मनोदशा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मनोदशा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




06 जनवरी 2022

कुछ है जो असंतुलित किये है

कभी-कभी सब कुछ सही सा दिखने के बाद भी कुछ सही सा नहीं लगता है. अपने आपमें ही ऐसा महसूस होता रहता है जैसे बहुत कुछ छूट सा रहा है, बहुत कुछ अनचाहा सा हो रहा है. कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वैसे देखा जाये तो कभी-कभी ही क्यों ऐसा हर बार होता है जबकि समझना कठिन होता है कि ये बहुत कुछ अनचाहा सा क्यों हो रहा है. मन की, तन की साम्यावस्था बनाये रखना बहुत कठिन हो जाता है. मन और तन का आपसी तालमेल न बैठ पाने के कारण किसी काम को करने की मनःस्थिति भी नहीं बन पाती है. मन कुछ करना चाहता है, दिल कुछ कहता है और देह कुछ और करने लगती है. इस असंतुलन को संतुलित कर पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है.


हर बार ऐसी स्थिति के बाद कोई ठोस और कठोर निर्णय लेने का मन करता है मगर संभवतः असंतुलन की स्थिति किसी एक स्थायी निर्णय पर भी नहीं पहुँचने देती है. कई बार लगता है किसी मशीन की तरह, किसी कंप्यूटर की तरह दिल-दिमाग को अपडेट किया जा सकता. किसी तकनीक के द्वारा फॉर्मेट किया जा सकता अपनी मेमोरी को, अपनी स्मृति को. वाकई, यदि मन को, दिल को, दिमाग को किसी कंप्यूटर की तरह फॉर्मेट किया जा सकता, किसी सॉफ्टवेयर की तरह अपडेट किया जा सकता, उसको असामान्य स्थिति होने पर अनइनस्टॉल, इनस्टॉल किया जा सकता. अफ़सोस ऐसा कुछ इंसानी शरीर के साथ, उसके दिल-दिमाग के साथ नहीं किया जा सकता है.


ऐसा न हो पाने के कारण तमाम उलझनों का बोझ उठाये बस चलायमान रखा जा रहा है. खुद को कर्तव्य पथ पर सक्रिय बनाये रखा जा रहा है. ये भी समझ से परे है कि खुद को काम में लगाए हुए हैं अथवा काम में उलझे होने का बहाना बनाये हुए हैं?




07 जून 2020

काश कि दिल-दिमाग-मन को फॉर्मेट किया जा सकता

कभी-कभी भावावेश में या फिर अचानक ही अनजाने में ऐसे कदम उठ जाते हैं जिनके बारे में बाद में सोचने पर अफ़सोस होता है. कई बार उन बातों के परिणाम सामने आने के बाद भी अफ़सोस होता है. आवश्यक नहीं कि ऐसी बातों का या कदमों का कोई दुष्परिणाम हो मगर जो भी होता है वो खुद को अच्छा नहीं लगता है. ऐसे में स्वाभाविक है कि यदि आपकी खुद की बातों का जो परिणाम रहा हो वो ही आपको पसंद न आ रहा हो तो दुःख होना स्वाभाविक है. अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या हमारे साथ ही ऐसा है?



कुछ बातों का असर कई-कई वर्षों बाद देखने को मिलता है. कुछ बातें तत्काल अपना परिणाम दिखा देती हैं. जिन बातों का असर तत्काल देखने को मिल जाता है, उनके चलते दुःख भी क्षणिक रहता है. इसके उलट ऐसी बातें जिनके परिणाम देर से मिलें उनके बारे में कष्ट भी बहुत लम्बे समय तक रहता है. इन्हीं में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनका छिपे रहना ही बेहतर होता है मगर कई बार भावनाओं में बह जाने के कारण बातें भी सामने आ जाती हैं. जिस समय भावनाओं का प्रकटीकरण किया जाता है, संभव है कि उस समय माहौल उनके अनुकूल हो मगर जैसे ही वातावरण उन बातों के विपरीत होता है वे बातें कष्ट देने लगती हैं.


ऐसी बातों पर पश्चाताप से भी कोई हल नहीं निकलता है. ऐसी बातों को कहने से संदर्भित क्षमा याचना भी उनके परिणाम से उत्पन्न कष्ट को कम नहीं करती. सोचने वाली बात है कि ऐसी बातों के लिए दोषी व्यक्ति पश्चाताप करना चाहता है मगर इसका कोई निदान नहीं. संभव है कि ये स्थिति अत्यंत कष्टकारी ही होती है. काश कि दिल-दिमाग-मन ऐसे यंत्र होते जिनको समय के साथ फॉर्मेट किया जा सकता. इनमें अच्छी-अच्छी यादों को संग्रहित कर लिया जाता और बुरी-बुरी बातों को, दुःख देने वाली घटनाओं को निकाल दिया जाता. काश ऐसा हो पाता.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

06 जून 2020

दो खुराकें सब सही कर देंगी

आज मन कुछ उदास सा है. क्यों है ऐसा पता नहीं, बस कुछ करने का मन नहीं कर रहा. कुछ कर भी रहे हैं तो लग रहा जैसे सबकुछ यंत्रवत ही करना पड़ रहा है. इस अनमने मूड के चलते आज  कुछ विशेष भी नहीं किया जा सका. पूरा दिन बेकार ही निकला. सुरक्षात्मक कदमों के चक्कर में कदम घर के बाहर न निकाले और शाम भी ऐसी न थी कि कुछ करने को प्रेरित करती. आज पूरे दिन में न कुछ पढ़ा गया और न ही कुछ लिखा गया. इसी न लिखने, न पढ़ने, मूड सही न होने के कारण आसपास एक उदासी सी महसूस हो रही है.



इस उदासी को दूर करने के लिए गाने भी सुने जा रहे मगर वे भी इस समय रसीले समझ न आ रहे. गाने, संगीत हमारे साथ बहुत आरंभिक दिनों से रहा है. रेडिओ के साथ भी बहुत शुरुआत से बना रहा. बाद में हॉस्टल जाने पर भी इसका साथ न छूटा. आज भी सुबह आँख खुलने के बाद पहला काम रेडिओ का शुरू करना होता है. विविध भारती अपने रंग के साथ हमारे साथ रंग बिखेरती है. उसका यह रंग बिखेरना देर रात तक चलता रहता है.

पर आज कुछ समस्या है. शायद दिमाग में कोई केमिकल लोचा हो गया है. संभव है यह सुबह उठने के बाद ठीक हो. ऐसा होगा भी क्योंकि किसी भी तरह की परिचित समस्या हमें एक-दो घंटे से ज्यादा परेशान नहीं कर पाती है, यहाँ तो समस्या का नामोनिशान नहीं. बस मूड सही नहीं. सोचा इसी को लिखा जाये, शायद कुछ सही हो क्योंकि ऐसा होता है अक्सर हमारे साथ कि परेशानी को, मूड ख़राब को लिख दो तो कुछ देर बाद सब सही हो जाता है. कागज़-पेन का सहारा लेकर कुछ लिख चुके हैं. अब इस माध्यम से भी लिख दे रहे हैं. ये दो खुराकें सब सही कर देंगी.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 दिसंबर 2019

प्रबल आत्मविश्वास ने ज़िन्दगी को जीना सिखलाया

किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके आत्मविश्वास का बहुत बड़ा योगदान होता है. इस बात को न केवल कहा जाता रहा है बल्कि बहुत से व्यक्तियों ने इसे अमल में लाकर इसे सच भी साबित किया है. विश्वास से ओतप्रोत व्यक्ति के चेहरे की आभा, उसके बातचीत का तरीका, कार्य करने का ढंग सबसे अलग ही नजर आता है. उसका सबसे अलग अंदाज ही उसे सबका प्रिय भी बनाता है और जीवन में सतत सफलता की राह पर भी ले जाता है. विश्वास, आत्मविश्वास को बनाये रखना किसी और के हाथ में नहीं वरन उसी सम्बंधित व्यक्ति के हाथ में होता है. उसकी खुद की सोच, उसकी खुद की मनोदशा, उसकी खुद की प्रकृति निर्धारित करती है कि उसके विश्वास का बिंदु किस ऊँचाई तक जा सकता है.


अपने जीवन में अनेक व्यक्तियों से मिलना हुआ, जिनमें विश्वास का चरम देखने को मिला. बहुत से लोग ऐसे मिले जो सहज रूप में अपनी जीवन-शैली का निर्वहन करते आ रहे हैं. ऐसे लोगों के जीवन में भले ही सुविधाओं की अतिशयता न रही हो मगर उनके सामने समस्याओं का, मजबूरी का, किसी कमी का होना भी नहीं रहा है. ऐसे लोग बिना किसी परेशानी के, स्वयं ही अत्यंत सहजता से अपने विश्वास के द्वारा अपनी सफलता की राह निर्मित करते मिले. इसके साथ-साथ ऐसे लोगों से भी मिलना होता रहा जिनके जीवन में अभाव बुरी तरह से रहे. ऐसे लोगों से भी मिलना हुआ जिनके लिए किसी तरह की सशक्त, समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि उपलब्ध नहीं रही. बहुत से ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने जीवन का बहुत बड़ा समय समस्याओं को हल करने में, अपनी परेशानियों को हल करने में ही लगाया. बहुत से ऐसे व्यक्तियों से भी परिचय होता रहा जिनकी शारीरिक स्थिति सामान्य व्यक्तियों की तरह से नहीं रही. ऐसे सभी लोगों के पास भले ही संसाधनों का अभाव रहा हो, भले ही पारिवारिक समृद्धि उनके लिए रास्तों का निर्माण नहीं कर सकी हो, भले ही उनकी शारीरिक स्थिति ने उन्हें समाज में सामान्य व्यक्ति की तरह से अनेक क्रियाकलापों से दूर कर रखा हो मगर ऐसे लोगों ने अपने विश्वास के बलबूते, आत्मबल के सहारे खुद को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित किया है.

आत्मविश्वास से लबरेज एक ऐसे व्यक्ति से आज लगभग दो दशक पुरानी दुर्घटना की याद के सहारे मिलना हुआ. उस समय अपने करीबी, बड़े भाई सरीखे अभिन्न मित्र के परिजन का एक ट्रेन दुर्घटना में अत्यंत गंभीर रूप से घायल होने का समाचार मिला. युवावस्था में कदम रखने के दौरान, जबकि आँखों में भावी जीवन के सपने बनने शुरू ही हुए होंगे, तकनीकी शिक्षा का आरम्भ अभी हुआ ही था लगा जैसे उसके सपने बिखर गए हैं. लगा जैसे कि जीवन आरम्भ होने के पहले ही किसी स्पीड ब्रेकर पर थमने सा लगा है. समय गुजरता रहा. उस होनहार युवक के बारे में लगातार जानकारियाँ मिलती रहीं. उसके द्वारा आत्मविश्वास के लगातार सहारे उन्नति के रास्ते पर बढ़ने के समाचार मिलते रहे. इन सबके बाद भी कभी मिलने का अवसर नहीं मिल सका. न मिलने के बाद भी महसूस होता रहा कि अपनी युवावस्था में दुर्घटना के द्वारा देह के स्तर से उपजी अक्षमता को उस होनहार, प्रसन्नचित्त, आत्मविश्वासी युवक ने जैसे हरा दिया है. अब जबकि उससे मिलना हुआ तो उसे वैसा ही पाया जैसा कि हम महसूस करते थे. आज पहली बार मिलना हुआ, उस युवक से. ढेर सारी बातें हुईं. पुरानी बातों को याद न करते हुए वर्तमान पर ही चर्चा हुई. हँसी-ख़ुशी के माहौल में उसका हँसमुख व्यवहार, विश्वास से दमकता चेहरा, मिलनसार व्यक्तित्व निश्चित रूप से उस निकटता को और बढ़ा गया, जो निकटता लगभग दो दशक पहले उसकी दुर्घटना की खबर सुनने के बाद बनी थी. निश्चित ही ऐसे युवक समाज में ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं, जो सभी तरह से सक्षम होने के बाद भी अपनी असफलताओं का रोना रोते रहते हैं. खुद को समाज की मुख्यधारा से अपने कमजोर विश्वास के हाथों हाशिये पर लगाये रहते हैं.

+++
चित्र परिचय –
काले सूट में गीत, जो लगभग दो दशक पहले एक ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैर और बायाँ हाथ खो चुके हैं. उस समय वह इंजीनियरिंग के छात्र थे. अपनी शिक्षा को उसके बाद भी उन्होंने पूरा किया. इस स्थिति में भी अपने विश्वास को, आत्मबल को उन्होंने कमजोर न पड़ने दिया. शिक्षा पूरी करने के बाद वे वर्तमान में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, SAIL में कार्यरत हैं.
आप जनपद जालौन के प्रसिद्द रंगकर्मी, फिल्मकार प्रभात तिवारी (कुरते में बैठे हुए) के भांजे हैं.

07 दिसंबर 2019

अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ बनना ही लिखा हो


कई बार सामान्य सी बातचीत भी असामान्य चर्चा की तरफ मुड़ जाती है. ऐसी चर्चा किसी निर्धारित बिन्दुओं के आधार पर अथवा किसी निश्चित विषय निर्धारण के द्वारा रास्ता नहीं पकड़ती है. बस बात की बात निकलते-निकलते कहाँ चली जाती है, समझ नहीं आता है. पिछले दिनों अपने मित्र सुभाष के साथ मैसेज के द्वारा चैटिंग हो रही थी. बातचीत का रास्ता अचानक से दूसरों की समस्या की चर्चा करते-करते खुद पर केन्द्रित हो गया. अकारण, बिना बात बातचीत में एक तरह का गाम्भीर्य दिखाई देने लगा. लगा कि दिल-दिमाग की उथल-पुथल कई बार शब्दों के द्वारा ज़ाहिर होने के लिए कोई न कोई माध्यम खोजती है. सत्य क्या है? इसका अभीष्ट क्या है? बातचीत का आधार बने बिना इस तरह की चर्चा का सूत्र किसके हाथों में रहा? सवालों के बीच अनेक बार इसे पढ़ने के बाद भी निरुत्तर रहे. सो लगा कि बस अब समाधान मिले, जो किसी भी रूप में मिले. मन की, दिल-दिमाग की उलझन, उथल-पुथल को विश्राम मिले. पर फिर वही सवाल कि क्या वाकई मनोस्थिति को, उलझन को, उथल-पुथल को कभी विश्राम मिला है, किसी के जीवन में भी?



= ऐसे में अगले ने अपना विश्वास हम पर रखा है... कम से कम हम खुद की नज़रों में अपराधी नहीं होना चाहते हैं. बहुत जगहों पर हम दोषी हैं पर वे नितांत हमारी हैं, व्यक्तिगत.
+ जीवन दोषो से भरा हुआ है लेकिन दोषों को स्वीकार करना ही दोष का शमन है मनुष्य जीवन में. मनुष्य होने की सीमाएं हैं. 
= हमारे दोषों का शमन नहीं, कई जगह विश्वास तोड़ा है.
+ हमें उन सीमाओं का ज्ञान हो जाये उतना ही काफी है. जीवन इतना थोड़ा सा है भाईसाहब कि कुछ भी अभीष्ट प्राप्त नही होता.
= सही बात, मगर जो सुधारा न जा सके और ये भी जानकारी हो कि खुद के कारण बिगड़ा है तो....?
+ कम से कम सच को खुद को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस लाना चाहिए. बस खुद की नजरों में न गिरें. स्वीकारोक्ति भी निश्छलता का ही पर्याय है.
= कम से कम हम अपने बारे में जानते हैं, सो समझते हैं. कुछ गलतियाँ चाह कर भी सुधारी न जा सकती हैं.
+ निश्छलता हर दोष के कलंक को कम करती है. गलतियां नही सुधरती, गलतियां तो घटनाएं हैं. घटना की पुनरावृत्ति न हो यही सुधार है बस. गलतियां तो जीवन का अभिन्न चरण हैं.
= कोशिश यही है.....
+ मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी मनुर्भव का लक्ष्य शायद इसीलिए स्थापित किया गया हमारे ऋषियों द्वारा.
= जब खुद की गलती से किसी और को सजा भुगतते देखते हैं तो ये सारी फिलोसोफी गायब हो जाती है.
+ फिलोसोफी की काट केवल फिलोसोफी ही है वरना मनुष्य मन सिवा बेचैनी की खान के सिवा और क्या है? या तो खाओ पीओ सड़ते रहो, बस. जरा सा चैतन्य हुए तो गलतियां मुंह बाए खडी. फिर यही फिलोसोफी ही तिनके का सहारा है.
= कुछ स्थितियाँ समझ के बाहर हैं, खुद हमारे.
+ आप हर घटना का भौतिक समाधान करते हैं, एकदम जमीनी, प्रशासन की तरह जबकि कुछ घटनाएं राजनैतिक समाधान मांगती हैं.
= कई बार लगता है कि दुनिया जहां की स्थितियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं और खुद गलतियों के पाताल में खड़े हैं.
+ यही आपकी जीत है कि आप अनुभव करने की योग्यता रखते हैं.
= या खुद को भ्रमित करने की?
+ कह सकते हैं.
= यही सत्य है.
+ सत्य भी कहाँ एक है? सबके अपने-अपने हैं
= ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि बहुत सी जगह खुद को आज तक माफ़ न कर सके. कोशिश करते हैं कि और किसी के साथ गलत न होने दें.
+ गलतियों से खुद को बांधे रखना भी तो एक बन्धन ही है. बन्धन सदा दुख आमन्त्रित करता है. गलितयों को स्वीकारोक्ति ही शमन है.
= खुद की गलतियों से  मुक्ति भी चाहिए.
+ यही जीवन भर का सन्धान शेष रह जाता है. ये तो अनवरत है, यात्रा जैसे. और कम से कम आप यात्रा में हैं.
= यही कष्ट भी है.
+ हमें यात्रा शुरू करनी है. सत्य, लेकिन कष्ट ही मुक्ति भी है शायद. सेल्फ हेल्प डिवाइस.
= कष्ट मुक्ति नहीं, प्रायश्चित है.
+ मुक्ति तो किसी ने देखी नहीं.
= गलती का दुःख कोई और भी सह रहा. उसे कहाँ मुक्ति मिली तो खुद को मुक्ति कैसे?
+ मृत्यु को मुक्ति कह नहीं सकते.
= बात मृत्यु की नहीं.
+ हम समझ रहे.
= अभी एक दिन हमने खुद के मरने का सपना देखा. हम मरे हैं, ठठरी बनी है और हम ही जिन्दा हैं, बता रहे अगले को कि कौन मर गया. समझ न सके कि है क्या ये? क्या चल रहा अचेतन में?
+ इस स्वप्न का कोई विशेष अर्थ होता होगा शायद?
= क्या जानें?
+ आप साक्षी भाव से जीवन की यात्रा में जा रहे शायद, जीवन से मोह भंग मतलब जीवन के उपक्रम से. आत्महत्या नहीं ये.
= ये कह सकते हैं. जीवन से किसी तरह का कोई मोह नहीं. खुद से मरना भी नहीं चाहते, आत्महत्या जैसा. पर कोई डर नहीं कि हमारे बाद सबका क्या होगा.
+ हम समझ रहे. जीवन का अभीष्ट शून्य ही है ये सच है. आपकी इच्छाओं की मृत्यु के सूचक हैं ये स्वप्न.
= ऐसा लग रहा, जैसे बस जी रहे. सच कहें तो इच्छाएं रही ही नहीं. बस किये जा रहे, जो मन में आया.
+ यही तो इच्छाओं की मृत्यु है. हम सब समझ पा रहे. इसी शून्य से जीवन जन्म लेता ही और इसी शून्य में.
= बस इस समय खुद से लड़ रहे, पिछले लगभग दस-बारह साल से.
+ यही तो आपके इच्छाओ की मृत्यु है क्रमशः. इसी लड़ाई से आपको अमृत मन्थना है. आप नितांत अकेले हैं इस यात्रा में. कोई आपको छू भी नहीं सकता. चाह कर भी कोई साथ नहीं चल सकता.
= पता नहीं अमृत मथेगा या हम खुद ही?
+ खुद तो सब ही मथते हैं। आप खुद के साथ साथ अमृत भी मथोगे यही आपका अभीष्ट है. अमृत तो आपको निकालना ही पड़ेगा क्योंकि आप मांग नहीं सकते भगवान से. जो भगवान से नहीं मांग सकता उसे अपना कुंआ खुद खोदना पड़ेगा. ये बात अलग है भगवान उसमें भी टेक्स लेंगे.
= बस अब समाधान चाहते हैं अपनी समस्याओं का, अपनी गलतियों का, अपने आपको मथने का. जो निकलना है, निकल आये अमृत या विष. अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ ही बनना लिखा हो? 

+++++++++++

(बातचीत में ‘=’ चिन्ह से हमारी बात और ‘+’ के द्वारा हमारे मित्र सुभाष की)

15 नवंबर 2019

लड़ना खुद से, जीतना-हारना भी खुद से


आज कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा था किन्तु कल से ही दिमाग में, दिल में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जिसका निदान सिर्फ लिखने से ही हो सकता है. असल में अब डायरी लिखना बहुत लम्बे समय से बंद कर दिया है. बचपन में बाबा जी द्वारा ये आदत डाली गई थी, जो समय के साथ परिपक्व होती रही. डायरी लिखने का महत्त्व भी समझ आता रहा सो डायरी लेखन लगातार बना रहा. बीच-बीच में ऐसे पल भी आये जबकि डायरी लेखन ने जीवन में काफी उठापटक मचा दी. भावनाओं का, संबंधों का अतिक्रमण करते हुए कुछ लोगों द्वारा डायरी का पढ़ना हो गया और उसका अनावश्यक दुष्प्रचार करके हमारी अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई. बहरहाल, समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता रहा, डायरी लेखन की आदत छूट न सकी और समयांतराल के साथ-साथ यह आदत बार-बार उभरती रही. हर बार कोई न कोई कारण ऐसा बनता रहा कि इसे बीच-बीच में बंद करते रहना पड़ा. इसी बीच तकनीक से परिचय हुआ, ब्लॉग का आना हुआ और डायरी लेखन की आदत कागज से हटकर डिजिटल मंच पर आने लगी. ब्लॉग कहीं न कहीं डायरी के रूप में हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया.


इधर बहुत लम्बे समय से ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम जीवन के विविध मंचों पर, तमाम आयामों पर असफल से होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि जीवन के किसी मोड़ पर सफलता नहीं मिली हो मगर जिस तरह से असफलताओं का आना होता रहा, उसके हिसाब से सफलताएँ कम ही साथ आईं हैं. यदि एक सामान्य रूप से अपने जीवन का आकलन, विश्लेषण करने बैठ जाएँ तो असफलताओं का कैनवास बहुत बड़ा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से अचानक ऐसी स्थितियों ने दिल-दिमाग पर जैसे कब्ज़ा सा कर लिया है. अपने आपका अपनी ही दृष्टि से मूल्यांकन किया जाता रहता है. कहाँ-कहाँ, किस-किस तरह की गलतियाँ हमारे द्वारा होती रहीं इनका विश्लेषण किया जाता रहता है. किस-किस गलती को सुधारा जा सकता है, कैसे सुधारा जा सकता है इसका भी आकलन किया जाता रहता है. भरसक प्रयास किया जाता है कि लगभग सभी गलतियों को सुधार दिया जाए. इसके बाद भी बहुत से कदम ऐसे हैं जिनको अब टाइम मशीन के द्वारा ही दोबारा पाया जा सकता है. उन कदमों के साथ हुई गलतियों को अब किसी भी रूप में सुधारा नहीं जा सकता है. ऐसे में लगता है कि उनका प्रायश्चित ही कर लिया जाए. यहाँ आकर भी सिर्फ खाली हाथ नजर आते हैं क्योंकि यह भी समय के चक्र में कहीं दूर हो चुकी स्थिति है.

फिलहाल तो आजकल अपने आपसे लड़ना हो रहा है. खुद से लड़ना, खुद से जीतना, खुद से हारना और फिर सबकुछ शून्य में विलीन होकर ज्यों का त्यों उसी अवस्था में दिखाई देने लगता है, जहाँ से लड़ना शुरू किया था. दिल-दिमाग लगाने के बाद भी हर एक स्थिति समझ से बाहर लगती नजर आती है. सबकुछ साथ होने के बाद भी साथ छूटता सा दिखाई देता है. हर गलती स्वीकारने के बाद भी, हर गलत कदम का प्रायश्चित करने के बाद भी गलतियाँ कम होने का नाम नहीं लेती हैं. तमाम सारी आदतों के बीच एक और आदत जो बाबा जी के द्वारा विकसित करवाई गई थी, रात को सोने के पहले दिन भर की गतिविधियों में से अच्छी और बुरी गतिविधियों का आकलन करना. अच्छी बातों को आगे करते रहने का संकल्प करना और बुरी बातों के लिए माफ़ी मांगते हुए आगे से न करने का वादा करना. हर रात उसी एक दिन की गतिविधियों के आकलन से शुरू होती है जो चलते-चलते अतीत तक पहुँच जाती है. अच्छी बातों के ऊपर गलत बातों का साया फैलता दिखाई देने लगता है. कब तक, कितनी बार, किस-किस से प्रायश्चित किया जाये? प्रत्यक्ष से, अप्रत्यक्ष से, चेतन से, अचेतन से, जीवित से, मृतक से न जाने किस-किस से ऐसा करना होता है, किया जा रहा है. इसके बाद भी खुद में हार जैसा, खुद में असफल होने जैसाएहसास बराबर बना रहता है. पता नहीं अन्दर से ऐसी कौन सी शक्ति विश्वास को बढाए रहती है, आत्मविश्वास को कमजोर नहीं होने देती है अन्यथा खुद के हार कर, टूट कर बिखरने में कोई कमी समझ नहीं आती है. पता नहीं कब तक ऐसा होता रहेगा?