ऑनलाइन शिक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ऑनलाइन शिक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 अप्रैल 2022

शिक्षक की महत्ता

समाज ने विकास के नए-नए आयामों को निरंतर ही प्राप्त किया है, साथ ही उनका विकास भी किया है. इनको लेकर उसके द्वारा कई-कई नए-नए मानक स्थापित भी किये गए हैं. इन्हीं में एक मानक शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थापित किया गया है. इक्कीसवीं सदी तक आते-आते शिक्षा क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, कई अत्यावश्यक कदमों को उठाया गया. शिक्षा व्यवस्था ने कई तरह के परिवर्तनों को देखते-समझते हुए अपना स्वरूप भी बदला. आज शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इस ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को कोरोनाकाल में और ज्यादा महत्त्व मिला. ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था अथवा शैक्षिक तकनीक का कितना भी विकास कर लिया गया हो, मगर समाज से शिक्षकों की महत्ता को, उनके द्वारा प्रत्यक्ष कक्षाओं में दी जा रही शिक्षा के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता है. तकनीकी विकास ने संस्थागत अनेकानेक बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया हो किन्तु इससे शिक्षकों की जिम्मेवारियाँ और उनका दायित्वों पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. वे समय के साथ कम नहीं हुई हैं वरन बढ़ी ही हैं. एक समय जबकि तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेवारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेवारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

 

आज ऐसा माना जाने लगा है कि किसी भी शिक्षक का काम किसी संस्थान में, किसी कमरे में बैठे अनेक विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र है. शिक्षक के लिए उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में एक विद्यार्थी का साथ अबसे अधिक एक शिक्षक के साथ ही रहता है. ऐसे में किसी भी स्तर के शिक्षक की जिम्मेवारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. यह विचार करना शायद आज किसी के लिए संभव नहीं हो पा रहा है कि अध्यापन कार्य किसी तरह के व्यवसाय से सम्बंधित करके कभी नहीं देखा गया है. इसके पीछे की मूल भावना सिर्फ इतनी थी कि एक शिक्षक किसी तरह का उत्पाद निर्मित नहीं करता है वरन वह एक नागरिक तैयार करता है, एक व्यक्तित्व का विकास करता है. ऐसे में उसके कार्यों, उसकी भावना, उसकी मानसिकता का प्रभाव उसके विद्यार्थियों पर पड़ता है. किसी भी शिक्षक को अपना आदर्श मानकर एक विद्यार्थी उससे बहुत कुछ सीखता है. उसकी कही बातों को गाँठ बांधकर जिंदगी भर उन पर अमल करने की कोशिश करता है.

 

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि शिक्षक का कार्य विशुद्ध रूप से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना, उनकी उत्तर-पुस्तिका जाँचकर अंक देना रह गया है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को शिक्षक माना-समझा जाने लगा है. ये किसी भी शिक्षक के सहायक उपकरण तो सिद्ध हो सकते हैं न कि किसी शिक्षक के स्थान पर स्वीकार्य हो सकते हैं. आज विकास की अंधी दौड़ में अभिभावकों के पास समय की अत्यंत कमी देखने को मिलती है. ऐसे में उनके द्वारा प्रयास यही किया जाता है कि शिक्षा का कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जो नितांत उन्हीं के बच्चे पर ध्यान दे सके. मोबाइल क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति ने जैसे अभिभावकों के मन की मुराद पूरी कर दी हो. एक क्लिक पर समस्त जानकारियों को अपने सामने देखकर अभिभावक भी संतुष्टि का एहसास कर रहे हैं.

 

इस बिंदु पर आकर वे यह समझना नहीं चाहते कि ऑनलाइन माध्यम से जानकारी तो मिल सकती है किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का सान्निध्य नहीं मिल सकता है, जो बच्चों को सही-गलत समझा सके. भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने का अर्थ सिर्फ पाठ्यक्रमों का पूरा कर लेना मात्र कभी नहीं रहा है. यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था के किसी भी चरण में नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, हमारे पूर्वजों के बारे में शिक्षा आदि को भी साथ-साथ दिया जाता रहा है. ऐसा माना जाता रहा है कि एक शिक्षक अपने पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों में समाज के प्रति सेवा-भावना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारी का भाव, प्राणीमात्र के लिए परोपकार की भावना, संगठन-शक्ति का विकास, सामूहिकता की स्वीकार्यता आदि गुणों का विकास भी करता है. ऐसे में समझना कतई मुश्किल नहीं है कि मशीनी संस्कृति, मशीनी शिक्षा के द्वारा विषय-सामग्री की उपलब्धता तो हो सकती है किन्तु उससे सम्बंधित विषय पर ज्ञान मिलेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता है.

 

मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज या फिर कांफ्रेंसिंग के जरिये किसी विषय को सहजता से समझाया भले ही जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों का विकास नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. ये समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? आज लोगों की जीवन-शैली तकनीकी रूप से, भौतिक रूप से पहले से कहीं अधिक संपन्न हुई है. लोगों को अपने मनमाफिक कार्यक्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई है. ऐसे में समाज में शिक्षकों के प्रति गंभीरता का भाव समाप्त भले ही न हुआ हो किन्तु कम अवश्य हुआ है. तकनीक को सर्वस्व मानने वालों के लिए एक शिक्षक का महत्त्व संस्थान स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति जितना रह गया है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है. किसी भी शिक्षक की स्थान-पूर्ति नहीं कर सकता है.

 

मशीन ज्ञान दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ऑनलाइन शिक्षा किसी भी विषय पर सामग्री की उपलब्धता सहज करवा सकती है किन्तु उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित नहीं करा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. किसी समय में तकनीक के, सामग्री के, पुस्तकों आदि के अभाव ने शिक्षकों की महत्ता को स्थापित किया होगा किन्तु आज तकनीकी विकास के दौर में भी शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

 


25 जुलाई 2020

ऑनलाइन क्लासेज का शिगूफा

जिस तरह से कोरोना संक्रमण की स्थिति दिखाई दे रही है, उसके अनुसार सरकारों द्वारा लॉकडाउन पुनः लगाये जाने के सम्बन्ध में जिस तरह के कदम उठाये जा रहे हैं, उन्हें देखकर लगता नहीं है कि शिक्षण संस्थान सहज रूप में जल्दी शुरू हो सकेंगे. प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के शिक्षण संस्थानों ने ऑनलाइन पढ़ाई के रूप में अपना तंत्र फैलाना शुरू कर दिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में अभी तो छूटी परीक्षाओं को पुनः करवाए जाने को लेकर संशय बना हुआ है. नए सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया पर संशय बना हुआ है. यद्यपि यहाँ भी जल्द से जल्द प्रक्रिया को पूरा करके ऑनलाइन कोर्स आरम्भ करने पर जोर दिया जा रहा है तथापि ऐसा व्यावहारिक रूप में होता समझ नहीं आ रहा है.



बाजार का खोल देना, कार्यालयों का खोल देना, कंपनियों को फिर से शुरू कर देना एक अलग स्थिति है और शिक्षण संस्थानों को खोलना एक बिलकुल अलग स्थिति है. यहाँ किसी भी रूप में बच्चों को सामाजिक दूरी के नियम में बाँधना मुश्किल कार्य है. ऐसे में निजी संस्थानों ने अपने अस्तित्व को बनाये, बचाए रखने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का एक नया शिगूफा छोड़ दिया है. प्रतिदिन कुछ वीडियो डालकर उनको देखने का काम बच्चों के भरोसे छोड़ दिया जाता है. यहाँ बच्चे कम उनके अभिभावक ज्यादा लगे रहते हैं ऑनलाइन क्लासेज के चक्कर में. होमवर्क को रोज डाउनलोड करना, बच्चों के द्वारा किये जाने वाले काम को अपलोड करना आदि काम अभिभावकों के मत्थे ही मढ़े गए हैं.

निजी शैक्षणिक संस्थानों ने अभिभावकों से फीस वसूलने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का नया चलन शुरू कर दिया मगर क्या किसी भी निजी संस्थान में इससे पहले किसी भी बच्चे को फाइल बनाना, अपलोड करना, डाउनलोड करना, वेबसाइट चलाना आदि बताया गया था? ये हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि रोज ही दसियों अभिभावकों को, अपने परिचितों को, मित्रों को इस बारे में जानकारी दे रहे हैं. निजी संस्थानों ने आदेश देकर अपने शिक्षकों को इस काम में झोंक दिया है. शिक्षकों ने भी इसे बस एक काम समझ कर सोशल मीडिया के द्वारा अथवा किसी अन्य रूप में बस खानापूर्ति करना समझ लिया है. देखा जाये तो ऑनलाइन क्लासेज का असल अर्थ न तो इन संस्थानों को ज्ञात है और न ही इस काम में लगे शिक्षकों को. सबके सब बस एक खानापूर्ति करने में लगे हैं. उनको न बच्चों के वर्तमान से कोई लेना देना है न ही भविष्य से. उनको न बच्चों के शारीरिक विकास से कोई मतलब है न ही उनके मानसिक विकास से.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 जून 2020

उच्च शिक्षा की बीमार हालत में ऑनलाइन शिक्षण की कवायद

चीनी वायरस कोरोना के चलते मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया. इसके ठीक पहले सभी तरह की शैक्षणिक संस्थाओं को बंद करवा दिया गया था. शैक्षणिक संस्थान अभी भी बंद हैं और आज दिए गए दिशा निर्देशों के अनुसार यह बंदी 31 जुलाई तक रहेगी. यह व्यवस्था आरम्भ से ही इसलिए की गई थी जिससे कि बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाया जा सके. सरकारों द्वारा जिस समय से शैक्षणिक संस्थाओं के बंद किये जाने के निर्देश दिए गए थे, उसी समय से क्षेत्रीय स्तर पर, स्थानीय स्तर पर ऑनलाइन कार्य करने का माहौल बनाया जाने लगा था. इसके लिए उच्च शिक्षा से सम्बंधित संस्थानों को भी दवाब में लेने का प्रयास किया गया. यह सही है कि कोरोना काल में सभी को सरकार की सहायता के लिए आगे आना चाहिए मगर इसके लिए भी स्वैच्छिक स्थिति रहती हो ज्यादा सही रहता.


उच्च शिक्षा संस्थाओं में जिस समय लॉकडाउन का पहला चरण आरम्भ हुआ उस समय विश्वविद्यालयीन परीक्षाओं का सञ्चालन हो रहा था. उस समय वैसे भी महाविद्यालयों में किसी तरह का कोई कार्य नहीं होता है. मार्च और अप्रैल परीक्षाओं में गुजर जाता है. इसके बाद मूल्यांकन का दौर आरम्भ होता है. यह भी एक अकेले विश्वविद्यालय में संपन्न नहीं होता है और न ही एक विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापकों के द्वारा संपन्न होता है. इसमें भी अनेक संस्थाओं के प्राध्यापकों द्वारा कार्य किया जाता है. इस प्रक्रिया के चलने, परिणाम घोषित करने के चरणों के दौर में ही ग्रीष्मकालीन अवकाश आरम्भ हो जाता है, जो 30 जून तक रहता है. यदि इस पूरी व्यवस्था पर दृष्टि डाली जाये तो इन दो-तीन माहों में किसी भी तरह का अध्यापन कार्य संपन्न नहीं होता है. हाँ, शिक्षण कार्य उन संस्थानों में संपन्न होता रहता है जहाँ सेमेस्टर सिस्टम है अथवा बीएड, एमएड जैसे पाठ्यक्रमों की पढ़ाई हो रही है. इनके अलावा किसी अन्य तरह की संस्थाओं पर ऑनलाइन अध्यापन का अनावश्यक दवाब बनाया जाना कहाँ तक सही है, समझ से परे है.


अब जबकि जुलाई में सभी तरह के शैक्षणिक संस्थाओं के बंद रखने के आदेश भी आ गए हैं, इसके बाद भी स्थानीय अथवा क्षेत्रीय स्तर पर ऑनलाइन शिक्षण की बात की जा रही है. चलिए, एकबारगी इस व्यवस्था के साथ खड़े होने की कोशिश भी की जाये तो यहाँ क्षेत्रीय स्तर की समस्याओं को समझना भी आवश्यक होता है. बहुत से विद्यार्थी पिछड़े क्षेत्रों से आते हैं, जहाँ आज भी इंटरनेट की सुविधा सही से नहीं पहुंची है. इसके अलावा तमाम महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या ऑफलाइन आने को ही तैयार नहीं दिखती है, वहाँ ऑनलाइन पढ़ाई एक स्वप्न ही समझ आता है.

उक्त के अतिरिक्त यदि व्यावहारिक समस्या की तरफ ध्यान दिया जाये तो सरकारें बताये, प्रशासन बताये, स्थानीय अथवा क्षेत्रीय अधिकारी इस पर अपनी राय व्यक्त करें कि आखिर क्या महाविद्यालय के शिक्षक को ऑनलाइन अध्यापन के लिए किसी तरह का मंच उपलब्ध है? क्या शैक्षणिक संस्थाओं में अथवा सरकार की तरफ से विभागवार किसी तरह की इंटरनेट सुविधा, कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है? ऐसा न होने की स्थिति में किसी प्राध्यापक द्वारा ऑनलाइन शिक्षण के लिए किस मंच का उपयोग किया जायेगा? किस तरह से वह ऑनलाइन सामग्री को प्रसारित करेगा?

इस सम्बन्ध में एक विशेष तथ्य की तरफ सबको ध्यान देना होगा कि निजी क्षेत्रों के महाविद्यालयों पर सरकार को इतना अधिक अविश्वास है कि उनमें से ज्यादातर में से कई वर्षों से परीक्षा केन्द्र नहीं बनाये जा रहे हैं. इन्हीं की तरफ से आती तमाम शिकायतों के बाद ही सभी संस्थानों में कैमरों की निगाह में परीक्षाओं का सञ्चालन किया जा रहा है. सरकारों ने, शिक्षा सम्बन्धी प्रशासन ने कभी विचार किया है कि इन संस्थानों में ऑनलाइन शिक्षण कार्य का सञ्चालन किस तरह होगा? उसके लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्य-प्रणाली है? 

कोरोना संकट इसी वर्ष उत्पन्न हुआ है मगर सरकारों द्वारा उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जो काम किये जाते रहे हैं वे कागजी ज्यादा रहे हैं. उच्च शिक्षा संस्थानों में सुधार के प्रयास भी हवाहवाई रहे हैं. नैक मूल्यांकन, एपीआई जैसी जैसी व्यवस्था लागू करने के बाद भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं किया जा सका है. अनावश्यक रूप से शोध-कार्यों का दवाब, यूजीसी में पंजीकृत शोध-पत्रिकाओं में शोध-पत्र प्रकाशन के जबरिया दवाब ने शोध कार्य को, प्रकाशन को भी व्यापार बना डाला है. केन्द्र सरकार द्वारा और न ही प्रदेश सरकारों द्वारा इस तरफ किसी भी तरह का ठोस, सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है. अब दो-चार भ्रष्ट शिक्षकों के कारण सम्पूर्ण प्रदेश के शिक्षकों के कागजातों के मूल्यांकन करने की कवायद भी इसी कोरोना काल में करवाई जानी है. सीधे-सीधे दिखाई पड़ता है कि सरकारों द्वारा, शैक्षिक प्रशासन द्वारा कहीं भी सकारात्मक रूप से काम करने की प्रवृत्ति दिखाई नहीं पड़ती है. सभी जगहों पर महज कागजी खानापूर्ति और उसके नाम पर धन-उगाही का खेल खेला जाने लगता है. कुछ इसी तरह का काम मानदेय प्रवक्ताओं के विनियमितीकरण को लेकर वर्षों तक खेला जाता रहा.

किसी भी प्राध्यापक को शिक्षण कार्य से समस्या नहीं है. आखिर उसकी नियुक्ति अध्यापन के लिए ही हुई है. इसके सापेक्ष यह सोचना कि सरकार उसे बैठे-बैठे का वेतन दे रही है गलत होगा. सरकार पहले उस मंच को, आधार को मजबूत बनाये जिसके द्वारा ऑनलाइन शिक्षण कार्य करना है, पहले उस व्यवस्था को सुरक्षित बनाये जिसके द्वारा एक अध्यापक को अपना डाटा ऑनलाइन अपलोड करना है. आज के तकनीक भरे इस दौर में भी तमाम सारे मंच डाटा चोरी के मामले में संदिग्ध बने हुए हैं. ऐसे में किसी प्राध्यापक की मेहनत से तैयार की गई शिक्षण सामग्री चोरी होती है, वह कल के दिन किसी दूसरे के नाम से प्रकाशित नजर आती है तो इसके लिए जिम्मेवार कौन होगा? इस समूची प्रक्रिया में लगने वाले उपकरण का, इंटरनेट व्यय का भार किसके द्वारा उठाया जायेगा? समूची व्यवस्था के नियमित रहने की जिम्मेवारी किसकी होगी? सरकार, प्रशासन इस बारे में विचार करे उसके बाद ही कोई कदम उठाने सम्बन्धी आदेश, निर्देश निर्गत करे.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग