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17 अप्रैल 2021

आम नागरिकों का लापरवाही भरा व्यवहार

पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ी है वह निश्चित ही चिंताजनक है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस बार इसके कारण बहुत से लोगों को मौत ने छीन लिया है. जिस तरह से मीडिया में आ रहा है उससे लग रहा है जैसे चारों तरफ अव्यवस्था ही अव्यवस्था है. कहीं ऑक्सीजन की कमी दिखाई जा रही है, कहीं श्मशान घाटों पर भीड़ बताई जा रही है, कहीं से बेड न होने की समस्या है तो कहीं से दवाओं का न होना दिक्कत बढ़ा रहा है. जिस तरह से आम आदमी और सरकारी स्तर पर लापरवाही देखने को मिली है उसके बाद ऐसे हालात बन जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं.


इधर लोग सरकार को कोसने में लगे हुए हैं. ये वही लोग हैं जो पिछली बार सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाये जाने के बाद से हाहाकार मचाने लगे थे. इन लोगों ने उस समय सरकार के इस कदम का घनघोर विरोध किया था और लॉकडाउन को मजदूरों, कमजोरों आदि के लिए घातक बताया था. सरकार को, प्रधानमन्त्री को तानाशाह तक सिद्ध कर दिया था. आज यही लोग लॉकडाउन की माँग करने में लगे हैं. अब वे सरकार को, प्रधानमंत्री को लॉकडाउन न लगाने के कारण कोसने में लगे हैं. बहरहाल, इसके इतर बहुत सी जगहों पर किसी तरह की चिकित्सकीय सुविधा के अभाव के लिए सरकार को दोषी ठहराने वाले खुद को दोषमुक्त मान रहे हैं. क्या वाकई सिर्फ सरकार ही दोषी है? माना कि प्राथमिक व्यवस्था करना सरकार का काम होता है मगर क्या आम नागरिक की जिम्मेवारी नहीं कि वह सरकार के साथ ऐसे आपातकाल में खड़ा रहे?


चलिए एक पल को मान लिया जाये कि सरकार ने एक साल बाद भी किसी तरह के इंतजाम नहीं किये. उसे मालूम था कि कोरोना गया नहीं है, ऐसे में वैक्सीन की व्यवस्था किसने की? सरकार ने आम आदमी के किसी रिश्तेदार ने? जितनी भी ऑक्सीजन हॉस्पिटल में उपलब्ध है वह किसने करवाई किसी आम आदमी ने या सरकार ने? आम आदमी ने क्या किया, आपदा बढ़ती दिखी तो उसने दवाओं की कालाबाजारी शुरू कर दी. मुश्किल घड़ी सामने आई तो इंजेक्शन दस-दस गुने दामों पर बेचा जाने लगा. ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ने लगी तो उसकी जमाखोरी शुरू हो गई. कम से कम कीमत वाले मास्क तक के अच्छे-खासे दाम वसूले गए.


ये तो मानिए कि व्यापारी वर्ग की हालत थी. और लोगों को तो मालूम था कि कोरोना अभी गया नहीं है मगर उन्होंने क्या किया? अनलॉक होने के बाद से बहुतेरे घर में रहने को तैयार नहीं थे. सब बाहर सडकों पर निकल कर ऐसे जमा होने लगे जैसे अब सभी संकटों से पार पा गए हैं. एक बारगी यह भी मान लिया जाये कि घरों में बंद लोग अकुलाहट में ऐसा कर बैठे तो भी आम नागरिक ने आने वाले समय के लिए किसी तरह के चिकित्सकीय इंतजाम किये? ये सभी तरफ से बताया जा रहा था कि कोरोना अभी गया नहीं है ऐसे में क्या आम नागरिकों ने एक या दो लोगों के लिए आपातकाल के लिए अपने घर में दवाओं को रखा था? क्या किसी परिवार ने अपने बुजुर्गजनों का मेडिकल चेकअप करवाया ताकि उनको किसी खतरे की आशंका से बचाया जा सके? क्या किसी ने अपने बच्चों को सुरक्षित रहने के टिप्स दिए? नहीं न. जिसने दिए उनकी संख्या लगभग न के बराबर है.


एक ऐसे समय में जबकि सभी नागरिकों ने पिछले साल कोरोना की दहशत को देखा और झेला भी है इसके बाद भी वह सजग नहीं हो सका है. इसी लापरवाही का परिणाम है कि व्यवस्था अचानक से बोझ पड़ने पर चरमरा उठी है. हमें एक जिम्मेवार नागरिक की हैसियत से सरकार का साथ देना चाहिए न कि अपनी लापरवाहियों से उसके लिए परेशानी उत्पन्न करें.


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वंदेमातरम्

17 अगस्त 2020

संदेहास्पद स्थितियाँ हैं कोरोना को लेकर

कोरोना से लड़ाई लगातार चलती जा रही है और एक तरह का अनिश्चय भी बना हुआ है. लॉकडाउन भी हुआ फिर अनलॉक भी शुरू हो गया. कोरोना से संक्रमित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है साथ ही इससे स्वस्थ होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. बिना इलाज ठीक होना भी एक आश्चर्य माना जा रहा है किन्तु साथ ही दावा किया जा रहा कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है तो उसे या तो कोरोना संक्रमण होगा नहीं और यदि हुआ तो वह जल्द स्वस्थ हो जायेगा. इसी के दूसरी तरफ सभी लोगों को सावधान रहने पर जोर दिया जा रहा है है. लोगों को मास्क बाँधने के लिए, मुँह-नाक ढँकने के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है. इस बीमारी से लड़ते-लड़ते कई महीने निकल गए मगर अभी भी कोई ठोस धरातल पर नहीं खड़ा हो सका है. अभी भी इसके लक्षणों पर संशय बना हुआ है, इसकी संक्रमण दर पर संशय बना हुआ है, इसके संक्रमण होने अथवा न होने को लेकर भी विमर्श चलता रहता है.


यहाँ एक बात विशेष रूप से गौर करने वाली है कि जबसे देश में कोरोना ने अपने कदम पसारे हैं तबसे चिकित्सा क्षेत्र में कोई दूसरी बीमारी दिखाई ही नहीं दे रही है. अब मरने वालों की जो संख्या आ रही है, मरने वालों की जो खबरें आ रही हैं वे बहुतायत में या कहें शत प्रतिशत कोरोना से होती बताई जा रही हैं. क्या वाकई ऐसा ही है? क्या इस समय देश भर में जितनी मौतें हो रही हैं वे सिर्फ कोरोना से हो रही हैं? क्या अन्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या शून्य हो गई है? कई बार मन में संशय उठता है कि इन सबके पीछे कहीं कोई वैश्विक साजिश तो नहीं? इसके पीछे कहीं कोई बहुत बड़ा खेल तो आम नागरिकों के साथ तो नहीं खेला जा रहा है?


ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह बात सभी चिकित्सक या कहें कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोग बेहतर तरीके से जानते हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण उसी दशा में होना है जबकि किसी भी तरह से संक्रमण मुँह-नाक के सहारे अन्दर चला जाए. किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने से कोरोना संक्रमण नहीं फैलना है. इसके बाद भी लगभग सभी जगहों से किसी दूसरे मरीज को चिकित्सा सेवा सहज उपलब्ध नहीं हो पा रही है. किसी भी तरह की बीमारी का इलाज करवाने के पहले मरीज को कोविड टेस्ट से गुजरना पड़ रहा है. ऐसा तब हो रहा है जबकि डॉक्टर्स पूरी तरह से किट में काम कर रहे हैं.

इसके साथ-साथ कोरोना के नाम पर किसी बड़ी साजिश का, किसी उच्च स्तरीय मिलीभगत, खेल का संदेह इस कारण भी है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी भी जाँच करवाई जा रही है और उसके कोरोना संक्रमित होने पर उसकी मृत्यु की गणना कोरोना से मरने वालों के साथ की जाने लगती है. आखिर ऐसा क्यों? जब उसकी मृत्यु कोरोना संक्रमण निर्धारित होने के पहले हो चुकी है तो फिर उसकी मौत को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? संभव है कि अन्य सुरक्षा कारणों से मरने के बाद भी जाँच के द्वारा कोरोना संक्रमण मृत देह से और जगहों पर फैलने के इरादे से ऐसा किया जा रहा हो मगर ऐसे में भी ऐसी मृत्यु को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ जोड़ना तर्कसंगत नहीं है.

एक और बिंदु ऐसा है जो संदेह जगाता है. आखिर कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बताते समय मात्र उतनी ही संख्या क्यों नहीं बताई जा रही जितने मरीज वर्तमान में एक्टिव हैं? आखिर ठीक पहले मरीज से लेकर अद्यतन संख्या बताने के पीछे क्या कारण है? क्यों इसमें वह संख्या भी शामिल है जो स्वस्थ हो चुके हैं? क्यों इसमें वह संख्या बताई जाती है जिनकी मृत्यु हो चुकी है?

कोरोना मामले में जिस तरह से जल्दबाजी में कदम उठाये गए उनको लेकर शायद इसलिए भी कुछ कहना उचित नहीं क्योंकि इस तरह का संकट अकेले हमारे देश पर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व इसी से जूझ रहा है. सभी के लिए यह बीमारी एकदम नई थी और सुरक्षात्मक कदमों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे में उपायों को लेकर, सुरक्षा सम्बन्धी बिन्दुओं को लेकर लगातार सीखने और गलतियाँ करने वाली स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है मगर इसकी आड़ में शेष बीमारियों के प्रति गैर-जिम्मेवाराना रवैया अपना लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. ये स्थितियां ऐसी हैं जो कहीं न कहीं संदेह को बढ़ाती हैं.

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23 जून 2020

बाबा रामदेव की कोरोनिल का प्रभाव

बाबा रामदेव के द्वारा कोरोना वायरस इलाज हेतु दवा का बाजार में उतारा जाना समूचे बाजार में हलचल मचा गया. इसके साथ-साथ विभिन्न विचारधाराओं की धाराओं में भी भँवरें पड़ने लगीं. ऐसा कोलाहल सा दिखाई देने लगा मानो अभी सुनामी आने वाली हो. बाबा की इस दवाई से ऐसी तबाही मचने वाली है जैसी कि कोई चक्रवात मचाता है. देखा जाये तो यदि बाबा रामदेव की ये दवा कारगर सिद्ध हो गई तो विभिन्न ड्रग माफियाओं के हाथों में खेलता दवाई का व्यापार अवश्य ही इस चक्रवात की चपेट में आ जायेगा. ये फिलहाल भविष्य के गर्भ में है कि इस दवा का अंतिम परिणाम क्या होगा.


इधर इसे दूसरे बिन्दुओं के रूप में देखा जाना चाहिए. जबसे कोरोना वायरस के द्वारा संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तबसे न केवल जनसामान्य द्वारा बल्कि आयुष मंत्रालय द्वारा भी आयुर्वेदिक काढ़ा पिए जाने की वकालत की जा रही है. ऐसा भी बताया जा रहा है कि कोरोना संक्रमित व्यक्तियों को यही काढ़ा दिए जाने से उनमें संक्रमण कम होने के संकेत मिले हैं और वे इसी के सेवन से स्वस्थ हुए हैं. इसके साथ-साथ नींबू पीने, विटामिन सी लेने, गर्म पानी पीने आदि जैसे कदम आयुष मंत्रालय द्वारा ही सुझाये गए हैं. ये कदम किसी भी रूप में दवाई नहीं हैं और न ही इलाज, इसके बाद भी इनके सेवन को लेकर लगातार सुझाव दिए जा रहे हैं. ऐसे में बाबा रामदेव की दवा को सन्देश की नजर से देखना हास्यास्पद ही है.


समझने का विषय है कि अभी तक भी कोरोना संक्रमण का कोई इलाज सामने नहीं आया है, किसी भी तरह की दवाई, वैक्सीन अभी बनाया नहीं जा सका है. इसके बाद भी देश में कुल संख्या के आधे से अधिक व्यक्ति स्वस्थ हो चुके हैं. क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि जब अभी तक कोई इलाज नहीं है तो फिर स्वस्थ कौन लोग हो रहे हैं और कैसे स्वस्थ हो रहे हैं? यहाँ निश्चित ही वही आयुर्वेदिक काढ़ा अपना प्रभावी असर दिखा रहा है जिसके बारे में मंत्रालय लगातार पैरवी करता रहा है. इसी के सन्दर्भ में बाबा रामदेव की दवा को देखने की आवश्यकता है.

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हमारे आयुर्वेद में तमाम तरह की उपयोगी सामग्री हैं जिनके द्वारा अनेक बीमारियों का इलाज सहजता से हो जाता है. कोरोना के सन्दर्भ में यह लगातार कहा जा रहा है कि व्यक्ति को इस संक्रमण से बचने के लिए प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता है. माना कि किसी दवा के सन्दर्भ में अपना नियम-कानून है तो वह कदम अवश्य उठाया जाना चाहिए मगर यदि लगता है कि बाबा रामदेव की दवाई से प्रतिरोधक क्षमता ही मजबूत हो रही है, किसी तरह का इलाज नहीं तो भी इसे काढ़ा के सापेक्ष उपयोग करने के लिए कहा जा सकता है.

फ़िलहाल तो लग रहा है कि बाबा रामदेव की यह दवा ड्रग माफियाओं के चंगुल में फँसकर भटकने की स्थिति में है. सरकार को ऐसे किसी भी प्रयास को स्वयं संज्ञान में लेते हुए प्रोत्साहित करना चाहिए जो इस भ्रम, संशय, डर के माहौल में एक सकारात्मक सन्देश जनसामान्य के बीच प्रेषित करने का प्रयास कर रहा है. इस दवा को इलाज और इम्युनिटी के सन्दर्भ में देखते हुए प्रयोग की अनुमति देनी चाहिए. इस सन्दर्भ में बस इतना याद रखना चाहिए कि काढ़ा का कोई क्लीनिकल ट्रायल नहीं किया गया है, काढ़ा कोई इलाज नहीं है इसके बाद भी इसे पीने की सलाह दी जा रही है.

हाँ, यदि बाबा रामदेव की इस दवा के अपने नुकसान हैं, शारीरिक-मानसिक समस्या पैदा होने का अंदेशा हो तो इस पर निश्चित ही प्रतिबन्ध लगना चाहिए. इसके साथ-साथ ध्यान यह भी रखना होगा कि इस दवा का सिर्फ इस कारण विरोध हो कि इसे बाबा रामदेव ने बनाया है, एलोपैथिक दवाओं के समानान्तर आयुर्वेद ने इस वायरस की दवा को खोज निकाला है तो यह नितांत क्षुद्र मानसिकता का द्योतक है.  

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12 अप्रैल 2020

जान की बाजी के द्वारा अनावश्यक भय का प्रसार

यदि लॉकडाउन 14 अप्रैल से आगे बढ़ा तो कुछ नए काम करने का विचार करना पड़ेगा. यह समय उनके लिए भले ही बहुत अच्छा है जिनको घर से बाहर रहने की, घूमने की आदत नहीं है; ऐसे लोगों के लिए भी उपयुक्त है जो अपने काम के अनावश्यक बोझ के चलते परिवार को समय नहीं दे पाते थे मगर ऐसे लोगों के लिए जो घूमने के शौक़ीन भी हैं और इसके साथ परिवार को भी समय देते हैं, बहुत ही समस्या उत्पन्न करने वाला समय है. व्यक्तिगत यदि हम अपनी बात करें तो लॉकडाउन के शुरू होने के बाद पहले हफ्ते ही पढ़ने, लिखने से मन भर सा गया. यद्यपि लॉकडाउन में जिस तरह की रियायत मिली हुई थी, उसके अनुसार दिन में बारह बजे तक तो किसी आवश्यक काम के बहाने से घर से बाहर निकल ही सकते थे. इसके अलावा मीडिया से संपर्क होने के कारण भी इसके लिए खुद को तत्पर करके घर से बाहर निकल आते. इसी तरह सामाजिक कार्यों में लम्बे समय से जुड़े होने के कारण भी सहजता से इसी कार्य हेतु घर से बाहर आ सकते थे. ऐसी सुलभ, सहज स्थितियों के बाद भी स्वयं विचार करके घर से बाहर न निकलने का मन बनाया था. आखिर महज शौक के लिए बाहर निकलना अथवा बोरियत मिटाने के लिए सड़कों पर टहलना हमें कतई सही नहीं लगा. रही बात मीडिया और सामाजिक कार्यों की तो उसके लिए बहुत से साथी अपनी जान की बाजी लगाकर इस तरफ लगे हुए थे तो सोचा कि काहे अपनी जान की बाजी लगाई जाये.


वैसे ये जान की बाजी लगा कर काम में जुटने का सन्दर्भ समझ नहीं आया. क्या कोरोना कहीं छिपा बैठा है जो मौका पाकर, घात लगाकर हमला कर देगा? क्या कोरोना कोई जीव-जंतु जैसा है जो हमला करके जान ले लेगा और कहीं गायब हो जायेगा? क्या कोरोना वायरस से संक्रमण वाकई इतनी गंभीर बीमारी है जो लगते ही मृत्यु दे देती है? क्या यह वायरस हवा में तैरता, उड़ता देश, प्रदेश की गलियों में लोगों को अपना शिकार बना रहा है? देखा जाये तो ऐसा कुछ भी नहीं है, फिर ये जान की बाजी लगा देना कहाँ से और कैसे उत्पन्न हुआ? क्या हम लोगों को किसी भी बात को गंभीरता से न लेने की आदत बनी हुई है? क्या हम किसी बात को जबरन ही भयावह बना देते हैं? क्या लोगों को डराना, भयाक्रांत करना हम सबके स्वभाव में शामिल है? आखिर ऐसा क्या है, जिसके चलते सामान्य से कदमों को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाने लगता है?


क्या मीडिया ने किसी आइसोलेशन वार्ड में जाकर वहाँ के मरीजों से मिलने की कोशिश की? क्या किसी ने उस लैब में जाकर संक्रमित व्यक्ति का सैम्पल छूने का प्रयास किया है? क्या किसी समाजसेवी ने कोरोना वायरस प्रभावित व्यक्ति को सहायता दी है? क्या कोरोना संक्रमित की सेवा इनके द्वारा की जा रही है? यदि ऐसा है तब तो जान की बाजी लगाना समझ आता है. और यदि ऐसा नहीं है तो फिर वे सभी लोग जान की बाजी लगाये हैं जो सड़कों पर घूम रहे हैं, सब्जी अथवा आवश्यक सामान लेने के लिए बाजार में खड़े हैं. देखा जाये तो इस मामले में चिकित्सा सेवा से जुड़े हुए वे लोग जो इन लोगों की देखभाल में लगे हैं, इनके सैम्पल की टेस्टिंग में लगे हैं, इनकी सेवा-उपचार कर रहे हैं, इनकी तीमारदारी कर रहे हैं, ही वाकई में अपनी जान की बाजी लगाये हुए हैं. ये लोग सबसे ज्यादा ‘डेंजर जोन’ में हैं, बाकी लोग तो इस खतरे के कहीं शतांश हिस्से में खड़े हैं. माना कि सभी अपने-अपने अनुसार दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं मगर महज इसी के चलते खुद को सबसे ऊपर, सबसे विशिष्ट बनाने-बताने की मानसिकता का खतरा ये होता है कि इनके अलावा अन्य नागरिकों में एक तरह के भय का वातावरण बनता रहता है. कम से कम ऐसे समय में जबकि एक-एक व्यक्ति मोबाइल लिए खुद में चैनल बना, मीडिया बना घूम रहा है, वैश्विक मौतों की, भयावहता को पल-पल अपडेट कर रहा हो तब मीडिया को, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को बहुत ही संयमित रहने की आवश्यकता है. उनको ध्यान रखना होगा कि जब हर हाथ समाचार एजेंसी बना हुआ तब कुछ प्रतिष्ठित नामों पर लोग विश्वास करते हैं. ऐसे में जब वे ही अपनी जान की बाजी लगाते दिखेंगे तो अनावश्यक भय का माहौल समाज में बनेगा.

ये सही है कि कोरोना संक्रमण अब महामारी के रूप में दिख रहा है. इसके बाद भी वैश्विक रूप से जानकर लोगों द्वारा बार-बार बताया जा रहा है कि इसके द्वारा होने वाली मृत्यु दर अत्यंत कम है. इसकी भयावहता के कारक अलग हैं. इसकी दवा भले ही न उपलब्ध हो, इसका इलाज अभी दिखाई न दे रहा हो इसके बाद भी लोग स्वस्थ हो रहे हैं. यही बिंदु बताता है कि हम सबको धैर्य रखने की आवश्यकता है. चीनी वायरस कोरोना के संक्रमण से होने वाली मौतों के पीछे के कारणों-कारकों को भी जानना, समझना होगा. इस संक्रमण से होने वाली किसी भी मृत्यु को सिर्फ इसी वायरस से जोड़कर देखना समाज में भय पैदा करना ही है, जो वर्तमान परिस्थितियों में कतई भी उचित प्रतीत नहीं होता है.

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14 मार्च 2020

अहंकारी इंसानी दिमाग एक वायरस के सामने चूर

चंद्रमा, मंगल तक अपनी वैज्ञानिक क्षमता की हनक दिखाने वाले इन्सान की हनक को एक झटके में एक वायरस ने समाप्त करके रख दिया. विश्व समुदाय के सामने सिर उठाकर अकड़ दिखाने वाला अहंकारी इन्सान एक बीमारी के सामने घुटने टेक चुका है. अभी तक के तमाम चिकित्सकीय आविष्कारों में से कोई भी ऐसा समझ नहीं आया जो फौरी तौर पर कोरोना वायरस से बचाव जैसी स्थिति ही पैदा कर सके. 
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05 मार्च 2020

जीवन-शैली का सुधार ही बीमारियों से बचाव है

इस समय कोरोना वायरस का हौआ इस कदर छाया हुआ है कि यदि किसी के बगल में पहुँच कर सामान्य सा खाँस दो या छींक दो तो अगला ऐसे देखेगा जैसे मौत को देख लिया हो. यदि किसी को जरा सा मौसमी जुकाम भी हो गया तो तुरंत मेडिकल के चक्कर में पड़ जायेगा. संभव है कि कोरोना एक भयंकर वाली बीमारी हो. इसके प्रभाव में आने वाले की जान पर बन आये मगर क्या वाकई जीवन के लिए एकमात्र यही घातक बीमारी है? देखने में आ रहा है कि जब से कोरोना के देश में चंद मामले सामने आये हैं, लोग मुँह पर मास्क लगाकर चलने लगे हैं. अभी कुछ दिन पहले सरकार, शासन, प्रशासन अपनी दम लगाकर दो-पहिया वाहन चालकों को हेलमेट के लाभ बता रहा था, उनको प्रेरित कर रहा था, बिना हेलमेट वालों पर जुरमाना भी लगाया जा रहा था मगर क्या मजाल कि सबके कानों में जूँ रेंगी हो. कुछेक लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को हेलमेट टाँगे तो जरूर देखा मगर लगाये हुए न देखा. इधर कोरोना के आने की खबर मात्र से बहुतायत लोगों के मुँह पर मास्क चिपक गए.


बीमारी से बचाव अच्छी बात है. किसी भी समस्या के चक्कर में पड़ने के पहले ही यदि उससे सुरक्षा कर ली जाए तो बेहतर होता है. इन सबके बीच ऐसे कई बिंदु दिमाग में आये जबकि लगा कि अब हम सभी किस कदर नकली या कहें कि कृत्रिम जीवन जीते चले जा रहे हैं. दिन भर किसी न किसी तरह से ऐसे काम में संलग्न रहेंगे जो पर्यावरण के हित में नहीं हैं मगर एक बीमारी के काल्पनिक हमले से बचने के लिए मुँह पर मास्क लगा लेंगे. क्या कभी इस पर विचार किया है कि कोरोना की आहट के पहले कितने लोग मास्क लगाकर घर से बाहर निकलते थे? शायद इक्का-दुक्का लोग ही ऐसा करते होंगे. तब क्या किसी बीमारी का खतरा नहीं था? क्या गाड़ियों से निकलने वाला धुँआ इन्सान के लिए किसी अमृत के समान है? क्या वह मनुष्य के शरीर में नहीं जा रहा? क्या उसका खानपान ऐसा है कि उसके किसी तरह की बीमारी न हो? क्या वह नैसर्गिक रूप से अपने आपको प्रकृति से जोड़कर चल रहा है? क्या उसकी दिनचर्या ऐसी है जो उसके लिए लाभप्रद है?

बहुत से लोग जो आज कोरोना के भय से मास्क लगाये घूम रहे हैं, इनमें से बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो दिन भर तम्बाकू का, गुटके का सेवन करते हैं. घड़ी-घड़ी इनके मुँह से सिगरेट का धुँआ निकलता रहता है. असल में अब बहुतायत लोगों ने अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन कर दिया है. उनकी दिनचर्या भी अलग तरह की हो गई है. खानपान भी बदल गया है. सेहत के नाम पर वे लोग सजग नहीं दिखाई देते हैं. यही कारण है कि आजकल बच्चे भी मोटापे का शिकार हो रहे हैं. नजर कमजोर हो रही है. बौद्धिक विकास भी त्वरित गति से नहीं हो रहा है. जरा सा परिश्रम करते ही साँस फूलने लगती है. कोरोना से बचाव का कारण उनकी जागरूकता नहीं है वरन मौत से उनका भय है. ऐसी किसी भी बीमारी से, जिसका कि इलाज संभव नहीं दिखता, व्यक्ति उसके प्रति जागरूक रहता है अन्यथा की स्थिति में वह लापरवाही करता ही करता है.


आज खेलकूद के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. मैदान में न तो बच्चों की भीड़ दिखाई देती है और न ही बड़े लोगों की. सैर के नाम पर चंद बुजुर्ग लोग दिख जाते हैं. पैदल चलना जैसे आज तौहीन है, व्यक्तित्व पर दाग है. खुले में कुछ देर को बैठना, स्वच्छा हवा में साँस लेना आज के लोग जैसे जानते ही नहीं हैं. चौबीस घंटे वातानुकूलित वातावरण में रहने का आदी हो जाना, जंक फ़ूड की आदत लगा बैठना आदि नुकसान के सिवाय कुछ और नहीं कर रहे हैं. ऐसे में बीमारियों का पनपना आम बात है. ऐसे में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आज एक मास्क किसी को एकमात्र बीमारी से चंद पलों के लिए सुरक्षित रख सकता है क्योंकि वह मास्क भी तो संक्रमित होगा ही, किसी न किसी तरह से. उसे दोबारा उपयोग में लाने का अर्थ खुद को संक्रमित करना ही है. ऐसे में अपनी दिनचर्या को नियमित किया जाये. व्यायाम की तरफ ध्यान दिया जाए. शारीरिक श्रम करने की तरफ बढ़ा जाये. बच्चों को बजाय मोबाइल, कंप्यूटर के मैदान में खेलने को प्रोत्साहित किया जाये. ऐसा करके जहाँ एक तरफ कोई व्यक्ति अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है वहीं दूसरी तरफ खुद को अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित कर सकता है. 
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01 जुलाई 2019

भगवान न सही मगर भगवान जैसा ही है डॉक्टर


आज, 01 जुलाई को डॉक्टर्स डे है, ऐसी जानकारी हुई. डॉक्टर, यह एक ऐसा शब्द है जिससे हमारा सम्बन्ध बचपन से ही रहा है. बचपन से इसलिए क्योंकि हमारे मामा-मामी चिकित्सा क्षेत्र से ही रहे हैं. मामी जनपद जालौन मुख्यालय उरई में स्थित जिला चिकित्सालय में कार्यरत थीं और मामा उरई में अपना क्लिनिक बनाये हुए थे. जिला चिकित्सालय, उरई के सरकारी आवास में उनका निवास हुआ करता था. इस निवास में लगभग रोज ही इस कारण जाना हुआ करता था क्योंकि उसी के बगल में बने राजकीय इंटर कॉलेज में हमारा पढ़ना हुआ करता था. इसके अलावा किसी न किसी कार्यक्रम में, किसी पारिवारिक आयोजन में अथवा पारिवारिक मुलाकातों के क्रम में वहाँ जाना हुआ करता था. इसी आने-जाने के कारण से बचपन से ही अनेक डॉक्टर्स से संपर्क बना रहा.


मामा-मामी के अलावा हॉस्पिटल से हमारा संपर्क होश संभालने से लेकर आज तक बना हुआ है. हमारा पैतृक गाँव और ननिहाल जनपद जालौन में ही है. यहाँ से बहुत से लोगों का चिकित्सकीय परामर्श हेतु उरई आना हुआ करता है. इसके अलावा शहर के भी बहुत से लोगों को मेडिकल सुविधा उपलब्ध करवाए जाने के कारण डॉक्टर्स से मिलना होता रहता है. बहुतायत में लोगों की सहायता के लिए और कभी-कभार खुद के लिए, अपने परिजनों के लिए हॉस्पिटल जाना होता रहता है. यदि कहा जाये कि अभी तक के जीवन का बहुत बड़ा भाग हॉस्पिटल में गुजरा है तो अतिश्योक्ति न होगी. लोगों की सहायता करने के, अपने और परिजनों के इलाज के सम्बन्ध में हॉस्पिटल, डॉक्टर्स से संपर्क बना रहने के अलावा अपने 'बिटोली' प्रोजेक्ट के कारण भी इस क्षेत्र से सम्बन्ध बना हुआ है. बिटोली अभियान के पहले संचालित कन्या भ्रूण हत्या निवारण सम्बन्धी कार्यक्रम में तो हम यहाँ की पीसीपीएनडीटी समिति के सदस्य भी रहे हैं. इससे भी लगातार डॉक्टर्स से संपर्क बना रहा. जिला चिकित्सालय के साथ-साथ निजी प्रैक्टिस करने वाले, अल्ट्रासाउंड वाले डॉक्टर्स से भी संपर्क बना रहा. बहुतों से संपर्क आज भी बना हुआ है. इन सबके अलावा हमारे मित्र, हमारे छोटे-बड़े भाई-बहिन भी चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, जिनके चलते भी डॉक्टर्स लगातार संपर्क में हैं.

लगातार और नियमित संपर्क के चलते कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में अच्छे और बुरे दोनों तरह के डॉक्टर्स से सामना हुआ. आप सबका भी सामना ऐसे लोगों से होता होगा, हुआ भी होगा. बुरे स्वभाव के डॉक्टर्स का विरोध करने के बाद भी आवश्यकता होने पर हम सभी डॉक्टर्स के पास ही जाते हैं. इन्सान के एक उम्र को पार करने के बाद डॉक्टर्स जैसे उसके लिए अनिवार्य हो जाता है. ऐसे में अच्छा-बुरा जानने के बाद भी हम सभी डॉक्टर्स के पास जाने को मजबूर होते हैं. यहाँ एक बाद ध्यान रखने वाली होती है कि डॉक्टर्स भी इन्सान हैं. मानवीय कमियाँ उनमें भी विद्यमान रहती हैं, भले ही उनके धरती पर भगवान का स्थान दिया जाता हो. उनकी तमाम कमियों के बाद भी समाज को स्वस्थ रखने का काम उन्हीं डॉक्टर्स के द्वारा किया जा रहा है. न सही बुरे स्वभाव के डॉक्टर्स के लिए वरन अच्छे स्वभाव के डॉक्टर्स के लिए हम सभी मंगल कामना तो कर ही सकते हैं.

भगवान न करे कि अभी किसी को शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़े मगर यदि ऐसा होता है तो मददगार सिर्फ डॉक्टर्स ही होते हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए उनके प्रति भी वही कोमल भावनाएँ बनाये रखनी चाहिए जो हम अपने किसी निकट परिचित के लिए, आत्मीय परिजन के लिए, घनिष्ट सहयोगी के लिए, अभिन्न मित्र के लिए बनाये रखते हैं.

03 अक्टूबर 2018

भारत में टेस्ट ट्यूब बेबी की यात्रा

आज तकनीकी के साथ चिकित्सा विज्ञान इस कदर बढ़ गई है कि इसकी मदद से हमने हर नामुमकिन सवालों के जवाब ढूंढ लिए जा रहे हैं. ये हमारी तकनीक का ही वरदान है कि कल तक जिसे किस्मत का खेल माना जाता था, आज उसे तकनीक के सहारे हासिल कर लिया जा रहा है. कुछ साल पहले तक माता-पिता बनना या न बनना स्वास्थ्य पर निर्भर हुआ करता था किन्तु आज इसके लिए भी चिकित्सा विज्ञान ने अवसर उपलब्ध करवा दिए हैं. आज ऐसे माता-पिता के लिए टेस्ट ट्यूब बेबी नामक तकनीक है विज्ञान में जिसके माध्यम से बच्चा पैदा किया जाता है. इस तकनीक को IVF यानि कि इन विट्रो फर्टिलाइजेशन या टेस्ट ट्यूब बेबी के नाम से जाना जाता है. इस तकनीक का सहारा उस स्थिति में लिया जा रहा है जबकि दंपत्ति संतान-सुख न ले पा रहे हों. महिला गर्भ धारण न कर पा रही हो. सामान्य तौर पर गर्भधारण प्रक्रिया में पुरुष का स्पर्म महिला के अंडाशय (ओवरी) में मौजूद अंडे से संपर्क करके उसके अन्दर जाकर उसे फर्टिलाइज करता है. अंडे के उत्सर्जन के बाद यह अंडा फर्टिलाइज होकर अंडाशय से निकलकर महिला के गर्भाशय में चला जाता है. यहीं भ्रूण के द्वारा शिशु का रूप उसे प्राप्त होता है.ऐसी किसी भी महिला को सामान्य रूप से गर्भधारण नहीं कर पा रही है, उसके लिए टेस्ट ट्यूब बेबी की तकनीक वरदान के समान है. 


किसी महिला के लिए गर्भधारण न कर पाने के पीछे कई कारण होते हैं. इनमें पुरुषों में इनफर्टिलिटी की समस्या, महिलाओं में अण्डों के निर्माण सम्बन्धी अस्थिरता, फलोपियन ट्यूब, अंडाशय की समस्या, महिलाओं की अधिक उम्र को मुख्य जिम्मेवार माना जाता है. इनफर्टिलिटी की समस्या पुरुषों में पाई जाती है. इसके चलते पुरुष में पर्याप्त मात्रा में स्पर्म्स का न बनना होता है. इसके चलते किसी महिला लिए गर्भ धारण करना मुश्किल हो जाता है. महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं में अण्डों के निर्माण सम्बन्धी चक्र का अनियमित अथवा अस्थिर होना है. इस गड़बड़ी के कारण महिला में आवश्यक अण्डों का निर्माण नहीं होता या फिर अण्डों की निर्माण-प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी आना हो सकता है. गर्भधारण न कर पाने की समस्या महिलाओं के अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब से भी जुडी हो सकती है.

आईवीएफ के द्वारा गर्भधारण कई चरणों में संपन्न होता है. इसमें सबसे पहले उस महिला के मासिक धर्म को को रोका जाता है, जिसे गर्भधारण करना होता है. इसके लिए योग्य चिकित्सक इंजेक्शन के माध्यम से दवाई देकर सम्बंधित महिला के मासिक धर्म को रोकता है. ऐसा इसलिए किया जाना आवश्यक होता है क्योंकि मासिक धर्म चलते रहने पर गर्भधारण नहीं किया जा सकता है. इसके बाद के चरण में महिला के अंडाशय में उस समय, जबकि अण्डों का बनना आरम्भ होता है, उसे फर्टिलिटी दवा दी जाती है. ऐसा होने पर महिला के अंडाशय में सामान्य से अधिक अण्डों का उत्सर्जन होता है.  इसके बाद अंडाशय में उत्सर्जित अण्डों को एक छोटे, सामान्य से ऑपरेशन के द्वारा बाहर निकाला जाता है. बाहर निकाले गए अंडो को पुरुष के स्पर्म के साथ रखा जाता है. कुछ समय बाद स्पर्म अंडे के अंदर जाना शुरू कर देते हैं. ऐसी स्थिति के अलावा कई बार बाहर निकाले गए अंडो में स्पर्म को इंजेक्शन के द्वारा भी अन्दर डाला जाता है. यह प्रक्रिया बीजारोपण (Insemination) कहलाती है. इस प्रक्रिया के द्वारा स्पर्म जब अंडे के अंदर चला जाता है तो उसे फर्टिलाइज करना शुरू कर देता है. अंडे के पूरी तरह से फर्टिलाइज हो जाने के बाद वह भ्रूण के रूप में विकास करना शुरू कर देता है. ऐसा महिला के अंडाशय से निकाले गए सभी अंडो के साथ होता है. इसके बाद का चरण प्रभावी चरण कहा जा सकता है. इसमें सभी भ्रूणों की जाँच की जाती है और उनमें से सबसे बेहतर भ्रूण का चयन किया जाता है. इस चयन के बाद सम्बंधित भ्रूण महिला के गर्भाशय में भेजा जाता है. यह प्रक्रिया एक पतली सी ट्यूब द्वारा पूरी की जाती है. इसके बाद महिला के गर्भ में उस भ्रूण का विकास होने लगता है. एक निश्चित अवधि के पश्चात् शिशु का जन्म होता है, जिसे इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के चलते टेस्ट ट्यूब बेबी नाम दिया जाता है.

दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन 

दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन अपने बच्चों के साथ 

लुईस ब्राउन नामक बच्ची विश्व की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी बनी, जिसका जन्म 25 जुलाई 1978 को हुआ था. इसके कुछ दिन बाद ही देश की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ. देश की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा उर्फ़ कनुप्रिया अग्रवाल का जन्म 03 अक्टूबर 1978 को हुआ था. यह सफलता कोलकाता के डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय के प्रयासों से प्राप्त हुई. उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ भारत में IVF प्रणाली से पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म कराया. यह बच्ची दुर्गा पूजा के दिन पैदा हुई थी इसलिए उसे सब दुर्गा कहने लगे, बाद में उसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल रखा गया. आज कनुप्रिया विवाहित हैं और फिलहाल वे एक कंप्यूटर कंसल्टेंसी कंपनी में बतौर मैनेजर कार्यरत हैं.


देश की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी - कनुप्रिया 

इसे तत्कालीन समाज की विडम्बना ही कहा जायेगा जहाँ एक ओर टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक की खोज करने वाले राबर्ट एडवर्ड्‍स को दुनिया ने नोबेल पुरस्कार देकर सम्मान और इज्ज़त दी वहीं भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का सफल प्रयोग करने वाले डॉक्टर सुभाष को सरकार और समाज के विरोध के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा. उनको सरकार के विरोध के साथ-साथ समाज के नैतिक विवाद का भी सामना करना पड़ा. कोई स्वीकारने को तैयार नहीं था कि इस चिकित्सक के परीक्षणों के चलते देश ने चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत बड़ी छलांग लगा ली है. उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मान मिलने की बजाय सामाजिक बहिष्कार, सरकार की नजरअंदाजी और धमकियां मिलीं. उन पर केस भी चलाया गया. इन सबसे तंग आकर उन्होंने 19 जून 1981 को आत्महत्या कर ली.

देश में टेस्ट ट्यूब बेबी के जनक डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय 

उनकी मौत के पांच साल बाद यानि सन 1986 में मुंबई एक टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ, जिसे भारत का पहला आधिकारिक टेस्ट ट्यूब बेबी माना गया. यह प्रसव मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में संपन्न हुआ था. चिकित्सकों की टीम में हॉस्पिटल की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ० कुसुम झावेरी, डॉ० इंदिरा हिंदूजा और आईसीएमआर के डायरेक्टर डॉ० टी०सी० आनंद कुमार शामिल थे. इनकी देखरेख में 6 अगस्त 1986 को जन्मी इस बच्ची का नाम हर्षा चावड़ा रखा गया. इस टेस्ट ट्यूब बेबी हर्षा ने 29 साल की उम्र में जसलोक अस्पताल की डॉ० इंदिरा हिंदूजा और डॉ० कुसुम झावेरी की देखरेख में एक बच्चे को जन्म दिया. ये दोनों वही चिकित्सक हैं जिन्होंने सन 1986 में हर्षा का जन्म करवाया था.

देश की आधिकारिक पहली टेस्ट ट्यूब बेबी हर्षा अपने नवजात शिशु के साथ 


डॉ० सुभाष की डायरी और शोध कार्य से संबंधित कागजात डॉ० आनंद कुमार के हाथ लगे और हर्षा का जन्म हुआ. उन्होंने माना कि जो श्रेय उन्हें मिल रहा है उसके असली हकदार तो डॉ० सुभाष मुखोपाध्याय हैं. उनके हाथ कुछ दस्तावेज लगे हैं जिससे ये साबित हुआ कि डॉ० सुभाष ने 1978 में आइवीएफ तकनीक से जिस बच्ची दुर्गा का जन्म होने का दावा किया था वह बिल्कुल सही था. लम्बी जद्दोजहद के बाद 2001 आते-आते आखिरकार डॉ० सुभाष के दावे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली. इसको स्वीकार किया गया कि उनका दावा सही था और वे ही भारत में टेस्ट ट्यूट बेबी के जनक थे. दुर्गा ही पहली टेस्ट ट्यूब बेबी थी, हर्षा नहीं. सन 2007 में डॉ० सुभाष की उपलब्धियों को डिक्शनरी ऑफ़ मेडिकल बायोग्राफी में शामिल भी किया गया. इसमें पूरी दुनिया के सौ देशों के 1100 प्रमुख चिकित्सकों के योगदान को शामिल किया जाता है.



14 जून 2018

संख्याबल की दौड़ से इतर सिर्फ रक्तदान


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है. संगठन ने विख्यात ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद कार्ल लेण्डस्टाइनर (जन्म 14 जून 1868) की स्मृति में उनके जन्मदिन को रक्तदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया. उन्होंने रक्त में अग्गुल्युटिनिन की उपस्थिति के आधार पर इसे अलग-अलग रक्त समूहों - , बी, में वर्गीकृत किया था,  जिसके लिए उन्हें वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था. वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति शुरू की. इसी वर्ष संगठन ने लक्ष्य रखा था कि देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा दें. इसका उद्देश्य यह था कि ज़रूरत पड़ने पर रक्त के लिए पैसे देने की ज़रूरत न पड़े. अब तक लगभग 49 देशों ने ही इस पर अमल किया है. ये दुर्भाग्य का विषय है कि आज भी कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, रक्तदाता पैसे लेता है. ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते.


हमारे देश में आज भी ऐसी धारणा है कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर हो जाता है. रक्त की भरपाई होने में महीनों लग जाते हैं. यह ग़लतफहमी भी बहुत से लोगों में है कि नियमित रक्त देने से रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं. ऐसे अनेक भ्रमों के चलते लोग रक्तदान का नाम सुनकर ही काँप जाते हैं. विश्व रक्तदान दिवस का उद्देश्य ऐसी भी भ्रांतियों को दूर करके लोगों को रक्तदान को प्रोत्साहित करना है. भारतीय रेडक्रास के राष्ट्रीय मुख्यालय के अनुसार देश में रक्तदान को लेकर भ्रांतियाँ कम हुई हैं पर अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है. संभवतः ऐसा बहुत कम लोगों को मालूम है कि मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है. इससे रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता. रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जिसका वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो, जिसे एचआईवी, हेपेटाटिस जैसी बीमारी न हुई हो वह रक्तदान कर सकता है. एक बार में जो 350 मिलीग्राम रक्त दिया जा सकता है उसकी पूर्ति शरीर चौबीस घण्टे के अन्दर कर लेता है. पूर्ति के बाद रक्त सम्बन्धी गुणवत्ता की 21 दिनों में पूर्ण हो जाती है. चिकित्सा विज्ञान ये भी कहता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम होती हैं. इसके अलावा सबसे ख़ास बात ये है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी होती है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में अपने आप ही ख़त्म हो जाते हैं इस दृष्टि से भी प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है.

जब भी रक्तदान करने की बात आती है तो हमारे द्वारा सबसे पहली बार किया गया रक्तदान याद आ जाता है. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट का डर सता रहा था. सन 1991 का जनवरी माह, घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ऐसे में लगा कि कहीं समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो हॉस्टल के नजदीक बने हॉस्पिटल पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का देख न ले. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. उस दिन नियमित रूप से रक्तदान करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय के चलते पिछली बार डांट भी खा चुके हैं अपनी बड़ी बहिन जी से. ये उनका स्नेह है हमारे प्रति जो हमारी शारीरिक स्थिति, हमारी भागदौड़, हमारे काम को देखते हुए अब रक्तदान करने को प्रोत्साहित नहीं करती हैं. इसके बाद भी उनका और सभी बड़ों का आशीर्वाद हमें इस लायक बनाये रखेगा कि जरूरत पर मदद कर सकें. वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके.


अभी 29 सितम्बर 2016 को अपने महाविद्यालय में संपन्न रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के एक सदस्य ने जानकारी चाही और पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो. हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए. संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद रखने की कोई मंशा नहीं है. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

12 अगस्त 2017

दोषियों पर तत्काल सख्त कार्यवाही हो

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. ये सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. इस घटना का कारण बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों के वार्ड में लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई थी. ऐसा बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का लाखों रूपया बकाया होने के बाद उसके द्वारा सप्लाई रोकने की बात भी कही जा चुकी थी. ऐसी स्थिति के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा उसके बकाया का भुगतान न करना, ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के उपाय न करना आदि दर्शाता है कि वह किस स्तर तक लापरवाह बना हुआ है. इसी मामले में प्रबन्ध तंत्र की तरफ से विशुद्ध लीपापोती होती दिख रही है. उसके द्वारा जानकारी सार्वजनिक की जा रही है कि लिक्विड ऑक्सीजन की किसी भी तरह कमी नहीं थी. कोई भी मौत इसकी कमी से नहीं हुई. ये भी अपने आपमें विशुद्ध गैर-जिम्मेवाराना हरकत है. एक पल को मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में कोई भी मौत लिक्विड ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई पर इससे कैसे इंकार किया जायेगा कि वहाँ तीस बच्चों की मृत्यु हुई है.


इस घटना का संज्ञान बहुत ही संवेदनशीलता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस घटना के एक दिन पहले मेडिकल के दौरे पर थे. वैसे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका अपने गृहनगर गोरखपुर में ये सातवाँ दौरा था किन्तु इस बार का दौरा उन्होंने विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही किया था. खुद इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से घंटों मुलाकात करने के बाद उन्होंने इसके इलाज से सम्बंधित सभी पक्षों, सुविधाओं, दवाइयों आदि की जानकारी लेने के लिए एक लम्बी मीटिंग भी की थी. इसके बावजूद इस तरह की घटना बताती है कि अकर्मण्य और गैर-जिम्मेवार अधिकारीयों, प्रशासन पर अपने मुख्यमंत्री का भी असर नहीं है. प्रथम दृष्टया ये मामला भले ही चिकित्सकीय सेवाओं, सुविधाओं में लापरवाही का दिखाई देता हो मगर यदि जरा सी गंभीरता से विचार किया जाये तो आसानी से समझ आ जायेगा कि इसके पीछे कितनी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है. दरअसल भाजपा द्वारा प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने, उसे पारदर्शी बनाने, अधिकारियों को निर्भय होकर काम करने देने की एक प्रणाली विक्सित करने का प्रयास किया गया. इसी क्रम में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रशासन को, अधिकारियों को स्वतंत्रता से कार्य करने को कहा जा रहा है. भाजपा द्वारा अपने विधायकों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को भी रोका गया है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर किसी तरह का दबाव न बनायें. इस तरह के निर्देशों से प्रशासनिक अधिकारियों में कार्य के प्रति जवाबदेही आणि चाहिए थी वो न आने के बजाय निरंकुशता आ रही है. अभी भी बहुतायत में वे अधिकारी काम कर रहे हैं जो पिछली सरकार के प्रिय बने हुए थे. ऐसे में उनके द्वारा न केवल भाजपा पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की अवहेलना की जा रही है वरन जनता के हितों को भी अनदेखा किया जा रहा है.


देखा जाये तो गोरखपुर की ये ह्रदयविदारक घटना इसी स्वतंत्रता का दुष्परिणाम है. सोचने वाली बात है कि प्रशासनिक अधिकारी इस कदर स्वतंत्र हो गए हैं कि महज एक दिन पहले मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना भी उनको उचित न लगा. यदि ऑक्सीजन की सप्लाई किसी कारण से बाधित होने की आशंका थी तो इसके लिए पहले से समुचित प्रबन्ध क्यों नहीं किये गए थे? वे भी तब जबकि इस बीमारी से भर्ती होने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा था. गोरखपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी देने के बाद भी बकाया चुकता करवाने, लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई सुचारू करवाने की तरह क्यों नहीं ध्यान दिया? बच्चों की मृत्यु के बाद जिस तरह की सजगता वहाँ का प्रशासन दिखाने में लगा है यदि उसका शतांश भी पूर्व में दिखा लिया होता तो संभवतः बच्चों को बचा लिया गया होता. अब भले ही चिकित्सालय प्रबंधन अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह की लीपापोती करे; सरकार अपने बचाव के लिए चाहे कुछ कहती रहे मगर कटुसत्य यही है कि बच्चों को वापस नहीं आना है. इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री योगी जी को विशेष रूप से संज्ञान लेते हुए न केवल चिकित्सकीय लापरवाही के बल्कि अन्य दूसरे पक्षों की भी जाँच करवानी चाहिए. जिस तरह से देश-प्रदेश में भाजपा-विरोधी माहौल उसके विरोधियों द्वारा बनाया जा रहा है; जिस तरह से असहिष्णुता जैसे शब्द के द्वारा लोगों में डर-भय का वातावरण बनाया जा रहा है; जिस तरह से शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेवाराना बयान देने लगता है उससे इस घटना के पीछे किसी तरह की साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए स्वयं योगी जी द्वारा सम्पूर्ण घटनाक्रम का गंभीरतापुर्वक संज्ञान लेते हुए सभी गैर-जिम्मेवार लोगों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए. अन्यथा की स्थिति में न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर धब्बा लगेगा बल्कि विपक्षियों को इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने का अवसर हाथ लगेगा, जो कम से कम इस समय कदापि उचित नहीं होगा.  

मासूम न्याय चाहते हैं - योगी जी के नाम खुला ख़त

माननीय योगी जी,
सादर प्रणाम,
आपके अपने क्षेत्र गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. यह उस समय और भी असामान्य हो जाती है जबकि आपका दौरा ऐसी ह्रदयविदारक घटना के ठीक पहले हुआ हो. ये सभी को भली-भांति विदित है कि उस दिन का आपका दौरा विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही था. लगभग पूरा ही दिन आपने मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस के मरीज बच्चों के बीच गुजारा था. आपने ICU और CCU में काफी देर तक इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से मुलाकात भी की थी. इसके साथ ही आपने इसी सम्बन्ध में एक मीटिंग भी ली थी, जिसमें इस बीमारी से जुड़े चिकित्सकों, विशेषज्ञों आदि से सुरक्षा सम्बन्धी तमाम बिन्दुओं पर संतोषजनक जानकारी ली थी. इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि बच्चों की एक-एक करके मृत्यु होने लगी.

प्रथम दृष्टया इसे ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होना बताया गया वहीं इसके उलट बयान ये भी आया कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई. चलिए एक बारगी मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित नहीं हुई थी पर क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि वहां तीस बच्चों की म्रत्यु नहीं हुई? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही के चलते ये हादसा हुआ? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा, उनके इलाज को लेकर किसी न किसी रूप में असंवेदनशीलता का परिचय दिया गया? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों नहीं प्रशासन में सरकार का भय है? क्यों नहीं समाज के किसी भी क्षेत्र में प्रशासनिक सजगता देखने को मिल रही है? क्यों नहीं अपराधियों में, निष्क्रिय लोगों में, कर्तव्यहीन लोगों में, गैर-जिम्मेवार लोगों में सरकारी तंत्र का, उन पर सख्त कार्यवाही होने का डर दिख रहा है? आखिर क्यों? ये सवाल एक हमारे नहीं, बल्कि उन सबके हैं जिन्होंने बड़ी आशा-विश्वास से प्रदेश की अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना चाहा था. प्रदेश के बहुत बड़े तबके को अभी भी आपके सख्त कदम की अपेक्षा है क्योंकि विगत के तीन-चार माह में उन्हें सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. आज भी सड़क चलते अपराध हो रहे हैं. आज भी हत्याएं, डकैती, हिंसा पूर्व की भांति हो रही हैं. आज भी अराजक तत्त्वों से लोगों में भय बना हुआ है. आज भी प्रशासन पूरी तरह निष्क्रियता दिखा रहा है.

इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रदेश के बहुतायत नागरिकों में आपके प्रति विश्वास, आस्था है कि आप यथाशीघ्र कोई ठोस कदम उठाकर प्रदेश को अराजकता से बाहर निकाल लेंगे. इस विश्वास के बीच गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की ये घटना ठेस पहुँचाने का काम करती है. आपकी ईमानदारी, आपकी सत्यनिष्ठा, आपकी कार्यशैली, आपकी जीवनशैली, आपकी साफगोई की तरफ अब लोग निगाह लगाये बैठे हैं कि मासूमों को इंसाफ मिले. मृत्यु के अन्य कारणों की जाँच होती रहेगी किन्तु प्रथम दृष्टया बच्चों की मृत्यु होना सामने आया है. इससे सम्बंधित सभी जिम्मेवार लोगों को तत्काल सजा देने का काम करके आप निराश लोगों में आशा का संचार कर सकते हैं. इसके बाद आप सम्पुर्ण प्रदेश के प्रशासनिक ढाँचे में सख्ती लाने का कार्य करिए. प्रशासन को स्वतंत्रता से कार्य करने देना चाहिए पर इतना भी स्वतंत्र नहीं कर देना चाहिए कि उसमें सरकार के प्रति ही डर-भय न रह जाये.

यदि किसी मुख्यमंत्री के स्थल विशेष के दौरे और बीमारी विशेष से सम्बंधित मीटिंग लेने के बाद भी हीलाहवाली का ये आलम रहे कि तीस बच्चों की मृत्यु हो जाये तो समझा जा सकता है कि प्रशासनिक मशीनरी किस तरह से लापरवाह, अक्षम, असंवेदनशील है. ऐसे गैर-जिम्मेवार लोगों पर यथाशीघ्र सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. कार्यवाही, सजा इस तरह की हो कि आने वाले समय में इस तरह की लापरवाही करने की, अपने दायित्व से खिलवाड़ करने की गलती कोई न करे.

आपसे आशा है कि आप इस संवेदनशील, ह्रदयविदारक घटना पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होने देंगे तथा सख्त और सकारात्मक कदम उठाते हुए प्रदेश की जनता को सार्थक सन्देश देने का कार्य करेंगे.


आपका ही.. 

02 जनवरी 2009

स्तनों में आये परिवर्तनों को नजरअंदाज न करें महिलाएँ

स्तन मानवीय देह, विशेष रूप से स्त्री देह में एक ऐसे अंग के रूप में विकसित है जो किसी महिला को अन्नपूर्णा रूप में प्रतिस्थापित करते हैं, साथ ही उस महिला के शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि करते हैं. किसी भी व्यक्ति की सौन्दर्य सम्बन्धी अवधारणा में आंतरिक और बाह्य सौन्दर्य के नाम पर अलग-अलग स्थितियों की संकल्पना बनाई गई है. उसके शारीरिक सौष्ठव से ज्यादा महत्त्व उसके आंतरिक गुणों को, उसके व्यवहार को दिया गया है. इसके बाद भी महिलाओं की सौन्दर्य सम्बन्धी संकल्पना में स्तनों का महत्त्व माना-समझा जाता है. ऐसा तब है जबकि शरीर का यह अंग स्त्री और पुरुष दोनों में समान रूप से पाया जाता है. इसके बाद भी दोनों में मूल अंतर यह है कि महिलाओं का यह अंग शिशुओं को भोजन प्रदान कर उन्हें जीवन देता है. 


भले ही किसी व्यक्ति के गुण सम्बन्धी व्यवहार के लिए उसकी बाह्य छवि से ज्यादा आंतरिक छवि को महत्त्व दिया जाता रहा हो मगर महिलाओं में अपनी दैहिक सुन्दरता के प्रति जो सजगता है, वह स्तनों को लेकर बहुत अधिक रहती है. वह स्तनों के विकास, उनके उभार, उनके सौन्दर्य के प्रति हमेशा सजग दिखती है. इतनी सजगता के बाद भी बहुसंखाय्क महिलाओं का अपने ही स्तनों के प्रति, उसके द्वारा होने वाले गंभीर रोग के प्रति कहीं न कहीं लापरवाही भी बरती जाती है. यह एक सामान्य सी प्राकृतिक अवस्था है कि स्त्री और पुरुष दोनों में स्तन पाए जाने के बावजूद सिर्फ महिलाओं को ही स्तनों में परिवर्तन का आजीवन अनुभव होता है. उम्र के साथ आते इन्हीं सामान्य परिवर्तनों के साथ-साथ कई बार अनेक महिलाओं में असामान्य परिवर्तन भी झलकने लगते हैं. अपनी शारीरिक सुन्दरता के मानकों में स्थापित अंग के प्रति स्वयं महिलाओं को इन असामान्य परिवर्तनों की जानकारी करते रहना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके स्तनों में किसी भी तरह का असामान्य परिवर्तन किसी रोग का संकेत हो सकता है. यह रोग स्तन कैंसर या ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है. 


चिकित्सा शोधों से स्पष्ट हुआ है कि औरतों में होने वाले कैंसर रोग में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर स्तन का ही है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि महिलाओं को होने वाले तमाम कैंसरों में एक तिहाई मामले स्तन कैंसर के होते हैं. ऐसा नहीं है कि स्तन कैंसर सिर्फ महिलाओं को ही होता है. यह खतरनाक बीमारी पुरुषों में भी होती है मगर माना जाता है कि चार सौ पुरुषों में किसी एक पुरुष को यह रोग होता है. स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों में इसके होने की आशंका 150 गुना कम होती है. इसके बाद भी पुरुषों को भी अपने स्तनों में आने वाले परिवर्तनों के प्रति उसी तरह से गंभीर रहने की आवश्यकता है जिस तरह कि एक महिला को है. यदि किसी पुरुष के स्तन में (खासकर एक ही तरफ) कोई गांठ हो, जिसमें कोई दर्द न हो रहा हो तो यह कैंसर की गांठ हो सकती है. स्तन कैंसर स्तन की कोशिकाओं में होने वाला एक प्रकार का ट्यूमर है, जो शरीर के बाकी हिस्सों और ऊतकों को भी प्रभावित करता है.  

किसी महिला को होने वाले स्तन कैंसर का बहुत हद तक सम्बन्ध उसमें होने वाले हार्मोनल परिवर्तन से होता है. महिलाओं में ये हार्मोनल परिवर्तन उनमें होने वाली माहवारी से जुड़े होते हैं. दरअसल माहवारी का होना न होना किसी भी महिला के हार्मोंस पर निर्भर करता है. इन हार्मोंस में एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन आदि शामिल हैं. चिकित्सकीय शोधों से ज्ञात हुआ है कि स्तन कैंसर हार्मोन आधारित कैंसर है, ऐसे में किसी महिला की माहवारी का निर्धारण मुख्य भूमिका निभाता है. किसी महिला की माहवारी का बहुत कम उम्र में ही, लगभग ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र में, शुरू हो जाना स्तन कैंसर की आशंका को बढ़ाता है. इसी तरह अधिक उम्र में रजोनिवृति होने से भी स्तन कैंसर का खतरा बढ़ता है. कहने का तात्पर्य यह कि यदि किसी महिला को मीनोपॉज कम उम्र में ही हो जाता है तो उनमें स्तन कैंसर होने का खतरा काफी कम होता है. स्तन कैंसर के सम्बन्ध में पारिवारिक इतिहास हालाँकि किसी कारक के रूप में नहीं रहता है तथापि यह स्तन कैंसर की आशंका को बढ़ाता है. यदि किसी परिवार में माता, बहन या बेटी को कम आयु में कैंसर हुआ हो तो स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. इसके साथ-साथ यदि परिवार के किसी पुरुष, पिता या भाई को स्तन कैंसर हुआ हो तो भी स्तन कैंसर की आशंका बनी रहती है.

हमारी जीवनशैली बहुत हद तक स्तन कैंसर को आमंत्रित करती है. किसी महिला का अत्याधिक मोटापा स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ाता है. इसके अलावा ऐसी महिलाएँ जिन्होंने कभी गर्भधारण न किया हो उन्हें स्तन कैंसर का खतरा अधिक रहता है. 35 वर्ष की आयु के बाद गर्भधारण करने वाली महिलाओं में भी इस कैंसर के होने का खतरा अधिक रहता है. स्तन कैंसर का एक कारण स्तनपान न करवाना भी होता है. इसके अलावा मद्यपान, हार्मोन का सेवन, विकिरणयुक्त वातावरण में कार्य की स्थिति भी स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ाती है.


स्तन कैंसर की सही समय पर रोकथाम, उपचार के लिए महिलाओं को स्वतः ही सजग रहने की आवश्यकता है. इसके लिए महिलाओं को स्वयं ही इसकी जाँच करते रहनी चाहिए. महिलाओं को नियमित समयांतराल पर अपने स्तनों को अच्छी तरह से दबा-दबाकर, उसके चारों तरह हथेलियों के स्पर्श से टटोलते हुए नियमित रूप से देखना चाहिए कि स्तन में कहीं कोई गांठ तो नहीं है. ऐसा वह कम से कम प्रतिमाह करे ही. यदि किसी भी समय उसे कहीं भी, छोटी-सी भी गांठ भी महसूस होती है तो उसे सामान्य सी गाँठ समझने की बजाय तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. 

स्तन में गांठ का होना कैंसर होने की संभावना को दर्शाता है. ऐसी दशा में चिकित्सक से तुरंत संपर्क करना चाहिए. इसके अलावा स्तन या निप्पल में किसी भी तरह का परिवर्तन होने पर, बगल में सूजन या गांठ के  होने पर, स्तन के आकार और बनावट में परिवर्तन होने पर, स्तन में एक तरफ असामान्य सूजन की स्थिति होने पर, स्तनों के आकार में असामान्यता दिखाई देने पर, निप्पल का अंदर की ओर धँसने जैसी अवस्था समझ आने पर, निप्पल और उसके आसपास की त्वचा में लालिमा के आने पर, स्तनों से दूध के अलावा पानी जैसा या खूनयुक्त स्त्राव होने पर भी तत्काल चिकित्सक से संपर्क करते हुए सलाह लेनी चाहिए. यदि महिला शिशु को स्तनपान नहीं करवा रही है और नियमित जाँच के दौरान स्तन के निप्पल से किसी तरह का कोई द्रव निकलता दिखाई दे तो भी उसे चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए.

चिकित्सा विज्ञान में तरक्की के बाद भी स्तन कैंसर की सर्वाधिक प्रामाणिक जाँच बायोप्सी के द्वारा ही हो पाती है. इसके अलावा मैमोग्राफी, एमआरआई या अल्ट्रासाउंड आदि ऐसी जांचें हैं को किसी भी डॉक्टर के लिए यह निर्धारित करने का काम करती हैं कि बायोप्सी करवाई जाये या नहीं. इन जांचों के द्वारा अंतिम तौर पर कभी तय नहीं किया जा सकता कि स्तन में बनी गांठ कैंसर की है या नहीं. बसे ज्यादा जरूरी बात यही है कि स्तन कैंसर की सबसे महत्वपूर्ण जांच बायोप्सी ही है. बिना बायोप्सी के कोई भी डॉक्टर पुख्तातौर पर नहीं बता सकता कि संबंधित गांठ कैंसर की है या नहीं. ऐसे में अगर स्तन कैंसर सम्बन्धी किसी भी तरह की आशंका लगती है तो अपने डॉक्टर की जांच पर सीधे बायोप्सी कराई जा सकती है. इससे स्तन कैंसर के सम्बन्ध में पुख्ता जानकारी मिल सकेगी और यदि ऐसा पाया जाता है तो उसका इलाज भी समय से किया जा सकता है. ध्यान रखना चाहिए कि समय का बढ़ना न केवल इलाज को, ऑपरेशन को बढ़ाता है वरन मरीज की उम्र को भी कम करता है.

इस स्थिति में, इस बीमारी की जकड़ में आने के पूर्व यदि जीवन-शैली को नियंत्रित रखा जाये, संयमित रखा जाये तो बहुत हद तक इस बीमारी को रोका जा सकता है. इसके लिए शरीर के वजन को संतुलित रखा जाये. नियमित व्यायाम करने की आदत विकसित की जाये. खुद को धूम्रपान एवं अत्यधिक मद्यपान से बचाया जाए. ऐसी महिलाएँ जिनको प्रसव हुआ है वे अपने शिशु को अधिक से अधिक स्तनपान करा कर इस बीमारी के खतरे को कम कर सकती हैं.