पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में
फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने
की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर
परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक
कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ
बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों
के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है
कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की
अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये
तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और
बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.
दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव
में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में
उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है.
सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने
लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और
बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ
ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर
व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई
देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ
और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर
व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान
में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.
सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में
व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया
को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता,
सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के
भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत
देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के
भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की
नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता
के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा
किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा
की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता
ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.
नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता,
हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए
जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि
कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन
घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम
होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए
समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान,
इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का
सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में
मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.
समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन
कौशल, संवेगात्मक बुद्धि
पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब
भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की
गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और
संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों
से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज
का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी
दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके
अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे?

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