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13 अक्टूबर 2021

विषयों के बदलते रास्ते

जिस तेज़ी से समाज में परिवर्तन दिखाई दे रहा है, उसी तेज़ी से यहाँ की चर्चाओं में भी परिवर्तन हो रहा है. सामान्य रूप से ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक सामाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है

 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 


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18 मार्च 2018

सोच बदलने को अशालीन होने की जरूरत नहीं


स्तनपान करवाती मॉडल की फोटो अब फिर से चर्चा में है. इस बार उसके चर्चा में आने का कारण उसके समर्थन में उतरी कुछ महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाने और उसकी फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना रहा है. इन जागरूक महिलाओं ने इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर के तर्क-कुतर्क गढ़े हैं. किसी पत्रिका के कवर पर मॉडल की स्तनपान करवाती फोटो के विवाद को शांत करने का यही सर्वोत्तम तरीका समझ आया उसके समर्थन में उतरी महिलाओं को. यदि उस पत्रिका के सम्पादक का कथन ही सच मान लिया जाये कि उस चित्र का सन्दर्भ लोगों में सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाती किसी भी महिला के प्रति सकारात्मक सोच बनाना था. ऐसी माँ के इस कृत्य को अश्लील न समझा-माना जाये तो उसके समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान करवाती फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करती महिलाएं क्या वाकई इसी सन्देश का प्रसार-प्रचार कर रही हैं? असलियत में गंभीरता से विचार किया जाये तो इस तरह का प्रदर्शन किसी न किसी रूप में अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता की वकालत करता ही दिखता है.


समाज सभी तरह के लोगों से मिलकर बना होता और उसमें अच्छे, बुरे लोगों का भी समावेश होता है. सकारात्मक तरीके से विचार करने की आवश्यकता बस इतनी है कि आज भी सड़क चलते सभी लोगों को न तो लूटा जा रहा है और न ही सड़क चलते सभी लोग लूटने में लगे हैं. स्पष्ट है कि उसी सड़क पर जहाँ लूटमार करने वाले हैं, लुटने वाले हैं वहीं बहुतायत में ऐसे लोग भी हैं जो शांतिपूर्ण ढंग से अपना काम कर रहे हैं. संभव है कि किसी सार्वजनिक स्थल पर खुलेआम किसी माँ को स्तनपान करवाते देख बहुत से व्यक्तियों की आँखों के, चेहरे के हाव-भाव बदल जाते हों मगर इसके बाद भी ऐसे व्यक्तियों (पुरुषों कह लीजिये) की भी संख्या बहुतायत में है जो ऐसी महिला के प्रति सामान्य भाव रखते होंगे. आज आवश्यकता ऐसी भावना के प्रचार-प्रसार की है. आज जरूरत इसकी नहीं कि सिर्फ भय दिखाकर ही शांति लाने का काम किया जाये. आज आवश्यकता इसकी भी है कि कैसे सुरक्षित भाव दिखाकर लोगों में और सुरक्षा की भावना का विस्तार किया जाये. हाँ, यदि इस तरह के आन्दोलनों, प्रदर्शनों से महिलाओं को अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता चाहिए तो फिर कोई बात ही नहीं है.

ऐसी आशंका महज इस कारण उपजती है कि समाज में बनी दशकों पुरानी अवधारणा को, सोच को बदलने के लिए आक्रामकता की बजाय, सकारात्मकता की बजाय देह-प्रदर्शन जैसी स्थिति, अशालीन स्थिति बना दी जाती है. महिलाओं की माहवारी के सम्बन्ध में सोच बदलने की जरूरत महसूस हुई तो हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन छेड़ दिया गया. विपरीतलिंगियों में प्रेम का आदान-प्रदान का समर्थन करने की बात सामने आई तो किस ऑफ़ लव का आयोजन कर लिया गया. अब स्तनपान को सार्वजनिक स्थलों पर सहजता से लेने की बात की गई तो उसके लिए स्तन-प्रदर्शन की राह चलाई जाने लगी. स्त्री हो या पुरुष इस सन्दर्भ में इतना समझना चाहिए कि यदि देह की परिभाषा को अंगों-उपांगों के आधार पर तय किया जायेगा, उसके आधार पर निर्मित किया जायेगा तो समाज में नग्नता ही देखने को मिलेगी, अश्लीलता ही देखने को मिलेगी. यदि स्त्री की देह के अंगों-उपांगों के प्रदर्शन की आज़ादी उसे प्राप्त है तो बहुत से ऐसे पुरुष हैं जो मात्र ऐसी ही किसी आज़ादी की उंगली पकड़ना चाहते हैं. अंग के बदले अंग का प्रदर्शन समाज को कहाँ ले जायेगा, पता नहीं? अंग के बदले अंग के प्रदर्शन की सोच स्त्री-पुरुष को कहाँ जाकर खड़ा करेगा, पता नहीं? और जिस तरह से प्रत्येक सकारात्मक स्थिति को महज अपने आपको स्थापित करने की भावना से विवादस्पद बनाने की भावना समाज में विकसित होती जा रही है, स्त्री-पुरुष दोनों में बलवती हो रही है उससे आशंका इसकी है कि कहीं किसी दिन दाम्पत्य जीवन के गोपन का प्रस्तुतिकरण सड़क पर न होने लगे. आखिर, सत्य को समाज को आज की भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता जो है. गोपन को अगोपन बनाये जाने की आवश्यकता जो है.

05 मार्च 2018

सार्वजनिक स्तनपान : मातृत्व या विज्ञापन


ऐसा माना जाता रहा है कि पढ़-लिख कर व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं जबकि ऐसा हुआ भी है. शिक्षित व्यक्तियों ने अपने ज्ञान के आधार पर तर्कों पर तमाम निष्कर्षों को कसा है. इधर तकनीकी विकास के साथ साक्षर होती पीढ़ी ने, तकनीकी का सहारा लेकर कुछ कर-गुजरने वाली मानसिकता ने शिक्षित होने, साक्षर होने के बाद तर्क-वितर्क को कुतर्क के रास्ते पर उतार दिया है. इस तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं.

विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान के द्वारा वह न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रेक होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

ऑस्ट्रेलियाई संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी बेटी को स्तनपान कराकर इतिहास रचने वाली सीनेटर लैरिसा वा‌र्ट्स
असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. इन्हें न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. बाजार के लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?

24 जनवरी 2018

बच्चे इतने असुरक्षित क्यों

आखिर हमारे बच्चे इतने असुरक्षित क्यों होते जा रहे हैं? बच्चों के साथ अमानवीयता करने वाले इतनी हैवानियत कहाँ से लाते हैं? बच्चों के हत्यारों के सामने क्या उनके बच्चों के चेहरे नहीं उभरते होंगे?  मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने वालों को क्या अपनी मासूम बच्ची याद न आती होगी? समाज की अनेकानेक घटनाओं को देखने-अनुभव करने के साथ दिल-दिमाग प्रश्न करने की स्थिति में खड़े हो जाते हैं. दिल-दिमाग उस समय और भी अधिक प्रश्नकर्ता की मुद्रा में होता है जबकि कोई घटना किसी बच्चे से सम्बंधित होती है. एक-एक घटना पर कई-कई सवाल. एक-एक बात पर कई-कई सवाल. सवाल ऐसे भी कि जवाब देते नहीं बनता है. बच्चों के साथ अमानवीयता, उनकी हत्या, उनके साथ दुष्कर्म अब कभी-कभार वाली घटनाएँ नहीं रह गईं हैं वरन रोजमर्रा की बात हो गई है. सुबह समाचार-पत्र उठाओ तो ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा दिखता है. चौबीस घंटे में किसी भी समय टीवी खोलो उसमें ऐसी ही खबरें सामने आने लगती हैं. सोशल मीडिया पर नजर दौड़ाओ तो वो भी ऐसी ही खबरों से रचा-बसा दिखता है. कभी स्कूल के रास्ते से बच्चे का अपहरण, कभी पार्क में खेलते समय बच्चे का अपहरण, कभी घर के बाहर खेलती बच्ची का गायब होना, कभी बाजार गई बच्ची का घर वापस न लौटना. बच्चों के गायब होने की परिणति में उनका लौटना बहुत कम सुनाई देता है. ऐसे बच्चों की मृत देह ही किसी झाड़ी में, किसी सुनसान में, किसी खंडहर में मिलने की ही खबर आती है.


इन सबके बीच ही आवाज़ उठती है बच्चों के बाहर निकल कर खेलने देने की. बच्चों के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए उनके पार्क में, मैदान में खेलने की, उनके कूदने की. चर्चा होती है बच्चों को घर की चहारदीवारी से बाहर निकाल कर खेले मैदान में भेजने की. विमर्श होता है बच्चों का खेल-कूद छोड़कर मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर में व्यस्त हो जाने पर. हम भी ऐसी चर्चा करते हैं, आप सब भी ऐसी ही चर्चा अवश्य करते होंगे. आखिर हम सभी अपने बच्चों को स्वस्थ देखना चाहते हैं. उनका शारीरिक और मानसिक विकास होने देना चाहते हैं. इसीलिए चाहते हैं कि वे मकान के बंधन से बाहर निकल खुली हवा में साँस लें. घर के कमरों में खेलने के बजाय बाहर मैदान में खेलें. मोबाइल, टीवी पर कार्टून चरित्रों को करतब करते देखने के स्थान पर वे खुद बाहर पार्कों में करतब करें. आपका-हमारा सोचना कहीं से गलत नहीं है पर सवाल वही उठता है कि आखिर बच्चों को उनकी ही जान की कीमत पर खेलने-कूदने देने की आज़ादी देना कहाँ तक उचित है? क्या अब बच्चों के स्वतंत्र होकर खेलने-कूदने के दिन गुजर चुके हैं? क्या वे अब कहीं भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं?


सामाजिक विमर्श के लिए खुद को सक्षम बताने वाले सामाजिक विज्ञानी, इन्सान के दिमाग की हलचल का आकलन करने वाले मनोविज्ञानी पता नहीं किस तरह की शोध करने में लगे हैं कि वे अभी तक बच्चों के साथ हो रहे अमानवीय कृत्यों का कोई समाधान नहीं खोज पाए हैं. हमारे वैज्ञानिक मंगल पर चाँद पर यान भेजने में सक्षम हो चुके हैं. एकसाथ सैकड़ों सेटेलाईट छोड़ने में हम सक्षम हो गए हैं. वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा हमारे चिकित्सक ऑपरेशन करने लगे हैं. वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा हमारे प्रशासनिक अधिकारी जिले भर की गतिविधियों पर सजगता से रिपोर्ट लेने लगे हैं. नगर भर में प्रशासन द्वारा कैमरे लगवाकर सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता किये जाने जाने के दावे किये जाने लगे हैं. इसके बाद भी हम अपने बच्चों को सुरक्षित रख पाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं. आखिर चूक कहाँ हो रही है? आखिर गलती किसकी है? कई बार लगता है कि किसी भी तरह के सवालों का जवाब देने से बेहतर है कि हम खुद अपने बच्चों के पहरेदार बनकर उनके आसपास चौबीस घंटे मौजूद रहें. कई बार लगता है कि बच्चों का स्वास्थ्य तो किसी न किसी तरह बन ही जायेगा, उनकी जान को सलामत रखने के लिए उनको घर में ही कैद रखा जाये. समझने वाली बात ये है कि बच्चों की जान जाने का मुद्दा न तो राजनीति का विषय है, न समाजशास्त्रियों के अध्ययन का विषय है, न ही किसी बुद्धिजीवी के लिए शोध का विषय है. ऐसे में हमारे बच्चों की सुरक्षा की व्यवस्था हमारी अपनी समस्या है. हमें, हम सबको अपने बच्चों की जान की सुरक्षा के लिए खुद जागना होगा, खुद सचेत रहना होगा. 

07 जनवरी 2018

विमर्शों की बहस में

समाज और साहित्य सदैव से एक-दूसरे के लिए आईने का काम करते रहे हैं. कभी समाज ने साहित्य से कुछ लिया, कभी साहित्य ने समाज से कुछ लिया. इधर कुछ वर्षों से साहित्य और समाज में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श का चलन व्यापक रूप से देखने को मिला है। इन दोनों विमर्शों को अधिकतर एकसाथ सम्बद्ध करके देखने की प्रवृत्ति समाज में बनती जा रही है। इसके पीछे दोनों-स्त्री और दलित- को शोषित, दबा-कुचला माना जाना एक प्रमुख कारण रहा है। यह सही है कि देश में स्त्रियों की, दलितों की स्थिति दयनीय दशा में रही है और इनके उत्थान के लिए, इनके विकास के लिए समाज में लगातार प्रयास किये जाते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। इन्हीं तमाम सारे कामों के, प्रयासों के बीच विमर्श भी अपनी भूमिका निभाता रहता है। दोनों विमर्शों के पक्षधर लोग अपने-अपने हिसाब से स्थितियों को दर्शाकर अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह करते रहते हैं और इसके परिणामस्वरूप साहित्य-समाज एकदूसरे पर अपना-अपना प्रभाव छोड़ते रहते हैं। साहित्य से समाज और समाज से साहित्य कुछ न कुछ अंगीकार करते हुए स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श को प्रतिस्थापित करते रहते हैं।


            इन दोनों विमर्शों को एकसाथ इनके परिणामों के रूप में देखने की आज आवश्यकता प्रतीत होती है। समाज में इन दोनों वर्गों के आज अपने-अपने आलम्बरदार बन गये हैं, अपने-अपने मोर्चे खोल लिये गये हैं, अपने-अपने झंडे फहराने शुरू कर दिये गये हैं। इस कारण से कई बार समाज में, साहित्य में स्थिति सुधरने के स्थान पर विकृत होने की सम्भावना पनपने लगती है। आज दोनों ही विमर्शों के परिणामस्वरूप जो नया तबका उभरकर सामने आया है उसने न तो समाज का ध्यान रखा है और न ही साहित्य की सम्भावनाओं का ध्यान रखा है। ऐसे तबके का ध्यान पूरी तरह से किसी न किसी रूप में सिर्फ और सिर्फ स्वयं को प्रतिस्थापन करने में लगा हुआ है। ऐसा होने से स्त्री-विमर्श तथा दलित-विमर्श के द्वारा जो सकारात्मक परिणाम सामने आने चाहिए थे, वे कदापि नहीं आये। स्त्री-विमर्श की आड़ लेकर स्त्रियों के एक बहुत बड़े तबके ने अपनी स्वतन्त्रा का दुरुपयोग करना शुरू किया और इसका परिणाम यह हुआ कि महिलायें पुरुषों के चंगुल से बाहर आकर महिलाओं के हाथों की कठपुतली बन गईं। इसी तरह से दलित-विमर्श के नाम पर दलित साहित्यकारों ने अपनी कलम के द्वारा, अपने साहित्य के द्वारा समाज में एक प्रकार का विभेद पैदा करना शुरू कर दिया। इससे न केवल सामाजिक वैमनष्य बढ़ा है और अगड़े-पिछड़े के बीच की खाई पटने के स्थान पर बढ़ी ही है। आज दोनों विमर्शों के सिपहसालार बजाय स्थितियों को सुधारने के स्थितियों को बिगाड़ने में लगे हुए हैं।


            विमर्श के नाम पर आज साहित्य में, समाज में जिस तरह से शिगूफा चलाया जा रहा है, उससे न तो समाज का भला होने वाला है और न ही साहित्य का। कम से कम इन दोनों विमर्शों के वे महारथी, जो ये समझते-मानते हैं कि आपसी वैमनष्यता से, आपसी भेदभाव से यदि दोनों तबकों का भला हो जायेगा, उनकी स्थिति सुधर जायेगी तो वे कहीं न कहीं गलत कर रहे हैं। यदि सामाजिक सक्रियता बनाये रखने वाले, साहित्यिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाने वाले वाकई इन दोनों वर्गों का सकारात्मक भला करना चाहते हैं तो उन्हें विभेद को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि कटुता दर्शाकर, विभेद दिखाकर समाज का, साहित्य का भला कदापि नहीं होगा बल्कि रिश्तों में कड़वाहट ही बढ़ती रहेगी। हाल-फ़िलहाल स्त्री-विमर्श में विगत कुछ दिनों से मेरिटल रेप जैसी शब्दावली का निर्माण करके उसके इर्द-गिर्द छद्म क्रांतिकारी बयान देखने को मिलने लगे हैं। कुछ लेखन भी देखने को मिल रहा है। इस नवोन्मेषी विषय पर जल्द ही।  

02 जनवरी 2018

समूचा विश्व है एक सोशल मीडिया जैसा

आम दिनों की तरह मित्र-मंडली बैठी हुई थी. रात का समय, मौसम में ठंडक, हवा में भी नमी महसूस की जा रही थी. गप्पबाजी के साथ गरमा-गरम का मूड बना तो खाने-पीने की घरेलू व्यवस्था के साथ-साथ बगिया की सूखी पड़ी टहनियों, घास, बेकार जलावन को इकठ्ठा करके कैम्प फायर जैसा अनुभव लेने का प्रयास होने लगा. इस पूरी मौज-मस्ती में अनेकानेक बिन्दुओं पर चर्चा होती रही. सहमति-असहमति के स्वर बनते-बिगड़ते रहे पर दोस्ती पर किसी तरह की आँच नहीं आई. आँच यदि हम दोस्तों के बीच गर्मी देती उस आग में जब भी कम पड़ती दिखती तो कोई न कोई उसमें लकड़ी डाल कर, फूंक की तेजी दिखाकर उसे बढ़ा देता. बातचीत के अनेक बिन्दुओं के बीच सोशल मीडिया को आना ही था. ऐसा आजकल संभव हो नहीं पा रहा है किसी के लिए कि बातचीत हो और उसमें सोशल मीडिया न घुस जाए. सो, ऐसा यहाँ भी हुआ, सोशल मीडिया यहाँ भी घुसा और फिर उसमें भी अनेक पक्षों को स्वीकार-अस्वीकार किया गया.


इसी विमर्श के बीच एक मित्र ने अपनी राय व्यक्त की कि उनकी राजनैतिक पोस्ट पर जितने अधिक लाइक या फिर कमेंट आ जाते हैं, उतने लाइक या कमेंट देश सम्बन्धी, सेना सम्बन्धी किसी पोस्ट पर नहीं आते. फेसबुक पर सक्रिय बहुत से मित्रों के साथ निश्चित ही ऐसी समस्या किसी और भी विषय को लेकर हो सकती है. न जाने कितने सार्थक विषय किसी एक अनावश्यक विषय पर लिखी गई पोस्ट के अत्यधिक लाइक और कमेंट के साये में गुम हो जाते हैं. असल में वर्तमान में देखने में आ रहा है कि फेसबुक पर पाठकों से अधिक आलोचना करने वाले हैं. किसी भी विषय पर पूर्वाग्रही राय बनाकर उस पर अपनी राय देने वाले हैं. ऐसी सोच वालों ने किसी न किसी रूप में अपना एक गुट जैसा भी बना रखा है जो किसी व्यक्ति विशेष की पोस्ट पर, किसी विषय विशेष की पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जैसी नहीं देता वरन उस पर हमला जैसा करता है. ज़ाहिर सी बात है कि प्रतिक्रिया होने पर तो विमर्श की स्थिति उत्पन्न होती है किन्तु जब हमला हुआ हो तो सिवाय हमलावर बनने के, हमले के प्रत्युत्तर में हमला करने के और कोई उपाय सामने वाले के पास भी नहीं होता है. हमला के ऊपर हमला की इसी स्थिति ने बहुत सारे अच्छे विषयों को कहीं गुम कर दिया है.


आखिर ये समझ से परे है कि हम सभी तर्क-वितर्क के मामले में एकदम से आक्रामक क्यों हो जाते हैं? आखिर हम सभी अपने नकारात्मक विचारों को सामने वाले की सकारात्मकता पर हावी क्यों होने देना चाहते हैं? आखिर प्रत्येक स्थिति में हम सभी अपने ही विचारों की सर्वस्व स्वीकार्यता क्यों चाहते हैं? ऐसे बहुत से सवाल खड़े हो सकते हैं, यदि उन पर गौर किया जाये. विचारों के आदान-प्रदान से, तर्क-लगा है जैसे कि हम सभी का तर्क-वितर्क करना सिर्फ अपने आपको ही सिद्ध करने के लिए होने लगा है. हम सभी का आपस में वैचारिक आदान-प्रदान करना कम, एक-दूसरे पर अपनी बुद्धिमत्ता को स्थापित करना रह गया है. शायद ऐसा ही कुछ राज्यों में आपस में, वैश्विक स्तर पर दो देशों के मध्य आपस में होते दिख रहा है. वैसे देखा जाये तो समूचा विश्व आजकल सोशल मीडिया के फॉर्मेट में ही दिखने लगा है. सबकी एपीआई-अपनी पोस्ट, सबके अपने-अपने लाइक, सबके अपने-अपने कमेंट और फिर उन पर सबके अपने-अपने तर्क-वितर्क-कुतर्क. वैश्विक मानसिकता अब घर-घर में, व्यक्ति-व्यक्ति में दिखाई दे रही है. देखा जाये तो अब हम वास्तविक रूप में सम्पूर्ण विश्व को अपने अन्दर समाहित कर सके हैं. 

01 जुलाई 2016

सरोगेसी का बढ़ता बाज़ार

फिल्म अभिनेता तुषार कपूर के सरोगेसी द्वारा पिता बनने के बाद सरोगेसी फिर चर्चाओं में है. इससे पहले गौरी-शाहरुख द्वारा अपने तीसरे बच्चे के लिए सरोगेसी का सहारा लिए जाने पर सरोगेसी चर्चा में आई थी. विचारणीय यह है कि शाहरुख़-गौरी दो बच्चों के माता-पिता थे वहीं तुषार कपूर अविवाहित हैं, चालीस वर्ष से कम उम्र के हैं. आखिर इनको सरोगेसी की आवश्यकता क्यों पड़ी? स्पष्ट है कि यह तकनीक संतानहीन दम्पत्तियों के लिए चलन में आई है. इन सेलेब्रिटी के कारण सरोगेसी भले ही आज चर्चा का विषय बनी हो किन्तु भारत में पहले सरोगेट शिशु के साथ सरोगेसी की शुरूआत 23 जून 1994 को हो गई थी. ये और बात है कि इस तकनीक को वैश्विक स्तर पर पहचान तब मिली जबकि वर्ष 2004 में एक महिला ने ब्रिटेन में रहने वाली अपनी बेटी के लिए एक सरोगेट शिशु को जन्म दिया.

सरोगेसी लैटिन शब्द सबरोगेट से बना है जिसका अर्थ है किसी और को अपने काम के लिए नियुक्त करना. तकनीक रूप से सरोगेसी दो प्रकार, ट्रेडिशनल और जेस्टेटशनल से होती है. ट्रेडिशनल सरोगेसी में संतान सुख के इच्छु्क दंपत्ति में से पिता के शुक्राणुओं को एक स्वस्थ महिला के अंडाणु के साथ प्राकृतिक रूप से निषेचित कर सरोगेट माँ के प्राकृतिक अण्डोत्सर्ग के समय डाला जाता है. इसमें जेनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है. जेस्टेसशनल सरोगेसी में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवाकर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्चे्दानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. इसमें बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता दोनों से होता है. मूलरूप से प्रजनन विज्ञान की सहायक तकनीक के रूप में विकसित सरोगेसी के द्वारा ऐसे दम्पत्तियों को संतानसुख प्रदान किया जाता है जो कतिपय कारणोंवश संतान पैदा नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें किसी अन्य महिला को गर्भस्थ करने और गर्भावस्था के दौरान होने वाले खर्च सहित, उसकी फीस चुकानी होती है. इसी को किराये की कोख या सेरोगेट मदर का नाम दिया गया है. इस तकनीक का उपयोग एक तरफ तो निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए कर रहे हैं साथ ही वे धनवान महिलाएँ भी कर रही हैं जो प्रसूति के दौरान होने वाली तकलीफों से बचना चाहती हैं.

देखा जाये तो भारत सरोगेसी के लिए सर्वोत्तम प्लेटफ़ॉर्म के रूप में विकसित हुआ है. एक अनुमान के अनुसार प्रजनन विज्ञान की इस सहायक विधि ने सालाना 63 अरब रुपए से अधिक के कारोबार का रूप ग्रहण कर लिया है. इसे विधि आयोग ने स्वर्ण कलश का नाम दिया है. भारत में सरोगेसी सम्बन्धी कानून न होने तथा बच्चा गोद लेने की जटिल प्रक्रिया के कारण यह निःसंतान दम्पत्तियों के लिए बेहतरीन और पसंदीदा विकल्प बन गई है. भारत में सरोगेसी को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल कोई कानून नहीं है. कानून की अनुपस्थिति में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् ने क्लीनिकों के प्रमाणन, निरीक्षण और नियंत्रण के लिए 2005 में दिशानिर्देश जारी किये थे किन्तु दिशानिर्देशों के उल्लंघन और कथित तौर पर बड़े पैमाने पर सरोगेट माताओं के शोषण और जबरन वसूली के मामले सामने आने के बाद कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही है. सरोगेसी को कानूनी बनाने के लिए भारत सरकार की पहल पर एक विशेषज्ञ समिति ने सहायक प्रजनन तकनीक (नियंत्रण) कानून, 2010 का मसौदा तैयार किया. इसमें सरोगेट माताओं के लिए आयुसीमा 21-35 वर्ष के बीच और उसके अपने बच्चों सहित कुल पाँच प्रसवों को सीमित किया गया है. प्रस्तावित कानून में प्रावधान किया गया है कि अनिवासी भारतीयों सहित विदेशी नागरिक जो सरोगेसी की चाह में भारत आएंगे, उन्हें प्रस्तावित कानून के अंतर्गत इस आशय का प्रमाणपत्र देना होगा कि उनके देश में सरोगेसी को कानूनी मान्यता प्राप्त है और जन्म के बाद शिशु को उनके देश की नागरिकता दी जाएगी.

चूँकि भारत का विधि आयोग किसी भी रूप में व्यावसायिक सरोगेसी के पक्ष में नहीं है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल परोपकार के तौर पर सरोगेसी का समर्थन किया जा सकता है? सवाल ये भी है कि मात्र परोपकार के लिए कोई महिला सरोगेट माँ बनने को तैयार होगी? क्या इससे रिश्तेदारों में सरोगेट माँ बनने का दबाव नहीं बढ़ेगा? इसके साथ-साथ अनेक चिंताएँ भी हैं कि व्यावसायिकता के चलते समाज पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. विवाह जैसी संस्था जो लिव-इन-रिलेशन के चलते विखंडन की स्थिति में है सरोगेसी के चलते पूरी तरह बिखर सकती है. गरीब, अशिक्षित महिलाओं को पैसे का लालच देकर उनको बार-बार सरोगेसी के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिससे उनकी ज़िन्दगी को खतरा हो जायेगा. सरोगेसी के नियमानुसार किसी भी दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं होता है, न अस्पताल, न डॉक्टर और न संतान चाहने वाला दंपत्ति. उन महिलाओं पर अनावश्यक अत्याचार बढ़ने की आशंका है जो किसी न किसी रूप में पारिवारिक हिंसा का सामना करती हैं.


भले ही कानूनी विशेषज्ञों की राय में प्रस्तावित मसौदा सही हो. भले ही यह सरोगेट माताओं और शिशुओं के हितों को सुरक्षा और संतान की चाह रखने वाले अभिभावकों को मददगार हो किन्तु इसके बाद भी भारतीय सामाजिक ढाँचे को ध्यान में रखते हुए इसे कानून बनाने से पूर्व सामाजिक, कानूनी और राजनैतिक क्षेत्रों में व्यापक बहस अपरिहार्य है.

21 जुलाई 2014

इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता और पत्रकारों को संभलने की आवश्यकता



संसाधनों के विकसित होते जाने से प्रसार माध्यमों ने भी लगातार विकास किया है. सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहजता हुई है और पल भर में सुदूर देश की खबर हमारे सामने होती है. तकनीक के इस क्रांतिकारी विकास ने समूचे विश्व को एक गाँव में बदल कर रख दिया है. आज धरातलीय दूरियों का एहसास उस समय होता है जबकि हम व्यक्तिगत रूप से प्रत्यक्ष में एक-दूसरे से मिलने की आकांक्षा रखते हैं अन्यथा की स्थिति में लाखों-लाख किमी की दूरी भी कम महसूस होने लगी है. संचार माध्यमों की विकसित अवस्था ने जहाँ हमें प्रचार-प्रसार का उन्नत साधन उपलब्ध करवाया है वहीं इसके साये में काम कर रहे कुत्सित मानसिकता वालों ने इसे नकारात्मकता के साथ प्रयोग कर इसकी उपयोगिता पर ही सवाल उठा दिया है. संचार के इन माध्यमों में आज इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को, इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता को प्रमुखता के साथ देखा जा सकता है.
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इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता ने पत्र माध्यम की और रेडिओ की पत्रकारिता से कई कदम आगे आकर अपने श्रोताओं को खबरों के साथ, घटनाओं के साथ साक्षात् जुड़ने का मंच प्रदान किया. पत्रकारिता के माध्यमों में एकाएक उत्कर्ष प्राप्त कर लेने से इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के लिए कार्य कर रहे चैनलों, व्यक्तियों ने मुखरता से भी एक कदम आगे जाकर स्वयंभू ठेकेदार बनने का काम करना शुरू कर दिया. अपनी अहमियत को जानकर, समझकर इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने खुद को ही अंतिम सत्य, अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. आज भी शायद ही कोई नागरिक होगा जो आरुषि हत्याकांड के समय इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, चैनलों, पत्रकारों द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग को भुला पाया हो. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जुड़े पत्रकार खुद को पत्रकार से ऊपर ले जाकर किसी जांच एजेंसी की तरह व्यवहार करने लगे थे. ग्राफिक्स की मदद से बनाये जाते आकलन, निकाले जाते निष्कर्ष से समूचे केस को एक झटके में ही हल कर दिया था जबकि साक्ष्यों की कहानी कुछ और कह रही है. इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का विद्रूप भरा चेहरा उस समय भी सामने आया जबकि इनके पत्रकार मुम्बई पर आतंकी हमले और किसी समय सीमा पर चल रही गोलाबारी की लाइव रिपोर्टिंग कर दुश्मनों को हमारे सैनिकों की स्थिति की पल-पल की खबर (भले ही अनजाने में ही सही) भेजते रहे.
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अब इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के ये पत्रकार, एंकर इससे भी आगे बढ़कर खुद ही अंतिम निष्कर्ष निकालने वाले बन गए हैं. किसी भी विषय पर बहस, चर्चा के दौरान; किसी घटना की लाइव कवरेज के दौरान; किसी खबर के प्रसारण के समय इनके द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग महज खबर सुनाने वाली, जानकारी देने वाली नहीं होती बल्कि सामने वाले के मुँह में अपने शब्द ठूँसने की, सिर्फ अपनी ही बात कहने की, बात-बात पर झल्लाने की होती है. संभवतः जिस तरह की पत्रकारिता के बारे में आजतक पढ़ा-सुना है, ये वैसी तो नहीं है. पत्रकारिता जगत में आते हैं एक सामान्य से व्यक्ति में एक अजब तरह का गुरूर अपने आप जन्म ले लेता है, जो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों, माध्यमों के पत्रकारों में और भी तीव्रतम रूप से प्रकट होता है. ये समझ से परे है कि आखिर पत्रकारिता जो समाज-शासन-प्रशासन के मध्य एक तरह के पुल का काम करती है उसमें कार्य करते पत्रकारों में अहंकार का भाव किसके लिए और क्यों पैदा हो जाता है? टीवी पर दिखाई देने के कारण एक अतिरिक्त भाव से लोगों से प्रश्नों का पूछना, अपनी बात को ही अंतिम सत्य बताकर दूसरे के विचारों पर थोपना, किसी भी दल, व्यक्ति, विचार के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना किसी भी रूप में पत्रकारिता के अंतर्गत नहीं आता है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की निरंतर बढ़ती जा  ये निरंकुशता जहाँ एक तरह पत्रकारिता के मूल्यों को नुकसान पहुँचा रही है वहीं दूसरी तरफ समाज के लिए भी घातक है. संभवतः हमारे पाठक-श्रोता और खुद मीडिया से जुड़े लोग विगत दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल के पत्रकारों की करतूत को भूले नहीं होंगे. इलेक्ट्रॉनिक चैनल को, पत्रकारों को, इनके मालिकों को संभलने की आवश्यकता है; प्रेस कौंसिल जो जागरूक होने की जरूरत है; मंत्रालय को सचेत होने की जरूरत है.  
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18 जुलाई 2014

गाजा-संकट पर चर्चा की माँग, असंवेदनशील विपक्ष की पहचान

संसद में बैठे विपक्षी अत्यंत चिंतित हैं इजराइल-फिलिस्तीन संकट को लेकर। वे इस पर सदन में बहस करवाकर कोई प्रस्ताव पारित करवाने की माँग पर अड़े हैं और सत्ता पक्ष इसके लिए कतई तैयार नहीं दिखता है। विपक्षियों का अपने तरीके से सोचना शायद जायज हो सकता है, आखिर  हमारी सरकार और हमारे विपक्ष ने देश की सभी समस्याओं को सुलझा लिया है। देश में किसी तरह की, कोई भी समस्या अब दिख नहीं रही है। राष्ट्रीय स्तर की बड़ी से बड़ी समस्याएँ एकाएक सुलझ गई हैं; पड़ोसी देशों के साथ आये दिन होने वाली समस्यायों का निदान भी हो चुका है। अब पाकिस्तान की तरफ से किसी भी तरह की आतंकी घटना नहीं होती है, कश्मीर को अत्यंत सहज रूप में उसने भारत का हिस्सा मानकर अपने हिस्से वाला कश्मीर खाली कर दिया है। कुछ इसी तरह का हाल चीन का है, उसने अरुणाचल प्रदेश सहित तमाम भारतीय भूमि पर अपने कब्जे को छोड़ दिया है; घुसपैठ जैसी कोई हरकत उसने करनी बंद कर दी है। देश की अंदरूनी समस्याओं से भी निजात मिल चुकी है, महिलाएं-बेटियाँ सुरक्षित हैं; मंहगाई पूर्ण नियंत्रण में है; बिजली-संकट जैसी कोई चीज नहीं; सबको रोटी-कपड़ा-मकान-रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सहज उपलब्ध हैं। ऐसे में अब संसद करे तो क्या करे, ये बहुत बड़ा सवाल है विपक्षियों के सामने। तो फिर उन्होंने केंद्र सरकार का ध्यान राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान के बाद अंतर्राष्ट्रीय संकटों को सुलझाने पर लगाया है।
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विपक्षी कहीं संसद को संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्यालय तो नहीं समझने लगे हैं? कहीं वे ये तो मान नहीं बैठे हैं कि इजराइल-फिलिस्तीन के साथ दोस्ताना संबंधों के चलते भारतीय संसद कोई प्रस्ताव पारित कर देगी तो दोनों देश उसे मानने पर मजबूर हो जायेंगे? कहीं विपक्षियों, विशेष रूप से कांग्रेसियों को ये भ्रम तो नहीं पैदा हो गया है कि वे अभी भी सत्ता में हैं और इंदिरा-राजीव नाम के रूप में इजराइल या फिलिस्तीन को समझा लेंगे? ऐसे अवसर पर जबकि दोनों देशों के साथ भारत के सम्बन्ध दोस्ताना रहे हैं, किसी एक देश के पक्ष में समर्थन दिखाने का या प्रस्ताव पारित करने का विदेशी राजनयिक संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा बजाय इस संकट पर बहस के वहाँ फंसे भारतीयों, यदि हैं, को निकालने सम्बन्धी कोशिशों पर चर्चा हो; ऐसे ही किसी संकट के अपने आसपास उत्पन्न हो जाने की दशा में उससे निपटने के तरीकों पर चर्चा हो; ऐसे संकट के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की अनुपलब्धता होने की दशा में उसके समाधान के उपायों पर चर्चा हो किन्तु ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
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यदि विपक्ष विदेशी संकटों के मामलों में बहस का इतना ही इच्छुक है, विदेशी राजनयिक संबंधों को लेकर इतना ही सजग रहता है तो उसने ऐसी पहल ईरान संकट के समय क्यों नहीं की? उसके लिए युक्रेन की समस्या सामने आने पर ऐसा कदम क्यों नहीं उठाया गया? चीन-पाकिस्तान के कुकृत्यों का जवाब देने के लिए विपक्ष आगे क्यों नहीं आया? दरअसल वर्तमान में विपक्ष का मूल एजेंडा किसी भी रूप में केंद्र सरकार को अस्थिर बनाये रख कर कार्यों में व्यवधान उत्पन्न कराना है; केंद्र सरकार को किसी भी रूप में गलत साबित करना है। विपक्षी यदि सदन में चर्चा के इतने ही शौक़ीन हैं तो घरेलू मुद्दों पर बहस करें क्योंकि सदन तो बहस के लिए, चर्चा के लिए ही बना हुआ मंच है। अभी हमारा देश अपनी मूलभूत समस्याओं से निजात नहीं पा सका है; अभी बिजली-संकट जबरदस्त रूप से गहराया है; पिछली सरकार के घोटालों के भूत सिर पर मंडरा रहे हैं; बेटियाँ रोज ही शारीरिक शोषण-हत्या का शिकार हो रही हैं; माननीय आये दिन किसी न किसी अपराध में लिप्त होते दिख रहे हैं; अपराधी जेलों में रहकर भी माननीय बनते जा रहे हैं; नौनिहाल शिक्षा-स्वास्थ्य-रोटी के लिए आज भी भटक रहे हैं; मूलभूत आवश्यकताओं का रोना आज भी लगा हुआ है। इजराइल-फिलिस्तीन संकट के मद्देनजर सदन में चर्चा को व्याकुल विपक्षी जन-हित, देश-हित मुद्दों पर बहस के लिए केंद्र सरकार को घेरें तो उनकी भी कुछ सार्थकता है अन्यथा की स्थिति में वातानुकूलित सदन में अपनी-अपनी जीभ की खलिश मिटाने के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता है। विपक्ष का ये रवैया संवेदनशील विपक्ष की नहीं वरन केंद्र सरकार के कार्यों में रोड़े अटकाने वाले और जन-हित, देश-हित के कार्यों से मुँह चुराने वाले विपक्ष की पहचान है।
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30 नवंबर 2013

स्वच्छंदता, दैहिक स्वतंत्रता, सेक्स का घालमेल लिव-इन-रिलेशन




माननीय न्यायालय की टिप्पणी के बाद लिव-इन-रिलेशन फिर चर्चा में है. महिला मुक्ति के समर्थक ऐसे किसी भी विषय का समर्थन करते आसानी से दिख जाते हैं जहाँ से शारीरक संबंधों की बाध्यता से स्वतंत्रता मिलती दिखती हो जबकि संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाये घूमते लोग ऐसे विषयों के विरोध में बात करते दिखते हैं. देखा जाये तो इन दोनों पक्षों के लोग कहीं न कहीं एक तरह की कट्टरता का अनुपालन करते दिखते हैं. इन लोगों के लिए विषय की गंभीरता, उसके उद्देश्य, समाज पर उसका प्रभाव, उसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ और सिर्फ अपनी-अपनी बात को सिद्ध करने का अनर्गल प्रयास करने में लगे रहते हैं. लिव-इन-रिलेशन भी एक इसी तरह का विषय है जो एक तरफ स्त्री की स्वतंत्रता का आयाम तय करता है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति को ही नाजुकता प्रदान करता है.
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भूमंडलीकरण के इस दौर में युवा वर्ग अपने कैरियर को बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. उसके लिए वर्तमान में विवाह से अधिक महत्त्वपूर्ण जल्द से जल्द सफलता का मुकाम हासिल करना होता है; अधिक से अधिक धनार्जन करना होता है; ऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. आगे निकलने की आपाधापी में लगे युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास भी लगभग शून्य सा होता जा रहा है. किसी तरह की सामाजिकता का भान उन्हें इस संस्था में नहीं दीखता है वरन यह एक तरह की बंदिश, प्रतिबन्ध सा दिखाई देता है. बिना किसी प्रतिबन्ध, बिना किसी जिम्मेवारी, निर्द्वन्द्व भाव से जीवन जीने की संकल्पना, अकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन होते हैं और यदि ये कहा जाए कि ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिक, पूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है, उन महिलाओं का कोपभाजन बनना होता है जो शारीरिक स्वतंत्रता को महिला-स्वतंत्रता से सम्बद्ध करके देखती हैं. जबकि सत्यता यही है कि ऐसे संबंधों में प्रत्येक रूप में महिलाओं को ही दुष्परिणाम सहने पड़ते हैं.
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प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष की शारीरिक स्थिति नितांत भिन्न रही है. सामाजिक प्रस्थिति को सफलता के बिंदु पर ले जाने के बाद भी महिलाओं का अपनी विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रहा है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों की, गर्भ रोकने के उपायों की बाज़ार में भरमार हुई है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों की, बिन-व्याही माताओं की, कूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि देखने को मिली है. ये समूची स्थितियाँ महिलाओं को अत्यधिक प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैं; सामाजिकता का अनुपालन करते हुए वैवाहिक कर्मकांडों से बचने के लिए है; शारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए है; अल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. इस असामाजिकता को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है कि भले ही ऐसे सम्बन्ध दो अविवाहितों के बीच बनें, दो विवाहितों के बीच बनें या फिर एक अविवाहित-एक विवाहित के बीच बनें वे सिर्फ और सिर्फ अनैतिकता को ही बढ़ावा देंगे. लिव-इन-रिलेशन को सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता देने के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस हो, खुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा हो, सकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो.