पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश
नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की
विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला
जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय
परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान
भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश
नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त
करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही
मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ
पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.
देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और
बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता
या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं
होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों
को, योजनाओं को रोकना
पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई
गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को
स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया
वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को
नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.
भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता
के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी
कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप
में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है
जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा
सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के
लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं
नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने
विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.
ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना
उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय
हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ
सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव
में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का
चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर
हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर
अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन
घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने
लगा.
यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई
पड़ती है, जैसी कि
वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत
सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं
निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट
के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका
और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत
की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है
वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है.
कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा
सकता है.
वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा
जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की
अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी
देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ
चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में
नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को
जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय
क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते
हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से
सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित
होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक
व्यावहारिक, दीर्घकालिक
दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट
होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को,
विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.

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