चलो अच्छा है बाजारवाद के खिलाफ एक माहौल बन रहा है... भले ही फेसबुक पर बन रहा
हो. वैसे बाजार वो स्थिति है जिसने बड़े-बड़े आन्दोलनों को निगल लिया. बड़े-बड़े आन्दोलनों
की दिशा को बदल दिया. पहली बात ये कि बाजारवाद है क्या? क्या महज सौन्दर्य प्रसाधन बेचना ही बाजारवाद है?
क्या वस्तु के सापेक्ष स्त्री को खड़ा कर
देना बाजारवाद है? क्या महज सात
दिनों में गोरा बना देने का दावा बाजारवाद है? क्या एक-एक बालों की सफेदी को रंगों में लिपटा लेना बाजारवाद
है? क्या माँ के स्तनपान की जगह
पर बाजारू दूध बच्चे को पिला देना बाजारवाद है? क्या मेरे कपड़े तेरे कपड़ों से सफ़ेद दिखा देना बाजारवाद
है? क्या हवन-पूजन के समय सेक्स की याद करते हुए कंडोम का फ्लेवर याद
कर लेना बाजारवाद है? आखिर बाजारवाद
का विरोध करते लोग/लुगाइयां भी बताएं कि बाजारवाद क्या है?
यदि बाजारवाद का विरोध लिपस्टिक, काजल, बिंदी, मस्कारा, आई-लाइनर, फाउंडेशन, नेल पोलिश आदि न
लगाना है तो विशुद्ध ड्रामा है ये. किसी साबुन, क्रीम, लोशन के सहारे चेहरे की झुर्रियों को छिपाने की कला भी नेचुरल नहीं है. बालों की
सफेदी में कालिख पोतना भी नेचुरल नहीं है. सुबह जगाने से लेकर रात सोने तक अनेकानेक
रूप में चेहरे को प्रयोगशाला बना देना नेचुरल नहीं है. बाकी का सेल्फी के नाम पर कुछ
भी हो मगर नेचुरल नहीं है. हो सकता है बहुतों को ये पोस्ट स्त्री-विरोधी लगे मगर इसे
पढ़ने के बाद एक बार जब बेशिन के सामने खड़े होकर कोई फेसवाश लगाया जाये, चेहरे की झुर्रियों पर उँगलियों को फिराया जाये,
बालों की सफेदी को दूर करने के लिए कोई
नेचुरल कलर घोला जाने लगे तो याद करियेगा कि कहीं इसी नेचुरल कलर की तरह आपकी सेल्फी
भी तो नेचुरल नहीं?
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