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16 अक्टूबर 2024

बाज़ार के हाथों में संचालित पर्व-त्यौहार

भारतीय समाज सदैव से पर्वों, त्योहारों, आयोजनों के उल्लास में रँगा-बसा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से देखने में आ रहा है कि जैसे किसी त्यौहार का, पर्व का आना होता है वैसे ही बाज़ार केन्द्रित अनेक शक्तियाँ अपने-अपने स्तर से सक्रिय हो जाती हैं. पर्वों, त्योहारों के सन्दर्भ में बाजार में देखने वाली सक्रियता का न तो पर्वों से कोई लेना-देना होता है और न ही त्योहारों की पावनता से. बाज़ार का उद्देश्य किसी न किसी रूप में इंसानी दिल-दिमाग पर अपना नियंत्रण रखना होता है. ऐसे में सवाल स्वयं से ही उठता है कि क्या इंसान बाजार के हाथों की कठपुतली बन चुका हैये ऐसा सवाल है जो आये दिन हर उस व्यक्ति के मन में कौंधता होगा जो संवेदनशील होगा. स्थिति यह है कि ऐसे आयोजनों में आवश्यकता की छोटी से छोटी वस्तु से लेकर जीवन का बड़े से बड़ा पल बाज़ार के द्वारा संचालित होने लगा है. सुबह जागने से लेकर सोने तक की समस्त गतिविधियों पर बाज़ार अपना नियंत्रण किये बैठा है. सुबह जागने के बाद उसे किन-किन पोषक तत्त्वों से भरे टूथपेस्ट की जरूरत है किस तरह के कपड़े उसके स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रख सकते हैं, सुबह के नाश्तेदोपहर के भोजन, कार्यक्षेत्र की स्थितिबच्चों का स्कूलगृहणियों का काम-काज आदि सब कुछ बाज़ार के द्वारा ही पूरा होता दिखाई देता है. 

 

विडम्बना ये है कि बाज़ार स्वयं चलकर घर के भीतर आ चुका है. टीवीसमाचार-पत्रपत्रिकाओं के सहारेहाथ में बराबर चलते मोबाइल के सहारे बाज़ार ने घर के साथ-साथ इंसान के दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है. घर से बाहर निकलते ही सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्सगली-मोहल्ले के कोने में झाँकते छोटे-छोटे से बैनरखम्बोंदीवारों पर चिपके पोस्टरजगह-जगह बँटते पैम्पलेट हर समय इंसान को बाज़ार की कैद में होने का आभास करवाते हैं. हर एक पल के लिए बाज़ार ने कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है. इंसान ख़ुशी के क्षणों में जी रहा है या ग़म साझा कर रहा हैबाज़ार ने इसके लिए भी इंतजाम कर रखे हैं. जन्मदिनशादीवैवाहिक वर्षगाँठपर्व-त्यौहार या फिर कोई भी आयोजन हो, विज्ञापनों के द्वारा इंसान को सम्मोहित कर लिया जाता है. कुछ करते हुए दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं. कुछ अच्छा होने पर कुछ मीठा हो जाये. भले ही टेढ़ा लगे पर मेरा सा लगे. कितना भी बड़ा डर हो पर उसके आगे जीत का एहसास दिखे. त्यौहार में पारंपरिक मिष्ठान बने या न बने पर कुछ मीठा हो जाये का विकल्प बाज़ार ने इंसान के सामने परोस रखा है.

 

इस बाजारीकरण की सबसे ख़राब स्थिति यह है कि इंसान कब उत्पादों का उपयोग करते-करते खुद ही उत्पाद बन गया उसे खबर ही नहीं हुई. शादी-विवाह जैसा विशुद्ध पारिवारिक और पवित्र संस्कार बाज़ार के हवाले हो गया. अब विवाह संस्कार परिजनों के हाथों से नहीं बल्कि बाजार के हाथों से संचालित होने लगा है. बाजार बताने लगा है कि दूल्हा-दुल्हन को कैसे तैयार होना है. बाज़ार बता रहा है कि पूरे आयोजन में कैसे और किस तरह से फोटोशूट किया जाना है. करवाचौथ जैसा पावन पर्व विशुद्ध रूप से बाजार का शिकार होकर दाम्पत्य जीवन में प्रविष्ट हो चुका है. बाज़ार द्वारा निर्धारित उपहार जब पत्नी को दिया जायेगा, बाज़ार सज्जित परिधान जब पहने जाएँगे तभी इस उपवास का उचित फल मिलेगा, इस तरह के सन्देश बाज़ार घर-घर में पहुँचाने में सफल हो गया है. पर्वों, त्योहारों के आते ही वाहन खरीदने के लाभ बताये जाते हैं. बाज़ार ही बताता है कि कौन सी मिठाई खिलाई जाए तो रिश्ते मजबूत होते हैं. परिजनों के एकसाथ मिलकर खुशियाँ मनाने में कौन सा रंग, कौन सा पेंट घर को चमकाएगा, ये भी बाज़ार निर्धारित कर रहा है. परिवार, संस्कार, संस्कृति से सम्बंधित वे सभी आयोजन जिनसे व्यक्ति का भावनात्मक जुड़ाव हैसबको बाज़ार ने अपने कब्जे में ले रखा है.

 

बाज़ार ने न केवल शालीनता के दायरे को पार किया बल्कि अनावश्यक रूप से घर-परिवारों में आर्थिक बोझ को भी बढ़ाया है. महँगे होते जाते आयोजनअत्यंत भव्यता बिखेरती साज-सज्जासामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनाप-शनाप ढंग से बर्बाद किया जाता धन आदि किसी भी रूप में किसी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच नहीं है. इसके पीछे पूरी तरह से नियोजित ढंग से बाज़ार अपना काम कर रहा है. उसका काम अपने उत्पाद को बेचना मात्र है. इस प्रक्रिया में स्वयं इंसान ही उत्पाद बनकर उभरने लगा है. वह बिना सोचे-विचारे बस इन कृत्यों को मशीनी ढंग से करने में लगा है. वह स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है कि इन कृत्यों को करने में उसे ख़ुशी मिल रही है या फिर वह बाज़ार के हाथों में नाच रहा है?  

19 नवंबर 2023

क्रिकेट को लेकर दिमागी उलझन न पालें

पिछले कई दिनों से बहुसंख्यक भारतीय जनमानस पर चढ़ा क्रिकेट बुखार बिना किसी दवाई के आज उतर गया. विश्वकप के इस फाइनल में यदि भारतीय क्रिकेट टीम की जीत होती तो यह बुखार सिर चढ़कर बहुत दिनों तक समूचे भारत को पागल किये रहता. इस पागलपन से बचने का हाल-फिलहाल तो कोई उपाय नजर आता नहीं है क्योंकि अब वो समय नहीं रहा जबकि क्रिकेट के मैच यदा-कदा हुआ करते थे. अब तो हर दूसरे-चौथे दिन किसी न किसी प्रतियोगिता का आयोजन होता रहता है और लगभग पूरे साल क्रिकेट का पागलपन, बुखार बहुतायत लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. इस बुखार में एक जीत जहाँ खिलाड़ी को भगवान बना देती है वहीं अगले ही दिन एक हार उसी खिलाड़ी को राक्षस भी बनाती है. ऐसी स्थिति को सिवाय पागलपन के और कुछ नहीं कहा जा सकता है.




क्रिकेट के इस पागलपन के दौर में एक बात समझने लायक है और जिसे कोई भी क्रिकेट-प्रेमी समझने को तैयार नहीं होता कि क्रिकेट अब महज खेल नहीं रह गया है. क्रिकेट को समझने के लिए उसके गणित को समझना होगा. जिस तरह दस तक पहाड़ा याद कर लेने वाले को, सौ तक की गिनती याद कर लेने वाले को गणितज्ञ नहीं कहा जाता, उसी तरह क्रिकेट के मैच देखने वाले को क्रिकेट का महारथी नहीं कहा जा सकता. आप में से कितने इस तथ्य को जानते हैं कि भारतीय क्रिकेट टीम भारत देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती है? यह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत दिसम्बर 1928 में गठित एवं पंजीकृत निकाय (ट्रस्ट) है. सो कम से कम किसी एक ट्रस्ट को देश के नाम से, उसकी प्रतिष्ठा से न जोड़ें.


आये दिन किसी न किसी खिलाड़ी के देवत्व को स्थापित करते हुए बताया जाता है कि उस खिलाड़ी के अति-निकट परिजन की मृत्यु के बाद भी वो देश के लिए मैच खेलने आया. एक बात समझिये, जो टीम ही देश की नहीं बल्कि एक ट्रस्ट की है उसका कोई खिलाड़ी देश के लिए कैसे खेलने आ सकता है? वह देश के लिए नहीं बल्कि उस ट्रस्ट के लिए खेलने आता है. दूसरी बात, वह किसी देश भावना से नहीं बल्कि ट्रस्ट के साथ हुए समझौते, विज्ञापन कंपनियों के साथ हुए करारनामे के बंधन में जकड़े होने के कारण खेलने आता है. एक अनुबंध के बाद करोड़ों की कमाई करने वाले खिलाड़ी का एक मैच न खेलना उसे आर्थिक चोट ही नहीं पहुँचायेगा बल्कि उसके कैरियर को भी बर्बाद कर देगा. (इसे कपोलकल्पना न मानिये. इसी विश्वकप की एक टीम श्रीलंका को ICC ने निलंबित कर दिया है. जानते हैं क्यों? नहीं जानते तो गूगल पर सर्च कर लीजिये, हाल का मामला है, पूरा का पूरा दिया गया है.) जहाँ पूरी की पूरी टीम का कैरियर ख़राब कर दिया गया है वहाँ एक अकेले व्यक्ति/खिलाड़ी की क्या औकात


और भी बहुत सी बातें हैं मगर बुखार उतरने के बाद आराम करने की आवश्यकता होती है, सो आराम करिए. इसी आराम की घड़ी में अपने परिवार के बच्चों को समझाइये कि ये महज खेल है जहाँ एक सट्टे में, एक विज्ञापन में महान से महान खिलाड़ी बिक जाता है. इसी क्रिकेट के तथाकथित भगवान और उनके कथित अवतार भी इस सट्टे के सामने घुटने टेक चुके हैं. इस क्रिकेट का या किसी भी खेल का उसी तरह आनंद लें जैसे कि किसी फिल्म का लेते हैं, गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों के साथ लेते हैं. अनावश्यक दिमागी उलझन लेंगे तो आप नहीं आपके परिवार के बच्चों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा. लिख लीजिये इस बात को. 





 

26 जून 2023

बाजारवाद के खिलाफ

चलो अच्छा है बाजारवाद के खिलाफ एक माहौल बन रहा है... भले ही फेसबुक पर बन रहा हो. वैसे बाजार वो स्थिति है जिसने बड़े-बड़े आन्दोलनों को निगल लिया. बड़े-बड़े आन्दोलनों की दिशा को बदल दिया. पहली बात ये कि बाजारवाद है क्या? क्या महज सौन्दर्य प्रसाधन बेचना ही बाजारवाद है? क्या वस्तु के सापेक्ष स्त्री को खड़ा कर देना बाजारवाद है? क्या महज सात दिनों में गोरा बना देने का दावा बाजारवाद है? क्या एक-एक बालों की सफेदी को रंगों में लिपटा लेना बाजारवाद है? क्या माँ के स्तनपान की जगह पर बाजारू दूध बच्चे को पिला देना बाजारवाद है? क्या मेरे कपड़े तेरे कपड़ों से सफ़ेद दिखा देना बाजारवाद है? क्या हवन-पूजन के  समय सेक्स की याद करते हुए कंडोम का फ्लेवर याद कर लेना बाजारवाद है? आखिर बाजारवाद का विरोध करते लोग/लुगाइयां भी बताएं कि बाजारवाद क्या है?

 

यदि बाजारवाद का विरोध लिपस्टिक, काजल, बिंदी, मस्कारा, आई-लाइनर, फाउंडेशन, नेल पोलिश आदि न लगाना है तो विशुद्ध ड्रामा है ये. किसी साबुन, क्रीम, लोशन के सहारे चेहरे की झुर्रियों को छिपाने की कला भी नेचुरल नहीं है. बालों की सफेदी में कालिख पोतना भी नेचुरल नहीं है. सुबह जगाने से लेकर रात सोने तक अनेकानेक रूप में चेहरे को प्रयोगशाला बना देना नेचुरल नहीं है. बाकी का सेल्फी के नाम पर कुछ भी हो मगर नेचुरल नहीं है. हो सकता है बहुतों को ये पोस्ट स्त्री-विरोधी लगे मगर इसे पढ़ने के बाद एक बार जब बेशिन के सामने खड़े होकर कोई फेसवाश लगाया जाये, चेहरे की झुर्रियों पर उँगलियों को फिराया जाये, बालों की सफेदी को दूर करने के लिए कोई नेचुरल कलर घोला जाने लगे तो याद करियेगा कि कहीं इसी नेचुरल कलर की तरह आपकी सेल्फी भी तो नेचुरल नहीं?


 

28 अगस्त 2022

बाजार द्वारा संचालित समाज

क्या इंसान बाजार के हाथों की कठपुतली बनता जा रहा है या कठपुतली बन चुका है? ये ऐसा सवाल है जो आये दिन हर उस व्यक्ति के मन में कौंधता होगा जो संवेदनशील होगा. व्यक्ति के जीवन की आज यह स्थिति बनी हुई है कि रोजमर्रा की आवश्यकता की छोटी से छोटी वस्तु से लेकर जीवन का बड़े से बड़ा पल बाज़ार के द्वारा संचालित होने लगा है. सुबह जागने के लिए व्यक्ति को किस घड़ी के अलार्म की आवश्यकता है, जागने के बाद उसे किन-किन पोषक तत्त्वों से भरे टूथपेस्ट की जरूरत है, यदि वह व्यक्ति सुबह की सैर पर जाता है तो कौन से जूते उसके लिए लाभदायक हैं, किस तरह के कपड़े उसके स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रख सकते हैं आदि-आदि बाज़ार ही तय कर रहा है. सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन, कार्यक्षेत्र की स्थिति, बच्चों का स्कूल, गृहणियों का काम-काज आदि सबकुछ अब बिना बाज़ार के पूरा होता नहीं दिखाई देता है. 


इन स्थितियों से दो-चार होने के लिए व्यक्ति को बाज़ार जाने की आवश्यकता नहीं है. अब बाज़ार स्वयं चलकर आपके घर के भीतर आ चुका है. टीवी पर विज्ञापन के सहारे, समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के सहारे, हाथ में बराबर चलते मोबाइल के सहारे बाज़ार ने न केवल घर में जगह बना ली है बल्कि उसने इंसान के दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है. घर से बाहर निकलते ही सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, गली-मोहल्ले के कोने में झाँकते छोटे-छोटे से बैनर, खम्बों, दीवारों पर चिपके पोस्टर, जगह-जगह बँटते पैम्पलेट हर समय इंसान को बाज़ार की कैद में होने का आभास करवाते हैं. अब खाने-पीने के सामान को खरीदने की बात हो या फिर पहनने-ओढ़ने के लिए वस्त्रों का चुनाव करना हो, घर को सजाने के लिए किसी वस्तु की चाहना हो या फिर कोई मंगलकारी आयोजन हो, सभी में व्यक्ति की सोच से अधिक तेज चलते हुए बाज़ार अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है. हर एक पल के लिए बाज़ार ने कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है. इंसान ख़ुशी के क्षणों में जी रहा है या ग़म साझा कर रहा है, बाज़ार ने इसके लिए भी इंतजाम कर रखे हैं.




जन्मदिन हो, शादी हो, वैवाहिक वर्षगाँठ हो, पर्व-त्यौहार हों या फिर कोई भी आयोजन विज्ञापनों के द्वारा इंसान को इतना सम्मोहित कर लिया जाता है कि वह बिना बाज़ार के आगोश में आये कुछ कर ही नहीं सकता है. कुछ करते हुए दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं, कुछ अच्छा होने पर कुछ मीठा हो जाये. भले ही टेढ़ा लगे पर मेरा सा लगे, कितना भी बड़ा डर हो पर उसके आगे जीत का एहसास दिखे, त्यौहार में पारंपरिक मिष्ठान बने या न बने पर कुछ मीठा हो जाये का विकल्प बाज़ार ने इंसान के सामने परोस रखा है. एकबारगी यदि देखें तो हँसी-ख़ुशी के माहौल को, अपने उल्लास को ऐसे किसी भी उत्पाद के सहारे मिल-बाँट कर मना लेना बुरा नहीं है. बुरे का एहसास उस समय होता है जबकि व्यक्ति बजाय इन उत्पादों का उपयोग करने के, इनका उपभोग करने के स्वयं ही उत्पाद बनने लगता है.


यह इस बाजारीकरण की सबसे ख़राब स्थिति है कि इंसान कब बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों का उपयोग करते-करते खुद ही उत्पाद बन गया उसे खबर ही नहीं हुई. कभी गौर किया है इस बात पर कि शादी-विवाह जैसा विशुद्ध पारिवारिक और पवित्र संस्कार कब बाज़ार के हवाले हो गया? अब विवाह संस्कार परिजनों के हाथों से नहीं, उनकी मनमर्जी से नहीं बल्कि बाजार के हाथों से संचालित होने लगा है. अब बाजार बताने लगा है कि दूल्हा-दुल्हन को कैसे तैयार होना है. अब बाज़ार ने निर्धारित कर दिया है कि सजावट कैसी होनी है. अब बाज़ार बता रहा है कि पूरे आयोजन में कैसे और किस तरह से फोटोशूट किया जाना है. बाज़ार की इन हरकतों ने जहाँ एक तरफ पाश्चात्य स्थिति को भारतीय संस्कृति पर थोपने जैसा काम किया है वहीं अनावश्यक रूप से व्यक्तियों की जेब पर भी डाका डाला है.


इन सबमें भारी-भरकम विज्ञापन, टीवी के रंगीन लकदक करते सीरियल भी सहायक भूमिका में नजर आने लगे हैं. विवाह अब संस्कार नहीं, पारिवारिक आयोजन नहीं बल्कि बाजारीकरण का सशक्त मॉडल बनकर सामने आया है. अकेले विवाह ही नहीं वरन व्यक्ति से सम्बंधित वे तमाम सारे आयोजन जिनमें किसी न किसी रूप में व्यक्ति का भावनात्मक सम्बन्ध जुड़ा है, सबको बाज़ार ने अपने कब्जे में ले रखा है. विवाह के पहले का फोटोशूट कब कैसे जनसामान्य के बीच जा घुसा किसी को खबर न हुई. शालीनता के महीन से परदे को गिराते हुए बाज़ार ने प्री-वेडिंग शूट के नाम पर अशालीनता फैलानी शुरू कर दी गई. विवाह का एकमात्र यही आयोजन नहीं बल्कि उससे जुड़े तमाम सारे छोटे-बड़े आयोजन भी बाज़ार ने हड़प लिए हैं. हल्दी, मेंहदी, द्वारचार, जयमाल, फेरे, विदाई आदि को अब बाज़ार संचालित कर रहा है. कैसे कपडे पहने जाने हैं, किस कंपनी के पहने जाने हैं, किसे क्या भूमिका निभानी है, कैसे नृत्य करते हुए कन्या आएगी, किस तरह से जयमाल होगी, वर-वधु कैसे आधुनिकता के वशीभूत होकर फेरे लेंगे, विदाई के समय कन्या कैसे और कितना रोएगी आदि बाज़ार ने सिखा-पढ़ा दिया है. मातृत्व जैसे भावनात्मक एहसास को भी विज्ञापनों, फोटोशूट के हाथों में थमा दिया गया. इन कृत्यों में आधुनिकता, वर्तमान चलन के नाम पर फूहड़ता, नग्नता, अशालीनता के अलावा और कुछ देखने को नहीं मिला.


बाज़ार ने न केवल शालीनता के दायरे को पार किया बल्कि अनावश्यक रूप से घर-परिवारों में आर्थिक बोझ को भी बढ़ाया है. महँगे होते जाते आयोजन, अत्यंत भव्यता बिखेरती साज-सज्जा, सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनाप-शनाप ढंग से बर्बाद किया जाता धन आदि किसी भी रूप में किसी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच नहीं है. इसके पीछे पूरी तरह से नियोजित ढंग से बाज़ार अपना काम कर रहा है. उसका काम अपने उत्पाद को बेचना मात्र है. इस प्रक्रिया में स्वयं इंसान ही उत्पाद बनकर उभरने लगा है. वह बिना सोचे-विचारे बस इन कृत्यों को मशीनी ढंग से करने में लगा है. वह स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है कि इन कृत्यों को करने में उसे ख़ुशी मिल रही है या फिर वह बाज़ार के हाथों में नाच रहा है?  




 

05 जून 2020

कमजोर आत्मविश्वास से सच न हो सके बहुत से सपने

स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी न हो सकी थी कि पिताजी का आदेश मिला कि वापस घर आ जाओ, आगे नहीं पढ़ाना है. उस समय हम स्थिति समझ सकते थे. घर से पढ़ने के लिए ग्वालियर पहुँचे और वहाँ पढ़ने से ज्यादा नाम सामने आने लगा लड़ाई-झगडा करने में. कहते हैं न कि बद अच्छा, बदनाम बुरा. कुछ नाम वास्तविक रूप में हुआ तो कुछ में नाम काल्पनिकता का शिकार होकर सामने आया. चर्चा उसकी नहीं क्योंकि उन दिनों की अपनी ही एक अलग कहानी है जिस पर घंटों लिखा-बताया जा सकता है. जैसा कि पिताजी का आदेश था बिना किसी विरोध के घर आ गए. आगे की पढ़ाई के रूप में लॉ करने का विचार था या फिर सांख्यिकी से परास्नातक करने का. दोनों में कुछ सहमति सी न दिखी तो सिविल सर्विस की तैयारियों की तरफ ध्यान लगाने की कोशिश की. इसी बीच फ़िल्मी कीड़ा काटने लगा.


उरई जैसे शहर में आने के बाद इस कीड़े के काटने का कोई इलाज भी नहीं था. जिस तरह का माहौल यहाँ दिख रहा था उसमें कुछ नाटकों और कुछ नुक्कड़ नाटकों के द्वारा ही संतुष्टि का एहसास किया जा सकता था मगर आगे बढ़ने जैसा कुछ हिसाब समझ नहीं आ रहा था. कुछ महीनों की भागदौड़ के बाद यहाँ का सांस्कृतिक माहौल भी समझ आने लगा. ऊपरी तौर पर भले ही सब एक मंच पर दिखाई पड़ते हों मगर अंदरूनी रूप से, अपने बैनर के रूप में सभी अलग-अलग विचारधाराओं के पोषक थे. इनके साथ बहुत लम्बा समय नहीं बीत सकता था या कहें कि अपने काटे कीड़े का इलाज यहाँ नहीं समझ आ रहा था.


उन्हीं दिनों एक जगह विज्ञापन दिखाई दिया किसी विज्ञापन कंपनी का. मित्रों के सुझाव के साथ विचार किया गया कि यदि एक बार इस क्षेत्र में घुसना हो गया तो शायद आगे का रास्ता भी यहीं से मिल जाये. विज्ञापन की कुछ शर्तों को पूरा करने के लिए फोटो की आवश्यकता थी. अपने फोटोग्राफी के शौक और सेन्स को प्रयोग में लाने का विचार बनाया. एक दोस्त के कैमरे में रील डालकर खुद को निर्देशित करते हुए, खुद के लिए कैमरामैन बने. आनन-फानन पाँच-दस फोटो निकालकर उनको जल्द से जल्द बनवाया गया. जिस दिन सारी औपचारिकतायें पूरी करके फॉर्म को पोस्ट किया उस दिन से न जाने कितनी सफल फिल्मों के हीरो हम नजर आने लगे.

इतना सारा काम घर में बिना किसी की जानकारी में आये हुआ. उसके बाद का दौर किसी खतरनाक फिल्म की तरह से हमारे सामने आया. एक दिन पिताजी की अदालत में पुकार लगी. बिना किसी गवाह, सबूत के हमें उपस्थित होना पड़ा. उनके हाथ में एक लिफाफा चमक रहा था जो हमारे अपराध की गवाही खुद दे रहा था. उस लिफाफे के साथ-साथ जाने कितनी तरह की बातें हमारे हाथ में रख दी गईं. विज्ञान स्नातक की पढ़ाई का मंतव्य सिद्ध करने को कहा गया, सिविल सेवा की तैयारियों का मतलब बताने को कहा गया, नाचने-गाने को सामाजिकता की श्रेणी में शामिल करने के आधार को बताने को कहा गया.

एक हम चुपचाप सिर झुकाए अपने विज्ञान स्नातक होने का कथित अहंकारी गर्व लिए खड़े रहे. हमारे पास कोई तर्क नहीं थे, सिवाय आज्ञा पालन करने के. वो फॉर्म बरसों हमारे पास सुरक्षित रहा, इस सबूत के साथ कि पहली स्टेज में हम पास हो गए थे. आगे के लिए मुंबई जाना था, कुछ फोटोशूट और अन्य औपचारिकताओं को करना था. फिर एक दिन बहुत सारे फालतू कागजातों के साथ उस फॉर्म और उसके साथ आये पत्र को भी मकान के सामने बहती नाली में प्रवाहित कर दिया. वो पत्र मर गया, वो फॉर्म बह गया मगर आज तक वो कीड़ा न मरा, आज तक वो कीड़ा कहीं और नहीं गया.

बहुत सी बातें हैं जो आज तक समझ आती रहीं, नहीं भी समझ आती रहीं मगर एक बात ये समझ न पाए कि क्या हम डरपोक निकले? क्या हमारे अन्दर अपने सपनों को पूरा करने के लिए पारिवारिक निर्णयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत न थी? क्या हमारे अन्दर किसी विश्वास की कमी थी जो हम पिताजी के उस निर्णय का विरोध न कर सके? क्या हम अन्दर ही अन्दर कमजोर थे? ऐसा इसलिए क्योंकि यह उसी एक निर्णय पर नहीं हुआ वरन हमारे साथ एकाधिक मामलों में, बहुतायत विषयों पर ऐसा हुआ. अब लगता है कि उस जैसे अनेक पारिवारिक निर्णयों पर हमारी चुप्पी हमारे आज्ञाकारी होने का नहीं वरन हमारे कमजोर आत्मविश्वास की परिचायक है. ऐसी अनेक चुप्पियों का परिणाम आज भी हम ही भोग रहे हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 मई 2020

डर के आगे जीत है, उनके लिए जो जीतना जानते हैं

किसी विज्ञापन के द्वारा अपना उत्पाद बेचने के लिए डर के आगे जीत है कह देना लोगों को बहुत पसंद आया है. आये दिन लोगों के मुख से इसे निकलते देखा जा सकता है. विज्ञापन की या कहें कि चमकते परदे की ज़िन्दगी की अपेक्षा वास्तविक ज़िन्दगी बहुत अलग है. विज्ञापन की दुनिया में डर के आगे जीत हो सकती है मगर वास्तविक दुनिया में डर सिर्फ डर है और इस डर के आगे मौत ही होती है. यह कोई मजाक नहीं, कोई कल्पना नहीं बल्कि एक कड़वा सत्य है. इस सत्य को अभी तक लोगों ने अपने जीवन में किताबों में पढ़ा था, फिल्मों में देखा था किन्तु विगत कुछ दिनों से इसे अपने जीवन में देख रहा है. कोरोना के वैश्विक आँकड़े व्यक्ति के अन्दर डर का वातावरण बना ही रहे हैं. इस डर को वे लोग और भी गहराई से महसूस कर रहे हैं जिनके शहर में, मोहल्ले में या तो कोई कोरोना संक्रमित निकला या फिर वहाँ किसी व्यक्ति का निधन इस वायरस के संक्रमण से हो गया है.



अब इस डर की असलियत क्या और कितनी है, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है किन्तु जिस तरह से मीडिया में कोरोना वायरस के बारे में बताया जा रहा है वह सिर्फ डर पैदा करने वाला है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर आम नागरिकों द्वारा स्वयं को एकमात्र विद्वान समझने, जानकारी का एकमात्र स्त्रोत समझने के चक्कर में भी अनावश्यक डर का माहौल बना दिया गया है. यह सत्य हो सकता है कि इस वायरस का इलाज न मिल पाने के कारण आज यह खतरनाक स्थिति में समझ आ रहा है. आज इस बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय लोगों से दूरी बनाये रखना ही नजर आ रहा है. ऐसे में अनर्गल तरीके से वीडियो, फोटो और तमाम पोस्ट के माध्यम से सिर्फ डर का वातावरण बनाया जा रहा है. मीडिया तो ऐसा करने में लगी है साथ ही ऐसा वे लोग भी करने में लगे हैं जो मीडिया क्षेत्र में न होते हुए भी खुद को मीडिया समझने की भूल करते हैं. किसी नगर में, किसी शहर में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या, उसके कार्य को लेकर जिस तरह से शंकाएं पैदा की जाती हैं वे कदापि सुखद नहीं हैं.

समझना होगा कि किसी शहर में कोरोना संक्रमितों की असल संख्या की जानकारी पाकर एक आम नागरिक उसका क्या लाभ ले सकता है? समझना चाहिए कि कोरोना संक्रमितों की संख्या, मौतों की पल-पल की जानकारी को सोशल मीडिया के द्वारा शेयर करने से लोग जनता का, समाज का क्या भला कर रहे हैं. इसके द्वारा सिवाय यह दर्शाने के कि समाज में, सोशल मीडिया में इस जानकारी के पहले स्त्रोत वो स्वयं है, किसी भी व्यक्ति का कोई और उद्देश्य नहीं होता है. अपनी पीठ थपथपाने की मानसिकता के कारण, लोगों से अपने बारे में प्रशंसा के दो बोल सुनने की तृष्णा के कारण ऐसे कदम उठाकर समाज में अनावश्यक भय का माहौल बनाया जाने लगता है. यहाँ इन लोगों को जानकारी होनी चाहिए कि किसी खबर को पाने के लिए और उसके प्रसारण के लिए वे जिस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसी को दूसरे भी इस्तेमाल कर रहे हैं. लोगों तक ये खबर पहुँचाने के लिए वे जिस स्मार्ट फोन का, जिस इंटरनेट सेवा का, जिस वैश्विक अथवा राष्ट्रीय चैनल का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसी के द्वारा दूसरा भी जानकारी ले रहा होता है. ऐसे में अकारण ये विद्वता दिखाने की मानसिकता क्या है? भले ही उनका उद्देश्य समाज में, लोगों में भय का माहौल बनाना न रहा हो मगर जाने-अनजाने वे भय का माहौल ही बना रहे हैं. लोगों को डराने का काम कर रहे हैं. यह दिमाग में रखना चाहिए कि डर के आगे जीत है का वाक्य सभी के लिए नहीं है और जिनके लिए है वे जानते हैं कि उन्हें जीतना कैसे है, उनको जीत कैसे मिलना है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 दिसंबर 2018

कल के वृद्ध आज के युवा


समय कितनी तेजी से बदलता है यह व्यक्तियों की आदतों, उसके रहन-सहन से समझ आता है. समय की यही चाल समाज की दिशा और चाल का निर्धारण करती है. किसी के लिए समय बहुत धीमी गति से चल रहा होता है तो किसी के लिए समय भागता सा समझ आता है. समय की गति का आकलन किसी एक व्यक्ति के अनुसार न करके समग्र रूप में करना चाहिए. समाज समग्रता में ही बसता है और व्यक्तिगत रूप में समाज का आकलन उस रूप में नहीं हो पाता है जैसा कि होना चाहिए. व्यक्तिगत नजरिया समग्र नजरिये से बहुत अलग होता है और इसी के चलते समय का प्रभाव सापेक्षतः स्पष्ट नहीं हो पाता है. इस सम्बन्ध में वर्षों पहले का एक विज्ञापन याद आता है, आपको भी याद आएगा. उस विज्ञापन में जितेन्द्र आकर तीस साल की उम्र के बारे में कुछ कहते-बताते हुए एक कैप्सूल खाने की सलाह देते थे. सोचिये उस समय को और आज को.


उस समय तीस साल की उम्र के बाद शक्तिवर्द्धक कैप्सूल लेने की आवश्यकता महसूस की जाती थी जबकि आज तीस साल की उम्र में एक व्यक्ति शादी करके पत्नी को खुश करने वाले कैप्सूल की तलाश करता है. उस विज्ञापन को याद करते हुए बस एक ही बात याद आती है कि कैसे उस दौर में एक व्यक्ति तीस साल की उम्र में ही खुद को वृद्ध समझने लगता होगा? कई बार उस विज्ञापन को याद करते हुए याद करते हैं अपने परिवार और अपने आसपास के परिवारों का हाल, जहाँ बीस-बाईस साल में परिवारों में दो-दो, चार-चार बच्चे पैदा हो जाया करते थे. आज हाल ये है कि तीस-पैंतीस की उम्र में विवाह हो रहे हैं. स्पष्ट है कि जब किसी व्यक्ति का परिवार बीस-बाईस साल में बस जायेगा, वे दो-चार बच्चों के माता-पिता बन जायेंगे तो उनमें अपने आप ही तीस साल की उम्र में बुढ़ापे का भाव आ जायेगा. किसी समय पढ़ा था ओशो के द्वारा कहा हुआ कि हमारे देश में जवानी आती ही नहीं. जिस समय इसे पढ़ा था, उस समय लगा था कि कुछ अतिशय कहा है उन्होंने मगर उनके तर्कों और उदाहरणों के सापेक्ष इसे मानना पड़ा था. आखिर एक व्यक्ति का जन्म होता है और पढ़ने-लिखने से फुर्सत पाने से उसके गले जिम्मेवारी डाल दी जाती है, विवाह की, एक लड़की की. अभी वह उस जिम्मेवारी को समझ ही नहीं पाता है कि उस पर रोज एक दबाव काम करने लगता है, अगली संतति को धरती पर लाने का. उफान मारती युवावस्था, भरपूर यौवन अपना रंग दिखाता ही है, उसके साथ उत्प्रेरक का काम करता है पारिवारिक दबाव. किसी को स्वर्ग की सीढ़ी की चाह होती है, किसी को मोक्ष प्राप्त करने की लालसा होती है. कोई बिना नाती देखे धरती छोड़ने को तैयार नहीं होता है. किसी को वंशावली बढ़ाने वाला उत्तराधिकारी चाहिए होता है. ऐसे में सबकी मनोकामना पूरी करते-करते, अपनी देह की माँग पूरी करते-करते अगला व्यक्ति कब दो-चार बच्चों के अभिभावक में बदल जाता है उसे पता ही नहीं चलता है.


इस स्थिति को उस समय बहुत नजदीक से देखा और समझा भी है. ऐसे में तब तीस साल की उम्र वृद्धावस्था वाली उम्र मानी जा सकती है. अब जबकि कैरियर के चक्कर में युवा शादी करने से भाग रहे हैं तब तीस साल की उम्र भरी युवावस्था समझा जाने लगा है. कैरियर के चलते, आधुनिकता के चलते आज के युवा शादी जैसी संस्था के बंधन में बंधना नहीं चाहते हैं. शारीरिक संतुष्टि, माँग उनके लिए आज महत्त्वपूर्ण नहीं रह गई है. विवाहपूर्व सम्बन्ध उनके लिए आज अनैतिक नहीं रह गए हैं, ऐसे में वे स्फूर्त रूप से अपने विकास पर ध्यान लगाये हुए हैं. अपने कैरियर को आगे बढ़ाने पर दिमाग लगाये हैं. विवाह आज उनकी अनिवार्यता नहीं वरन सामाजिक परम्पराओं का निर्वहन मात्र रह गया है. ऐसे में थर्टी प्लस जैसे विज्ञापन देखने वालों को आज का समाज कुछ ज्यादा ही आधुनिक समझ आये. इसके बाद भी आज का सत्य यही है कि कल का युवा भले ही तीस साल की उम्र में वृद्ध माना जाने लगता हो मगर आज का युवा तीस के बाद ही अपनी जवानी से परिचय कर रहा है. यही समय की गति है, जो खुद अपनी बनायी गति को बदलता रहता है.

05 मार्च 2018

सार्वजनिक स्तनपान : मातृत्व या विज्ञापन


ऐसा माना जाता रहा है कि पढ़-लिख कर व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं जबकि ऐसा हुआ भी है. शिक्षित व्यक्तियों ने अपने ज्ञान के आधार पर तर्कों पर तमाम निष्कर्षों को कसा है. इधर तकनीकी विकास के साथ साक्षर होती पीढ़ी ने, तकनीकी का सहारा लेकर कुछ कर-गुजरने वाली मानसिकता ने शिक्षित होने, साक्षर होने के बाद तर्क-वितर्क को कुतर्क के रास्ते पर उतार दिया है. इस तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं.

विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान के द्वारा वह न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रेक होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

ऑस्ट्रेलियाई संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी बेटी को स्तनपान कराकर इतिहास रचने वाली सीनेटर लैरिसा वा‌र्ट्स
असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. इन्हें न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. बाजार के लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?

10 जुलाई 2009

विज्ञापन का ज़माना है, ज़रा देख कर फँसना

आज हम मित्रों के बीच विज्ञापनों को लेकर चर्चा चल रही थी। किस प्रकार के विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं, उनका प्रस्तुतिकरण इस ढंग का हो रहा है कि कई बार अपने आसपास से भी आँखें चुराना पड़ता है।
एक महानगर का हाल बतायें। वहाँ एक नर्सिंग होम के ऊपर बड़ा सा बोर्ड टँगा देखा जिस पर लगा विज्ञापन कुछ इस तरह का संदेश देता दिखा-क्या आप माहवारी से परेशान हैं? आप वाकई गर्भाशय निकलवाना चाहतीं हैं?..... आगे और भी कई लाइन लिखीं थीं जो स्पष्ट रूप से यही साबित करने का प्रयास कर रहीं थीं कि आप (महिलायें) प्रति माह होने वाली माहवारी से परेशान हैं तो अपना गर्भाशय निकलवा लें।
इसके अलावा और भी बहुत से विज्ञापन टी0वी0 और प्रिंट मीडिया के माध्यम से हमारी आँखों के सामने से गुजरते हैं जो सही बात को तो सही सिद्ध करते हैं कई बार गलत बात को भी सही सिद्ध करने का प्रयास करते दिखते हैं।
आपस की चर्चा के दौरान हमने एक पुरानी छोटी सी कहानी सुनाई जो विज्ञापन की सत्यता पर एक अच्छा खासा कमेंट है। हम इसे जितनी बार भी सुनाते हैं उतनी बार ही मजा आता है। आप भी सुन लीजिए इस बार ये कहानी-

मृत्युलोक से मर कर एक आदमी यमराज के सामने उपस्थित हुआ। यमराज ने चित्रगुप्त जी से उसका लेखा-जोखा माँगा तो चित्रगुप्त जी ने बताया कि महाराज आप भूल रहे हैं। अब लोकतन्त्र है, अब आपके हाथ में नहीं है कि किसे स्वर्ग भेजना है और किसे नर्क? अब यह तो आदमी तय करेगा कि उसे जाना कहाँ है? मानवाधिकार का सवाल जो है। चित्रगुप्त जी के ऐसा बताने पर यमराज ने कहा कि ठीक है इस आदमी के ऊपर ही छोड़ दो कि इसे स्वर्ग चाहिए या नर्क?
आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि महाराज हमें एक बार स्वर्ग तथा नरक दोनों जगह दिखा दो। हम देखने के बाद ही फैसला करेंगे कि हमें कहाँ जाना है?
यमराज ने कहा कि ठीक है लोकतन्त्र में सभी की बात सुनी जाती है तो इस आदमी की बात को सुना जाये। उस आदमी को स्वर्ग तथा नर्क दिखाने का इन्तजाम किया गया।
पहले स्वर्ग देखने की इच्छा के कारण उसको स्वर्ग दिखाया गया। उस आदमी ने देखा कि स्वर्ग में अप्सरायें भी हैं, परियाँ भी हैं। कुछ जवान हैं, कुछ वृद्ध हैं। सारे सुख हैं, सुविधायें हैं पर थोड़ी कमी सी है। कारें चल रहीं हैं पर बिना एसी की हैं। बँगले बने हैं पर ठीक से साफ नहीं हैं। हर तरह के ऐशोआराम हैं। इसके बाद भी कुछ न कुछ कमी भी है।
अब आदमी ने नरक की तरफ प्रस्थान किया। देखा कि वहाँ परियाँ, हूरें तो नहीं हैं पर सभी सेवा करने वालीं दासियाँ स्मार्ट हैं, जो नौकर भी काम कर रहे हैं वे बिना किसी आलस के मुस्तैद हैं। इधर भी कारें चल रहीं हैं। बड़े-बड़े भवन बने हैं। लोगों के काम करने में उत्साह है। कहीं भी किसी के साथ मारपीट नहीं की जा रही है। किसी को खौलते कड़ाहे में उबाला नहीं जा रहा है। किसी को आरी से काटा नहीं जा रहा है। कुल मिला कर सभी सुख-सुविधायें दिख रहीं थीं।
आदमी ने बापस आकर यमराज से पूछा सरकार नरक में भी इतनी सुविधायें क्यों? यमराज ने कहा आजकल मानवाधिकार वाले परेशान करने लगे हैं। अल्पसंख्यक आयोग परेशान करता है। राजनेता परेशान करते हैं। सबसे बचने के लिए अब हमने नरक में यातनायें देना बन्द कर दिया है। अब यहाँ भी हमको सुख-सुविधाओं का ध्यान देना होता है।
उस आदमी ने स्वर्ग-नरक की सुविधाओं की आपस में तुलना करके यमराज से कहा कि महाराज हमें नरक में भेज दो। यमराज ने कहा सोच लो फिर न कहना। बापसी का कोई प्रावधान नहीं है। आदमी ने बिना किसी संशय के नरक में जाना स्वीकार किया।
यमरारज के कहने पर उसको नरक में डाल दिया गया। जैसे ही वह नरक के भीतर पहुँचा देखता क्या है जगह-जगह खौलते तेल के कड़ाहे चढ़े हैं, जिनमें आदमी खौल रहे हैं। पापियों को आरी से काटा जा रहा है। किसी को हाथियों से कुचला जा रहा है। हर तरफ चीख पुकार मची है।
यह देख आदमी घबरा गया। उसने चिल्ला कर यमराज को पुकारा और कहा महाराज ये तो हमारे साथ धोखा है। नरक जैसा दिखाया गया था वैसा नहीं है।
यमराज ने कहा कि ये असलियत है, जो तुमको दिखाया गया था वो तो विज्ञापन था। यदि ऐसा न करें तो नरक में आयेगा कौन और स्वर्ग में भी तुम जैसे पापी इकट्ठा हो जायेंगे।।