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18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


25 दिसंबर 2016

जातिगत राजनीति में उलझा प्रदेश

चुनावी सुगंध का एहसास राजनैतिक दलों को कई माह पहले से होने लगता है. इसी सुगंध में उनके द्वारा लगातार ऐसे काम किये जाते हैं जो जनता के हितार्थ भी होते हैं तो दूसरी तरफ दलगत राजनीति को बढ़ावा देने वाले भी होते हैं. प्रथम दृष्टया जनहित से सम्बंधित दिखाई देने वाले इन कार्यों के पीछे मूल भावना स्व-हितकारी ही बनी होती है. इसी कारण से बहुतेरे जनहित से सम्बंधित कार्यों का निष्पादन ऐन चुनावों के आसपास ही किया जाता है. बड़े-बड़े लुभावने वादों का भी प्रस्तुतीकरण इसी समय होता है. कुछ ऐसा ही वर्तमान उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने किया है, पिछड़े वर्ग से सत्रह जातियों को अति-पिछड़े के नाम पर अनुसूचित जातियों में शामिल करके. सरकार द्वारा इस तरह से प्रदर्शित किया जा रहा है मानो उन सत्रह जातियों के अनुसूचित जाति वर्ग में समाहित किये जाने से उनकी सभी समस्याओं का अंत हो जायेगा. ऐसा लग रहा है जैसे कि वे सब अब तमाम सरकारी सुविधाओं का लाभ लेकर संपन्न हो जाएगी. इसके उलट एक सवाल खुद उन्हीं सत्रह जातियों को सरकार से करना चाहिए कि आखिर इतने वर्षों तक उन्हें पिछड़े वर्ग की सुविधाओं से वंचित क्यों रखा गया? किसने उन्हें आगे बढ़ने से रोका? किसने उनको पिछड़े वर्ग में अति-पिछड़ा बनाये रखा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी भी सरकार के पास नहीं. 



असल में हो ये रहा है कि वर्तमान में आरक्षण को राजनैतिक हथियार के रूप में, एक रणनीति के रूप में उपयोग किया जा रहा है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. वंचित वर्ग को लाभान्वित करने के लिए की गई व्यवस्था स्वार्थ-पूर्ति का हथियार बन कर रह गई है. आरक्षण का पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाभ उठाते आये लोग वंचित वर्गों के भीतर एक तरह के मठाधीश, कुलीन वर्ग बनकर रह गए हैं. इस नवोन्मेषी वर्ग ने आरक्षण का लाभ अपने से नीचे वर्ग तक न पहुँचने के कुप्रयास भी किये. इस सत्य को भले ही स्वीकार न किया जाए पर ये सौ फ़ीसदी सत्य है कि वर्तमान में आरक्षण कुछ विशेष जातियों, विशेष परिवारों, विशेष राजनैतिक दलों की बपौती सा बनकर रह गया है. शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, राजनीति आदि जिन-जिन क्षेत्रों में आरक्षण व्यवस्था लागू है वहां आसानी से देखने को मिलता है कि कैसे पीढ़ियों से आरक्षण उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है. आरक्षण लाभान्वित संपन्न परिवारों को जब भी आरक्षण की परिधि से बाहर निकल जाने का खतरा दिखा तब-तब किसी न किसी राजनैतिक, प्रशासनिक जुगत से क्रीमीलेयर नामक व्यवस्था को अपने पक्ष में करवाकर आरक्षण को अपने तक ही सीमित कर लिया.


वर्तमान निर्णय का लाभ कितना मिलेगा, कितना नहीं ये तो भविष्य की बात है मगर जो बात सामने दिख रही है वो ये कि इसका सीधा सा लाभ पिछड़े वर्ग की शेष जातियों को ही मिलेगा, आरक्षण सम्बन्धी सुविधाओं के लिए. स्पष्ट है कि आरक्षण का लाभ लेने सम्बन्धी मुद्दे पर पिछड़े वर्ग के खाते से सत्रह जातियों की कमी हो गई है, जबकि आरक्षण का प्रतिशत ज्यों का त्यों बना हुआ है. इसके उलट अनुसूचित जातियों को आरक्षण का लाभ लेने के लिए अपने पूर्व-घोषित प्रतिशत में अब और भी जद्दोजहद करनी होगी. अब यदि आरक्षण समर्थक इस व्यवस्था का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक पहुँचाना चाहते हैं वे स्वयं इस बात का विरोध करें कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आरक्षण समाप्त किया जाए. आरक्षण के सहारे शिक्षा, सुविधा, धन से संपन्न हो चुके परिवार की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ न दिया जाए (जब तक कि वो वाकई वंचित की अवस्था में न हो). दरअसल आरक्षण संपन्न वर्ग द्वारा जारी अवरोध के साथ-साथ राजनैतिक दलों द्वारा उठाये जाने वाले विभेदकारी क़दमों से भी आरक्षण का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक नहीं पहुँच सका है. इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि (उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में) अन्य पिछड़ा वर्ग में और अनुसूचित जाति वर्ग में आरक्षण का लाभ (सम्पूर्ण लाभ) किन-किन एक-दो जाति विशेष को ही उपलब्ध है. जातिगत राजनीति के सहारे आगे आने वाले और आरक्षण का समर्थन करने वाले विशेष राजनैतिक दल खुद में अपने वर्ग की अन्य दूसरी जातियों के लाभान्वित होने की दिशा में काम नहीं कर रहे हैं. इनका एकमात्र उद्देश्य आरक्षण के सहारे अपनी-अपनी जातियों के वोट-बैंक से सत्ता प्राप्त करने का रहता है. जबतक आरक्षण को उचित रूप में लागू करने की मंशा से काम नहीं किया जायेगा तब तक समाज विभेदकारी स्थिति से बाहर नहीं निकल पायेगा. आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के गलत उपयोग से उत्पन्न होता सामाजिक विभेद, वर्ग विभेद उस विभेदकारी स्थिति से ज्यादा घातक है जिसे दूर करने के लिए आरक्षण को लागू किया गया.

13 मई 2016

जाति है कि जाती नहीं

जाति व्यवस्था को एक सिरे से समाज की घनघोर बुराई बताने वालों की कमी नहीं है. समय-समय पर इसको दूर करने के सम्बन्ध में बुद्धिजीवियों, राजनैतिक लोगों द्वारा सुझाव भी दिए जाते रहे हैं. बहुतेरे लोगों ने जाति के स्थान पर भारतीय लिखने की, किसी ने मानव लिखने की, किसी ने हिन्दुस्तानी लिखने तक की वकालत की. बहुत से संवेदनशील लोगों ने ऐसा करना शुरू भी किया. उन्होंने अपने नाम के साथ जाति के स्थान पर ऐसे ही शब्दों को लिखना शुरू किया. समाज को जाति-मुक्त बनाने का काम करना शुरू किया. समाज ने ऐसे लोगों को प्राथमिकता में नहीं लिया और न ही उनकी सोच को वरीयता दी. परिणाम ये हुआ कि ऐसे लोगों के प्रयास इन्हीं लोगों तक अथवा इनके परिवार तक ही सीमित रह गए. परिवर्तन के इस अल्प-दौर में शायद कुछ परिवर्तन होता भी किन्तु जिस तरह से राजनीति में जाति को प्रमुखता दी गई, उसने जतिमुक्त समाज की अवधारणा को पूरी तरह से समाप्त कर दिया. एकबारगी समाज का जतिमुक्त होना बहुत सुखद संकल्पना लगती है. सबका जातिविहीन होकर सम्मिलित रूप में रहना सुहाना महसूस होता है. इस सुखद संकल्पना, स्थिति में अब जातियों से ज्यादा राजनीति समस्या बनती नजर आ रही है. 

जातिगत आधार पर संचालित होती राजनीति के चलते अब नीति-नियंता भी नहीं चाहते हैं कि समाज जातिमुक्त स्वरूप में दिखे. उनके लिए समाज का जातियों में विभक्त रहना लाभकारी सौदा हो गया है. यही कारण है कि अब चुनावों के दौरान लगभग सभी दलों द्वारा जातिगत आधार को ध्यान में रखते हुए टिकट का बँटवारा किया जाता है. उनके लिए उनके कर्मठ कार्यकर्ताओं, उनके समर्पित व्यक्तियों से अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति वो होता है जिसकी उसके क्षेत्र में निवास कर रही जातियों में बहुलता हो. राजनैतिक दलों के लिए योजनाओं का, बजट का क्रियान्वयन भी इस तरह से किया जाता है कि वे एक क्षेत्र-विशेष की जाति-विशेष के लिए लाभकारी हों. जाति को आधार बनाकर की जा रही राजनीति के चलते ही चुनावों के समय बहुसंख्यक प्रत्याशियों द्वारा अपनी जाति को प्रमुखता से दर्शाया जाता है. उसके पीछे उनका मूल उद्देश्य अपनी जाति के लोगों को आकर्षित करना होता है. ऐसी मानसिकता के बीच अनेक राजनैतिक दलों द्वारा समाज के सामान्य वर्ग अथवा सवर्ण वर्ग पर आरोप लगाया जाता है कि ये मनुवादी समाज में जातिभेद को फ़ैलाने में लगे हुए हैं. दलितों, पिछड़ों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं.

ये समझ से परे है कि उच्च सदन, निम्न सदन, प्रदेशों के सदनों में बैठे तमाम महानुभाव अपने वेतन वृद्धि के लिए किसी के मोहताज नहीं रहते. अपनी जनता की राय का अनुपालन नहीं करते. उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं. वे लोग जो किसी भी तरह की नीति को बनाकर जनता पर थोपा जाना सा पसंद करते हैं, वे जातिमुक्त समाज के लिए कोई नियम-कानून पारित क्यों नहीं कर देते? समाज में सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि शिक्षा के द्वारा जातिव्यवस्था को दूर किया जा सकता है. इसके ठीक उलट देखने में आ रहा है कि समाज जिस तेजी से शिक्षित हो रहा है, जिस तेजी से तकनीकी रूप से समृद्ध हो रहा है, उसी तेजी से जातिगत बंधनों में बँधता जा रहा है. दलित, पिछड़े वर्गों से उन्नति करके, शिक्षित होकर सामने आये लोगों में भी उसी तरह का अहंकार देखने को मिल रहा है जैसा कि सवर्णों के लिए कहा जाता है. ऐसे वर्गों के संपन्न, सक्षम लोगों में सवर्ण वर्ग के लिए उसी तरह का विद्वेष देखने को मिल रहा है  जैसा कि सवर्णों के मन में होना बताया जाता है. स्पष्ट है कि जातिगत व्यवस्था को दूर करने के लिए जातिगत विद्वेष फ़ैलाने से काम नहीं बनेगा. आरक्षण की बैशाखी के माध्यम से राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास करते लोगों के मन में अपनी जातियों के विकास की भावना से अधिक भावना सवर्णों के खिलाफ माहौल बनाने की है. इसके लिए वे जातिगत विभेद को किसी भी रूप में समाप्त नहीं करना चाहते हैं. जातिगत विभेद के द्वारा राजनैतिक दल जहाँ अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे हैं वहीं इसके द्वारा जातिगत ठेकेदार अपने-अपने उल्लू सीधे करने में लगे हुए हैं. जाति को समाज का नासूर बताने वाले ही समय-समय पर उसे कुरेदकर ज़ख्मों को हरा किये रहते हैं. आखिर जाति का जिंदा रहना उनके लिए ही लाभकारी सौदा है. 
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चित्र गूगल छवियों से साभार

28 जनवरी 2013

भ्रष्ट कहा तो सुलग गई



            चलिये, नंदी महोदय ने आरक्षण का एक और पहलू सामने रख दिया। उनके बयान के बाद भ्रष्टाचार की वर्गवार स्थिति पर वर्तमान में भले ही एक अलग प्रकार का माहौल बना दिख रहा हो, वर्ग विशेष में रोष का वातावरण दिख रहा हो किन्तु इस विषय पर एक प्रकार की बहस की गुंजाइश दिखाई देती है। पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के द्वारा भ्रष्टाचार में लिप्त होने के बयान के द्वारा प्रख्यात समाजशास्त्री ने समाज की उस नब्ज पर हाथ रख दिया है जिसे सभी देख-सुन-समझ रहे थे किन्तु किसी न किसी कारण से स्वयं को शान्त रखे हुए थे। इस ज्वलंत विषय पर बोलने का परिणाम का परिणाम तुरन्त दिखाई भी दिया; आशीष नन्दी पर गैर-जमानती धाराएं लगाई गईं, उनकी गिरफ्तारी की मांग उठने लगी, मायावती सहित तमाम लोगों ने उन पर एस0सी0/एस0टी0 एक्ट लगाने की बात तक कर दी। सोचने वाली बात यह है कि क्या वाकई नंदी का बयान इस तरह की आपराधिक प्रवृत्ति का है कि उन पर गैर-जमानती धाराएं लगाई जाती, उन पर एस0सी0/एस0टी0 एक्ट लगाये जाने की बात उठाई जाती? दरअसल उन्होंने उस वर्ग पर चोट करने का साहस उठाया है जो विगत कई वर्षों से तमाम सारे कानूनों के सहारे से अपनी निरंकुशता को बढ़ाने में लगा हुआ है। 
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            यह बात कई लोगों को नागवार गुजर सकती है पर मीडिया से, सामाजिक क्षेत्र से और अध्यापन कार्य से जुड़े होने के कारण लेखक को इस वर्ग से सीधे-सीधे जुड़ने का अवसर मिलता रहता है। इसके अलावा कुछ मित्रों का भी इन वर्गों से आना होता है, जिससे भी उनकी मानसिकता का पता आसानी से चलता रहता है। यहां किसी भी रूप में यह साबित करने का प्रयास नहीं है कि देश में हो रहे भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ और सिर्फ यही वर्ग दोषी है पर इस बात से खुद इस वर्ग के लोगों को भी गुरेज नहीं होगा कि भ्रष्टाचार करने में ये वर्ग भी किसी रूप में पीछे नहीं हैं। विगत कुछ वर्षों में आई जागरूकता, सामाजिक-राजनैतिक सक्रियता ने इन वर्गों के लोगों को उच्च पदस्थ रूप में स्थापित भी किया है; इसके अलावा कानूनी रूप से शासन-प्रशासन की सहायता मिलने से इन वर्गों के लोगों को सामान्यजन से अधिक प्राथमिकता प्राप्त हुई है। शिक्षा, रोजगार, कानूनी सहायता आदि में इन वर्गों को कहीं अधिक ही प्रदान किया जा रहा है और हर आने वाले पल में और अधिक देने की बात उच्च सदन से की जाती रही है। समाज में इस तरह की प्राथमिकता मिलने के कारण कहीं न कहीं इन वर्गों के लोग निरंकुश रूप से अपना व्यवहार करते दिखने लगे हैं।
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            इस बात को यहां तर्क-वितर्क का विषय भले ही बना लिया जाये पर कोई भी इस बात से इंकार नहीं करेगा कि समाज में प्रतिस्थापित हो चुके दलित/एस0सी0/एस0टी0 वर्ग के अधिसंख्यक लोगों द्वारा विद्वेष की भावना से कार्य किया जा रहा है। विगत कई वर्षों से गांवों में जिस तरह से एस0सी0/एस0टी0 एक्ट का दुरुपयोग हुआ है, उससे इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। लेखक ने स्वयं ही अपनी मित्र-मण्डली में, अपने परिचितों में शामिल इन वर्गों के लोगों द्वारा एक विशेष प्रकार का शक्ति प्रदर्शन आजमाने की अप्रत्यक्ष चुनौती सी देते देखी है। कानून से मिलने वाली प्राथमिकता, सत्ता, शासन, प्रशासन से मिलने वाली प्राथमिकता के कारण आये दिन इन वर्गों के अधिसंख्यक लोगों द्वारा कई तरह से शक्ति प्रदर्शन की चुनौती सी समाज में प्रदर्शित भी की जाती रहती है। ऐसे शक्ति सम्पन्न, कानूनी सहायता प्राप्त वर्गों द्वारा अपने पदों का, शक्ति का, सत्ता का दुरुपयोग भी आसानी से किया जाना क्या सम्भव नहीं दिखता है? इसके अलावा ऐसा भी नहीं है कि देश में भ्रष्टाचार करने का ठेका सिर्फ और सिर्फ सामान्य वर्ग के लोगों ने ले रखा है। ऐसा भी नहीं है कि भ्रष्टाचार में पिछड़ा, एस0सी/एस0टी0 वर्ग के लोगों का कोई हाथ ही नहीं रहा है। इन वर्गों द्वारा भ्रष्टाचार का सर्वोत्तम उदाहरण गांवों में मिड-डे मील में, मनरेगा में आसानी से देखने को मिलता है।
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            समाजशास्त्री की बात को जिस तरह से तूल दिया जा रहा है वह समाज में तमाम सारी बनी खाइयों के बीच एक और खाई बनाने का कार्य करेगा। अच्छा होता कि उनके बयान को भले ही आधार न बनाया जाता पर कम से कम इस सम्भावना पर भी विचार किया जाता। स्वयं इन वर्गों को और इन वर्गों के हिमायतियों को विचार करना चाहिए कि जो बयान आज एक समाजशास्त्री के द्वारा दिया गया, कल को वह आरोप बनकर समाज के अधिसंख्यक वर्ग के मुंह पर न आ जाये। इस पर विचार करने के बजाय इन वर्गों के लोग अनर्गल रूप से विवाद को बनाये रखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें भली-भांति ज्ञात है कि उनकी रक्षा के लिए सत्ताधारी हैं, कानून हैं, तमाम सारे एक्ट हैं, तमाम सारे आयोग हैं।
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24 जुलाई 2010

जाति-विभेद दूर करने में भी जातिगत राजनीति




देश की जनगणना में जाति को शामिल करना/न करना का विवाद अपने अलग रंग में है। आये दिन बुद्धिजीवी इसको लेकर प्रदर्शन, धरना आदि में व्यस्त रह रहे हैं। बैठे बिठाये एक मुद्दा मिल गया है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)


इधर कुछ दिनों से खबर लगातार मिल रही है कि प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों ने मिड डे मील का खाना खाने से मना किया। इसके पीछे कारण भोजन का दलित महिला से बनवाया जाना बताया जा रहा है। सरकार ने जाति विभेद को दूर करने का यह अनोखा तरीका इजाद किया है कि स्कूलों में भोजन दलित जाति की महिला बनायेगी। इससे विभेद मिट रहा हो या नहीं पर बच्चों के मन में जातिगत संकीर्णता और तेजी से घर कर रही है।

जाति का कारनामा नेताओं की देन है तो समाज के ठेकेदारों की भी देन है। इसके अलावा हम लोग भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जातिगत समस्याओं को हवा देते रहते हैं। अकसर देखने में आया है कि जाति धर्म को लेकर बड़े-बड़े भाषण देने वाले ही जातिगत संकीर्णताओं में बँधे देखे गये हैं।

बहरहाल यह तो समाज का चलन है, जो तब तक जारी रहेगा जब तक कि समाज स्वयं इसको चलन से दूर करने की नहीं ठान लेता। इस पोस्ट के पीछे से सवाल उठाना हमारा मकसद था कि


स्कूलों में दलित महिलाओं के द्वारा भोजन बनवाने से क्या जातिगत विभेद समाप्त हो जायेगा?

होटलों, ढाबों आदि में भोजन करते समय क्या हम भोजन बनाने वालों की अथवा वेटरों की जाति पूछकर वहाँ भोजन करते हैं?

विवाह, समारोहों आदि में भोजन करते समय क्या वहाँ काम कर रहे लोगों से उनकी जाति पूछते हैं?

अपने देवी-देवताओं के लिए प्रसाद लेने के लिए, व्रत-पूजा के लिए मिठाई लेने के पहले क्या हलवाई की अथवा उस मिठाई को बनाने वाले की जाति का पता करते हैं?


जाति का मिटना हमारे हाथ में ही है और उसका बढ़ना भी हमारे हाथ में है। हम भले ही अपनी जाति को न छिपाना चाहें, ठीक है पर कम से कम किसी अन्य को उसकी जाति के कारण छोटा और ही न समझें। किसी को मात्र जाति के कारण ही प्रताड़ना का शिकार न बनायें, भेदभाव का शिकार न होने दें। इस तरह के कदम ही जातिगत विभेद को दूर करने में सहायक होंगे।

समस्या का मूल समझना होगा, इसको ऊपर-ऊपर से दूर करने का प्रयास समाज के लिए घातक ही होगा।

10 जनवरी 2009

पढ़े-लिखों की राजनीति

कई बार मुछ घटनाएं इस तरह से सामने आतीं हैं कि लगता ही नहीं कि हम किसी पढ़े-लिखे समाज का अंग हैं या फ़िर इस तरह की बात करने वाले भी पढ़े-लिखे हैं. अक्सर समाज में बुद्धिजीवी वर्ग को जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि जैसी बातों की बुराई करते देखा जाता है पर जैसे ही मौका मिलता है यही वर्ग इस तरह की बातें करने लगता है. कुछ इसी से मिलती जुलती बात आज ही देखने में आई है. हुआ ये कि हमारे क्षेत्र में विश्वविद्यालय झाँसी में है "बुंदेलखंड विश्वविद्यालय." कल यानि कि 10 जनवरी को विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ "बूटा" का चुनाव होना है. इस चुनाव की परिधि इस विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले महाविद्यालय आते हैं, इन महाविद्यालयों में शासकीय महाविद्यालय शामिल नहीं होते हैं. इन महाविद्यालयों के सभी नियमित प्राध्यापक ही इस चुनाव में मतदान कर सकते हैं.

इन चुनाव में समीकरण कुछ इस तरह बने कि किसी की समझ में ये नहीं आ रहा है कि किसे वोट दिया जाए और किसे नहीं. अध्यक्ष पद के लिए तो दो ही दावेदार हैं और ज्यादातर लोगों का रुझान स्पष्ट है कि कहाँ वोट देना है पर महामंत्री पद के लिए तीन प्रत्याशी होने के कारन लोगों में असमंजस की स्थिति है. इस असमंजस की आड़ में जब ये तय नहीं हो पाया कि कौन आगे है और कौन पीछे तो प्रत्याशियों की तरफ़ से उनके समर्थकों की तरफ़ से जातिवाद का और क्षेत्रवाद का खेल शुरू किया गया. एक जाति विशेष को जिताने और एक जाति विशेष को हराने का खेल शुरू किया गया. कुछ मतों को क्षेत्र के नाम पर बटोरना शुरू किया गया। जाति, क्षेत्र की राजनीति इस तरह के छोटे से चुनाव में देखने को मिली जिसका कि कोई बहुत बड़ा राजनैतिक लाभ भी नहीं है. देखा जाए तो ये चुनाव एक तरह की व्यक्तिगत राजनीती का परिचायक हैं पर इनमें भी इस बार एक अलग तरह की राजनीती होते दिख रही है.

शाम गए और देर रात तक जो खबरें मिल रहीं थी उनको सुन कर लग रहा था कि आज सारी रात यही उठापटक चलेगी कि कैसे किस मत को किस आधार पर प्राप्त किया जा सके. बहरहाल जिस चुनाव की कोई बहुत अहमियत न हो उसमें इस तरह की राजनीती बताती है कि देश की प्रमुख राजनीति में किस कदर ये तत्त्व हावी हो चुके हैं. देश के किसी भी स्तर के चुनावों में जाति, क्षेत्र की राजनीति का हम सभी विरोध करते हैं और नेताओं को कोसने का काम करते हैं, उनको अनपढ़, बदमाश, अपराधी और भी न जाने क्या-क्या कह कर अपनी भडास निकाल लेते हैं, क्या इन पढ़े-लिखे लोगों (महाविद्यालय के प्राध्यापक) के चुनाव में इस तरह की राजनीति को आप साफ़ कहेंगे? क्या ये लोग किसी भी राजनेता से कम हैं? क्या ये समाज को शिक्षित करने का कार्य सही ढंग से कर रहे हैं? सवाल बहुत हैं पर जवाब...............??????????

15 दिसंबर 2008

कैसा समाज चाहिए हमें???????

इस समय प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए सरकार की मिड डे मील योजना चल रही है। इस योजना के चलने से लेकर अभी तक ये अपनी सफलता के लिए कम और विवादों के लिए अधिक चर्चा में रही है. इसके पीछे कारण समाज में फैला भ्रष्टाचार तो है ही साथ ही समाज में अपनी जड़ें गहराई तक जमा चुकी जात-पात की बुराई भी है. इस योजना के द्वारा बच्चों को भोजन देने का प्रयास किया गया साथ में हमारे नेताओं ने इसे समाज में समता लाने का साधन भी बना लिया।
ये तय किया गया कि बच्चों के लिए जो महिला खाना बनाएगी वो दलित वर्ग की होगी. बस यही से विवाद शुरू हो गया. कुछ ने इसी को राजनीति के लिए अपना लिया और कुछ ने इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया. बहरहाल कुछ भी हो .............. आज इसी मुद्दे का एक समाचार पढ़ रहे थे. लिखा था कि कुछ बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया. उनका कहना था कि वे किसी दलित के हाथ का बना खाना नहीं खायेंगे. हमारे नित्य के उठने बैठने वालों के मध्य ये ही चर्चा थी कि क्या कोई बच्चा दलित, पिछडा, शूद्र शब्द समझता है? क्या वो समझता है कि अगडा-पिछड़ा क्या है?
सवाल वाकई गंभीर थे पर अनुत्तरित नहीं हैं. आज भी गाँवों में जात-पात का भेद सबसे ज्यादा है, रही सही कसार इस राजनीति ने पूरी कर दी है. जबसे अगडे-पिछडे का खेल खेला जाने लगा है तब से समाज में समता कम और कटुता अधिक आई है. क्या हम बच्चों को यही सिखा रहे हैं? हमारे राजनेता वाकई समाज में समता लाना चाहते हैं या फ़िर नाटक ही करते रहना चाहते हैं? हम वाकई समाज में समता लाना चाहते हैं या फ़िर नेताओं के हाथ कि कठपुतली बने रहना चाहते हैं? सोचिये और कम से कम अपने लिए न सही अपने बच्चों के लिए ही सही समाज से जाट-पात का भेद मिटाने का प्रयास करें. कहिये क्या विचार है आपका?
(अभी सेमिनार की जल्दी है, इसलिए इतना ही शेष बाद में..........सेमिनार 19-20 दिसम्बर को है.)