्रम्प टैरिफ लागू किये जाने की जिद पकड़े हैं? ये भी जानने-समझने का विषय हो सकता है कि आखिर किस कारण से ट्रम्प को टैरिफ एक तरफ दवाई नजर आ रही है तो दूसरी तरफ खूबसूरत चीज दिखाई दे रही है. ट्रम्प ने सोशल मीडिया के एक मंच पर लिखा भी है कि चीन, यूरोपीय संघ और कई अन्य देशों के साथ हमारा विशाल वित्तीय घाटा है. इस समस्या का समाधान सिर्फ टैरिफ़ से ही संभव है. इससे अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं. क्या वाकई टैरिफ की नई दरों से अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं या फिर यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनी बात को पुख्ता किये जाने के लिए कहा गया है? यदि बाजार के सन्दर्भ में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर नजर डालें तो साफ़ समझ आ रहा है कि अमेरिकी सरकार पर कर्ज का बहुत बड़ा बोझ है. आँकड़े बताते हैं कि अमेरिकी सरकार वर्तमान में 36.1 ट्रिलियन डॉलर क़र्ज़ की सर्वोच्च सीमा पर है. इसके अलावा अमेरिका के लिए आर्थिक स्तर पर जो बुरी खबर है वो यह कि वर्तमान में अमेरिकी सरकार प्रतिवर्ष लगभग 900 बिलियन डॉलर से एक ट्रिलियन डॉलर के आसपास ब्याज का भुगतान करती है. टैरिफ के कारण अमेरिकी बॉण्ड यील्ड में आई गिरावट हाल-फिलहाल ट्रम्प सरकार के लिए राहत जैसी समझ आ रही. टैरिफ के कारण अमेरिका के दस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसी तरह से बीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.25 प्रतिशत और तीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.3 प्रतिशत की गिरावट आई है. यह गिरावट इसलिए राहत का विषय हो सकती है क्योंकि इससे ब्याज देनदारी में कमी आएगी. ऐसी विषम स्थिति में ट्रम्प सरकार को राहत दिलाने का यह काम भले टैरिफ के माध्यम से होता दिखे मगर वह क्षणिक है और दीर्घकाल में समूचे विश्व में इसका नकारात्म्मक असर दिखने की आशंका है.

 

ट्रम्प के टैरिफ वॉर का असर वैश्विक स्तर पर तो पड़ेगा ही उसका अमेरिका पर भी काफी बुरा असर पड़ेगा. तात्‍कालिक प्रभाव से शेयर बाजार में छह लाख करोड़ डॉलर तो डूब ही चुके हैं जो अमेरिका की अर्थव्‍यवस्‍था का लगभग 20 प्रतिशत है. इसके साथ-साथ एशिया, यूरोपीय बाजारों में यह आँकड़ा सोच से कहीं अधिक बुरी कहानी बयान करता है. ऐसी स्थिति के चलते अमेरिका में मंदी की आशंका जताई जा रही है. विश्व की अनेक कम्पनियाँ जो अमेरिका को अपने उत्पाद, सेवाएँ भेजती हैं, उनके कारोबार और बाजार मूल्‍यांकन में तगड़ी गिरावट देखी जा रही है. इससे नौकरियों पर भी संकट आ गया है. यदि यश स्थिति वैश्विक रूप में मंदी के रूप में सामने आती है तो छोटी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के लिए इससे उबरना मुश्किल हो जाएगा.

 

ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ने भले ही दो अप्रैल को अपना नया लिबरेशन दिवस घोषित करते हुए अमेरिका के अनेक व्यापारिक साझेदारों पर जवाबी शुल्क लगा दिया हो मगर इससे अमेरिका की स्थिति में सुधार होने की सम्भावना हाल-फिलहाल तो नजर नहीं आती है. बजाय किसी तरह के सुधार के एक सम्भावना यह बनती दिख रही है कि कहीं वैश्विक व्यापारिक क्षेत्र में अमेरिका शेष विश्व से अलग न हो जाये. ट्रम्प ने भले ही अमेरिका को अपने ही आर्थिक झंझावातों से बाहर निकालने के लिए, अमेरिका को कर्ज के मकड़जाल से मुक्त करवाने के लिए टैरिफ लगाये जाने का निर्णय लिया मगर इससे एशिया, यूरोप की अर्थव्यवस्था में अलग तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं. विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका से इतर एक नई व्यापारिक व्यवस्था को स्वीकार कर सकती हैं. निश्चित ही ऐसा होना वैश्वीकरण की व्यवस्था को पूरी तरह से उलट देने जैसा होगा. टैरिफ की घोषणा के आने मात्र से होने वाली उठापटक के बाद इसके दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सुखद कल्पना तो कदापि नहीं की जा सकती है. देखना यह है कि आने वाले समय में ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया टैरिफ वॉर क्या अंतिम परिणाम सामने लाता है?


03 मार्च 2025

अमर्यादित, अशालीन कूटनीतिक व्यवहार

वर्तमान में दो राष्ट्रों रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध जितनी चर्चा में है, उससे कहीं अधिक चर्चा दो राष्ट्रों अमेरिका और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों की मुलाकात की है. व्हाइट हाउस के ओवल हाउस में मीडिया के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की मुलाकात में शालीनता, मर्यादा, कूटनीति के सभी मानदण्डों का विखंडन देखने को मिला. अत्यंत कठोर और अमर्यादित लहजे में हुई बातचीत को समूचे विश्व ने देखा-सुना. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सख्त अंदाज़ में यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को खरी-खोटी सुनाई वह अप्रत्याशित ही नहीं अशोभनीय भी है. सामान्य शिष्टाचार के रूप में ऐसा आचरण स्वीकार्य नहीं है, इसके साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के स्तर पर भी इसे मर्यादित नहीं कह सकते. ट्रम्प के व्यवहार को देखकर लगा जैसे वे अपनी ताकत के बल पर, अपने सहयोग के एहसान के बदले यूक्रेन को युद्ध विराम के लिए एक तरह का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं. यूक्रेन को युद्ध के समय अमेरिकी मदद का जिक्र करना, मदद बिना यूक्रेन का युद्ध लड़ने में सक्षम न होने का दंभ दिखाना, यूक्रेन पर तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात उत्पन्न करने जैसा आरोप लगाना ट्रम्प का अहंकारी रवैया ही कहा जायेगा. अमेरिका संग खनन समझौते के लिए वाशिंगटन पहुँचे ज़ेलेंस्की पर अशालीन ढंग से ट्रम्प द्वारा अपना फैसला थोपने जैसा कदम उठाया गया.

 



जहाँ तक रूस-यूक्रेन युद्ध की बात है तो पिछले तीन सालों से चले आ रहे इस युद्ध का कोई अंतिम निष्कर्ष न तो निकला है और न ही निकलता दिखाई दे रहा है. इस बातचीत के बाद तो इस दिशा में अवरोध खड़े होने के आसार अधिक नजर आ रहे हैं. चूँकि ट्रम्प अपने चुनाव प्रचार के समय से ही रूस-यूक्रेन युद्ध विराम की बात करते रहे हैं, ऐसे में उनकी हडबडाहट को समझा जा सकता है. इस जल्दबाजी के कारण ही ट्रम्प पूरी मुलाकात में यूक्रेन के प्रति गम्भीर भाव नहीं दिखा सके. तीन वर्ष पूर्व आरम्भ हुए युद्ध के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है, यह चर्चा का विषय अवश्य हो सकता है. रूस कभी भी इससे प्रसन्न नहीं रहा कि सोवियत संघ के कई देशों ने नाटो की सदस्यता ले ली. 1999 में अन्य यूरोपियन देशों के साथ हुई एक संधि पर रूस ने इस बात के लिए हस्ताक्षर किये थे कि प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा के लिये किसी भी संगठन से जुड़ने को स्वतंत्र है. ऐसी संधि स्वीकारने के बाद भी रूस को सुखद प्रतीत नहीं हो रहा था कि यूक्रेन नाटो से जुड़े. ये और बात है कि 2008 में यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता माँगे जाने पर नाटो ने सदस्यता तो नहीं दी किन्तु भविष्य के लिए सदस्यता सम्बन्धी विकल्प को खुला रखा.

 

बहरहाल, रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने का एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता की मंशा रखना था. रूस द्वारा हमला किये जाने के पश्चात् यूक्रेन ने अपने दुश्मन के विरुद्ध हथियार नहीं डाले. ये भले ही अमरीकी मदद के बिना सम्भव नहीं हुआ मगर इसका अर्थ यह तो कतई नहीं कि एक राष्ट्रपति द्वारा दूसरे राष्ट्रपति को अपमानित किया जाये. ट्रम्प इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि अमेरिका की सैन्य सहायता के बिना यूक्रेन द्वारा रूस का प्रतिरोध कर पाना सहज नहीं होगा. ऐसे में युद्ध विराम के लिए ट्रम्प किसी अगुआ की भांति, किसी महाशक्ति की तरह, किसी सर्वमान्य नेता की तरह कूटनीति अपनाते हुए ज़ेलेंस्की को युद्ध विराम के लिए तैयार कर लेते तो उनके प्रयासों का महत्त्व समझ आता. जैसा कि ट्रम्प अपने बड़बोलेपन और अलग तरह की कार्य-शैली के लिए जाने जाते हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे स्वयं को अहंकारी, अक्खड़ तरीके से प्रस्तुत करते हुए किसी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष पर दबाव बनायें. यहाँ ट्रम्प को समझना चाहिए था कि ज़ेलेंस्की ने ट्रम्प से एक तरह का भरोसा चाहा था. अमेरिका के साथ अपने खनिज संसाधनों को बाँटने की स्थिति में यूक्रेन को भी आश्वासन चाहिए था कि रूस पीछे हट जाएगा, यूक्रेन के कब्ज़ाए हुए क्षेत्र वापस कर देगा और भविष्य में यूक्रेन पर आक्रमण नहीं करेगा. देखा जाये तो एक राष्ट्राध्यक्ष के नाते युद्ध विराम के बदले में ऐसी माँग अनुचित तो नहीं थी. ज़ेलेंस्की भी अच्छी तरह से जानते होंगे कि रूस के विरुद्ध युद्ध करते हुए यूक्रेन लगातार अपना ही नुकसान कर रहा है. भले ही यूक्रेन पूरी तरह से परास्त न हो पर वो रूस को अकेले नहीं हरा सकता है. ऐसे में सम्भव है कि ज़ेलेंस्की और यूक्रेन के नागरिक युद्ध-विराम जैसी स्थिति चाहते हों, भले ही इसके लिए अमेरिका अथवा किसी अन्य भरोसेमंद राष्ट्र की पहल का इंतजार कर रहे हों.

 

यहाँ ट्रम्प को यह नहीं भूलना चाहिए था कि वे राजनयिक अधिकारों एवं शिष्टाचार सम्बन्धी वियना समझौते के हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अहंकार में आकर वे यूक्रेन की सार्वभौमिकता, सम्प्रभुता का अपमान नहीं कर सकते. जेलेंस्की उनके मातहत किसी अधिकारी नहीं बल्कि एक संप्रभु, स्वतंत्र राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ उपस्थित थे. यह अपमान और प्रदर्शन व्हाइट हाउस की असभ्यता है, संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों का मखौल उड़ाना है. राजनैतिक असहमति के प्रदर्शन का यह तरीका निहायत ही निम्नस्तरीय है. ज़ेलेंस्की का खनिज समझौते पर हस्ताक्षर किये बिना वापस लौट आना, ट्रम्प का एकतरफा ऐलान सा करना कि ज़ेलेंस्की अभी शांति के मूड में नहीं हैं और जब शांति की बात करना चाहें तो हमारे दरवाजे उनके लिए खुले हैं, निश्चित रूप से युद्ध विराम सम्बन्धी स्थिति का बनने के पहले ही बिगड़ना है. ट्रम्प के इस तरह के बर्ताव के बाद यूरोपीय देशों में भी हलचल बढ़ने लगी है; रूस को भी हिम्मत मिली होगी, अब वह और अधिक हमलावर स्थिति में आने की कोशिश करेगा. यह बदलता परिदृश्य अनिश्चितताएँ बढ़ाने का कार्य करेगा.


06 नवंबर 2024

भारतीय सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रंप की जीत

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने जीत हासिल की. उन्होंने अपनी प्रतिद्वन्द्वी कमला हैरिस को पराजित किया. राष्ट्रपति पद की जीत के लिए आवश्यक 270 इलेक्टोरल वोट के आँकड़े को पार करते हुए इस जीत को हासिल किया. इस जीत से उन्होंने अमेरिका में 132 वर्ष पूर्व हुए राष्ट्रपति चुनाव परिणाम की बराबरी कर ली है. दरअसल ट्रंप 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जो 2020 में हुए अगले राष्ट्रपति चुनाव में हार गए थे. इस हार के बाद वे अब 2024 में पुनः विजयी हुए हैं. अमेरिका में ऐसा 132 साल बाद हुआ है जब कोई व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति बना हो मगर उसने चुनाव लगातार न जीता हो. डोनाल्ड ट्रंप के पहले ग्रोवर क्लीवलैंड 1884 में और फिर 1892 में राष्ट्रपति बने थे.

 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत को लेकर भारत में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. उनकी जीत से भारतीय शेयर बाजार पर भी प्रभाव पड़ता दिखा है. इसका एक कारण है कि अमेरिकी चुनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. भारत का व्यापार अमेरिका के साथ वैश्विक स्तर पर अपना महत्त्व रखता है. भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों की दृष्टि से देखा जाये तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-2022 में 119.42 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हुआ था, जबकि इसके पूर्व 2020-21 में यह 80.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. इस व्यापारिक संबंधों का प्रभाव निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा. ट्रंप के आने का सबसे ज्यादा फायदा उन उद्योगों को होने वाला है जो निर्यात से जुड़े हैं. इसमें चाहे मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियाँ हों या इन कम्पनियों के उत्पादों को बाहर भेजने वाली कोई तीसरी कम्पनी. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ऑटोमोबाइल, मशीनरी, टेक्सटाइल और कैमिकल आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है. ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है कि ट्रंप की नीतियाँ अमेरिकी कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं. इस कारण से भी भारत-अमेरिका के बीच पारस्परिक सह-संबंधों में जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकते हैं.

 



भारतीय निर्यात को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद के साथ-साथ ट्रंप द्वारा पूर्व में चीनी उत्पादों पर हाई टैरिफ लगाए जाने का सकारात्मक असर भारतीय व्यापारिक नीति में दिखाई पड़ सकता है. ट्रंप ने चीन से आने वाले सोलर पैनल, वॉशिंग मशीन, स्टील और एल्युमीनियम समेत अनेक उत्पादों पर टैरिफ्स लगाए थे. इससे अमेरिका में उनका निर्यात बहुत मुश्किल हो गया था. वहाँ की कम्पनियाँ इन उत्पादों की माँग की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्पों की ओर देखने लगी थीं. इन विकल्पों में एक नाम भारत का भी शामिल था. ऐसा माना जा रहा है कि वर्तमान जीत के बाद भी ट्रंप का रवैया या नजरिया चीन के प्रति कोई खास बदलने वाला नहीं है. यदि ऐसा रहा तो निश्चित ही माल की आपूर्ति के लिए वहाँ की कम्पनियों को दूसरे देशों को विकल्प के रूप में स्वीकारना होगा. ऐसी स्थिति में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अमेरिका के साथ इसके संबंध देश को चीन का विकल्प बनने के लिए प्रबल दावेदार बनाते हैं. इससे अमेरिकी बाजार में ऑटो पार्ट, सौर उपकरण और रासायनिक उत्पाद आदि भारतीय निर्माताओं को स्थान मिल सकता है.

 

निर्यातक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता मिलने की एक उम्मीद के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा क्षेत्र में ट्रंप की नीतियों का लाभ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में तेजी ला सकता है. अमेरिकी इन क्षेत्रों को मजबूत बनाने के लिए भारतीय रक्षा कम्पनियों के साथ बेहतर सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं. भारत-अमेरिका के बीच रक्षा और सैन्य सहयोग पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुआ है. क्वाड समूह के द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को कम करने सम्बन्धी कदम उठाया था. ट्रंप के पिछले कार्यकाल में हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्वाड समूह के द्वारा सुरक्षा साझेदारी को मजबूत किया गया था.  ऐसी स्थिति में वर्तमान में ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को बेहतर तथा मजबूत बनाये जाने की प्रबल सम्भावना है.

 

इन व्यापारिक, रक्षा सम्बन्धी मामलों के साथ-साथ ऐसा माना जा रहा है कि ट्रंप की जीत से रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति आने की सम्भावना है. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार यह कहते नजर आये हैं उनके जीतने का सुखद परिणाम रूस-यूक्रेन युद्ध रुकने के रूप में सामने आएगा. यद्यपि अमेरिका और भारत की नीति एवं वैचारिक रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग रही है किन्तु जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों पर कहते नजर आये हैं कि ये युद्ध का समय नहीं है, ऐसे में संभव है कि ट्रंप की पहल से यह युद्ध रुक जाये. युद्ध का रुकना भारतीय सन्दर्भों में भी लाभकारी है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ-साथ ट्रंप बांग्लादेश मामले में भी वहाँ हिन्दुओं पर हो रही हिंसा का विरोध करते रहे हैं. ऐसे में जबकि माना जा रहा है कि बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार में अमेरिका का हस्तक्षेप बना हुआ है. ऐसे में ट्रंप के आने से एक उम्मीद यह भी है कि बांग्लादेश के हालात और वहाँ हिन्दुओं की हालत में सुधार होगा. यदि ऐसा होता है तो यह भी निश्चित रूप से भारत के लिए लाभकारी होगा.

26 मार्च 2024

रूस पर बड़ा आतंकी हमला

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत वाली जीत के बाद रूस के और अधिक शक्तिशाली रूप में उभर कर आने का विश्वास व्यक्त किया था. इस दावे के साथ ही उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो सेनाओं के शामिल होने के अपने विश्वासपरक दावे के सापेक्ष दुनिया को विश्वयुद्ध से एक कदम दूर बताया था. पुतिन की विश्वयुद्ध की सम्भावित चेतावनी नाटो सेनाओं, पश्चिमी देशों के लिए थी. इन सबके पीछे रूस की सशक्त सेना, पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था, सजग सुरक्षा एजेंसियों का होना माना जा रहा था मगर चंद आतंकियों ने रूस के, पुतिन के इस विश्वास को हिला डाला. चार आतंकियों ने मॉस्को के नज़दीक स्थित क्रोकस कॉन्सर्ट हॉल में घुसकर सोवियत काल के रॉक बैंड ग्रुप पिकनिक के एक म्यूजिक कॉन्सर्ट के दौरान गोलियों की बौछार कर दी थी. एके 47 से की गई अंधाधुंध गोलीबारी में सैकड़ों लोगों की जान गई और घायल हुए.

 



जहाँ इस हमले की जिम्मेवारी एक तरफ इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान प्रान्त (ISIS-K) ने ली वहीं दूसरी तरफ पुतिन इस आतंकी हमले को यूक्रेन की साजिश बता रहे हैं. पुतिन के इस संदेह का कारण आतंकियों का यूक्रेनी सीमा से यूक्रेन में प्रवेश करने की कोशिश करना रहा है. एक तरफ रूसी राष्ट्रपति इस्लामिक आतंकी संगठन को, यूक्रेन को इसके लिए जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, दूसरी तरफ जैसै-जैसे इस आतंकी हमले की जाँच आगे बड़ रही है वैसे-वैसे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इस आतंकी हमले में संलिप्त चारों आतंकियों सहित कुल ग्यारह लोगों को पकड़ने का दावा रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने किया है. इन सभी गिरफ्तार व्यक्तियों का सम्बन्ध अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट की खोरासान शाखा से बताया गया है. इससे इस हमले में तुर्किये का सम्बन्ध होना सामने आया है. रूस की संघीय सुरक्षा एजेंसी (FSB) ने दावा किया है कि पहले भी मॉस्को में इसी तरह के दो आतंकी हमले की कोशिशों को नाकाम किया गया है. इस हमले में तुर्किये कनेक्शन सामने के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन को अपना दोस्त बताने वाले तुर्किये राष्ट्रपति एर्दोगन क्या अब धोखा दे रहे हैं?

 

रूस में हुए इस आतंकी हमले में अलग-अलग दृष्टिकोण से अलग-अलग पेंच और सम्बन्ध दिखाई देते हैं. हमले की जिम्मेवारी सबसे पहले इस्लामिक आतंकी संगठन ने ली थी. रूसी सुरक्षा एजेंसियों की जाँच से तुर्किये कनेक्शन दिखाई दिया. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले को यूक्रेन की साजिश बताया. इस संदेह के चलते ही यूक्रेन को पुतिन के गुस्से का खामियाजा उठाना पड़ा. रूस ने यूक्रेन के बाईस से ज्यादा शहरों में हमले किए. यूक्रेन के इस हमले में शामिल होने के दावे का असर अमेरिका पर पड़ता दिख रहा है. पुतिन के नजदीकी विश्वस्त अफसरों को संदेह है कि अमेरिका को इस तरह का आतंकी हमला होने की जानकारी थी लेकिन उसने रूस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. रूसी अधिकारियों द्वारा इस तरह का संदेह उठाये जाने का एक कारण अमेरिका द्वारा सात मार्च का वह अलर्ट है जिसमें अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों से कहा था कि वे मॉस्को में होने वाली बड़ी सभाओं और कार्यक्रमों से दूर रहें. इस अलर्ट के बीस दिनों के भीतर ही आतंकी हमला होने का सीधा मतलब यही लगाया जा रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी हमले को लेकर जानकारी थी.  

 

आतंकी हमले के तार कहाँ-कहाँ, किस-किस से जुड़े हैं ये तो आने वाले समय में होने वाली जाँच से पता चलता रहेगा मगर अब अंदेशा रूस के हमलावर होने का है. ऐसा होता नजर आने भी लगा है. सुरक्षा एजेंसियों ने देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है. सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है. यूक्रेन पर हमले बढ़ गए हैं, देखा जाये तो ये बढ़े हुए हमले कहीं का कहीं अमेरिका और नाटो सेनाओं के विरुद्ध क्रोध का संकेत हैं. दरअसल वर्ष 2002 में चेचन अलगाववादियों द्वारा नॉर्ड-ओस्ट थियेटर में बंधक बनाये जाने के बाद से यह सबसे बड़ा आतंकी हमला है. उस हमले में एक सौ सत्तर के आसपास लोग मारे गए थे. रूस अभी तक उस आतंकी हमले को भुला नहीं पाया है. इसके अलावा इसमें कोई संदेह नहीं कि पुतिन अपने नेतृत्व में रूस से इस्लामिक, कट्टरपंथी आतंकवाद का एक तरह से सफाया कर दिया है. ऐसे में पुतिन की प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत वाली जीत ने उनके विरोधियों में नाराजगी और निराशा पैदा कर दी.

 

यह आतंकी हमला इसी निराशा और हताशा का परिणाम हो या न हो किन्तु यह हमला पुतिन के विश्वास और स्वाभिमान पर अवश्य है. इस आतंकी हमले के बाद रूस आक्रामक मुद्रा में है और अमेरिका द्वारा यूक्रेन को बेगुनाह बताते हुए क्लीन चिट दी जा रही है. विश्व की इन दो महाशक्तियों द्वारा उठाये जा रहे कदमों, बयानों का अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है किन्तु इस आतंकी घटना ने एक तरह का वैश्विक भय अवश्य पैदा कर दिया है. इस आतंकी हमले ने विश्व की दो महाशक्तियों के बीच खतरनाक संघर्ष के शुरू होने का बीज बो दिया है. 






 

17 दिसंबर 2023

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन के खिलाफ महाभियोग

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है. अमेरिकी सदन के अध्यक्ष केविन मैक्कार्थी ने राष्ट्रपति पर औपचारिक महाभियोग जाँच किये जाने की घोषणा की. सदन के अध्यक्ष ने राष्ट्रपति और उनके बेटे हंटर बाइडेन के खिलाफ आरोपों पर कहा कि राष्ट्रपति ने अपने बेटे के व्यापारिक लेनदेन की जानकारी के बारे में झूठ बोला है. उनके अनुसार बाइडेन परिवार के सदस्यों को कंपनियों से लाखों डॉलर का भुगतान प्राप्त हुआ था और उस लेनदेन को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा संदिग्ध बताया गया. बाइडेन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने सरकारी कार्यालय का उपयोग अपने बेटे के व्यावसायिक भागीदारों के साथ समन्वय बनाने के लिए किया था. बाइडेन और उनके बेटे पर यूक्रेन, चीन में अपने व्यापारिक सौदों में अपने परिवार के नाम पर प्रभावी ढंग से उपयोग करने का आरोप है. इसके अलावा हंटर पर अवैध रूप से हथियार रखने, 1.4 मिलियन डॉलर टैक्स चोरी करने का आरोप भी है. यह पहला मौका है जब अमेरिका में वहाँ के कार्यरत राष्ट्रपति के बेटे के विरुद्ध आपराधिक आरोप तय हुए हैं. अमेरिका के न्याय विभाग ने हंटर को टैक्स और हथियारों से जुड़े मामलों में दोषी बताया है.

 

राष्ट्रपति बाइडेन पर उनके बेटे के विवादास्पद अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन के मामले को आधार बनाकर उन पर औपचारिक महाभियोग जाँच शुरू किए जाने का प्रस्ताव दिया गया. अमेरिकी संसद में इस प्रस्ताव के समर्थन में 221 वोट पड़े वहीं इसके विरुद्ध 212 वोट पड़े. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा द्वारा किसी राष्ट्रपति, किसी वरिष्ठ कार्यकारी अथवा न्यायिक अधिकारी को उसके पद से हटाने की औपचारिक प्रक्रिया का पहला कदम महाभियोग होता है. अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के देशद्रोह, रिश्वत, दुराचार अथवा अन्य किसी बड़े अपराध में शामिल होने की आशंका होने की स्थिति में उस पर महाभियोग लगाया जाता है. यद्यपि अमेरिकी संविधान में दुराचार तथा बड़े अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है तथापि ऐसा माना गया है कि इसका स्वीकार्य उस स्थिति में होगा जबकि उच्चस्तरीय सार्वजनिक अधिकारी द्वारा सत्ता का दुरुपयोग किया जाये. इस तरह की स्थिति में यह भी अनिवार्य रूप से माना गया है कि आवश्यक नहीं कि इसमें सामान्य आपराधिक क़ानून का उल्लंघन हो. स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय सार्वजनिक अधिकारी द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की बात सामने आती हो, भले ही कानूनी उल्लंघन न होता हो तो भी उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है.

 

महाभियोग जाँच शुरू करने के लिए सदन में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है. मुक़दमे के पश्चात् दोष सिद्ध होने की स्थिति और निष्कासन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में राष्ट्रपति पर मुक़दमे सम्बन्धी कार्यवाही की जाती है. ऐसी स्थिति में अमेरिका विधायिका की सीनेट न्यायालय की तरह से कार्य करती है. अमेरिका में वहाँ की विधायिका में कुल दो सदन हैं. एक सदन को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स कहा जाता है. जिसमें चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या उस राज्य की जनसँख्या के आधार पर निर्धारित होती है. हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स के अलावा दूसरे सदन को सीनेट कहा जाता है. इसमें अमेरिका के प्रत्येक राज्य से दो प्रतिनिधि चुने जाते हैं. प्रतिनिधियों की यह संख्या निश्चित होती है भले ही उस राज्य की जनसँख्या कितनी भी हो. इन चुने हुए प्रतिनिधियों को सीनेटर कहा जाता है. राष्ट्रपति के दोषी पाए जाने पर उसे पद से हटाने की शक्ति सीनेट को प्राप्त है.

 

महाभियोग की मंजूरी मिलने के बाद मुक़दमे की सुनवाई के लिये इन्हीं सीनेटर्स के बीच से कुछ सांसदों को चुन लिया जाता है. ये चुने हुए सीनेटर्स प्रबंधक के रूप में जाने जाते हैं जो एक तरह से अभियोजकों की भूमिका निभाते हैं. इस मुक़दमे में जिस तरह सीनेट से चुने सीनेटर्स अभियोजक के रूप में होते हैं, उसी तरह से राष्ट्रपति का भी अपना वकील होता है और वह राष्ट्रपति की ओर से अपना पक्ष रखता है. मुक़दमे की पूरी सुनवाई होने के पश्चात् सीनेट दोषसिद्धि का परीक्षण करती है, जिसके उपरांत वोट देने का प्रावधान है. यदि इस वोटिंग के द्वारा सीनेट में उपस्थित कम से कम दो तिहाई सदस्य राष्ट्रपति को दोषी पाते हैं तो उसको अपने पद से हटा दिया जाता है.

 

अमेरिका के अभी तक के इतिहास में इससे पूर्व तीन राष्ट्रपतियों डोनाल्ड ट्रंप (2019, 2021), बिल क्लिंटन (1998) और एंड्रयू जॉनसन (1868) पर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स द्वारा महाभियोग लगाया गया है.  इनमें डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी इतिहास के ऐसे पहले राष्ट्रपति बन गए हैं जिन्हें एक ही कार्यकाल में दो बार महाभियोग का सामना करना पड़ा. अभी तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है. महाभियोग का सामना करने वाले उक्त तीनों राष्ट्रपतियों को सीनेट में विमुक्त कर दिया गया.

 

अमेरिका के महाभियोग सम्बन्धी इतिहास को और बाइडेन के खिलाफ तथ्यों के आधार पर डेमोक्रेटिक पार्टी ने महाभियोग को मंजूरी देने को बेबुनियाद बताया है. भले ही आने वाले समय में मुक़दमे की कार्यवाही के पश्चात् बाइडेन को इससे विमुक्त कर दिया जाये मगर अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के महत्त्वाकांक्षी बाइडेन के समक्ष मुश्किल तो खड़ी हुई ही है.