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24 जनवरी 2025

महाकुम्भ और एआई संचालित पत्रकारिता

सनातन के वास्तविक लोग, महाकुम्भ के सजग नागरिक कथित मीडिया और इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के हमले से सावधान रहें.

 

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है. यहाँ ध्यान रहे कि 'माना' जाता है, वो चौथा खम्भा है नहीं. लोकतंत्र में मात्र तीन खम्भे ही सहज स्वीकार्य हैं-कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका. पत्रकारिता को जबरिया एक खम्भा घोषित कर दिया गया है. इस चौथे स्तम्भ की आड़ में उपजे कथित जबरिया, नियंत्रण-मुक्त, उच्छृंखल सोशल मीडिया खम्भे ने बहुत नुकसान पहुँचाया है. इसे प्रयागराज के महाकुम्भ में देखा जा सकता है.

 

हर हाथ मोबाइल, हर हाथ इंटरनेट ने सबको सोशल मीडिया चैनल बना दिया है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस पड़े. न सवाल पूछने की अकल, न विषय की गम्भीरता, न वातावरण-देशकाल का भान.... बस मोबाइल का मोबाइल ओं और बन गए पत्रकार. सनातन संस्कृति के पवित्र, पावन, भव्य, संस्कारित आयोजन महाकुम्भ पर ऐसे कथित मीडिया मंचों से बचने की आवश्यकता है. इन कथित मानसिकता वालों को पर्याप्त मदद मिल रही है कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से.


सावधान रहें.




20 जनवरी 2025

महाकुम्भ में बौराया सोशल मीडिया

हिन्दू धर्म की सर्वाधिक पवित्र और प्राचीन परम्पराओं में से एक कुम्भ का आयोजन है. इसके आयोजन के पीछे अनेक पौराणिक, धार्मिक और खगोलीय कारण हैं. वर्तमान में प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है. गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों की त्रिवेणी की भांति ही यहाँ ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी का संगम है. यह समय आत्मशुद्धि, आस्था और ध्यान के लिए उपयुक्त माना गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय देव और दानवों के बीच हुई रस्साकशी में अमृत की बूँदें बारह स्थानों पर गिरी थीं. जिनमें चार स्थान पृथ्वी पर और आठ देवलोक में हैं. पृथ्वी में ये चार स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के रूप में चिन्हित हैं. प्रयागराज में संगम, हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की क्षिप्रा और नासिक की गोदावरी नदी के तट पर कुम्भ का आयोजन होता है.

 

कुम्भ की तिथियाँ खगोलीय घटनाओं के आधार पर निर्धारित होती हैं. सूर्य और बृहस्पति ग्रह की स्थिति का इससे गहरा सम्बन्ध है. चूँकि बृहस्पति को अपनी कक्षा में बारह वर्ष का समय लगता है, इसलिए इसका आयोजन प्रत्येक बारह वर्ष में होता है. प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन उस समय होता है जब सूर्य मकर राशि में और बृहस्पति वृष राशि में होता है. इसी तरह से सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के कुम्भ राशि में आने पर हरिद्वार में, सूर्य के कर्क और बृहस्पति के सिंह में आने पर नासिक में तथा सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर उज्जैन में कुम्भ मेला आयोजित होता है. प्रयागराज में दो कुम्भ पर्वों के बीच छह वर्ष के अन्तराल में अर्धकुम्भ भी होता है. नासिक और उज्जैन में बृहस्पति के सिंह राशि में होने के कारण यहाँ के कुम्भ मेले को सिंहस्थ भी कहा जाता है.

 



महाकुम्भ सनातन परम्परा के प्रतीक, गंगा स्नान, तीर्थ दर्शन और साधु-संतों के त्रिवेणी तट पर आगमन, कल्पवास करने का पर्व नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम है. इसके साथ-साथ यह भक्ति-भाव से भगवान और भक्त के आपस में मिलन का विराट आयोजन है. महाकुम्भ में परम्परा, मान्यता, वेदांती, महामंडलेश्वर, संत, गृहस्थ, विद्वान, निर्गुण, सगुण आदि के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सनातनता के विविध मनोहारी रंग, गुण, कलाएँ आदि देखने को मिलते हैं. कहीं यज्ञ हो रहा है, कहीं कथा हो रही है, कहीं ध्यान तो कहीं प्रवचन. कहीं नागा संन्यासियों का समाधि-बोध का सुख है तो कहीं अमरत्व की चाह में त्रिवेणी के पावन जल में डुबकी लगाती श्रद्धालुओं की भीड़. पवित्रता, पावनता, ज्ञान, कर्म, भक्ति, साधना, ध्यान, योग, समाधि आदि से ओत-प्रोत सनातन संस्कृति के इस विशाल आयोजन को सोशल मीडिया के कुछ अराजक तत्त्वों ने तमाशा बना दिया है.

 

सोशल मीडिया की संपादकत्वविहीन कार्यशैली ने उच्छृंखलता को बढ़ाया है. इसके द्वारा महाकुम्भ में आये लाखों श्रद्धालुओं, साधुओं, संन्यासियों, वैरागियों की भक्ति, आस्था और वैराग्य का मजाक बनाना शुरू कर दिया गया. इनको आईआईटी का युवा साधु, माला बेचती युवती की आँखें, युवा साध्वी का दैहिक सौन्दर्य ही आकर्षण का केन्द्र समझ आया. महाकुम्भ की पावनता, ज्ञान, भक्ति से इतर सोशल मीडिया के लिए ये लोग फूहड़ सवालों, सेल्फी, वीडियो आदि का केन्द्रबिन्दु बने. विडम्बना देखिये कि इसी अतिवादिता के कारण इन तीनों को महाकुम्भ से प्रस्थान करना पड़ा. अखाड़ों के क्रिया-कलाप, नागा संन्यासियों की समाधिस्थ भावना, साधु-संतों की ध्यान प्रक्रिया, गृहस्थों द्वारा किया जा रहा कल्पवास, जगह-जगह होते प्रवचन, पौराणिक कथाएँ, सांस्कृतिकता आदि सोशल मीडिया के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रही.



 

ऐसा नहीं कि महाकुम्भ में पहुँचने वाला प्रत्येक साधु, संन्यासी शास्त्रों का ज्ञाता ही हो. अनेक तो पूर्ण निरक्षर भी होंगे किन्तु वे अपना सम्पूर्ण जीवन भगवद-भक्ति में समर्पित कर चुके हैं. सम्भव है कि उनके पास सोशल मीडिया के कथित चैनलों के अनर्गल प्रश्नों के उत्तर न हों. सम्भव है कि उनके पास फूहड़ कुतर्कों की काट भी न हो. उनके पास अपने आराध्य देव के प्रति श्रद्धा है, धर्म में आस्था है. ऐसे सहज लोगों के मुँह में जबरन माइक डाल कर कुछ व्यूज, लाइक आदि के लिए उन्हें अज्ञानी बताया जा रहा है. महाकुम्भ का उद्देश्य गंगा स्नान, संत दर्शन, और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना है. ऐसे में धर्म, ज्ञान, साधना आदि से अनभिज्ञ सोशल मीडिया के उतावले लोग कुम्भ की प्रतिष्ठा पर चोट कर रहे हैं.

 

शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह महाकुम्भ क्षेत्र में नियंत्रित मीडिया मंचों को ही अनुमति प्रदान करें. अनर्गल रूप से सोशल मीडिया पर दिखती रील्स, वीडियो के द्वारा जहाँ महाकुम्भ की पावनता, प्रतिष्ठा, आस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं वहीं मीडिया चैनलों की भूमिका, छवि भी धूमिल हो रही है. जिस तरह से सम्पूर्ण क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में सुरक्षाकर्मी, कैमरे, आधुनिक तकनीक कार्य कर रही है, उसके माध्यम से ही असभ्य सोशल मीडिया, यूट्यूबरों, रील्स बनाने वालों को प्रतिबंधित किया जाये. सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपमानजनक, अमर्यादित सामग्री को हटाने सम्बन्धी निर्देश जारी करने चाहिए.

 

हम सभी को समझना होगा कि त्रिवेणी संगम को जीवन के यथार्थ में उतारना कुम्भ का संदेश है. जिसमें दृश्य और दृष्टि गंगा, यमुना की भांति प्रत्यक्ष बह रही है वहीं दर्शन सरस्वती की भांति अदृश्य होकर प्रवाह बनाये है. जो दिखता है वह तो सत्य है ही पर जो नहीं दिखता है वह भी परम सत्य है. महाकुम्भ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है. इसकी पवित्रता बनाए रखना सभी का कर्तव्य है. इसे तमाशा बनाने वालों के खिलाफ खड़ा होना हम सभी का कर्तव्य है. कथित माइकधारियों और उनकी फूहड़ रिपोर्टिंग को रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को सशक्त कदम उठाने होंगे.

 


18 जनवरी 2025

मीडिया की आड़ में महाकुम्भ की नौटंकी

मीडिया में जिस तरह से असंवेदनशील लोग घुस चुके हैं, उससे विषयों का लगातार क्षरण हो रहा है. हर हाथ में स्मार्ट फोन का कैमरा, इंटरनेट, सोशल मीडिया का मंच होने से सभी को किसी न किसी मीडिया मंच का मालिक बना रखा है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस गए. इसी मुँह उठाकर घुसने की प्रवृत्ति के कारण विषयों का गाम्भीर्य गायब होता जा रहा है. इसका उदाहरण प्रयागराज में चल रहा पावन महाकुम्भ है. जिसे देखो वो मुँह उठाये खुद को स्वयंभू मीडिया चैनल घोषित करके गम्भीरता से इतर बस दो कौड़ी की रील बना-बना ठेलने में लगा है. किसी को माला बेचती युवती की आँखें दिख रही हैं, किसी को IIT वाला बाबा दिख रहा है, किसी को स्त्री-सौन्दर्य आकर्षित करने में लगा है.

 



मोबाइल के सहारे क्रांति करते कथित मीडिया व्यक्तियों को शायद जानकारी नहीं होगी कि महाकुम्भ किसे कहते हैं? नागा बाबा कौन हैं? अखाड़ों का वास्तविक अर्थ क्या है? पूरे महाकुम्भ में मात्र कुछ दिन ही विशेष स्नान क्यों होते हैं? त्रिवेणी में तीसरी नदी कहाँ है? और भी बहुत सी महत्त्वपूर्ण जानकारी इन कम-दिमाग वालों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं. इनको बस ये पता करना है कि किस युवती की आँखें ज्यादा मोहक हैं? कौन सी युवती सर्वाधिक मोहक साध्वी है? देह के आकर्षण में खोये ये बददिमाग कथित मीडियामैन महाकुम्भ में भी सिर्फ रील बनाने का 'माल' खोज रहे हैं. इनको महाकुम्भ की गहराई से कोई मतलब नहीं. महाकुम्भ के भावार्थ से कोई लेना-देना नहीं. प्रयागराज की गम्भीरता का कोई मोल नहीं? त्रिवेणी के अलौकिक सौन्दर्य का कोई महत्त्व नहीं.

 


04 अक्टूबर 2021

मौज, मस्ती, अपनेपन से सजी यात्रा

इधर लगभग चार साल के लम्बे अन्तराल के बाद प्रयागराज जाना हुआ. जबसे प्रयागराज जाना शुरू किया है, इतना लम्बा अन्तराल कभी नहीं आया. प्रयागराज, तबके इलाहाबाद की पहली यात्रा वर्ष 1994 में हुई थी. उस समय एक प्रतियोगी परीक्षा को देने के लिए वहाँ जाना हुआ था. पहली बार देर रात पहुँचने का भी अपना जबरदस्त अनुभव रहा था. युवावस्था के जोश में उस समय दिमाग में नहीं आया कि देर रात दो बजे किसी मोहल्ले, कॉलोनी में कोई इस इंतजार में नहीं बैठा होगा कि हम वहाँ आयें और उससे अपने मित्र के कमरे का पता पूछें. रेलवे स्टेशन उतरने के बाद प्रयागराज के शिवकुटी इलाके के लिए रिक्शे से चल दिए. उरई से उस इलाके की सामान्य सी जानकारी लेकर चले थे और उसी जानकारी को रिक्शे वाले के सामने उड़ेलते हुए उसके सामने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे जैसे कि हमें वहाँ के बारे में बहुत गहरी जानकारी हो. उस समय अँधेरे में तो रिक्शे वाले का चेहरा दिख नहीं रहा था मगर बाद में जब सोचते तो लगता कि वह निश्चित ही हम पर हँस रहा होगा या फिर हमें इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के किसी विद्यार्थी का परिचित समझ कर घबराया हुआ होगा.


बहरहाल, रिक्शे वाले से बतियाते हुए, आसपास की जानकारी लेते हुए शिवकुटी पहुँचने की जल्दी में थे. उस जल्दी में भी, उस अँधियारे में भी एक बार भी ख्याल नहीं आया कि यदि अपने मित्र का कमरा न मिला तो इतनी रात वापसी कहाँ के लिए करेंगे? रुकने के लिए ठिकाना कहाँ लिया जायेगा? रिक्शा चलते-चलते इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के पीछे आ गया. अभी तक के सन्नाटे भरे रास्ते के बाद अब चहल-पहल दिखाई दी. कुछ लड़कों के छोटे-छोटे से झुंड एक चाय के ढाले को अपने शोरगुल, मस्ती से गुलज़ार किये थे. उन्हीं से अपने मित्र का पता पूछा तो एक लड़के ने वहाँ का रास्ता बताया. काफी देर रिक्शे वाले सहित भटकने के बाद देर रात लगभग ढाई बजे गलियों में टहलते-धुआँबाजी करते कुछ लड़कों ने हमें हमारे मित्र के कमरे तक पहुँचाया.


उसके बाद प्रयागराज का चक्कर लगातार लगता रहा. हमारे एक अभिन्न मित्र या कहें कि किसी दूसरे नाम, रूप, आकार में हमारी ही छवि संदीप की नौकरी का आरम्भ प्रयागराज से हुआ. इफ्को की अपनी ट्रेनिंग से लेकर अभी तक प्रयागराज में ही जमा हुआ है और हमारा उसी ट्रेनिंग के समय से अभी तक लगातार उसके पास जाना होता रहता है. ट्रेनिंग के समय में बहुत-बहुत समय तक रुकना होता था उसके पास. उसके साथ उसके सहकर्मी भी रहा करते थे. सभी युवा, सभी अविवाहित, सभी मस्ताने सो बस ट्रेनिंग और उसके बाद प्रयागराज की घुमक्कड़ी. उस घुमक्कड़ी के साथ-साथ संदीप और उसके सहकर्मियों ने प्लांट भ्रमण करवा कर हमें बहुत सारे लोगों से परिचित करवा दिया.  


संदीप 


इस बार बहुत ही लम्बे अन्तराल बाद जब प्रयागराज जाना हुआ. एक शाम इफ्को के लिए निर्धारित की गई. हमारा अन्तराल भले ही बहुत लम्बा रहा हो मगर संदीप और अखिलेश ने हमारी उपस्थिति को अपने प्लांट में बनाये रखा. हमारी बातों, हमारी रचनाओं, हमारे लेखों ने हमारे नाम को उनके सहकर्मियों के बीच उपस्थित रखा. इसका एहसास उस शाम हुआ जबकि हमारा उन सभी लोगों से मिलना हुआ. एक शानदार पार्टी के बीच शेरो-शायरी की महफ़िल जमी रही, चुटकुलों की, ठहाकों की बारिश होती रही. मिलने वाले कुछ चेहरे परिचित रहे और बहुत सारे चेहरे अपरिचित थे, पहली बार मिल रहे थे मगर उस मुलाकात में आत्मीयता ऐसी जैसे कि बरसों से जानते हों. देखा जाये तो यह सही भी था. हम भले बहुत से लोगों को न जान रहे हो, पहचान रहे हों मगर संदीप और अखिलेश के कारण हमसे सभी परिचित थे.


अखिलेश


मौज-मस्ती-अपनापन आदि से सजी इस यात्रा ने लम्बे अन्तराल से उपजी बोझिलता को दूर किया. इसके साथ ही उरई के हमारे बहुत पुराने मित्र से भी मुलाकात करवा दी. यद्यपि मुलाकात अल्प समय की रही तथापि वादा किया जल्द ही दीर्घ मुलाकात की, कुछ रचनात्मकता भरी पहल के साथ. 


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