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24 फ़रवरी 2025

डरना मना है

कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र ने बातचीत के दौरान पूछा कि डर, भय क्या होता है? किसे कहते हैं? इससे कैसे निपटा जाये? ये सवाल देखने में बहुत ही सहज मालूम पड़ते हैं पर इनके जवाब उतने सहज नहीं हैं. उस समय सामान्य बातचीत के चलते सहज रूप में भय का अर्थ अलग-अलग घटनाओं, स्थितियों के सन्दर्भ में अलग-अलग ही समझ आया. यदि स्थिति आर्थिक है तो भय अलग तरह का होगा, स्थिति यदि सामाजिक है तो डर के पीछे का कारण दूसरा होगा. स्थितियों के अनुसार भय का होना अलग-अलग हो सकता है. ऐसे में इन स्थितियों के सन्दर्भ में उत्पन्न होने वाले भय पर यदि ध्यान दिया जाये तो सहज रूप में समझ आता है कि व्यक्ति के पास से कुछ भी खो देने की स्थिति, कुछ बुरा हो जाने की स्थिति भय को जन्म देती है. इन कारणों-कारकों के साथ-साथ देखा जाये तो भय एक तरह की मानसिक अवस्था है.

 



सम्भव है कि इसके भी अपने-अपने सन्दर्भ निकाले जाएँ, बताये जाएँ मगर जैसा कि व्यक्तिगत अनुभव से, सामाजिक अनुभव से जो देखने-सीखने को मिला उसके अनुसार खुद के पास से खो देने, गलत हो जाने की अवस्था ही भय का कारण है. आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर भी बहुसंख्यक लोगों के मन-मष्तिष्क में एक तरह का भय बना ही रहता है. धन के चोरी हो जाने का, आर्थिक रूप से घाटा हो जाने का, किसी निवेश में हानि हो जाने का. इसी तरह से कोई भी क्षेत्र हो सभी में किसी न किसी रूप में भय व्याप्त रहता है. पारिवारिक रूप में भी भय किसी अपने को खो देने का, उसके साथ गलत हो जाने का लगा रहता है.

 

भय से निदान के बारे में भी मित्र द्वारा जानकारी माँगी गई. ऐसा संभवतः उका हमारे स्वभाव को देखते हुए ही रहा होगा. बहुत कम स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ कि हमें भय घेरता है. ऐसा नहीं है कि हमें डर नहीं लगता है अथवा भय व्याप्त नहीं होता मगर उसकी स्थितियाँ अलग हैं. किसी भी छोटी-बड़ी बात से घबरा जाना हमारा स्वभाव नहीं. ऐसी कोई स्थिति जो अभी तक सामने नहीं आई है, जिसका महज अंदेशा है या फिर जिसका अनुमान लगाया जा रहा है, ऐसी किसी भी स्थिति से हम नहीं घबराते हैं. इसके अलावा दैनिक जीवन के अनेकानेक उतार-चढाव से भी घबराहट नहीं होती, भय नहीं लगता. एक सीधा सा विचार है कि जिस स्थिति से निपटा जा सकता, उससे डरना कैसे और जिससे निपटा नहीं जा सकता, उससे डरना कैसा, उससे निपटने के प्रयास पर विचार करना चाहिए.

 

सामान्य रूप में जो हमें समझ आया कि यदि व्यक्ति आत्मविश्वास मजबूत बनाये रखे, खुद को हताश-निराश न होने दे तो वह बहुत हद तक अपने भय पर नियंत्रण पा सकता है. संयम रखने से, जल्दबाजी न करने से और मन को शांत रखने से भी भय पर नियंत्रण पाया जा सकता है. भय की स्थिति में होता यही है कि व्यक्ति अपने विश्वास को खो देता है, हड़बड़ी में गलत कदम उठाने लगता है, सोचने-विचारने की क्षमता खोने लगता है. इस कारण से भय उस व्यक्ति को अपने अधिकार में ले लेता है. इससे भी स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ने लगती है. बेहतर हो कि व्यक्ति स्थिति को पहचानते हुए उसका सामना करने के लिए खुद को तैयार करे. इससे भयग्रस्त होने वाली स्थिति से बचा जा सकता है.


06 मई 2021

मौत की दहशत को अपने में भरते लोग

वर्ष २०२० में कोरोना वायरस के आने के बाद लोगों में सुरक्षा को लेकर सजगता भी दिखाई दी थी और एक तरह का डर भी. उस समय डर होने का एक कारण इस बीमारी का नया-नया होना तो था ही साथ ही जिस तरह से मीडिया में इसके वैश्विक स्वरूप को दिखाया गया वह डराने वाला था. इसके साथ-साथ आये दिन आने वाले आँकड़ों, वीडियो आदि ने भी जनमानस को भयभीत कर रखा था. भय के माहौल में लोगों ने राहत लेते हुए वर्ष २०२१ में प्रवेश किया. इसी अवधि में चाक-चौबंद व्यवस्था दिखाई दी, वैक्सीन के बन जाने के समाचार आये, साथ ही कोरोना के असर का कम होना भी दिखाई दिया. इसके बाद अचानक से कोरोना वायरस ने पुनः हमला कर दिया. लोग एकदम से संक्रमित होने लगे. अचानक से कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ने लगी. सामान्य से चलते जीवन में एकदम से उथल-पुथल सी मच गई.


एकदम से संक्रमितों की संख्या बढ़ी साथ ही उससे होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ने लगी. कोरोना से होने वाली मौतों की सत्यता-असत्यता के पीछे की सबकी अपनी कहानी है मगर इसके द्वारा लोगों में दहशत पैदा होने लगी. डर का माहौल बुरी तरह से लोगों को भयानक वातावरण का एहसास कराने लगा. इस तरह के वातावरण को बनाने में जहाँ मीडिया पीछे नहीं रही वहीं सोशल मीडिया से जुड़े लोगों ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी. मौत का तांडव, लाशों के ढेर, चिताओं के मेले, मौत का नंगा नाच आदि जैसे शब्दों से समाचारों को लिखा जाने लगा. ऐसा लगने लगा जैसे लोगों को डराने के लिए, उन्हें दहशत में लाने के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा हो. समाचार, वीडियो जानकारी से अधिक हॉरर मूवी समझ आने लगे.




इन मौतों की खबरों के कारण जिस तरह का भय समाज में दिखाई दे रहा था उससे ज्यादा डर इस कारण भी बना हुआ है क्योंकि लोग अपने आसपास ही नहीं किसी दूसरे शहर में होने वाली किसी भी मौत से स्वयं को जोड़ ले रहे हैं. लोग सोशल मीडिया के द्वारा अनावश्यक रूप से मौत की खबरों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं. कुछ लोगों के लिए ऐसा करना जानकारी का संप्रेषण है तो कुछ लोग इसके पीछे सरकार की, शासन-प्रशासन की विफलता दिखाना चाहते हैं. लोगों की मंशा कुछ भी मगर इससे आमजनमानस में दहशत भरने लगी. लोग जान-परिचित वालों की मौत पर तो दुखी हो रहे हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है किन्तु बहुतायत में अब लोग अपरिचितों की मौत से भी खुद को जोड़ने लगे हैं. दिन भर की ही नहीं, अपने पड़ोस, अपने शहर की ही नहीं वरन दसियों दिन पुरानी, दूसरे शहरों-राज्यों की मौतों को अब लोग अपने सिर पर लादे घूमने लगे हैं. मौतों के ये समाचार लोगों को जानकारी देने से ज्यादा मौत के करीब ले जाने लगे हैं.


लोग अपने आसपास की मौतों से खुद को जोड़ते हुए भयाक्रांत हो रहे हैं. पिछले हफ्ते हमारे एक मित्र का फोन आया. शाम का समय था, उसकी आवाज़ में एक तरह का डर, निराशा जैसा समझ आया. उसे टोका तो उसने बताया कि वह बहुत घबराया हुआ है, कोरोना से. उसने बताया कि उसकी कॉलोनी में उस दिन तीन लोगों की मौत हो गई. पूछने पर उसी ने बताया कि तीन लोगों में दो लोग पैंसठ वर्ष से अधिक के थे और एक पचपन वर्ष के थे. इसमें भी एक बात उसने बतायी कि इन तीन लोगों में कोरोना से एक का निधन हुआ, पैंसठ वर्ष वालों का.


उसके साथ दो-चार संवेदना भरे वाक्यों के बाद पूछने पर जानकारी हुई कि वह दस-बारह साल से उस कॉलोनी में रह रहा है. उससे यह पूछने पर कि इन दस-बारह सालों में क्या उसकी कॉलोनी में किसी का निधन नहीं हुआ? उसने बताया कि इस दौरान लगभग बीस-पच्चीस लोगों का निधन हो चुका है. उसी ने बताया कि पिछले साल ही तीन लोगों का निधन हुआ.


उसकी यही बातें पकड़ते हुए हमने उससे कहा कि क्या पिछले साल की अथवा पिछले दस-बारह सालों में हुई मौतों की खबर तुमने हमें दी? क्या उन मौतों पर कभी तुमने परेशान होकर, डर कर हमें फोन किया? उसके मना करते ही उसके साथ जरा तेज़ आवाज़ में बात करते हुए कहा कि यही वो स्थिति है जो अनजाने डर को अपने में समाहित करके दहशत पैदा करती है. इसी दहशत को तुम्हारे जैसे लोग फैलाने का काम करते हैं. तुम्हारे जैसे लोग ही ऐसी खबरों से डरते नहीं बल्कि उनका प्रसारण करते हो. तुम जिसे लोग अपने डर को दूसरों के चेहरे पर भी देखना चाहते हैं ताकि समाज में सभी लोग दहशत में जीते रहें.


इसके बाद उसे बहुत से उदाहरणों से समझाते रहे, उसकी हिम्मत बढ़ाते रहे. अब वह डर से कितना बाहर आया यह तो वही जाने पर वास्तविकता यही है कि लोग अपने आपको लेकर कम डर रहे हैं और अनजाने लोगों की मौतों को अपने सिर में लाद कर डर से आगे निकल दहशत को अपने अन्दर भरते जा रहे हैं. इस समय जो माहौल है उसमें हम सभी को अनावश्यक रूप से ऐसी खबरों के प्रसारण से बचना चाहिए जो डर का पैदा करती हों. ऐसी खबरों से न केवल स्वस्थ व्यक्ति घबराता है बल्कि उनको इनसे ज्यादा खतरा है जो कोरोना संक्रमित हैं. ऐसी खबरों से लगता है जैसे चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मौतें हो रही हैं. यदि स्वस्थ होने वालों और मौतों का आँकड़ा देखें तो स्पष्ट अंतर दिखाई देता है. हमारे देश में कोरोना संक्रमण से स्वस्थ होने वालों की संख्या बहुत अधिक है और मौतों की संख्या दो प्रतिशत से अधिक नहीं है.


इस विपत्ति के समय में यदि किसी का सहयोग नहीं किया जा सकता है तो कम से कम किसी को डराने का काम तो न किया जाये. समझ से परे है कि आखिर इस भय का ऐसा माहौल क्यों बनाया जा रहा है? कहीं इसके पीछे भी आपदा में अवसर बनाने वाला बाज़ार तो नहीं?


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वंदेमातरम्

28 अप्रैल 2021

डराने का ट्रेंड चल पड़ा है सोशल मीडिया पर

कोरोनाकाल फिर एक बार सबको डराने में लगा है. इस डर के पीछे एक कारण लोगों का अनावश्यक रूप से दहशत फैलाना भी है. बहुतेरे लोग ऐसा जानबूझ कर करने में लगे हैं और बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसा अनजाने में करने में लगे हुए हैं. कोरोना संक्रमित लोगों में से बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस आये हैं. सरकारी आँकड़ों पर ध्यान न देकर यदि अपने आसपास ही नजर दौड़ाएं तो हमें बहुत से लोग ऐसे मिल जायेंगे जो स्वस्थ हो गए हैं. इसके बाद भी हम सभी को सोशल मीडिया पर लोगों के निधन की खबरें ही बहुतायत में देखने-सुनने को मिल रही हैं. इससे एक दहशत भरा माहौल सोशल मीडिया पर बना हुआ है.






दरअसल इसे भी एक ट्रेंड की तरह से देखा जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान समय में सबकुछ बाजार की तरह से हमारे सामने आता है. यही बाजार अब हर एक काम के लिए एक तरह का ट्रेंड बना देता है. यही ट्रेंड आजकल चल पड़ा है कि यदि किसी की मृत्यु की सूचना दी जाती है तो तमाम ऐसे लोगों में शोक संवेदना व्यक्त करने की होड़ मच जाती है जो उस दिवंगत व्यक्ति की बीमारी की खबर पाकर उसका फोन भी नहीं उठाते थे. दिवंगत के अपरिचित होने के बाद भी ये भेड़चाल मची रहती है. ठीक है, हमारी संस्कृति, परम्परा में दिवंगत के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना है मगर बहुत से काम देशकाल, परिस्थिति के अनुसार भी करने चाहिए.


समस्त संवेदनशील लोगों से अनुरोध है कि विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त शोक संदेश को सूचना के तौर पर पढ लें और मन ही मन ईश्वर से आत्मा की मोक्षप्राप्ति की प्रार्थना करें. लगातार ॐ शान्ति, दुखद, RIP इत्यादि लिखकर अस्वस्थ लोगों का मनोबल न गिराएं. बेहतर हो कि दिवंगत के परिजनों से मिलकर या उन्हें फोन कर उनके समक्ष अपनी भावनाएँ व्यक्त करें.


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वंदेमातरम्

24 नवंबर 2020

न खुद डरिए, न औरों को डराइए

रोज ही आपको सड़क दुर्घटनाओं की खबर पढ़ने को मिलती होगी, दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने की भी खबरें मिलती होंगीं, हो सकता है कि आप, आपके परिजन, परिचित, सहयोगी आदि कभी बाइक, कार आदि दुर्घटना के शिकार हुए हों, दुर्भाग्य से आपके बीच का कोई सदस्य दुर्घटना में आपने हमेशा-हमेशा को खो दिया हो, तो 

क्या ऐसे किसी हादसे के बाद से आपने यात्रा करना बंद कर दिया?

क्या आपने बाइक, कार आदि पर बैठना बंद कर दिया?

दुर्घटना न हो तो क्या इसके लिए आपने बाइक, कार आदि चलाना छोड़ दिया?

दुर्घटना की आशंका के चलते क्या आपने घर से निकलना ही बंद कर दिया?

क्या और लोगों को आप बाइक, कार दुर्घटनाओं के आँकड़े दिखाकर डराते हैं?

क्या अपने परिचितों में दुर्घटनाओं की भयावहता के बारे में  डर पैदा करते हैं?

क्या आप अपनी सामान्य बातचीत में दुर्घटनाओं की बातें ही करते हैं?


संभव है आप कहेंगे कि ऐसा नहीं करते, तो ऐसा कोरोना को लेकर क्यों कर रहे हैं?


दुर्घटनाएँ देखकर, अपनों के साथ हुए हादसे देखकर, अपने किसी परिचित को इसमें खो देने के बाद आपने ये सब बंद न किया, बस सावधानी बढ़ा दी।


अब आप सुरक्षित यात्रा करने लगे होंगे। हो सकता है कि रफ्तार से बाइक, कार चलानी बंद कर दी हो। बस ऐसे ही सावधान रहिए, सावधानी बरतिए। अनावश्यक न डरिए, न दूसरों को डराइए।



05 जून 2020

कमजोर आत्मविश्वास से सच न हो सके बहुत से सपने

स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी न हो सकी थी कि पिताजी का आदेश मिला कि वापस घर आ जाओ, आगे नहीं पढ़ाना है. उस समय हम स्थिति समझ सकते थे. घर से पढ़ने के लिए ग्वालियर पहुँचे और वहाँ पढ़ने से ज्यादा नाम सामने आने लगा लड़ाई-झगडा करने में. कहते हैं न कि बद अच्छा, बदनाम बुरा. कुछ नाम वास्तविक रूप में हुआ तो कुछ में नाम काल्पनिकता का शिकार होकर सामने आया. चर्चा उसकी नहीं क्योंकि उन दिनों की अपनी ही एक अलग कहानी है जिस पर घंटों लिखा-बताया जा सकता है. जैसा कि पिताजी का आदेश था बिना किसी विरोध के घर आ गए. आगे की पढ़ाई के रूप में लॉ करने का विचार था या फिर सांख्यिकी से परास्नातक करने का. दोनों में कुछ सहमति सी न दिखी तो सिविल सर्विस की तैयारियों की तरफ ध्यान लगाने की कोशिश की. इसी बीच फ़िल्मी कीड़ा काटने लगा.


उरई जैसे शहर में आने के बाद इस कीड़े के काटने का कोई इलाज भी नहीं था. जिस तरह का माहौल यहाँ दिख रहा था उसमें कुछ नाटकों और कुछ नुक्कड़ नाटकों के द्वारा ही संतुष्टि का एहसास किया जा सकता था मगर आगे बढ़ने जैसा कुछ हिसाब समझ नहीं आ रहा था. कुछ महीनों की भागदौड़ के बाद यहाँ का सांस्कृतिक माहौल भी समझ आने लगा. ऊपरी तौर पर भले ही सब एक मंच पर दिखाई पड़ते हों मगर अंदरूनी रूप से, अपने बैनर के रूप में सभी अलग-अलग विचारधाराओं के पोषक थे. इनके साथ बहुत लम्बा समय नहीं बीत सकता था या कहें कि अपने काटे कीड़े का इलाज यहाँ नहीं समझ आ रहा था.


उन्हीं दिनों एक जगह विज्ञापन दिखाई दिया किसी विज्ञापन कंपनी का. मित्रों के सुझाव के साथ विचार किया गया कि यदि एक बार इस क्षेत्र में घुसना हो गया तो शायद आगे का रास्ता भी यहीं से मिल जाये. विज्ञापन की कुछ शर्तों को पूरा करने के लिए फोटो की आवश्यकता थी. अपने फोटोग्राफी के शौक और सेन्स को प्रयोग में लाने का विचार बनाया. एक दोस्त के कैमरे में रील डालकर खुद को निर्देशित करते हुए, खुद के लिए कैमरामैन बने. आनन-फानन पाँच-दस फोटो निकालकर उनको जल्द से जल्द बनवाया गया. जिस दिन सारी औपचारिकतायें पूरी करके फॉर्म को पोस्ट किया उस दिन से न जाने कितनी सफल फिल्मों के हीरो हम नजर आने लगे.

इतना सारा काम घर में बिना किसी की जानकारी में आये हुआ. उसके बाद का दौर किसी खतरनाक फिल्म की तरह से हमारे सामने आया. एक दिन पिताजी की अदालत में पुकार लगी. बिना किसी गवाह, सबूत के हमें उपस्थित होना पड़ा. उनके हाथ में एक लिफाफा चमक रहा था जो हमारे अपराध की गवाही खुद दे रहा था. उस लिफाफे के साथ-साथ जाने कितनी तरह की बातें हमारे हाथ में रख दी गईं. विज्ञान स्नातक की पढ़ाई का मंतव्य सिद्ध करने को कहा गया, सिविल सेवा की तैयारियों का मतलब बताने को कहा गया, नाचने-गाने को सामाजिकता की श्रेणी में शामिल करने के आधार को बताने को कहा गया.

एक हम चुपचाप सिर झुकाए अपने विज्ञान स्नातक होने का कथित अहंकारी गर्व लिए खड़े रहे. हमारे पास कोई तर्क नहीं थे, सिवाय आज्ञा पालन करने के. वो फॉर्म बरसों हमारे पास सुरक्षित रहा, इस सबूत के साथ कि पहली स्टेज में हम पास हो गए थे. आगे के लिए मुंबई जाना था, कुछ फोटोशूट और अन्य औपचारिकताओं को करना था. फिर एक दिन बहुत सारे फालतू कागजातों के साथ उस फॉर्म और उसके साथ आये पत्र को भी मकान के सामने बहती नाली में प्रवाहित कर दिया. वो पत्र मर गया, वो फॉर्म बह गया मगर आज तक वो कीड़ा न मरा, आज तक वो कीड़ा कहीं और नहीं गया.

बहुत सी बातें हैं जो आज तक समझ आती रहीं, नहीं भी समझ आती रहीं मगर एक बात ये समझ न पाए कि क्या हम डरपोक निकले? क्या हमारे अन्दर अपने सपनों को पूरा करने के लिए पारिवारिक निर्णयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत न थी? क्या हमारे अन्दर किसी विश्वास की कमी थी जो हम पिताजी के उस निर्णय का विरोध न कर सके? क्या हम अन्दर ही अन्दर कमजोर थे? ऐसा इसलिए क्योंकि यह उसी एक निर्णय पर नहीं हुआ वरन हमारे साथ एकाधिक मामलों में, बहुतायत विषयों पर ऐसा हुआ. अब लगता है कि उस जैसे अनेक पारिवारिक निर्णयों पर हमारी चुप्पी हमारे आज्ञाकारी होने का नहीं वरन हमारे कमजोर आत्मविश्वास की परिचायक है. ऐसी अनेक चुप्पियों का परिणाम आज भी हम ही भोग रहे हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 मई 2020

डर के आगे जीत है, उनके लिए जो जीतना जानते हैं

किसी विज्ञापन के द्वारा अपना उत्पाद बेचने के लिए डर के आगे जीत है कह देना लोगों को बहुत पसंद आया है. आये दिन लोगों के मुख से इसे निकलते देखा जा सकता है. विज्ञापन की या कहें कि चमकते परदे की ज़िन्दगी की अपेक्षा वास्तविक ज़िन्दगी बहुत अलग है. विज्ञापन की दुनिया में डर के आगे जीत हो सकती है मगर वास्तविक दुनिया में डर सिर्फ डर है और इस डर के आगे मौत ही होती है. यह कोई मजाक नहीं, कोई कल्पना नहीं बल्कि एक कड़वा सत्य है. इस सत्य को अभी तक लोगों ने अपने जीवन में किताबों में पढ़ा था, फिल्मों में देखा था किन्तु विगत कुछ दिनों से इसे अपने जीवन में देख रहा है. कोरोना के वैश्विक आँकड़े व्यक्ति के अन्दर डर का वातावरण बना ही रहे हैं. इस डर को वे लोग और भी गहराई से महसूस कर रहे हैं जिनके शहर में, मोहल्ले में या तो कोई कोरोना संक्रमित निकला या फिर वहाँ किसी व्यक्ति का निधन इस वायरस के संक्रमण से हो गया है.



अब इस डर की असलियत क्या और कितनी है, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है किन्तु जिस तरह से मीडिया में कोरोना वायरस के बारे में बताया जा रहा है वह सिर्फ डर पैदा करने वाला है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर आम नागरिकों द्वारा स्वयं को एकमात्र विद्वान समझने, जानकारी का एकमात्र स्त्रोत समझने के चक्कर में भी अनावश्यक डर का माहौल बना दिया गया है. यह सत्य हो सकता है कि इस वायरस का इलाज न मिल पाने के कारण आज यह खतरनाक स्थिति में समझ आ रहा है. आज इस बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय लोगों से दूरी बनाये रखना ही नजर आ रहा है. ऐसे में अनर्गल तरीके से वीडियो, फोटो और तमाम पोस्ट के माध्यम से सिर्फ डर का वातावरण बनाया जा रहा है. मीडिया तो ऐसा करने में लगी है साथ ही ऐसा वे लोग भी करने में लगे हैं जो मीडिया क्षेत्र में न होते हुए भी खुद को मीडिया समझने की भूल करते हैं. किसी नगर में, किसी शहर में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या, उसके कार्य को लेकर जिस तरह से शंकाएं पैदा की जाती हैं वे कदापि सुखद नहीं हैं.

समझना होगा कि किसी शहर में कोरोना संक्रमितों की असल संख्या की जानकारी पाकर एक आम नागरिक उसका क्या लाभ ले सकता है? समझना चाहिए कि कोरोना संक्रमितों की संख्या, मौतों की पल-पल की जानकारी को सोशल मीडिया के द्वारा शेयर करने से लोग जनता का, समाज का क्या भला कर रहे हैं. इसके द्वारा सिवाय यह दर्शाने के कि समाज में, सोशल मीडिया में इस जानकारी के पहले स्त्रोत वो स्वयं है, किसी भी व्यक्ति का कोई और उद्देश्य नहीं होता है. अपनी पीठ थपथपाने की मानसिकता के कारण, लोगों से अपने बारे में प्रशंसा के दो बोल सुनने की तृष्णा के कारण ऐसे कदम उठाकर समाज में अनावश्यक भय का माहौल बनाया जाने लगता है. यहाँ इन लोगों को जानकारी होनी चाहिए कि किसी खबर को पाने के लिए और उसके प्रसारण के लिए वे जिस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसी को दूसरे भी इस्तेमाल कर रहे हैं. लोगों तक ये खबर पहुँचाने के लिए वे जिस स्मार्ट फोन का, जिस इंटरनेट सेवा का, जिस वैश्विक अथवा राष्ट्रीय चैनल का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसी के द्वारा दूसरा भी जानकारी ले रहा होता है. ऐसे में अकारण ये विद्वता दिखाने की मानसिकता क्या है? भले ही उनका उद्देश्य समाज में, लोगों में भय का माहौल बनाना न रहा हो मगर जाने-अनजाने वे भय का माहौल ही बना रहे हैं. लोगों को डराने का काम कर रहे हैं. यह दिमाग में रखना चाहिए कि डर के आगे जीत है का वाक्य सभी के लिए नहीं है और जिनके लिए है वे जानते हैं कि उन्हें जीतना कैसे है, उनको जीत कैसे मिलना है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

12 अप्रैल 2020

जान की बाजी के द्वारा अनावश्यक भय का प्रसार

यदि लॉकडाउन 14 अप्रैल से आगे बढ़ा तो कुछ नए काम करने का विचार करना पड़ेगा. यह समय उनके लिए भले ही बहुत अच्छा है जिनको घर से बाहर रहने की, घूमने की आदत नहीं है; ऐसे लोगों के लिए भी उपयुक्त है जो अपने काम के अनावश्यक बोझ के चलते परिवार को समय नहीं दे पाते थे मगर ऐसे लोगों के लिए जो घूमने के शौक़ीन भी हैं और इसके साथ परिवार को भी समय देते हैं, बहुत ही समस्या उत्पन्न करने वाला समय है. व्यक्तिगत यदि हम अपनी बात करें तो लॉकडाउन के शुरू होने के बाद पहले हफ्ते ही पढ़ने, लिखने से मन भर सा गया. यद्यपि लॉकडाउन में जिस तरह की रियायत मिली हुई थी, उसके अनुसार दिन में बारह बजे तक तो किसी आवश्यक काम के बहाने से घर से बाहर निकल ही सकते थे. इसके अलावा मीडिया से संपर्क होने के कारण भी इसके लिए खुद को तत्पर करके घर से बाहर निकल आते. इसी तरह सामाजिक कार्यों में लम्बे समय से जुड़े होने के कारण भी सहजता से इसी कार्य हेतु घर से बाहर आ सकते थे. ऐसी सुलभ, सहज स्थितियों के बाद भी स्वयं विचार करके घर से बाहर न निकलने का मन बनाया था. आखिर महज शौक के लिए बाहर निकलना अथवा बोरियत मिटाने के लिए सड़कों पर टहलना हमें कतई सही नहीं लगा. रही बात मीडिया और सामाजिक कार्यों की तो उसके लिए बहुत से साथी अपनी जान की बाजी लगाकर इस तरफ लगे हुए थे तो सोचा कि काहे अपनी जान की बाजी लगाई जाये.


वैसे ये जान की बाजी लगा कर काम में जुटने का सन्दर्भ समझ नहीं आया. क्या कोरोना कहीं छिपा बैठा है जो मौका पाकर, घात लगाकर हमला कर देगा? क्या कोरोना कोई जीव-जंतु जैसा है जो हमला करके जान ले लेगा और कहीं गायब हो जायेगा? क्या कोरोना वायरस से संक्रमण वाकई इतनी गंभीर बीमारी है जो लगते ही मृत्यु दे देती है? क्या यह वायरस हवा में तैरता, उड़ता देश, प्रदेश की गलियों में लोगों को अपना शिकार बना रहा है? देखा जाये तो ऐसा कुछ भी नहीं है, फिर ये जान की बाजी लगा देना कहाँ से और कैसे उत्पन्न हुआ? क्या हम लोगों को किसी भी बात को गंभीरता से न लेने की आदत बनी हुई है? क्या हम किसी बात को जबरन ही भयावह बना देते हैं? क्या लोगों को डराना, भयाक्रांत करना हम सबके स्वभाव में शामिल है? आखिर ऐसा क्या है, जिसके चलते सामान्य से कदमों को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाने लगता है?


क्या मीडिया ने किसी आइसोलेशन वार्ड में जाकर वहाँ के मरीजों से मिलने की कोशिश की? क्या किसी ने उस लैब में जाकर संक्रमित व्यक्ति का सैम्पल छूने का प्रयास किया है? क्या किसी समाजसेवी ने कोरोना वायरस प्रभावित व्यक्ति को सहायता दी है? क्या कोरोना संक्रमित की सेवा इनके द्वारा की जा रही है? यदि ऐसा है तब तो जान की बाजी लगाना समझ आता है. और यदि ऐसा नहीं है तो फिर वे सभी लोग जान की बाजी लगाये हैं जो सड़कों पर घूम रहे हैं, सब्जी अथवा आवश्यक सामान लेने के लिए बाजार में खड़े हैं. देखा जाये तो इस मामले में चिकित्सा सेवा से जुड़े हुए वे लोग जो इन लोगों की देखभाल में लगे हैं, इनके सैम्पल की टेस्टिंग में लगे हैं, इनकी सेवा-उपचार कर रहे हैं, इनकी तीमारदारी कर रहे हैं, ही वाकई में अपनी जान की बाजी लगाये हुए हैं. ये लोग सबसे ज्यादा ‘डेंजर जोन’ में हैं, बाकी लोग तो इस खतरे के कहीं शतांश हिस्से में खड़े हैं. माना कि सभी अपने-अपने अनुसार दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं मगर महज इसी के चलते खुद को सबसे ऊपर, सबसे विशिष्ट बनाने-बताने की मानसिकता का खतरा ये होता है कि इनके अलावा अन्य नागरिकों में एक तरह के भय का वातावरण बनता रहता है. कम से कम ऐसे समय में जबकि एक-एक व्यक्ति मोबाइल लिए खुद में चैनल बना, मीडिया बना घूम रहा है, वैश्विक मौतों की, भयावहता को पल-पल अपडेट कर रहा हो तब मीडिया को, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को बहुत ही संयमित रहने की आवश्यकता है. उनको ध्यान रखना होगा कि जब हर हाथ समाचार एजेंसी बना हुआ तब कुछ प्रतिष्ठित नामों पर लोग विश्वास करते हैं. ऐसे में जब वे ही अपनी जान की बाजी लगाते दिखेंगे तो अनावश्यक भय का माहौल समाज में बनेगा.

ये सही है कि कोरोना संक्रमण अब महामारी के रूप में दिख रहा है. इसके बाद भी वैश्विक रूप से जानकर लोगों द्वारा बार-बार बताया जा रहा है कि इसके द्वारा होने वाली मृत्यु दर अत्यंत कम है. इसकी भयावहता के कारक अलग हैं. इसकी दवा भले ही न उपलब्ध हो, इसका इलाज अभी दिखाई न दे रहा हो इसके बाद भी लोग स्वस्थ हो रहे हैं. यही बिंदु बताता है कि हम सबको धैर्य रखने की आवश्यकता है. चीनी वायरस कोरोना के संक्रमण से होने वाली मौतों के पीछे के कारणों-कारकों को भी जानना, समझना होगा. इस संक्रमण से होने वाली किसी भी मृत्यु को सिर्फ इसी वायरस से जोड़कर देखना समाज में भय पैदा करना ही है, जो वर्तमान परिस्थितियों में कतई भी उचित प्रतीत नहीं होता है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 मई 2018

हँसते रहे तो जिंदा रहोगे


ये जानकार आश्चर्य हुआ कि आज, 6 मई को विश्व हास्य दिवस मनाया जा रहा है. इसे हमारी सामान्य ज्ञान में कमी भले ही समझा जाये मगर हमने व्यक्तिगत रूप से कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई दिन मनाया जाता होगा. इंसानी शारीरिक क्रियाओं में हँसना स्वाभाविक क्रिया है, जिसके लिए न किसी तरह की मेहनत करनी पड़ती है, न किसी तरह का श्रम करना पड़ता है. ऐसे में यदि इस स्वाभाविक क्रिया के लिए भी एक दिन निर्धारित करना पड़े तो इसका अर्थ है कि इन्सान हँसना-मुस्कुराना भूलता जा रहा है या भुला चुका है. मई माह के पहले रविवार को मनाया जाने वाले हास्य दिवस का उद्देश्य भयग्रस्त समाज को हँसने के द्वारा कुछ देर को ही सही, भय से दूर रखना है. हास्य दिवस का विश्व हास्य दिवस के रूप में पहला आयोजन 11 जनवरी 1998 को मुंबई में किया गया था. विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना डॉ० मदन कटारिया द्वारा की गई और उनके ही प्रयासों से विश्व हास्य दिवस का आरंभ संसार में शांति की स्थापना, भाईचारे, सदभाव के उद्देश्य से हुआ. वर्तमान में इस दिवस की लोकप्रियता हास्य योग आंदोलन के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गई. ऐसा माना जा रहा है कि इस समय अधिकांश विश्व आतंकवाद के डर से सहमा हुआ है, इसलिए हास्य दिवस की अत्यधिक आवश्यकता है. आज से पहले दुनिया में इतनी अशांति देखने को नहीं मिली थी. आज हर व्यक्ति के अंदर द्वंद्व मचा हुआ है. चूँकि हंसी के द्वारा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इस कारण प्रत्येक व्यक्ति को हँसी की महत्ता बताने के लिए इस दिवस का आरम्भ किया गया. समाज में वर्तमान में प्रचलित हास्य योग के अनुसार, हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है, जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और संसार को शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्त्व उपस्थित रहते हैं. यह व्यक्ति के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. जब व्यक्ति समूह में हंसता है तो उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पूरे क्षेत्र में फैल जाती है और क्षेत्र से नकारात्मक ऊर्जा हटती है.


विश्व हास्य दिवस के पीछे की वास्तविकता क्या है, सत्यता क्या है ये तो इसे मनाने वाले, अपनाने वाले जाने मगर व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि आज ही नहीं वरन समाज में भय सदैव से बना रहा है. वर्तमान और अतीत के भय में मूल अंतर यह था कि उस समय किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना, दुर्घटना आदि से भयभीत होने वाला खुद को अकेला महसूस नहीं करता था. उस समय उसके सहयोगी, उसका परिवार, उसके मित्र, उसका पड़ोस उसके साथ दिखाई देता था. आज स्थिति इसके ठीक उलट है. आज व्यक्ति ख़ुशी को महसूस कर रहा है मगर अकेला है. अपनी खुशियों को बाँटने के अवसर उसके पास हैं मगर उसकी ख़ुशी को बाँटने वाले लोग उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में किसी के भय के, डर के साथ कौन आकर खड़ा होगा. इसके अलावा एक और बात जो महत्त्वपूर्ण है कि आज इन्सान के भीतर अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ चुका है. उसे अपने सगे सम्बन्धियों पर भरोसा नहीं. उसे अपने मित्रों पर भरोसा नहीं. उसे अपने सहयोगियों पर विश्वास नहीं. ऐसे में भी किसी विषम स्थिति में इन्सान खुद को अकेले महसूस करता है. और सीधी सी बात है कि अकेला आदमी कितनी देर हँस सकता है, कितना मुस्कुरा सकता है. वैसे भी हमारा समाज वह है जहाँ अकेले हँसने वाले को पागल, मानसिक दीवालिया समझा जाता है.

विश्व हास्य दिवस को भले ही मनाया जाए मगर सोचा जाये कि एक दिन की हँसी किस तरह डर को दूर करेगी? एक दिन का हास्य कैसे समाज में फ़ैल रहा भय दूर करेगा? बेहतर हो कि इन्सान आपस में संबंधों को मजबूत करे. सामाजिकता का जिस तरह से लोप हो रहा है उसे दूर करने की कोशिश करे. मिलने-मिलाने का जो माहौल आज समाप्त हो चुका है उसे पुनः जिन्दा किया जाये. संबंधों में खो चुके विश्वास को फिर से लाया जाये. घरों की चाहरदीवारी से बाहर आकर समाज के मैदान पर लोगों से मिला-जुला जाये. मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी आदि पर फूहड़ कार्यक्रमों के खरीदे हुए कलाकारों को ठहाके लगाते देख हँसने की जबरिया कोशिश से बाहर निकल कर वास्तविक हास्य का आनंद लिया जाये. ऐसा नहीं कि समाज में ख़ुशी नहीं है, ऐसा नहीं है कि प्रकृति ने हास्य नहीं बिखेरा है बस खुद को जागरूक करने की आवश्यकता है. एक बार व्यक्ति अपने बनाये खोल से बाहर आने की कोशिश कर ले, एक बार वह अपने बनाये घरौंदे को तोड़ दे, एक बार वह कथित बुद्धिजीवी होने के ढोंग से बाहर निकल आये फिर उसके आसपास हास्य ही हास्य है. आज देखने में आता है कि सामाजिक रूप से किसी भी तरह की प्रस्थिति न होने के बाद भी लोग क्या कहेंगे की मानसिकता के चलते लोगों ने अपने चेहरे पर जबरन ही कठोरता चिपका रखी है. सार्वजनिक कार्यक्रमों में अकारण ही खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में हँसना भुला कर नाहक ही गंभीरता ओढ़े फिरते हैं. ऐसे लोग न खुद हँसने की कोशिश करते हैं और न ही दूसरों के हँसने में शामिल होते हैं. ऐसे लोगों ने ही हँसने को किसी दूसरे ग्रह की स्थिति बना दिया है.

जागिये, सोचिये, समझिये कि इस प्रकृति ने हमें स्वाभाविक क्रिया दी है जो न केवल खुद को प्रसन्न करती है वरन सामने वाले को भी मुग्ध करती है. पता नहीं क्यों, कब, कैसे ठहाके लगाकर हँसना, खुलकर हँसना फूहड़ता का प्रतीक बना दिया गया. हम तो आज भी खुलकर हँसते हैं, ठहाके मार कर हँसते हैं, सार्वजनिक जगहों पर खुलकर हँसते हैं, घर में बैठकर हँसते हैं, सबके साथ मिलकर हँसते हैं. मुस्कुराते चेहरे के साथ, हँसते रहने के कारण हमें तो आज तक आवश्यकता न हुई थी इस दिवस को मनाने की. कभी भय भी न लगा कि क्या होगा, कभी डर भी नहीं लगा कि क्या होने वाला है. सत्य यही है कि आने वाले समय को किसी ने नहीं देखा है, जो होना होगा वही होगा फिर आने वाले समय की अनिश्चितता के लिए वर्तमान को दुखद क्यों बनाया जाये? आज को बोझिल क्यों बनाया जाये? जो होगा गया यदि उसे बदलना हमारे हाथ नहीं तो दुखी बने रहने से क्या लाभ? इसलिए आज में जीना होगा, वर्तमान में खुद को स्थापित करना होगा और यह होगा खुद को सभी चिंताओं, डर, भय से मुक्त करके. खूब हँसिये, ठहाके लगाकर हँसिये फिर देखिये डर कैसे गायब होता है. भय कैसे दूर भागता है. हाँ, समय, स्थिति, काल, वातावरण के अनुसार सभी चीजें भली लगती हैं, हँसना भी उसमें शामिल है.