शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से
बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली
पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों
की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के
आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता
है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के
माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता
वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा
बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के
पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के
द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी'
अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का
उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को
सुलझाने की क्षमता भी घटी है.
किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी
जीवन-चर्या, कार्य-शैली
आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा
स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की
समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर
किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने
में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक
अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की
आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की
छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं,
रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन
करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने
संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी
परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे
रहते हैं.
अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण
ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक
बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे
से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के
रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के
कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना,
संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर
घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.
सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के,
पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के
बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा
रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने
बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने
के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर
सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह
स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.
डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न
माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी
के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली
पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी
को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले
ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद,
मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही
होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से
बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद
चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी
पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी
संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की
आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है,
बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम
सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.

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