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11 मई 2024

चुनाव प्रचार हेतु अंतरिम जमानत

मामला चूँकि माननीय अदालत से सम्बंधित है, उसके आदेश से सम्बंधित है इस कारण समझ नहीं आता कि इस बारे में क्या लिखा जाये, क्या कहा जाये? दिल्ली के मुख्यमंत्री को अदालत द्वारा महज इस कारण अंतरिम जमानत मिल जाती है कि उनको चुनाव प्रचार करना है. समझ नहीं आता कि ये किस तरह की न्याय व्यवस्था है जहाँ जेल में बंद व्यक्ति को महज इस कारण से अंतरिम जमानत मिल जाती है कि उसे लोकसभा चुनाव में प्रचार करना है. संभवतः ये अपनी तरह का पहला मामला होगा?

बहरहाल, अदालत के आदेश पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं. बावजूद इसके सवाल मन में उभरता है कि क्या इस आधार पर कोई भी व्यक्ति अंतरिम जमानत पाने का अधिकारी हो जाता है? एक ऐसा व्यक्ति जो जेल में बंद है और वह चुनाव में उतरने के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करता है तो क्या उसे भी अंतरिम जमानत दी जाएगी? क्या ऐसे व्यक्ति जो अभी भी जेलों में बंद हैं और वे राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं, तब भी क्या उनको चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाएगी? संभव है कि चुनाव प्रचार करना संवैधानिक अथवा मौलिक अधिकार नहीं हो किन्तु यदि माननीय अदालत किसी एक व्यक्ति को इस आधार पर राहत देती है तो फिर यह निर्णय अन्य लोगों के लिए नजीर के रूप में काम करेगा. 




 

28 सितंबर 2020

नया फाउंटेन पेन मिलने की ख़ुशी बदली सजा में

हस्तलिपि की चर्चा छिड़ी तो बचपन की एक घटना याद आ गई. उस समय हम कक्षा पाँच में पढ़ते थे. एक शाम पिताजी बाजार से वापस आने के बाद अपना लिखा-पढ़ी का कोई काम कर रहे थे. हमने देखा कि पिताजी अपने जिस फाउंटेन पेन से लिखते थे, उससे न लिख कर एक नए पेन से लिख रहे हैं. मैरून रंग का वह पेन बहुत अच्छा लग रहा था. यद्यपि रंगीन पेन हमारे लिए नया नहीं था क्योंकि पिताजी जिन फाउंटेन पेन का प्रयोग करते थे, वे रंगीन बॉडी के ही थे. उन पेन को छूने की हिम्मत भी नहीं होती थी.


उस शाम पता नहीं हमें क्या हुआ, शायद मैरून रंग का ज्यादा आकर्षण रहा कि जैसे ही पिताजी ने अपना काम बंद करके पेन रखा, हमने पिताजी से पूछा कि ये पेन हम ले लें? पिताजी की अनुमति मिलते ही ख़ुशी का ठिकाना न रहा. झटपट पेन उठाया, अपनी कॉपी निकाली. कॉपी के एक पेज पर बड़ी ही फुर्ती में अपना पूरा नाम (जैसा चित्र में लाल रंग में लिखा है) लिख कर पिताजी को दिखाने पहुँच गए.




उन्होंने पूछा कि कुमारेन्द्र कैसे लिखा जाता है?


हमारी फुर्ती, पेन पाने की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया. तुरंत इतना समझ आ गया कि लिखने में कुछ गलती कर गए. कॉपी पर लिखे अपने नाम को फिर से देखा तो समझ आ गया कि द्र की मात्रा गलत लगा गए. गलती समझ आई तो तुरंत सही तरीके से कुमारेन्द्र लिख कर दिखा दिया (जैसा कि चित्र में पीले रंग में लिखा है). पिताजी ने सिर हिलाते हुए उस सही को स्वीकार किया और गलत लिखने की सजा भी सुना डाली.


अब जाओ, सौ बार कुमारेन्द्र लिखो.


नए फाउंटेन पेन से लिखने के चक्कर में सजा पहले तो सजा जैसी न लगी मगर बीस-तीस बार कुमारेन्द्र लिखने के बाद नया पेन आफत लगने लगा. फिलहाल सजा तो पूरी करनी ही थी, सो करी. आज भी बरसों बरस बीत जाने के बाद भी कहीं भी जब अपना नाम लिखते हैं तो तुरंत यह सजा, वह मैरून फाउंटेन पेन याद आ जाता है.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 जुलाई 2020

एक गलती की इतनी बड़ी सजा

किसी गलती की क्या सजा हो सकती है? ये गलती पर निर्भर करता है या सजा देने वाले की मानसिकता पर? अब सजा देने वाले के मन की कोई क्या जाने मगर जहाँ तक हमारी व्यक्तिगत राय है तो कोई भी सजा उसकी गलती के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि सजा देने वाले की मानसिकता में परिवर्तन होते रह सकते हैं मगर गलती एक जैसी ही होगी, वह चाहे किसी भी जगह हो, किसी के साथ हो. गलती कई बार जानबूझ कर होती है, कई बार अनजाने में हो जाती है. इसके अलावा कई बार गलती करने के पीछे एक उद्देश्य होता है. यह उद्देश्य दो तरह से हो सकता है, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक. अब आप कहेंगे कि गलती भी की जा रही और वह भी सकारात्मक. जी हाँ, ऐसा होता है.


सकारात्मक गलतियाँ हम सभी ने की होंगी, आज भी करते होंगे. याद करिए अपने बचपन को. याद आया कुछ, जब आप मित्र-मंडली किसी ऐसे काम को करके आते हैं कि जिस पर कुछ न कुछ सजा मिलनी निश्चित है तब उस समय उस गलती की जिम्मेवारी कोई ऐसा व्यक्ति अपने सिर ले लेता है जो कम से कम सजा का भागी बनेगा. एक घटना अपनी याद आती है, जबकि हम लोग स्कूल में से समोसे खाने के लिए अपने मित्र को बाहर निकालते थे. उस गलती कि क्लास छूट रहा, पकडे गए तो सजा उसी मित्र को मिलेगी, हम सभी मित्र करते थे. वह बालपन की अबोध गलती थी, पता नहीं आज इसे गलती कहा जायेगा या कि कुछ और. बहरहाल, उन दिनों की तरह दिल युवावस्था में भी अबोध बना रहा, गलतियाँ करता रहा.


बचपन की तमाम गलतियाँ भुला दी गईं, उनकी कहीं न कहीं माफ़ी भी मिल गई मगर एक गलती ऐसी हो गई जिसकी माफ़ी मिलती न दिख रही. वह गलती भी सकारात्मक विचार के कारण पैदा हुई. असल में स्वभावगत एक कमी हमारे अन्दर हमेशा से रही है कि दोस्ती में सबकुछ कुर्बान कर देने तक की मंशा रखते हैं. हमारे घरवालों को बहुत बार हमारे इस स्वभाव से बहुत ज्यादा परेशानी होती है. इसके बाद भी न घरवाले अपनी आदत से बाज़ आते हैं और न हम ही अपनी आदत छोड़ पाते हैं. इसी आदत के चलते दो दोस्तों या कहें दोस्तों से ज्यादा वाली स्थिति के बीच समन्वय बनाने बैठ गए. अब बैठे तो बस बैठे ही रह गए. इस समन्वय के बीच ऐसी ग़लतफ़हमी उपजी कि हम आज तक अपराधी बने सजा भुगत रहे हैं.

इस बारे में कहना कुछ नहीं क्योंकि हम मानते हैं कि गलती हमारी है. गलती ये कि दो लोगों के बीच में कभी नहीं आना चाहिए भले ही सबकी आपस में मित्रता है. गलती ये कि कभी भी संबंधों को बचाए रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए भले ही सम्बन्ध आपस में ही क्यों न बिखरते हों. गलती ये भी कि कभी ये नहीं समझना चाहिए कि जो आपके करीब है वो आपकी बात को महत्त्व देगा. खुद को हमेशा सबसे अलग हाशिये पर समझना चाहिए और अपने आपको बचाने की कोशिश करनी चाहिए. फ़िलहाल तो सबक मिला है, इस घटना से. आगे अपने स्वभाव को देखते हैं कि नियंत्रण में आता है या नहीं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 जुलाई 2020

खातिरदारी नहीं सार्वजनिक सजा मिले अपराधियों को

इसे शायद मानवाधिकार का उल्लंघन माना जायेगा मगर हमारा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि दुर्दांत अपराधियों को, आतंकियों को सार्वजनिक रूप से अत्यंत कष्टकारी और दुखद मौत देनी चाहिए. उनको दी जाने वाली सजा इतनी भयावह और दर्दनाक हो कि आने वाले समय में लोग अपराध करने से डरें. फाँसी या फिर आजीवन कारावास किसी भी रूप में कोई सजा नहीं. फाँसी के बाद अपराधी तो सभी तरह के कष्टों से मुक्त हो गया, भुगतता है उसका परिवार. इसी तरह से आजीवन कारावास में अपराधी बड़े ही चैन की नींद लेते हैं. दुर्दांत अपराधियों का और उनके रसूख की जानकारी आज जन-जन को रहती है, ये और बात है कि व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की जान की चिंता करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं करता है.



व्यक्तिगत स्तर पर हमारा मानना है कि किसी भी तरह के ऐसे अपराधियों को, जिनका बहुत सारे केस में हाथ है, जिनका आपराधिक इतिहास भी प्रमाण सहित प्रशासन के पास है उनके सम्बन्ध में किसी तरह की रियायत नहीं होनी चाहिए. अपराधियों को जिन्दा बनाये रखना, उनकी खातिरदारी करते रहना किसी भी तरह की अकलमंदी नहीं है. ये कहना कि उनके द्वारा सबूतों को इकठ्ठा कर लिया जायेगा, रसूखदार लोगों पर शिकंजा कस लिया जायेगा, सिर्फ टहलाने की बातें हो सकती हैं. देश में बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनको अभी तक जिन्दा रखा गया है, जिनसे बहुत सारे प्रमाण मिल चुके हैं मगर कोई बताये कि किस रसूखदार के गिरेबान में आज तक पुलिस ने हाथ डाल पाया है? हत्या, अपहरण, बलात्कार सहित ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें संरक्षण गृह की बालिकाओं तक के साथ अपराध किया जाता है, किस मामले में आजतक किसी रसूखदार व्यक्ति की गिरफ़्तारी हुई है? किसी एक केस का नाम लेकर बाकी दूसरे केसों को कमजोर बताना यहाँ मकसद नहीं है, यहाँ बस यही बताना है कि सबूतों का इकठ्ठा किया जाना, अपराधियों के बयानों पर रसूखदारों पर शिकंजा कसने की बातें बस जनता को टहलाने के लिए हैं.

एक-दो बार नहीं, अनेक बार ऐसी खबरें सामने आई हैं जबकि रसूखदारों से सम्बन्ध रखने वाले अपराधियों को जेल में वीआईपी सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाती रही हैं. बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनके बारे में साफ़ तौर पर मीडिया में आता रहा है कि वे जेल से भी अपने आपराधिक कृत्यों को सहजता से संचालित करते रहते हैं. आये दिन जेल में मोबाइल का मिलना, अन्य सामानों का मिलना इसी बात की तरफ इशारा करता है. ऐसे में किसी भी दुर्दांत अपराधी को जिन्दा रखते हुए, उसकी खातिरदारी करते हुए किसी न किसी रूप में प्रशासन को ही हतोत्साहित करना है. प्रशासन की अपनी ही जिम्मेवारियाँ कम नहीं हैं, ऐसे में अपराधियों की खातिरदारी करवाने से बचना चाहिए. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह का तंत्र हमारे समाज में अब स्थापित हो चुका है, वहाँ किसी भी रसूखदार पर हाथ डालना सहज नहीं. ऐसे में अपराधियों से मिलने वाले सबूतों, प्रमाणों का अचार डालने से बेहतर है कि उनको सार्वजनिक रूप से ऐसी सजा दी जाये जिसे देखकर, सुनकर बाकियों के हाथ-पैर काँप जाएँ. न सही पूरी तरह से मगर बहुत हद तक अंकुश लगेगा अपराध पर, ऐसा हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है. हाँ, इसके लिए अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करना बंद करना होगा.

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