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28 अक्टूबर 2025

खुराफाती पलों का बिंदास साथी

अपने पढ़ने के शौक के कारण ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई पुस्तक मँगवाई जाए और बिना पढ़े अलमारी में सज जाए. इसी तरह ऐसा तो बहुत कम ही पुस्तकों के साथ होता है कि आने के बाद कुछ ही घंटों में उसे चट कर दिया जाये. आज ही अपने कर्मकांडी मित्र अनुराग की पुस्तक हाथ लगी. ये बात कहने में कोई गुरेज नहीं कि आज किसी भी व्यस्तता में होते उसे छोड़कर पहला काम अनुराग के उपन्यास को पढ़ना रहता. हुआ भी कुछ ऐसा ही. कॉलेज से लौटते ही कोरियर वाले ने पुस्तक थमाई उसके बाद उसी को पढ़ने का काम शुरू हुआ.

उपन्यास की समीक्षा इस पोस्ट के बाद, अभी कुछ बातें अनुराग और अपने बारे में. 1990 में स्नातक की पढ़ाई के लिए जब ग्वालियर के साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया तो हॉस्टल में सबसे पहली मुलाकात अनुराग से ही हुई. उस पहली मुलाकात में बहुत ही संक्षित सी बातचीत हुई मगर उसके बाद डिफ़ॉल्ट सेटिंग में इंस्टाल खुराफातों ने आजतक हमें और अनुराग को लगातार साथ बनाये रखा.

हॉस्टल की एक फोटो, 1991 

हॉस्टल के बहुत से मित्र आज भी साथ हैं, बहुत से सीनियर बड़े भाई की तरह अपना आशीष बनाये हुए हैं, बहुत से जूनियर छोटे भाई की तरह जीवन से जुड़े हुए हैं. सभी भाई किसी न किसी विशेषता के कारण सबसे अलग थे, आज भी अपनी उसी विशेषता के कारण अलग हैं. अनुराग पहले दिन से ही एकदम बिंदास, जिंदादिल, बेख़ौफ़ व्यक्तित्व से भरा हुआ लगा और ऐसा आजतक है. संभवतः इसी डिफ़ॉल्ट सेटिंग के कारण स्थलीय दूरी होने के बाद भी हम दोनों अलग-अलग नहीं हो सके.

हॉस्टल मीट, 2017

बिंदास, मौजियल स्वभाव के अनुराग के साथ मिलकर कितनी-कितनी खुराफातें रची गईं कहना मुश्किल है. उसकी एक बिंदास फोटो आज भी हमारे कलेक्शन को महकाती-चहकाती है. इसे आशीर्वाद ही कहा जायेगा कि 2017 में हॉस्टल मीट के दौरान मंच से हम लोगों के वार्डन रहे चंदेल सर ने अनुराग और हमारा ही नाम लेकर हमारी शरारतों का जिक्र किया. होली के ठीक पहले अनुराग के साथ मिलकर हाथ ठेला पर बिठाकर अपने एक सीनियर को रेलवे स्टेशन छोड़ने की घटना का जिक्र हम आज तक अपने दोस्तों के बीच किया करते हैं. अनुराग को पत्र मित्र कॉलम में कुमारी अनु के नाम से मिलने वाले हजारों-हजार पत्र आज भी हॉस्टल के साथियों के बीच मौज-मस्ती का बिन्दु बनते हैं.

आज अनुराग के उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते तीस साल से अधिक पुराना हॉस्टल का समय बार-बार उभर आता, उस समय की शैतानियाँ सामने आ खड़ी होतीं. कई-कई बार होंठों पर मुस्कान उभर आती, ख़ुशी में आँखें नम हो जातीं.  

मौज-मस्ती, 2021

अनुराग के ऑफिस में, 2021



08 जुलाई 2025

इसे दोस्ती नहीं कहते यारो!

फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स, इस आधुनिक शब्दावली से आप परिचित हैं? संभवतः नहीं ही होंगे किन्तु युवा वर्ग इससे अवश्य ही परिचित होगा. दरअसल विगत वर्षों में समाज ने जिस तेजी से विकास किया है, नवीनतम तकनीकी को अपनाया है उसी तेजी से उसने आधुनिक जीवनशैली को अपनाया है, उनके परिदृश्य में अपना विकास किया है. इस विकास को अपनाने में सर्वाधिक सक्रियता युवाओं ने, विशेष रूप से विषमलिंगी युवा जोड़ों ने दिखाई है. जिसके चलते समाज की प्रचलित, बंधी-बंधाई सी परिभाषाओं, शब्दावलियों से अलग इस तरह की नवीन अवधारणाओं जन्म होता रहता है. इस तरह की नवीन जीवनशैली ने, नवीन रिश्तों ने तमाम सारे सामाजिक, पारिवारिक बंधनों को, मान्यताओं को नकारते हुए अपनी ही मान्यताएँ, अपने ही जीवन-मूल्य स्थापित किये हैं.

 

इन नवीन परिभाषाओं, मान्यताओं ने न केवल ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बदला है बल्कि रिश्तों का, संबंधों का स्वरूप भी परिवर्तित किया है. इस तरह की मान्यताओं को संस्कृति, सभ्यता, जीवन-मूल्य आदि के सापेक्ष देखने के स्थान पर तात्कालिक आवश्यकता, क्षणिक सामाजिक अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स में दोस्ती का सन्दर्भ दो विषमलिंगियों के आपस में मिलने से है. यह एक ऐसा रिश्ता है जिसमें दो विषमलिंगी बिना किसी प्रतिबद्धता के, शारीरिक रूप से अंतरंग होते हैं. यहाँ आपसी सम्बन्ध का नाम दोस्ती होता है मगर यह दोस्ती उस रूप में नहीं होती जो प्रतिबद्धता की बात करे. एक-दूसरे के प्रति समर्पण, विश्वास का भाव रखे. इस हाथ दे, उस हाथ ले वाली बात यहाँ लागू होती है और यहीं से आरम्भ होती है बेनिफिट्स वाली अवधारणा. यहाँ रिश्तों की बुनियाद आपसी शर्तों के आधार पर काम करती है जहाँ भावनाओं का कोई मोल नहीं. वर्तमान आर्थिक, भोगवादी मानसिकता में जहाँ अकेलापन हैकाम का असीमित बोझ हैकार्य-स्वरूप में अनियमितता है वहाँ इस तरह के सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से बनते देखे जाते हैं. सहजता से कुछ भी कहीं भी मिल जाने की स्थिति ने इस प्रकार के रिश्तों को और भी तवज्जो दी है. किसी के सामने कोई जिम्मेदारी वाला भाव नहीं. माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ पूरी तरह से लागू होता है.

 



ऐसे रिश्तों की गहराई में जाकर देखना होगा कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं वह किस प्रकार के रिश्तों से बनता हैयह सार्वभौम सत्य है कि आज के युग में परिवारों के टूटने का चलन तेजी से बढ़ा है. लड़के और लड़कियों में कार्य करने कीघर से बाहर रह कर कैरियर बनाने की मानसिकता में अन्य जरूरतों के साथ-साथ शरीर ने भी अपनी जरूरत के अनुसार रिश्तों को स्वीकारना सीखा है. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स को वह युवा वर्ग, जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज का यह वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है. इनकी स्वच्छंद सोच पर उनके अभिभावकों का नियंत्रणसमाज का नियंत्रण दकियानूसी समझा जाने लगा है. जल्द से जल्द अपने आपको सफलता के मुकाम पर ले जानेआधुनिकता के नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्रता मान लेने की मानसिकता ने युवाओं को एक प्रकार की अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैकेजवैश्वीकरण की रंगीन मानसिकताबाँहों में विपरीतलिंगी साथी, सड़क पर बेतहाशा दौड़ते वाहनधन का अंधाधुंध दुरुपयोग आदि उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं.

 

युवा वर्ग जिसे समूचा विश्व मुट्ठी में बंद दिखता हैएक क्लिक पर समूची दुनिया उन्हें अपने सामने खड़ी दिखाई पड़ती हैऐसे में वह अपने को किसी से भी कमतर नहीं समझता है. इसमें युवा कहाँ जाकर स्वयं को नियंत्रित करेगा; आर्थिक प्राथमिकता के दौर में नैतिक पतन को कौन सँभालेगा, कहा नहीं जा सकता. आज का युवा पूरी तरह से स्वतंत्रता पाने को लालायित है. अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति, भले ही किसी भी तरह से हो, करने के लिए उत्साहित है. स्वतंत्रता के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर उच्छृंखलता, उन्मुक्तता को ज़िन्दगी का मूल समझ कर युवा कभी वन नाईट स्टैंड की, कभी लिव-इन रिलेशन की, कभी लिविंग टुगेदर की, कभी फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स की मरीचिका में भटकता रहता है. यहाँ इस तरह के संबंधों को, ऐसी दोस्ती को महत्त्व देने वाले युवा जोड़ों को संबंधों की, रिश्तों की भावना को समझना होगा. ऐसे सम्बन्ध क्षणिक संतुष्टि देते भले प्रतीत हों मगर अपनत्व के अभाव में इनके पार्श्व में संतुष्टि नहीं होती है, गम्भीरता नहीं होती है.

 

ऐसे रिश्ते को प्राथमिकता देने वाले युवा जोड़ों को दोस्ती का, दोस्त का, शारीरिक सम्बन्धों का अर्थ और सन्दर्भ समझना होगा. यदि दो विषमलिंगी दोस्ती करना चाहते हैं तो उसके लिए आवश्यक है कि वे इस तरह के रिश्ते को पूरी गरिमा के साथ समझें. दोस्ती का तात्पर्य उन दोनों लोगों के लिए क्या है, इस समझ और स्वीकृति के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहिए. दो विषमलिंगी मित्रों को यह समझना होगा दोस्तों के बीच अंतरंगता का अर्थ सिर्फ शारीरिक संबंध ही नहीं हैं. मित्र की इच्छाओं, उसकी आवश्यकताओं को जानना-पहचानना भी महत्वपूर्ण है और इसके लिए खुला संवाद, भावनात्मक समर्थन, निस्वार्थ सहयोग प्रदान करना भी एक तरह की अंतरंगता है. दोस्ती, प्यार, शारीरिक सम्बन्ध आदि के मायने समझते हुए दोस्ती को, दोस्त को फ़िल्मी फूहड़पन से बचाए जाने की आवश्यकता है. दोस्ती को लाभ के लिए न करें, दोस्त लाभ के लिए न बनाएँ अर्थात दोस्ती में स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यह एक अनमोल रिश्ता है जो बिना किसी शर्त के विश्वास, प्यार और सहयोग पर आधारित होना चाहिए. ध्यान रखें, दोस्त मुश्किल समय में साथ देने वाले होते हैं. प्रोत्साहित करने वाले, बेहतर इंसान बनाने वाले होते हैं. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स कुछ भी हो सकते हों मगर फ्रेंड नहीं हो सकते.


26 मार्च 2025

पुरानी उरई को खोजते दो अफलातून

कई वर्षों के बाद संदीप का उरई आना हुआ. प्रयागराज से सरप्राइज यात्रा के साथ रात को लगभग नौ बजे उसका उरई आना हुआ. घर पहुँचकर सामान्य हाल-चाल का आदान-प्रदान होने के बाद, चाय-जलपान के बाद दस बजे करीब स्कूटर उठाकर अपने समय की उरई को खोजने निकला गया. दोनों मित्र रात को बहुत देर तक उरई की सड़कों-गलियों में स्कूटर को दौड़ाते हुए पुराने दिनों में घूमते रहे, बीती बातें याद करते रहे. अबकी चमकती, रौशनी से जगमगाती, सीसी रोड पर दौड़ती उरई में वो बात नजर नहीं आती जो हमारे समय की उस उरई में थी. 


बहरहाल, नवीनता का स्वागत करते हुए, विगत को याद करते हुए बजाय तमाम सारी फोटोग्राफी करने के हम दोनों मित्र घूमते-बतियाते-ठहाके लगाते उरई के रंग में रँगे रहे.




23 जून 2023

बचपन की तिरछी राइटिंग और स्केचिंग

यदि कोई दोस्त यदि वाकई में आपका दोस्त है तो उसका दोस्त होना आपको प्रसन्न कर देता है. दोस्तों के मामले में, दोस्ती के मामले में हम बहुत सौभाग्यशाली रहे हैं. दोस्त हमेशा ऐसे मिले हैं जो वाकई दोस्ती के काबिल रहे, जिनकी दोस्ती पर गर्व किया जा सकता है. आप सभी में से बहुत से लोग ऐसे होंगे जिनको दोस्त की, दोस्ती की असली दौलत मिली होगी. ऐसे दोस्तों के साथ एक-दो मिनट का पल भी बहुत सुखद और मन को स्फूर्ति देने वाला होता है. 


आज के दौर में जबकि हम सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं, अपने परिवार में व्यस्त हैं, अपनी एक रूटीन दिनचर्या में व्यस्त हैं, ऐसे समय में यदि आपको कोई मित्र आपके ऐसे शौक, आपके ऐसे काम को याद रखे हो जो तीन दशकों से अधिक समय पुराना हो तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. एक गणितीय आकलन कीजिये वर्ष 1983-84 से आज 2023 के बीच के समय का. लगभग चालीस वर्ष का समय बीच में निकल गया. ऐसे में आपको भी आश्चर्य होना चाहिए कि यदि कोई दोस्त आज से चालीस साल पहले की बात को, काम को स्पष्टतः याद रखे हो. यह आश्चर्य उस समय और भी ज्यादा हो जाता है जबकि आपको इसकी जानकारी हो कि अपने इस दोस्त से आप नियमित भले मिल रहे हों मगर अपनी व्यक्तिगत रुचियाँ, अपने शौक आदि उसके साथ बाँटे न जा रहे हों.


ऐसा पढ़ कर आप लोग संशय न करने लगिएगा. पता नहीं आप सबके पास ऐसे मित्र हैं या नहीं पर हमारे पास ऐसे दोस्त हैं जिनके साथ मुलाकात किसी न किसी विशेष आयोजन पर होती है. कभी किसी त्यौहार पर, कभी किसी समारोह में, कभी किसी वैवाहिक कार्यक्रम में तो कभी किसी अन्य पारिवारिक कार्यक्रम में. उन मित्रों से भले ही पल-पल की बातें शेयर न की जाती हों, भले ही उनको अपनी नितांत गोपनीय, नितांत व्यक्तिगत जानकारी दी जाती हो मगर उनके साथ दोस्ताना सम्बन्ध में कोई कमी नहीं होती है, उनके साथ दोस्ती का जज्बा बीते दिनों की तरह ही बना रहता है. हमारे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जो आजकल अपने रोजगार, अपनी आजीविका के सम्बन्ध में उरई से बाहर हैं. बहुत से मित्र ऐसे हैं जो उरई में ही हैं मगर व्यस्तता के कारण उनसे मिलना-जुलना यदा-कदा भले होता हो मगर दोस्ती में, दोस्त होने के अंदाज में कोई कमी नहीं आई है.




बहरहाल, जो बात आपको बताना चाह रहे थे, वो दोस्तों के चक्कर में रही जा रही है. बचपन के अपने स्केचिंग, पेंटिंग के शौक को जब-तब समय मिलने पर पूरा करते रहते हैं. इस बार जून की छुट्टियों में लगभग रोज ही किसी न किसी रूप में स्केचिंग की जा रही है. कभी पेन्सिल से तो कभी सीधे पेन से. ऐसे में एक दिन विचार आया कि कोई छोटी सी डायरी आकार की स्केच बुक/डायरी ले ली जाये. उसी पर स्केच बनाने से वे सभी एक जगह सुरक्षित रहेंगे. बाजार में इस तरह की किसी स्केच बुक/डायरी के बारे में पता किया तो परिणाम शून्य मिला. अब समझ नहीं आया कि अपने इस शौक को कैसे अपने सोचे हुए ढंग से अंजाम दिया जाये. इसी सब में ध्यान आया कि व्यापारी, दुकानदार बही खाता सम्बन्धी जिस किताब का उपयोग करते हैं, उसके छोटे आकार से हमारा काम बन सकता है. अपने परिचित की एक दुकान पर अपनी बात रखी, उन्होंने तुरंत पुस्तकाकार एक बही खाता हमें थमा दिया. उपयोग करके उसकी उपयोगिता को परखने के उद्देश्य से वह लाल किताब हमने खरीद ली. 


इसके बाद जब हम अपने स्कूटर में पेट्रोल डलवाने गए तो वहाँ अपने मित्र से मुलाक़ात हो गई. वह हमारे साथ कक्षा छः से पढ़ा है. ये समय संभवतः 1983-84 का रहा होगा. पेट्रोल डलवाने के लिए जैसे ही हमने अपने स्कूटर की सीट ऊपर की तो उसको वह बही खाता पुस्तिका दिख गई. उसने आश्चर्य से पूछा तुमको क्या काम इस बही खाते का? जैसे ही हमने उसे बताया कि पेंटिंग, स्केचिंग करने के लिए लिया है तो वह बहुत ही आश्चर्य से पूछने के अंदाज में बोला कि कक्षा छ, सात, आठ के शौक अभी तक चल रहे हैं? हमने जोर का ठहाका लगाया और बताया कि वे शौक तो चल ही रहे हैं, और नए शौक जुड़ भी गए हैं. इसके बाद आश्चर्यचकित होने की बारी हमारी थी जब उसने सवाल किया कि अभी भी तिरछी राइटिंग में लिखते हो? असल में उस समय अपने फाउंटेन पेन की निब को तिरछा काटकर उसके सहारे कैलीग्राफी की जाती थी. तब न हमें मालूम था कि उस लिखने की स्टाइल को क्या कहते हैं और न ही हमारे मित्र को. उसकी याददाश्त को शाबासी देते हुए उसे बताया कि सामान्य लेखन तो सामान्य ढंग से ही होता है मगर अभी भी तिरछी राइटिंग में भी लिखते हैं.




असल में उस समय हमारी क्लास में बहुत कम बच्चे ऐसे थे जिनकी हस्तलिपि अच्छी, सुन्दर थी. उन बच्चों में एक हम थे और इसी कारण से कक्षा के बहुत से बच्चों की कॉपी में, किताबों में, प्रैक्टिकल बुक में नाम लिखने, डिजाईन बनाने का काम हमारे पास रहता था. अब जबकि कंप्यूटर के कारण से लोगों का लिखना लगभग बंद हो चुका है, तब भी हम नियमित रूप से लिखते हैं. ये बात उस दिन बड़ी न लगी जब हमारे मित्र ने हमारी चालीस बरस पुरानी बात को याद दिलाया. ये वाकई बहुत ज्यादा ख़ुशी की बात है. सबके लिए हो या न हो पर हमारे लिए अवश्य है कि कम से कम हमारे मित्र तो हमारी किसी विशेषता को आज भी याद रखे हैं.   






 

19 मई 2023

ज़िन्दगी इक सफ़र, दोस्तों संग है सुहाना

ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना, इस गीत को कितनी ही बार सुना है, गुनगुनाया है. इस गाने-गुनगुनाने के क्रम में बहुत बार मन ही मन ज़िन्दगी के बारे में विचार भी किया, उसके गुजरते चले जाने के बारे में भी सोचा. इस सफ़र में अनेक बार ऐसे मौके आये जिसने हँसने के अवसर दिए और ऐसे भी पल आये जिन्होंने आँसू भी दिए. सुख-दुःख, हँसना-रोना, मिलना-बिछड़ना आदि इस ज़िन्दगी के सफ़र के बहुत बड़ा सत्य है. इस सत्य को जानते-समझते हुए भी बहुत बार मन उदास हो जाता है, विचलित हो जाता है. बहुत सी बातें, बहुत सी घटनाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनके कारण दिल न चाहते हुए भी टूट सा जाता है, आत्मविश्वास डगमगा सा जाता है. ऐसी स्थिति में ज़िन्दगी का ये सफ़र उदास, बेरंग सा, बेमकसद सा समझ आने लगता है. लगता है जैसे कि आसपास सबकुछ खाली-खाली है, लगता है जैसे चारों तरफ एक तरह का सन्नाटा है. 


चारों तरफ के चीखते सन्नाटों में, दिल के बिना आवाज़ टूटते जाने के बीच जब ऐसा लगता है कि सबकुछ समाप्त होने वाला है, कुछ भी अपने मन का नहीं है तब दोस्त ही होते हैं जो दिल को संगीतमय बनाते हैं, मन को गुलज़ार करते हैं. यदि व्यक्तिगत रूप से अपनी बात करें तो ज़िन्दगी में बहुत से पल ऐसे आये जबकि लगा कि सबकुछ समाप्त हो गया है, लगा कि मुठ्ठी खाली की खाली रह गई है उन नाजुक से क्षणों में दोस्तों ने कंधे पर अपने साथ की मजबूती भरा हाथ रखा. हमारे खाली होते जा रहे, काँपते हाथों को अपनी हथेली में थामकर उनमें शक्ति का संचार किया है. हम साथ हैं की भाव-भंगिमा के सहारे दिल में, मन में विश्वास का भाव जगाया है. इधर कई दिनों से किसी काम में मन नहीं लग रहा था. किसी भी तरह का नैराश्य न होने के बाद भी एक निराशा जैसी स्थिति बनी हुई थी. सबकुछ ठीक-ठाक होने के बाद भी लगता था जैसे कुछ सही नहीं हो रहा. खुद के कार्यों से असंतुष्टि का भाव न होने के बाद भी खुद से अजब सी नाराजगी जैसी बनी हुई थी. सारे काम नियमित रूप से करने के बाद भी लगता था जैसे कोई काम पूरा नहीं हो रहा.




ऐसे अनकहे से, अनसुलझे से माहौल में एक वाक्य ‘आजकल बहुत निगेटिव हो रहे हो से भीतर ही भीतर ही लगा कि क्या वाकई ऐसा हो रहा है? नकारात्मकता जैसी कोई बात न होने के बाद भी यदि बातों-बातों में कोई दोस्त मानसिक स्थिति को, मनोदशा को इस रूप में देख रहा हो तो लगा कि अब खुद के सजग होने की स्थिति है. एक काम बचपन से करते आ रहे हैं, रोज रात को सोने के पहले दिन भर के कामों का आकलन, खुद अपना विश्लेषण. वही काम दिन में किया, खुद के कामों को लेकर, खुद की सक्रियता को लेकर, खुद के आसपास की स्थिति को लेकर, खुद की मनःस्थिति को लेकर. लगा कि भले ही नकारात्मकता हावी न हो रही हो मगर काम में वैसी सकारात्मकता भी नहीं है. ऐसा भी महसूस हुआ कि निष्क्रियता भी नहीं मगर पहले जैसी सक्रियता भी नहीं दिखी. सारे काम हो रहे हैं, फोटोग्राफी भी हो रही, पेंटिंग, स्केचिंग भी हो रही, नियमित लेखन भी हो रहा, पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी नियमित लिखा जा रहा फिर भी ऐसा लगता कि कुछ न किया जाये. सबकुछ करने के बाद भी करने का मन नहीं होता.


दोस्त के एक शब्द निगेटिव होने ने जैसे सोते से उठा दिया. लगा कि वाकई यदि सारे काम करने के साथ-साथ यही एहसास साथ चलता रहा कि कुछ भी नहीं हो रहा है, यदि काम करने के दौरान भी मन में यही भाव बना रहा कि कुछ भी करने का मन नहीं है तो आज नहीं तो कल नकारात्मकता हावी हो ही जाएगी, निगेटिव हो ही जाएँगे. वैसे अपने बहुत सारे मित्रों से, परिचितों से कहा भी है कि हमें अपनी काउंसलिंग करवानी है मगर वे सब इस बात को हँस कर टाल जाते हैं. हमें लगता है कि वाकई हमें अपनी काउंसलिंग करवाने की आवश्यकता है. न होगा तो हम खुद ही अपनी काउंसलिंग करेंगे. अपने उसी दोस्त के कहने के हिसाब से कि सबको कूल कर लेते हो तो खुद को भी कूल कर लो. बहरहाल, ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, बस उसमें दोस्तों की उपस्थिति का भी रहे होना. 





 

21 दिसंबर 2022

इक मुलाकात जरूरी है ज़िन्दगी के लिए

हम सभी के साथ अक्सर ऐसा होता होगा कि हम लोगों से मिलने का मन बनाये रहते हैं, बहुत से लोगों से बात करने का मन बनाये होते हैं मगर अपनी ओढ़ी हुई व्यस्तता के कारण न मिलने का समय निकाल पाते हैं और न ही फोन से बात कर पाते हैं. दिन में कई बार ऐसे विचार आने के बाद भी उसे आने वाले समय में कर लेने का सोच कर टाल जाते हैं. मिलने-जुलने, बातचीत करने का लगातार सोचते रहने के बाद भी कई-कई बार तो महीनों गुजर जाते हैं और अपने विचार को क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं. मिलना-जुलना, मेल-मिलाप, बातचीत आदि एक सामाजिक क्रिया है और इससे संबंधों में प्रगाढ़ता तो आती ही है, आपसी समन्वय-सहयोग की भावना का विकास भी होता है. यह जानते-समझते हुए भी देखने में आ रहा है कि लोगों में मिलने-जुलने की भावना कम से कमतर होती जा रही है.


ये सदियों पहले की बात नहीं है जबकि समाज में मिलने-जुलने का भाव प्रमुख था. नब्बे के दशक में भी इस तरह की गतिविधियाँ सहज रूप से संपन्न हुआ करती थीं, जबकि लोग बड़े प्रेम, स्नेह के साथ एक-दूसरे के परिजनों के साथ मेल-मिलाप करते हुए अपना जीवन-यापन करते थे. हमें बहुत अच्छे से याद है कि शाम का समय यार-दोस्तों के साथ मिलकर गप्पबाजी करने में, घूमने-टहलने में बीता करता था. किसी दोस्त के दो-चार दिन न मिलने पर उसके घर पहुँचकर उसके हालचाल लिए जाते थे. दोस्तों के बीच ही सामंजस्य या मधुर सम्बन्ध नहीं हुआ करते थे बल्कि उनके परिजन भी आपस में मैत्रीभाव से जुड़े होते थे, एक-दूसरे के बारे में जानकारी रखते थे, उनका ध्यान रखते थे. अब ऐसा देखा जाना दुर्लभ हो गया है.




इस बारे में बीते दिनों हमारी अपने एक परिचित से मुलाकात हुई. अब घर जाकर मिलने में तमाम तरह की बाध्यताओं का पालन करने के कारण से बहुत से लोगों के घरों में जाना बंद कर दिया है. अब नियमित रूप से उन्हीं मित्रों, परिचितों के घर जाया जाता है जहाँ आज भी कोई औपचारिकता नहीं है, किसी तरह की कोई बाध्यता नहीं है. हाँ तो, एक शाम हमारे एक परिचित सड़क की चहलकदमी के दौरान मिले. इधर-उधर की बातचीत के दौरान मिलने-जुलने सम्बन्धी विषय पर चर्चा आकर टिक गई. उन्होंने अपना एक अनुभव हमारे साथ बाँटा तो एक पल को झटका सा लगा. उन्होंने बताया कि उनके रिश्ते के एक भाई ने एक बार उनके पारिवारिक आयोजन के दौरान एक सवाल सबके सामने रखा कि हम लोगों का अगले दस-पन्द्रह साल में आपस में कितनी बार मिलना संभव है?


देखने-सुनने में यह सवाल एकदम सामान्य सा, सीधा-साधा सा है. बावजूद इसके हमारे परिचित के परिजनों में आश्चर्य के साथ-साथ एक अनदेखे भय का भी संचार हुआ जबकि आपस में मिलने की संख्या बहुत अधिक नहीं हो सकी. उन सबके बीच सामान्य रूप से एक बात यह उभरी कि यदि परिवार में शादी-विवाह न हों, अन्य कोई पारिवारिक आयोजन न हो तो सबका आपस में बरसों-बरस तक मिलना नहीं होता है. यह स्थिति अकेले हमारे परिचित के परिवार की नहीं है कमोबेश सभी की है. एक पल को आप भी विचार करके देखिये कि अपने परिवार में जिन सदस्यों को आप अपना बहुत ख़ास कहते हैं, सार्वजानिक रूप से जिनके लिए आप जान तक देने का दम भरते हैं, उनके साथ मुलाकात की समयावधि क्या होती है? याद करके देखिएगा कि अपने किसी आत्मीय से, जो आपका परिजन नहीं है उसके साथ आपने अंतिम मुलाकात कर की थी?


ज़िन्दगी वाकई बहुत छोटी है. मिलना-जुलना, बातचीत करना बनाये रहना चाहिए. परिवार हो या मित्र, सभी से आत्मीय सम्बन्ध बने रहना एक बात है और उनसे मिलकर अपनी भावनाओं को प्रकट कर देना एक अलग बात है. मिलना-जुलना, आपस में बैठकर तमाम बातें करना बहुत सी परेशानियों को दूर भी करता है, बहुत सी समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है. जिससे मन करे उससे मिल आना चाहिए. जिससे मन करे उससे बात कर लेना चाहिए. क्षणभंगुर जीवन में पता नहीं कब आप ही कहें कि काश! उससे मिल आये होते, फलां व्यक्ति बहुत भला था. इससे पहले संबंधों में, रिश्तों में, आत्मीयता में ‘है के स्थान पर ‘था लगे अपने कदम घर के बाहर निकालिए और अपने आत्मीय को अपनी बाँहों में भर लीजिये, उसे अपने गले लगा लीजिये.  





 

13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये. 




 

07 सितंबर 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.  





 

05 अगस्त 2022

दोस्ती तो बस दोस्ती ही होती है

इस दुनिया में सबसे अनमोल शब्द है दोस्ती और दिल के सर्वाधिक करीब शब्द रहता है दोस्ती. इन दोनों शब्दों की महत्ता को वही जान-समझ सकता है जिसने इनको अपने जीवन में स्वयं में उतार रखा हो. ऐसा नहीं हो सकता कि किसी व्यक्ति को दोस्त और दोस्ती की सम्पदा मिलती रहे और वह किसी और के लिए इस सम्पदा को छिपाए रहे. इस खजाने को पाने के साथ-साथ इसे लुटाना भी पड़ता है. व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना यही है कि दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो किसी तरह की शब्दावली से बँधा नहीं होता है, किसी भी तरह की औपचारिकता का पालन नहीं करता है, किसी भी तरह से स्वार्थी भाव नहीं रखता है. बहुत सारे परिचितों के बीच दोस्तों जैसी शब्दावली हमारे साथ भी है. 


कुछ मित्र ऐसे हैं जो बचपन से अभी तक साथ हैं. प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के समय जो गठबंधन हुआ वह आज तक निष्काम चला आ रहा है. कुछ मित्रों से माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा के दौरान मेल-मिलाप हुआ. दोस्ती के नाम पर यहाँ भी जबरदस्त जोड़ आज तक अपना काम कर रहा है. कुछ मित्र ऐसे भी हैं जिनके साथ किसी कक्षा का, किसी शैक्षणिक संस्थान का साथ न था. उनके साथ जैसे दिल का रिश्ता पहले से बना हुआ था, बस मिलने की देर थी. उनके मिलते ही एक पल में दोस्ती का पावन रिश्ता परवान चढ़ने लगा. कुछ मित्र कार्यक्षेत्र के समय मिले, कुछ ने सोशल मीडिया के द्वारा जीवन में अपना स्थान जमाया. दोस्त बने तो फिर बाकी सारी बातें पीछे रह गईं.




इधर एक घटना सामने आई तो एक बहुत पुराना घटनाक्रम याद आ गया. ज्यादातर तो ऐसी बातें हम अपने दिमाग से निकाल देते हैं मगर अक्सर उसी से मिलता-जुलता कुछ दिखाई देने पर बातें याद आ जाती हैं. ये शायद सन 2007 की बात होगी, उस समय हम उरई के गांधी महाविद्यालय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत थे. कॉलेज आने-जाने के क्रम में, शाम को बाजार घूमने की अपनी आदत में अपने बहुत से मित्रों से मुलाक़ात हो जाया करती थी. वो दौर हमारे व्यक्तिगत के लिए बहुत बुरा चल रहा था, ऐसे में मित्रों का मिलना, उनके साथ फिर पुराने दिनों को याद करना दिल-दिमाग को तरोताजा कर देता था. इसी सबके बीच एक दिन हमारे बचपन के एक दोस्त का घर आना हुआ. उससे भी नियमित रूप में मिलना-जुलना होता रहता था.


जैसी कि आमतौर पर मुलाकात होती थी, उसी तरह की मुलाकात उस दिन भी हुई. जैसा कि पहले भी कहा कि दोस्ती किसी भी तरह के संकोच, किसी भी तरह की औपचारिकता से मुक्त होती है, उसी भाव से उस दोस्त ने कहा कि इतने रुपये दो. रुपये माँगने में उसके अधिकार भाव को देखकर अच्छा लगा. हमें किसी भी रिश्ते का निःसंकोच भाव सदैव आकर्षित करता रहा है, फिर यह तो दोस्त था और वो दोस्त जो बचपन से लगातार साथ था. उस दोस्त की पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, उसका अपना छोटा सा काम भी बहुत सुखद स्थिति में नहीं चल रहा था. बहरहाल, चाय-पानी के, गप्पबाजी के दौर के बीच उसकी आवश्यकतानुसार पैसे उसको दे दिए. इसके बाद भी उसका मिलना होता रहा, गपशप ज्यों की त्यों चलती रही न उसने उन पैसों का जिक्र किया और हमारे करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था.


उस घटना के बाद चार-छह महीने बाद उसने फिर कुछ रुपयों की साधिकार माँग रखी. इसके बाद भी तीन-चार बार और ऐसा उसके द्वारा किया गया. हाँ, यहाँ आप सबको एक जानकारी और दे दें कि उसकी साधिकार माँग में धन की कीमत हर बार एक हजार रुपये से कम ही रही. एक दोपहर घर पर उसका आना हुआ. हम कॉलेज से लौटते ही जा रहे थे. उसके चेहरे का रंग एकदम से उड़ा हुआ था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई अनहोनी सी हो गई. उसके हालचाल पूछ पाते इससे पहले वह हमारी दोनों हथेलियों को पकड़ कर रो दिया. हमारी समझ से सबकुछ बाहर था. उससे कारण पूछा तो वह बोला कुछ नहीं, बस फूट-फूट कर रोता रहा. इतना तो समझ आ गया था कि कुछ भावनात्मक बात है, सो हमने भी उसके भीतर का गुबार निकल जाने दिया. कुछ मिनट के बाद वह शांत हुआ. पानी के कुछ घूँट पीने के बाद उसके बोल निकले. उसे सुनकर एकदम से हमें भी झटका लगा. उसके सबसे पहले शब्द थे, यार हमें माफ़ कर देना.


इनको सुनकर कुछ समझ न आया. क्या बकवास कर रहे हो, पगला गए हो का? कहते हुए उसे टोका तो उसने एकदम बुझे स्वर में कहा, नहीं यार, हम तुमसे कितनी बार पैसे माँग ले गए. हमें आज ही पता चला कि अभी तुमको बहुत कम तनख्वाह मिलती है. तुम्हारी इस स्थिति में हमें तुम्हारी सहायता करनी चाहिए थी और हम तुमसे ही पैसे लेते रहे. उसको बोलने से रोका तो वह हमें टोकते हुए बोला, हम तो समझते थे कि तुम्हारी नौकरी डिग्री कॉलेज में लग गई है तो पचास-साठ हजार तो मिलते ही होंगे. बस यही सोचकर हम तुमसे बिना संकोच के माँग लेते थे. हमें लगा जैसे उसको ये पता चलना कि मानदेय पर पचास-साठ हजार रुपये नहीं मिलते हैं, उसका चंद सैकड़ा रुपये माँगना शर्मिंदा कर रहा है, हमें अपने आपमें अपराधबोध सा लगने लगा. जैसी कि निपट घनघोर दोस्तों के साथ जिस तरह की शब्दावली इस्तेमाल होती है, वही करते हुए उससे कहा कि आज ये बकवास कर दी सो कर दी, आगे से करी तो जूते खाओगे. आज न सही पचास-साठ हजार रुपये पर तुम सब दोस्तों के कारण ये पचास-साठ लाख हैं हमारे लिए.


इसके बाद चाय-पानी, गपशप बहुत थोड़ी देर चली मगर दोस्ती आज तक चल रही है. उसके बाद भी उसके अधिकार जमाने वाले तीन-चार मौके आये. धीरे-धीरे समय के साथ उसकी स्थिति भी सही होती रही, हमारी भी स्थिति सही होती रही. मानदेय प्रवक्ता के समय मिलते अत्यल्प मानदेय से निकल कर समान कार्य समान वेतन में कुछ वेतन जैसा बारह महीने पाने लगे. कालांतर में सरकारी दयादृष्टि ने हमें भी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बना दिया. इसके बाद भी हम दोनों जब भी मिलते हैं तो बस बचपन वाले स्कूल की, उसी समय के साथियों की, उस समय की शरारतों की ही बातें होती हैं. 





 

21 मई 2022

चाय की चुस्कियों वाली महफ़िलें

सुबह की गरमागरम चाय पी लेने के बाद जब मोबाइल खोला तो मालूम चला कि आज अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है. चाय के बहुत बड़े चिलमची होने के बाद भी अक्सर इस दिन को भूल जाते हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि अब चाय हमारी जीवन-शैली में ऐसे शामिल हो गई है, जैसे साँस लेना. न हम साँस लेना याद रखते हैं, न भूलते हैं. कुछ ऐसा ही चाय को लेकर है. हँसी-मजाक के दौर में हम अक्सर सबसे यही कहते हैं कि यदि किसी को अपनी कोई समस्या सुलझानी हो, कोई रुका काम करवाना हो तो हमारा नाम लेकर, दो कप चाय चढ़ा दिया करे, जब हम मिलें तो हमें पिला दिया करे. ऐसा करने से सारे बिगड़े काम बन जाते हैं. 


बहरहाल, चाय दिवस के बारे में जैसे ही जानकारी हुई तो बहुत सी बातें याद आने लगीं. चाय से जुड़ी बहुत सी कहानियाँ हमारे साथ जुड़ी हुई हैं. इसके पीछे का कारण यह है कि हमारे सभी परिचितों को हमारा चाय शौक बहुत अच्छे से पता है. हमारा एक दोस्त तो आज भी कहता है कि कभी यदि गलती से ज्यादा चाय बन जाये तो परेशान न हो, बस कुमारेन्द्र को बुला लो. ये चाय का बल्क कंज्यूमर है. ऐसा सच भी है. कॉलेज टाइम में अक्सर चाय को लेकर शर्त जैसी अघोषित स्थिति बनी रहती थी. एक-एक बैठकी में दस-बीस गिलास चाय ऐसे गटक ली जाती थी जैसे हवा गटक रहे हों. गरम चाय पीने की आदत शुरू से ही थी मगर इस आदत में वृद्धि हॉस्टल में रहने के दौरान हो गई. उन दिनों बहुत सीमित जेबखर्च मिला करता था. चाय की तलब घनघोर रहती थी. उस पर विपदा ये कि कभी अकेले चाय पीना होता नहीं था. दो-चार यार-दोस्त संग रहते ही थे. तब आर्थिक समस्या से निपटने के दौर में एक रास्ता खोजने की कोशिश की जाती कि जो सबसे अंत में चाय पिएगा, वही भुगतान करेगा. ऐसे में जल्दी-जल्दी चाय पीने की आदत भी बन गई. हालाँकि इस नियम का कोई गज़ट पास तो हुआ नहीं था कि ऐसा होना ही होना है, बस तफरी के लिए, हाहा-हीही के लिए यह भी मौज होती रहती थी.




चाय का ही कमाल कहा जायेगा कि उसने हॉस्टल में हमें बड़े भाई जैसे रिश्ते से भी परिचित करवाया. पहली साल थी हॉस्टल में. अभी कुछ महीने ही हुए थे हमको. चूँकि चाय के जबरदस्त शौक़ीन होने के कारण हम हॉस्टल में अपने कमरे में चाय का पूरा इंतजाम किये रहते थे. उन्हीं दिनों हमसे एक साल आगे अक्षय भाईसाहब का हॉस्टल में आना हुआ. वे भी खूब चाय पिया करते थे. चाय की महक उड़ती हुई ऊपर की विंग से नीचे की विंग तक पहुँची. अपने साथ-साथ हम भाईसाहब के लिए भी चाय बनाने लगे. उस चाय से बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज भी उसी जिन्दादिली से चल रहा है. भाईसाहब के साथ-साथ फिर तो चाय की चुस्कियों में और भी लोग शामिल होते चले गए.


समय के साथ यार-दोस्त अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते चले गए, हम भी अपनी दुनिया में खोते चले गए. इसी सब में चाय तो पी जाती रही मगर चाय की महफ़िलें ख़त्म हो गईं. हॉस्टल टाइम में कभी लल्ला, जगदीश के यहाँ की चाय की घंटों के हिसाब से लगती महफ़िलें, कभी देर रात सखा-विलास के ढाबों पर चाय की चुस्की बीच कहानियों का जन्म, कभी रेलवे स्टेशन की चाय के साथ बनते-बिगड़ते सपने आदि-आदि पीछे छूट गए. चाय का स्वाद तभी है जब यारों की महफ़िल हो, ठहाके हों, गप्पबाजी हो. चाय स्वाद भी तभी देती है जबकि हाथ में चाय का प्याला हो, गिलास हो और उसकी चुस्की के साथ कोई न कोई कहानी हो. चाय की वही पुरानी महफ़िल फिर गुलज़ार करने की कोशिश है.


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20 मार्च 2022

वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है

मित्रों के घर आना-जाना तो सभी का लगा ही रहता है. सामान्य तौर पर जाना भी होता है और किसी विशेष अवसर पर भी जाना पड़ता है. एक ऐसा ही विशेष अवसर आया हमारी मित्र के गृह प्रवेश का. मित्रता बहुत पुरानी, अनौपचारिक और पारिवारिक है, सो जाना अनिवार्य जैसा ही था. जाना हुआ भी उसके घर. उसके परिजनों में बहुत सारे लोग ऐसे थे जिनसे मुलाकात नहीं थी मगर सभी के नामों से (कारनामों से भी) जबरदस्त परिचय था. वैसे सोशल मीडिया के कारण उन सभी पारिवारिक सदस्यों के चेहरों से भी परिचय था, बस आमने-सामने की मुलाकात नहीं थी.


फिलहाल, नियत समय पर मित्र के घर जाना हुआ. दिल-दिमाग में एक विचार बहुत बार आया कि वहाँ सबसे मिलना होगा, जिन लोगों से पहली बार मिलना होगा उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? खुद हमारा अपना व्यवहार, उनसे मिलने का अंदाज उनके प्रति कैसा होगा? उन लोगों की तरफ से मुलाकात कितनी औपचारिक, कितनी अनौपचारिक रहेगी? खैर, इस तरह के सवाल सामने आते और हम अपने स्वभाव के चलते उनको हवा में उड़ा देते क्योंकि विगत वर्षों की दोस्ती का जो अंदाज बना हुआ है उसके कारण यह तो खुद पर भरोसा था कि मुलाकात, परिचय महज औपचारिक तो नहीं ही रहेगा.


जो समय हमने स्वयं में विचार कर रखा था, उससे कुछ देरी से ही घर पहुँचना हुआ. इस देरी का बहुत बड़ा कारण गाड़ी के मिलने में होने वाली समस्या रही. होली का त्यौहार होने के कारण गाड़ियाँ सहज रूप में उपलब्ध नहीं थीं. भले ही कुछ देरी से मित्र के घर पहुँचना रहा हो मगर द्वार पर पहुँचते ही लगा नहीं कि ऐसे लोगों के सामने आकर खड़े हो गए हैं, जिनसे पहली बार मुलाकात हो रही है, पहली बार बातचीत हो रही है. स्वागत की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी की हमारी तर्ज़ पर ही हमारा स्वागत किया गया.


उसे वैसे स्वागत क्या ही कहेंगे, वो स्वागत से बहुत-बहुत ज्यादा ही कुछ था. अपनत्व, स्नेह, प्रेम, अनौपचारिकता, सम्मान, पारिवारिकता से भरपूर दरवाजे का वो अद्भुत नजारा सामने आया जैसा कि सोचा भी न था. ऐसा महसूस हुआ जैसे सभी लोग बस हमारा ही इंतजार कर रहे थे. खिलंदड अंदाज में कोई अपनी बात कह रहा था, कोई कैमरे वाले को बुलाने में लगा था, कोई फूलों की बारिश करने में, कोई गलबहियाँ करने में. और जब ऐसी स्थिति बने कि कार से उतरते ही अपेक्षा से कहीं बहुत अधिक और मनपसंद स्थिति मिल जाये तो फिर न पैर जमीन पर टिके होते हैं और न दिमाग अपने ठिकाने पर होता है. ऐसा स्वागत तो विश्वस्तर पर भी किसी VVVVIP का भी नहीं हुआ होगा या कहें कि उसने कल्पना भी नहीं की होगी.


ऐसा तब होना और भी आश्चर्यचकित करता है, मंत्रमुग्ध करता है जबकि मित्र के परिजनों से केवल खुद का नाम ही परिचित हो, सोशल मीडिया एक माध्यम रहा हो. निस्संदेह अद्भुत, अप्रतिम, स्नेह-अपनत्व-अनौपचारिकता से भरे क्षण थे वे. उन चंद पलों में न केवल हम ही वरन गृह प्रवेश के अवसर पर आये बहुत सारे लोग भी आश्चर्यचकित थे. उसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों से व्यक्तिगत मुलाक़ात करवाना, बातचीत का हास्य-बोध भरा माहौल, नितांत अनौपचारिक वातावरण में एकदम पारिवारिक सा अनुभव हो रहा था. यह व्यक्तिगत प्रसन्नता ही होती जबकि आपका पारिवारिक दायरा और अधिक विस्तार ले लेता है. इसे हम सहज रूप में महसूस कर सकते हैं.


वे चंद पल ज़िन्दगी भर के लिए अपना ऋणी बनाने के लिए पर्याप्त हैं. अब वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है.





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04 अक्टूबर 2021

मौज, मस्ती, अपनेपन से सजी यात्रा

इधर लगभग चार साल के लम्बे अन्तराल के बाद प्रयागराज जाना हुआ. जबसे प्रयागराज जाना शुरू किया है, इतना लम्बा अन्तराल कभी नहीं आया. प्रयागराज, तबके इलाहाबाद की पहली यात्रा वर्ष 1994 में हुई थी. उस समय एक प्रतियोगी परीक्षा को देने के लिए वहाँ जाना हुआ था. पहली बार देर रात पहुँचने का भी अपना जबरदस्त अनुभव रहा था. युवावस्था के जोश में उस समय दिमाग में नहीं आया कि देर रात दो बजे किसी मोहल्ले, कॉलोनी में कोई इस इंतजार में नहीं बैठा होगा कि हम वहाँ आयें और उससे अपने मित्र के कमरे का पता पूछें. रेलवे स्टेशन उतरने के बाद प्रयागराज के शिवकुटी इलाके के लिए रिक्शे से चल दिए. उरई से उस इलाके की सामान्य सी जानकारी लेकर चले थे और उसी जानकारी को रिक्शे वाले के सामने उड़ेलते हुए उसके सामने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे जैसे कि हमें वहाँ के बारे में बहुत गहरी जानकारी हो. उस समय अँधेरे में तो रिक्शे वाले का चेहरा दिख नहीं रहा था मगर बाद में जब सोचते तो लगता कि वह निश्चित ही हम पर हँस रहा होगा या फिर हमें इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के किसी विद्यार्थी का परिचित समझ कर घबराया हुआ होगा.


बहरहाल, रिक्शे वाले से बतियाते हुए, आसपास की जानकारी लेते हुए शिवकुटी पहुँचने की जल्दी में थे. उस जल्दी में भी, उस अँधियारे में भी एक बार भी ख्याल नहीं आया कि यदि अपने मित्र का कमरा न मिला तो इतनी रात वापसी कहाँ के लिए करेंगे? रुकने के लिए ठिकाना कहाँ लिया जायेगा? रिक्शा चलते-चलते इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के पीछे आ गया. अभी तक के सन्नाटे भरे रास्ते के बाद अब चहल-पहल दिखाई दी. कुछ लड़कों के छोटे-छोटे से झुंड एक चाय के ढाले को अपने शोरगुल, मस्ती से गुलज़ार किये थे. उन्हीं से अपने मित्र का पता पूछा तो एक लड़के ने वहाँ का रास्ता बताया. काफी देर रिक्शे वाले सहित भटकने के बाद देर रात लगभग ढाई बजे गलियों में टहलते-धुआँबाजी करते कुछ लड़कों ने हमें हमारे मित्र के कमरे तक पहुँचाया.


उसके बाद प्रयागराज का चक्कर लगातार लगता रहा. हमारे एक अभिन्न मित्र या कहें कि किसी दूसरे नाम, रूप, आकार में हमारी ही छवि संदीप की नौकरी का आरम्भ प्रयागराज से हुआ. इफ्को की अपनी ट्रेनिंग से लेकर अभी तक प्रयागराज में ही जमा हुआ है और हमारा उसी ट्रेनिंग के समय से अभी तक लगातार उसके पास जाना होता रहता है. ट्रेनिंग के समय में बहुत-बहुत समय तक रुकना होता था उसके पास. उसके साथ उसके सहकर्मी भी रहा करते थे. सभी युवा, सभी अविवाहित, सभी मस्ताने सो बस ट्रेनिंग और उसके बाद प्रयागराज की घुमक्कड़ी. उस घुमक्कड़ी के साथ-साथ संदीप और उसके सहकर्मियों ने प्लांट भ्रमण करवा कर हमें बहुत सारे लोगों से परिचित करवा दिया.  


संदीप 


इस बार बहुत ही लम्बे अन्तराल बाद जब प्रयागराज जाना हुआ. एक शाम इफ्को के लिए निर्धारित की गई. हमारा अन्तराल भले ही बहुत लम्बा रहा हो मगर संदीप और अखिलेश ने हमारी उपस्थिति को अपने प्लांट में बनाये रखा. हमारी बातों, हमारी रचनाओं, हमारे लेखों ने हमारे नाम को उनके सहकर्मियों के बीच उपस्थित रखा. इसका एहसास उस शाम हुआ जबकि हमारा उन सभी लोगों से मिलना हुआ. एक शानदार पार्टी के बीच शेरो-शायरी की महफ़िल जमी रही, चुटकुलों की, ठहाकों की बारिश होती रही. मिलने वाले कुछ चेहरे परिचित रहे और बहुत सारे चेहरे अपरिचित थे, पहली बार मिल रहे थे मगर उस मुलाकात में आत्मीयता ऐसी जैसे कि बरसों से जानते हों. देखा जाये तो यह सही भी था. हम भले बहुत से लोगों को न जान रहे हो, पहचान रहे हों मगर संदीप और अखिलेश के कारण हमसे सभी परिचित थे.


अखिलेश


मौज-मस्ती-अपनापन आदि से सजी इस यात्रा ने लम्बे अन्तराल से उपजी बोझिलता को दूर किया. इसके साथ ही उरई के हमारे बहुत पुराने मित्र से भी मुलाकात करवा दी. यद्यपि मुलाकात अल्प समय की रही तथापि वादा किया जल्द ही दीर्घ मुलाकात की, कुछ रचनात्मकता भरी पहल के साथ. 


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22 जून 2021

कहानी यारों-दिलदारों की

 किसी भी तरह की समस्या से कैसे निकलना है यह खुद हम पर निर्भर करता है. ये व्यक्ति की मनोदशा पर, उसके व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह किसी भी विषम परिस्थिति में खुद को संयमित करते हुए उसे अपने पक्ष में करे. पिछले वर्ष 2020 से जबसे कोरोना ने अपनी गिरफ्त में देश को लिया उसी के बाद से बहुत से लोगों में दहशत में आ गए थे. यह दहशत इस वर्ष और बढ़ गई जबकि कोरोना की दूसरी लहर का कहर दिखा. ये समय अप्रैल मध्य से भयावह सा दिखाई देने लगा था. उसी भयावहता के बीच लगातार यह प्रयास रहा कि सबको इस भयावहता से, दहशत से बचा सकें. इसके लिए लगातार लोगों से बात करना, उनके अन्दर विश्वास जगाना, उनको हिम्मत देना आदि को मिलकर, फोन से करना शुरू किया. इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये.


इसी में एक रात सोशल मीडिया पर अपने अनेक मित्रों के बीच इसी तरह की कुछ सकारात्मक बातों पर चर्चा हो रही थी. बात की बात में रंगमंच की कलाकार, साहित्यकार और हमारी मित्र गीतिका वेदिका ने किसी चर्चा पर एक शब्द यार दिलदार छोड़ा. बस उसी समय मन में, दिल में एक विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाये जिसमें अपने दोस्तों के बारे में चर्चा की जाये. तुरंत उसी समय यार-दिलदार के नाम से एक एल्बम सोशल मीडिया पर बनाया. यह काम 06 मई 2021 को शुरू किया. उस समय सिर्फ फोटो लगाने का विचार था. अपने बचपन के मित्रों से, कॉलेज समय के मित्रों से उस एल्बम को सजाना शुरू किया. शुरू में यही लग रहा था कि लोगों की निगाह में यह एक चलताऊ सा काम होगा. ऐसे एल्बम में लोगों को रुचि नहीं होगी. आखिर कोई क्यों हमारे मित्रों के बारे में उत्सुकता दिखाएगा?


चूँकि माहौल कोरोना के कारण, लॉकडाउन के कारण एकाकी था, भयावह था, दहशत से भरा हुआ था. ऐसे में लोग कुछ नया सा होते अपने बीच देखना चाह रहे होंगे और शायद इसी सोच के कारण शुरू के एक-दो दिन बाद ही यार-दिलदार एल्बम में लोगों ने उत्सुकता दिखाना शुरू की, अपनी रुचि प्रदर्शित की. मित्रों की फोटो, बहुत पुराने मित्रों की फोटो, पुराने दिनों की फोटो देखकर लोगों में भी ख़ुशी दिखाई दी. बहुत से लोगों ने अपनी फोटो के बारे में भी चर्चा की. बहुत से लोगों ने हमारे मित्रों के बारे में जानने की भी इच्छा प्रकट की. ऐसे में लगा कि किसी गम्भीर माहौल को कुछ हल्का-फुल्का बनाने के उद्देश्य से यार-दिलदार एल्बम बनाना सफल रहा.


बहुत से लोगों ने जब मित्रों के बारे में जानना चाहा, सम्बंधित चित्रों की कहानी जाननी चाही तो लगा कि अब अपने उन्हीं दोस्तों के बारे में, दोस्तों के साथ खिंचाई फोटो के बारे में, उस फोटो से सम्बंधित कहानी के बारे में, मित्रों के साथ गुजारे दिनों के बारे में भी बताया जाना चाहिए. इस तरह के काम से यदि लोगों को अपने पुराने दिन याद आ जाएँ, अपने मित्र याद आ जाएँ, मित्रों के साथ गुजारे सुहाने दिन याद आ जाएँ तो यह काम अच्छा ही कहा जायेगा. बस इसी अच्छे काम को अब ब्लॉग पर भी लगाया जायेगा. अपने मित्रों की फोटो और कहानी यहाँ भी आएगी, आप लोग भी घूमियेगा हमारे साथ, हमारे सुहाने दिनों में, हमारे मित्रों के साथ.




25 मई 2021

कमर के एक ठुमके से भीड़ छाँट देने वाला मित्र

हमें ब्लॉगिंग का चस्का लगा वर्ष 2008 में. लिखास और छपास रोग ने इंटरनेट के तत्कालीन बेहतरीन मंच से परिचित करवाया. उस दौरान खूब लिखा जाता और खूब पढ़ा जाता. अब इधर बहुत से ब्लॉगर मित्र सोशल मीडिया के दूसरे-दूसरे मंचों पर सक्रिय हो गए हैं जिसके कारण बहुत से ब्लॉगर साथी अब ब्लॉग पर कम दिखाई पड़ते हैं. बहरहाल, उन दिनों खूब लिखने, पढ़ने, टिप्पणी करने के कारण बहुत से ब्लॉगर मित्रों से आत्मीय सम्बन्ध भी बन गए थे.


आपस में अपनत्व का भाव भी खूब था. एक-दूसरे की मदद करने को भी बहुत से लोग आगे रहते थे. नए-नए लोगों को आगे बढ़ाने का काम भी बहुत से लोग करते थे. ब्लॉगिंग ने बहुत सारे मित्र बनवा दिए थे मगर मिलना उस समय किसी से नहीं हुआ था. एक तो हमारी आवागमन की समस्या बनी हुई थी, साथ ही ऐसा कोई अवसर नहीं मिल पा रहा था कि ब्लॉग जगत के साथियों से मिलना हो सके.


उन्हीं दिनों लखनऊ में ब्लॉगिंग से जुड़ा हुआ एक आयोजन हुआ. जानकारी मिली कि उसमें बहुत से ब्लॉगर साथी आ रहे हैं. लखनऊ पहुँचना मुश्किल नहीं था सो हम भी निश्चित दिन पर अपना पंजीकरण करवा कर पहुँच गए. उस आयोजन में मंच की अपनी व्यवस्था थी, जिस पर उस समय के प्रतिष्ठित ब्लॉगर साथियों का कब्ज़ा था. बहुत से वरिष्ठ और प्रतिष्ठित ब्लॉगर हॉल में अपनी गरिमामयी उपस्थिति बिखेरने में लगे थे. मंचासीन वक्ता अपने विचार रखने में मगन थे तो नीचे श्रोताओं में ज्यादातर लोग आपस में मिलने-जुलने में व्यस्त थे. मिलने वालों के चेहरे पर उत्साह था, ख़ुशी झलक रही थी.


अभी तक फोटो और विचारों के द्वारा परिचित कुछ साथियों को हमने पहचाना तो कुछ साथियों ने हमें पकड़ लिया. इसी पकड़ा-पकड़ाई में हमें शिवम भाई ने जकड़ लिया. ब्लॉगिंग में उस समय हम नए-नए उसी तरह संकोच में थे जैसे कोई नया विद्यार्थी हॉस्टल में संकोच में रहता है. शिवम ने ही हमारा कई ब्लॉगर साथियों से परिचय करवाया. मेल-मिलाप के इसी क्रम में भोजन का समय भी आ गया.


जब हम लोग गपियाते हुए भोजन हॉल के पास पहुँचे तो वहाँ पर्याप्त भीड़ थी. उस भीड़ को देखकर हम लोग बाहर आकर प्रतीक्षा करने लगे. लग रहा था जैसे भीड़ कम नहीं होने वाली. एक तो भोजन और उसके साथ भोजन करते हुए सभी से मिल लेने की उत्कंठा, सो हॉल के अन्दर जाने वाला बाहर आने का नाम नहीं लेता. ऐसे में शिवम ने मौज लेते हुए कहा कि यदि अब भीड़ कम न हो तो कहिये अन्दर घुसकर कमर का एक ठुमका लगायें, आधी भीड़ छंट जाएगी. चार-छह लोगों को एक झटके में इधर-उधर कर देने वाली उनकी कमर का आकार देख हम सभी ठहाका मार कर हँस दिए.


लखनऊ के उस ब्लॉगर सम्मलेन ने बहुत से साथियों से परिचय करवाया, संपर्क करवाया. बहुत से मित्र आज भी संपर्क में हैं. बहुत से आत्मीय संबंधों में हैं. शिवम मिश्रा भाई उन्हीं में से एक हैं. उनकी वो बरसों पुरानी बात हमें कभी न भूली और एक दिन वही याद दिलाते हुए उनको खूब हँसाया.


(उस समय हमारे पास कैमरा नहीं था और कैमरे वाला मोबाइल भी नहीं हुआ करता था. शिवम भाई ने ही ये फोटो उपलब्ध करवाई थी.)

24 मई 2021

यार की यारी और रात की आवारगी

उस शाम अचानक से एक मित्रवर प्रकट हुए घर पर. लगभग सोलह-सत्रह साल बाद राहुल को अपने सामने देखकर आश्चर्य ही हुआ. बरसों-बरस की बातें शुरू हुईं तो फिर उस रात उसे उरई में रह रहे उसके रिश्तेदार के घर वापस न जाने दिया. अगली सुबह किसी जरूरी काम को निपटाने के बाद शाम को आने का कहकर महाशय चले गए.


उस शाम अगले का आना न हुआ. चूँकि जब महाशय उरई में पढ़ते थे तो उरई में जितनी जनसंख्या थीउससे कहीं ज्यादा उनकी रिश्तेदारियाँ थीं. यही सोचकर कि पता नहीं किसके साथ अड्डेबाजी कर रहे होंगे, उसे फोन न किया. अगला दिन भी खाली निकल गया तो रात को लगभग दस बजे उसे फोन किया.


जैसा कि एक ही लँगोटी बाँधने वाले दोस्तों के साथ बातचीत होती है, वैसे ही अत्यंत शालीन (इतने शालीन कि उन शब्दों को यहाँ लिख नहीं सकते) शब्दों में उसके न आने का कारण पूछा तो अगले ने कहा कि बस दस मिनट में बताते हैं.


पाँच मिनट बाद ही राहुल का फोन आया कि हम घर आ रहे हैं मगर घर में न बैठेंगे. उरई घूमेंगे. हमने हामी भर दी और लगभग पंद्रह मिनट बाद अपनी चिर-परिचित मुस्कान, हड़बड़ी के साथ महाशय घर के दरवाजे पर थे. एक मिनट को भी न बैठने की जिद के साथ बस उरई घूमने की रट लगी हुई थी.




बिना एक पल की देरी किये हम दोनों स्कूटर पर सवार हो निकल लिए रात लगभग साढ़े दस बजे उरई की सड़कों पर. अभी अपनी गली से निकल कर सड़क पर आये ही थे कि महाशय ने अगली रट लगाईं हमारा स्कूटर चलाने की. अगल-बगल पहिये लगे होने के कारण स्कूटर एक तरफ को भागता है. हर एक के लिए चलाना सहज नहीं होता है. कुछ ऐसा ही राहुल के साथ हो रहा था मगर प्रत्येक काम को कुशलता से कर लेने के हुनर के चलते वह धीमी गति से स्कूटर को एक तरह से सड़क पर इधर-उधर लहराते हुए लुड़का सा रहा था. देर रात सुनसान सड़क पर ऐसे लहराते हुए स्कूटर चलाते देख कुछ दूर तक पुलिस की एक जीप हम लोगों के पीछे लग गई. किसी तरह की आपत्तिजनक स्थिति न देखकर जीप कुछ देर बाद आगे निकल गई.


इसके बाद स्कूटर की ड्राइविंग सीट पर बैठे हम और स्कूटर ने उरई की सड़कों को नापना शुरू किया. इधर-उधर की जगहों को घुमाने के बाद रेलवे स्टेशन की सैर करने पहुँच गए. वहाँ की चाय, रसगुल्ले के साथ हंगामा चलता रहा. ट्रेन के साथ फोटो, वीडियो बनाये गए तो प्लेटफ़ॉर्म पर मस्ती की जाती रही. लगभग चार बजे के आसपास राहुल ने उस ट्रेन की आने की स्थिति मालूम की, जिससे उसे जाना था. जानकारी मिली कि ट्रेन एक घंटे लेट है. उसके बाद वापस घर लौटना हुआ. घर की एक कप गरमागरम चाय को डकार कर राहुल अपने रिश्तेदार के घर को निकल पड़ा. हमने कहा कि रुको छोड़ आते हैं तो वो बोला, न रहने दो. अभी दौड़ते हुए जाकर बापू को उठाएँगे और कहेंगे कि देखो हम मॉर्निंग वाक करके भी लौट आये, आप अभी तक सो रहे हैं.


हँसी का ठहाका लगाते हुए महाशय भोर के धुंधलके में गुम हो गए. बाद में अगले का फोन आया जबकि ट्रेन ने उसको अपने अन्दर बिठा कर दौड़ना शुरू कर दिया था.


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