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14 सितंबर 2022

मोक्ष की अवधारणा और कुछ सवाल

सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा को लेकर बहुत सी बातें कही गईं हैं. जीव के जीवन-मरण से मुक्ति का मार्ग मोक्ष को स्वीकारा गया है. इसी की प्राप्ति के लिए ऐसा माना जाता है कि तमाम सारी प्रजातियों में मनुष्य जन्म मिलना सौभाग्य की बात होती है और इसी जन्म में ऐसे कर्म कर लेने चाहिए कि व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाये. मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा की सहज स्वीकार्यता के कारण ही मनुष्यों को सत्कर्म करने के प्रति प्रेरित किया जाता है. उनको सभी प्रकार की बुराइयों से दूर रहने का प्रवचन दिया जाता है. इसी के साथ-साथ उनको भगवान की भक्ति करने, परोपकार करने, ईश्वर का नाम लेने की सलाह दी जाती है.


यहाँ एक बात समझने वाली ये है कि क्या मोक्ष की लालसा में किये जाने वाले सद्कार्य लालच की श्रेणी में नहीं आते हैं. जिस सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा है, उसी में कहा गया है कि किसी फल की आशा में कार्य नहीं करना चाहिए. यहाँ तो ईश्वर का नाम, भगवान-भक्ति, परोपकार आदि मोक्ष की कामना के साथ किये जा रहे हैं. देखा जाये तो यह विशुद्ध लालच ही है. ऐसे में एक लालच के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है? यहीं एक सवाल और मन में उभरता है कि आखिर मोक्ष की प्राप्ति किसके लिए, किसलिए? क्या किसी को अपने जन्म के पहले के जन्मों या जन्म का भान है कि उसे कष्ट मिले थे या सुख? यदि ये मान लिया जाये कि बहुत से लोग अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर गए होंगे तो क्या उनको इसका एहसास होगा कि वे जन्म-मरण से मुक्ति पा गए हैं? वे अब मोक्ष प्राप्त कर गए हैं?




एक पल को सारी बातों को दरकिनार करते हुए मान लिया जाये कि सभी जीवों द्वारा किसी भी तरह का बुरा काम, गलत कर्म करना बंद कर दिए गए. सभी अपनी-अपनी तरह से ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगे, परोपकार करने लगे. ये भी मान लिया जाये कि सभी को अपने इन्हीं सद्कर्मों से मोक्ष मिल गया तो क्या ये प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं है? क्या इससे सृष्टि सञ्चालन की व्यवस्था अवरुद्ध नहीं हो जाएगी? ऐसा इसलिए कि यदि सभी जीवों को मोक्ष मिल जायेगा, सभी को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी तो फिर इस सृष्टि में जन्म किसका होगा? इस प्रकृति का सञ्चालन कैसे होगा?


संभव है कि हम अल्पज्ञानी की समझ से बाहर हों उक्त बातें किन्तु मन की जिज्ञासा को शांत करना चाहते हैं.  

 





 

18 मार्च 2019

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई


तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई.... ये भले ही गीत की एक पंक्ति हो मगर अक्सर इसे किसी न किसी रूप में सत्य होते देखा जाता है. कभी-कभी लगता है किसी को देखकर, उससे मिलकर कि उस व्यक्ति से निश्चित ही कोई सम्बन्ध है, कोई रिश्ता है. कई बार दो आपसी परिचितों में भी इस तरह की बॉन्डिंग देखने को मिलती है कि ऐसा लगता है जैसे कि उनके बीच कोई अनजानी सी, कोई अप्रत्यक्ष सी डोर बंधी हुई है. उसी के सहारे वे दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. बिना कहे, समझाए एकदूसरे की बात जान जाते हैं, समझ जाते हैं. कई बार हम सभी ने ऐसा महसूस किया होगा कि किसी विशेष अवसर पर ऐसे किसी व्यक्ति से अचानक ही संपर्क हो जाता है, जिससे आप बेहद करीब से जुड़े हुए होते हैं. इसके लिए आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति आपके पास ही हो. कई बार सैकड़ों किमी दूर बैठे व्यक्ति से ऐसे संपर्क होता है, जैसे कि वह सामने ही बैठा हो. इसे महज संयोग कहकर नकारा नहीं जा सकता है. यह कहीं न कहीं वह विधान होता है जो हम सभी मानते भी नहीं हैं और पूरी तरह से खारिज भी नहीं करते हैं. इसे भले ही पूर्वजन्म जैसा कुछ न कहा जाये मगर कुछ तो ऐसा होता ही है जो व्यक्ति को एक-दूसरे से जोड़ता है. 


दिल से दिल की भावनाओं का, दिल-दिमाग की तरंगों का, व्यक्ति से व्यक्ति के जुड़ाव का कोई न कोई ऐसा तार अवश्य बना होता है जो उनके संबंधों को समाप्त नहीं होने देता है. यही सम्बन्ध ही वैज्ञानिक रूप में टैलीपैथी कही जा सकती है. दिमागी हलचल का, दिल से दिल के सम्बन्ध का रहस्य भले ही लगातार खोजने की कोशिश की जा रही हो मगर देखने में आया है कि भावनात्मकता का कोई विज्ञान नहीं, आपसी तारतम्यता का कोई फ़ॉर्मूला नहीं. निश्चित रूप से प्रकृति ने अपना एक विधान बनाकर इन्सान को अपने आँचल में शरण दी है. यह व्यक्तियों के आपसी व्यवहार, सम्बन्ध, पारदर्शिता पर निर्भर करता है कि उनके बीच की बनी अंतरंगता किस हद तक सकारात्मक है. इसी सकारात्मकता का परिणाम होता है कि व्यक्ति पास न होकर भी करीबी का अनुभव करवाता है. इसी अंतरंगता का परिणाम होता है कि आपके जीवन का कोई भी सुखद पल उसकी उपस्थिति के बिना पूरा नहीं होता, भले ही वह सामने न हो. ऐसी भावनाओं को, ऐसे रिश्तों को, ऐसे संबंधों को समझने, बनाने की कोशिश नहीं करनी पड़ती है. एक-दूसरे की आपसी समझ, आपसी सोच, आपसी मानसिकता स्वतः उस व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़ती है. बस, इसके लिए दिल से उठती हुई सकारात्मकता को समझने की आवश्यकता होती है.

28 दिसंबर 2009

मनुष्य प्रत्येक जन्म में मनुष्य के रूप में ही जन्मता है!!!

आजकल किसी चैनल पर एक सीरियल दिखाया जा रहा है जिसमें अपने पूर्व जन्म के बारे में मालूम किया जा सकता है। हालांकि हमने यह सीरियल आज तक और अभी तक एक बार भी, बिलकुल भी नहीं देखा है किन्तु अपने अन्य देखने वालों से ज्ञात हुआ है कि इसमें व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के बारे में बहुत कुछ जान जाता है।

इस सीरियल के अलावा भी कई बार समाचार-पत्रों के द्वारा अथवा समाचारों के द्वारा पता लगता है कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म का आभास हुआ है।
हमें पूर्व जन्म की स्मृति होने अथवा न होने के संदर्भ में कुछ भी नहीं कहना है। इस बारे में हमारा स्वयं का कोई अनुभव भी नहीं है इस कारण इस विषय में कुछ भी कहना मुश्किल है। इस सबके बाद भी एक विचार ने इस छोटी सी पोस्ट को लिखने को विवश किया।
अभी तक जितने लोगों के पूर्वजन्म के बारे में सुना, इस सीरियल के द्वारा जिन लोगों के पूर्व जन्म के बारे में पता चल रहा है उससे एक बात सौ फीसदी पता चली कि सभी अपने पूर्व जन्म में मनुष्य ही होते रहे हैं।
पोस्ट के द्वारा बस इतनी सी जानकारी चाहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्व जन्म में मनुष्य ही क्यों होता दिखता है, महसूस करता है? क्यों नहीं वह स्वयं को कोई जानवर, पक्षी, कीड़ा, मकोड़ा आदि होता महसूस करता है?
ऐसा धर्म ग्रन्थों में कूट-कूट कर लिखा है कि मानव तन बड़े ही जतन से मिलता है और इसका सदुपयोग करना चाहिए। इसके बाद भी पूर्व जन्म की घटनाओं में हमें आज तक मनुष्य के अपने पूर्व जन्म में मनुष्य बनने की जानकारी मिली है।
क्या कोई बतायेगा कि ऐसा क्यों होता है? वर्तमान में पैदा हुआ मनुष्य अपने पूर्व जन्म में कोई जानवर आदि क्यों नहीं होता?

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चित्र गूगल छवियों से साभार