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22 जून 2026

बच्चों के जीवन से खिलवाड़ बंद हो

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता  जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसी हर दुर्घटना के बाद दोषियों को चिन्हित किया जाने लगता है; सम्बंधित को गैर-कानूनी बताया जाने लगता है; अधिकारियों की अक्षमता की पहचान की जाने लगती है मगर आगे के लिए हम कोई सबक नहीं लेते हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सभी ने यह मान लिया है कि समाज में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ तंत्र ही दोषी है, व्यवस्था ही जिम्मेदार है. बच्चों से सम्बंधित किसी भी दुर्घटना के बाद भी अभिभावकों में किसी भी तरह की सजगता उपजती नहीं दिखती है, ऐसा क्यों?   

 

यदि इसी आगजनी की बात करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान की स्थिति का आकलन कर लेते? महत्त्वाकांक्षा की आड़ में हमने अपनी ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है. उनके उज्जवल भविष्य बनाने के लिए कोचिंग सेंटर्स को एकमात्र उपाय मानते हुए हम सभी एक तरह की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम रकम चुकाना ही उनका कर्तव्य बन गया है. कोचिंग में प्रवेश के नाम पर बच्चों को वहाँ भेजना भी एकमात्र उद्देश्य रह गया है. एकबारगी भी संभवतः किसी अभिभावक द्वारा कोचिंग संचालकों से वहाँ के सुरक्षा मानकों को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता है. कोचिंग में सुरक्षा सम्बन्धी क्या उपाय किये गए हैं, इस बारे में भी कोई पूछताछ नहीं करने की मानसिकता बनी हुई है. दिमाग में एक विचार गहराई से बिठा लिया गया है कि कोचिंग संचालक से ज्यादा सवाल-जवाब उनके बच्चे को वहाँ से बाहर का रास्ता दिखा देगा. ऐसी सोच के चलते लोग अकारण ही बच्चों को असुरक्षित माहौल में धकेल देते हैं.

 


आज जिस तरह का माहौल चारों तरफ दिखता है
, उसमें बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं, आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? कोचिंग सेंटर में, किसी संस्था में प्रवेश करवा देना, मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती है. यह समझना चाहिए कि बच्चे आपके ही हैं, कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं, कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं, तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.

 

शासन-प्रशासन को, व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है; हम-आपके हाथ में नहीं है कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये. लखनऊ कोचिंग की आज की दुर्घटना और इससे पहले भी हुई अनेकानेक दुर्घटनाओं से हम सबको ही सबक सीखने की आवश्यकता है. इन दुर्घटनाओं के बाद कम से कम हम लोग ही जागें क्योंकि तंत्र तो फिर सो जायेगा. अपने बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनायें. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की, संयम से उससे निपटने की राह बनाने की तरकीब सिखाएँ. असामान्य स्थिति में न केवल स्वयं को बचाने की बल्कि अपने साथियों को भी निकालने की कला सिखानी होगी. समय बहुत ही निरंकुश है और उसकी आपदाओं से बचने का रास्ता हमें ही बनाना होगा, अपने बच्चों को सिखाना होगा.

 

ऐसी किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ व्यवस्था को दोषी बता देना कहीं न कहीं हम लोगों का अपने आपको दोष-मुक्त करने जैसा है. यह घटना कोई पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें हमारे नौनिहालों ने असमय मौत को गले लगा लिया. कम से कम अब तो हम लोगों को जागना होगा. प्रशासन के बजाय, व्यवस्था के बजाय हम लोगों को ही सजग-सचेत होना पड़ेगा. तंत्र तो अपनी खाना-पूरी करके फिर से अपनी उसी चाल में, उसी ढर्रे पर लग जायेगा मगर हम लोगों को अपने बच्चों के जीवन को, उन्के भविष्य को बचाने के लिए जागना ही होगा. 

21 फ़रवरी 2026

बच्चों को इंसान बनायें न कि मशीन

अपने रंग-स्वरूप में बसंती मदहोशी ओढ़े रहने वाले मौसम में एक भय भी लिपटा रहता है. इस भय से समाज के सभी लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि एक विशेष आयु-वर्ग के बालक-बालिका ही प्रभावित होते हैं. मौसमी सुहानेपन में परीक्षाओं का आना बच्चों को भयभीत ही करता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि अब परीक्षाओं को किसी बच्चे के द्वारा सर्वाधिक अंक लाये जाने का पैमाना मान लिया गया है. ऐसी स्थिति के कारण परीक्षाओं के नाम पर ही अभिभावकों द्वारा बालमन पर एक तरह का दबाव डाला जाने लगता है. बच्चों के सामने अनेक तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन पर सभी से अधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जाने लगता है.

 

वर्तमान शैक्षिक वातावरण जिस तरह से बन गया है उसमें बच्चों की बुद्धिमत्ता से अधिक चर्चे उसके द्वारा प्राप्त अंकों के होते हैं. यहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के माहौल में ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अंकों के कारण से उनमें हीनभावना न पनपने पाए. इसके उलट हो ये रहा है कि स्वयं अभिभावकों द्वारा न केवल परिवार के बच्चों से बल्कि मोहल्ले के, सोसायटी के, विद्यालय के अन्य बच्चों के साथ अपने बच्चे की तुलना करते हुए कम अंकों के कारण उसे कमतर महसूस कराया जाता है. सोचने वाली बात ये है कि अंकों का अधिक या कम आना एक परीक्षा की प्रक्रिया, उसकी पद्धति, मूल्यांकन के वातावरण पर आना निर्भर करता है. इसके स्थान पर बच्चों की बुद्धिमत्ता, उनके कौशल, उनकी बौद्धिकता का आकलन करते हुए उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास प्रत्येक अभिभावक द्वारा किया जाता है किन्तु बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर दबाव बनाया जाना कदापि उचित नहीं.

 

अभिभावकों को ये समझना चाहिए कि बेहतर शिक्षा का सम्बन्ध किसी भी रूप में अंकों से नहीं है. उस पर भी परीक्षा जैसे मानसिक दबाव भरे माहौल में यदि परिवार का वातावरण भी बोझिल रहेगा, अभिभावकों द्वारा भी अधिकाधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जायेगा तो यह स्थिति बच्चों को नकारात्मक  रूप से प्रभावित करेगा. यह एक सामान्य सा मनोविज्ञान है कि कक्षा के, परिवारके वातावरण में और परीक्षा कक्ष के वातावरण में अंतर होता है. वातावरण का अंतर बच्चों को अलग तरह से प्रभावित करता है. कक्षा में, परिवार में अपनी पढ़ाई, अपनी याददाश्त पर शत-प्रतिशत विश्वास करने वाले बहुत से बच्चे परीक्षा कक्ष में चिन्तित, व्यग्र दिखाई देते हैं. निश्चित समय-सीमा में प्रश्नपत्र को हल करने की उनकी उलझन में यदि अधिकाधिक अंक लाने का बोझ डाल दिया जाये तो निश्चित ही बच्चे अपनी ही प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे.

 

संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु यह बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि परीक्षा के दिनों में वे अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताएँ. आज बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए.

 

इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. उनको समझाना चाहिए कि अंकों का महत्त्व उस उत्तर पुस्तिका के सन्दर्भ में है, जिस पर उनके द्वारा प्रश्नों को हल किया जाता है. जीवन की प्रतियोगिता में उनके अंकों से कहीं अधिक महत्त्व उनके कौशल का, उनकी बुद्धिमत्ता का, उनकी बौद्धिकता का है. अभिभावकों को अपने बच्चों को ये विश्वास जगाना चाहिए कि ज़िन्दगी निर्वहन के लिए, पारिवारिक सञ्चालन के लिए सिर्फ नौकरी ही अथवा बड़े-बड़े पैकेज ही एकमात्र संसाधन नहीं हैं. व्यक्तिगत अवधारणा में भले ही इनको महत्त्व दिया जा रहा हो मगर समाज की कसौटी पर आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो अपने कौशल से, अपने श्रम से, अपनी प्रतिभा से खुद को विकसित, सफलतम रूप में स्थापित कर चुके हैं.

 

घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षकों तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लादना बंद करना होगा. अपने अतृप्त सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर देना बंद करना होगा. बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने से बचना होगा. परीक्षा के दिनों में ही नहीं सामान्य दिवसों में भी बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण बनाया जाना चाहिए. संख्यात्मकता के स्थान पर गुणात्मकता का निर्माण करने पर जोर दिया जाना चाहिए. अपने बच्चों को मशीन बनाने के स्थान पर इंसान बनाने का प्रयास आज से ही करना होगा.


17 सितंबर 2025

हमारा लेखन और बाबा जी की सीख

 कुछ सीखें, बातें ज़िन्दगी भर काम आती हैं. ऐसा कुछ है हमारे साथ बाबा जी की बातों को लेकर. उनका अपने साथ सुबह की सैर पर हम तीनों भाइयों को ले जाना और पूरे रास्ते किसी न किसी कहानी, किसी न किसी दृष्टान्त के माध्यम से जीवन की सच्चाई को समझाना, जीवन में आने वाली समस्याओं से निपटने की सलाह देना. 


अपने बाबा जी के साथ अक्सर अपने लेखन सम्बन्धी चर्चा कर लिया करते थे. बचपने का अपरिपक्व लेखन बाबा जी की अनुभवी आँखों के सामने से गुजरता रहता, इसी कारण वे लेखन की गम्भीरता को देख भी रहे थे. सुबह की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन बाबा जी ने हमारे लिखे किसी लेख की चर्चा करते हुए उस लेख के एकदम विपरीत बिन्दुओं पर विमर्श शुरू किया. बाबा जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर तो हम दे सके, कुछ में अटक गए. ऐसे में बाबा जी ने हमारे लेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम लिखने लगे हो, ऐसे में किसी भी मुद्दे को, विषय को दोनों पक्षों की तरफ से देखो. जरूरी नहीं कि दोनों पक्षों को शामिल करते हुए लिखा जाये मगर दिमाग में दोनों पक्ष रहने चाहिए. 


इसके अलावा और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा लेखन के सम्बन्ध में बताई गईं, जो आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं. बचपने से पड़ी लेखन की आदत आज भी बनी हुई है, बाबा जी द्वारा दोनों पक्षों को विचार करने की बात आज भी कंठस्थ है और इसी का परिणाम है कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी विषय पर बाल की खाल निकालने की हद तक चले जाते हैं. 


आज हमारे बाबा जी की पुण्यतिथि है. उनको सादर चरण स्पर्श... सादर श्रद्धांजलि. 




08 जनवरी 2025

सोशल मीडिया की कैद में बच्चे

इंटरनेट के युग में कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया जैसे शब्द की अवधारणा नहीं थी. समय के साथ जैसे-जैसे इंटरनेट तकनीक ने विकास-गति को पकड़ा, अनेक नए-नए शब्द जुड़ते चले गए. सोशल मीडिया ऐसे ही शब्दों में से एक है. आज स्थिति यह है कि लोगों का अधिकतम समय सोशल मीडिया पर बीत रहा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. इस महत्त्वपूर्ण मंच के सुखद पहलुओं के बीच एक दुखद पहलू यह भी सामने आया कि सोशल मीडिया की गिरफ्त में बच्चे बहुतायत में हैं. उनके द्वारा दिन का बहुत सारा समय सोशल मीडिया पर गुजारा जा रहा है.

 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ पीडियाट्रिक रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. इनमें से लगभग 81 प्रतिशत व्हाट्सएप का और लगभग 55 प्रतिशत फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं. देश में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग आदि का उपयोग करने वाले बच्चे नौ से सत्रह वर्ष की उम्र के हैं, जो प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक समय यहाँ बिताते हैं. डिजिटल युग में तेजी से उभरते इन आँकड़ों को सुखद तो नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में जबकि कोरोनाकाल की ऑनलाइन शैक्षिक व्यवस्था के बाद से लगभग प्रत्येक बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन, इंटरनेट की सुविधा सहज रूप में उपलब्ध है तो उसका सोशल मीडिया पर आना भी सहज ही है. सोशल मीडिया पर आने की सहजता और सोशल मीडिया का नियंत्रण मुक्त होना निश्चित रूप में बाल-मन, किशोर-मन के लिए घातक है. ऑनलाइन शिक्षा की आड़ में वे क्या देख रहे हैं, किस वेबसाइट पर जा रहे हैं इसे देखना-समझना आवश्यक है. इंटरनेट की दुनिया में मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. ओटीटी की वेबसीरीज की अश्लीलता को, गालियों को, अश्लील भाव-भंगिमा को सोशल मीडिया में तैरती बहुतायत रील्स में देखा जा सकता है. गालियों, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. इसके चलते इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, क्रूरता आदि दिखने लगी है.

 



बच्चों के सोशल मीडिया पर बढ़ते चलन को देखते हुए पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित करने सम्बन्धी एक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के आने के बाद ऑस्ट्रेलिया के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक आदि जैसे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि सोशल मीडिया कम्पनियाँ बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा पाती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा. ऐसा वैश्विक रूप में किसी देश द्वारा पहली बार किया गया है. इस विधेयक के पारित होने के बाद बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को प्रतिबंधित किये जाने सम्बन्धी बहस भी छिड़ी. सैद्धांतिक रूप में यह कदम भले ही सार्थक लगता हो मगर व्यावहारिक रूप में इसे अमल में लाना मुश्किल ही है. आखिर किसी सोशल मीडिया कम्पनी-एजेंसी द्वारा यह कैसे निर्धारित किया जायेगा कि सम्बंधित सोशल मीडिया मंच का इस्तेमाल सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा नहीं किया जा रहा है? तकनीकी ज्ञान में पूर्णतः सक्षम आज के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए छद्म नाम, जन्मतिथि आदि के द्वारा सोलह वर्ष से अधिक का होने में कितना समय लगेगा.

 

ऐसे में यदि समाज, सरकार वाकई इसे लेकर गम्भीर है कि बच्चों का बहुतायत समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है तो उसे किसी विधेयक जैसी सैद्धांतिक स्थिति के साथ-साथ कुछ व्यावहारिक कदमों को भी उठाना होगा. स्मार्टफोन की पैरेंटल कंट्रोल सुविधा को और सशक्त करना होगा. इसके द्वारा अभिभावकों को भी अपने बच्चों के स्मार्टफोन में तमाम वेबसाइट को, सोशल मीडिया मंचों को प्रतिबंधित करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया से, इंटरनेट से होने वाले नुकसान के बारे में भी समझाया जाना होगा. आपराधिक दुनिया की जानकारी देते हुए उनके डिजिटल अरेस्ट, साइबर क्राइम, चाइल्ड पोर्नोग्राफी आदि जैसी नकारात्मकता से भी परिचित करवाना होगा. जरा-जरा सी बात को, घटना को सोशल मीडिया पर अपलोड करने, अपने दोस्तों, परिजनों के साथ शेयर करने की हानियों से परिचित करवाना होगा. उनकी इस प्रवृत्ति को रोकने का कार्य भी करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से इतर वास्तविक दुनिया की तरफ ले जाना होगा. उनको परिवार के साथ अधिक से अधिक समय बिताने को प्रोत्साहित करना होगा. मोबाइल, कम्प्यूटर, ऑनलाइन गेमिंग के स्थान पर मैदानों में खेलने को वरीयता देनी होगी. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा. पारिवारिक वातावरण को सकारात्मक, संस्कारित बनाते हुए बच्चों को सोशल मीडिया के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

 


01 सितंबर 2024

बच्चों के स्वास्थ्य पर विद्यालय समय का प्रभाव

शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए आये दिन एक विचार तैरता है कि सभी कक्षाओं में, सभी विद्यालयों में NCERT की किताबें ही होनी चाहिए; महँगी किताबों को रोका जाना चाहिए; बस्ते का बोझ कम से कम रखा जाये. इसके साथ-साथ सबको एक बात के लिए और आवाज़ उठानी चाहिए. इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए विद्यालयों का समय कम किया जाये. आज लगभग सभी विद्यालयों में समय प्रातः सात-आठ बजे से दोपहर बाद दो-तीन बजे तक का है. ऐसे समय के चलते बच्चे सुबह छह-साढ़े छह बजे घर से निकलते हैं और तीन-चार बजे तक लौटते हैं.

 

कभी विचार करिए कि इन बच्चों को सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन उचित तरीक़े से नहीं मिल पा रहा है. विद्यालयों में भोजनावकाश में बच्चे पेट ही भरते हैं, न तो उनको घर की तरह आराम से खाने का समय मिलता है और न ही वैसा भोजन. विद्यालय से तीन- चार बजे लौटने पर या तो भोजन किया नहीं जाता है या फिर बस काम चला लिया जाता है. इस तरह की भोजन स्थिति से बच्चों को दोपहर में खाद्य-पौष्टिकता नहीं मिल पा रही है. दिन में देर से भोजन करने पर रात को भी भोजन की स्थिति में अनियमितता आती है. इस स्थितियों को देखकर प्रयास किए जाएँ कि विद्यालयों का समय कम किया जाये, जिससे बच्चे दोपहर का भोजन आराम से कर सकें, पौष्टिकता के साथ कर सकें. उनकी सेहत के लिए ये आवश्यक है.


30 मार्च 2024

बचपने के सुख से दूर बचपन

बोर्ड परीक्षाओं के साथ-साथ घरेलू परीक्षाओं की समाप्ति के बाद भी बच्चे न तो उत्साहित से दिख रहे हैं और न ही पढ़ाई से मुक्त नजर आ रहे हैं. लगभग सभी बच्चों के चेहरे पर एक तरह का तनाव सा दिखाई पड़ रहा है. इनको देखकर लग ही नहीं रहा है कि इन्हीं बच्चों ने अभी कुछ दिन पहले खूब मेहनत करके परीक्षाएँ दी है. ये सारे के सारे बच्चे आज भी किसी परीक्षा को देते से नजर आते हैं. ये सच भी है, क्योंकि एक समय था जबकि परीक्षाएँ समाप्त होने के बाद कुछ दिनों तक सभी बच्चे दबाव मुक्त होकर अपनी छुट्टियों को बिताया करते थे. आजकल देखने में आ रहा है कि परीक्षा के दबाव से निकलते ही उनके ऊपर परीक्षा परिणाम का दबाव हावी होने लगता है. अंक कैसे आयेंगे? कौन सा ग्रेड मिलेगा? प्रवीणता सूची में नाम आएगा या नहीं? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों सवाल उनके मन-मष्तिष्क पर दबाव बनाने लगते हैं. इस दबाव के साथ-साथ एक दूसरी तरह का दबाव भी अपनी गिरफ्त बनाने की कोशिश करता है. बच्चों के ऊपर जहाँ परीक्षा परिणाम का दबाव उनके सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षणिक वातावरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है वहाँ एक अन्य प्रकार का दबाव उन पर व्यावसायिक स्थिति के चलते बनाया जाने लगता है. अभी परीक्षा परिणाम निकला नहीं है मगर शिक्षण संस्थानों द्वारा अगले सत्र में प्रवेश लेने के लिए युद्ध-स्तर पर तैयारियाँ चलने लगी हैं. विज्ञापनों, व्यक्तिगत संपर्कों, फोन कॉल्स के द्वारा अभिभावकों पर डोरे डालने का काम शुरू हो गया है.

 



देखा जाये तो समस्या न तो परीक्षा है, न परीक्षाफल और न ही अगली कक्षा में प्रवेश की रस्साकशी, असल समस्या है बच्चों के हिस्से में आने वाली गर्मियों की छुट्टियों पर डाका डालने की. सुनने, पढ़ने में ये भले ही अजीब सा, अलोकतांत्रिक सा लगे मगर सच यही है कि अब बच्चों के हिस्से में वे गर्मियों की छुट्टियाँ नहीं आती हैं, जिन्हें वास्तविक रूप में छुट्टियाँ कहा जाता है. परीक्षा परिणाम अभी क्या होगा, इससे किसी तरह का सरोकार रखे बिना शिक्षण संस्थानों द्वारा बच्चों का प्रवेश अगली कक्षा में कर लिया जाता है. नए शैक्षिक सत्र के नाम पर चंद दिनों चलाई गई कक्षाओं के बाद बोलचाल में स्वीकारी जाने वाली गर्मियों की छुट्टियों के लिए बच्चों के बस्तों में इतना सारा अनावश्यक काम गृहकार्य के नाम पर ठूँस दिया जाता है कि न केवल बच्चा बल्कि उसके माता-पिता तक भूल जाते हैं कि वे गर्मियों की छुट्टियों का आनंद उठा रहे हैं.

 

मई-जून माह में होने वाली गर्मियों की छुट्टियाँ विद्यालयों से दूर रहने वाले दिन अकेले नहीं हुआ करते हैं बल्कि इन छुट्टियों के द्वारा बच्चों में अपने परिजनों से मिलने, अपने आसपास के वातावरण को देखने-समझने, देशाटन करने, बिना किसी तरह का मानसिक बोझ लेकर साथियों संग समन्वय-सामंजस्य आदि की समझ विकसित हुआ करती है. अब गृहकार्य के नाम पर जिस तरह का मानसिक और किताबी बोझ बच्चों पर लाद दिया जाता है, उससे बच्चे गर्मियों की छुट्टियों का आनंद उठाना भूल ही गए हैं. एक पल को रुक कर सोचिए और महसूस करिए कि क्या आज के बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में आम के बगीचों का आनंद ले पा रहे हैं? क्या वे ग्रामीण अंचलों में रह रहे अपने बाबा-दादी, नाना-नानी अथवा अन्य रिश्तेदारों के पास जा पा रहे हैं? रातों को खुले आसमान के नीचे चाँद-सितारों को निहारते हुए किस्से-कहानियों के कल्पना-लोक में विचरण करने जैसा सुख क्या आज के बच्चे ले पा रहे हैं? क्या आज के बच्चों द्वारा निष्फिक्र रूप में तालाब, नहर, बम्बा आदि में तैरने का मजा लिया जा रहा है? क्या ये बच्चे इन छुट्टियों में खेतों-खलिहानों को वास्तविक रूप में आत्मसात कर पा रहे हैं? ऐसी स्थिति के चलते आज के बच्चे नैसर्गिक वातावरण से बहुत दूर होते चले जा रहे हैं. यह वातावरण प्राकृतिक ही नहीं बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि भी है.

 

ऐसा नहीं कि गर्मियों की छुट्टियों में मिलने वाला गृहकार्य आवश्यक नहीं, इसके द्वारा भी बच्चों का मानसिक और शैक्षणिक विकास होता है. छुट्टियों के दिनों में दिए गए प्रोजेक्ट के द्वारा उनके भीतर कुछ न कुछ नया सीखने की ललक पैदा होती है, जिज्ञासा जागती है. बावजूद इसके क्या आज मिलने वाले गृहकार्य के द्वारा ऐसा हो रहा है? विद्यालयों से गृहकार्य के नाम पर पाठ्यक्रमों की पूर्ति करवाई जाने लगी है. लम्बे-लम्बे लिखित किताबी कार्य देकर बच्चों को चौबीस घंटे किताबों में ही घुसे रहने को मजबूर किया जा रहा है. गृहकार्य के द्वारा अब न बच्चों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है, न उनकी हस्तलिपि को सुधारने पर जोर दिया जा रहा है, न ही कला-संगीत आदि किसी शौक को विकसित करने की पहल की जा रही है. अधिक से अधिक अंक लाने की अंधी दौड़, प्रवीणता सूची में सबसे ऊपर आने की कशमकश, अधिक से अधिक किताबी ज्ञान को दिमाग में भर लेने की कवायद के द्वारा बच्चों का बचपन तो पहले ही छीन लिया गया है, अब गर्मियों की छुट्टियों पर अप्रत्यक्ष डाका डालकर उनको सामाजिकता, पारिवारिकता, सांस्कृतिकता आदि से भी दूर किया जा रहा है. 





 

23 जून 2023

बचपन की तिरछी राइटिंग और स्केचिंग

यदि कोई दोस्त यदि वाकई में आपका दोस्त है तो उसका दोस्त होना आपको प्रसन्न कर देता है. दोस्तों के मामले में, दोस्ती के मामले में हम बहुत सौभाग्यशाली रहे हैं. दोस्त हमेशा ऐसे मिले हैं जो वाकई दोस्ती के काबिल रहे, जिनकी दोस्ती पर गर्व किया जा सकता है. आप सभी में से बहुत से लोग ऐसे होंगे जिनको दोस्त की, दोस्ती की असली दौलत मिली होगी. ऐसे दोस्तों के साथ एक-दो मिनट का पल भी बहुत सुखद और मन को स्फूर्ति देने वाला होता है. 


आज के दौर में जबकि हम सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं, अपने परिवार में व्यस्त हैं, अपनी एक रूटीन दिनचर्या में व्यस्त हैं, ऐसे समय में यदि आपको कोई मित्र आपके ऐसे शौक, आपके ऐसे काम को याद रखे हो जो तीन दशकों से अधिक समय पुराना हो तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. एक गणितीय आकलन कीजिये वर्ष 1983-84 से आज 2023 के बीच के समय का. लगभग चालीस वर्ष का समय बीच में निकल गया. ऐसे में आपको भी आश्चर्य होना चाहिए कि यदि कोई दोस्त आज से चालीस साल पहले की बात को, काम को स्पष्टतः याद रखे हो. यह आश्चर्य उस समय और भी ज्यादा हो जाता है जबकि आपको इसकी जानकारी हो कि अपने इस दोस्त से आप नियमित भले मिल रहे हों मगर अपनी व्यक्तिगत रुचियाँ, अपने शौक आदि उसके साथ बाँटे न जा रहे हों.


ऐसा पढ़ कर आप लोग संशय न करने लगिएगा. पता नहीं आप सबके पास ऐसे मित्र हैं या नहीं पर हमारे पास ऐसे दोस्त हैं जिनके साथ मुलाकात किसी न किसी विशेष आयोजन पर होती है. कभी किसी त्यौहार पर, कभी किसी समारोह में, कभी किसी वैवाहिक कार्यक्रम में तो कभी किसी अन्य पारिवारिक कार्यक्रम में. उन मित्रों से भले ही पल-पल की बातें शेयर न की जाती हों, भले ही उनको अपनी नितांत गोपनीय, नितांत व्यक्तिगत जानकारी दी जाती हो मगर उनके साथ दोस्ताना सम्बन्ध में कोई कमी नहीं होती है, उनके साथ दोस्ती का जज्बा बीते दिनों की तरह ही बना रहता है. हमारे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जो आजकल अपने रोजगार, अपनी आजीविका के सम्बन्ध में उरई से बाहर हैं. बहुत से मित्र ऐसे हैं जो उरई में ही हैं मगर व्यस्तता के कारण उनसे मिलना-जुलना यदा-कदा भले होता हो मगर दोस्ती में, दोस्त होने के अंदाज में कोई कमी नहीं आई है.




बहरहाल, जो बात आपको बताना चाह रहे थे, वो दोस्तों के चक्कर में रही जा रही है. बचपन के अपने स्केचिंग, पेंटिंग के शौक को जब-तब समय मिलने पर पूरा करते रहते हैं. इस बार जून की छुट्टियों में लगभग रोज ही किसी न किसी रूप में स्केचिंग की जा रही है. कभी पेन्सिल से तो कभी सीधे पेन से. ऐसे में एक दिन विचार आया कि कोई छोटी सी डायरी आकार की स्केच बुक/डायरी ले ली जाये. उसी पर स्केच बनाने से वे सभी एक जगह सुरक्षित रहेंगे. बाजार में इस तरह की किसी स्केच बुक/डायरी के बारे में पता किया तो परिणाम शून्य मिला. अब समझ नहीं आया कि अपने इस शौक को कैसे अपने सोचे हुए ढंग से अंजाम दिया जाये. इसी सब में ध्यान आया कि व्यापारी, दुकानदार बही खाता सम्बन्धी जिस किताब का उपयोग करते हैं, उसके छोटे आकार से हमारा काम बन सकता है. अपने परिचित की एक दुकान पर अपनी बात रखी, उन्होंने तुरंत पुस्तकाकार एक बही खाता हमें थमा दिया. उपयोग करके उसकी उपयोगिता को परखने के उद्देश्य से वह लाल किताब हमने खरीद ली. 


इसके बाद जब हम अपने स्कूटर में पेट्रोल डलवाने गए तो वहाँ अपने मित्र से मुलाक़ात हो गई. वह हमारे साथ कक्षा छः से पढ़ा है. ये समय संभवतः 1983-84 का रहा होगा. पेट्रोल डलवाने के लिए जैसे ही हमने अपने स्कूटर की सीट ऊपर की तो उसको वह बही खाता पुस्तिका दिख गई. उसने आश्चर्य से पूछा तुमको क्या काम इस बही खाते का? जैसे ही हमने उसे बताया कि पेंटिंग, स्केचिंग करने के लिए लिया है तो वह बहुत ही आश्चर्य से पूछने के अंदाज में बोला कि कक्षा छ, सात, आठ के शौक अभी तक चल रहे हैं? हमने जोर का ठहाका लगाया और बताया कि वे शौक तो चल ही रहे हैं, और नए शौक जुड़ भी गए हैं. इसके बाद आश्चर्यचकित होने की बारी हमारी थी जब उसने सवाल किया कि अभी भी तिरछी राइटिंग में लिखते हो? असल में उस समय अपने फाउंटेन पेन की निब को तिरछा काटकर उसके सहारे कैलीग्राफी की जाती थी. तब न हमें मालूम था कि उस लिखने की स्टाइल को क्या कहते हैं और न ही हमारे मित्र को. उसकी याददाश्त को शाबासी देते हुए उसे बताया कि सामान्य लेखन तो सामान्य ढंग से ही होता है मगर अभी भी तिरछी राइटिंग में भी लिखते हैं.




असल में उस समय हमारी क्लास में बहुत कम बच्चे ऐसे थे जिनकी हस्तलिपि अच्छी, सुन्दर थी. उन बच्चों में एक हम थे और इसी कारण से कक्षा के बहुत से बच्चों की कॉपी में, किताबों में, प्रैक्टिकल बुक में नाम लिखने, डिजाईन बनाने का काम हमारे पास रहता था. अब जबकि कंप्यूटर के कारण से लोगों का लिखना लगभग बंद हो चुका है, तब भी हम नियमित रूप से लिखते हैं. ये बात उस दिन बड़ी न लगी जब हमारे मित्र ने हमारी चालीस बरस पुरानी बात को याद दिलाया. ये वाकई बहुत ज्यादा ख़ुशी की बात है. सबके लिए हो या न हो पर हमारे लिए अवश्य है कि कम से कम हमारे मित्र तो हमारी किसी विशेषता को आज भी याद रखे हैं.   






 

10 मई 2023

ऐसे संयोग भी बिरले ही होते हैं - 2300वीं पोस्ट

शिक्षा किसी के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस शिक्षा के द्वारा व्यक्ति न केवल संस्कारित बनता है बल्कि अपनी भावनाओं के प्रकटीकरण को लेकर भी सजग होता है. पता नहीं ये सबके साथ होता है या नहीं मगर हमारे साथ हमारे उन सभी शिक्षण संस्थानों के साथ आत्मिक लगाव रहा है जहाँ से हमने शिक्षा प्राप्त की है. प्राथमिक शिक्षा के लिए संस्थान रहा हो या या फिर उच्च शिक्षा का संस्थान, न उस संस्थान को, न वहाँ के शिक्षकों को हमने विस्मृत किया है.


इसी क्रम में अपनी उच्च शिक्षा से जुड़े एक शिक्षण संस्थान दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का जिक्र करना आज अत्यावाशय्क हो गया है. वैसे इस पोस्ट को हमने 08 मार्च को लिखा था मगर जब बात ख़ास थी तो पोस्ट भी ख़ास होनी चाहिए थी, यही सोचकर इसे रोक रखा था. चलिए, अब दोनों बातें एक-एक करके आपको बताते चलें. पहली बात चूँकि हमारे कॉलेज से जुडी है, इसलिए पहले उसे बताते हैं. विगत दो दशकों से अधिक समय से अध्यापन कार्य से जुड़े होने के बाद भी इस साल पहली बार अवसर मिला कि हमें कहीं बाह्य परीक्षक के रूप में मौखिकी परीक्षा लेने जाना था. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि विगत वर्षों में कई बार ऐसे अवसर आने के बाद भी हम इनकार करते रहे. शायद दस्तावेज के रूप में दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का नाम ही जुड़ना था.




इस महाविद्यालय के प्राध्यापक नीरज, जो हमारे मित्र भी हैं, का फोन आने पर पहले हमने उनको इनकार कर दिया, वो भी इस रूप में कि मित्र की मौज ले ली जाए. असलियत ये थी कि दयानंद वैदिक महाविद्यालय के नाम से हमें इनकार करना ही नहीं था. अब आते हैं इस नाम के आकर्षण के पीछे की कहानी पर. असल में जहाँ ये महाविद्यालय स्थित हैं, वहाँ हमारा निवास स्थान है. और निवास स्थान भी कोई आज का नहीं दशकों पुराना है. उस दौर का है जबकि हम इस महाविद्यालय के प्रांगण का उपयोग अध्यापन के लिए नहीं बल्कि अपने खेलकूद के लिए किया करते थे. उन दिनों का स्मरण आप लोग भी साथ में कीजिये, जबकि हम सन 1985 में रामनगर स्थित अपने मकान में आये और उसके बगल में डीवी कॉलेज को देखा. ये भी एक संयोग था कि तत्कालीन प्राध्यापकों के बच्चे हमउम्र होने के कारण या तो हमारे सहपाठी थे या फिर खेल के मैदान के मित्र थे. इसी कारण से कॉलेज कभी अनजाना सा नहीं लगा. खेलकूद के लिए मैदान का उपयोग करने के साथ-साथ वहाँ की शैक्षिणक सुविधाओं का लाभ लिया गया.


अब जबकि नीरज का फोन आया तो मन में एक लालच था अपने महाविद्यालय में बाह्य परीक्षक के रूप में जाने का. अपना महाविद्यालय इसलिए क्योंकि यहाँ बचपन में खेले तो हैं ही, कालांतर में यहाँ अध्ययन भी किया और उसके बाद अध्यापन कार्य भी किया. ये संयोग एकमात्र हमारे साथ नहीं जुड़ा होगा मगर हमारे लिए तो वाकई बिरला संयोग कहा जायेगा. इस महाविद्यालय में न केवल हमारा बचपन खेलकूद में बीता बल्कि अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद यहीं हमने परास्नातक में प्रवेश लिया था. सन 1995 में अर्थशास्त्र विषय से परास्नातक होने के बाद उसी साल जुलाई से महाविद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था. अर्थशास्त्र विषय से अध्यापन के साथ-साथ वर्ष 1998 से यहीं हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य करने का अवसर भी मिला. अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ यहीं से हमें अपनी दोनों पी-एच.डी. करने का अवसर भी मिला.




ऐसे सुखद संयोग को हम किसी भी रूप में अपने हाथ से गँवाना नहीं चाह रहे थे. नीरज से कुछ मिनट के हँसी-मजाक के बाद बाह्य परीक्षक के लिए हाँ कर दी. 08 तारीख को पोस्ट लिखने के दौरान पोस्ट की संख्या देखी तो लगा कि इसे एक-दो दिन के लिए टाल दिया जाये तो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण घटना के साथ-साथ पोस्ट भी विशेष हो जाएगी. असल में हमारे इस ब्लॉग की ये 2300वीं पोस्ट है. विगत 15 वर्षों से नियमित रूप से ब्लॉग-लेखन का ये सुफल आज दिख रहा है. एकसाथ दो-दो बातों को आप सबके बीच बाँटना बहुत ही अच्छा लग रहा है. बड़ों के आशीर्वाद, छोटों के स्नेह और साथियों के सहयोग का सुखद परिणाम है कि आज हम इस दोहरी ख़ुशी को आप सबके बीच साझा कर रहे हैं. आप सभी लोग अपना स्नेह बनाये रखियेगा. 



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इस ब्लॉग की 2300वीं पोस्ट है ये.



 

19 फ़रवरी 2023

दबाव न बनायें बच्चों पर

मौसम में बसंती रंग चढ़ने को है और बच्चों के सामने परीक्षा किसी भय की तरह खड़ी होने लगी है. विभिन्न बोर्ड परीक्षाएँ आरम्भ होने लगी हैं. बच्चों की परीक्षाएँ आरम्भ होने पर और उसके पूर्व भी उनके अभिभावकों द्वारा बालमन पर अतिरिक्त दबाव डाला जाने लगता है. सार्वजनिक रूप से भले ही अभिभावक इसे न स्वीकारें किन्तु सत्य यही है कि उनके द्वारा अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दबाव बहुत बुरी तरह से डाला जाता है. बचपन में ही अध्ययन को लेकर अतिरिक्त सजगता दिखाना, ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की चाह, कक्षा में-विद्यालय में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने की कामना करना, अन्य दूसरे बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा की भावना का नकारात्मक रूप विकसित करना आदि बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर असर डाल रहा है. ये सारा दबाव समूचे वर्ष भर तो काम करता ही है किन्तु इसका विकृत और भयावह रूप परीक्षाओं के समय देखने को मिलता है. दिन-दिन भर, गई रात तक, अलस्सुबह जगाकर बच्चों के दिमाग में किताबों को लगभग ठूँस देने की मानसिकता बहुतायत अभिभावकों में देखी जा रही है.


आजकल जिस तरह से कॉन्वेंट पद्धति का विकास हुआ, जिस तरह से अत्यधिक किताबों का बोझ बच्चों पर लादा जा रहा है, जिस तरह से कठिन से कठिन पाठ्यक्रम को मंजूरी दी जा रही है, जिस तरह से कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की बहुतायत किताबों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है वो चिंता का विषय होना चाहिए. ये सब कुछ अकेले विद्यालय प्रबंधन की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा अकेले निजी प्रकाशकों की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले दलालों-माफियाओं की मंशा से नहीं हो रहा है वरन इसमें कहीं न कहीं अभिभावकों की मंशा भी अन्तर्निहित है. वे एकदम से अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते हैं. वे एकदम से अपने बच्चों में विश्व के सभी क्षेत्रों का ज्ञान समाहित हुए देखना चाहते हैं.




अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास अपेक्षित है किन्तु घर में दवाब भरा माहौल बना देना उचित नहीं. बहुतायत में ये बच्चे अपने-अपने विद्यालयों में एक तरह का अनुशासनात्मक माहौल का बिगड़ा हुआ स्वरूप देखते हैं. क्लासरूम का माहौल, शिक्षा पद्धति का मानक स्वरूप न होना, अत्यधिक पाठ्यक्रम, रटने की मानसिकता आदि से बच्चों में स्कूलों के वातावरण के प्रति एक भय दिखता है. लगभग उसी तरह का माहौल वह अपने घर में देखता है, अपने अभिभावकों में भी शिक्षक का अनुशासन देखता है, अधिकाधिक अंक लाने का दबाव देखता है तो बच्चा अनजाने ही अवसाद की स्थिति में चला जाता है. ऐसी स्थिति के आने पर ऐसे बच्चे गुमसुम, शांत, बिना किसी अतिरिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया के देखे जा सकते हैं. डरे-सहमे से ये बच्चे किसी अनजान व्यक्ति के सामने सहजता से व्यवहार नहीं कर पाते हैं. न केवल उनके साथ बल्कि हमउम्र बच्चों के साथ भी उनको समन्वय करने में, सहयोग करने में समस्या होती है. ये स्थितियाँ आगे चलकर बच्चों में एकाकीपन की, अकेलेपन की भावना पैदा करती हैं. घर-स्कूल का दबाव ही कहा जायेगा जबकि नौनिहाल आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठाने लगे हैं, घरों से भागने लगे हैं.


बच्चों द्वारा असफलता के भय से अथवा कुछ प्रतिशत अंक कम आने के चलते मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ अधिकारों, स्वतंत्रता, फ्री-सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन आदि जैसी अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न हैं, वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए किसी तरह की चर्चा नहीं होती है. ये सम्पूर्ण समाज के लिए क्षोभ का विषय होना चाहिए कि एक बच्चा कुछ प्रतिशत कम अंक आने के भय से अथवा कम अंक आने के कारण मृत्यु को चुन लेता है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से नजर आते हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने में लगे हैं. इसके चलते अभिभावकों, शिक्षकों के असफल अतीत को अपने भविष्य द्वारा पूरा करने के चक्कर में बच्चों द्वारा अपना वर्तमान दोषपूर्ण बना लिया जाता है.


संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो गई हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु ये सब बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताने का काम करें. आज के दूषित वातावरण में बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे ही छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें सहयोग की भावना विकसित करने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए. इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. यदि हम आने वाले समय में ऐसा कर पाए तो अवश्य ही विकास की राह प्रशस्त कर पायेंगे, अन्यथा कष्ट तो दिनों-दिन बढ़ते ही जाना है. 

 






 

08 जनवरी 2023

पेन की दीवानगी और बचपन के मँहगे पेन

फेसबुक पर अतिसक्रियता दिखाने वाले राम द्विवेदी, जो अक्सर हलकी-फुलकी पोस्ट के बीच गंभीर पोस्ट लगाकर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते रहते हैं. आज भी उनके द्वारा कुछ ऐसा ही किया गया. Luxor Pilot पेन से सम्बंधित एक पोस्ट लगाई और उसमें हमें भी टैग कर दिया. चूँकि पेन का जबरदस्त शौक हमें हैं, ये बात न केवल राम जानते हैं बल्कि हमारे सभी परिचित भी जानते हैं, इसी कारण से उस पोस्ट में हमें टैग किया गया था. पोस्ट देखी तो वो Luxor Pilot Pen से सम्बंधित थी. आज की पोस्ट के द्वारा बीते दिनों की सैर करवाई जा रही थी. जिस पेन की फोटो राम ने लगाईं थी, अस्सी-नब्बे के दौर में किसी भी साधारण विद्यार्थी के लिए उसे खरीदना संभव नहीं था. उसी साधारण विद्यार्थी वाली स्थिति में हम भी थे. 




पेन का शौक आज से नहीं बल्कि बचपन से रहा है. अपनी कक्षा के कुछ धनवीर मित्रों के हाथों में इस तरह के पेन देखकर मन ललचाता तो था किन्तु परिवार में जिस तरह का माहौल था, उसके द्वारा संतोषम परम सुखम वाली भावना सर्वोपरि थी. जब खुद कमाना, तब शौक करना वाली घुट्टी तो बचपन से ही पिलाई जाने लगी थी. खुद कमाओगे तब पैसे का मोल समझ में आएगा की धमकी भी समय-समय पर मिलती रहती थी. बहुत अच्छे से याद है कि कक्षा छह में आने के बाद ही अकेले में बाजार घूमने का अवसर मिला था. इसी कक्षा में आने के बाद ही अपने घर से लगभग डेढ़-दो किमी दूर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज में जाने का मौका मिला. जैसा कि आज का दौर है बच्चों को रेशम में लपेट कर पालने की, वैसा माहौल उस समय हमें नहीं मिला. ऐसा नहीं था कि हम बच्चों की देख-रेख नहीं होती थी किन्तु उस समय बहुत छोटे-छोटे कदमों के द्वारा हमें आत्मनिर्भर होने के, परिस्थितियों से खुद लड़ने के अवसर भी परिवार की तरफ से दिए जा रहे थे.


बाजार से गुजरते समय कुछ दुकानें मिलती थीं स्टेशनरी की, उनमें लटके पेन देखकर मन ललचाता मगर एक दिन के जेबखर्च के रूप में मिलती चवन्नी उस लालच की तरफ उतावला न होने देती. हो सकता है कि आज के बच्चे चवन्नी का अर्थ भी न समझें. इसे हमारे पाठक समझायेंगे. उसी दौरान राम द्विवेदी द्वारा दर्शाए गए इस पेन के साथ-साथ इसी कंपनी का एक और पेन नजर के सामने से गुजरा. इन दोनों पेन में इनकी टिप का अंतर था. जो पेन राम ने दिखाया उसकी टिप स्टील की हुआ करती थी और दूसरे पेन की टिप फाइबर की. बहुत हिम्मत करके एक दिन पिताजी के सामने फाइबर टिप वाला पेन लेने की फरमाइश रख दी. स्केच की जगह पर उसके इस्तेमाल का कारण बताते ही पेन के लिए पैसे तो न मिले बल्कि जबरदस्त डांट मिली. कुछ दिनों के लिए किसी भी तरह के नए पेन की तरफ से ध्यान ही हट गया.




एक बात यहाँ बताएँ कि उस समय हमें फाउंटेन पेन से लिखने के लिए प्रेरित भी किया जाता था और धमकाया भी जाता था. बस इसी कारण से बॉल पेन के रूप में यदि कोई पेन कभी-कभार हाथ में आया तो शार्प का पारदर्शी नीला पेन और कभी-कभी चवन्नी वाली रिफिल वाला कोई सस्ता सा बॉल पेन. ऐसे में किसी दूसरे पेन की बात सोचना भी बड़ी हिम्मत का काम हुआ करता था. यद्यपि उसी समय में एक-दो रुपये तक के कुछ पेन कई-कई दिन की दस-पाँच पैसे की बचत करके भी लिए गए. शायद आप लोगों को याद हो एक स्टील का पेन आया करता था बिना कैप का.


बहरहाल, Luxor के ये दोनों पेन भी लिए गए मगर बहुत दिनों की बचत के बाद. धारे-धीरे कक्षा आगे बढती गई, घर से सख्ती भी कुछ कम होती रही. कभी ड्राइंग के लिए, कभी चार्ट के लिए, कभी परीक्षाओं के लिए पेन की जरूरत पड़ती रही तो ये पेन भी हमारी जेब की शोभा बनते रहे. उन्हीं दिनों इसी कंपनी के एक और बड़े हाई-फाई टाइप पेन से मुलाकात हुई. Pilot V5 के नाम से बाजार में आये इस पेन ने एक बार में ही अपनी तरफ ध्यान खींचा, ऐसा लगा जैसे पहली नजर का प्यार उसी से हो गया हो. उसके बाद जैसे ही दुकान पर जाकर उसका मूल्य पता किया, सारा प्यार हवा में उड़ गया. उस पेन की कीमत के आसपास का पैसा तो महीने भर में हमारे हाथ नहीं आया करता था. पेन से अपने प्यार को खाली हाथ कुछ धन्नासेठों के बच्चों के हाथ में सजा देखते रहे.




शायद आज के बच्चों को आश्चर्य हो कि उस पेन (Pilot V5) को हमने अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान पैसे जोड़कर ही खरीदा. स्नातक की पढ़ाई के लिए ग्वालियर जाना हूं वहाँ हॉस्टल में रहने का कारण महीने का जेबखर्च चार सौ रुपये मिला करता था. इसी में खाना, दूध और बाकी सामान लिए जाते थे. ऐसे में कुछ महीनों की बचत के बाद V5 पेन ले लिए गया. समय के साथ बहुत कुछ बदला. बाजार ने पेन पर पेन उतार दिए, सस्ते से सस्ता पेन और मंहगे से मंहगा पेन. अब पेन की इतनी वैरायटी मौजूद है कि लेने वाला ही पागल हो जाये कि किसे ले और किसे छोड़े.


दूसरों के पागलपन की क्या बात करें, हम खुद ही पागल रहते हैं बाजार में इतने अधिक पेन देखकर. ये एक आश्चर्य हो सकता है कि पिछले लगभग पच्चीस-तीस साल से हमने किसी पेन के लिए रिफिल नहीं खरीदी है. इससे बड़ा आश्चर्य तो ये होगा कि इतने सालों में किसी पेन की रिफिल ही ख़त्म नहीं हुई है. हर महीने दो-चार नए पेन खरीद लिए जाते हैं, इस कारण रिफिल सुरक्षित बनी रहती है. हाँ, Pilot का V5 पेन जरूर नियमित रूप से पिछले बीच-पच्चीस साल से हमारे लेखन का, हमारी आर्ट का, स्केचिंग का, कैलीग्राफी का हिस्सा बना हुआ है. 






 

24 दिसंबर 2022

गीत-ग़ज़ल के शौक़ीन नहीं दिखते अब

क्या आजकल लोगों ने गाने-ग़ज़ल सुनना बंद कर दिए? हो सकता है कि आप सबको ये सवाल कुछ अजीब सा लगे. लगा भी होगा बहुतों को कि ये क्या सवाल है मगर यदि अपनी भागमभाग ज़िन्दगी में एक पल को रुक कर बस इसी सवाल का जवाब खोजें तो आप अपने आपमें ही, अपने लिए जवाब न दे पाएँगे. ऐसा आज के समय में बहुत हद तक सही है. आपको, हमें या कहें कि हम एक व्यक्ति को आज के दौर में एक ऐसी नस्ल देखने को मिलती है जिसके काम में हेडफोन लगा है, इयरफोन घुसे हैं मगर सत्य ये है कि वे गाने नहीं सुन रहे होते हैं. इस नस्ल में से कुछेक लोग यदि गाने सुनते भी हैं तो वे बस कुछ पल के लिए. उनके लिए भी गाने सुनना कोई शौक नहीं, कोई पैशन नहीं.


ये सवाल कोई आज अचानक से दिमाग में नहीं आ गया. ये सवाल बहुत दिनों से दिल-दिमाग के किसी कोने में बैठा हुआ था, बस हम ही मौका नहीं निकाल पा रहे थे कि इसे बाहर ला सकें. पिछले एक लम्बे समय से हम अनुभव कर रहे हैं कि हम मित्रों की मुलाकात के दौरान, अपने आसपास जमा भीड़ की बातचीत के दौरान, समाज के विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय रखने वालों की बातचीत के दौरान, किशोरों-युवाओं के साथ अपनी बातचीत के दौरान बहुत सारे विषयों पर बात होती है, बहुत सारे मुद्दों पर बहस होती है मगर गानों-ग़ज़लों पर चर्चा नहीं होती है. इसी तरह के बहुत सारे लोगों से उनके शौक पर बात होती है, उनकी पसंद-नापसंद पर बात होती है, उनके कार्यों पर बात होती है मगर इन्हीं में से कोई ऐसा सामने नहीं आता है जो गाने सुनने का शौक रखता हो, जो नए-पुराने गानों-ग़ज़लों को सुनने का शौक रखता हो. आश्चर्य की बात तो ये लगी कि ऐसा हाल उन लोगों का भी है जो खुद को गीत-संगीत के क्षेत्र से जोड़े हुए हैं, लगातार गायन-वादन से जुड़े हैं.




ऐसे में यदि हम अपनी बात करें तो आज भी सुबह उठने के बाद पहला काम रेडियो को शुरू करना होता है. उसके न होने की स्थिति में म्यूजिक सिस्टम चालू हो जाता है. इनका काम गानों-ग़ज़लों को सुनाते रहना है. ये क्रम तब तक निर्बाध चलता है जबकि हमारा सोना नहीं होता है. आपको आश्चर्य लगेगा, ये काम हमारी नित्यक्रिया संपन्न करने के दौरान भी चलता रहता है. बस उस समय म्यूजिक सिस्टम की आवाज़ जरा तेज हो जाती है. इस लेख को लिखे जाने के समय भी ग़ज़ल साथ में चल रही है. ये आदत कोई आज की नहीं है. आज हम इसे आदत नहीं बल्कि नशा कहते हैं. अपने घर में बचपन से ही रेडियो की उपस्थिति को महसूस किया है. गाने, समाचार, कमेंट्री, बच्चों के कार्यक्रम, लोकगीत आदि को रेडियो में बचपन से ही सुनते चले आ रहे हैं.


रेडियो के उस सुहाने दौर में रिकॉर्ड प्लेयर से भी परिचय हुआ, टेप रिकॉर्डर से भी मुलाकात हुई. इन दोनों का अपना अलग ही अंदाज देखा. अस्सी के दशक में उरई में इक्का-दुक्का दुकानें हुआ करती थीं जहाँ कैसेट में गाने की डबिंग हुआ करती थी. ये हम बच्चों के लिए बड़ी कौतूहल की चीज हुआ करती थी. समय के साथ बदलाव आते गए, समझ बढ़ती गई तो कैसेट का, प्लेयर का महत्त्व समझ में आया, उनका अंतर समझ में आया. गाने सुनते-सुनते कब ये शौक ग़ज़ल सुनने में बदल गया पता ही न चला. पुराने गीतों के तमाम सारे गायक-गायिकाओं के बीच कब गुलाम अली ने अपनी ग़ज़ल गायकी से स्थान बना लिया पता ही न चला. नब्बे के दौर में हम मित्रों के बीच यह भी स्वस्थ प्रतियोगिता की एक पहचान हुआ करती थी कि किसके पास किस गायक की नई कैसेट आ गई है, किसने गुलाम अली की कौन सी नई ग़ज़ल पहले सुन ली है.


उन दिनों आपसी बातचीत का एक विषय गीत-ग़ज़ल भी हुआ करते थे. आज ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है. अभी पिछले दिनों गुलाम अली की एक बेहतरीन ग़ज़ल की चर्चा अपने मित्रों से की, परिचितों से की मगर किसी ने ये भी जानने की कोशिश ना की कि वो ग़ज़ल कौन सी है. अपने कॉलेज में भी सामान्य बातचीत के दौरान भी यदि कभी गीत-ग़ज़ल की चर्चा हो जाती है तो सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है. जबकि ऐसा पहले नहीं था. पहले एक मित्र के यहाँ यदि कैसेट आ जाती थी तो बारी-बारी से उसी रिकॉर्डिंग सभी मित्रों तक पहुँच जाती थी. हमें आज भी याद है उस समय गुलाम अली का कोई कार्यक्रम शायद दिल्ली में हुआ था. हमारे एक मित्र को इसीलिए दिल्ली भेजा गया था कि वो लाइव रिकॉर्डिंग करेगा. उसने भी वहाँ पहुँच कर विशेष रूप से स्पीकर के पास बैठने का इंतजाम किया और गुलाम अली का लाइव कार्यक्रम रिकॉर्ड किया. वो कैसेट आज भी हमारे पास सुरक्षित है.


अब हो सकता है कि लोग गीत-ग़ज़ल सुनते हों मगर खुद में सीमित रहकर. जैसे बहुत सी बातों को लोगों ने गोपनीय बना दिया है, शायद गीत-ग़ज़ल सुनने के शौक को भी गोपनीय बना दिया हो.

  






 

22 नवंबर 2022

दिमागी सक्रियता पर कब्ज़ा करता बाजार

आज इंटरनेट पर एक साईट पर अपने फाउंटेन पेन और पुस्तकों को खोजते समय अपने आपमें एक अनोखी सी चीज बिकती दिखी. संभव हो कि बहुत से लोगों के लिए ये अनोखी सी न हो पर हमारे लिए थी. इस चीज को आप सबने भी इंटरनेट पर बिकते देखा होगा. ये चीज थी छोटी हो गई पेन्सिल को बड़ा करने का होल्डर. बाजार व्यवस्था के अधीन उपभोक्ताओं के मन को खँगालते हुए इस तरह के उत्पाद बनाये जाते हैं, उनका व्यापार किया जाता है, उनको प्रचारित किया जाता है. इस उत्पाद को देखकर आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इसलिए हुआ कि क्या वाकई ऐसे उत्पाद को, ऐसे सामान को खरीदा जाता होगा? इससे ज्यादा आश्चर्य हुआ उसकी कीमत देखकर.




आज उपभोक्तावादी संस्कृति के चलन में आ जाने के कारण बाजार प्रत्येक वस्तु को अपने अधीन कर लेना चाहता है. इसी सोच के चलते उपयोग में लायी जाती पेन्सिल के छोटी हो जाने के बाद उसको बड़ा करने के लिए होल्डर बनाया गया. हम सभी में से जिसने भी बचपन में पेन्सिल का इस्तेमाल किया होगा या आज अपने बच्चों को पेन्सिल का उपयोग करते देखते होंगे, वे भली-भांति जानते होंगे कि उपयोग में लायी जाने वाली पेन्सिल को छीलते-छीलते एक समय ऐसा आता है जबकि पेन्सिल को पकड़ना मुश्किल होता है. छोटे आकार के कारण उससे लिखना कठिन हो जाता है और उतने हिस्से को फेंकना सामान की बर्बादी समझ आती है. ऐसे ही छोटे आकार के पेन्सिल के टुकड़ों को इस तरह के होल्डर में फँसा कर उनका आकार बड़ा कर लिया जाता है. इसके द्वारा पेन्सिल का उपयोग करना सहज हो जाता है.


इस उत्पाद को बिकते देखकर आश्चर्य के साथ बहुत हँसी भी आई. हँसी आने का कारण हमारा व्यक्तिगत रूप से पेन्सिल के ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों को उपयोग में लाने का अनुभव है. ड्राइंग, कैलीग्राफी, स्केचिंग आदि का शौक होने के कारण पेन्सिल का उपयोग बचपन से लेकर अभी तक करते आ रहे हैं. जाहिर सी बात है कि उसके छोटे होते हिस्सों से भी सामना होता है. ऐसे टुकड़ों को बड़ा करने के लिए बाजार में बिकते किसी होल्डर का उपयोग आज तक नहीं किया गया. बेकार हो गईं स्केच के हिस्सों को, बेकार हो गए पेन के ढांचे को अथवा कागज़ को गोलाकार रूप में बदलकर पेन्सिल के छोटे हिस्सों को उसी में फँसाकर बड़ा करते रहे.


इस उत्पाद को बिकते देखकर लगा कि आज बाजार कितनी आसानी से इंसानों की, बच्चों की सक्रियता को, उनकी दिमागी कल्पनाशीलता को छीन ले रहा है. अब बिना दिमाग लगाये कि पेन्सिल के इन छोटे हिस्सों को उपयोग में लाने के लिए कैसे बड़ा किया जाये, बच्चे भी, बड़े भी बाजार में बिकते उत्पाद को ले आते हैं. सक्रियता की इस तरह की कमी के चलते बहुत से इंसानों में नया सोचने-समझने की क्षमता का अभाव होता जा रहा है. वे सभी एक बंधी-बंधाई लीक पर ही चलते चले जा रहे हैं. अभिभावकों को, शिक्षकों को इस बारे में विचार करने की आवश्यकता है. उनको अपने बच्चों को इस तरह की क्रियाशीलता के बारे में बताना-समझाना चाहिए. यदि इसी तरह से सबकुछ बाजार के हाथों में ही नियंत्रित होता चला गया तो भावी जीवन में सोचने-समझने की क्षमता भी कुंद रूप में देखने को मिलेगी. 





 

05 अगस्त 2022

दोस्ती तो बस दोस्ती ही होती है

इस दुनिया में सबसे अनमोल शब्द है दोस्ती और दिल के सर्वाधिक करीब शब्द रहता है दोस्ती. इन दोनों शब्दों की महत्ता को वही जान-समझ सकता है जिसने इनको अपने जीवन में स्वयं में उतार रखा हो. ऐसा नहीं हो सकता कि किसी व्यक्ति को दोस्त और दोस्ती की सम्पदा मिलती रहे और वह किसी और के लिए इस सम्पदा को छिपाए रहे. इस खजाने को पाने के साथ-साथ इसे लुटाना भी पड़ता है. व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना यही है कि दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो किसी तरह की शब्दावली से बँधा नहीं होता है, किसी भी तरह की औपचारिकता का पालन नहीं करता है, किसी भी तरह से स्वार्थी भाव नहीं रखता है. बहुत सारे परिचितों के बीच दोस्तों जैसी शब्दावली हमारे साथ भी है. 


कुछ मित्र ऐसे हैं जो बचपन से अभी तक साथ हैं. प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के समय जो गठबंधन हुआ वह आज तक निष्काम चला आ रहा है. कुछ मित्रों से माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा के दौरान मेल-मिलाप हुआ. दोस्ती के नाम पर यहाँ भी जबरदस्त जोड़ आज तक अपना काम कर रहा है. कुछ मित्र ऐसे भी हैं जिनके साथ किसी कक्षा का, किसी शैक्षणिक संस्थान का साथ न था. उनके साथ जैसे दिल का रिश्ता पहले से बना हुआ था, बस मिलने की देर थी. उनके मिलते ही एक पल में दोस्ती का पावन रिश्ता परवान चढ़ने लगा. कुछ मित्र कार्यक्षेत्र के समय मिले, कुछ ने सोशल मीडिया के द्वारा जीवन में अपना स्थान जमाया. दोस्त बने तो फिर बाकी सारी बातें पीछे रह गईं.




इधर एक घटना सामने आई तो एक बहुत पुराना घटनाक्रम याद आ गया. ज्यादातर तो ऐसी बातें हम अपने दिमाग से निकाल देते हैं मगर अक्सर उसी से मिलता-जुलता कुछ दिखाई देने पर बातें याद आ जाती हैं. ये शायद सन 2007 की बात होगी, उस समय हम उरई के गांधी महाविद्यालय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत थे. कॉलेज आने-जाने के क्रम में, शाम को बाजार घूमने की अपनी आदत में अपने बहुत से मित्रों से मुलाक़ात हो जाया करती थी. वो दौर हमारे व्यक्तिगत के लिए बहुत बुरा चल रहा था, ऐसे में मित्रों का मिलना, उनके साथ फिर पुराने दिनों को याद करना दिल-दिमाग को तरोताजा कर देता था. इसी सबके बीच एक दिन हमारे बचपन के एक दोस्त का घर आना हुआ. उससे भी नियमित रूप में मिलना-जुलना होता रहता था.


जैसी कि आमतौर पर मुलाकात होती थी, उसी तरह की मुलाकात उस दिन भी हुई. जैसा कि पहले भी कहा कि दोस्ती किसी भी तरह के संकोच, किसी भी तरह की औपचारिकता से मुक्त होती है, उसी भाव से उस दोस्त ने कहा कि इतने रुपये दो. रुपये माँगने में उसके अधिकार भाव को देखकर अच्छा लगा. हमें किसी भी रिश्ते का निःसंकोच भाव सदैव आकर्षित करता रहा है, फिर यह तो दोस्त था और वो दोस्त जो बचपन से लगातार साथ था. उस दोस्त की पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, उसका अपना छोटा सा काम भी बहुत सुखद स्थिति में नहीं चल रहा था. बहरहाल, चाय-पानी के, गप्पबाजी के दौर के बीच उसकी आवश्यकतानुसार पैसे उसको दे दिए. इसके बाद भी उसका मिलना होता रहा, गपशप ज्यों की त्यों चलती रही न उसने उन पैसों का जिक्र किया और हमारे करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था.


उस घटना के बाद चार-छह महीने बाद उसने फिर कुछ रुपयों की साधिकार माँग रखी. इसके बाद भी तीन-चार बार और ऐसा उसके द्वारा किया गया. हाँ, यहाँ आप सबको एक जानकारी और दे दें कि उसकी साधिकार माँग में धन की कीमत हर बार एक हजार रुपये से कम ही रही. एक दोपहर घर पर उसका आना हुआ. हम कॉलेज से लौटते ही जा रहे थे. उसके चेहरे का रंग एकदम से उड़ा हुआ था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई अनहोनी सी हो गई. उसके हालचाल पूछ पाते इससे पहले वह हमारी दोनों हथेलियों को पकड़ कर रो दिया. हमारी समझ से सबकुछ बाहर था. उससे कारण पूछा तो वह बोला कुछ नहीं, बस फूट-फूट कर रोता रहा. इतना तो समझ आ गया था कि कुछ भावनात्मक बात है, सो हमने भी उसके भीतर का गुबार निकल जाने दिया. कुछ मिनट के बाद वह शांत हुआ. पानी के कुछ घूँट पीने के बाद उसके बोल निकले. उसे सुनकर एकदम से हमें भी झटका लगा. उसके सबसे पहले शब्द थे, यार हमें माफ़ कर देना.


इनको सुनकर कुछ समझ न आया. क्या बकवास कर रहे हो, पगला गए हो का? कहते हुए उसे टोका तो उसने एकदम बुझे स्वर में कहा, नहीं यार, हम तुमसे कितनी बार पैसे माँग ले गए. हमें आज ही पता चला कि अभी तुमको बहुत कम तनख्वाह मिलती है. तुम्हारी इस स्थिति में हमें तुम्हारी सहायता करनी चाहिए थी और हम तुमसे ही पैसे लेते रहे. उसको बोलने से रोका तो वह हमें टोकते हुए बोला, हम तो समझते थे कि तुम्हारी नौकरी डिग्री कॉलेज में लग गई है तो पचास-साठ हजार तो मिलते ही होंगे. बस यही सोचकर हम तुमसे बिना संकोच के माँग लेते थे. हमें लगा जैसे उसको ये पता चलना कि मानदेय पर पचास-साठ हजार रुपये नहीं मिलते हैं, उसका चंद सैकड़ा रुपये माँगना शर्मिंदा कर रहा है, हमें अपने आपमें अपराधबोध सा लगने लगा. जैसी कि निपट घनघोर दोस्तों के साथ जिस तरह की शब्दावली इस्तेमाल होती है, वही करते हुए उससे कहा कि आज ये बकवास कर दी सो कर दी, आगे से करी तो जूते खाओगे. आज न सही पचास-साठ हजार रुपये पर तुम सब दोस्तों के कारण ये पचास-साठ लाख हैं हमारे लिए.


इसके बाद चाय-पानी, गपशप बहुत थोड़ी देर चली मगर दोस्ती आज तक चल रही है. उसके बाद भी उसके अधिकार जमाने वाले तीन-चार मौके आये. धीरे-धीरे समय के साथ उसकी स्थिति भी सही होती रही, हमारी भी स्थिति सही होती रही. मानदेय प्रवक्ता के समय मिलते अत्यल्प मानदेय से निकल कर समान कार्य समान वेतन में कुछ वेतन जैसा बारह महीने पाने लगे. कालांतर में सरकारी दयादृष्टि ने हमें भी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बना दिया. इसके बाद भी हम दोनों जब भी मिलते हैं तो बस बचपन वाले स्कूल की, उसी समय के साथियों की, उस समय की शरारतों की ही बातें होती हैं. 





 

14 मई 2022

पुराने दिनों की सोंधी महक

कितना कुछ ऐसा देखा है, एहसास किया है हमारे समय की पीढ़ी ने. इस पीढ़ी को जानने के लिए इक्कीसवीं सदी के पहले जाना पड़ेगा. यह वो पीढ़ी है जो सत्तर-अस्सी के दशक में जन्म लेकर तमाम सारे बदलावों की साक्षी बनने के लिए आगे बढ़ रही थी. आज की पीढ़ी को मोबाइल, कम्प्यूटर आदि से चिपके देखते हैं तो अनायास ही पुराने दिन याद आ जाते हैं. उन दिनों के याद आने का कारण आज की पीढ़ी का इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निरंतर चिपके रहना नहीं है. उन दिनों को याद आने के पीछे तत्कालीन सामाजिकता, व्यावहारिकता, पारिवारिकता आदि भी प्रमुख है. सामूहिक रूप से खेलना, खुले मैदानों में बचपन का गुजरना एक अलग स्थिति तो है ही, उससे बड़ी और प्रमुख बात है उन दिनों में आपस में अपनत्व होना, समन्वय होना.


अपने बचपन के वे दिन कभी नहीं भूलते जबकि गर्मियों की रातें छत पर गुजरती थीं. शाम से ही छतों को पानी से नहलाने का काम बच्चों के कंधों पर आ जाता. सबकी अपनी-अपनी जगह निर्धारित हो जाती. रात की ठंडक के आते ही मोहल्ले भर की छतें गुलजार हो उठती थीं. यदि लाइट की कृपा रही तो पीले-पीले बल्बों की रौशनी में सबके घर चमकते न तो कहीं लालटेन की, कहीं ढिबरी की मद्धिम रौशनी बिखरती रहती. इसी रौशनी में सबकी छतों पर भोजन करने का लगभग सामूहिक कार्यक्रम शुरू हो जाता. किसी छत से आवाज़ आती चटनी ले जाने के लिए, कोई आवाज़ देता आम का पना पहुँचाने के लिए. किसी चाची के हाथ का अचार सबको ललचाता था तो किसी की छौंक लगी दाल से मुँह में पानी आ जाता. ये किसी एक दिन की बात नहीं होती बल्कि रोज का ही काम होता था. खाद्य सामग्री बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी जातिगत भावना के छतों-छतों घूमती-टहलती अपना स्वाद बाँटती रहती.




ऐसी स्थिति आज नहीं दिखती. आज छतों पर सोने का, टहलने का जैसे रिवाज ही नहीं रह गया. सुबह हों या शाम या फिर रात, छतों पर टहलते लोग, शरारत करते बच्चे दिखाई ही नहीं पड़ते. लाइट आये या न आये, लोग घरों में ही घुसे रहना पसंद करने लगे हैं. बच्चों के पास स्कूल के काम उन दिनों भी हुआ करते थे मगर आज के जैसा बोझ नहीं हुआ करता था. उन दिनों हमारे सिर पर अधिक से अधिक नंबर लाने का, अपने ही मित्र से ज्यादा नंबर लाने का, कक्षा में ही नहीं बल्कि पूरे शहर में टॉप करने का दवाब नहीं हुआ करता था. इस कारण से हमारी पीढ़ी ने उस समय को भी खुलकर जिया है और आज भी उसी मस्ती में जिए जा रही है. उन दिनों में संसाधन सीमित हुआ करते थे मगर वे अपार खुशियाँ देते थे. तब हम बच्चे लोग अकेले-अकेले किसी खेल में मगन नहीं रहा करते थे. कई-कई बच्चों के गुट बने होते थे, जो बस मौका निकालने का इंतजार करते थे. खेलों के अपने ही नियम हुआ करते थे, खेलों के कोई मानक उपकरण नहीं हुआ करते थे. कपड़े धोने वाली मुगरी क्रिकेट का बैट बन जाया करती थी तो लुगदी कपड़ों पर साईकिल ट्यूब की रबड़ से गेंद बन जाया करती थी. बाँस के टुकड़े हॉकी का रूप ले लिया करते थे तो कई बार हार्ड बोर्ड के टुकड़े, कॉपियों की दफ्ती बैडमिंटन के रैकेट का काम किया करती थी.


वे दिन, बचपन के वे सुहाने दिन हमारी पीढ़ी के लिए तो लौट कर आने ही नहीं हैं. जो पीढ़ी वर्तमान में अपने बचपन में है, उसके सहारे भी हमारी पीढ़ी अपने बचपन को नहीं जी सकती. आव की स्थितियाँ बहुत अलग हैं, ऐसे में पुराने दिनों को उन पर थोपा नहीं जा सकता मगर बहुत हद तक उन दिनों का कुछ स्वरूप बनाया जा सकता है. इसके लिए पुरानी पीढ़ी यदि कोई कदम भी उठाती है तो आज की तेज भागती पीढ़ी को वे सब काम, वे सब कदम, वे सब बातें बोरिंग लगती हैं, पुरातन काल की लगती हैं, उनको पिछड़ा सिद्ध करती हैं. फ़िलहाल तो हम अपने उन्हीं दिनों को याद करते हुए वर्तमान को उसी रौ में जी रहे हैं.


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