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10 फ़रवरी 2019

दिव्यता और ऐतिहासिकता का पर्व है वसंत पंचमी


माघ मास की पंचमी को वसंत पंचमी के पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है. शास्त्रों में इसे ऋषि पंचमी के रूप में जाना जाता है. वसंत पंचमी पर ज्ञान, पौराणिकता, आध्यात्मिकता के साथ-साथ दिव्यता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है. ऋतुराज वसंत सबके मन को लुभाता हुआ अपने आपमें दिव्यता, भव्यता, ऊर्जा का संचार करता है. वासंती प्रवाह न केवल प्रकृति को वरन उसके अंगों-उपांगों तक को नवीन ऊर्जा से भर देती है. वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है. प्रकृति से लेकर पशु-पक्षी तक सभी उल्लास से भर जाते हैं. माँ सरस्वती के जन्मने के रूप में वर्णित पौराणिकता के चलते जहाँ वसंत पर्व में पावनता के दर्शन होते हैं वहीं सम्पूर्ण प्रकृति पर छाई माँ शारदे के वीणा की मधुर तान सबको सम्मोहित करती है. 

पौराणिकता मान्यता है कि पृथ्वी के निर्माण के बाद जीवों की उत्पत्ति हुई,, उसके बाद भी वहां सूनापन बना हुआ था. ब्रह्मा जी के लिए ये चिंता का विषय था कि इतनी गहन और श्रेष्ठ सर्जना के बाद भी पृथ्वी पर शांति छाई हुई है. इसके पश्चात् उन्होंने विष्णु जी की आज्ञा से पृथ्वी पर एक दिव्य शक्ति का प्रादुर्भाव किया. इस शक्ति के उत्पन्न होते ही चारों तरफ ज्ञान, उत्सव, संगीत, राग-रागिनियों, पावनता, दिव्यता का वातावरण चित्रित होने लगा. स्वर-लहरियाँ दसों दिशाओं में गूँजने लगीं. यह दिव्य शक्ति अपने छह हाथों के साथ प्रकट हुई जिसने एक हाथ में पुस्तक, दूसरे में कमल, तीसरे और चौथे हाथ में कमंडल तथा पाँचवें और छठवें में वीणा धारण किये हुए थे. इसके दिव्य रूप से ऋषियों को वेदमंत्रों का ज्ञान हुआ. सभी जीवों को उस दिव्य शक्ति की वीणालहरी से स्वर प्राप्त हुआ. ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा. वर्तमान में माँ सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं. वसन्त पंचमी को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं.


माँ सरस्वती को भारतीय मान्यतानुसार ज्ञान की, विद्या की देवी स्वीकार भी किया गया है. इस पर्व की पावनता की वैज्ञानिकता के सम्बन्ध में इसलिए भी सहज विश्वास किया जा सकता है क्योंकि जिस प्राकृतिक वातावरण में वसंत का आगमन होता है उस समय चारों तरफ हरियाली के साथ-साथ खेत पीले रंग की चादर ओढ़े हुए सुहाने मौसम का स्वागत कर रहे होते हैं. खेतों में फैली फसलों की हरियाली और वासंती रंग किसानों के मेहनत का सुखद पुरस्कार दर्शा रही होती है. मस्ती में आनंद से सराबोर होते किसान झूमते हुए इसी वासंती रंग से अपार ऊर्जा का संचरण अपने भीतर महसूस कर रहे होते हैं. पूस की कड़कती ठण्ड के बाद सुहाने, गुलाबी मौसम में चारों तरह आनंद और मनमोहकता का बिखराव दिखाई देता है. उत्सवधर्मी भारतीय ऐसे किसी भी अवसर को आनंद में परिवर्तित कर लेते हैं जहाँ सर्वत्र खुशियों की आहट सुनाई देने लगे. यही कारण है कि वसंत पंचमी को किसी भी तरह के मांगलिक कार्यों का शुभारम्भ किया जा सकता है. वैदिक परम्पराओं का पालन करने वाले, मुहूर्त, शुभ घड़ी आदि देखकर कार्य करने वाले लोग भी इस दिन स्वेच्छा से निर्बाध रूप से अपने मांगलिक कार्यों का आरम्भ करते हैं.

वसंत पंचमी की पौराणिकता के साथ-साथ इसके साथ ऐतिहासिकता भी सम्बद्ध है. ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर वसंत पंचमी का दिन पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है. उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को सोलह बार युद्ध में पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया. इसके बाद  सत्रहवीं बार हुए युद्ध में पृथ्वीराज चौहान जब पराजित हो गए तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा. वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं. इसके बाद गौरी ने उनको मृत्युदंड देने से पहले उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा. पृथ्वीराज चौहान के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया. चंदबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान को संकेत करते हुए मोहम्मद गौरी के बैठे होने के स्थान का आभास करवाया.
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥

पृथ्वीराज चौहान ने कोई भूल नहीं की. उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से जो बाण छोड़ा वह गौरी के सीने में जा धंसा. इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया.  सन 1192 ई को घटित यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी.

वसंत पंचमी की पौराणिकता, ऐतिहासिकता और उसकी दिव्याभा के साथ-साथ उसमें साहित्यिकता का भी समन्वय है. सम्पूर्ण भारतवर्ष की समस्त ऋतुओं में से वसंत ऋतु एकमात्र ऐसी ऋतु है जिसे सभी आयुवर्ग के लोगों द्वारा पसंद किया जाता है. विद्या की देवी माँ सरस्वती के अवतरण दिवस के कारण इसका सम्बन्ध शिक्षा, ज्ञान से होने के कारण शिक्षक, शिक्षार्थी के साथ-साथ साहित्यकार, लेखक भी सहज रूप में इससे अपने को सम्बद्ध मानते हैं. शिक्षक, शिक्षार्थी शैक्षणिक संस्थानों में, गुरुकुलों में, विद्यालयों में माँ सरस्वती का पूजन करते हैं. इसी तरह कवियों, साहित्यकारों, लेखकों ने इस पर्व को युवामन के चिर-अभिलाषी पर्व के रूप में वर्णित किया है. उनके द्वारा वसंत का उद्घाटन कहीं नायिका के रूप में चित्रित किया गया है तो कहीं उसे प्रेयसी के रूप में दर्शाया गया है. ऐसा विरल समुच्चय अन्यत्र देखने को मिलता नहीं है जबकि किसी एक पर्व के साथ पावनता, पौराणिकता, परम्परा, ऐतिहासिकता, साहित्यिकता, शिक्षा, ज्ञान, ऊर्जा, जोश आदि का समन्वय हो. देखा जाये तो वसंत पंचमी सृजन का प्रतीक है. उमंग, उल्लास, जोश का प्रतीक है. नवचेतना का गान है तो नवोन्मेषी प्राकट्य का आधार है. वसंत की इस पावन वासंती ऊर्जा में प्रयास यही हो कि सभी अपने में नवचेतना का स्फूर्त प्रकीर्णन महसूस करें. नवचेतना का संचार भरें और उस नवीन स्फूर्ति से देशहित में, समाजहित में खुद को प्रेरित करें.



22 जनवरी 2018

पावनता और ज्ञान का पर्व है वसंत पंचमी

हिन्दी महीनों के अनुसार माघ मास की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी के पावन पर्व का आयोजन किया जाता है. शास्त्रों में इसका उल्लेख ऋषि पंचमी के रूप में भी किया गया है. ज्ञान, दिव्यता, पौराणिकता, आध्यात्मिकता आदि का जितना अद्भुत समन्वय वसंत पंचमी पर दिखाई देता है वैसा किसी और पर्व में देखने को नहीं मिलता है. ऋतुराज वसंत अपनी वासंती बयार के साथ सबके मन को लुभाता हुआ पूर्ण दिव्याभा के साथ आता है. अपने आपमें दिव्यता, भव्यता, ऊर्जा का संचार करते हुए वासंती प्रवाह न केवल प्रकृति को वरन उसके अंगों-उपांगों तक को नवीन ऊर्जा से भर देता है. वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है. प्रकृति से लेकर पशु-पक्षी तक सभी उल्लास से भर जाते हैं. माँ सरस्वती के जन्मने के रूप में वर्णित पौराणिकता के चलते जहाँ वसंत पर्व में पावनता के दर्शन होते हैं वहीं सम्पूर्ण प्रकृति पर छाई माँ शारदे के वीणा की मधुर तान सबको सम्मोहित करती है.


पौराणिकता आधार पर ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी के निर्माण के बाद, जीवों की उत्पत्ति के बाद भी एक तरह का सूनापन देवताओं को दिखाई दिया. ब्रह्मा जी के लिए ये चिंता का विषय था कि इतनी गहन और श्रेष्ठ सर्जना के बाद भी पृथ्वी पर अजीब सी शांति छाई हुई है. उन्होंने विष्णु जी की अनुमति से पृथ्वी पर एक दिव्य शक्ति का प्रादुर्भाव किया. इस शक्ति के उत्पन्न होते ही चारों तरफ ज्ञान, उत्सव, संगीत, राग-रागिनियों, पावनता, दिव्यता का वातावरण चित्रित होने लगा. स्वर-लहरियाँ दसों दिशाओं में गूँजने लगीं. पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि उस दिव्य शक्ति छह भुजाओं के साथ अवतरित हुई. यह दिव्य शक्ति एक हाथ में पुस्तक, दूसरे में कमल, तीसरे और चौथे हाथ में कमंडल तथा पाँचवें और छठवें में वीणा हस्तगत किये थी. इसके दिव्य रूप से ऋषियों को वेदमंत्रों का ज्ञान हुआ. सभी जीवों को उस दिव्य शक्ति की वीणालहरी से स्वर प्राप्त हुआ. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा. वर्तमान में माँ सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण माँ सरस्वती को संगीत की देवी भी स्वीकारा जाता है. वसन्त पंचमी को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु 
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है. पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी आराधना की जाएगी. देश के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होती है जो आज तक सतत प्रवहमान है.

माँ सरस्वती को भारतीय मान्यतानुसार ज्ञान की, विद्या की देवी स्वीकार भी किया गया है. इस पर्व की पावनता की वैज्ञानिकता के सम्बन्ध में इसलिए भी सहज विश्वास किया जा सकता है क्योंकि जिस प्राकृतिक वातावरण में वसंत का आगमन होता है उस समय चारों तरफ हरियाली के साथ-साथ खेत पीले रंग की चादर ओढ़े हुए सुहाने मौसम का स्वागत कर रहे होते हैं. खेतों में फैली फसलों की हरियाली और वासंती रंग किसानों के मेहनत का सुखद पुरस्कार दर्शा रही होती है. मस्ती में आनंद से सराबोर होते किसान झूमते हुए इसी वासंती रंग से अपार ऊर्जा का संचरण अपने भीतर महसूस कर रहे होते हैं. पूस की कड़कती ठण्ड के बाद सुहाने, गुलाबी मौसम में चारों तरह आनंद और मनमोहकता का बिखराव दिखाई देता है. उत्सवधर्मी भारतीय ऐसे किसी भी अवसर को आनंद में परिवर्तित कर लेते हैं जहाँ सर्वत्र खुशियों की आहट सुनाई देने लगे. यही कारण है कि वसंत पंचमी को किसी भी तरह के मांगलिक कार्यों का शुभारम्भ किया जा सकता है. वैदिक परम्पराओं का पालन करने वाले, मुहूर्त, शुभ घड़ी आदि देखकर कार्य करने वाले लोग भी इस दिन स्वेच्छा से निर्बाध रूप से अपने मांगलिक कार्यों का आरम्भ करते हैं.


वसंत पंचमी की पौराणिकता के साथ-साथ इसके साथ ऐतिहासिकता भी सम्बद्ध है. ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर वसंत पंचमी का दिन पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है. उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को सोलह बार युद्ध में पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया. इसके बाद  सत्रहवीं बार हुए युद्ध में पृथ्वीराज चौहान जब पराजित हो गए तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा. वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं. इसके बाद गौरी ने उनको मृत्युदंड देने से पहले उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा. पृथ्वीराज चौहान के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया. चंदबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान को संकेत करते हुए मोहम्मद गौरी के बैठे होने के स्थान का आभास करवाया. 
“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥” 
पृथ्वीराज चौहान ने कोई भूल नहीं की. उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से जो बाण छोड़ा वह गौरी के सीने में जा धंसा. इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया.  सन 1192 ई को घटित यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी.


वसंत पंचमी की पौराणिकता, ऐतिहासिकता और उसकी दिव्याभा के साथ-साथ उसमें साहित्यिकता का भी समन्वय है. सम्पूर्ण भारतवर्ष की समस्त ऋतुओं में से वसंत ऋतु एकमात्र ऐसी ऋतु है जिसे सभी आयुवर्ग के लोगों द्वारा पसंद किया जाता है. विद्या की देवी माँ सरस्वती के अवतरण दिवस के कारण इसका सम्बन्ध शिक्षा, ज्ञान से होने के कारण शिक्षक, शिक्षार्थी के साथ-साथ साहित्यकार, लेखक भी सहज रूप में इससे अपने को सम्बद्ध मानते हैं. शिक्षक, शिक्षार्थी शैक्षणिक संस्थानों में, गुरुकुलों में, विद्यालयों में माँ सरस्वती का पूजन करते हैं. इसी तरह कवियों, साहित्यकारों, लेखकों ने इस पर्व को युवामन के चिर-अभिलाषी पर्व के रूप में वर्णित किया है. उनके द्वारा वसंत का उद्घाटन कहीं नायिका के रूप में चित्रित किया गया है तो कहीं उसे प्रेयसी के रूप में दर्शाया गया है. ऐसा विरल समुच्चय अन्यत्र देखने को मिलता नहीं है जबकि किसी एक पर्व के साथ पावनता, पौराणिकता, परम्परा, ऐतिहासिकता, साहित्यिकता, शिक्षा, ज्ञान, ऊर्जा, जोश आदि का समन्वय हो. देखा जाये तो वसंत पंचमी सृजन का प्रतीक है. उमंग, उल्लास, जोश का प्रतीक है. नवचेतना का गान है तो नवोन्मेषी प्राकट्य का आधार है. वसंत की इस पावन वासंती ऊर्जा में प्रयास यही हो कि सभी अपने में नवचेतना का स्फूर्त प्रकीर्णन महसूस करें. नवचेतना का संचार भरें और उस नवीन स्फूर्ति से देशहित में, समाजहित में खुद को प्रेरित करें.

21 जनवरी 2018

वो बचपन का मेला आज भी याद आता है

कल बसंत पंचमी का पर्व है. आज शाम बिटिया रानी के लिए कल के लिए फल-फूल लाने के लिए बाजार की तरफ जाना हुआ. रोज की तरह उसी मंदिर के सामने से गुजरना हुआ जहाँ हम अपने बचपन में बसंत पंचमी के मेले में आया करते थे. यूँ तो उस मंदिर के सामने से जितनी बार गुजरना होता है, बचपन की बसंत पंचमी याद आ ही जाती है. उस समय मेले में किया जाता हुड़दंग भी याद आ जाता है. दोस्तों, भाइयों के साथ की गई शैतानियाँ भी याद आ जाती हैं. आज जबकि बाजार जाने का मंतव्य बसंत पंचमी से जुड़ा हुआ था, उस मंदिर के सामने से निकलना विशेष रूप से उसी समय में ले गया. अपने बचपन की अनेक घटनायें याद आ गयीं. घर के पास बना हुआ नरसिंह भगवान का मंदिर तब भी था, आज भी है. मंदिर आज तो बहुत ही अच्छी दशा में है जो हमारे बचपन में बहुत ही जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हुआ करता था. उस मंदिर के हाते में ही एक छोटा सा मेला लगा करता था. उस समय मेले की तैयारियाँ कई-कई दिनों पहले से शुरू हो जाया करती थीं. कई-कई झूले, कई-कई दिन पहले से आकर लग जाया करते थे. आज शाम देखा तो मेले जैसी कोई तैयारी वहाँ दिखाई नहीं दी.



उस समय मेले में कई छाटे-बड़े झूले, बहुत सी छोटी-छोटी दुकानें आया करतीं थी. दुकानें आज भी लगतीं हैं, पिछले साल तक भी दुकानें लगीं मगर इनकी संख्या में लगातार कमी होती जा रही है. दुकानें कमोबेश वैसी ही हैं, जैसी कि उस समय हुआ करती थीं. उस समय भी महिलाओं के साज-श्रृंगार से सम्बन्धित सामग्री की दुकानें अधिक हुआ करतीं थीं, आज भी हैं. बच्चों के खेल-खिलौने से सम्बंधित दुकानें तब भी हुआ करती थीं, आज भी हैं. आज यदि कुछ फर्क आया है तो खरीददारी और बिकवाली का. बहरहाल ये तो आधुनिकता का तकाजा है. आज मेले के लिए सिर्फ एक झूले वाले को तैयारी करते देखा तो लगा कि अब मेले को लेकर किसी तरह का उत्साह नहीं बचा है. हाँ, कल अवश्य ही कुछ दुकानदार अपने व्यवसाय की परम्परा का पालन करने आयेंगे ही, तो कुछ इसी बहाने भगवान की सेवा करने का बहाना निकाल लेंगे. हमें बहुत अच्छी तरह याद है कि उस समय मेले का रूप छोटा सा हुआ करता था किन्तु उसमें रौनक बहुत रहती थी. बच्चों के अतिरिक्त बड़ों में भी उत्साह देखते बनता था. मंदिर के दर्शन बड़ों के लिए आवश्यक होता था तो हम बच्चों के लिए भगवान के दर्शन प्रसाद पाने का बहाना हुआ करता था. मंदिर के पुजारी के हाथों मिलती मिठाई, फल आदि में एक अजब सा स्वाद होता था जो किसी भी भगवान में आस्था न रखे बिना भी बहुत मजेदार हुआ करता था.


इधर बहुत सालों से उस मंदिर में जाना नहीं हुआ. मंदिर लगातार आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ता जा रहा है. पिछले वर्षों में कुछ दुकानदारों से बात करने पर पता चला कि अब मंदिर परिसर पर कुछ अवांछित तत्वों का कब्जा हो गया है जो दुकान का किराया बसूलने लगे हैं. इधर लोगों का ध्यान भी पारम्परिक पर्वा-त्योहारों से अलग हट कर कुछ विशेष करने की तरफ जा रहा है. बसंत पंचमी का महत्व कम से कम तब तक तो लोगों के लिए नहीं है जब तक कि उसे किसी विदेशी द्वारा प्रचारित प्रसारित न किया जाये. किसी कार्ड बनाने वाली कम्पनी से इस उपलक्ष्य में ग्रीटिंग कार्ड न बेचना शुरू किये जाये. जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक हमारे बचपन के प्यारे से मेले में रौनक नहीं होगी, उस छोटे से मंदिर के प्रसाद में अपनत्व की महक नहीं होगी. क्या कभी ऐसा होगा कि हम फिर से बसंत पंचमी को लगने वाले इस मेले में बचपन की तरह झूले में झूल सकेगे? मंदिर के पुजारी से बिना किसी आस्था के सिर्फ प्रसाद लेने के लिए मंदिर जाया करेंगे?

16 फ़रवरी 2013

हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाने का बहाना चाहिए



          गुरुवार की रात से बारिश होने लगी, सरदी-गरमी की धूप-छांव के कारण मौसम कभी गर्म तो कभी सर्द हो जाता। बारिश के साथ चलती ठंडी हवाओं का चलना तथा शुक्रवार को वसंत पंचमी के अवकाश ने मौसम को और सुहाना बनाया। अपने मित्र सुभाष के साथ बाइक पर बैठकर निकल लिए सैर पर। शहर के पास से निकलता हाइवे और उसके आसपास खेतों में लहलहाती सरसों से मन प्रसन्न हो उठा। चूंकि पिछली रात इतनी बारिश नहीं हुई थी कि जिससे फसल को नुकसान पहुंचता किन्तु आशंका इस बात की थी कि यदि और बारिश हो गई तो अवश्य ही फसलों के लिए नुकसानदेह साबित होगी। इसके पीछे कारण ये भी था कि कुछ दिनों पहले की घनघोर बारिश और ओलावृष्टि ने फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाया था।
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          हम दोनों मित्रों ने इस पर व्यापक चर्चा की, जहां तक की सैर करना तय था वहां तक पहुंचकर किसानों पर, बारिश पर, मौसम पर, सामाजिक परिदृश्य पर चर्चा करके वापस घर आने को निकल पड़े। मौसम के सुहानेपन का दिलो-दिमाग पर असर हो रहा था, बारिश भी हल्की-हल्की शुरू हो गई थी। गरमागरम चाय के साथ गरमागरम पकौड़ी की तलब को हमारे एक और मित्र अनुज ने पूरा किया, जिनके घर हम दोनों ने वापसी में डेरा जमाया। वहां भी कई विषयों पर चर्चा की और भविष्य की अपनी कुछ योजनाओं को अमल में लाने सम्बन्धी रूपरेखा तय की।
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          अपनी विविध विषयों पर चर्चा करने के दौरान बार-बार कृषि फसलों पर बारिश के प्रभाव, फसलों के नुकसान होने पर किसानों को होने वाले नुकसान पर अपनी संवेदना प्रकट की। अपनी-अपनी संवेदनाएं आपस में ही प्रकट करने के बाद, चाय-पकौड़ी-चटनी का, बाइक का, सुहाने मौसम में पीली-पीली सरसों, हरे-भरे खेतों का आनन्द उठाने के बाद घर लौट आये। इस पूरे प्रकरण के साथ कहीं न कहीं मन में एक टीस सी उठती रही। किसी के प्रति मात्र संवेदना व्यक्त करने के अलावा कुछ और न कर पाने की विवशता ने कहीं अंदर तक विचलित किया। मात्र बातों के बताशे फोड़ने के अतिरिक्त हम कुछ और भी न कर सके, न तो बारिश से तबाह होती फसलों को बचा सके और न ही इस नुकसान से प्रभावित होते किसानों की मदद कर सके।
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          ऐसी स्थिति कोई इस बार ही सामने नहीं आई, कभी अतिवृष्टि, कभी ओलावृष्टि, कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी कोई और आपदा आये दिन किसानों को, फसलों को, गरीबों को, असहायों को बुरी तरह से प्रभावित करके तोड़ देती है; दाने-दाने को, रोटी को मोहताज कर देती है। चन्द सामाजिक संस्थाओं की मदद से, चन्द जागरूक नागरिकों की मदद से उन्हें क्षणिक सहायता तो मिल जाती है पर किसी तरह का स्थायी समाधान किसी भी समस्या से नहीं मिलता है। प्रशासनिक अधिकारियों-राजनीतिज्ञों का रवैया अपने आपमें अनूठा ही रहता है। ये दोनों वर्ग अपने-अपने नियमों-कानूनों का हवाला देकर मदद के रास्तों पर चलने का प्रयास सा करते दिखते हैं। ऐसे में कुछ करने की चाह के बाद भी कुछ न कर पाने की विवशता मन को खिन्न कर देती है। क्या किया जाये...मन की खिन्नता तो दूर हुई नहीं वरन् पिछले दो दिनों से हो रही बारिश ने और भी बढ़ा दिया।  
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जिनको किसानों के, असहायों के, परेशान लोगों के, दुखियों के दुखों को दूर करने का, समस्या का समाधान करने का, कष्ट को भगाने का जिम्मा दिया गया है; जो जनप्रतिनिधि बनकर जनता की आवाज उठाने का, जनता के कष्टों में उसके साथ खड़े होने का, उनकी समस्याओं को निपटाने का, शासन-प्रशासन को सचेत करने का बीड़ा उठाने का दम भरते हैं जब वे ही मात्र संवेदना व्यक्त करके चाय-पकौड़ी के स्वाद की ओर मुखातिब हो जाते हैं तो फिर हम मित्र तो विवश हैं। इस विवशता के बीच, अपनी सीमाओं के बीच यदि संवेदना प्रकट कर लेते हैं, एक-दो लोगों के कष्टों में उसके साथ खड़े हो जाते हैं तो कुछ किलोमीटर की बाइकिंग, मौसम के साथ हवाखोरी, गरमागरम चाय-पकौड़ी का आनन्द तो लेकर अपनी विवशत को दूर कर ही सकते हैं। अब क्या किया जाये...संवेदनाओं को आपस में बैठकर आज भी व्यक्त किया और फिर चाय-समोसे का स्वाद लेने में जुट गये। आज बारिश कम हुई होती या फिर न हुई होती तो निश्चय ही आज भी बाइक पर हवाखोरी का आनन्द लिया होता। क्या करें, कुछ इसी तरह से ही कष्टों को, परेशानियों को, समस्याओं को, फ़िक्र को धुंए में उड़ाने का बहाना ढूंड़ते हैं।
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चित्र गूगल छवियों से साभार

30 जनवरी 2009

बसंत पंचमी का मेला:बचपन की यादें

कल बसंत पंचमी का पर्व है और आज यही सोचते हुए बाजार की तरफ जाना हुआ तो अपने बचपन की अनेक घटनायें याद आ गयीं। घर के पास ही एक मंदिर है, मंदिर आज तो बहुत ही अप्छी दशा में है किन्तु उस समय जबकि हम छोटे-छोटे थे मंदिर बहुत ही जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हुआ करता था। उस मंदिर के हाते में ही एक छोटा सा मेला लगा करता था, मेला तो आज भी लगता है और आज उसी मेले की तैयारी होते देख अपना बचपन याद आ गया।
उस समय मेले में कई छाटे-बड़े झूले, बहुत सी छोटी-छोटी दुकानें आया करतीं थी। दुकानें आज भी लगतीं हैं किन्तु अब इनकी संख्या में लगातार कमी होती जा रही है। हालांकि दुकानों के स्तर में बहुत सुधार नहीं हुआ है। उस समय भी महिलाओं के साज-श्रृंगार से सम्बन्धित सामग्री की दुकानें अधिक हुआ करतीं थीं, आज भी हैं। बस फर्क आया है तो खरीददारी और बिकवाली का।
बहरहाल ये तो आधुनिकता का तकाजा है। आज मेले के लिए आये कुछ दुकानदारों और झूले वालों को तैयारी करते देख लगा कि उनमें भी कल के मेले को लेकर किसी तरह का उत्साह नहीं बचा है। कुछ दुकानदार अपने व्यवसाय की परम्परा का पालन कर रहे हैं तो कुछ इसी बहाने भगवान की सेवा करने का बहाना निकाल रहे हैं। हमें बहुत अच्छी तरह याद है कि उस समय मेले का रूप छोटा सा हुआ करता था किन्तु उसमें रौनक बहुत रहती थी। बच्चों के अतिरिक्त बड़ों में भी उत्साह देखते बनता था। मंदिर के दर्शन बड़ों के लिए आवश्यक होता था तो हम बच्चों के लिए भगवान के दर्शन प्रसाद पाने का बहाना हुआ करता था। मंदिर के पुजारी के हाथों मिलती मिठाई, फल आदि में एक अजब सा स्वाद होता था जो किसी भी भगवान में आस्था न रखे बिना भी बहुत मजेदार हुआ करता था।
इधर अब बहुत सालों से उस मंदिर में जाना नहीं हुआ। मंदिरों का भी लगातार आधुनिकीकरण होता जा रहा है और वे भी व्यावसायिकता को किसी न किसी रूप में स्वीकारते दिख रहे हैं। कुछ दुकानदारों से बात करने पर पता चला कि अब मंदिर परिसर पर कुछ अवांछित तत्वों का कब्जा हो गया है जो दुकान का किराया बसूलने लगे हैं। इधर लोगों का ध्यान भी पारम्परिक पर्वा-त्योहारों से अलग हट कर कुछ विशेष करने की तरफ जा रहा है। बसंत पंचमी का महत्व कम से कम तब तक तो लोगों के लिए नहीं है जब तक कि उसे किसी विदेशी द्वारा प्रचारित प्रसारित न किया जाये। किसी कार्ड बनाने वाली कम्पनी से इस उपलक्ष्य में ग्रीटिंग कार्ड न बेचना शुरू किये जायें। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक हमारे बचपन के प्यारे से मेले में रौनक नहीं होगी, उस छोटे से मंदिर के प्रसाद में अपनत्व की महक नहीं होगी।
क्या कभी ऐसा होगा कि हम फिर से बसंत पंचमी को लगने वाले इस मेले में बचपन की तरह झूले में झूल सकेगे? मंदिर के पुजारी से बिना किसी आस्था के सिर्फ प्रसाद लेने के लिए मंदिर जाया करेंगे?