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20 जनवरी 2023

सुख से ज्यादा दुःख का स्थायी भाव है

आये दिन एक उदाहरण भरी कहानी सामने से गुजरती है, जिसमें एक व्यक्ति कुछ सीख देने का प्रयास कर रहा है. वह अपने सामने बैठे लोगों को एक बोर्ड दिखाते हुए पूछता है कि उनको क्या दिख रहा है? बोर्ड सफ़ेद रंग का है और उसमें छोटा सा एक काला बिन्दु बना हुआ है. भीड़ में से बहुसंख्यक लोग काला बिन्दु दिखाई देना बताते हैं. तब वह व्यक्ति इसे नकारात्मक मानसिकता का परिचायक बताते हुए कहता है कि किसी को भी इतना बड़ा सफ़ेद बोर्ड नहीं दिखाई दिया जबकि एक छोटा सा काला बिन्दु सबने देख लिया. संभव है कि उस व्यक्ति की दृष्टि में ऐसा सही हो, एक बहुत बड़े सफ़ेद बोर्ड के बीच एक छोटा सा काला बिन्दु ही देखना नकारात्मक मानसिकता का सूचक हो किन्तु यही एकमात्र सत्य हो, ऐसा नहीं है.




यह एक मानवीय स्वभाव है कि वह सकारात्मकता की जगह पर नकारात्मकता में बहुत जल्दी घिर जाता है. किसी भी व्यक्ति का मन, दिल-दिमाग सकारात्मक घटनाओं के प्रति उतनी तेजी से नहीं सोच पाता है जितनी तेजी से वह नकारात्मक घटनाओं के प्रति सोचने लगता है. यह लगभग सभी लोगों के साथ हुआ होगा, घर का कोई व्यक्ति किसी काम से यदि बाहर जाता है और यदि वह निश्चित समयावधि में वापस नहीं लौटता है तो मन बजाय सकारात्मक सोचने के नकारात्मक ही सोचने लगता है. इस सन्दर्भ में मन को, दिल को कितना भी समझाया जाये किन्तु वह नकारात्मकता की तरफ ही मुड़ जाता है. ऐसा अकेले सोचने के सन्दर्भ में ही नहीं होता है बल्कि हमारे दिल-दिमाग में दुखद घटनाएँ, दुःख भरी यादें ज्यादा गहराई से छाई रहती हैं. खुशियों से भरी बातें, सुख भरे समय की यादें स्थायी रूप से अपना स्थान नहीं बना पाती हैं जबकि दुखी करने वाली ऐसी बातें जैसे स्थायी रूप से दिल-दिमाग में बस जाती हैं.


ये बातें किसी भी रूप में नकारात्मकता को प्रदर्शित नहीं करती हैं बल्कि ये मानवीय स्वभाव का चित्र खींचती हैं. मानवीय स्वभाव में ही कुछ इस तरह की भावनात्मकता छिपी हुई है जो सुख के बजाय दुःख के प्रति जल्दी आकर्षित होती है. समाज में भी यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति, उसक सुख आकर्षित करता है तो उससे ज्यादा तेजी से किसी भी व्यक्ति का दुःख, उसका कष्ट ध्यान खींचता है. निश्चित ही यह नकारात्मकता का नहीं बल्कि करुणा का द्योतक है. दुखों के प्रति, कष्ट के प्रति सहज रूप में ध्यान चले जाने के रूप में ही सफ़ेद बोर्ड में एक छोटे से काले बिन्दु का ध्यान आकर्षित कर लेना है. यहाँ बजाय नकारात्मकता के इसे मानवीय स्वभाव के रूप में समझने की आवश्यकता है.   





 

22 सितंबर 2022

हम खुद पैदा करते हैं दुःख, कष्ट

प्रसन्न रहना भी दूसरे लोगों के लिए परेशानी का कारण बनता है. उनको इसी बात पर समस्या हो जाती है कि अगला व्यक्ति खुश कैसे है? किस तरह हँस लेता है? ऐसा नहीं होता कि जो व्यक्ति खुश दिख रहा है, हँस रहा है उसके पास समस्याएँ नहीं अथवा वह किसी बात पर दुखी नहीं. हँसते-मुस्कुराते व्यक्ति के पास भी उसी तरह की समस्याएँ हो सकती हैं जैसी कि अन्य व्यक्ति के पास हो सकती हैं. समस्याओं का होना और समस्याओं के होने के बाद भी हँसते-मुस्कुराते हुए कार्य को करते रहना दो अलग-अलग बातें हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास कष्ट नहीं हैं, हमारे पास समस्याएँ नहीं हैं मगर बचपन से एक आदत रही है, किसी भी परेशानी में अपना धैर्य न खोने की, अपना विश्वास न खोने की. इसी के चलते बड़ी सहजता से किसी भी तरह की परेशानी, किसी भी तरह के कष्ट से बाहर निकलने का रास्ता निकल आता है.


लोग अक्सर कुछ निश्चित से सवाल हमसे पूछते रहते हैं. उन सवालों में हमें कभी टेंशन में न देखने की बात होती है. उनके सवालों में हमेशा हमारे चेहरे पर हँसी के भाव बने रहने का कारण होता है. उनके प्रश्न हमारी समस्याओं, कष्टों आदि से सम्बंधित होते हैं. यदि हम ये कहें कि हमें किसी तरह का कष्ट नहीं या फिर हम दुखी नहीं होते तो यह नितांत झूठ होगा. हम भी एक साधारण से इन्सान हैं, हमारी भी भावनाएँ हैं, हमारी भी इच्छाएँ हैं और उन्हीं के चलते हमें भी किसी आम आदमी की तरह कष्ट होता है, हम भी दुखी होते हैं. जैसी कि आदत रही है, उसके अनुसार अपने कष्टों, अपने दुखों, अपनी समस्याओं को अपने तक सीमित रखते हुए उनको दूर करने का प्रयास करते हैं.




यहाँ दुखों, कष्टों, समस्याओं को दूर करने, उनसे मुकाबला करने की बात से पहले यह समझना आवश्यक है कि हम सबके दुःख का, कष्ट का कारण क्या रहता है? बहुत से कष्ट और समस्याएँ ऐसे होते हैं जो हम स्वतः बना लेते हैं या कहें कि खुद ही उनको जन्म देते हैं. इसके पीछे दूसरे लोगों से हमारी अपनी अपेक्षा का बना होना होता है. हम सभी किसी न किसी रूप में दूसरों से अपेक्षाएँ पाले होते हैं. चूँकि सभी व्यक्तियों की अपनी-अपनी सीमायें हैं, अपने-अपने अधिकार हैं, ऐसे में अक्सर अपेक्षाओं का पूरा न हो पाना हम सबके लिए कष्ट का विषय बनता है. इसी तरह बहुत बार हम आने वाले समय में होने वाली किसी भी घटना की कल्पना करके भी परेशान होते हैं. अभी जो घटना हुई नहीं होती है, उसके बारे में काल्पनिक बातें सोचते-सोचते खुद को कष्ट में डाल देते हैं. कई बार किसी भी समस्या के सामने आ जाने के बाद लोग धैर्य खो देते हैं, ऐसे में वे उस स्थिति को और भी अधिक परेशानी भरा बना देते हैं. इसके चलते भी व्यक्ति अक्सर दुःख का, कष्ट का शिकार हो जाता है. ऐसी घटनाओं के अलावा बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो आकस्मिक रूप से होती हैं. अक्सर हम सभी ऐसी घटनाओं-दुर्घटनाओं के लिए किसी देवीय शक्ति को जिम्मेवार मान लेते हैं. कई बार कुछ घटनाओं के लिए प्राकृतिक आपदा भी जिम्मेवार होती है. ऐसी घटनाओं से उत्पन्न दुःख और कष्ट आदि को भी मनुष्य सहता है.


किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट आदि के सम्बन्ध में एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जो बात हम सबके हाथ में है, उसके लिए किसी भी तरह से परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में है, उसका करना हमारे हाथ में है. इसके उलट ऐसी कोई बात जिसका किया जाना हमारे हाथ में नहीं है तो उसके बारे में सोचा-विचारी नहीं करनी चाहिए, उसके बारे में परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसका नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं है. लगभग सभी लोगों की आदत होती है कि लोग ऐसी बातों के लिए भी परेशान होते हैं जो उनके हाथ में होते हैं और कुछ लोग उन बातों को अपने लिए समस्या बनाये रखते हैं, जो उनके नियंत्रण में नहीं होते हैं.


इन सबके अलावा एक बात विशेष रूप से याद रखनी चाहिए कि हम सभी को अपेक्षाओं के दायरे से बाहर रहना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार, अपने सहकर्मी अथवा अन्य किसी भी परिचित से बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ न करें. उनके ऊपर अपनी विचारधारा को, अपने निर्णयों को थोपने का प्रयास भी न करें. सभी की अपनी जीवन-शैली है, सभी के अपने विचार हैं. ऐसे में उन पर अपने विचारों का थोपा जाना अथवा उसका प्रयास करना भी आपस में मनमुटाव का, आपसी तनाव का कारण बनता है. इससे भी व्यक्ति कष्टों, दुखों का सामना करता है. यह ध्यान रखते हुए कि सभी का जीवन, सभी की जीवन-शैली उसकी अपनी व्यक्तिगत है. उसकी रुचियाँ, उसकी कार्यप्रणाली, उसका स्वभाव उसका अपना है. जिस तरह हम स्वयं को किसी दूसरे के लिए नहीं बदल सकते, ऐसे ही हमें भी किसी दूसरे को अपनी तरह से बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए.


धैर्य, विश्वास, संयम के साथ हँसते-मुस्कुराते हुए जीवन में आगे बढ़ा जायेगा तो किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट, परेशानी भले पास आ जाये मगर हताश, निराश नहीं कर सकेगी. 






 

17 सितंबर 2022

तारीखों का एहसास

तारीखों का भी अपना एक अलग एहसास होता है. किसी भी महीने की किसी भी तारीख को किसी ऐसी घटना के घटित होने पर, जो व्यक्ति के दिल-दिमाग पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है, वह तारीख प्रत्येक महीने अपने उसी एहसास के साथ सामने आती है. किसी ख़ुशी की घटना के होने के कारण वह तारीख सुखद एहसास दिलाती है और यदि इसके उलट यदि उस तारीख में कुछ सुखद न हुआ हो तो वह तारीख ग़म का एहसास कराती है. कभी-कभी लगता है कि क्या उन तारीखों में किसी तरह की तासीर होती है या फिर उन घटनाओं में, जो सम्बंधित तारीख आने पर उस घटना का एहसास कराती हैं. ऐसा इसलिए दिमाग में आता है कि यदि एक पल को मान लिया जाये कि किसी वैश्विक योजना का अनुपालन करते हुए यदि कैलेण्डर ही बदल दिया जाये, उनकी तारीखों का क्रम बदल दिया जाये अथवा उनको किसी और नाम से परिभाषित कर दिया जाये तो किसी तारीख विशेष में उस दिन घटित घटना का एहसास किस तरह का होगा?




ये सवाल अपने आपमें काल्पनिक ही हैं मगर व्यक्तिगत रूप से हमें लगता है कि किसी भी घटना का घटित होना एक एहसास तो जगाता ही है मगर उसमें सबसे बड़ी भूमिका उस दिन की, उस तारीख की होती है. हम सबने महसूस किया होगा कि कोई भी घटना हमें पूरे माह याद नहीं आती मगर जैसे-जैसे उस तारीख का नजदीक आना होता है, तो वह घटना बहुत तेजी से अपना एहसास जगाती रहती है. इसके पीछे संभवतः उस तारीख के रूप में उस घटना का केन्द्रित किया जाना प्रमुख हो. देखा जाये तो कैलेण्डर, तिथियाँ आदि का निर्माण ही किसी भी घटना को याद रखने के लिए किया गया होगा. इन्हीं के आधार पर हम सभी अच्छी-बुरी घटनाओं को याद रखते हैं.


तारीखों का होना हम सबके जीवन में एक अलग तरह का एहसास जगाना है. इसमें भी यदि किसी एक ही तारीख को किसी एक ही व्यक्ति के साथ अच्छी और बुरी घटना का जुड़ना एकसाथ हो जाये तो उसके एहसासों में अलग तरह की लहरों का उठना-गिरना होता है. इसमें भी उस तारीख की ही भूमिका प्रमुख होती है. 




 

30 दिसंबर 2021

वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास हो

जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता, ये सन्दर्भ सदैव से व्यक्ति के इस धरा से हमेशा के लिए चले जाने के सन्दर्भ में की जाती है. यह सच भी है क्योंकि इंसानी विकास यात्रा में उसके द्वारा तमाम तरह के नए-नए आविष्कार किये गए, नए-नए मानक स्थापित किये गए, अनेक असाध्य बीमारियों का निदान उसके द्वारा निकाला गया मगर एक मृत्यु ही ऐसी है जिस पर इंसानों की तमाम सारी कोशिशों के बाद भी विजय प्राप्त नहीं की जा सकी. जिस तरह से इंसान मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सका है, तमाम सारी कोशिशों के बाद भी, वैज्ञानिक, चिकित्सकीय उपकरणों के होने के बाद भी मृत्यु को रोका नहीं जा सका है, ठीक उसी तरह से समय को नहीं रोका जा सका है. गुजरे समय को वापस नहीं लाया जा सका है.




ये वर्तमान वर्ष 2021 का अत्यंत अंतिम दौर है. एक-दो दिन इसके गुजर जाने में शेष हैं, ऐसे में बहुतायत लोग इस वर्ष के जाने की और नए साल के आने की बात करते दिख रहे हैं. इस साल ने अपने पूर्ववर्ती वर्ष 2020 की तरह ही कोरोना की भयावहता को बनाये रखा. इधर ऐसा दिखाई दे रहा है, जैसे वर्ष 2020 को जल्दी से जल्दी जाने की बात लोग करते दिखाई दे रहे थे, कुछ ऐसा ही इस साल में दिखाई दे रहा है. समय के जल्द से जल्द जाने की इच्छा उसी समय की जाती है जबकि उस समय से प्रसन्नता न मिले, ख़ुशी न मिले. कुछ ऐसा ही इस जाते हुए वर्ष के साथ हुआ है. इस साल में कोरोना की दूसरी लहर ने जबरदस्त भयावहता फैलाई. यद्यपि इस लहर की समयावधि कम रही तथापि जितनी देर उसकी उपस्थिति रही लोगों को डराती ही रही, लोगों को मौत के आगोश में भेजती रही.


ये साल चला जायेगा, भले रूप में या बुरे रूप में ये और बात है. जाते हुए समय को कोई रोक नहीं पाया है, जाने वाले समय को कोई वापस भी नहीं ला सका है. ऐसे में बुरे समय के जल्दी गुजरने वाली बात हो या फिर अच्छे समय को रोके रखने की इच्छा, ये एक काल्पनिक स्थिति है. बुरे समय को न तो जल्दी भगाया जा सकता है और न ही अच्छे समय को आहूत अधिक रोका जा सकता है. समय का अपना ही एक निर्धारण है, जिसके अनुसार उसका आना और जाना लगा रहता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यदि समय अच्छे से गुजारा जाए, उसमें खुशियों को समाहित किया जाये तो वह बिना किसी कष्ट के बीत जाता है. इसके उलट कई बार समय ही कष्ट दे जाता है, समय ही दुःख दे जाता है बस उसी समय से कैसे भी निपटा नहीं जा सकता है. समय के हाथों मिलने वाले दुःख या कष्ट का कोई निदान नहीं, सिवाय इसके कि आने वाले समय की महत्ता समझी जाये और वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास किया जाये.


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09 जुलाई 2021

सकारात्मकता अत्यावश्यक है जीवन में

खुशी हो या गम सभी समय के हाथ में रहते हैं। यह किसी व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह अपने साथ घटित होने वाले अच्छे या बुरे घटनाक्रम से किस प्रकार से निपटता है। यह सही बात है कि बुरी घटनाएं व्यक्ति को झकझोर देती हैं। यह हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है कि वह बुरी घटनाओं के प्रभाव से सहजता से बाहर निकल सके किंतु व्यक्ति को इस प्रकार से अपने आप को संतुलित करना चाहिए कि वह खुद को बुरी घटनाओं के प्रभाव से बाहर निकाल सके।


हम सभी के जीवन में इस प्रकार के उदाहरण सामने आते रहते हैं कि उनके द्वारा पता चलता है कि लोग खुद को दुख से बाहर निकाल कर सुख की तरफ बढ़ रहे हैं। यह सत्य है कि किसी भी व्यक्ति का दुख उसका व्यक्तिगत होता और उसके साथ के लोग निश्चित ही उसका दुख बांटने का काम करते हैं। इसके बाद भी यह देखने में आता है कि एक समयसीमा के बाद लोग ऐसे व्यक्तियों का साथ देने से बचने लगते हैं जो 24 घंटे सिर्फ रोने का, अपने दुख को दिखाने का काम करते रहते हैं। हम सभी को यह समझना चाहिए कि इस संसार में पूर्णरूप से सुखी अथवा प्रसन्न कोई भी नहीं है, हर एक व्यक्ति के साथ तमाम सारे सुखों के बीच कोई ना कोई दुख लगा रहता है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने दुख को भूलकर यदि सामने वाले की दुख में का साथ दे रहा है तो यह बड़ी बात है।


दुख में साथ देने की स्थिति के बाद भी एक स्थिति ऐसी आती है जबकि साथ देने वाला व्यक्ति भी दूसरे के दुख से खुद को परेशान महसूस करने लगता है। इसके पीछे का कारण सामने वाले का सिर्फ दुख भरी बातें करना, अपने कष्टों को बताते रहना आदि रहता है। सिर्फ और सिर्फ अपने दुखों को बताते रहना, मिलने वाले से अपने कष्टों की चर्चा करते रहना कहीं ना कहीं मिलने वालों की संख्या में कमी करता है। परेशान व्यक्तियों को चाहिए कि वे इस बात को समझें कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दुखों को पीछे रखकर उसके दुखों को बांटने का काम कर रहा है। इसलिए जो व्यक्ति उसके साथ है उसके दुखों, सुखों का भी ख्याल रखना चाहिए। 


दुख का वातावरण नकारात्मकता पैदा करता है इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपने आसपास बहुत देर तक अथवा बहुत दिनों तक दुख जैसी स्थिति को बनाए रखना से बचना चाहिए। नकारात्मकता के उस माहौल से व्यक्ति स्वयं भी परेशान होता है और अपने मिलने वाले व्यक्तियों को भी परेशान करता है। दुख की नकारात्मकता के बीच सुख अथवा प्रसन्नता सकारात्मकता पैदा करता है। परेशानी की स्थिति में भी यदि व्यक्ति अपने आसपास सकारात्मक माहौल बनाए रखें तो वह स्वयं अपने दुखों से बहुत हद तक खुद को बाहर निकाल लेता है। इसके अलावा उसके आसपास की सकारात्मकता उसमें ऊर्जा का संचार करती है जिसके द्वारा वह ना केवल खुद को स्फूर्तिवान और प्रसन्न महसूस करता है बल्कि अपने मिलने-जुलने वालों को भी खुशी देता है। दुख के बीच अपने आसपास खुशी का वातावरण सृजित करना प्रत्येक के वश की बात नहीं है किंतु माहौल को नकारात्मकता से बचाने के लिए ऐसा करना अत्यावश्यक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने आसपास किसी भी रूप में नकारात्मकता, दुख अथवा परेशानी को बहुत लंबे समय तक न बना रहने दे।


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09 मई 2021

दुःख का पोषण करने की मानसिकता

दुःख, ये शब्द ऐसा है जिसको समाज में खूब व्याख्यायित किया गया है. दुःख को मानव जीवन के लिए कर्मों का आधार माना गया है. एक तरह का आवश्यक अंग माना गया है दुःख को. हिन्दी साहित्य में भी भक्ति से सम्बंधित साहित्य में दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है. कहीं दुःख को चिर-स्थायी दोस्त बताया गया है, कहीं बिना दुःख के जिंदगी की सच्चाई का पता न चलने की बात कही गई है. दुःख को भले ही किसी ने दो पल का माना हो मगर उसी के सहारे अपने और पराये की पहचान होना भी बताया है. इसे धार्मिक अथवा साहित्यिक विचारों का प्रभाव कहेंगे या कुछ और कि बहुधा लोगों को अपने दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताते देखा है. हमारे जितना दुःख किसी और को होता तो मर जाता, तुम क्या जानो दर्द किसे कहते हैं, ज़माने का सारा दुख हमारे हिस्से ही आया है, ज़िन्दगी भर दुःख ही तो सहा है, जितना कष्ट उठा लिया उससे ज्यादा कोई क्या देगा... आदि वाक्य आये दिन आप भी लोगों के मुँह से सुनते होंगे.


दुःख किसी न किसी रूप में सबसे साथ जुड़े होते हैं पर हमें सिर्फ अपने दुःख ही क्यों सबसे बड़े लगते हैं? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही दुःख को हम किसी दूसरे के दुःख पर आरोपित करना चाहते हैं? हो सकता है कि ऐसा उस स्थिति में होता हो जबकि हम अपने दुःख में नितांत अकेले बैठे हों. कष्ट, समस्या, दुःख किसी भी रूप में किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का कारक नहीं बनते. उनके होने पर किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति नहीं होती है. इसके बाद भी ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति अपने कष्टों, अपने दुखों को लगभग पालने-पोसने का काम करते हैं. किसी न किसी तरह, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में समाज में अपने दुःख को प्रकट करने का अवकाश खोजते हैं.




आम आदमी हो अथवा कोई ख़ास, सभी अपने दुःख को ही विशिष्ट मानते-बताते हैं. उनके लिए दूसरे के दुःख से कोई सरोकार नहीं. ऐसे लोगों में कोई अपने शारीरिक कष्टों का दुःख अत्यंत विकटता के साथ प्रकट करता है. कोई मानसिक कष्टों को सर्वाधिक दुखद बताते हुए अपने आपको संसार का एकमात्र दुखी प्राणी सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है. किसी को दुःख का कारण नहीं ज्ञात, उसका आधार नहीं ज्ञात मगर इसके बाद भी उसका दुःख सभी के दुःख से बहुत-बहुत बड़ा होता है. ऐसे लोग दुःख के माध्यम से लोगों की सहानुभूति बटोरने की मानसिकता से काम तो करते ही हैं साथ ही अपने आपको अपने साथ के बाकी लोगों से कहीं ऊपर मानने-मनवाने का जतन भी करते दिखाई देते हैं. ऐसे लोग जो बात-बात में अपने दुःख का रोना रोते हैं, अपने दुःख को ही सबसे बड़ा और कष्टप्रद बताते नहीं थकते हैं.


अनेकानेक मामलों में ऐसा महसूस होता है जैसे लोग दुखों को आत्मसात कर उनका पोषण करते रहते हैं. यह आमतौर पर देखने में आता है कि किसी तिथि विशेष पर व्यक्ति को उसका सुख जितना प्रसन्न करता है उससे कहीं अधिक किसी तिथि विशेष पर मिला हुआ दुःख ज्यादा दुखी करता है. इसे समझने की आवश्यकता है कि किसी व्यक्ति के जीवन में उसके सुख पर दुःख आजीवन कैसे और क्यों आक्षेपित हो जाता है? व्यक्ति समाज का एक हिस्सा है, उसी के द्वारा समाज का निर्माण हुआ है. ऐसे में सभी व्यक्तियों का दायित्व बनता है कि वे एक-दूसरे के साथ तारतम्यता बनाये रखें, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाये रहें. यदि व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होता है तो वह एक-दूसरे के सुखों का आनंद भी उठा सकता है, एक-दूसरे के दुखों, कष्टों, समस्याओं को भी मिलकर सुलझा सकता है. मिलजुल कर रहने के कारण, सामूहिकता की भावना होने के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना कष्ट किसी दूसरे के कष्ट के आगे बहुत बड़ा नहीं लगेगा. कष्ट की, समस्या की स्थिति में वह हमेशा दूसरे के कष्टों को, समस्याओं को दूर करने के लिए आगे ही आगे रहेगा. इससे व्यक्ति को समझ में आएगा कि समाज में एकमात्र वही नहीं है जिसके पास समस्याएं हैं, कष्ट हैं. उसके जैसे, उससे बुरी स्थिति में बहुत से लोग हैं जो कष्टों में, समस्याओं में रहने के बाद भी अपने जीवन को सहजता से संचालित कर रहे हैं. 


व्यक्ति को अपनी गंभीरता, अपने धैर्य, अपनी हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. इनके द्वारा वह आत्मविश्वास में वृद्धि करता रहता है. इसी आत्मविश्वास के चलते वह सदैव कष्टों पर विजय पा सकता है, समस्याओं का समाधान खोज सकता है, दुखों से मुक्ति पा सकता है. बस उसे ध्यान रखना होगा कि उससे ज्यादा कष्ट वाले, समस्या वाले इस समाज में हैं. उसे ध्यान रखना होगा कि उसके पास आत्मविश्वास है जो उसे हारने नहीं देगा. दुःख हो अथवा सुख दोनों ही परिस्थितिजन्य होते हैं. परिस्थितियाँ कभी एक जैसी नहीं रहतीं ऐसे में परिस्थितियों के बदलने का प्रयास करना चाहिए अथवा उनके बदलने का इंतजार करना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं हो रहा है तब तक भी और आगे भी जीवन में आये सुखों के पलों के साथ विश्वास बनाये रखते हुए दुखों को कम करने का, दुखों को भूलने का काम करना चाहिए. यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि दुखों का लगातार मन-मष्तिष्क में बने रहना व्यक्ति की कार्य-क्षमता को, उसकी जीवन-शैली को, उसकी पारिवारिकता को, उसकी सामाजिकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है. इसके विपरीत सुख व्यक्ति में उत्साह भरते हैं, उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं, उसके मनोबल को बढ़ाते हैं. विश्वास के सहारे दुखों पर विजय प्राप्त करते हुए उन्हें सुखों में परिवर्तित करना व्यक्ति का ध्येय होना चाहिए, उसका कर्म होना चाहिए. 


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30 दिसंबर 2020

जाते की विदाई आते का स्वागत, बाकी तो समय के हाथ है

इस वर्ष, 2020 का आज अंतिम दूसरा दिन, सेकेण्ड लास्ट डे है. पिछले कई दिनों से बहुत से मित्रों, परिचितों के सन्देश मिल रहे हैं जिसमें इस साल के बारे में उनके विचार पढ़ने को मिल रहे हैं. ये इंसानी फितरत होती है कि इन्सान अपने मनोभावों को तत्कालीन सन्दर्भों से जोड़कर व्यक्त करता है. कुछ ऐसा ही लगभग सभी के विचारों में देखने को मिला. वर्तमान में कोरोना-कोरोना ही सबके दिल-दिमाग में छाया हुआ है. कहीं की भी बात की जाये वो लौट-फिर कर कोरोना पर आकर टिक जाती है. किसी से मुलाकात हो या फिर फोन से बातचीत हो सबकी बातों का केंद्र सिर्फ कोरोना ही रहता है. ऐसा ही संदेशों में आते विचारों में देखने को मिला.


ये सच है कि वर्ष 2020 को कोरना ने पूरी तरह से अपनी जकड़न में ले रखा है. इसके उलट यदि एक बार समूचे वर्ष को देखें तो ऐसी जकड़ उन दिनों में ज्यादा देखने को मिली जबकि लॉकडाउन लगा हुआ था. अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जैसे-जैसे आज़ादी मिलती रही, काम करने की अनुमति मिलती रही, बहुत सी छूटें मिलती रहीं उनके बाद जिस तरह से लोगों की भीड़ सड़क पर देखने को मिल रही है, जिस तरह से लोग बिना किसी भय के अपने-अपने काम पर लगे हुए हैं उसे देखकर लगता नहीं कि अब कोरोना का वह डर लोगों में है. यह भी मानसिकता का खेल है. पिछले दिनों अपने एक परिचित के सामान्य बीमार होने पर उनसे बात करने पर पता चला कि वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनको शंका थी कि भले ही उनकी कोरोना टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है मगर उनको कोरोना ही है. इसी कारण वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनकी सोच से उलट उनकी मेडिकल रिपोर्ट में उनको टायफाइड बताया गया था. क्या कहेंगे आप, क्या इस कोरोना काल के पहले टायफायड होने की दशा में कमजोरी नहीं होती थी? क्या किसी बीमारी में कमजोरी आना इसी साल से हुआ है?




कुछ इसी तरह की मानसिकता ने सबके भीतर एक अज्ञात भय पैदा कर रखा है. किसी भी तरह की शारीरिक समस्या आने पर, कोई भी बीमारी आने पर वे उसे कोरोना से जोड़ दे रहे हैं. इस तरह की सोच, ऐसा मानसिकता अब अपने आपमें एक बीमारी है. अकारण किसी बात के लिए परेशान रहना, सबको परेशान करना कहीं से भी उचित नहीं. हाँ, किसी भी हमले के लिए, किसी भी रोग से बचने के लिए सतर्क रहना, सुरक्षित रहना एक आवश्यक कदम है मगर सिर्फ और सिर्फ किसी एक बीमारी से डर कर किसी भी कदम को उसी से जोड़ देना बुद्धिमानी नहीं.


यह साल सबके लिए अपने-अपने हिसाब से अच्छा गुजरा. किसी के लिए बुरा, किसी के लिए अच्छा. क्या आपने इससे पहले इतना लम्बा समय अपने परिजनों के साथ बिताया था? क्या इससे पहले आपको अपने शौक, जो कहीं दबे हुए थे, पूरे करने का अवसर कभी मिला है? नुकसान बहुत से लोगों को हुआ है, बहुत से लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा, बहुत से लोगों के परिजन सदा-सदा को उनसे दूर हो गए, बहुत से लोगों ने कोरोना बीमारी का हमला झेला है मगर इसके साथ-साथ बहुत से लोगों ने अपने दूर हो चुके परिजनों को भी पाया है, बहुत से लोगों को इसी काल में नौकरी भी मिली है, बहुत से लोगों को इसी कालखंड में अपना नया रोजगार ज़माने का अवसर मिला है. इसी एक साल का नहीं, बीते प्रत्येक साल का हिसाब-किताब करिए और उसमें अच्छे-बुरे का, लाभ-हानि का, सुख-दुःख का आकलन करिए. इसके बाद तय करिए कि क्या ये साल सिर्फ और सिर्फ बुरा ही गुजरा? उसके बाद ही विचार करिए कि इस जाते साल ने सिर्फ और सिर्फ कष्ट ही दिए हैं?


जाने वाले को विदा करिए और आने वाले का स्वागत करिए. बाकी सब तो समय के हाथ में है, भविष्य के गर्भ में है.


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वंदेमातरम्

18 दिसंबर 2020

परछाई बनने, बनाने से बचना चाहिए

अकसर कहने-सुनने में आता है कि अँधेरे में परछाई भी साथ छोड़ देती है। इसका सीधा सा अर्थ इस बात से लगाया जाता है कि लोग मुश्किल समय में, किसी कठिनाई में साथ छोड़ देते हैं।  ऐसा सत्य भी है मगर यही अंतिम सत्य नहीं है। कठिनाई में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो लोगों की ताकत बनकर उनके साथ हमेशा खड़े रहते हैं। जहाँ तक परछाई का अँधेरे में साथ छोड़ने का अर्थ है या किसी व्यक्ति का मुश्किल में साथ न देने का विषय है तो उस पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। समझना चाहिए कि क्या किसी व्यक्ति की परछाई उसका अपना निर्माण है या परिस्थिति का निर्माण है? यह भी समझने की बात है कि कोई भी परछाई कब उसके साथ रहती है? परछाई अँधेरे में साथ छोड़ देती है या रोशनी में ही बनती है, ये दो बिन्दु मनन करने योग्य हैं। 

किसी भी व्यक्ति को समझना चाहिए कि उसके साथ परछाई की अवधारणा कभी किसी स्थिति में नहीं रही है। परछाई की अवधारणा को स्वीकारने का अर्थ ही है कि अपनी ही ऐसी छवि को स्वीकारना जो परिस्थिति के चलते उत्पन्न होती है। जो परिस्थितिजन्य है उसके उसी अनुरूप साथ रहने, साथ छोड़ देने की मानसिकता बन जाती है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि किसी भी जीव, जन्तु, वस्तु की परछाई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखती है। वह अपनी मूल की नकल मात्र होती है जो रोशनी का साथ पाकर पैदा होती है। मूल की नकल होने के कारण उसकी किसी भी तरह की स्वतन्त्र गतिविधि भी नहीं होती है। उसकी समस्त क्रियाविधि, सभी क्रियाकलाप मूल की नकल मात्र होते हैं। ऐसे में कल्पना कैसे कर ली जाती है कि परछाई सदैव साथ देगी।




यहाँ हर किसी को परछाई की नहीं मित्र की, सहयोगी की, हमसफर की, हमराज की अवधारणा को पुष्ट करना चाहिए। जो परछाई बनकर साथ आएगा, वो परिस्थिति के अनुकूल ही अपना व्यवहार करेगा। इसके उलट जो हमारा मित्र, सहयोगी होगा वो हमारा अपना ही एक रूप होता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे मित्र, सहयोगी परिस्थिति से नहीं बल्कि स्वतः, स्वस्फूर्त प्रेरणा से साथ रहते हैं। ऐसे लोग परछाई नहीं बल्कि हमारा ही रूप होते हैं जो हमारी भावनाओं को, संवेदनाओं को समझते हैं। इनके लिए रोशनी का, अँधेरे का कोई अलग अर्थ नहीं होता है। यही लोग हैं जो न सुख देखकर साथ आते हैं न दुख देखकर साथ छोड़ जाते हैं। 

स्पष्ट है कि हमें परछाई बनाने, बनने से बचना चाहिए। इसके उलट यदि हम प्रतिरूप बनते, बनाते हैं, छवि बनते, बनाते हैं तो कष्ट, समस्या, परेशानी, दुख में कोई हमें छोड़ कर जाएगा और न ही ऐसी स्थिति में हम किसी को छोड़ सकेंगे। 

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वंदेमातरम्

19 जुलाई 2020

यादों का हटाया जाना सहज होता तो....

यादें समय-असमय चली आती हैं, कभी परेशान करने तो कभी प्रसन्न करने. इनको आने के लिए न तो किसी से अनुमति की आवश्यकता होती है और न ही इनके आने का कोई समय निर्धारित होता है. क्या घटना है, क्या स्थिति है, कैसी परिस्थिति है इससे भी कोई लेना-देना नहीं, बस इन यादों का मन हुआ और आकर सामने खड़ी हो जाती हैं. अब जबकि ये समय अनलॉक की स्थिति के बाद भी नितांत अपने आपमें ही व्यतीत हो रहा है तब इन यादों ने जैसे दिल-दिमाग पर अपना ही कब्ज़ा कर रखा है. इस समय जीवनशैली नियमित होने के बाद भी, अनुशासित होने के बाद भी कहीं न कहीं थोड़ी सी अनियमित है, थोड़ी सी अनुशासनहीन है. ऐसे में कोई काम पूर्ण मनोयोग से संपन्न नहीं हो पा रहा है. किसी भी काम को करते समय उससे सम्बंधित किसी न किसी तरह की यादें अपना स्वरूप निर्मित कर लेती हैं.



आज की आईएस तकनीकी भरी दुनिया में बहुत सारे इंस्ट्रूमेंट बाजार में उपलब्ध हैं. इनमें से बहुतों के साथ मेमोरी का चक्कर जुड़ा होता है. कई बार उनको कार्यशील बनाये रखने के लिए पुरानी संग्रहित फाइल्स को हटाना होता है, उसमें जमा पुरानी, अनुपयोगी सामग्री को भी हटाना होता है. कई बार मन में आता है कि ऐसा कुछ दिमाग के साथ, दिल के साथ क्यों नहीं है? क्यों इनके साथ ऐसी कोई प्रक्रिया जुड़ी नहीं है जो दिल-दिमाग को भी फोर्मेट कर दे, उसके भीतर जमा अनुपयोगी, बेकार सामग्री को, यादों को हमेशा के लिए डिलीट कर दे.

ऐसा विचार इसलिए आता है क्योंकि हर एक याद ख़ुशी देती हो ऐसा नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि हर एक याद का अपना कोई महत्त्व हो. बहुत बार लगता है कि दिमाग, दिल बहुत सी ऐसी यादों को अपने में समेटे है जिनका होना सिर्फ दुःख ही देता है. ऐसी बहुत सी यादें हैं जिनका होना सिर्फ दुःख का कारण होता है. लगता है कि यदि उनका हटाया जाना सहज होता तो शायद बहुत से लोगों का जीवन सुखमय हो सकता था.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 दिसंबर 2019

दुःख और सुख की प्रतिद्वंद्विता है जीवन


पिछले साल इन्हीं दिनों एक बहुत बड़े से कार्यक्रम का हिस्सा बने हए थे. उसी समय एक बहुत ही बुरी खबर सुनने को मिली थी. कार्यक्रम में चेहरे पर मुस्कराहट लाकर लोगों से मिलने की विवशता और दिल में उस बुरी खबर के चलते उठती दुःख की लहर. दोनों के बीच संतुलन बैठाना और दोनों स्थितियों के बीच खुद को वर्तमान में लाने की कुशलता हमें खुद में दिखानी थी. दोनों स्थितियों का अपने में तारतम्य ऐसा था जिसमें हम खुद ही किसी न किसी रूप में शामिल थे. इसके बाद भी खुद को स्पष्ट रूप से उसी रूप में ज़ाहिर न कर पाना भी हमारी मजबूरी थी. बुरी खबर ऐसी थी कि एक पल को पैरों के नीचे की जमीन सरक गई. समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हो सकता है. क्यों हमारे साथ ही ऐसी बुरी ख़बरों का, घटनाओं का जुड़ना होता है? उस एक घटना के साथ अपना अतीत अचानक सामने आ गया. कैसे एक-एक घटना के साथ कई-कई घटनाओं का जुड़ना हो जाता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता है. 

आज पूरे एक वर्ष बीत जाने के बाद भी उस एक फोन पर मिली खबर से खुद को अलग नहीं कर सके हैं. बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें कहने के बाद भी नहीं कह सके हैं. अतीत को याद करने का कोई लाभ नहीं मगर बीते दिनों को याद करते हैं तो हम खुद में समझ नहीं पाते हैं कि आखिर हमारे साथ ऐसा क्या था कि आज तक हमारे साथ हमारा सोचा गया काम हुआ नहीं. जो-जो सोचा वो तो कभी हुआ ही नहीं मगर जिसे-जिसे अपने करीब माना उसके साथ भी कहीं न कहीं बुरा ही होता रहा. आज तक समझ नहीं आया कि यदि कोई शक्ति है, परम सत्ता है तो हर बार परीक्षा के लिए हमें ही क्यों चुना जाता है? समझ नहीं सके कि बहुत थोड़ी सी ख़ुशी के बीच बहुत बड़ा दुःख हमारे हिस्से ही क्यों आता है? बहुत बार ऐसा आवश्यक नहीं कि दुख का, कष्ट का सीधे-सीधे सम्बन्ध उसी व्यक्ति से हो मगर उससे कहीं न कहीं व्यक्ति का जुड़ा होना उसे कष्ट देता है.

फिलहाल कष्ट के दिन बीत जाएँ. चेहरे की हँसी, मुस्कान कभी धूमिल न होने पाए. समय ने जिन जिम्मेवारियों से अगले को जोड़ दिया है, वे कभी अधूरी न रहने पायें. हम किस मोड़ पर, किस रूप में, कैसे सहायक, सहयोगी बन सकेंगे हमें खुद नहीं पता मगर हमारी एक-एक साँस, एक-एक पल साथ है. इसी विश्वास के साथ, बिना कुछ कहे, बहुत कुछ.

23 अप्रैल 2019

कैसे भूल जाएँ वो दिन, उस दिन से उपजे कष्ट को


कहते हैं कि दुःख-दर्द को बहुत दिनों तक याद नहीं रखना चाहिए. जीवन में घटित होने वाली कष्टकारी घटनाओं को भी भुला कर आगे बढ़ना चाहिए. जीवन का फलसफा यही होना चाहिए, इसी में ज़िन्दगी का सार भी है. सभी के जीवन में अच्छे-बुरे पलों का आना होता है, सुखद-दुखद घटनाओं का आना होता है. ऐसे में न चाहते हुए भी ऐसी घटनाओं को, ऐसी बातों को व्यक्ति भुला नहीं पाता है जिनके कारण उसे कष्ट हुआ हो, जिन घटनाओं से उसे दर्द मिला हो. इसके बाद भी ऐसी बातों को भूलने की कोशिश करते हुए इन्सान आगे बढ़ता ही रहता है. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि कोई व्यक्ति अपने कष्टों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ता रहता हो. ऐसा भी लगभग न के बराबर देखने को मिलता है जबकि वह सुखद पलों में अपने कष्टों का आरोपण करके सुख की अनुभूति करता हो. कष्टों को, दुखों को भूलना-भुलाना भले ही व्यक्ति के हाथों में हो, उसके वश में हो इसके बाद भी अनेक स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें वह चाहकर भी भुला नहीं पाता है. ऐसा किसी और के साथ नहीं स्वयं हमारे साथ है.


ज़िन्दगी में कई तरह के दुःख देखने को मिले. कई तरह के कष्टों से सामना होता रहा. सामाजिक, पारिवारिक जीवन में ऐसी अनेक स्थितियाँ सामने आईं जिन्होंने सिवाय कष्ट के और कुछ नहीं दिया. ऐसी स्थितियों को, क्षणों को भुलाते हुए हर बार आगे बढ़ते रहे. पारिवारिक सदस्यों का हमेशा-हमेशा को छोड़कर चले जाना कष्टकारी एहसास देता है. मित्रों का, सहयोगियों का, परिजनों का, अपनों का कई बार साथ न मिलना भी कष्ट देता है. ज़िन्दगी की आपाधापी में हम भी लगे हुए हैं, पारिवारिक संरचना के अनुसार हम भी सक्रियता बनाये हुए हैं. ऐसे में समय-असमय मिलती परेशानियाँ, कष्ट, दुःख समय के साथ-साथ धुंधले पड़ते जाते हैं, दिल-दिमाग से विस्मृत होते जाते हैं. ऐसी ही तमाम सारी परेशानियों के बीच एक कष्ट ऐसा मिला जो चाहते हुए भी भुलाया नहीं जा सकता है. यह कष्ट खुद का एक ट्रेन दुर्घटना में घायल होना रहा. कह सकते हैं कि 22 अप्रैल 2005 को पुनर्जन्म ही हुआ हमारा. उस एक घटना ने तत्क्षण जो कष्ट दिए, आने वाले महीनों में जो कष्ट दिए उनसे निपटना होता रहा. इसके बाद भी रोज ही, हर पल ही वह दिन याद आता है, उस दिन के साथ मिला कष्ट याद आता है. लाख कोशिश करते हैं, लाख लोगों का कहना मानने की सोचते हैं मगर हर बार असफल रहते हैं.

आखिर कैसे भुला दें उस कष्ट को जो सुबह आँख खुलने के साथ हमारे साथ अपनी आँखें खोलता है? कैसे भुला दें कृत्रिम पैर पहनते समय कि कोई दुर्घटना हमारे साथ नहीं हुई? कैसे भुला दें बिस्तर छोड़ने से पहले क्षतिग्रस्त पंजे की मालिश करके उसके सहारे खड़े होने की स्थिति बनाते समय कि कहीं कोई दर्द नहीं है? कैसे भूल जाएँ कि कोई दर्द नहीं है जबकि पंजे में बिना पट्टी बांधे एक कदम चलना मुश्किल है? कैसे भूल जाएँ पिछले चौदह साल में एक सेकेण्ड को भी बंद न हुए दर्द के कारण कि शरीर कष्टमुक्त है? कैसे भूल जाएँ कमर में बंधी बेल्ट के दर्द से छिलती देह के बीच कि उस दिन की दुर्घटना ने तन-मन को छील कर रख दिया है? कैसे भुला दें कृत्रिम पैर के बोझ और हाथ में पकड़ी छड़ी के साथ कि कभी हम भी एथलेटिक्स में भाग लिया करते थे? कैसे भुला दें देर रात सोने से पहले कृत्रिम पैर को, पंजे की पट्टी को उतारने के बाद पैर-पंजे में आई सूजन को मालिश से सामान्य करते समय कि उस दुर्घटना से कष्ट नहीं उपजा है? 


हाँ, फिर भी सबकुछ याद रखते हुए भी, सबकुछ याद आते हुए भी सबकुछ भुलाना भी है, सबकुछ भुलाते भी हैं. एक बंधी-बंधाई सी मशीनी दिनचर्या की तरह पंजे की मालिश, कृत्रिम पैर का पहनना, पट्टी बांधना, दर्द को भुलाते हुए आगे बढ़ना होता ही है. ऐसा नियमित ही होता है. दर्द अपनी तीव्रता के साथ अपना काम करता है, हम अपनी जीवटता के सहारे अपना काम करते हैं. किसी दिन दर्द जीत जाता है, किसी दिन हम जीतने का एहसास कर लेते हैं. किसी दिन रिश्ते ज़ख्म को हम भुलाते हुए उसमे मीठा एहसास पैदा करने की कोशिश करते हैं, किसी दिन वही ज़ख्म दोस्त बनकर स्वतः खामोश एहसास जगाने लगता है. दर्द, जलन, सूजन, कष्ट के बीच कहना आसान है कि सबकुछ भुलाकर आगे बढ़ा जाए मगर जब कुछ ऐसा जो आपका न होकर भी आपके साथ जुड़ जाए, कुछ ऐसा जिसके बिना आपका एक कदम आगे बढ़ाना संभव न हो तब सबकुछ भुलाया जा सकता है, बस यही सबकुछ नहीं भुलाया जा सकता है. इसी सबकुछ को याद रखते हुए, इसी सबकुछ को भुलाते रहते हैं, खुद भुलावे में रहते हैं.

15 अप्रैल 2019

तेरा कष्ट मेरे कष्ट से बड़ा कैसे


समस्याएं सबसे साथ होती हैं पर हमें सिर्फ अपनी समस्या ही सबसे बड़ी क्यों लगती है? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही कष्ट को, अपनी समस्या को हम किसी दूसरे के कष्ट पर, दूसरे की समस्या पर आरोपित करना चाहते हैं. ऐसा संभव है कि उस स्थिति में होता हो जबकि हम अपने कष्ट में, अपनी समस्या में घिरे नितांत अकेले बैठे हों. जब हम किसी दूसरे के कष्ट में भागीदार नहीं बनेंगे, किसी दूसरे की समस्या के साथ खुद को जोड़ने का काम नहीं करेंगे तब तक किसी और के कष्टों, दुखों, समस्याओं को न ही समझ सकेंगे, न ही उनको बड़ा समझ सकेंगे. कष्ट, समस्या, दुःख किसी भी रूप में किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का कारक नहीं बनते. उनके होने पर किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति नहीं होती है. इसके बाद भी ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति अपने कष्टों, अपनी समस्याओं को लगभग पालने-पोसने का काम करते हैं. किसी न किसी तरह, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में समाज में अपने कष्ट, अपनी समस्या को प्रकट करने का अवकाश खोजते हैं.


व्यक्ति समाज का एक हिस्सा है, उसी के द्वारा समाज का निर्माण हुआ है. ऐसे में सभी व्यक्तियों का दायित्व बनता है कि वे एक-दूसरे के साथ तारतम्यता बनाये रखें, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाये रहें. यदि व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होता है तो वह एक-दूसरे के सुखों का आनंद भी उठा सकता है, एक-दूसरे के दुखों, कष्टों, समस्याओं को भी मिलकर सुलझा सकता है. मिलजुल कर रहने के कारण, सामूहिकता की भावना होने के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना कष्ट किसी दूसरे के कष्ट के आगे बहुत बड़ा नहीं लगेगा. कष्ट की, समस्या की स्थिति में वह हमेशा दूसरे के कष्टों को, समस्याओं को दूर करने के लिए आगे ही आगे रहेगा. इससे व्यक्ति को समझ में आएगा कि समाज में एकमात्र वही नहीं है जिसके पास समस्याएं हैं, कष्ट हैं. उसके जैसे, उससे बुरी स्थिति में बहुत से लोग हैं जो कष्टों में, समस्याओं में रहने के बाद भी अपने जीवन को सहजता से संचालित कर रहे हैं. 

व्यक्ति को अपनी गंभीरता, अपने धैर्य, अपनी हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. इनके द्वारा वह आत्मविश्वास में वृद्धि करता रहता है. इसी आत्मविश्वास के चलते वह सदैव कष्टों पर विजय पा सकता है, समस्याओं का समाधान खोज सकता है, दुखों से मुक्ति पा सकता है. बस उसे ध्यान रखना होगा कि उससे ज्यादा कष्ट वाले, समस्या वाले इस समाज में हैं. उसे ध्यान रखना होगा कि उसके पास आत्मविश्वास है जो उसे हारने नहीं देगा.

06 मार्च 2019

कालखंड के विधान न मानना ही कष्ट का कारण

आसपास नजर दौड़ाओ तो परेशान लोगों की बहुतायत संख्या दिखाई पड़ती है. कोई अपनी बीमारी से परेशान है. कोई अपने परिजनों की बीमारी से परेशान है. कोई नौकरी न मिलने से परेशान हो रहा है. कोई अपने व्यवसाय में लाभ न होने को लेकर परेशान है. कोई बच्चों के विवाह के लिए परेशान है. कोई संतान न होने के कारण परेशान है. कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में परेशान लोग दिखाई दे ही जायेंगे. ऐसे परेशान लोगों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया जाये तो जानकारी मिलेगी कि ऐसे लोग ज्यादा परेशान हैं जो सात्विक प्रवृत्ति के हैं, जिनका ईश्वर पर, ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास है. जिनके दिन का एक बहुत बड़ा भाग भगवान की भक्ति में बीतता है. जिनके घूमने-फिरने का बहुत बड़ा समय धार्मिक स्थलों की यात्राओं में व्यतीत होता है. जिनकी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक कृत्यों को संपन्न करने में व्यय होता है. ऐसे परेशान लोगों का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि ऐसे लोगों ने अपने जीवन में शायद ही किसी के लिए बुरा सोचा हो. शायद ही इन्होने अपने कृत्यों में कभी कुकृत्य जैसा कोई आचरण किया हो. इसके बाद भी सर्वाधिक कष्ट ऐसे लोगों के हिस्से में ही आते हैं. आखिर क्या कारण है इसका? क्या कारण हो सकता है, ऐसा होने के पीछे? 



संभव है कि इसे हँसी में निकाल दिया जाये क्योंकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं. संभव है कि इसे नास्तिकता भरा कदम बताया जाये क्योंकि इसके पीछे किसी तरह की धार्मिकता का आधार काम नहीं करता है. इसके बाद भी हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों के पीछे, उसके सफल-असफल होने के पीछे, उसकी ख़ुशी-दुःख के पीछे सम्बंधित कालखंड, समय, परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ होता है. बिना इसके किसी भी व्यक्ति का विकास-गति प्राप्त करना संभव नहीं दिखता है. यदि एक पल को इसे सत्य मान लिया जाये तो साफ़ है कि इस कलियुग में उसी व्यक्ति को कष्ट अधिक मिलने हैं जो कलियुग के अनुसार अपने कृत्यों का सञ्चालन नहीं करेगा. जो भी व्यक्ति कलियुग के नियमों-कानूनों का अनुपालन नहीं करेगा उसे कष्ट भोगने होंगे. भगवान जैसी शक्ति यदि वाकई है तो वह हमेशा उसी को दंड देने का काम करती है जो उसके बने-बनाये विधानों का अनुपालन नहीं करता है. ऐसे में सुखी रहने के लिए व्यक्ति को कलियुग के विधानों का अनुपालन करना अनिवार्य है. यदि वह ऐसा नहीं करता है तो कष्ट का भागी बनता है.

इसे महज मजाक का विषय न माना जाये वरन अपने आसपास भी देखा जाये तो बहुत हद तक सत्यता दिखाई पड़ने लगेगी. ऐसे लोगों को बहुत कम कष्ट में देखा होगा जो किसी न किसी तरह के दंद-फंद का काम करते हैं. झूठ बोलने वालों को, भ्रष्टाचार करने वालों को, रिश्वतखोरी करने वालों को कष्ट से ज्यादा सुख भोगते देखा जाता है. आये दिन सड़क दुर्घटना की खबरें पढ़ते हैं, तमाम निर्दोषों के , मासूमों के मारे जाने की खबरें सामने आती हैं मगर शायद ही कभी एक-दो दुर्घटनाएं ऐसी सामने आती हों जिनमें कोई अत्याचारी मारा गया हो, कोई दुर्दांत मारा गया हो. ऐसे में क्या ये माना जाये कि सभी को अत्याचार करना चाहिए? सभी को भ्रष्ट हो जाना चाहिए? सभी को कुकृत्य करने शुरू कर देने चाहिए? एक पल को इसके बारे में हाँ कहना अवश्य ही अचंभित करेगा किन्तु यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक संतृप्तता की स्थिति नहीं आती तब तक सम्बंधित विषय में प्रक्रिया चलती रहती है. कुछ ऐसा ही समाज में अपराधों को लेकर हो रहा है. जब तक समाज में कुछ बुरे लोग होंगे, कुछ भले लोग होंगे तब तक अपराध की प्रक्रिया चलती रहेगी. या तो समाज में सभी लोग भले बन जाएँ या फिर सभी लोग बुरे बन जाएँ तो संतृप्तता की स्थिति आने से सुधार दिखाई देने लगेगा. ऐसा भी नहीं कि बिना हत्या किये किसी के काम न बनेंगे. ऐसा भी नहीं कि यदि रिश्वत नहीं ली जाएगी तो काम नहीं बनेगा. यह भी नहीं कि अपराध नहीं किया जायेगा तो समाज नहीं चलेगा. यह सब होगा मगर जब शक्ति-संतुलन की स्थिति समाज में बनती है तो अपराध कम होते हैं या कहें कि न के बराबर होते हैं. इसी शक्ति-संतुलन की आज आवश्यकता है और वह तभी हो सकेगा जब कि इन्सान खुद को भगवान भक्ति से बाहर निकाले. ईश्वरीय शक्ति यदि एक तरफ इन्सान को ताकत देती है तो उसे कमजोर भी बनाती है. यही कमजोरी किसी भी भले इन्सान को हमेशा परेशानी में रखती है, दुखी रखती है.

ऐसा कहने का अर्थ कदापि यह नहीं कि इन्सान सिर्फ और सिर्फ अत्याचार करने पे उतर आये, पूरी तरह से कुकृत्य करने लगे. ऐसा कहने का आशय महज इतना है कि इंसानों को अपने समय, शक्ति, ऊर्जा को अनावश्यक रूप से कथित भगवन-भक्ति में खर्च करके सार्थक कार्यों की तरफ लगाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि ईश्वर भी इन्सान की बनाई कृति है जो उसने अपने गुण-दोषों के विवेचन के लिए स्थापित की है. यहाँ ईश्वर के सम्बन्ध में एक बात ध्यान रखना चाहिए कि भगवान की भक्ति करने के द्वारा इन्सान सिर्फ वही चीजें माँगता है जिनको पूरा करना कहीं न कहीं उसी इन्सान के हाथों में होता है. कोई भी इन्सान अपनी परेशानियाँ का निस्तारण चाहता है. वह परीक्षा में पास होना चाहता है, नौकरी चाहता है, संतान चाहता है, बीमारी से मुक्ति चाहता है, व्यापार में लाभ चाहता है, विवाह चाहता है, तरक्की चाहता है. इनके लिए वह प्रयास भी करता रहता है और भगवान की भक्ति भी करता रहता है. ऐसे में उसकी कामना पूरी होने का श्रेय वह भगवान को देता हुआ उसके प्रति कृतज्ञ रहता है. क्या कभी किसी इन्सान ने अपने चार हाथ हो जाने की कामना भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने भरी दोपहरी में रात हो जाने की माँग भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने गर्मी के मौसम में सर्दी की आकांक्षा भगवान से की है? सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई नहीं दिखता, पर एक पल को ऐसा माँगा भी जाये भगवान से तो क्या वह पूरा हो जायेगा? कितनी भी कठिन तपस्या हो, यज्ञ-हवन किये जाएँ मगर ऐसा हो पाना संभव नहीं क्योंकि यह एक तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया है. इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया से भटकने के कारण इन्सान दुखों का अनुभव करता है. ऐसे में इन्सान को अपने कृत्यों पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ने कि आवश्यकता है. भगवान भक्ति कलियुग में इन्सान को राक्षस बनाएगी, दुष्ट साबित करेगी, अत्याचारी साबित करेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करते रहने के कारण इन्सान अपने कार्यों के प्रति सजग-सचेत-सक्रिय नहीं रहता है.
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(यह आलेख पूर्वाग्रही, आँख बंद करके भगवान भक्ति करने वाले न पढ़ें.)

03 फ़रवरी 2019

ख़ुशी अपने भीतर है, पहचानो तो


ख़ुशी शब्द देखने में जितना छोटा है, उसकी उतनी ही व्यापकता हैं. सभी के लिए ख़ुशी के अलग-अलग मायने हैं, अलग-अलग सन्दर्भ हैं. किसी के लिए बहुत ही छोटी समझी जाने वाली स्थिति से बहुत बड़ी सी ख़ुशी उत्पन्न हो सकती है तो किसी के लिए बड़े से बड़ी स्थिति भी ख़ुशी पैदा नहीं कर पाती है. ख़ुशी के अपने अलग-अलग मानक हैं. ख़ुशी किसी चीज को प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी से मिल लेने भर का नाम नहीं है. ख़ुशी किसी सफलता के प्रत्युत्तर में जन्मने वाली स्थिति नहीं. ख़ुशी खुद को तनावरहित बनाये रखने की अवस्था भी नहीं. ख़ुशी संतुष्टि की भावना नहीं. ख़ुशी शारीरिक अवस्था भी नहीं है. ख़ुशी को विशुद्ध मानसिक अवस्था भी नहीं कहा जा सकता है. हो सकता है कोई आर्थिक सशक्तता को प्राप्त कर लेता हो मगर उसे फिर भी ख़ुशी न मिलती हो. हो सकता है कोई आर्थिक स्तर पर बहुत ही कमजोर हो मगर वह खुश रहता हो. ख़ुशी एक स्थिति कही जा सकती है जो व्यक्ति को खुश रहने का अवसर उपलब्ध करवाती है. इस अवसर का स्वरूप कुछ भी हो सकता है, कैसा भी हो सकता है.

बहुत सारे मनोविज्ञानियों के अपने-अपने अनुभवों, प्रयोगों के आधार पर ख़ुशी के, खुश रहने के अलग-अलग मानक निकाले गए. कुछ के लिए नकारात्मक स्थितियों की समाप्ति ख़ुशी है तो कुछ के लिए अपनी सोचने की क्षमता ख़ुशी का आधार है. आधार या स्थिति कुछ भी हो मगर लगता है कि ख़ुशी का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है. या ऐसा भी हो सकता है कि किसी भी व्यक्ति के लिए ख़ुशी प्राप्ति का साधन एक से अधिक हो और इसी कारण से ख़ुशी का जीवन लम्बा न हो पाता हो. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति को एक सफलता से अपार ख़ुशी मिलती है और अगले ही पल किसी दूसरी जगह से मिली असफलता उसे निराश कर देती है. जबकि इन दोनों सफलता, असफलता से उसे किसी मंजिल तक नहीं पहुँचना होता है. ऐसे में यदि ख़ुशी दीर्घजीवी है तो उसे असफलता से मिली निराशा पर हावी रहना चाहिए, मगर ऐसा नहीं होता है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जबकि ख़ुशी पर नाखुशी ज्यादा प्रभावी रही है.


कई बार लगता है कि मानव स्वभाव इस तरह का है ही कि वह ख़ुशी को बहुत लम्बे समय तक अपने साथ रख नहीं पाता है. उसके ऊपर किसी न किसी दुःख को, कष्ट को, नाखुशी को बैठा देता है. उसके सामने एक पल में एकसाथ आने वाली ख़ुशी और ग़म में वह उस ग़म को ज़िन्दगी भर ढोता रहता है जबकि उसी समय साथ आई ख़ुशी को तत्काल भुला बैठता है. एक बहुत बड़ी ख़ुशी के अवसर पर भी वह छोटे से छोटे दुःख को अपने साथ घसीट कर लाने से नहीं चूकता है जबकि ऐसा उसके द्वारा दुःख के अवसर कर नहीं किया जाता है. देखा जाये यदि ख़ुशी परिस्थितिजन्य है तो दुःख भी इससे इतर नहीं है. यदि ख़ुशी को मानसिक अवस्था माना जाये तो दुःख भी उसी श्रेणी में शामिल होता है. यदि नकारात्मकता दूर करने के परिणामस्वरूप ख़ुशी का जन्म होता है तो फिर ध्यान रखना होगा कि सकारात्मकता समाप्त होने से ही दुःख का उदय हुआ है. ऐसे में उसी सकारात्मकता को पुनः क्यों नहीं प्राप्त किया जाता है? क्यों नहीं दुःख के मूल में छिपे नकारात्मक भाव को दूर करके ख़ुशी को गले लगाया जाता है?

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति ख़ुशी को हर एक पल में अलग-अलग चाहता है. वह एक ही ख़ुशी को सभी पलों के साथ स्थापित करते हुए उसका अनुभव नहीं करना चाहता है. इसके उलट वह किसी भी एक कष्ट को सभी पलों पर स्थापित कर देता है. संभव है कि कोई कष्ट इतना बड़ा हो, कोई दुःख इतना गहरा हो कि उसका प्रभाव दीर्घकालिक हो मगर यह कहना कतई सुखद एहसास नहीं कराता कि वह दुःख सभी खुशियों पर सदा-सदा के लिए भारी हो जायेगा. यह कहना उपयुक्त भी नहीं कि एक ग़म, एक दुःख सभी खुशियों को मिटा देता है. भारतीय समाज में बहुधा देखने में आता है कि एक दुःख के साये में व्यक्ति पूरी जिंदगी बिता देता है. उसका रहन-सहन, उसकी जीवन-शैली, उसकी कार्यशैली, उसकी दिनचर्या आदि सबकुछ उसी एक दुःख के द्वारा संचालित होने लगती है. ऐसे में उसी नकारात्मकता को दूर करने की आवश्यकता है जिसके दूर होने से ख़ुशी मिली थी. उसी सकारात्मकता को बनाये रखने की जरूरत है जिसके न होने से दुःख दिखाई देने लगा है. 

सामाजिक विज्ञानी, मनोविज्ञानी और उनके प्रयोग क्या कहते हैं ये और बात है मगर ख़ुशी या दुःख पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी मानसिक अवस्था है. उसे अपने वर्तमान के साथ जीवन जीने की कला सीखने की आवश्यकता है. जो व्यक्ति अपने वर्तमान में अतीत की परेशानियों को खींच ले आते हैं और उसी वर्तमान को बोझ बनाकर भविष्य तक ले जाना चाहते हैं वही ख़ुशी का आनंद नहीं ले पाते हैं. ख़ुशी को दीर्घजीवी भी बनाया जा सकता है बशर्ते उसका स्वरूप स्वतंत्र छोड़ना होगा. उसे किसी भी तरह के दुःख के साये में पलने को नहीं छोड़ना होगा. हमें हमारी ख़ुशी हमारी भावनाओं में खोजनी होगी. हमें हमारी ख़ुशी के लिए अपने जीवन की कठिनता को छोड़ना होगा. खुशियों को लम्बे समय तक साथ बनाये रखने के लिए व्यक्ति को दिखावे की संस्कृति से दूर होना पड़ेगा. यह भी ध्यान देना होगा कि जो बातें व्यक्ति के दिल-दिमाग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं उनसे न केवल निपटना होगा बल्कि उन्हें हमेशा के लिए दूर करना होगा. व्यक्ति को उन्हीं कामों की तरफ खुद को एकाग्र करने की आवश्यकता है जो उसके दिल-दिमाग को पसंद आते हों. आवश्यक नहीं कि सिर्फ धनोपार्जन के लिए ही काम किया जाये. ऐसे काम करने के साथ-साथ अपनी ख़ुशी को लम्बा बनाने के लिए वे काम भी करने चाहिए जिन्हें शौक कहा जा सकता है, पसंद कहा जा सकता है, पैशन कहा जा सकता है. इस तरह के क्रियाकलापों से, व्यवहार से, प्रक्रिया से ख़ुशी प्राप्त की जा सकती है. किसी भी व्यक्ति को इसका आभास होना ही होना चाहिए कि ख़ुशी उसके भीतर ही है, बस उसे देखने-समझने की आवश्यकता है. लगातार सिर्फ और सिर्फ परेशानियों के बारे में सोचना, उनकी चर्चा करना, दुःख में बने रहना, खुद को निराश दिखाना व्यक्ति की शारीरिक सेहत और दिमाग़ी सेहत दोनों के लिए कष्टकारी है, नुकसानदायक है.

21 जनवरी 2019

अपनों का साथ है संजीवनी

ज़िन्दगी जितनी सहज-सरल है उतनी ही कठिन-क्लिष्ट है. एक पल में लगता है जैसे सारी सहजता, सभी कुछ आसानी से उपलब्ध हो गया है. उसी एक पल में लगने लगता है जैसे जीवन को गति प्रदान करना कठिन होता जा रहा है. सहजता और कठिनता जिंदगी के ऐसे दो पहलू हैं जो हर पल एक साथ रहते हैं मगर इन्सान को एक बार में एक ही पहलू दिखाई देता है. इधर यह भी कहा जा सकता है कि वह एक बार में एक ही पहलू देखने का आदी हो गया होता है. जीवन में सुख-दुःख का साथ सदैव से रहा है. धर्म, जाति, आर्थिक स्तर, क्षेत्र आदि कुछ भी रहा हो मगर जीवन के ये दो पहलू सदैव एकसाथ रहे हैं. सुख की स्थिति आते ही सबकुछ अच्छा-अच्छा लगने लगता है, सुखद लगने लगता है. यही कारण है कि लम्बे होने के बाद भी उन पलों का एहसास चंद पलों का लगता है. इसके उलट दुःख का, कष्टों का आना भले ही चंद पलों का हो मगर उनके साथ इतनी समस्याएं साथ आती हैं कि वे चंद पल भी सदियों से कम प्रतीत नहीं होते हैं. 


सुख और दुःख के इन्हीं पलों में साथ देने वालों के द्वारा भी इन पलों की समयावधि के एहसास को कम, ज्यादा किया जा सकता है. इसके साथ-साथ व्यक्ति की जिजीविषा भी उसके साथ आने वाले लोगों के द्वारा भी निर्धारित हो जाती है. ऐसा नहीं है कि व्यक्ति अपने आपको दुःख में ही अकेला और तन्हा महसूस करता हो. कई बार देखने में आता है कि सुखों का अतिरेक होने के बाद भी उसको अकेलापन महसूस होता है. ऐसी किसी भी स्थिति में जबकि उसे अकेलापन महसूस हो, खुद में तन्हा महसूस करे तब उसके साथ के लोगों से ही उसे ऊर्जा मिलती है. जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है. उसकी जिजीविषा को शक्ति मिलती है. प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह दुःख में रहे या फिर सुख में रहे, इसका एहसास हमेशा रहना चाहिए कि जो वक्त उसके साथ चल रहा है वह सदैव के लिए उसके साथ नहीं है. वक्त कब किस करवट बैठेगा, कब अपनी चाल को बदलेगा कहा नहीं जा सकता. ऐसे में व्यक्ति की अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा, अपनी जिजीविषा उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती है.

20 नवंबर 2018

हँसना दुखों को छिपाना नहीं होता


तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो, किसी ग़ज़ल की इस एक पंक्ति ने हँसने-मुस्कुराने तक पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. क्या वाकई ऐसा है कि ज्यादा हँसने-मुस्कुराने वाला व्यक्ति अपने भीतर किसी दर्द को छिपाने की कोशिश कर रहा है? क्या वाकई यह सत्य है कि जो जितना हँसता है, जितने तेज ठहाके लगाता है वह अन्दर से उतना ही दुखी होता है? हो सकता है ऐसी रचना करने वाले के सामने इस तरह का कोई उदाहरण सामने आया हो और उसने ऐसी पंक्ति रच दी हो. ये हो सकता है कि किसी व्यक्ति ने किसी अपने के सामने अपने दुःख को जाहिर न होने देने के लिए हँस कर उससे व्यवहार किया हो और उसी को ऐसी बात का पर्याय मान लिया गया हो. यदि उक्त पंक्ति के दर्शन को विचार किया जाये तो वास्तव में भावनात्मक रूप से कोई व्यक्ति नहीं चाहता है कि उसका कोई करीबी उसके दुःख के कारण दुखी हो. इसी कारण से बहुधा देखने में आता है कि दुःख में लोग जबरन मुस्कुराने की, खुश रहने की कोशिश करते हैं. यहाँ भी एक बात विचारणीय है कि जबरन हँसने वालों की मुस्कराहट स्वतः सबकुछ बयान कर देती है. उनके हँसने में, उनके मुस्कुराने में, उनके खुश रहने में एक तरह की बनावट नजर आती है. उनकी समूची ख़ुशी पर, समूचे सुखों पर एक मुस्कान भी कमजोर साबित होती है, एक ठहाका भी खोखला समझ आता है. 


वास्तविकता ये है कि समाज में कोई भी कालखंड रहा हो सबके सामने कोई न कोई समस्या अवश्य रही है. व्यक्ति कभी सामाजिक स्थिति के चलते, कभी आर्थिक स्थिति के चलते, कभी सांस्कृतिक स्थिति के चलते, कभी शैक्षिक स्थिति के चलते, कभी किसी अन्य स्थिति के चलते लगातार परेशान ही रहा है. ऐसे में वही लोग हँसने का जोखिम उठा सके हैं जिन्होंने समय-स्थिति के वश में रहना नहीं सीखा है. उन लोगों ने भी दुखों को मात दी है जिन्होंने वर्तमान को जीना अपना मकसद बना रखा हो. ऐसे लोगों के लिए क्या दुःख, क्या सुख. ये लोग समय को अपने हिसाब से संचालित करते हुए वर्तमान का आनंद उठाते हैं और दुखों को किनारे लगाये रहते हैं. ऐसे लोगों के ठहाके हर परिस्थिति में एकसमान ढंग से सुनाई देते हैं. ऐसे लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट कभी भी लोप नहीं होती है. असल में ऐसे लोग वे लोग होते हैं जो समय को, परिस्थितियों को, दुःख-सुख को अपने नियंत्रण में रखते हैं न कि उनके नियंत्रण में रहते हैं. ऐसे लोग अपने नैसर्गिक व्यवहार को, नैसर्गिक चरित्र को छोड़ नहीं पाते हैं. इनके लिए हँसना, ठहाके लगाना, मुस्कुराना सभी स्थितियों में एकसमान रहता है. ऐसे में वे कलमकार या फिर समाज के अन्य लोग जिन्होंने जीवटता नहीं देखी हो, दुःख-सुख का समान भाव न देखा हो प्रत्येक हँसने वाले को दुखों से घिरा मान बैठते हैं. हर ऐसा व्यक्ति जो सरेराह ठहाका लगाता दिखता है, ऐसे लोगों की निगाह में दुखों से घिरा होता है.

चलिए, एक पल को मान भी लिया जाये कि यही सच है. जो व्यक्ति जितना हँस-मुस्कुरा रहा है उतना ही दुःख से घिरा है, कष्टों में है तो अन्य लोगों को उसके इस एहसास से क्या लेना-देना? क्या समाज का कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के दुःख को हमेशा के लिए समाप्त कर सकता है? क्या समाज में कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति का साथ पसंद करेगा जो अपने दुखों का रोना रोता रहे? क्या ऐसे व्यक्ति के साथ कोई भी ख़ुशी महसूस कर सकेगा जो सिर्फ और सिर्फ आँसुओं के साए में रह रहा हो? जब समाज में कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति का साथ देने को तैयार नहीं होता जो चौबीस घंटे बस दुःख में रहे, रोता रहे तो फिर उसके हँसने-रोने का क्या अर्थ? हम सभी उस व्यक्ति का धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगते हैं जो सिर्फ दुखों का, कष्टों का रोना रोता है. हम सभी सदैव अपने आसपास हँसने वाले, मुस्कुराने वाले लोगों को ही पसंद करते हैं. दुःख की घड़ी में अपने लोग, घर-परिवार के लोग भी तभी तक सहारा देते हैं जब तक कि दुखों से घिरा व्यक्ति खुद अपनी मदद करता है. ऐसे में सबसे शुरू में दी गई पंक्ति का कोई अर्थ सामान्य रूप में समझ नहीं आता है. बाकी सत्य यह है कि
दर्द दिल में दबाकर हँसना सबको नहीं आता,
ये हुनर वो है जो आँसुओं को पीकर है आता.

30 जुलाई 2018

तेरा दुःख मेरे दुःख से बड़ा कैसे

दुःख को लेकर एक पोस्ट लिखी थी, दो-चार दिन पहले. उस पोस्ट को लेकर भी लोगों में सवाल-जवाब की स्थिति बनी है. संशय की स्थिति बनी है. पता नहीं क्यों समाज में लोग अपने दुःख को ही सबके दुखों से अधिक बड़ा साबित करने पर लगे रहते हैं? समझ नहीं आता है कि सार्वजनिक रूप से क्यों लोग अपने दुःख को बढ़ा-चढ़ा कर सुना जाना पसंद करते हैं? यही समझ नहीं आता कि दुःख का मापन कैसे हो? कैसे किसी का दुःख नापकर बताया जाये कि इसका दुःख उसके दुःख से कम है? खुशियों को तलाशते-तलाशते इन्सान कब दुखों की चाह करने लगा समझ नहीं आया. उसके दुःख को बड़ा स्वीकारते हुए यदि उससे कहा जाये कि तुम ज़िन्दगी भर दुखी ही रहो, इस दुःख के बदले अपनी ख़ुशी दे दो तो वह इसके लिए कतई राजी नहीं होगा. ऐसे में वह किस कारण अपे दुःख को औरों के दुःख से बड़ा बताना चाह रहा है? 

28 जुलाई 2018

दुःख के अनावश्यक विस्तार में अहंकारी मानसिकता


दुःख, ये शब्द ऐसा है जिसके बारे में पौराणिक ग्रंथों ने खूब व्याख्या की है तो धार्मिक ग्रंथों, व्यक्तियों ने भी इसके बारे में अपनी-अपनी तरह की परिभाषाएं, व्याख्याएँ दी हैं. धार्मिक आधार पर दुःख को मानव जीवन के लिए कर्मों का आधार माना गया है. एक तरह का आवश्यक अंग माना गया है दुःख को. हिन्दी साहित्य में भी भक्ति से सम्बंधित साहित्य में दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है. कहीं दुःख को चिर-स्थायी दोस्त बताया गया है, कहीं बिना दुःख के जिंदगी की सच्चाई का पता न चलने की बात कही गई है. दुःख को भले ही किसी ने दो पल का माना हो मगर उसी के सहारे अपने और पराये की पहचान होना भी बताया है. अब पता नहीं इन धार्मिक अथवा साहित्यिक विचारों का प्रभाव है या और कुछ कि बहुधा लोगों को अपने दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताते देखा है. हमारे जितना दुःख किसी और को होता तो मर जाता, तुम क्या जानो दर्द किसे कहते हैं, ज़माने का सारा दुख हमारे हिस्से ही आया है, ज़िन्दगी भर दुःख ही तो सहा है, जितना कष्ट उठा लिया उससे ज्यादा कोई क्या देगा... आदि वाक्य आये दिन आप भी लोगों के मुँह से सुनते होंगे. ये विचित्र विडम्बना है कि कार में घूमने वाले, वातानुकूलित में रहने वाले, लाखों रुपये एक माह में डकारने वाले, सुख-सुविधाओं का अंधाधुंध उपभोग करने वाले भी खुद को सर्वाधिक दुखी बताने में पीछे नहीं रहते हैं.


समझ नहीं आता है कि चाहे आम आदमी हो अथवा कोई ख़ास, सभी अपने दुःख को ही विशिष्ट मानते-बताते हैं. उनके लिए दूसरे के दुःख से कोई सरोकार नहीं. इनके लिए अपना दुःख ही सर्वाधिक कष्टकारी है, सर्वाधिक रूप से इन्सान को परेशान करने वाला है. ऐसे लोगों में कोई अपने शारीरिक कष्टों का दुःख अत्यंत विकटता के साथ प्रकट करता है. कोई मानसिक कष्टों को सर्वाधिक दुखद बताते हुए अपने आपको संसार का एकमात्र दुखी प्राणी सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है. किसी को दुःख का कारण नहीं ज्ञात, उसका आधार नहीं ज्ञात मगर इसके बाद भी उसका दुःख सभी के दुःख से बहुत-बहुत बड़ा होता है. ऐसे लोग दुःख के माध्यम से लोगों की सहानुभूति बटोरने की मानसिकता से काम तो करते ही हैं साथ ही अपने आपको अपने साथ के बाकी लोगों से कहीं ऊपर मानने-मनवाने का जतन भी करते दिखाई देते हैं. ऐसे लोग जो बात-बात में अपने दुःख का रोना रोते हैं, अपने दुःख को ही सबसे बड़ा और कष्टप्रद बताते नहीं थकते हैं, वे लोगों से मिलने वाली सहानुभूति के जरिये खुद में एक तरह की अहंकारी भावना को जन्म देते हैं.

आपको संभवतः यह सुनकर आश्चर्य लगे, किंचित अचम्भा सा महसूस हो मगर सत्य यही है. दुःख की, कष्ट की एक समयावधि, एक सीमा गुजर जाने के बाद ऐसे व्यक्ति इन्हीं दुखों और कष्टों के अनावश्यक प्रलाप के द्वारा समाज की सहानुभूति बटोरते रहते हैं. दरअसल दुखों के चलते सामने वाला दुखी व्यक्ति को दिलासा दिलाने की खातिर, उसे हिम्मत बढ़ाने की दृष्टि से उसकी सहनशक्ति, उसके हौसले, उसके विश्वास आदि की प्रशंसा करता है. यह प्रशंसा दुखी व्यक्ति को तत्कालीन दुःख से, कष्ट से बाहर निकलने में मदद करती है. यहाँ तक तो समझ आता है किन्तु इसके बाद जिस तरह से अपने दुःख को आजीवन तारीफ बटोरने का, सहानुभूति बटोरने का माध्यम बना लिया जाता है, वह एक तरह की मनोवृत्ति है. यही वृत्ति आगे चलकर मनोविकार में बदल जाती है. दुःख चाहे वर्तमान में हो अथवा अतीत में आया हो, उसे लगातार अपने साथ समेटकर चलने से किसी भी तरह से भला नहीं होने वाला. जिस तरह धार्मिक ग्रंथों में, साहित्य में सुख को आने-जाने वाला बताया गया है, उसी तरह की प्रकृति दुःख की भी है. यह भी सदैव किसी एक व्यक्ति के हिस्से में नहीं आता. आने-जाने वाली स्थिति के सहारे खुद को समाज में, अपने आसपास के लोगों में विशिष्ट बनने की, कुछ ख़ास बनने की मानसिकता को त्यागना ही होगा. समझना होगा कि दुःख का अकारण रोना रोने वाला सदैव रोता ही रहता है, कष्ट में ही रहता है भले ही उसके साथ दुःख लगा हो या नहीं.

22 जून 2018

वाकई शो मस्ट गो ऑन


जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह जीवन भी दो पहलुओं में सिमटा हुआ है. दुःख और सुख का, हँसी और आँसू का, ख़ुशी और गम का सह-सम्बन्ध जीवन में सहज ही देखने को मिलता है. जीवन जितना सहज, खुशनुमा, सुरमयी दिखाई देता है उतना ही क्रूर, जटिल, दुखद भी है. दुःख-सुख के एकसाथ आने या फिर क्रमशः आने की अनिश्चितता के चलते जीवन को एक रंगमंच सरीखा माना गया है. कुछ भी हो जाये, कुछ भी होता रहे मगर जीवन-चक्र चलता ही रहता है. दुखों का साया हो या फिर खुशियों का आँचल जीवन की गति रुकती नहीं है. शो मस्ट गो ऑन की संतोषमयी अवधारणा के चलते इन्सान तमाम सारी समस्याओं, परेशानियों के सामने आने के बाद भी सतत आगे बढ़ता रहता है. इसे जीवन गति के आगे बढ़ाते जाने की मजबूरी समझी जाए या फिर इन्सान की जिजीविषा, जिसके चलते वह दुखों, कष्टों के सामने बने रहने के बाद भी सामान्य ढंग से जीवन-पथ पर आगे बढ़ता जाता है. देखने में आया है कि सहज भाव से जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है. दुखों, कष्टों, समस्याओं, परेशानियों के होने के बाद भी मनुष्य इस कारण से आगे बढ़ता रहता है क्योंकि उसके सामने सुखों, खुशियों के आने की सम्भावना बनी होती है.


सोचने वाली बात यह है कि कोई इन्सान जब अपनी पूरी क्षमताओं से खुशियों का आनंद उठाने में लगा हो ठीक उसी पल दुखों का साया उसे घेर ले, तब वह जीवन को किस तरह जीता है? दुखों की घड़ी आने के बाद भी उसे खुशियों भरे पल का निर्वहन करना है तब उसी मानसिकता क्या, कैसी रहती होगी? यह स्थिति विषम से भी अधिक विषम समझ आती है. एक तरफ दुःख के कारण पसरा मातम और दूसरी तरफ खुशियों के पल का निर्वहन. निश्चित ही जीवन की इसी अनिश्चितता के चलते व्यक्ति यदि कमजोर बनता है तो दूसरी तरफ यही अनिश्चितता उसे ताकत प्रदान करती है. यही अनिश्चितता उसे अतीत को विस्मृत करके वर्तमान में जीने का सन्देश देती है. सैद्धांतिक रूप से ऐसा कहना सहज होता है कि अतीत को भुलाकर वर्तमान में जीना चाहिए. यह कहना भी सरल होता है कि शो मस्ट गो ऑन, यह समझाना भी आसान होता है कि दुखों को भुलाकर खुशियों का स्वागत करना चाहिए मगर ऐसा करना तब बहुत मुश्किल होता है जबकि दुःख किसी अपने के जाने का हो. अपने मन को समझा पाना तब और भी कठिन होता है जबकि जाने वाला व्यक्ति आपका जन्मदाता हो. ऐसा करना तब और भी कठिन हो जब अतीत महज चंद घंटे पुराना हो. ऐसी स्थिति के बाद भी यदि व्यक्ति और पूरा परिवार हँसते-मुस्कुराते हुए दरवाजे खड़ी खुशियों का स्वागत कर रहा हो, सामने खड़े उल्लासित पल पर अतीत की छाया नहीं पड़ने दे रहा है तब समझ आता है कि वाकई इन्सान की जिजीविषा ही जीवन को गति प्रदान करती है. भविष्य की सुखद संकल्पना इसी की कोख से जन्म लेती है.

ऐसा कहीं और नहीं जब खुद सहना पड़ता है, अपने परिवार के साथ होना देखना पड़ता है तब शब्द मुस्कुराते हुए कहते हैं शो मस्ट गो ऑन मगर दिल अन्दर ही अन्दर आँसू बहा रहा होता है. बहुत बड़ा दिल चाहिए खुशियों भरे पल का स्वागत करने के लिए जबकि चंद घंटे पहले आपने अपने परिजन को खोया हो, किसी ने पत्नी को, किसी ने माँ को, किसी ने दादी-नानी को, किसी ने किसी और रिश्ते को. अपने परिवार में इस विषम स्थिति को, सुख-दुःख को एकसाथ सामने खड़े देखा. बहरहाल, दुःख का आना, किसी का जाना प्राकृतिक सत्य है, जीवन का क्रम है जिसे न तो भुलाया जा सकता है न ही टाला जा सकता है. इसके बाद भी वर्तमान की खुशियों का स्वागत करने की जीवटता, सामने खड़े सुखद पल को आत्मसात करने की मानसिकता, दुखों के साए पर खुशियों का आँचल ओढ़ाने की जिजीविषा जिस प्रकार देखने को मिली वह अनुकरणीय है. ऐसी जिजीविषा के लिए, ऐसी अदम्य जीवटता के लिए, वर्तमान को सुखद बनाने के साहस के लिए अपने परिवार को नमन, अपने परिजनों को नमन.