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12 अगस्त 2024

आक्रामकता और यंत्रणा से जूझते खिलाड़ी

लगभग तीन सप्ताह तक चला पेरिस ओलम्पिक बहुत सारे खिलाड़ियों के लिए खुशियों की बारिश लाया तो बहुत से खिलाड़ियों के लिए निराशा का पल. भारतीय खिलाड़ियों के सन्दर्भ में सभी की अपनी-अपनी दृष्टि है, अपना-अपना नजरिया है. 117 खिलाड़ियों और 140 अधिकारियों-सहायकों की टीम की कुल सफलता मात्र छह पदक प्राप्त करना ही रही. अनेक भारतीय खिलाड़ी पदक की दौड़ में बहुत जल्दी बाहर हो गए, कुछ खिलाड़ी अपना बेहतर प्रदर्शन करते हुए पदकों की दौड़ में भले बने रहे मगर अंतिम रूप से पदक प्राप्त नहीं कर सके.

 

निस्संदेह ओलम्पिक जैसा खेल आयोजन जबरदस्त प्रतिस्पर्धात्मक होने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक दबाव पैदा करने वाला होता है. किसी भी स्पर्धा के अंतिम-अंतिम क्षणों तक खिलाड़ी को अपनी ऊर्जा, अपनी शक्ति, अपना विश्वास बनाये-बचाए रखना ही उसे विजयी बनाता है. देखा जाये तो अब ओलम्पिक ही नहीं किसी भी खेल आयोजन में किसी भी खिलाड़ी के लिए ऊर्जा, विश्वास, संयम बनाये रखना एक चुनौती है. जिस तरह से पढ़ते-सुनते आये हैं कि खेल आपस में समन्वय बढ़ाते हैं, एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देते हैं, सहयोगी भावना का विकास करते हैं वैसा अब बहुत कम या कहें कि न के बराबर देखने को मिलता है. अब खिलाड़ियों में आपस में सहयोग, समन्वय, मैत्री-भाव से ज्यादा शत्रुता, कटुता का भाव देखने को मिलता है. उनके अन्दर विजयी होने की मानसिकता इस कदर हावी है कि वे साथी प्रतिद्वन्द्वी खिलाड़ी का अहित करने से भी नहीं चूकते हैं. इसी पेरिस ओलम्पिक में भारतीय महिला पहलवान निशा दहिया को मैच के दौरान लगी चोट इसी नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता का उदाहरण है. कुश्ती, मुक्केबाजी सहित अनेक खेलों में खिलाड़ियों के बीच अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह आक्रामकता, वैमनष्यता नजर आने लगी है.

 



खेलों में विजयी होने की भावना उचित है मगर विजयी होने के लिए, पदक, ट्रॉफी, सम्मान आदि पाने की चाहत में नकारात्मक प्रतिस्पर्धा ने खेल भावना को ठेस पहुँचाई है. सिर्फ और सिर्फ जीतने की भावना ने खिलाड़ियों को भी यातना, यंत्रणा के दौर से गुजरने को मजबूर किया है. विभिन्न खेलों के कोच द्वारा, ट्रेनर द्वारा अपने खिलाड़ियों को कठिन से कठिनतम अभ्यास करवाए जाने की खबरें समय-समय पर देखने-सुनने को मितली रही हैं मगर इस ओलम्पिक में खिलाड़ियों की शारीरिक, मानसिक यंत्रणा का उदाहरण देखने को मिला. कुश्ती प्रतिस्पर्धा में भारत की महिला पहलवान विनेश फोगाट को फाइनल में सौ ग्राम वजन अधिक होने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया. दो किलो वजन को कम करने के लिए फोगाट रात भर जागकर कसरत करती रहीं, यहाँ तक कि उन्होंने अपना खून भी निकलवाया. यह किसी खिलाड़ी द्वारा अथवा उसके कोच द्वारा एक तरह की यातना है. सेमीफाइनल जीतने के बाद फोगाट ने न कुछ खाया और न ही पानी पिया. रात भर कसरत करने, कुछ न खाने-पीने, खून निकलवाने का दुष्परिणाम यह हुआ कि फोगाट को निर्जलीकरण की स्थिति में अस्पताल में भर्ती करवाया गया.

 

ये दो उदाहरण उस मानसिकता की बानगी भर हैं, जिसमें कोई खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ जीतना चाहता है. वह अपने विरोधी खिलाड़ी को चोट पहुँचाकर जीत रहा है अथवा खुद को शारीरिक-मानसिक कष्ट देकर, इसका उसके लिए कोई अर्थ नहीं. सोचने वाली बात है कि नेहा दहिया को इस तरह की चोट लग जाती कि उनका हाथ, कंधा सदैव के लिए काम करना बंद कर देता तो क्या इसे विरोधी खिलाड़ी की खेल भावना, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहा जाता? क्या पदक वाकई इतना महत्त्वपूर्ण था कि उसके लिए विनेश फोगाट ने खुद को जोखिमपूर्ण स्थिति में डाला? जीतने के प्रति, पदक के प्रति, सम्मान के प्रति एक तरह की जिजीविषा अवश्य होनी चाहिए मगर उसके लिए आक्रामकता, हिंसात्मक रवैया, बैर-भाव जैसी मानसिकता अपनाने की आवश्यकता नहीं. खेलों के द्वारा स्वस्थ समाज बनाने की परिकल्पना रखने के बाद भी खेलों को, खिलाड़ियों की आपसी स्पर्धा को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे किसी रण में जा रहे हों. ‘महासंग्राम’, ‘क्रिकेट का विश्वयुद्ध’, ‘खिलाड़ियों के बीच जंग’ आदि शब्दावली का उपयोग किया जाना ऐसा लगता है जैसे दो देशों अथवा दो खिलाड़ियों के बीच खेल नहीं बल्कि युद्ध चल रहा हो.

 

खेल में आक्रामकता किसी भी शारीरिक, मौखिक व्यवहार से जुड़ी होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य विरोधी को चोट पहुँचाकर विजय प्राप्त करना होता है. आक्रामकता यदि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के चलते हो तो उससे खिलाड़ी को, खेल भावना को ठेस नहीं पहुँचती है मगर जब यह नकारात्मक रूप में अपनाई जाती है तो इसके नुकसान खेल और खिलाड़ी ही उठाते हैं. आज आवश्यकता इसकी है कि कोच, अधिकारी और खिलाड़ी निष्पक्ष खेल भावना को बढ़ावा दें, खेल के नियमों का सम्मान करें, विरोधी खिलाड़ी के प्रति सद्भाव बनाये रखें. यदि इस तरह का अनुशासन खिलाड़ियों द्वारा नहीं अपनाया जाता है तो निश्चित ही खेलों, खेल भावना को ही क्षति पहुँचेगी और इसका खामियाजा खिलाड़ियों को ही उठाना पड़ेगा.

  


28 जुलाई 2024

निशानेबाजी में पदक और हमारी ख़ुशी

कई बार कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्तिगत रूप से खुद अपने से सम्बन्धित नहीं होती हैं मगर इसके बावजूद वे खुशियाँ अपने से जोड़ती हैं, प्रभावित करती हैं. इस तरह की खुशियों में एक तरह का अनदेखा सा बंधन होता है जो किसी न किसी रूप में बंधा तो होता है मगर सामाजिक रूप में नजर नहीं आता है. इस तरह के बंधन बहुत ही आंतरिक, अत्यंत ही आत्मीय होते हैं. इनमें भले ही सामने वाले से कोई रिश्ता न हो, भले ही उससे कोई सम्बन्ध न हो मगर कुछ ऐसा होता है जो प्रभावित करता है और उसकी खुशियों से खुद को जोड़ता है.

 



कुछ इसी तरह की ख़ुशी आज मिली जबकि खबर मिली कि पेरिस ओलम्पिक 2024 में भारत को अपना पहला पदक निशानेबाजी में मिला. यह पदक कांस्य के रूप में आया जिसे मनु भाकर ने दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में प्राप्त किया. यहाँ विशेष बात ये है कि ओलम्पिक के इतिहास में निशानेबाजी में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया यह पहला पदक है.

 

इस जीत से ख़ुशी मिलना स्वाभाविक ही है क्योंकि ओलम्पिक के दूसरे ही दिन देश के नाम पहला पदक आया. हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं, जिसने ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों को बस खेलते ही देखा है. पदकों का सूखा ख़त्म होने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा था. इस कारण से ख़ुशी मिलने के अलावा इसलिए भी इस पदक से ख़ुशी मिली क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व 2019 में हमने भी निशानेबाजी में प्रदेश स्तर की प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय स्पर्धा के लिए जगह बनाई थी. संयोग से यह स्पर्धा भी दस मीटर एयर राइफल की थी.

 

बहरहाल, कतिपय पारिवारिक कारणों से, कोरोना के कारण उसके बाद आगे आना नहीं हो सका किन्तु भारतीय निशानेबाजों की छोटी से छोटी जीत भी हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, ख़ुशी देती है. मनु को बधाई, शुभकामनायें; साथ ही सभी भारतीय खिलाड़ियों को भी शुभकामनाएँ कि देश को रोज ही कई-कई पदक प्रदान करवाते रहें.


31 अगस्त 2021

टोक्यो पैरालम्पिक खेलों के वर्गीकरण की जानकारी

टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. अभी पैरालम्पिक खेल चल रहे हैं. ये खेल अभी पाँच सितम्बर 2021 तक चलने हैं, तब तक और भी ढेर सारे पदक भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते जाने हैं. ये विश्वास है क्योंकि हमारे खिलाड़ी अत्यंत ऊर्जा, विश्वास के साथ लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं. 


ऐसे बहुत से खेल प्रेमी जो खेलों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, खिलाड़ियों के जीतने पर प्रसन्न भी होते हैं मगर उनमें से बहुत से लोग पैरालम्पिक में किये गए वर्गीकरण को समझ नहीं पाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पैरालम्पिक के बारे में अथवा पैरा खेलों के बारे में जनसामान्य को बहुत अधिक न तो बताया गया है और न ही उनको भी इस बारे में बहुत ज्यादा रुचि है. लोगों के लिए विभिन्न स्पर्धाओं में किये गए वर्गीकरण, खिलाड़ियों की शारीरिक स्थिति के चलते उनकी स्पर्धा को समझ पाना बहुत जायद क्लिष्ट नहीं है. एक बार गंभीरता से इसे जान लिया जाये तो फिर पैरालम्पिक खेलों की विभिन्न स्पर्धाओं के बारे में सहजता से समझा जा सकता है. 




इस बारे में अपने पूर्व आलेख में कुछ समझाने का प्रयास किया था. इसे यहाँ क्लिक करके (पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी) पढ़ा जा सकता है. 


टोक्यो पैरालम्पिक में किस तरह का वर्गीकरण किया गया है, इसे यहाँ क्लिक करके (Paralympic Games Classification) समझा जा सकता है. 


इस बारे में इस आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पीडीएफ का भी अध्ययन यहाँ क्लिक करके किया जा सकता है. 


जो भी सामग्री लिंक पर उपलब्ध है, वह टोक्यो पैरालम्पिक 2020 की निम्न वेबसाइट से ली गई है. 

https://olympics.com/tokyo-2020/en/paralympics

29 अगस्त 2021

पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी

टोक्यो ओलम्पिक के बाद इस समय टोक्यो पैरालम्पिक चर्चा में है. ये और बात है कि ओलम्पिक की तरह मीडिया में इनको बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिल पा रहा है मगर हमारे देश के खिलाड़ी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके पैरालम्पिक खेलों की तरफ जनसामान्य का ध्यान खींच रहे हैं. पैरालम्पिक खेल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता में मुख्य रूप से वे खिलाडी सहभागिता करते हैं जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) की श्रेणी में आते हैं.  


यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो जानकारी मिलती है कि पैरालंपिक खेलों को दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था. सन 1948 में दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल चोट को ठीक करने के लिए न्यूरोलोजिस्ट गुडविंग गुट्टमान ने रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए खेलों का चयन किया. उस समय इन खेलों को अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स के नाम से पहचान मिली थी. कालांतर में सन 1960 में रोम में पहले पैरालम्पिक खेल हुए. इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी भाग ले सकते थे. इन खेलों में उस समय 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. ब्रिटेन के मार्गेट माघन पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बने. उन्होंने तीरंदाज़ी में स्वर्ण पदक जीता. इस पहले पैरालम्पिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. समय के साथ पैरालम्पिक खेलों में बदलाव होते गए और सन 1976 में अन्य पैरा खिलाड़ियों को भी इन खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया.




पैरालम्पिक में सहभागिता करने वाले खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है. उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि मुकाबला बराबरी का रहे. जैसे हाथ से विकलांग खिलाड़ियों को एक वर्ग में, पैरों से विकलांग खिलाड़ियों को एक अलग वर्ग में रखा जाता है. इसके अलावा पैरालम्पिक खिलाड़ियों के वर्गीकरण में उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी श्रेणी का निर्धारण किया जाता है.


किसी खिलाड़ी को पैरा खिलाड़ी मानने के दस मानदंड हैं-

1. माँसपेशियों की दुर्बलता

2. जोड़ों की गति की निष्क्रियता

3. किसी अंग में कोई कमी

4. टाँगों की लम्बाई में अंतर

5. छोटा क़द

6. हाइपरटोनिया यानी माँसपेशियों में जकड़न

7. शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी

8. एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी गति

9. नज़र में ख़राबी

10. सीखने की अवरुद्ध क्षमता.


श्रेणीकरण के साथ-साथ खेलों का भी वर्गीकरण किया जाता है. फील्ड की प्रतियोगिताएं एफ कोड के साथ जानी जातीं हैं. इसमें शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो आदि शामिल हैं. विकलांगता के हिसाब से इन खेलों में लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. ट्रैक की प्रतियोगिताओं को टी से परिभाषित किया जाता है. इसमें दौड़ और कूदने जैसी प्रतियोगिताएँ शामिल हैं. इन खेलों में 19 श्रेणियाँ होती हैं. सभी खेल स्पर्धाओं को विकलांगता के अनुसार अलग-अलग नंबरों में बाँटा जाता है. जैसे फील्ड की स्पर्धाओं में एफ़-32, एफ़-33, एफ़-34 आदि नंबर देखने को मिलते हैं. यहाँ इन्हीं नंबरों के अनुसार विकलांगता की स्थिति को पहचाना जाता है. जिस स्पर्धा में जितना कम नंबर होता है, उसकी उतनी ही अधिक विकलांगता होती है.


फील्ड और ट्रैक की प्रतियोगिताओं के अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर वाले खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और तलवारबाजी) भी पैरालम्पिक में खेले जाते हैं. व्हीलचेयर पर खेले जाने वाले खेलों की पहचान डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से की जाती है. इन खेलों में भी जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं उनको एस से पहचाना जाता है. इसको भी दो अलग-अलग विकलांगता श्रेणियों में बाँटा गया है. यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में विकलांगता होती है तो एस के साथ यू लिखा होगा, जिसका अर्थ है अपर लिंब. इसी तरह यदि एस के आगे एल लिखा है तो इसका अर्थ हुआ कि शरीर के निचले हिस्से (लोअर लिंब) में विकलांगता है.




पैरालम्पिक खेलों में खिलाड़ियों के चयन के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी (आईपीसी) द्वारा मानक का निर्धारण किया गया है. इसमें भी ये आवश्यक नहीं कि किसी खिलाड़ीद्वारा इस मानक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे चयनित नहीं माना जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीसी द्वारा प्रत्येक देश एक निश्चित कोटा है, इस निर्धारित कोटे से ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते. ऐसे में यदि निर्धारित कोटे से अधिक ख़िलाड़ी निर्धारित मानक लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाया जाता है. इसमें चयनित खिलाड़ी ही अंतिम रूप से पैरालम्पिक के लिए चयनित होते हैं. इसके अलावा विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है.


वर्तमान में देश की तरफ से अनेक खिलाड़ी टोक्यो में अपना प्रदर्शन करने के लिए गए हैं. उन सभी को शुभकामनाएँ.

02 अगस्त 2021

खेलों से वास्तविक ख़ुशी पाने के लिए खुद को खेलों से जोड़ना होगा

आजकल ओलम्पिक की चर्चा है सभी जगह. जो लोग खेलों में रुचि रखते हैं, वे बहुत प्रसन्न नजर आ रहे हैं. उनकी ख़ुशी उस समय और भी देखने लायक होती है जबकि हमारी कोई टीम या फिर हमारा कोई खिलाडी पदक जीतने के नजदीक होता है. ऐसे समय में एक-दो व्यक्ति नहीं बल्कि लगभग समूचा देश पूरी ऊर्जा के साथ उन खिलाड़ियों के साथ, उन टीमों के साथ नजर आता है. सेमीफाइनल, क्वार्टरफाइनल में आने पर यहाँ तक कि पदक की आस में खेलते खिलाड़ियों के हार जाने पर भी हम लोग ऐसा हंगामा मचाते हैं जैसे कोई बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है. ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि हम सभी लोग ऐसी ख़ुशी बहुत कम देख पाते हैं. हमारे सामने कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जबकि हम खेलों के मामले में ऐसी ख़ुशी दिखा सकें. हमारे सामने बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं जबकि हम खुद को अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा में कहीं खड़ा पाते हैं.


इसी के साथ बहुत से सवाल हैं जो हम सभी के मन में उठना चाहिए. ऐसे बहुत से सवाल हैं जो हर भारतीय के दिल-दिमाग को मजबूर करें सोचने के लिए. इन सवालों में एक सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी समय यदि हमारे खिलाड़ियों ने, हमारी टीमों ने 20-25 स्वर्ण जीत लिए तो हम सबका हंगामा किस स्तर का होगा? कभी विचार किया गया है कि आखिर इतने बड़े देश में पदकों के लिए हमारी उंगलियाँ अधिक हो जाती हैं और पदक कम पड़ जाते हैं,क्यों? आखिर क्या कारण है कि हम महज फाइनल राउंड में पहुँचने पर ही हंगामा काटना शुरू कर देते हैं? कभी आप सबने विचार किया इस पर? शायद नहीं किया होगा क्योंकि आपने अपने घर के किसी सदस्य को खेलों के प्रति गम्भीर बनाया ही नहीं.


इन एक-दो पदकों के आने, अंतिम चार/सोलह में जगह बना लेने/पदक की दौड़ में होकर भी बाहर हो जाने पर हमारी अपार खुशी कुछ और ही कहती लगती है. जैसे हम लोग अपने किसी नाकारा परिजन की छोटी सी सफलता पर भी जबरदस्त धूम मचा लेते हैं, कुछ वैसा ही यहाँ भी लगता है. क्या ऐसा नहीं है? हमें खुद अपने खिलाड़ियों से, अपनी टीमों से किसी तरह की उम्मीद नहीं होती है. ऐसे में जब कोई एक खिलाड़ी या फिर कोई एक टीम भी ऐसा प्रदर्शन करती है जिसके सहारे पदक की आशा बंधती है तो हम सभी ख़ुशी से पागल हो जाते हैं. उन खिलाड़ियों को, टीमों को अपने सिर पर बिठा लेते हैं. उनकी हार पर भी हम गर्व करते हैं क्योंकि हमारे अपने बीच का कोई व्यक्ति वहाँ तक भी नहीं पहुँच पाया होता है.


सत्यता तो यह है कि हम सब वास्तविक ख़ुशी के लिए ऐसा करते ही नहीं हैं क्योंकि यदि हम खेलों में सफलता के लिए वास्तविक ख़ुशी तलाश रहे होते तो अपने किसी परिजन को खेलों में पहुँचाने की कोशिश करते. यदि आप, हम सब वाकई खेलों के क्षेत्र में ख़ुशी देखना चाहते हैं, तलाशना चाहते हैं तो मल्टीनेशनल कंपनी के पैकेज से बाहर निकलना होगा. विदेश भागकर धन कमाने की मानसिकता से उबरना होगा. अपने किसी बच्चे को खेलों में धकेलना होगा.  


आगे की कहानी आप समझ सकते हैं. 

24 जुलाई 2021

तिरंगे की छाँव में शपथ दिलवाने का रोमांच

टोक्यो ओलम्पिक आरम्भ हो चुके हैं. भारत की झोली में पहला पदक आ भी गया है. ओलम्पिक के शुरू होते ही सोशल मीडिया पर, ओलम्पिक के दीवानों के दिल-दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ओलम्पिक खेल ही छाये हुए हैं. इस दीवानगी में उस समय और वृद्धि हो जाया करती है जबकि अपने तिरंगे को लहराते हुये देखते हैं. जब भी मीडिया में, सोशल मीडिया में किसी खिलाड़ी को तिरंगे के साथ देखते हैं तो अपने आपमें ही गर्व का एहसास होने लगता है. इस सुखद एहसास के साथ दिल-दिमाग में ओलम्पिक खेलने का जोश, उसका उत्साह भी उमड़ने-घुमड़ने लगता है. जो लोग खेलों के दीवाने हैं, शौक़ीन हैं, खिलाड़ी हैं वे निश्चित ही कल्पना-लोक में अपने आपको ओलम्पिक खेलों के बीच खड़ा पाते होंगे.


अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या नहीं मगर हमारे साथ बहुत जबरदस्त तरीके से होता है. खेलों का आयोजन अपने आपमें रोमांच भरता है और उस पर भी यदि बात ओलम्पिक की हो तो कहने ही क्या. हालाँकि एशियाई खेलों को लेकर भी एक अलग तरह का उत्साह रहता है मगर जिस तरह का जोश ओलम्पिक के आयोजन के समय खुद में नजर आने लगता है, उसकी बात ही निराली है. ओलम्पिक खेल, ओलम्पिक के पाँच गोलों का प्रतीक चिन्ह और उस पर तिरंगा ध्वज का लहराना रोम-रोम में जोश, ऊर्जा का संचार कर देता है. घर पर स्क्रीन के सामने बैठने के बाद भी यही लगता है जैसे उस सम्बंधित प्रतियोगिता में हम स्वयं भाग ले रहे हैं.


इस सुखद एहसास के पीछे का एक कारण हमारा खुद में खिलाड़ी होना भी है. कॉलेज में खेल-खेल में ही एथलेटिक्स में उतर आये थे, जिसके चलते पाँच हजार मीटर और दस हजार मीटर दौड़ के साथ-साथ भाला फेंक में भी सहभागिता होने लगी. स्नातक के अंतिम वर्ष में एथलेटिक्स टीम के कप्तान का दायित्व हमें सौंपा गया. जिस समय हमें इस दायित्व से अवगत कराया गया उस समय इसमें हमें कुछ विशेष समझ नहीं आया मगर जिस दिन कॉलेज में एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं का आरम्भ हुआ उस दिन गर्व की अनुभूति हुई. प्रतियोगिताओं के आरम्भ होने के पहले एथलेटिक्स की विभिन्न स्पर्धाओं में भाग लेने वाले पचास के करीब खिलाड़ियों को खेल भावना का निर्वहन करने सम्बन्धी शपथ का दिलवाया जाना आज भी रोमांच से भर देता है. इस रोमांच का कारण एक तरफ इतनी बड़ी टीम का कप्तान होना तो था ही उससे ज्यादा रोमांच था तिरंगे की छाँव में खड़े होकर शपथ दिलवाना.




ये और बात है कि खेलों की तरफ कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया, उसी क्षेत्र में कैरियर बनाने जैसा कुछ विचार नहीं किया. आज भले ही हम किसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं मगर स्क्रीन पर खेलते खिलाड़ी को देखकर खुद के खेलने का एहसास होता है, तिरंगे के साथ जोश-ऊर्जा में दिखाई देते खिलाड़ियों में अपने होने का एहसास होता है. ये एहसास तिरंगे का है, ये एहसास खेल का है, ये एहसास खेल भावना का है. 


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