14 June 2018

संख्याबल की दौड़ से इतर सिर्फ रक्तदान


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है. संगठन ने विख्यात ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद कार्ल लेण्डस्टाइनर (जन्म 14 जून 1868) की स्मृति में उनके जन्मदिन को रक्तदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया. उन्होंने रक्त में अग्गुल्युटिनिन की उपस्थिति के आधार पर इसे अलग-अलग रक्त समूहों - , बी, में वर्गीकृत किया था,  जिसके लिए उन्हें वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था. वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति शुरू की. इसी वर्ष संगठन ने लक्ष्य रखा था कि देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा दें. इसका उद्देश्य यह था कि ज़रूरत पड़ने पर रक्त के लिए पैसे देने की ज़रूरत न पड़े. अब तक लगभग 49 देशों ने ही इस पर अमल किया है. ये दुर्भाग्य का विषय है कि आज भी कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, रक्तदाता पैसे लेता है. ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते.


हमारे देश में आज भी ऐसी धारणा है कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर हो जाता है. रक्त की भरपाई होने में महीनों लग जाते हैं. यह ग़लतफहमी भी बहुत से लोगों में है कि नियमित रक्त देने से रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं. ऐसे अनेक भ्रमों के चलते लोग रक्तदान का नाम सुनकर ही काँप जाते हैं. विश्व रक्तदान दिवस का उद्देश्य ऐसी भी भ्रांतियों को दूर करके लोगों को रक्तदान को प्रोत्साहित करना है. भारतीय रेडक्रास के राष्ट्रीय मुख्यालय के अनुसार देश में रक्तदान को लेकर भ्रांतियाँ कम हुई हैं पर अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है. संभवतः ऐसा बहुत कम लोगों को मालूम है कि मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है. इससे रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता. रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जिसका वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो, जिसे एचआईवी, हेपेटाटिस जैसी बीमारी न हुई हो वह रक्तदान कर सकता है. एक बार में जो 350 मिलीग्राम रक्त दिया जा सकता है उसकी पूर्ति शरीर चौबीस घण्टे के अन्दर कर लेता है. पूर्ति के बाद रक्त सम्बन्धी गुणवत्ता की 21 दिनों में पूर्ण हो जाती है. चिकित्सा विज्ञान ये भी कहता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम होती हैं. इसके अलावा सबसे ख़ास बात ये है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी होती है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में अपने आप ही ख़त्म हो जाते हैं इस दृष्टि से भी प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है.

जब भी रक्तदान करने की बात आती है तो हमारे द्वारा सबसे पहली बार किया गया रक्तदान याद आ जाता है. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट का डर सता रहा था. सन 1991 का जनवरी माह, घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ऐसे में लगा कि कहीं समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो हॉस्टल के नजदीक बने हॉस्पिटल पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का देख न ले. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. उस दिन नियमित रूप से रक्तदान करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय के चलते पिछली बार डांट भी खा चुके हैं अपनी बड़ी बहिन जी से. ये उनका स्नेह है हमारे प्रति जो हमारी शारीरिक स्थिति, हमारी भागदौड़, हमारे काम को देखते हुए अब रक्तदान करने को प्रोत्साहित नहीं करती हैं. इसके बाद भी उनका और सभी बड़ों का आशीर्वाद हमें इस लायक बनाये रखेगा कि जरूरत पर मदद कर सकें. वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके.


अभी 29 सितम्बर 2016 को अपने महाविद्यालय में संपन्न रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के एक सदस्य ने जानकारी चाही और पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो. हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए. संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद रखने की कोई मंशा नहीं है. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

1 comment:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व रक्तदान दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...