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09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


11 जून 2020

पति-पत्नी और अहंकार

विगत कुछ समय से अनेक उदाहरण ऐसे सामने आ रहे हैं जिनमें मुख्य तत्त्व है अहंकार. इन तमाम मामलों को देखने-समझने के बाद समझ नहीं आ रहा कि व्यक्ति का जीवन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उसका अहंकार? सामने आने वाले इन मामलों में अहंकार है भाई से भाई का, दोस्त से दोस्त का, परिवार से, पड़ोस से, सहयोगियों से. इन्हीं में एक तरह का अहंकार देखने को मिल रहा है पति-पत्नी के बीच. क्या ये ऐसा रिश्ता है जहाँ अहंकार का स्थान है? क्या इस रिश्ते के बीच अहंकार आना चाहिए?


आज पोस्ट नहीं, बस सवाल. क्या पति-पत्नी के बीच अहंकार आना चाहिए? वर्तमान परिदृश्य में क्या आपके सामने ऐसे मामले आये हैं जिनमें पति-पत्नी के बीच अहंकार ने जगह ले ली है? क्या इस अहंकार को मिटाया जा सकता है? इसको दूर करने के उपाय क्या होने चाहिए?


लिखिए अपने विचार और भेज दीजिए हमें.




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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 मार्च 2018

हमारी नजर में ये सिर्फ महिलायें नहीं


कल और आज महिला दिवस को लेकर कई कार्यक्रमों में सहभागिता रही. बिना किसी अपनी सहभागिता के बस उपस्थिति ही बनाये रखी. इसके पीछे कारण उन कार्यक्रमों का बजाय सामाजिक होने के प्रशासनिक हो जाना रहा. प्रशासनिक कार्यक्रमों का एक तरीके का आयोजन रहता है. उनका जो मुखिया हो उसकी चापलूसी करते रहो, उसके बारे में गुणगान करते रहो. इसके बदले में मिलता ये है कि जो आयोजन करता है उसके साथ के कुछ लोगों को सम्मानित कर दिया जाता है. कुछ विशेष लोगों संग सेल्फी निकलवा ली जाती है. उन्हीं लोगों के बारे में कह-सुन लिया जाता है. उन्हीं लोगों को मंच पर बोलने बुला लिया जाता है. बहरहाल, प्रशासन के अलावा भी अन्य कई जगहों पर अपनी सक्रिय सहभागिता की. आत्मिक रूप से इसलिए प्रसन्नता हुई क्योंकि ऐसे लोग संसाधनों से विहीन हैं मगर कुछ करने की इच्छा रखते हैं. हमारे साथ भी कुछ ऐसा था. वर्ष 1997-98 में जब हमने कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम जिले में शुरू किया था तो जिला प्रशासन के पास भी इससे सम्बंधित कोई सामग्री नहीं थी. चिकित्साधिकारी भी इससे शून्य थे. ऐसे में हमने अपने कुछ मित्रों संग अँधेरे में तीर मारना शुरू किया. इधर-उधर से सामग्री जुटाई और लोगों को बेटियों के बारे माँ जागरूक करना शुरू किया. तब हमारे पास भी संसाधन नहीं थे. हमने भी उसी समय परास्नातक परीक्षा पास की थी. बेरोजगार होने का बिल्ला माथे पर चिपकाये समाजसेवा में निकल पड़े थे. बेटियों को बचाने निकल पड़े थे. इसीलिए आज भी जब कोई ऐसा व्यक्ति जो संसाधन-रहित होता है बेटियों के बारे में कोई भी कार्यक्रम करता है, करना चाहता है, हम उसे पूरा सहयोग करते हैं.


इन जमीनी कार्यक्रमों के अलावा सोशल मीडिया पर भी कार्यक्रम चल रहे हैं. इधर-उधर से कॉपी-पेस्ट की हुई फोटो, विचारों आदि को दे दनादन इधर से उधर भेजा जा रहा है. इसी भेजा-भिजाई में सब अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ले रहे हैं. सामाजिक कार्यों से जिनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, वे सम्मानित हो रहे हैं. उनकी पोस्ट पर हजारों-हजार की संख्या में लाइक, कमेन्ट मिल रहे हैं. जिनका जमीनी काम है वे संसाधनों से रहित होने के कारण कहीं कोने में कार्यक्रम करने में लगे हैं. बहरहाल, इस बीच कई-कई लोगों ने हमसे कहा कि आज भी आपने कुछ नहीं लिखा. (इधर लोगों की मानसिकता बदलने की नीयत से विगत एक माह से अधिक समय से हम सोशल मीडिया या कहें कि फेसबुक से गायब हैं) सही भी है आज हमने कुछ लिखा भी नहीं, महिला दिवस पर. आखिर समझ ही नहीं आया कि क्या लिखना? महिलाओं का झंडा उठाये लोगों को मानना नहीं है कि उनके विकास में पुरुषों का योगदान महिलाओं से ज्यादा है. जिन लोगों ने स्त्री-विमर्श का इतिहास पढ़ रखा होगा उनको भली-भांति पता होगा कि वैश्विक स्तर पर स्त्री-सशक्तिकरण सम्बन्धी घटित चार बड़ी घटनाओं में से तीन का आरम्भ पुरुषों द्वारा किया गया. आज स्थिति ये है कि स्त्री को सफलता मिलती है तो वह उसके अपने निजी प्रयास से और असफलता मिलती है तो पुरुष द्वारा अवरोध पैदा करने के कारण.

आज जिस तरह से विभेद को समाप्त करने के लिए विभेद की नीति अपनाई जा रही है वह समाज में स्त्री और पुरुष के बीच खाई पैदा ही नहीं करेगी वरन और बढ़ाएगी. बहरहाल, आज हमने इसलिए कुछ नहीं लिखा क्योंकि समझ नहीं आया कि किसके लिए लिखें? क्या उन अईया या नानी के लिए बधाई सन्देश लिखें जिन्होंने हमारे इस धरती में आने का आधार रचा? उनके द्वारा जन्मी संतति ही हमारे जन्म का आधार बनी. वे दोनों लोग उस स्थिति तक पूज्य हैं, जो स्थिति भगवान से भी ऊपर है हमारे लिए. भगवान को क्या शुभकामना, क्या बधाई. इसके बाद क्या माँ को बधाई दें? उस माँ को जो हमारी नज़रों में मात्र महिला नहीं बल्कि किसी देवी से कम नहीं. पिता के साथ उसके साहचर्य का परिणाम है कि हम इस दुनिया में हैं. इसलिए उस देवी को मात्र महिला कैसे मान लिया जाये? उस माँ के अलावा यदि किसी ने आत्मीयता से अपने गले लगाया है तो वो है हमारी बहिन. उस बहिन ने हमें सिखाया कि कैसे दुनिया की बाकी महिलाओं का सम्मान किया जा सकता है, उसकी राखी की कैसे रक्षा की जा सकती है. कैसे वह बहिन मित्र भी बन जाती है, माँ भी बन जाती है, हमराज़ भी बन जाती है. उस बहिन को मात्र महिला कैसे समझ लें, जिसने महिलाओं के विविध आयामों को समझाया? इसके बाद जीवन में आई महिला मित्र. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिला मान लें. उन्होंने हमारे प्रति समाज के विश्वास को सशक्त किया कि अकेले में भी हमारे साथ वे सुरक्षित हैं. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिलाओं के खांचे में खड़ा कर दें, जो अपने अस्तित्व से ज्यादा हमारे अस्तित्व को स्वीकारने में सक्रिय हों.


इसके अलावा जिस महिला के साथ अग्नि के सामने सात फेरे लिए, जो इन्सान अपना सबकुछ छोड़कर हमारे साथ न केवल जीवन को आगे बढ़ाने आया हो वरन हमारे परिवार का सदस्य बनकर आया हो. जिस इन्सान ने पत्नी के रूप में न केवल हमारे अस्तित्व को स्वीकार किया बल्कि हमारे अस्तित्व को अपना अस्तित्व बनाया. इसके बाद भी अपने व्यक्तित्व का विकास करने के साथ-साथ हमारे विकास में भी सहायक बनी, उसे मात्र महिला कैसे मान लें? इन सबके अलावा हमारी बेटियों ने भी हमारे गौरव को आगे बढ़ाया है. जिस कार्य के लिए हमने पूरे समाज के बीच अलख जगाने का काम किया वही बेटियों के रूप में हमारे परिवार का अंग बनी हुई हैं. उन बेटियों का प्यार, उनकी शरारतें, उनका दुलार, उनका हँसना, उनकी जिद, उनकी पल-पल की गतिविधियाँ हम सबके लिए जीवन का आधार बनी. ऐसी बेटियों को मात्र महिलाओं में कैसे शामिल कर दें?

आखिर किसे दें हम महिला दिवस की शुभकामनायें? क्योंकि सम्पूर्ण समाज की महिलाएं किसी न किसी रूप में किसी की माँ, किसी की बहिन, किसी की दोस्त, किसी की पत्नी, किसी की बेटी है. ऐसे में सभी सुखी रहें, प्रसन्न रहें, बस इतनी कामना है.