हिन्दू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिन्दू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


10 जनवरी 2026

भारत के लिए भावी बांग्लादेश : मित्र या शत्रु?

उथल-पुथल वाली खतरनाक स्थिति के बाद से बांग्लादेश अराजक ही बना हुआ है. वहाँ के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों, हमलों, उनकी हत्याओं के चलते ऐसा लग रहा है कि वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाये जाने के बाद बनी अंतरिम सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. आन्दोलन, हिंसा, अराजकता के लम्बे दौर के बाद अब बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं. वहाँ के चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए बताया कि देश में 12 फ़रवरी को राष्ट्रीय चुनाव होंगे. यहाँ विशेष बात यह भी है कि इसी दिन देश में जनमत संग्रह भी होगा. यह चुनाव बांग्लादेश में हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहली बार होने जा रहे हैं.

 

यद्यपि बांग्लादेश में चुनावों की घोषणा से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगी है तथापि वर्तमान हालातों को देखते हुए उम्मीद की किरण पर संकट के बादल भी मँडराते नजर आ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति लम्बे समय से टकराव वाली रही है. वहाँ हमेशा से ही सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष चलता रहा है. मुख्य दलों में से एक का कट्टरपंथ की तरफ झुकाव होने, भारत के प्रति नकारात्मक भाव रखने और दूसरे का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास होने, भारत के प्रति सद्भाव रखने के कारण वहाँ वैचारिक विभेद भी खुलकर सामने आता रहा है. इसी के चलते वहाँ के चुनावों की निष्पक्षता पर आये दिन सवाल उठते रहे हैं. वैचारिक विभेद सिर्फ विरोध के स्तर पर ही नहीं रहा बल्कि इसका स्वरूप हिंसात्मक भी रहा, जिसके चलते बांग्लादेश में अकसर राजनीतिक तनाव, हिंसात्मक गतिविधियाँ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश आदि देखने को मिलता रहा  है. ऐसे वातावरण से समाज में, जनसामान्य में भय और असुरक्षा का माहौल दिखाई पड़ता रहा है.

 



विगत समय के राजनीतिक संक्रमण, सामाजिक तनाव और आर्थिक दबावों के बीच देश आगामी चुनावों की ओर बढ़ रहा है. तनाव, हिंसा, अराजकता के बीच के जो भी हालात बने उसने केवल सत्ता परिवर्तन ही किया और उसके पश्चात् बांग्लादेश को अराजक बना दिया. ऐसे घटनाक्रमों ने बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य, सामाजिक ताने-बाने और क्षेत्रीय स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित किया है. अतीत की उपजी राजनीतिक अनिश्चितता का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. राजधानी ढाका के साथ-साथ अन्य शहर सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में हैं, इसके बाद भी हिंसात्मक गतिविधियों में कमी नहीं आई है. जनसामान्य में, हिन्दुओं में, अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण बना हुआ है. अब जबकि चुनावों की घोषणा हो चुकी है तब वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र की बहाली जैसे विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने हुए हैं. आन्दोलन के बाद उपजी हिंसा की आग और अब चुनावी लहर के माहौल में वहाँ की अंतरिम सरकार को, चुनाव आयोग को, सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरफ की लापरवाह स्थिति अब वहाँ पनपने न पाए. इस तरह के संवेदनशील माहौल में किसी भी तरह की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है.

 

बांग्लादेश के खतरनाक हालातों के स्थायी समाधान के लिए समावेशी राजनीति, पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों के सम्मान आदि की आवश्यकता है. यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ये हालात देश की स्थिरता और विकास के लिए और भी गम्भीर खतरा बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देशों की नजरें भी बांग्लादेश पर टिकी हैं. शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव न केवल देश के भीतर विश्वास बहाल करेंगे बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को भी मजबूत करेंगे. आगामी माह में सम्भावित चुनावों के पश्चात् बांग्लादेश की स्थिति का असर भारत पर भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप में पड़ेगा, इसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. अंतरिम सरकार बनने के बाद भी जिस तरह से अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, वह चिंता का विषय है. पिछले दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद युनुस द्वारा पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल साहिर शमशाद मिर्ज़ा को एक पुस्तक (आर्ट ऑफ़ ट्रायंफ: बांग्लादेश द न्यू डॉन) और विवादित मानचित्र का उपहार में दिया जाना भारत के प्रति उनकी मानसिकता को ही दर्शाता है. उस मानचित्र में बिहार, झारखंड, ओड़िशा, असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के रूप में दिखाया गया है. इस तरह का कृत्य निश्चित रूप से भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने के कारण ही अंजाम दिया गया है. ऐसे में भारत को अत्यंत सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है.

 

कुल मिलाकर बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके अनुसार वहाँ शांति बहाली का रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है. ऐसी स्थिति में वहाँ के संवेदनशील जनप्रतिनिधियों को आगे आकर राजनीतिक समझदारी, संस्थागत पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी. आम जनमानस में सरकार के, लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाना होगा और उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा. देश के युवाओं को समझाना होगा कि लोकतान्त्रिक मूल्यों और शांति बहाली से ही उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं. आने वाला समय यह तो तय करेगा ही कि बांग्लादेश अस्थिरता की ओर बढ़ेगा या लोकतांत्रिक मजबूती की ओर, इसके साथ ही यह भी निर्धारित हो सकेगा कि वह भारत के लिए किस रूप में सामने आ रहा है, मित्र रूप में अथवा शत्रु रूप में.


01 अगस्त 2025

प्रेमचन्द का इस्लामिक तुष्टिकरण

आये दिन चर्चा होती है फिल्मों में तुष्टिकरण के सम्बन्ध में. नायक को हिन्दू देवी-देवताओं से नफरत होती है पर 786 के बिल्ले पर विश्वास होता है. साधु-संत ढोंगी दिखाए जाते हैं मगर मौलवी-मौलाना विश्वासी होते हैं. ऐसी अनेकानेक घटनाएँ हैं, अनेकानेक फ़िल्में हैं. गौर करियेगा, ये फ़िल्मी बातें आज़ादी के बहुत बाद की हैं. किसी दौर में तो मुस्लिम अभिनेताओं को भी अपना स्थान बनाये रखने के लिए हिन्दू नाम अपनाने पड़े थे. बहरहाल, फिल्मों में इस तरह की हरकतें आज़ादी के बहुत बाद शुरू हुईं जबकि हिन्दू पात्र खलनायक और मुस्लिम पात्र नायक दिखाए गए. हिन्दू आस्था को ढोंग बताया गया और इस्लामिक पद्धति को स्वीकारा गया.

 



आज़ादी के बहुत पहले 1933 में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ईदगाह, आप सबने पढ़ी होगी. लेखक हैं इसके प्रेमचन्द. गौर करियेगा, इस कहानी में हामिद दया का मानक बनता है, अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है. आखिर ऐसा पात्र हिन्दू भी गढ़ा जा सकता था लेकिन प्रेमचन्द ने नहीं गढ़ा. प्रेमचन्द ने हिन्दू पात्र में रचा घीसू और माधव को, कहानी को (उपन्यास) नाम दिया कफ़न. जिस-जिसने इसे पढ़ा होगा वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह का हिन्दू पात्र रचा गया. ऐसा उस लेखक द्वारा किया गया जिसे उपन्यास सम्राट कहा गया. जिसकी कोई फंडिंग इस्लामिक देशों से नहीं थी. समझना कठिन नहीं कि हिन्दू विरोधी नैरेटिव बरसों से बहुत ही सहजता के साथ चलाया-फैलाया जाता रहा है.

 


20 जून 2025

सवाल तो ढंग से उठाया जाये

आये दिन हिन्दुओं से सम्बंधित बाबाओं, महात्माओं, साध्वियों आदि से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया में दिखती है, वो भी उनके विरोध में. अक्सर ऐसा लगता है जैसे ये पोस्ट-धारी कहीं न कहीं हिन्दू-विरोधी स्लीपर सेल ही हैं. मौका ताकते ही सक्रिय ही जाते हैं.

 

इस समय बहुतायत पोस्ट में धीरेन्द्र शास्त्री निशाने पर हैं. उनका चश्मा, उनकी जैकेट निशाने पर है. इन दोनों वस्तुओं की कीमत को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं. उठाना भी चाहिए मगर सकारात्मक रूप में, बिना किसी पूर्वाग्रह के. आखिर इक्कीसवीं सदी में भी आप वही पाठ क्यों पढ़ना चाहते हैं....???

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था.

किसी गाँव में एक गरीब शिक्षक रहता था.

 

अब इस गरीब वाली मानसिकता से बाहर निकलो. कभी सवाल उठाया किसी क्रिकेटर, किसी फ़िल्मी कलाकार के उपयोग में आने वाले सामानों की कीमत के बारे में? नहीं न!! वे तुमको क्या देते हैं? कोई खेलने का ढोंग करता है, कोई अभिनय का, तुम सबको क्या मिलता है..... बाबा जी का....!! अनावश्यक अपने दिमाग पर लोड लेने की आवश्यकता नहीं. समाज सुधार सबका काम निश्चित रूप से होना चाहिए मगर पूर्वाग्रह के साथ नहीं. आप सबको लगता है कि धीरेन्द्र शास्त्री अथवा अन्य कोई दूसरा बाबा, महात्मा धोखा दे रहा है तो फिर इनको बेनकाब करिए मगर फिर उन सबको भी बेनकाब करिए जो समाज को पथ-भ्रष्ट कर रहे हैं.

 

ऐसा न हो कि सनातन धर्म वालों के विरोध में तो आप लंगोट कसे हैं.... बाकियों के विरोध में आप अपनी पतलून में ही हग-मूत लेते हैं.


27 अप्रैल 2025

नफरत फ़ैलाने वाले भी तुम

अनुभव कीजिए कि क्या पहलगाम हत्याकांड के ठीक पहले मिनट तक किसी ने पोस्ट किया कि पहलगाम के मुसलमानों की सेवा न ली जाए?


दो चार मुसलमानों की तात्कालिक सहायता के वशीभूत क्या ये भुला दिया जाएगा कि उन आतंकियों ने ही हिन्दू, मुस्लिम की पहचान करने के बाद ही गोली मारी?


पर्यटकों को घुमाने और अन्य सेवायें देने वाले स्थानीय मुसलमान जो अब सीना ठोंक कर सहायता करने का झंडा गाड़ रहे, उस समय मिलकर आतंकियों का मुक़ाबला करने का दम क्यों न दिखा पाए?


हिन्दू मुस्लिम उन आतंकियों ने शुरू किया था, उसका विरोध बंद हो गया, क्यों?


इस घटना ने आतंकियों को अब नया ढंग दे दिया है हत्याएं करने का. अब वे विशुद्ध काफिरों को ही मार सकेंगे. अपने मजहबियों की हत्या करने का दोष अब उनके सिर नहीं आयेगा.


इस घटना के दौरान या बाद में सम्भव है कि स्थानीय लोगों में सहायता की होगी पर क्या मात्र इसी कारण से भुला दिया जाए कि जो लोग मारे गए, उनको मुसलमान न होने के कारण मारा गया?


फिर हिन्दू मुसलमान कौन कर रहा?


आँखें खोलिए और सजग, सचेत, सुरक्षित रहिए. ज़्यादा भावनाओं में बहने से पहले आतंकवाद का इतिहास देख लें, कट्टरपंथियों की मानसिकता देख लें. यहाँ वक़्फ़ के ख़िलाफ़ बोलने पर शहर भर आग में जलने लगता है. एक पोस्ट लगाने पर दर्जी का गला काट दिया जाता है. क्रिकेट के विवाद में मुहल्ले भर में मारा-काटी मचा दी जाती है.


और आप सब कहते हो कि नफ़रत हम फैलाते हैं. सच को पहचानो और उसे सामने लाने की कुव्वत रखो.


23 अप्रैल 2025

हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश

पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा जाये, भले ही इसे पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

 

पहलगाम की इस घटना के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के बाद से भारतीय सेना ने, यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा था.

 



जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था. पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक है.

 

इधर जाँच में सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी. पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना बनाना था. इसमें भी उनके निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए, पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.


19 अप्रैल 2025

शांतिदूत लिखने का सन्दर्भ भी समझो

'शांतिदूत' शब्द का प्रयोग करना बंद करो.

+++++++++++++++++++++++


यदि खुलकर मुस्लिम समुदाय के हमलावरों, आतातायी लोगों, उत्पात मचाते युवकों के खिलाफ हत्यारे, बवाली, हिंसक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते तो कुछ न लिखो.... चुपचाप रहो.... मगर 'शांतिदूत' लिखकर उनको भविष्य के लिए वाकई शांतिदूत माने जाने का रास्ता न बनाओ.


वर्तमान इंटरनेट युग में इस शब्द के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश जायेगा वहीं भविष्य में इसी एक शब्द के द्वारा इन वर्तमान मुस्लिम आक्रान्ताओं को, हमलावरों को वास्तविक रूप में शांतिदूत माना-स्वीकारा जाने लगेगा.


क्या पता तब आज की तरह से फिल्मों के द्वारा सच दिखाने वाले लोग जिंदा भी मिलें या नहीं?


28 जनवरी 2025

हिन्दुओं की आस्था पर फिर आघात

एक तरफ बहुसंख्यक देशवासी प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ की पावनता का एहसास कर रहे हैं वहीं कुछ राजनैतिक पक्ष इसको मलिन बनाने में लगे हैं. महाकुम्भ की पावनता को राजनैतिक रंग देने से राजनैतिक दल, व्यक्तित्व चूक नहीं रहे हैं. इसके आरम्भ होने के पहले से ही भाजपा-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी मानसिकता वालों द्वारा अनर्गल प्रलाप किया जा रहा है. इसी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान ने विवाद पैदा कर दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी नेताओं के बीच गंगा स्नान की होड़ लगी हुई है, हालांकि इससे कोई गरीबी दूर होने वाली नहीं है. कांग्रेस पार्टी धर्म के नाम पर शोषण को कभी बर्दाश्त नहीं करने वाली. कांग्रेस अध्यक्ष को संभवतः जानकारी नहीं रही होगी कि कांग्रेस के पुराने नेता, जिसमें कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी भी शामिल हैं, कुम्भ में स्नान कर चुके हैं. देखा जाये तो यह बयान राजनैतिक विरोध के साथ-साथ धार्मिक आस्था के विरोध का भी है.  

 



विगत कुछ वर्षों से अनेक राजनैतिक दलों, व्यक्तियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक विरोध के नाम पर हिंदुत्व पर, हिन्दुओं की आस्था पर चोट करना है. अवसर मिलते ही उनके द्वारा ऐसा कर लिया जाता है. कांग्रेस अध्यक्ष को यदि भाजपा नेताओं के स्नान करने से आपत्ति थी तो उनको किसी अन्य विषय के सन्दर्भ सहित भाजपा की, उनके नेताओं की आलोचना करनी चाहिए थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. दरअसल गैर-भाजपाई दलों की दृष्टि में महाकुम्भ हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केन्द्र होने से ज्यादा भाजपा की राजनीति को सशक्त करने वाला मंच बनता जा रहा है. महाकुम्भ में जिस तरह से हिन्दू आस्था का सैलाब उमड़ रहा है उससे इन दलों को अपने राजनैतिक अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता समझ आ रहा है. यही कारण है कि अनेक दलों द्वारा लगातार किसी न किसी रूप में महाकुम्भ की आलोचना का अवसर खोजा जा रहा है. यह अवसर खड़गे को भाजपा नेताओं के गंगा स्नान करने के रूप में हाथ लगा.

 

धर्म, गंगा स्नान, महाकुम्भ आदि किसी व्यक्ति की आस्था से जुड़े विषय हैं. पिछले कुछ समय से व्यक्ति की धार्मिक आस्था को, विशेष रूप से हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को रोजगार, आजीविका, अमीरी-गरीबी आदि से जोड़ कर देखा जाने लगा है. इसका जीता-जागता उदाहरण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर रहा है. उसे लेकर अनर्गल प्रलाप बराबर बना रहता था. मंदिर के स्थान पर कोई अस्पताल बनवाने की बात करता था, कोई विद्यालय बनाये जाने की वकालत करता था. मंदिर निर्माण को रोजगार से, आजीविका से जोड़कर भी लगातार सवाल उठाये गए. यहाँ सवाल उठाये जाने वालों की नीयत में किसी व्यक्ति का भला करना नहीं, किसी वर्ग-विशेष को लाभ पहुँचाना नहीं वरन हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करना रहा है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हिन्दुओं की आस्था पर, उनके धार्मिक स्थलों पर, उनके धार्मिक कृत्यों पर प्रश्न खड़े करते लोगों द्वारा कभी भी किसी अन्य धर्म, मजहब के लिए ऐसे प्रश्न नहीं किये गए. कभी इस पर बयान नहीं दिए गए कि किसी दरगाह, मजार पर चादर चढ़ाने से किसी गरीब के नंगे बदन को वस्त्र नहीं मिल जाता. कभी सवाल नहीं उठाया गया कि मोमबत्तियाँ जलाकर प्रार्थना करने से किसी गरीब के घर रौशनी हो जाती. ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलाप ही संचालित होते हों, अन्य धर्मों के क्रिया-कलाप भी यहाँ पूरे उत्साह के साथ संचालित होते हैं, अन्य धर्मों के स्थल यहाँ अपनी पूरी आभा के साथ स्थापित हैं. ऐसी स्थिति होने के बाद भी हिन्दुओं की आस्था पर सवाल उठाना ऐसे लोगों की कुत्सित मानसिकता का परिचायक है.

 



ये बात राजनैतिक लोगों को समझ में नहीं आती है कि धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी होता है. वर्तमान में राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं.

 

जहाँ तक सवाल हिन्दुओं का है तो इस देश में सदैव से ही हिन्दुओं को साम्प्रदायिक घोषित करने का काम किया जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम पर बार-बार समाज में हिन्दुओं को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है. हिन्दुओं को बदनाम करने की आड़ में भारत देश में भगवा आतंकवादहिन्दू आतंकवाद का प्रचार किया जाता रहा है. कुछ इसी तरह की हरकत खड़गे के बयान को कहा जायेगा. ये सोचने-समझने वाली बात है कि धार्मिक कृत्य मनोभावों को, संस्कारों को, पारिवारिक मूल्यों को सहेजने का, पल्लवित-पुष्पित करने का कार्य करते हैं. आस्था में, धार्मिक विश्वास में, कृत्य में कभी भी आर्थिक दृष्टिकोण को हावी नहीं होने दिया गया है. पता नहीं राजनैतिक रूप से खुद को सशक्त समझने वाले लोग धार्मिक, सामाजिक रूप से इतने कंगाल क्यों हो जाते हैं कि वे व्यक्तियों की आस्था, भावना से खेलने का काम करने लगते हैं?  


30 दिसंबर 2024

रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से ही मन में अभिलाषा थी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर जाने की, रामलला के दर्शन करने की. इसके पीछे किसी तरह के भक्तिभाव से ज्यादा अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों, राष्ट्रीय भाव-बोध के संवाहक के दर्शन करने का भाव था. भीड़-भाड़ के दौरान उत्पन्न होने वाली अनेकानेक दिक्कतों से बचने के लिए ही प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन अयोध्या जाने का कार्यक्रम नहीं बनाया था. बहरहाल, लगभग एक वर्ष की समयावधि में ही रामलला के दर्शन करने का अवसर स्वतः ही सामने आ गया. छोटे भाइयों की व्यापारिक-व्यावसायिक मीटिंग का केन्द्र अयोध्या होने पर उनके द्वारा साथ चलने का स्नेहिल प्रस्ताव सामने रखा गया, जिसे बिना एक पल की देरी किये हमने लपक लिया. वर्ष 2024 के निपट अंतिम दिनों में बिना किसी पूर्व-योजना के अयोध्या धाम पहुँचना हो गया.

 





29 दिसम्बर की शाम को अयोध्या धाम में प्रवेश करने के बाद छोटे भाई तो अपनी व्यावसायिक मीटिंग के लिए निकल गए, हम चल दिए रामलला के दर्शन की इच्छा लिए, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर देखने की इच्छा में. समय का तारतम्य कुछ ऐसा रहा कि रामलला के दर्शन तो आज नहीं हो सके मगर वहाँ से सम्बंधित तमाम सारी जानकारियाँ एकत्र कर ली गईं, ताकि अगली सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यहाँ आने पर किसी तरह की दिक्कत न हो. रात को नौ बजे के बाद भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु, दर्शनार्थी मंदिर परिसर में नजर आ रहे थे. अगले दिन सुबह-सुबह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्रांगण में रामलला के दर्शन हेतु पहुँचना हो गया. आरम्भिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम लोगों के कदम आगे की तरफ चल पड़े.

 

श्रीराम जन्मभूमि प्रांगण में आने के बाद कदम-कदम पर न चाहते हुए भी आँखें सजल हो उठतीं. हर कदम पर याद आता वो दौर जब कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. कैसे तुष्टिकरण की राजनीति ने अनेकानेक कारसेवकों को मौत की नींद सुला दिया था. मंदिर की तरफ़ बढ़ता हर कदम याद दिलाता कि किस तरह के कष्ट-अपमान सहने के बाद ये गर्व का क्षण देखने को मिला है. श्रीराम मंदिर विरोधी बात-बात पर बाबरी ढाँचे के ध्वंस को महज राजनीति बताते और कटाक्ष करते. ऐसे ही दौर में जबकि रामलला को एक टेंट की छाया उपलब्ध कराई जा रही थी, श्रीराम मंदिर के, रामलला के दर्शन हेतु अयोध्या जाना हुआ था. तत्कालीन प्रदेश सरकार की व्यवस्था इस तरह से थी जैसे रामलला के दर्शन के स्थान पर कोई अपराध करने आ गए हों. सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों का व्यवहार, उनकी बातचीत, भाषा-शैली को कोई भी सामान्य व्यक्ति सुनना पसंद नहीं करेगा. उनके अन्दर ऐसा भाव था ही नहीं कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति, रामलला के दर्शन करने को आया श्रद्धालु किसी भी तरह की सामान्य जानकारी ही माँग रहा है, न कि किसी तरह का अपराध कर रहा है.

 





सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस कर्मियों की अतिवादिता, अहंकार, अभद्र कार्य-शैली के चलते किसी दिन उस तंग गली के भीतर से टेंट में विराजमान रामलला के दर्शन हेतु पहुँचने को नकार दिया था. उन पुलिस कर्मियों के कथित अहंकार के ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का गर्वीला भाव प्रचंड रूप में हावी था. उनके व्यवहार, भाषा-शैली के बाद वहीं तुरंत ही उनके अधिकारियों के समक्ष एक जिद को पकड़ लिया. उनसे स्पष्ट भाषा में कहा कि अब उसी दिन रामलला के दर्शन करने आयेंगे जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग हमारी सुरक्षा व्यवस्था में होंगे या फिर उस दिन आयेंगे जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन जायेगा. उस दिन अपनी जिद में रामलला के दर्शन किये बिना वापस लौट आए थे मगर मन में एक विश्वास था कि किसी न किसी दिन हम मंदिर के भीतर पहुँचकर रामलला के दर्शन करेंगे. उन तंग, सँकरी गलियों के स्थान पर चौड़ी, चमचमाती सड़कें हजारों-हजार श्रद्धालुओं को सहज भाव से आगे चलते रहने का स्थान उपलब्ध करवा रही थीं. किसी दिन पूरे अहंकारी भाव में तैनात खाकी सेना अब पूरे आदर-भाव के साथ एक-एक जानकारी देने को तत्पर थी. बात-बात पर सर-सर की अनुगूँज, हँसते-मुस्कुराते हुए हजारों की भीड़ को आगे का रास्ता बनाती सुरक्षा व्यवस्था से लग रहा था कि आज हिन्दू वास्तविक रूप में अपनी संस्कृति के प्रांगण में है.

 

उस सुसज्जित, भव्य प्रांगण में खड़े होकर स्मरण हो आया वो दौर जब छात्र-जीवन में कंठ से स्वर गूँजता था

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे”

बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का”


उस समय में जबकि रामलला के दर्शन करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की औपचारिता से बाहर निकले तो खुद को उसी प्रांगण के साथ समाविष्ट करने का भाव जागा. मोबाइल, कैमरे के द्वारा पावन परिसर को सदैव के लिए सुरक्षित कर लेने का भाव जागा. ऐसी स्थिति में भाव-व्हिवल मन-संवेदन, आँखों की नमी और कैमरे में सामंजस्य बिठाना कठिन हो रहा था. दोनों का समन्वय न बन पाने से ज़्यादा मुश्किल हो रहा था ख़ुद का उस पावन भूमि के साथ तादाम्य स्थापित कर पाना. बहरहाल, “तारीख़ नहीं बतायेंगे” जैसी कटुक्ति सुनने के दौर को सहने के बाद अब स्वतः ही “रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं” की गर्वोक्ति निकलनी स्वाभाविक थी और हजारों की भीड़ के बीच स्वतः प्रस्फुटित हुई भी.

 

जय श्रीराम

 


23 दिसंबर 2024

भारत के लिए खतरा है बांग्लादेश की अराजकता

बांग्लादेश से शेख हसीना के पलायन के बाद वहाँ हुए सत्ता परिवर्तन से लगातार हालात बिगड़ रहे हैं. वहाँ हिन्दुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. चटगाँव, पंचगढ़, बोगुरा, रंगपुर, शेरपुर किशोरगंज, सिराजगंज, नरैल, पटुआखली, सतखीरा, तंगैल, हबीगंज आदि जगहों सहित दो दर्जन से अधिक जिलों में कट्टरपंथियों का आतंक जारी है. इन स्थानों पर हिन्दुओं पर न सिर्फ हमले हो रहे बल्कि उनकी सम्पत्तियों को भी लूटा जा रहा है. कट्टरपंथियों के हमलों में उनके घरों, दुकानों, धार्मिक स्थलों को आग के हवाले किया जा रहा है. वैसे बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले होना कोई नई बात नहीं है. उनके साथ ऐसी घटनाएँ विगत वर्षों में लगातार होती रही हैं. हिन्दुओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के सम्बन्ध में भारतीय संसद में विदेश मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आँकड़े भयावह प्रतीत होते हैं. इन आँकड़ों के अनुसार हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की 47 घटनाएँ 2022 में दर्ज की गईं थीं, जबकि 2023 और 2024 में क्रमशः 302 और 2200 घटनाएँ दर्ज की गईं. विदेश राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में अल्पसंख्यक तथा मानवाधिकार संगठनों के आँकड़ों का हवाला देते हुए यह जानकारी दी.

 



बांग्लादेश को इंडिया लॉक्ड देश कहा जाता है. दरसअल भारत और बांग्लादेश के बीच 4367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 प्रतिशत है. एक दृष्टि से बांग्लादेश लगभग चारों तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है. ऐसे में बांग्लादेश की वर्तमान अराजक स्थिति का नकारात्मक प्रभाव भारत पर भी पड़ने की आशंका है. बांग्लादेश से भारत को पूर्वोत्तर के राज्यों में सहज सम्पर्क मार्ग होने के कारण सीमा सम्बन्धी मामलों के साथ-साथ सुरक्षा, शरणार्थियों के मुद्दे पर भी प्रभाव पड़ने की सम्भावना है. बांग्लादेश में ऐसी अराजक स्थिति होने के बाद भी भारत की ओर से बांग्लादेश के साथ राजनैतिक, व्यापारिक सम्बन्धों को बनाये रखने का एक बहुत बड़ा कारण बांग्लादेश का अस्थिर होना भी है. ऐसा समझा जा रहा है कि यदि भारत के द्वारा बांग्लादेश के साथ सम्बन्धों को कुछ समय के लिए भी बंद कर दिया गया तो वहाँ पर राजनैतिक अस्थिरता तो बढ़ेगी ही साथ ही वहाँ की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचने की आशंका है. ये स्थितियाँ केवल बांग्लादेश को ही नहीं बल्कि भारत को भी नुकसान पहुँचा सकती हैं.

 

बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है और एशिया में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर भारत है. एशिया में भारत के साथ सबसे ज़्यादा निर्यात बांग्लादेश करता है. उसने वित्त वर्ष 2022-23 में दो अरब डॉलर का निर्यात किया था. इसी वित्त वर्ष में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 15.9 अरब डॉलर का रहा था. भारत ने पिछले आठ सालों में बांग्लादेश को सड़क, रेल, शिपिंग और पोर्ट्स निर्माण आदि विकास परियोजनाओं के लिए आठ अरब डॉलर की मदद की है. इसके अलावा बांग्लादेश में लगभग एक चौथाई कपड़ा इकाइयाँ भारतीय कम्पनियों के स्वामित्व में हैं. ऐसे में यह अशांति इन कपड़ा निर्माण इकाइयों को भी प्रभावित करेगी.

 

व्यापारिक रूप से सशक्त सम्बन्धों के बाद भी भारत द्वारा सम्बन्ध-विच्छेद की नीति को हाल-फिलहाल इसलिए नहीं अपनाया जा रहा है क्योंकि उसके लिए सदैव से चिंता का विषय यही रहा है कि कहीं बांग्लादेश के सम्बन्ध चीन के साथ ज़्यादा मजबूत न हो जाएँ. यह चिंता अब और गहरी हो जाती है जबकि बांग्लादेश शेख हसीना की गैर-मौजूदगी में वैश्विक राजनीति में अपने कदम बढ़ा रहा है. वर्तमान परिदृश्य में बांग्लादेश की नजदीकियाँ चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के साथ भी बढ़ती दिख रही हैं. आज भी बांग्लादेश में निवेश का सबसे बड़ा स्रोत चीन है. चीन द्वारा वैश्विक सम्पर्क और सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक बहुआयामी विकास रणनीति, जिसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के नाम से जाना जाता है, का हिस्सा बांग्लादेश भी है. यदि चीन का बांग्लादेश में निवेश और निर्यात को देखें तो यह क्रमशः सात अरब डॉलर और बाईस अरब डॉलर का है. बांग्लादेश में मुहम्मद युनुस के अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने के बाद पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों की नजदीकी का उदाहरण पाकिस्तान के एक मालवाहक पोत का कराची से बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चटगाँव बंदरगाह पर पहुँचना है. 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद से दोनों देशों के बीच यह पहला समुद्री सम्पर्क है. इसे पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के सम्बन्ध बढ़ने का सशक्त कदम माना जा सकता है. इसके साथ-साथ पाकिस्तान से मजबूत सम्बन्ध रखने वाले जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन बांग्लादेश में अपनी पकड़ बना रहे हैं. इससे बांग्लादेश के साथ भारत की व्यापक खुली सीमा पर घुसपैठ और सुरक्षा मामलों का खतरा बढ़ गया है.

 

भारतीय सन्दर्भों में यदि देखा जाये तो उसके पड़ोस में अस्थिरता का निश्चित रूप से उसकी अपनी सुरक्षा पर असर पड़ेगा. इस क्षेत्र का सुरक्षा वातावरण पहले से ही काफी बिगड़ा हुआ है, जिसे अफ़गानिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक और मालदीव से लेकर म्यांमार तक देखा जा सकता है. बांग्लादेश की स्थिति इसलिए भी भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इससे बड़ी संख्या में शरणार्थियों की संभावना है. ऐसी स्थिति में भारत को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान के अनेक कट्टरपंथी संगठनों के पास सक्रिय होने का अवसर है. भारत को इन उभरती सुरक्षा और विदेश नीति सम्बन्धी चुनौतियों से निपटना होगा. इस सन्दर्भ में उठाये गए कदम न केवल भारत की आर्थिक स्थिति को निर्धारित करेंगे बल्कि उसकी राजनैतिक क्षमता को भी स्थापित करेंगे.


23 नवंबर 2024

नेरेटिव में फँसता हिन्दू

नेरेटिव सेट करना सुना है? बिलकुल सुना होगा क्योंकि चौबीस घंटे तो मोबाइल हाथ में लिए सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना होता है.


आजकल एक नेरेटिव सेट किया जा रहा है बारातियों की संख्या निर्धारित करने का. और हिन्दू ही लगे हैं दे दनादन इसे शेयर करने में, पोस्ट करने में. हम नहीं कहते कि किसी दूसरे धर्म के रीति-रिवाजों के बारे में सोचो या पोस्ट करो. काहे कि ये औकात की बात होती है. जिनकी औकात में कपड़े नाप से सिलवाने की न हो वे क्या औकात रखेंगे हजारों-हजार लोगों के स्वागत की.


किसी समय में सुना था कि महाराजा सिंधिया (माधवराज) की बेटी की शादी में पूरे ग्वालियर में मुनादी हुई थी लगातार सात दिनों तक सम्पूर्ण ग्वालियर के भोज की. आखिर ऐसी औकात भी तो हो.


चलिए, एक मिनट को मान लें कि कम बाराती लाने वाली पोस्ट के पीछे कोई नेरेटिव नहीं, किसी तरह का कोई पूर्वाग्रह नहीं, तो भी किसी भी बारात का स्वागत का इंतजाम, खुद लड़की वालों की अपनी व्यवस्था का इंतजाम लड़की वाले ही करते हैं.


एक पल को यहाँ मान लें कि लड़के वालों के दबाव में लड़की वालों ने ऐसा किया होगा मगर त्रयोदशी, जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ तो आपके नितांत व्यक्तिगत और एकल अधिकार वाले आयोजन हैं. इनको काहे इतनी तड़क-भड़क से मनाया जाता है? क्यों त्रयोदशी के लिए सैकड़ों-हजारों की संख्या में कार्ड बाँटे जाते हैं? क्या त्रयोदशी संस्कार के लिए भी बाराती लाये जाते हैं?


इस तरह के नेरेटिव से आज बचने की आवश्यकता है. बेवक़ूफ़ हिन्दू इसी में फँस जाता है और अपना ही बुरा कर बैठता है.


17 नवंबर 2024

नेरेटिव में फँसते हिन्दू

नेरेटिव सेट करना सुना है? बिलकुल सुना होगा क्योंकि चौबीस घंटे तो मोबाइल हाथ में लिए सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना होता है. आजकल एक नेरेटिव सेट किया जा रहा है बारातियों की संख्या निर्धारित करने का. और हिन्दू ही लगे हैं दे दनादन इसे शेयर करने में, पोस्ट करने में. हम नहीं कहते कि किसी दूसरे धर्म के रीति-रिवाजों के बारे में सोचो या पोस्ट करो. काहे कि ये औकात की बात होती है. जिनकी औकात में कपड़े नाप से सिलवाने की न हो वे क्या औकात रखेंगे हजारों-हजार लोगों के स्वागत की.

 



किसी समय में सुना था कि महाराजा सिंधिया (माधवराज) की बेटी की शादी में पूरे ग्वालियर में मुनादी हुई थी लगातार सात दिनों तक सम्पूर्ण ग्वालियर के भोज की. आखिर ऐसी औकात भी तो हो. चलिए, एक मिनट को मान लें कि कम बाराती लाने वाली पोस्ट के पीछे कोई नेरेटिव नहीं, किसी तरह का कोई पूर्वाग्रह नहीं, तो भी किसी भी बारात का स्वागत का इंतजाम, खुद लड़की वालों की अपनी व्यवस्था का इंतजाम लड़की वाले ही करते हैं.

 

एक पल को यहाँ मान लें कि लड़के वालों के दबाव में लड़की वालों ने ऐसा किया होगा मगर त्रयोदशी, जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ तो आपके नितांत व्यक्तिगत और एकल अधिकार वाले आयोजन हैं. इनको काहे इतनी तड़क-भड़क से मनाया जाता है? क्यों त्रयोदशी के लिए सैकड़ों-हजारों की संख्या में कार्ड बाँटे जाते हैं? क्या त्रयोदशी संस्कार के लिए भी बाराती लाये जाते हैं? इस तरह के नेरेटिव से आज बचने की आवश्यकता है. बेवक़ूफ़ हिन्दू इसी में फँस जाता है और अपना ही बुरा कर बैठता है.

 


30 अक्टूबर 2024

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो, यह वाक्य सुन्दरसार्थक और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दियों की जगमगमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीरोशनियों के साथ फूटते पटाखे आदि अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चोंयुवाओंबुजुर्गोंपुरुषों-महिलाओं का स्वाभाविक रूप हर्षोल्लासित होना दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में प्रकृति के अन्तर्गत मनमोहक ऋतुओं की तरह से विविध पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेषता यह है कि इन्हें धार्मिकता के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते हैं. इसका उद्देश्य यही है कि इनके द्वारा सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन हुआ है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब चकाचौंध के वशीभूत होता जा रहा है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली के बीच दीपावली का उद्देश्य सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत खड़ा दिखाई देता है. इस आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं दिखती वरन् मोबाइल के पीछे सेल्फी लेने वाले हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता में हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. मिठाई के पैकेट स्वयं को तुच्छ और गरिमाहीन सा महसूस करने लगते हैं जब किसी ब्रांडेड कम्पनी की चाकलेट का डिब्बा खुलकर मुँह चिढ़ाने लगता है. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने कोई विदेशी आतिशबाजी अपने अस्तित्व का विस्तार करने लगती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. इस तरह की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे.

 

हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक ही नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा. 

24 जुलाई 2024

ये विषय आस्था का है

व्रत-उपवास-पूजन आदि की सामग्री को लेकर बहुसंख्यक हिन्दू परिवारों में सदैव से एक अलग स्थिति रही है. दुकान पर मिठाई अथवा अन्य पूजन सामग्री वाला भले ही दो दिन से न नहाया हो, मुँह में गुटखा भरे हो मगर वही सामग्री घर में आने के बाद पूज्य हो जाती है. उसे बिना नहाए छुआ नहीं जा सकता है, बिना पूजन के उसे खाया नहीं जा सकता है, जूठे मुँह उसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है. ये सब कोई ढकोसला नहीं बल्कि एक विश्वास है, एक आस्था है. ये अलग बात है कि आधुनिक बनने के चक्कर में, वामपंथ को चचोरते रहने के कारण बहुतेरे हिन्दू इन सब बातों को सार्वजनिक रूप से नहीं मानते. (ये और बात है कि ऐसे बहुतेरे हिन्दू अंदरूनी रूप में कहीं न कहीं ऐसी बातों का पालन करते हैं.)

 

यदि कांवड़ मार्ग में हिन्दू श्रद्धालुओं के भोज्य पदार्थों के साथ शुचिता बनाये रखने के लिए कोई आदेश आया था तो मुसलमानों को उसका स्वागत करना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ क्योंकि इनका मूल कर्म हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाना है, हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों, कृत्यों पर हमला बोलना है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश पर मुसलमानों से ज्यादा वे लोग उचकने में लगे हैं जो मुस्लिम वोटों के कारण जिंदा हैं. ऐसे लोग भी जानते हैं कि हिन्दू आस्था, श्रद्धा का तात्पर्य क्या है, मगर वे अपनी मानसिकता के हाथों बंदी बने हुए हैं.

 


24 अप्रैल 2024

माधवी लता के तीर की हलचल

लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ अपने चरम पर हैं. उम्मीदवारों का अपना जोश है और उनके समर्थक अपने ही अलग जोश में है. इस जोश में, उत्साह के बीच कुछ लोकसभा सीटें और कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जिनको व्यापक लोकप्रियता मिली हुई है, वे पर्याप्त चर्चा के केन्द्र में हैं. सात चरणों में संपन्न होने वाले चुनावों का अभी पहला चरण ही पूरा हुआ है मगर सूरत लोकसभा सीट, हैदराबाद लोकसभा सीट, उम्मीदवार माधवी लता लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं. सूरत सीट के चर्चा में आने का कारण वहाँ से भाजपा के प्रत्याशी मुकेश दलाल का निर्विरोध निर्वाचित होना है. इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवारी खारिज हो जाने और अन्य प्रत्याशियों द्वारा नाम वापस लेने के कारण भाजपा प्रत्याशी को निर्विरोध विजयी घोषित करने के बाद से यह सीट लगातार चर्चा में बनी हुई है.

 

कुछ इसी तरह की चर्चा का विषय, लोकप्रियता के केन्द्र में हैदराबाद की सीट बनी हुई है. इस सीट पर विगत कई वर्षों से अपना कब्ज़ा बनाये असदुद्दीन ओवैसी के सामने भाजपा ने नए चेहरे माधवी लता को उतारा है. आजादी के बाद से लोकसभा के यहाँ संपन्न हुए कुल सत्रह चुनावों में दस बार ओवैसी परिवार की जीत हुई है. 1984 में असदुद्दीन ओवैसी के पिता सलाहुद्दीन ओवैसी ने पहली बार कांग्रेस के विजय अभियान को रोका था. उसके बाद से लगातार छह चुनाव सलाहुद्दीन ओवैसी ने और चार चुनाव असदुद्दीन ओवैसी ने जीते हैं. उनके खिलाफ मैदान में उतरी माधवी लता भले ही नया चेहरा हो मगर हैदराबाद की राजनीति में वे पिछले काफी समय से लगातार सक्रिय हैं. उनकी पहचान प्रखर हिन्दू नेता के साथ-साथ सजग सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बनी हुई है. उनके हिन्दूवादी बयानों ने जहाँ उनको ओजस्वी वक्ता के रूप में पहचान दी वहीं झुग्गी-झोपड़ियों की मुस्लिम महिलाओं के सहायतार्थ काम करने ने उनको संवेदनशील व्यक्ति के रूप में भी जाना है.

 



इस चुनाव में ओवैसी पिछले कई वर्षों का चुनावी अनुभव लेकर उतरे हैं मगर माधवी लता पहली बार चुनावी मैदान में हैं. अपना पहला चुनाव होने के बावजूद माधवी के जोश में, उत्साह में किसी तरह की कमी नहीं दिखती है. इसी जोश, उत्साह में रामनवमी के अवसर पर उनका एक काल्पनिक तीर देशव्यापी चर्चा का विषय बन गया. इंटरनेट पर वायरल हुए एक वीडियो में रामनवमी की शोभायात्रा के अवसर पर माधवी लता बिना वास्तविक धनुष-वाण लिए इस तरह की भाव-भंगिमा बनाती हैं जैसे वे धनुष पर तीर चढ़ाकर उसे किसी पर चला रही हैं. उनके इस काल्पनिक तीर चलाने को लेकर इस आरोप के साथ प्राथमिकी दर्ज की गई कि उन्होंने शोभायात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाली एक मस्जिद को निशाना बनाते हुए अपना काल्पनिक तीर चलाया था. उनके इस कृत्य से, भाव-भंगिमा से मुस्लिम समाज आहत हुआ है. अपने ऊपर दर्ज प्राथमिकी का विरोध करते हुए माधवी लता ने भी ओवैसी के विरुद्ध चुनाव आयोग में शिकायत की है. माधवी लता ने एक वीडियो का जिक्र करते हुए शिकायत की कि ओवैसी अपने चुनाव प्रचार के दौरान कसाइयों को गाय काटने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. वीडियो में वह ‘काटते रहो’ कहकर ‘बीफ जिंदाबाद’ का नारा भी लगा रहे हैं. यह एक प्रकार से खुलेआम गोमाँस खाने का समर्थन है. इससे एक समुदाय विशेष की भावनाएँ आहत हुई हैं.

 

हिन्दू, मुस्लिम समाज की भावनाओं के आहत होने की बात हो, तीर चलाने की मुद्रा बनाना हो, बीफ जिंदाबाद का नारा लगाना हो, ये सब राजनैतिक गलियारे की हलचल हैं. सोचने वाली बात ये है कि मुस्लिम समाज की खुलेआम कट्टरता से, उनके अतिवाद से हिन्दू समाज की भावनाएँ आहत नहीं होती हैं मगर एक काल्पनिक तीर पूरे समाज को आहत कर जाता है. यदि हैदराबाद के चुनावी माहौल को देखें तो इस बार स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि भाजपा का जिस तरह से दक्षिण में विस्तार हो रहा है उससे उसके विरोधियों में हलचल मची हुई है. वैसे तो हैदराबाद मुस्लिम बहुल सीट है किन्तु इस बार पाँच लाख से अधिक मतदाताओं के कम हो जाने तथा माधवी लता के प्रचार के निराले अंदाज से विरोधी खेमे में बेचैनी है. इस बेचैनी का एक और कारण असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान किया गया दावा भी है. उन्होंने दावा किया था कि राज्य की सत्ता में आने पर तीस मिनट के भीतर हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर कर दिया जाएगा. केंद्रीय मंत्री और तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी ने भी इसी तरह का बयान देकर हैदराबाद नाम परिवर्तन की राजनीति को हवा दी. विगत लम्बे समय से भाजपा जिस तरह से सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय भावना को लेकर काम कर रही है उसे लेकर हैदराबाद का नाम भाग्यनगर किये जाने के समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है.  

 

हैदराबाद में मुस्लिम लगभग साठ प्रतिशत, हिन्दू पैंतीस प्रतिशत और शेष में अन्य समुदाय हैं. भले ही 1984 में पहली जीत के बाद से ओवैसी परिवार का मत प्रतिशत बढ़ता रहा हो किन्तु माधवी लता द्वारा गरीब मुस्लिम महिलाओं के लिए काम करते रहने से उनको मुस्लिम समाज का समर्थन मिल रहा है. निवर्तमान सांसद एवं प्रत्याशी असदुद्दीन ओवैसी अथवा भाजपा के नए चेहरे माधवी लता में से किसका निर्वाचन होगा, ये तो यहाँ के मतदाताओं पर निर्भर है. यदि ओवैसी अपने पिछले रिकॉर्ड को बनाये रख पाते हैं तो सबकुछ जैसे का तैसा नजर आएगा किन्तु यदि माधवी लता की जीत होती है तो निश्चित ही इस शहर की पहचान की पुनर्व्याख्या तय होगी. चुनाव परिणाम कुछ भी हो ओवैसी के गढ़ में एक महिला का खम ठोकना दिलचस्प है. आत्मविश्वास से भरी हुई माधवी लता जोरदार चुनौती दे रहीं है. लोकसभा चुनाव परिणाम कुछ भी हो, हैदराबाद का भाग्य किसी भी करवट बैठे मगर इस सितारे का राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर चमकना तय है, एक उत्कृष्ट महिला नेत्री का उदय अवश्य है. 






 

12 मार्च 2024

अपने ही नागरिकों को नागरिकता देने वाला कानून

चार वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा के पश्चात् अंततः नागरिक संशोधन अधिनियम को भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. दिसम्बर 2019 में यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ था. अब इसे अधिसूचित किये जाने के बाद इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है. इस कानून के लागू हो जाने से भारत के तीन पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल सकेगी. संसद के दोनों सदनों से पारित इस अधिनियम के द्वारा अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का त्वरित मार्ग प्रदान करके के लिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किये गए.

 



देश की स्वतंत्रता के बाद जब 26 जनवरी 1950 को यहाँ का संविधान लागू हुआ तो भारत में जन्म लेने वाले नागरिकों को यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल गई थी. इसके पश्चात् 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई जो पूर्व-रियासतों के नागरिक रहे थे. इस कानून में समय-समय पर परिवर्तन भी किये जाते रहे. ऐसा करने के पीछे कारण गोवा, दमन-दीव, पुडुचेरी की भौगौलिक स्थितियों में आये परिवर्तन रहे थे. दरअसल पाकिस्तान और बांग्लादेश से भूमि विवाद सुलझाने के कारण से इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को भारत की नागरिकता देने के लिए ये संशोधन किये गए थे. भूमि विवाद के साथ-साथ इन पड़ोसी देशों में धार्मिक विवाद भी लगातार देखने को मिल रहे थे. इससे शायद ही कोई इंकार करे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यक नागरिकों-हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी आदि को लगातार अमानवीय व्यवहार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा, संरक्षण के लिए नेहरू-लियाकत समझौता भी इसी कारण से धरातल पर लाया गया था. कालांतर में उसका अनुपालन असल हो गया.

 

ये एक विचारणीय स्थिति है कि देश के विभाजन के पूर्व इन तीनों पड़ोसी देशों के ये अल्पसंख्यक नागरिक इसी भारत देश के नागरिक थे, यही इनकी भी मातृभूमि थी. ऐसी स्थिति जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए किये गए समझौते का अनुपालन करना संभव नहीं हो रहा था तो भारत की संवैधानिक जिम्मेवारी बनती थी कि वह इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करे. लगातार मिलते उत्पीड़न, शोषण के कारण इन देशों के अल्पसंख्यक नागरिक लगातार अपनी मातृभूमि-भारत की तरफ एक आशा की दृष्टि के साथ दौड़ पड़ते हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ऐसे हजारों नागरिक अवैध प्रवासी के रूप में भारत में रह रहे हैं. मानवीयता के आधार पर भले ही उनकी सहायता की जा सके मगर देश की कोई भी सरकार, राज्यों की सरकारें चाह कर भी संवैधानिक रूप से उनकी सहायता नहीं कर पा रही थीं. ये तीनों देश भी अपने देश में अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सहायता करने में असमर्थ ही नजर आ रहे थे. ऐसे में भारत सरकार ने अपना दायित्व समझते हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम को दोनों सदनों में पारित करवाया और उसकी विस्तीर्ण नियमावली को अधिसूचित कर दिया. यह अधिनियम इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान करता है किन्तु वह इन्हीं तीनों पडोसी देशों के मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान नहीं करता है.

 

देखा जाये तो भारत सरकार की तरफ से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम का उठाया जाना है. इस अधिनियम से देश के किसी भी अल्पसंख्यक और मुस्लिम की नागरिकता पर किसी तरह का संकट नहीं खड़ा होता है, जैसा कि पूर्व में अनेक विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है. अनेक राजनैतिक दलों के साथ-साथ अनेक मुस्लिम संगठनों ने इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् इसका जबरदस्त विरोध किया था. शाहीन बाग़ में एक लम्बी अवधि तक चला विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण है. यहाँ स्पष्ट रूप से समझने वाली बात है कि यह अधिनियम देश के किसी भी व्यक्ति, वह चाहे किसी भी धर्म का हो, की नागरिकता को खतरे में नहीं डालता है न ही उसका हनन करता है. यह अधिनियम उन वंचितों को, धार्मिक अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देता है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में प्रताड़ित होकर भारत में शरणार्थी की स्थिति में हैं. नागरिकता अधिनियम में नागरिकता के प्रावधान के सन्दर्भ में आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से आखिरी वर्ष में 11 महीने भारत में रहना चाहिए. कानून में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई जो तीन देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सम्बंधित हैं, उनके लिए 11 वर्ष की जगह 6 वर्ष तक का समय निर्धारित किया गया है. कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है तो ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया कार्डधारकों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है. 


भारत सरकार द्वारा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में अपने ही उन नागरिकों को संरक्षण, सुरक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान किया है जो आज़ादी के समय तत्कालीन स्थितियों के चलते अनचाहे ही किसी दूसरे देश के नागरिक बन गए थे और उन देशों में वे धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक भी थे, प्रताड़ित भी थे. इस तरह के कदम के लिए देशव्यापी समर्थन, सहयोग मिलना चाहिए था मगर कतिपय राजनैतिक स्वार्थ के चलते इस अधिनियम का अतार्किक विरोध किया गया. अब जबकि इस अधिनियम को अधिसूचित कर दिया गया है, राज्यों का अनापेक्षित हस्तक्षेप न रहे इसके लिए केन्द्रीय पोर्टल की व्यवस्था की गई है, तब सभी को अपने ही पूर्व-नागरिकों का स्वागत, सम्मान करना चाहिए जो अभी तक अपने ही देश में शरणार्थी की तरह रहने को विवश थे. 





 

24 अक्टूबर 2023

सनातन संस्कृति के विरुद्ध तथ्यहीन, असत्य बातों का प्रचार

विजयादशमी का पावन पर्व उसी तरह से गुजर गया जैसे कि प्रतिवर्ष गुजरता है. एक दिन पहले से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान चलना शुरू हुआ. सोशल मीडिया के तमाम मंचों के द्वारा नीलकंठ के दर्शन करवा दिए गए, पान खिलवा दिए गए. इधर कई वर्षों से ऐसा होने लगा है कि अब किसी भी पर्व-त्यौहार पर मिलने-जुलने का काम मोबाइल के द्वारा होने लगा है. चित्रों के, शब्दों के माध्यम से शुभकामनाओं का आना-जाना हो जाता है, उसी को मिलना-जुलना, लोगों का आना-जाना मान लिया जाता है. जितना उत्साह मोबाइल पर, सोशल मीडिया के मंचों पर दिखाई देता है, उससे अधिक उदासीनता एक-दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने में दिखती है. 




इस उदासीन सी स्थिति के साथ-साथ विगत कुछ वर्षों से एक चलन और देखने को मिलने लगा है कि दशहरा आते ही रावण को महान बताये जाने के प्रयास होने लगते हैं. उसे एक भावुक इंसान, अत्यंत विद्वान, सजग भाई, जिम्मेवार पति, मानवीय दृष्टिकोण रखने वाला बताया जाने लगता है. राम के सापेक्ष उसके व्यक्तित्व को इस तरह से खड़ा किया जाने लगता है कि राम को मानने वाले खुद में शर्म महसूस करने लगें. रावण को इतना महान बताया जाने लगता है कि समाज के बहुत से लोग उसी की तरह के भाई, पति, इंसान मिलने की कल्पना करने लगते हैं. दरअसल ये जहाँ एक तरफ सनातन संस्कृति को धूमिल करने का, उसे बदनाम करने का षड्यंत्र है वहीं दूसरी तरफ सनातन संस्कृति वालों के द्वारा अपनी ही संस्कृति से विमुख होने का दुष्परिणाम है.


इक्कीसवीं सदी में आने के बाद से लोगों में आधुनिक होने का ऐसा नशा चढ़ा है कि अपनी ही संस्कृति को नकारना उनके लिए गर्व की बात होने लगी है. जिस तरह से किसी अत्याधुनिक अथवा आधुनिक माने लाने वाले परिवार के लिए यह बड़े गर्व की बात होने लगी है कि उसकी बेटी रसोई का काम नहीं जानती, ठीक इसी तरह से यह भी गौरवान्वित करने वाली बात होने लगी है कि किसी व्यक्ति को हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी नहीं, सनातन संस्कृति की समझ नहीं, अपने ही धर्म ग्रंथों, धार्मिक व्यक्तित्वों के बारे में कोई जानकारी नहीं. ऐसे में केवल उन लोगों को ही दोष नहीं दिया जा सकता जो सनातन संस्कृति के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे तो अपने काम को पूर्ण मनोयोग से करने में लगे हैं. उनको इस काम के लिए उचित मानदेय, पारिश्रमिक भी मिल रहा है. समय-समय पर ऐसे लोग सम्मानित भी किये जाते हैं. इसके उलट सनातन संस्कृति के लोग क्या कर रहे हैं? हिन्दू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले क्या कर रहे हैं?


ये लोग भी ऐसी बातों का विरोध इसलिए भी नहीं कर पाते क्योंकि अपने ही धर्म के बारे में इनको ज्ञान नहीं. रावण के बारे में बताई जा रही अनर्गल बातों की काट के सम्बन्ध में असली ज्ञान इनको है ही नहीं. रावण ने सीता जी का स्पर्श क्यों नहीं किया; रावण और उसकी बहिन के आपसी सम्बन्ध क्या थे; रावण के पतिरूप, पितारूप, भाईरूप की असलियत क्या थी आदि बातों को तब समझा जाता जबकि अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया होता. इंटरनेट पर बिखरी बड़ी काल्पनिक, असत्य, तथ्यहीन बातों को पढ़कर हिन्दू धर्म को, सनातन संस्कृति को समझने का दंभ भरने वालों ने ही ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर समाज में फैला रखा है. वर्तमान दौर में सनातन संस्कृति के विरुद्ध काम करने वालों को सबक सिखाने से कहीं ज्यादा आवश्यक है कि सनातन संस्कृति, हिन्दू धर्म, इनके व्यक्तित्वों, धार्मिक ग्रंथों के बारे में प्रचारित तथ्यहीन, असत्य बातों को फैलने से रोका जाये.