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24 जनवरी 2026

व्यावहारिक और दीर्घकालिक हो विदेश नीति

पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.

 

देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों को, योजनाओं को रोकना पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.

 



भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.

 

ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने लगा.  

 

यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई पड़ती है, जैसी कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है. कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा सकता है.

 

वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक व्यावहारिक, दीर्घकालिक दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को, विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.


08 अगस्त 2022

बांग्लादेश के संकट पर भारत का रुख

वर्तमान दौर भारत के पड़ोसी देशों के लिए सुखद नहीं है. श्रीलंका का आर्थिक और राजनैतिक संकट कुछ दिनों पहले ही वैश्विक पटल पर उभर कर सामने आया था. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. अब बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति सबके सामने आ रही है. इन तीनों पड़ोसी देशों में जनसामान्य को रोजमर्रा की वस्तुओं का मिलना दुष्कर होता जा रहा है. मँहगाई का स्तर बढ़ता जा रहा है. विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आती जा रही है. इन सभी देशों की मुद्रा की कीमत भी डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रही है. बांग्लादेश सरकार ने अपने निर्माण के बाद पहली बार तेल कीमतों में अतिशय वृद्धि करके डाँवाडोल होती अपनी आर्थिक स्थिति से निपटने को एक अजब सा कदम उठाया है.   


बांग्लादेश की सरकार भले कहे कि उसके देश में हालात सामान्य हैं किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है. तेल कीमतों के बढाए जाने के बाद जिस तरह से नागरिकों ने सड़क पर उतर कर विरोध, विद्रोह किया है वह वहाँ के हालात बताने को पर्याप्त है. बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति के खराब होने की एक बड़ी वजह वहाँ आयात के बढ़ना और निर्यात का घटना रहा है. आयात बढ़ने के का सीधा असर वहाँ के खजाने पर हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2021 से लेकर मई 2022 के बीच 81.5 अरब डॉलर का आयात किया गया. पिछले साल की तुलना में यह 39 प्रतिशत अधिक है. जाहिर सी बात है कि ऐसा होने के कारण वहाँ के मुद्रा कोष पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही था. बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2021 जुलाई तक 45 अरब डॉलर था, जो जुलाई 2022 को यह घटकर 39 अरब डॉलर रह गया. अनुमान है कि इस स्थिति में बांग्लादेश के पास पाँच महीने आयात करने की क्षमता बची है. इन स्थितियों से निपटने के लिए बांग्लादेश के वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 4.5 अरब डॉलर का कर्ज माँगा है. इसका उद्देश्य एक प्रकार से देश के विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ ताकत प्रदान करना है.




बांग्लादेश के ऐसे आर्थिक हालातों पर प्रश्न अवश्य ही उठता है कि भारत का नजरिया क्या होना चाहिए? भारत उसकी सहायता के लिए क्या कदम उठाता है यह एक राजनयिक बिंदु है मगर भारत को वहाँ की बिगड़ती स्थिति से मुँह फेर कर नहीं बैठना चाहिए. बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति भारत के लिए भी चिंता का कारण होनी चाहिए. इसके पीछे का कारण बांग्लादेश का पड़ोसी होना मात्र नहीं है वरन अन्य दूसरी स्थितियाँ भी हैं. बांग्लादेश वर्ष 1971 में बनने के साथ ही भारत का पड़ोसी देश कहलाया अन्यथा की स्थिति में वह पहले अविभाज्य भारत का ही हिस्सा था. वहाँ की संस्कृति, वातावरण आदि में बहुत हद तक समानता देखने को मिलती है. अविभाजित भारत का भाग होने के कारण दोनों तरफ के बहुतेरे नागरिकों में दो देशों जैसा भाव का एहसास नहीं जन्मा है. रोजगार की तलाश में आज भी बांग्लादेश से हजारों की संख्या में नागरिक भारत में घुसपैठ करते हैं. अवैध तरीके से होने वाली घुसपैठ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में कटुता का कारण भी बनी है.


बांग्लादेश की तरफ से होने वाली अवैध घुसपैठ के चलते भारत में तनाव बना रहता है. इस घुसपैठ ने न केवल भारतीय संसाधनों, आर्थिक स्थितियों पर बोझ डाला है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी ध्वस्त किया है. बांग्लादेशी घुसपैठियों के यहाँ अनेक तरह के अपराधों में लिप्त होने के प्रमाण मिले हैं. ऐसे में यदि बांग्लादेश का आर्थिक संकट लम्बा चलता है, वहाँ के नागरिकों में इसी तरह विरोध की मानसिकता बनी रही, रोजगार के अवसरों में कमी आती रही तो निश्चित ही वहाँ से घुसपैठ करने वालों की संख्या बढ़ेगी. रोजगार की तलाश में हजारों की संख्या में नागरिकों का भारत में आना होगा. यह स्थिति कतई सुखद नहीं होगी. इससे न केवल दोनों देशों के राजनयिक, कूटनीतिक संबंधों पर नकारात्मक असर होगा, भारत के सामाजिक ढाँचे और आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा.


इसके अलावा दोनों देशों की सीमा अत्यंत विस्तीर्ण है, जहाँ की भौगौलिक स्थिति के कारण पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कर पाना दुष्कर होता है. इसका लाभ उठाते हुए नकली नोटों, हथियारों, नशीले पदार्थों आदि की तस्करी की घटनाएँ नियमित रूप से अंजाम दी जाती हैं. बांग्लादेश का आर्थिक संकट इस तरह की अवैध गतिविधियों को और बढ़ावा देगा. जाहिर सी बात है कि बांग्लादेश में वस्तुओं की कमी को पूरा करने के लिए भारत से तस्करी करके, अवैध रूप से वस्तुओं को बांग्लादेश पहुँचाया जायेगा. निश्चित ही यह भारत के लिए आर्थिक समस्या ही उत्पन्न करेगा. बांग्लादेश आर्थिक संकट के दौरान भारत की तरफ से उसे खाद्यान्न सहायता प्रदान की गई है. अन्य आवश्यक संसाधनों की सहायता प्रदान करने की दृष्टि से उच्चस्तरीय कदम उठाये जा रहे हैं.


चूँकि बांग्लादेश कपड़ा निर्यातकों में अपना एक विशेष स्थान रखता है. वैश्विक बाजार में यहाँ के कपड़े की जबरदस्त माँग रहती है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यहाँ के कपड़ा निर्यात की माँग पर नकारात्मक असर पड़ा. बिगड़ते आर्थिक हालातों में खाने-पीने की चीजों और ईंधन के बढ़े दाम से नागरिकों को परेशानी पैदा हुई. नागरिकों के सड़कों पर उतरने से वहाँ भी श्रीलंका जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में बांग्लादेश चीन के कर्ज जाल में फँस जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. चीन पहले भी चटगाँव को लेकर बहुत ज्यादा रुचि दिखाता रहा है, ऐसे में उसके द्वारा आर्थिक सहायता की बड़ी पहल करना कोई नई बात नहीं होगी. यदि बांग्लादेश चीन के आर्थिक चंगुल में फँसता है तो यह भारत के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं होगा. इसलिए भारत को बांग्लादेश के आर्थिक संकट को जल्द से जल्द दूर करने हेतु यथासंभव कदम उठाने की आवश्यकता है.


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