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17 सितंबर 2023

बाबा जी की शिक्षाओं ने रखा विवादों से दूर

साइंस कॉलेज, ग्वालियर में बी.एस-सी. में प्रवेश लेने के लिए जाने का दिन निश्चित हो गया था. जाने के कोई पाँच-छह दिन पहले अचानक से मन में आया कि गाँव जाकर बाबा-अइया से मिल आया जाये. घर पर पिताजी से गाँव जाने की अनुमति लेकर अगले दिन गाँव के लिए निकल पड़े. इससे पहले भी बहुत बार गाँव जाना हुआ था मगर निपट अकेले गाँव जाने का यह पहला मौका था. उस समय फोन, मोबाइल की व्यवस्था आज के जैसी नहीं थी कि अपने आने की जानकारी बाबा तक पहुँचा पाते, सो अचानक से हमें देखकर बाबा और अइया का चौंकना स्वाभाविक था. जमींदार परिवार से होने के बाद भी बाबा जी ने अपने छात्र जीवन में बहुत संघर्ष किया था, खुद को अपने बलबूते स्थापित किया था, सो वे हम भाइयों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित करते रहते थे. बाबा जी को बहुत ख़ुशी हुई कि हम ग्वालियर जाने के पहले उनके पास गाँव आये, वो भी अकेले. 




तीन दिन बड़े ही ख़ुशी से गुजर गए. कहते हैं न कि ब्याज मूलधन से ज्यादा प्यारा होता है, बस कुछ यही स्थिति हमारी भी थी. अइया ने तमाम सारे पकवान, व्यंजन बनाये, बाबा जी से खूब सारी बातें हुईं. जिस दिन हमारा गाँव से उरई आने का तय हुआ, उस दिन चलने से कुछ देर पहले बाबा जी ने कहा कि चलते-चलते जरा पैर की उँगलियाँ चटका दो. बाबा जी जब उरई में हम लोगों के साथ होते तो दिन में कई-कई बार पैर की उँगलियाँ हम भाइयों से चटकवाया करते थे. पैर के पंजे को हलके हाथों से कुछ देर दबाने के बाद उँगलियों के चटकाने का नंबर आता था, उतनी देर में बाबा जी खूब सारी बातें बताया करते, कभी अपनी नौकरी की, कभी अपने बचपन की, कभी अपनी पढ़ाई की. हम लोगों को भी खूब मजा आता था सो दिन में कई-कई बार खुद ही बाबा जी से उँगलियों को चटकाने के लिए पूछ लिया करते थे.


पैर के पंजे दबाने के समय बाबा जी ने हमेशा की तरह बहुत सी बातें बताईं. उसी में उन्होंने कहा कि अब तुम उच्च शिक्षा के लिए बाहर जा रहे हो. अच्छा लगा कि बाहर जाते समय तुमको अपना गाँव याद रहा, यहाँ आने का मन बनाया. बाबा जी बोले कि हमारी एक बात हमेशा याद रखना कि अपने जीवन को बनाने के लिए ही तुम घर से बाहर जा रहे हो, जीवन को बर्बाद करने के लिए वापस आने की जरूरत नहीं. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि बाबा जी आखिर किस बात के लिए कह रहे हैं. जब हमने अपनी शंका सामने रखी तो उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए कहा क्योंकि संपत्ति का मोह बहुत बुरा होता है. गाँव के ये मकान, खेत-खलिहान आदि न तुम्हारे पिताजी लेकर आये, न हम लेकर आये, न हमारे बाप-दादा लेकर आये थे. ये पुश्तैनी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अपने आप मिलते रहे हैं. इनके लिए गाँव आकर फौजदारी करने की जरूरत नहीं. तुम्हारे पिताजी, चाचा लोगों को पढ़ा-लिखाकर बाहर इसीलिए निकाला कि अपना जीवन सुधार सकें. तुम लोग भी ऐसा करना. दुर्भाग्य से कभी कोई ऐसा करे कि वो गाँव की संपत्ति पर कब्ज़ा कर ले तो स्वाभिमान के साथ उससे कानूनी लड़ाई लड़ना, खून-खच्चर करने की जरूरत नहीं. अच्छी शिक्षा, ज्ञान की जो संपत्ति तुम लोग बनाओगे उसे कोई नहीं कब्ज़ा सकेगा और उसके बल पर तुम लोग कहीं भी इससे ज्यादा संपत्ति हासिल कर लोगे. चूँकि बाबा जी ने स्वयं लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद गाँव में अपने हिस्से की संपत्ति को हासिल किया था. उन्होंने गाँव में और अपनी पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने संपत्ति के विवादों, लड़ाई-झगड़ों के दुष्परिणामों को करीब से देखा था, इस कारण वे अपने अनुभवों को हमसे बताते हुए भविष्य के लिए हमें जागरूक कर रहे थे.      


उस दिन तो बहुत सी बातें समझ में भी नहीं आईं मगर उनको दिल-दिमाग में गहरे से बैठा लिया था. समय का चक्र ऐसा घूमा कि उसके बाद बाबा जी से बहुत ज्यादा मिलना नहीं हो सका. जितना भी मिलना हुआ, बाबा जी ने उसमें इस तरह की कोई बात नहीं की. ये घटना जुलाई-अगस्त 1990 की थी और एक साल बीतते-बीतते 1991 की आज की तारीख में बाबा जी हम सबसे बहुत दूर चले गए. बाबा जी के बाद भी गाँव की पैतृक संपत्ति से सम्बंधित किसी भी मामले में हमारा सीधा हस्तक्षेप नहीं रहा किन्तु हमारे पिताजी के वर्ष 2005 में चले जाने के बाद गाँव की इस छिपी हुई वास्तविकता से सामना हुआ. एक-एक इंच जमीन को कब्जाने का लालच देखा, खेतों पर गिद्ध दृष्टि लगाये लोगों को देखा. ये तो बाबा जी की शिक्षाओं का, उनके आशीर्वाद का सुफल कहा जायेगा कि बहुत सी विषम स्थितियों से आराम से निकल आये.


आज बाबा जी हम सबसे दूर हुए 32 वर्ष हो गए हैं, दो दिन बाद हम भी 50 का आँकड़ा छू लेंगे किन्तु अभी भी गाँव की पैतृक संपत्ति को बिना किसी विवाद के, बिना किसी लड़ाई-झगड़े के सुरक्षित रखे हुए हैं. यही कामना करते हैं कि ज़िन्दगी भर बाबा जी की, अइया की शिक्षाओं का पालन कर सकें, उनके दिखाए रास्ते पर चल सकें.


आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन. 






 

26 फ़रवरी 2022

क्रांतिधाम सेलुलर जेल और वीर सावरकर के दर्शन

घूमने का, फोटोग्राफी का शौक बचपन से रहा है. ये और बात है कि देशकाल, परिस्थिति के कारण बहुत सारी जगहों पर बहुत घूमना न हुआ मगर आसपास की जगहों पर खूब घूमना होता रहा. तमाम सारी जगहों के बारे में पढ़ने-देखने के कारण बहुत सी जगहों को देखने का, वहाँ के बारे में जानने-लिखने का, उसकी फोटोग्राफी खुद करने का बहुत मन हुआ करता था. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. 


जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 



23 फ़रवरी 2022

जब प्यार करे दिल तो.....

समय ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से रंगीन से गुजरता हुआ बहुरंगी होता चला गया. सेल्युलाइड की दुनिया वीनस गर्ल से निकल कर धक-धक गर्ल, मिर्ची गर्ल, कांटा गर्ल, चोली गर्ल की राह से गुजरती हुई नग्न-अर्धनग्न कमनीय बालाओं के साथ लगातार आगे बढ़ती रही. इन सबके बीच भी लोगों के स्वभाव बदले, रुचियाँ बदलीं, पसंद बदलीं, पसंदीदा व्यक्ति बदले. बदलाव के इस दौर में यदि कुछ बदलता न दिखा तो वो है अभिनेत्री मधुबाला के प्रति लोगों का आकर्षण. अपने समय में वीनस गर्ल के रूप में मशहूर मधुबाला के प्रशंसक आज भी उतने ही मिल जाते हैं, जितने कि उनके दौर में मिलते होंगे. ऐसा तब है जबकि उनको इस दुनिया को हमेशा-हमेशा को अलविदा कहे हुए आधी सदी से अधिक समय बीत गया है.

 

मधुबाला के प्रति आकर्षण के सम्बन्ध में जब हम खुद अपने को देखते हैं तो आश्चर्य होता है. हमारे इस संसार में आने के चार-पांच साल पहले मधुबाला इस संसार को अलविदा कह गई थी. हमारे समय की और उसके बाद जन्मने वाली पीढ़ी ने मधुबाला को सिर्फ परदे पर ही देखा है, टीवी पर देखा है और अब इंटरनेट के माध्यम से कई-कई सोशल मीडिया मंचों पर देख रही है. इस पीढ़ी ने कभी भी उनको लाइव रूप में नहीं देखा है, किसी कार्यक्रम में उनसे परिचय नहीं हुआ है, किसी समारोह में उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं मिला है, किसी आयोजन में उनके ऑटोग्राफ लेने का मौका भी नहीं मिला है इसके बाद भी मधुबाला की मनमोहक छवि इस पीढ़ी के बीच भी जीवित है.

 

इंटरमीडिएट तक की शिक्षा के दौरान घर-परिवार में ही रहना हुआ. उसी दौरान परिवार के अनुशासन में जितना टीवी, वीडियो देखने को मिला उसी में पुरानी फिल्मों को खूब देखने का अवसर मिला. उस समय बहुत सारे अभिनेता-अभिनेत्रियों के बीच मधुबाला सर्वाधिक आकर्षक महसूस हुईं. हँसने का अंदाज, आँखों की शरारत और उनकी अदाकारी ने उनके प्रति अजब सी दीवानगी पैदा कर दी थी. घर के अनुशासन में, छोटे से घर में कभी हिम्मत ही नहीं कर सके कि मधुबाला के पोस्टर कमरे की दीवारों पर लगा सकते किन्तु पत्रिकाओं में, अख़बारों में कभी-कभी निकलती फोटो किताबों, कापियों की शोभा बनती. किताबों, कापियों के कवर के रूप में भी कभी-कभी मधुबाला का चित्र आँखों के सामने दिखता रहता. बाद में आगे की पढ़ाई के लिए जब बाहर निकलना हुआ तब अपनी इस इच्छा को जीभर कर पूरा किया गया. हॉस्टल के अपने कमरे में अलग-अलग अंदाज में मधुबाला अवतरित होने लगीं. हमारे कमरे में उसका चौबीस घंटे रहना हुआ करता था. जिस तरफ नजर दौड़ते मधुबाला ही मधुबाला नजर आती थी. कमरे की तीन दीवारों पर छोटे-बड़े कई रूपों में मधुबाला उपस्थित रहती थीं और एक दीवाल माधुरी दीक्षित के लिए रख छोड़ी थी.

 

बहुत से लोगों के लिए यह मजाक का विषय बन जाता है कि मधुबाला आज भी हमारे मोबाइल में, लैपटॉप में वॉलपेपर के रूप में उपस्थित रहती हैं. मधुबाला से कब प्रेम सा हो गया पता नहीं मगर जिस दिन से उनसे प्रेम जैसा कुछ हुआउस दिन से उनको अपने से अलग नहीं किया है. स्कूल के दिनों में हमारे कुछ दोस्त मधुबाला से चोरी-छिपे मिलवाने में हमारी मदद कर देते थे. कभी किसी पत्रिका के चित्र, कभी उन दिनों हीरो-हीरोइन के चित्रों वाले पोस्टकार्ड आकार के कार्ड गिफ्ट करके. चूँकि मधुबाला के प्रति हमारे इस प्रेम या आकर्षण के बारे में हमारे दोस्तों को, हमारे परिजनों को, हमारे सभी परिचितों को भली-भांति जानकारी है, सो गाहे-बगाहे मधुबाला से कोई न कोई किसी न किसी रूप में मुलाकात करवा ही देता है.

 


अभी कुछ वर्षों पहले हमारी भांजी ने हमारे जन्मदिन पर मधुबाला के चित्रों से अलंकृत एक डायरी हमें भेंट करके उससे मुलाकात करवा दी. वह डायरी आज भी हमारी बुक-सेल्फ में इस तरह से लगी हुई है कि उसकी छवि आँखों के सामने बनी रहती है. कई सारे दोस्त इस बात पर हमारी मौज लिया करते कि शादी के बाद मधुबाला की एक फोटो भी न लगा पाओगे, पोस्टर तो बहुत बड़ी बात है. ये दीवानगी ही कही जाएगी कि आज शादी को भी लगभग दो दशक होने को आये हैं मगर कमरे में मधुबाला अपने पूरे सौन्दर्य के साथ ज्यों की त्यों उपस्थित हैं. तकनीकी दौर ने हाथों में मोबाइल पकड़ाया तो मधुबाला कमरे के साथ-साथ वहाँ भी उपस्थित रहने लगीं.

 

संभव है कि आज की एकदम नवोन्मेषी पीढ़ी ने सौन्दर्य के प्रतिमान बदल दिए हों. उसके लिए सौन्दर्य का सम्बन्ध कम वस्त्रों से, कामुक मुद्राओं से, अर्धनग्न प्रदर्शन से, आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता से होने लगा हो किन्तु इसके बाद भी बहुतायत में ऐसे युवा आज भी मिलते हैं जो मधुबाला के प्रशंसक हैं. आज २३ फरवरी को मधुबाला की पुण्यतिथि है. उनको श्रद्धा-सुमन इस आकांक्षा के साथ कि उनका अप्रतिम मनमोहक रूप-सौन्दर्य सदैव समाज में अंकित रहे. वीनस गर्ल के रूप में उनकी छवि और भी चमकती रहे.



(यह इस ब्लॉग की 2150वीं पोस्ट है.)

16 जनवरी 2022

तुमसे अब ऐसे ही मिलना हुआ करेगा

अभी तक तो हम तुमको देख पा रहे थे, भले ही पार्थिव रूप में. आज एक साल होने को आया जबकि हमने तुमको पञ्चतत्त्व में विलीन कर दिया. जिस किसी भी, भले ही वह तुम्हारा निर्जीव रूप था, तुमको देख रहे थे मगर आज के बाद तो तुमको देख भी नहीं सके, तुमको छू भी नहीं सके. हम तो उस दिन तुमको छूने में भी संकोच कर रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह के तुमको स्पर्श करें? उस दिन तो कोई आशीर्वाद भी तुम तक नहीं पहुँच रहा था. कोई आवाज़ भी तुम नहीं सुन रहे थे. दीपू ने कितनी बार कहा हमसे कि भाई जी मिंटू को बोलो कि उठे, मगर तुम किसी की सुन ही कहाँ रहे थे. तुम तक हमने बहुत बार हाथ बढ़ाया, बहुत बार तुमको छुआ मगर तुमने कोई जवाब नहीं दिया. तुमको उस दिन उठना ही नहीं था, तुम उठे भी नहीं.


कितनी बड़ी सजा है ये कि तुमको किसी दिन अपने कंधों पर उठाने वाले, तुमको खिलाने वाले उस दिन भी तुमको अपने कंधों पर लिए जा रहे थे मगर सबकी आँखों में आँसू थे. वे सब उस दिन खुश नहीं थे, हँस नहीं रहे थे. उस दिन गिरते-पड़ते हमने भी कुछ कदम तुमको अपने कंधे पर बिठाया था, ये सोच कर कि शायद तुम उठ बैठो मगर तुम न उठे. हम जानते थे कि तुमको अब नहीं उठाना है फिर भी खुद को धोखा देने का काम कर रहे थे. तुम उस धोखे में नहीं आये. तुम नहीं उठे.


बहरहाल, उस दिन को, उस बहुत बुरे दिन को आज एक साल हो गए हैं मगर ऐसा लगता है जैसे आज, अभी इसी समय की बात हो. एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं गुजारा हमने. लोग पागल कह सकते हैं हमें, यदि उनको बताया जाये. कहने को कुछ भी कहा जाये मगर आज एक साल बाद भी एक सेकेण्ड तुम्हारे बिना नहीं गुजरा हमारा. आज पिंटू इंदौर में थे तो वो टिंकू, रश्मि और विक्रम सहित उज्जैन हो आये. तुम उज्जैन जाते रहते थे, रश्मि की भी ऐसी इच्छा थी. अब तुम हम सबके बीच या कहें कि तुम्हारे साथ हम सभी लोग इसी तरह बस संस्कारों के माध्यम से आते रहेंगे.







तुमको बार-बार आशीर्वाद, जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो.

17 जून 2021

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध

बुन्देलखण्ड के इतिहास की बारीकियों से परिचित करवाने वाले देवेन्द्र सिंह जी की कलम से...

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१७ जुन,१८५८ महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस, आज १७ जून है तो आज की पोस्ट उन्हीं को समर्पित करता हुआ ग्वालियर में लड़े गए युद्ध का विवरण.


१७ जून से एक दिन पहले कल यानि १६ जून को रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मोरार की तरफ बढ़ा लेकिन उसके पहले उसने अपनी व्यूहरचना पूरी कर ली थी. संक्षेप में कहूँ तो यह इस प्रकार थी, ग्वालियर के दक्षिण दिशा में मेजर ओर हैद्राबाद कन्टन्जेंट के साथ आ जमा था. उसका कार्य यह था कि ग्वालियर शिवपुरी मार्ग से यदि भारतीय सेना दक्षिण की ओर भागने की कोशिश करे तो उसको रोके. ग्वालियर, लश्कर और मुरार को तीन भागों में बांट कर ग्वालियर के पूर्व-दक्षिण में कोटा की सराय में मुख्य मोर्चा स्थापित किया. ग्वालियर से कोटा की सराय सात मील की दुरी पर थी और लश्कर वहाँ से लगभग चार मील पर था. एक बार कम्पू और लश्कर पर अधिकार हो जाय तो किले के दक्षिण का भाग उनके उनके अधिकार में आने में ज्यादा मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. रोज ने निश्चय किया कि वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सराय में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. स्मिथ के ऊपर सबसे महत्वपूर्ण स्थान का भार था.


ग्वालियर में क्रांतिकारी सैनिकों के मोर्चे इस प्रकार थे, तात्या टोपे का मोर्चा कम्पू में, राव साहब पश्चिम में था, बाँदा के नवाब अलीबहादुर को ग्वालियर नगर और किले का भार सौपा गया. १६ जून को हुए युद्ध में क्रांतिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. रोज के साथ Sir Robert Hamilton, Agent to the Governor-General in central India और Major Charters MacPherson, the Political Resident of Gwalior भी मुरार में आए. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार रोज के कैम्प में आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से जो क्रांतिकरियों की तरफ से लड़ रहे थे, से कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद फिर से देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे उनका साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. ऐसा लगता है कि इस घोषणा का कुछ असर हुआ और फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे.


रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार आगे आकर अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में उनको समझाया. मेरे गुरु प्रोफेसर बिलास राय मिश्रा ने अपनी पुस्तक The Rising of 1857 in Bundelkhand with Special Reference to Jhansi के पेज न० १११ में लिखा – The Rani, however, once again rose equal to the occasion, she prepared an excellent plan of defence, entrusting to herself the most difficult task defending the eastern side of Gwalior. Accordingly, she made dispositions of her small force on the hills not yet occupied by the British. Her chief officers were Munder, Juhi, Ram Chandra desmukh, Raghunath singh, and Gul mohammad. They did not shut themselves up inside the fort. The fate that had befallen Jhansi was a constant reminder of the futility and danger of getting shut up inside the fort and thereby running the risk of being reduced to submission for want of provisions and other necessaries.


इस प्लान के तहत १६ जून की रात तक रानी ने और नेताओं से सलाह लेकर सब तोपें लगवा दीं. १७ जून को प्रातः सिंधिया की अश्वशाला से रानी के लिए एक नया घोडा लाया गया क्योंकि १६ जून को मुरार के मोर्चे में रानी का घोड़ा घायल हो गया था. उन्होंने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन, सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई.




इधर भोर होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल ४०० या ५०० कदम आगे बढ़ा था कि क्रांतिकारी सेना के गोलों की बौछार होने लगी. पीछे हट कर उसने अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. इसी में रानी के एक तोपची ने कैप्टेन हिनेज को लक्ष्य करके एक गोला चलाया मगर दुर्भाग्य से गोला कैप्टेन के घोड़े को लगा और वह बच गया. हिनेज इस घटना से इतना डर गया कि कमान कैप्टेन पोर को दी. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई. कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था.


अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस आक्रमण में डाक्टर शेलोक्क भी घायल हो गया. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी Cornet Goldworthy वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे पर खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद भारतियों की तरफ के पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी भारतीय सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.


रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे, युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी. उसके बॉडीगार्ड भी उससे बहुत दूर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने अपनी रिजर्व में रोके हुए ८वीं हुसर्स सैनिकों की टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से उन पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगती है. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती. रानी पीछे मुड़ी और मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया लेकिन तभी एक सैनिक की तलवार का करारा हाथ उन पर पड़ा. उनकी माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. सहसा एक गोली भी उसकी छाती में समा गई. वह घोड़े पर औंधे मुँह गिर पड़ी. इसी समय अंग्रेजी फ़ौज को वापस लौटने का आदेश देने वाला बिगुल बजा और उनके सैनिक पीछे लौट चले. ये सैनिक भी नहीं जानते थे कि उन्होंने किसको मारा है.


रानी के साथियों ने रानी को ढूँढना शुरू किया परन्तु वह कहाँ थी. थोड़ी दूर पर रानी का घोडा मिला. रानी अभी भी उस पर ही लेटी थी. उसकी सांसे चल रही थी. सब उनको लेकर नाले के पार एक कुटिया पर लाए. थोड़ी ही देर में रानी की सांसें थम गईं. तात्या टोपे ने अपने बयान में बतलाया था कि रामचंद्र देशमुख ने रानी की चिता में आग दी थी.


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रानी झाँसी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि सहित 

16 मार्च 2021

आशीर्वाद दीजिए कि हम कभी कमजोर महसूस न करें

साल को आना ही था क्योंकि विधि का विधान भी यही है. इस तारीख को भी आना था क्योंकि यह भी निश्चित है. इस बार यह तारीख कुछ ज्यादा ही दर्दनाक होकर आई. आपके जाने के दुःख के साथ मिंटू के न रहने की असह्य पीड़ा ने कष्ट बहुत ज्यादा बढ़ा दिया. वर्ष 2005 में आपके जाने के तत्काल बाद ही परिवार हमारी दुर्घटना के साथ ही अत्यंत विपत्ति जैसी स्थिति में आ गया था. आपके जाने के दुःख के साथ एक और दर्द जुड़ गया था. आपके जाने के बाद एकदम से घर में खुद के बड़े होने के एहसास हमारे प्रति दिखाई देने लगा. खुद में भी बड़े होने की जिम्मेवारी का भाव समेट कर खुद को इसके लिए तैयार करने लगे कि आपके द्वारा छोड़े गए कामों को कुछ हद तक पूरा कर सकें.


खुद को खुद के कष्ट से उभारते हुए कोशिश यही बनी रही कि परिवार में आपके द्वारा बनाई स्थिति बराबर बनी रही. इसमें कितना सफल रहे, कितना नहीं ये तो आप ही बता सकते हैं. कोशिश बराबर बनी रही कि कोई भी हमारे किसी कदम से, हमारे व्यवहार से निराश न हो. परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्यों के साथ समन्वित रूप को बनाये रखते हुए, लगातार सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास होता रहा. इस प्रयास में सभी लोग अपनी-अपनी स्थिति, प्रस्थिति में समाहित होते रहे. समय-समय पर सब लोग एक-दूसरे के प्रति सहयोग, प्रेम, स्नेह की भावना के साथ परिवार की अवधारणा को और पुष्ट करते रहे.


इस बीच लगने लगा था जैसे सबकुछ सही से चल रहा है. सामान्य सी उथल-पुथल जो आमतौर पर सबके साथ होती रहती हैं, वे आ रही थीं, सहज रूप में उनका समाधान हो रहा था और ज़िन्दगी की गाड़ी अपनी ही सुखमय रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी. इसी में मिंटू के अचानक चले जाने की घटना ने भीतर तक तोड़ कर रख दिया. विपत्ति की, परेशानियों की स्थिति में दिल-दिमाग में बहुत कुछ नकारात्मक बातें आती हैं मगर ऐसी नकारात्मक स्थिति तो कभी सोची भी नहीं गई थी. संभवतः किसी ने भी ऐसी घटना की कल्पना, आशंका भी नहीं की होगी. जनवरी में मकर संक्रांति की शाम वह दिल तोड़ देने वाली खबर लेकर आई. उस खबर ने भीतर तक न केवल तोड़ डाला बल्कि बहुत अकेला सा कर दिया.


मिंटू की घटना के बाद से लगातार आपको याद करते हुए विचार करते हैं कि ऐसी कौन सी परीक्षा ली जा रही है हमारी, हमारे अलावा अम्मा की, पिंटू की शेष परिजनों की यह समझ नहीं आ रहा है. शायद आपके न रहने पर आपकी अनुपस्थिति से उपजी तमाम जिम्मेवारियों को हम उस रूप में नहीं निभा पाए जिस तरह से उनको निभाया जाना था. आपके जाने के बाद परिवार की एक कड़ी के रूप में सबको जोड़े तो रहे मगर उस रूप में नहीं जोड़ सके जिससे कि सभी एक-दूसरे की ताकत बने रहते.


आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको सादर चरण स्पर्श करते हुए अपने लिए आशीर्वाद की कामना है कि आगे परिवार ऐसी किसी आपत्ति में, मुश्किल में न आये. आगे कभी किसी परेशानी में, किसी दुःख में हमें अकेला न रहने दे, कमजोर ने बनाये.


पिताजी, अम्माजी के साथ हम तीनों भाई 


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वंदेमातरम्

06 जनवरी 2021

अँधेरे को ज्ञान देने वाले लुई ब्रेल

आज, चार जनवरी को दृष्टिबाधितों के मसीहा एवं ब्रेल लिपि के आविष्कारक लुई ब्रेल का जन्म हुआ था. उनका जन्म फ्रांस के छोटे से गाँव कुप्रे में 4 जनवरी 1809 को मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. महज तीन साल की उम्र में एक हादसे में उनकी दोनों आँखों की रौशनी चली गई थी. हर बात को सीखने के प्रति उनकी ललक को देखते हुए उनके पिता ने उनका दाखिला दस वर्ष की उम्र में पेरिस के रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रेन  में करवा दिया था. उस समय स्कूल में वेलन्टीन होउ द्वारा बनाई गई लिपि से पढ़ाई होती थी पर यह लिपि अधूरी थी. इसी स्कूल में एक बार फ्रांस की सेना के एक अधिकारी कैप्टन चार्ल्स बार्बियर एक प्रशिक्षण के सिलसिले में आए. यहाँ उन्होंने सैनिकों द्वारा अँधेरे में पढ़ी जाने वाली नाइट राइटिंग या सोनोग्राफी लिपि के बारे में बताया. यह लिपि कागज पर अक्षरों को उभारकर बनाई जाती थी. इसमें 12 बिंदुओं को 6-6 की दो पंक्तियों को रखा जाता था किन्तु इस लिपि में विराम चिह्न, संख्‍या, गणितीय चिह्न आदि का अभाव था. प्रखर बुद्धि के लुई ने इसी लिपि को आधार बनाकर 12 की बजाय मात्र 6 बिंदुओं का उपयोग कर 64 अक्षर और चिह्न बनाए. उसमें न केवल विराम चिह्न बल्कि गणितीय चिह्न और संगीत के नोटेशन भी लिखे जा सकते हैं.




लुई ब्रेल को उनके जीवन में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे. 1837 में फ्रांस का संक्षिप्त इतिहास  नामक पुस्तक भी ब्रेल लिपि में छापी गई, फिर भी संसार ने इसे मान्यता देने में बहुत समय लगाया. फ़्रांस की सरकार ने ही लुई ब्रेल की मृत्यु के दो वर्ष बाद 1854 में इसे सरकारी मान्यता प्रदान की. ब्रेल लिपि की असीम क्षमता और प्रबल प्रभाविकता के कारण सन 1950 के विश्व ब्रेल सम्मेलन में ब्रेल को विश्व ब्रेल का स्थान मिल गया. उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए फ़्रांस ने उनके देहांत के सौ वर्ष बाद वापस राष्ट्रीय सम्मान के साथ उनको दफनाया. अपनी इस भूल के लिये फ्रांस की समस्त जनता तथा नौकरशाह ने लुई ब्रेल के नश्वर शरीर से माफी माँगी. 2009 में 4 जनवरी को जब लुई ब्रेल के जन्म के दो सौ वर्ष पूरे हुए तो हमारे देश ने भी उन्हें पुर्नजीवित करने का प्रयास किया. उनकी द्विशती के अवसर पर उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया.


कहते हैं ईश्वर ने सभी को इस धरती पर किसी न किसी प्रयोजन हेतु भेजा है. लुई ब्रेल के बचपन की दुर्घटना के पीछे ईश्वर का कुछ खास मकसद छुपा हुआ था. 1825 में लुई ब्रेल ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में एक ऐसी लिपि का आविष्कार कर दिया जिसे ब्रेल लिपि कहते हैं. इस लिपि के आविष्कार ने दृष्टिबाधित लोगों की शिक्षा में क्रांति ला दी. यही लिपि आज सर्वमान्य है. उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हे बहुत जल्द ही विद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली. वे पूर्ण लगन के साथ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते रहे. 35 वर्ष की अल्पायु में ही क्षय रोग की चपेट में आ गये. जिसके चलते 43 वर्ष की अल्पायु में ही अंधकार भरे जीवन में शिक्षा की ज्योति जलाने वाला यह व्यक्तित्व 6 जनवरी 1852 को इस दुनिया को अलविदा कह गया.


लुई ब्रेल ने अपने कार्य से सिद्ध कर दिया कि जीवन की दुर्घटनाओं में अकसर बड़े महत्व के नैतिक पहलू छिपे हुए होते हैं. आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन.

 

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वंदेमातरम्

03 जनवरी 2021

यूँ ज़िन्दगी से नहीं जाना था ज़िन्दगी भर के लिए

किसी से पहचान होना, किसी से कोई रिश्ता बन जाना, किसी से सम्बन्ध हो जाना, किसी से दोस्ती होना, किसी से सामान्य सा व्यवहार रखना आदि ऐसा लगता है जैसे अपने हाथ में नहीं वरन पूर्व निर्धारित होता है. कोई अकारण ही मन को, दिल को पसंद आने लगता है. कभी ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति ने कुछ बुरा नहीं किया होता है, उससे कोई सम्बन्ध भी नहीं होता है इसके बाद भी वह दिल को, मन को पसंद नहीं आता है. बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनसे कभी मुलाकात न होने के बाद भी ऐसे लगता है जैसे जन्मों की जान-पहचान है, मुलाकात है. कई बार ऐसा होता है कि किसी से पहली बार मिलने पर भी ऐसा एहसास होता है जैसे उसके साथ वर्षों का सम्बन्ध रहा हो.


इधर सोशल मीडिया के दौर में बहुत से मित्र ऐसे बने जिनके साथ सोशल मीडिया पर बातचीत के अलावा कभी किसी भी रूप में मिलना न हुआ. ऐसे बहुत से मित्र हैं जिनकी पोस्ट, फोटो, वीडियो से ऐसा लगता है जैसे उनसे रोज ही बात होती है, रोज ही मुलाकात होती है. इस मंच के तमाम आभासी, वास्तविक पहलुओं के बीच एक पहलू यह भी है कि बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दिल के किसी कोने में हमेशा-हमेशा के लिए चिर-परिचित की तरह बस जाते हैं. ऐसे लोगों से कभी मुलाकात न होने के बाद भी वे बहुत करीबी से, बहुत अपने से लगते हैं. इन तमाम मित्रों में से कुछ ही ऐसे ख़ास बन जाते हैं जो दिल के बहुत ही करीब हो जाते हैं. इनकी कोई न कोई विशेषता ही इन्हें ख़ास बनाती है. कोई अपनी लेखन शैली से प्रभावित करता है तो कोई अपने व्यवहार से. किसी में हास्य-बोध का गहरा भाव छिपा होता है तो कोई अत्यंत संवेदनशील होता है. किसी का साहित्य-प्रेम आकर्षित करता है तो किसी की कलात्मक अभिरुचि उसे विशेष बनाती है.


सोशल मीडिया के ऐसे ही विशेष मित्रों में एक नाम ने बहुत जल्दी सभी के दिलों में जगह बना ली थी. चुलबुली, हास्य-बोध से भरी पोस्ट के द्वारा निधि जैन ने सबके दिल-दिमाग में अपना कब्ज़ा जमा लिया था. चुहल भरी पोस्ट, फोटो आदि के साथ आकर्षित करता उसका उपनाम ‘निंबोरी’ भी सबको बहुत पसंद आया था. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में किसी महिला के लेखन में अत्यंत सरल होते हुए भी उतना ही गंभीर हास्य-व्यंग्य बोध देखने को नहीं मिला था. लगता था जैसे यह नाम किसी दिन हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में बड़ा नाम बनेगा लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था.


नया वर्ष आया और आते ही उसने अत्यंत दुखद खबर से सोशल मीडिया के तमाम मित्रों को अन्दर तक हिलाकर रख दिया. एक हृदयविदारक दुर्घटना में निधि असमय सभी से दूर चली गई. वह आज का ही दिन था मगर आज पाँच वर्ष बीत जाने के बाद भी लगता है जैसे यह अभी-अभी की घटना हो. उससे कभी मिलना नहीं हुआ मगर ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत करीबी हमेशा के लिए जुदा हो गया है. चूँकि सोशल मीडिया सभी को फ्रेंड की परिभाषा में शामिल करता है, निधि भी हमारी फ्रेंड लिस्ट में थी. दोस्तों की उस सूची के कई मित्र असमय हमसे हमेशा-हमेशा के लिए दूर चले गए, उस लिस्ट में एक दिन निधि भी शामिल हो जाएगी, सोचा न था. होनी को जो मंजूर होता है, उसे कोई नहीं टाल सकता है किन्तु यह अवश्य कह सकते हैं कि एक ऐसा मित्र जिससे कभी मुलाकात नहीं हुई वह कब दिल के, मन के कोने में स्थायी रूप से अपनी जगह बनाकर बैठ गया पता ही नहीं चला. दोस्ती अपने इसी स्वरूप के कारण पावन, पुनीत बनी हुई है और इसी कारण से सभी रिश्तों से ऊपर दोस्ती का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए बहुत गहरे से जुड़ा रहता है. 


यूँ तो ज़िन्दगी नहीं होती किसी की

ज़िन्दगी भर के लिए,

पर ज़िन्दगी से नहीं जाना था ऐसे भी

ज़िन्दगी भर के लिए.


सादर श्रद्धांजलि, निधि जैन 'निंबोरी'




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वंदेमातरम्


31 दिसंबर 2020

न भूलने वाली घटना, न भूलने वाली तिथि

जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो बिना याद किये याद आती रहती हैं, चाहते हुए भी भूली नहीं जाती हैं. ऐसी स्थिति के लिए घटनाओं के साथ-साथ उनसे जुड़ी तारीख भी महत्त्वपूर्ण होती है. घटनाओं को भुलाना भी चाहो तो उससे जुड़ी तारीख उस घटना को भूलने नहीं देती है. ऐसी ही तारीख है किसी भी वर्ष की अंतिम तिथि अर्थात 31 दिसम्बर. यही तारीख थी उस शाम को जबकि हम अपने दोस्तों के साथ बाजार घूमा-फिरी का इंतजाम करने में लगे थे और उसी समय मोबाइल पर मिले समाचार न चौंका दिया. साले साहब की काँपती, रोती आवाज़ ने ससुर साहब के न रहने की बुरी खबर सुनाई. एकदम से समझ ही नहीं आया कि ये हो कैसे गया? अभी दो-तीन घंटे पहले ही कार्यक्रम बना था अगले दिन का और अचानक से ये खबर.


यही वे पल होते हैं जबकि समझ आता है कि सबकुछ समय के हाथों में होता है और इंसान अकारण सबकुछ अपने हाथों में नियंत्रित किये रहने के झूठे ख्याल में बना रहता है. आये दिन ये कर देने, वो कर देने, ऐसा कर लिया, वैसा कर लिया, यह योजना बना ली, वह योजना बना ली जैसी स्थितियों से सभी दो-चार होते रहते हैं. ऐसी घटनाओं के बाद समझ आना चाहिए कि यहाँ ज़िन्दगी का एक पल का भरोसा नहीं और इंसान है कि ज़िन्दगी भर का इंतजाम करने में लगा रहता है.


बहरहाल, साल के जाने वाले पल में न चाहते हुए भी वे पल, उस शाम के वे पल याद आ ही जाते हैं. उन्हीं यादों के साथ आगे बढ़ने की प्रवृत्ति भी विकसित होती है. ऐसा करना चाहिए क्योंकि यदि किसी पल में दुःख है तो उसी पल में ख़ुशी भी होती है. दुःख का एहसास करते हुए सुख का स्वागत करना चाहिए और जीवन-यात्रा को सुखमय बनाने का प्रयास करना चाहिए. दुःख हमें ज़िन्दगी का फलसफा सिखाते हैं और सुख जीवन में उन्हीं दुखों पर मरहम लगाने का काम करते हैं.


आज इस वर्ष 2020 के अंतिम दिन पर ससुर साहब को श्रद्धांजलि सहित कामना यही कि आने वाला साल सभी के लिए सुखद हो.




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वंदेमातरम्

30 दिसंबर 2020

मैं तुझे भूलने की कोशिश में, आज कितने क़रीब पाता हूँ

हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो किसी विरले कवि को प्राप्त होती है. वे हिन्दी के कवि और ग़ज़लकार थे. उनके लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता रहा है. यूँ तो उन्होंने अनेक विधाओं में लेखनी चलाई किन्तु ग़ज़लों की अपार लोकप्रियता ने उनकी अन्य विधाओं को पीछे धकेल दिया. दुष्यंत कुमार का जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर भी रहे. अपने जीवन में वे बहुत, सहज और मनमौजी व्यक्ति थे. उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. उन्होंने प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परदेशी नाम से रचनाएँ करनी शुरू की. 





जिस समय उन्होंने साहित्य की दुनिया में पदार्पण किया उस समय प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था. इसी तरह हिन्दी में अज्ञेय और मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था. ऐसे समय में दुष्यंत कुमार ने सहज हिन्दी में ग़ज़ल लिखकर उसे कठिनता से निकाला और प्रसिद्धि प्राप्त की. दुष्यंत कुमार ने देश के आम आदमी का दर्द ही नहीं लिखा बल्कि उसकी भाषा को भी अपनाया. उनका एकमात्र ग़ज़ल संग्रह साये में धूप आज भी साहित्य-प्रेमियों के बीच बहुत सराहा जाता है. उनकी अन्य कृतियों में सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का वसन्त (काव्य-संग्रह) और छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष, दुहरी ज़िंदगी (उपन्यास) प्रमुख हैं. उनका निधन 30 दिसम्बर सन 1975 में सिर्फ़ 42 वर्ष की अवस्था में हो गया. 


दुष्यंत कुमार को सभी लोग गजलकार के रूप में जानते हैं मगर दिलचस्प बात है कि ग़ज़ल उनका पहला प्यार नहीं थीं. इनसे पहले वे उपन्यास, नाटक, एकांकी और कविता सरीखी हर विधा में अपना हाथ आजमा चुके थे. इन सब में उन्होंने हाथ ही नहीं आजमाया, हर जगह अपनी साफ छाप भी छोड़ी. नयी कहानी, इस परंपरा के प्रमुख सूत्रधार मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर माने जाते हैं परन्तु बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि इस आन्दोलन का नामकरण दुष्यंत कुमार द्वारा ही किया गया था. उन्होंने अपने एक लेख में लिखा भी था कि क्यों और किस तरह ये कहानियाँ पुरानी कहानियों से अलग हैं. उन्होंने इसे भी प्रमाणित किया था कि आखिरकार इनका नाम नयी कहानी क्यों उचित है.


आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हीं की एक ग़ज़ल सादर समर्पित-- 


मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ,

वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ.


एक जंगल है तेरी आँखों में

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.


तू किसी रेल सी गुज़रती है

मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ.


हर तरफ़ एतराज़ होता है

मैं अगर रौशनी में आता हूँ.


एक बाज़ू उखड़ गया जब से

और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ.


मैं तुझे भूलने की कोशिश में

आज कितने क़रीब पाता हूँ.


कौन ये फ़ासला निभाएगा

मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ.

 

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वंदेमातरम्

17 सितंबर 2020

वो मासूमियत भरे कोमल दिन

Early to bed and early to rise makes and man healthy, wealthy and wise. ये लाइन हमारे बाबा जी अक्सर हम भाइयों को सुनाया करते थे. जल्दी सोने की आदत उस समय हुआ करती थी और जल्दी जागने की भी. कारण ये कि  पढ़ाई का बहुत बोझ जैसा कोई माहौल नहीं था. जो थोड़ा-बहुत काम मिला करता था वह बहुत जल्दी समाप्त हो जाया करता था. उसके बाद खूब जमकर मैदान पर खेलना हुआ करता था. जमकर शारीरिक अभ्यास होने के कारण जल्दी ही नींद के आगोश में चले जाया करते थे. सोने के बाद ये आराम नहीं कि सुबह देरी तक सोते ही रहना है. बाबा जी ने आदत डलवाई थी सुबह घूमने की, इसी कारण सुबह जागना भी खूब जल्दी हो जाया करता था.


बाबा जी के साथ सुबह-सुबह टहलने का क्रम वर्ष 1990 तक चला. उसके बाद हमारा उच्च शिक्षा के लिए ग्वालियर जाना हुआ और अगले वर्ष आज ही के दिन बाबा जी का अनंत यात्रा को जाना हुआ. हॉस्टल में रहने के कारण जल्दी सोने की आदत तो बदलने लगी मगर सुबह जल्दी उठने और घूमने की आदत नहीं बदली. कॉलेज के मैदान पर सुबह-सुबह जाकर कई-कई चक्कर लगाया करते थे. उसके पीछे सुबह उठने की आदत के साथ-साथ एथलेटिक्स में भाग लेना भी था.


समय बदलता रहा, हम भी बदलते चले गए और आदतें भी बदल गईं. अब देर रात तक जागना होने लगा है. सुबह नींद आज भी जल्दी खुल जाती है मगर अब न एथलेटिक्स है, न सुबह कुछ याद करने का चक्कर, न पढ़ाई करने की स्थिति सो जागते हुए घड़ी के और आगे सरकने का इंतजार करते रहते हैं. देर रात से ही आज की तारीख दिमाग में घूम रही थी, उस दिन की घटना किसी फिल्म की तरह घूम रही थी. सुबह उठकर बचपन की दिनचर्या याद आने लगी. दौड़ते-दौड़ते अजनारी गाँव तक जाना, लौटते समय रेलवे क्रासिंग पर बनी गुमटी में बैठकर निकलने वाली ट्रेन के डिब्बे गिनना, सिक्कों को चुम्बक बनाने के लिए पटरियों पर रखना और ट्रेन निकल जाने के बाद उनको ढूँढना आदि-आदि याद आता रहा, चेहरे पर मुस्कान लाता रहा. बुजुर्गों का साथ रहना बच्चों को कितना-कितना सिखा जाता है, यह वही समझ सकता जिसने उन पलों का आनंद लिया हो.


बाबा जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 जून 2020

हर बार लगता जैसे सामने खड़ी खिलखिला हँस रही है

किसी व्यक्ति के साथ गुजारा समय जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे महत्त्वपूर्ण होता है उन पलों में उस व्यक्ति का व्यवहार. यही व्यवहार उस व्यक्ति की स्मृतियों को चिर-स्थायी करता है. यही स्मृतियाँ उस व्यक्ति को सदैव दिल में जीवित बनाये रखती हैं. श्वेता के साथ की कुछ ऐसी अल्प-स्मृतियाँ चिर-स्थायी बनकर दिल में सदैव के लिए बस गईं हैं. ऐसा आज अकेले हमें अपने साथ ही नजर नहीं आया बल्कि कई लोगों की निगाहों में, उनके स्वर में, उनकी भावनाओं में ऐसा परिलक्षित हुआ.


श्वेता 

आज, 10 जून श्वेता की तीसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ऐसे कई लोगों से मिलना हुआ जो भावनात्मक रूप से खिंचे आ रहे थे. हर बार की तरह इस बार भी रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था मगर सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए अत्यंत सीमित रूप में. पहले विचार बना था कि महज दस लोगों के द्वारा रक्तदान करवाकर श्वेता को श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायेंगे लेकिन यह विचार बस विचार ही बन गया. ऐसा इसलिए क्योंकि भावनात्मकता पर किसी तरह की औपचारिकता का पहरा नहीं होता है, किसी तरह की बंदिश नहीं होती है. इसी के चलते कुछ लोगों में श्वेता की स्मृति में रक्तदान करने की भावनात्मक जिद भी देखी गई.


श्रद्धा सुमन अर्पित करते अपर जिलाधिकारी प्रमिल कुमार सिंह 

इस भावनात्मक जिद में अंततः मेडिकल टीम को अपनी हार मानने पर एक व्यक्ति ने विवश कर दिया. 72 वर्षीय शिव सिंह सेंगर रक्तदान के लिए बार-बार आत्मीय रूप से लगातार निवेदन करते रहे. हर बार मेडिकल टीम रक्तदान सम्बन्धी नियमावली का सहारा लेकर उनके निवेदन को इंकार में बदल देती. एक तरफ भावनात्मकता थी और दूसरी तरफ नियम मगर अंततः भावनाओं की, आत्मीयता की विजय हुई. आवश्यक स्वास्थ्य जाँचों को करने के बाद शिव सिंह जी ने इस तरह चहकते हुए रक्तदान किया जैसे कोई अपने बच्चे का जीवन सींच रहा हो. कहीं न कहीं यह सही भी था. शिव सिंह जी का ही नहीं वरन श्वेता का रिश्ता जिससे भी बना अत्यंत अपनत्व भरा रहा. अपनी मधुर मुस्कान के द्वारा एक पल में सभी को अपने परिवार में शामिल कर लेने वाली श्वेता की चाह भगवान को भी रही होगी. तभी उस उम्र में जबकि लोग अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, अपने बच्चों के साथ खेलते-कूदते हैं, श्वेता हम सबको अपनी यादों के बीच छोड़ गई.

रक्तदान करते शिव सिंह सेंगर (72 वर्ष)

डॉ० अंकुर शुक्ला 

इसे संयोग ही कहा जायेगा कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उसे पहचानने से इंकार कर दिया. तब हमें बताया गया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी है. हमने उस पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी विख्यात हो चुके थे. ऐसे में हमारे जैसे दिन भर घूमने वाले, सामाजिक प्राणी को इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.

हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली श्वेता के साथ अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 

ये हैं हम 

आज से पहले भी दो बार उसकी स्मृति में रक्तदान किया और हर बार यही लगता है जैसे वह सामने खड़ी होकर उसी तरह खिलखिलाकर हँस रही है और कह रही है कि ये हमारे बड़े भाई हैं.

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16 मार्च 2020

बिन आपके घर कैसे सँभला, ये आप ही जानें

ज़िन्दगी भर इस बात की टीस रहेगी कि कभी आपसे खुलकर बात भी न कर सके. पिता, पुत्र के बीच का जैसा सम्बन्ध आज देखने को मिलता है, उस समय सोचा भी नहीं जा सकता था. कई-कई महीने तो ऐसे निकल जाया करते थे जबकि हमारे और आपके बीच किसी तरह की कोई बातचीत नहीं होती थी. जबसे होश संभाला तबसे ऐसी कोई जरूरत समझ ही नहीं आई जो हमें पूरी करने के लिए कहना पड़ा हो. परिवार में जिस तरह का लालन-पालन, भरण-पोषण हो रहा था उसमें किसी तरह की भौतिकतावादी चीज की अपेक्षा कभी रखी भी नहीं गई. जीवन के लिए जो आवश्यक हुआ करता था वह सब अपने आप, बिना माँगे ही मिल जाया करता था. इसलिए कभी ऐसा भी नहीं हुआ कि आपसे कुछ माँगने के लिए ही आपसे बातचीत का माध्यम बनाया गया हो. यदा-कदा कुछ आवश्यकता भी हुई तो उसके लिए अम्मा एक माध्यम बनती थीं. 


एक समय के बाद हमारी अपनी घुमक्कड़ी की आदत, सामाजिक कार्यों में बिना किसी सोच-विचार के लगे रहने की आदत पर आपने अम्मा से क्या कहा होगा, इसका पता नहीं मगर आपने हमसे कभी कुछ नहीं कहा. हाँ, कभी-कभी देर रात, और वह भी ज्यादा देर नहीं महज नौ या साढ़े नौ बजने पर आपने बस इतना कहा कि कितना बज रहा है, हम समझ जाते थे कि आपका कहने का क्या मंतव्य है. आपके कुछ भी न कहने के बाद भी कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर सामने आई आर्थिक समस्या को आपने ही दूर किया. उन दिनों हम भी अपने सपनों की दुनिया में खोये हुए थे. स्नातक की और परास्नातक की शिक्षा के दौरान जो सपने देखे थे, वे सब बस अगले ही कदम में सच होते दिखते थे. उन्हीं सपनों के बीच सपना देखा करते थे आपके लिए कुछ करने का. बहरहाल, आपके सामने हम इस स्थिति में आ ही नहीं सके कि आपके लिए कुछ कर सकें. आपके लिए क्या, उस समय तक हम अपने लिए ही कुछ न कर सके. इसके लिए आप लोगों द्वारा एक जिम्मेवारी से बाँध देने के कारण भी कुछ न कुछ करने की भावना का निर्माण हो रहा था. उस भावना का विकास हो पाता, कुछ उसका स्थायी समाधान निकल पाता कि आप उस सुबह आशीर्वाद देकर और अब तुम घर सँभालना का अंतिम वाक्य कह कर चल दिए. उस समय कतई यह भान न था कि उसके बाद आपसे फोन पर आपकी तबियत के बारे में बात होगी. यह भी नहीं सोचा था कि अब आपको दोबारा आशीर्वाद देने के लिए अपने सामने साक्षात् नहीं पायेंगे.

आज आपके बिना पंद्रह वर्ष की जीवन-यात्रा पूरी हो गई है, आपका आशीर्वाद साथ है मगर लगता है जैसे घर सँभाल नहीं पाए. आपके जाने के अगले महीने ही परिवार पर, घर पर हम एक संकट बनके आये. उसके बाद लगातार अच्छे दिन भी आते रहे और संकट भी आते रहे. घर को सँभालने की कोशिश में बराबर लगे रहे. कोशिश यही रही कि कुछ बिगड़े नहीं. कोशिश यही रही कि कुछ टूटे नहीं, कुछ बिखरे नहीं. तमाम प्रयासों के बाद भी ऐसा कुछ होता रहा जहाँ कुछ न कुछ बिखरता रहा, कुछ न कुछ टूटता रहा, कुछ न कुछ बिगड़ता रहा. इन टूटती, बिखरती, बिगड़ती किरिचों के बीच लगातार, बराबर कोशिश यही है कि इनकी जो भी खरोंच लगे वह हमें लगे. आपने घर के एक रहने का, एकसूत्र में बंधे रहने का, संभले रहने का जो भी सपना देखा था, वह किसी न किसी तरह हम पूरा करते रहें. उस दिन की अपनी दुर्घटना के बाद भी आज आपके सपने को पूरा करने में अपने आपको लगे रहना देखते हैं तो एहसास होता है कि आप साथ हैं, आपका आशीर्वाद साथ है. आपका आज भी पन्द्रह सालों के बाद भी लगातार, नियमित रूप से हर दूसरे-तीसरे दिन हमारे सपने में आना, मार्गदर्शन देना यही साबित करता है.

इन पन्द्रह वर्षों में घर को, परिवार को सँभालने में जो चूक हुई हो उसके लिए क्षमा करियेगा. कोशिश यही है कि सबकुछ सँभला रहे, सबकुछ बना रहे. हाँ, एक कसक, एक तीस आपसे बातचीत न कर पाने की जो रह गई थी, वो अब सपने में दूर हो रही है. आपका आना, आपके साथ बातचीत करना, लगता ही नहीं कि आप हमसे कहीं दूर हैं. सनातन संस्कृति की मोक्ष और भटकने का दर्शन क्या कहता है, उसका क्या सत्य है इसकी जानकारी नहीं मगर आपके साथ होने का एहसास हमें सुखद लगता है, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.


सादर श्रद्धांजलि के साथ आपको सादर नमन. आपका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहे, घर-परिवार को एकजुट बनाये रहे, सँभाले रहे, यही कामना है. 

(पिताजी की पुण्यतिथि 16 मार्च पर विशेष)
(16.03.2005 - 16.03.2020)
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24 फ़रवरी 2020

सूरज आ गया पकड़ में, अइया को याद करते हुए

बहुत से दिन, तिथियाँ भुलाए नहीं भूलतीं, ये और बात होती है कि हम सभी अपनी-अपनी व्यस्तता में उन्हें याद न कर पायें. ऐसी तारीखें स्मृति-पटल पर अंकित रहती हैं और वक्त-बेवक्त सामने आ खड़ी होती हैं. हरेक व्यक्ति के जीवन में ऐसी बहुत सी तारीखें होंगी, बहुत सी स्मृतियाँ होंगी जिनको वह चाह कर भी भुला न पाया होगा. ऐसी की अनेक तारीखों में एक तारीख आज की, हमारे जीवन में भी है. न सिर्फ आज की वरन गुजरे कल की तारीख भी आज की तारीख से जुड़ी हुई है. कल यानि कि 23 फरवरी और आज यानि कि 24 फरवरी, ऐसी तारीखें हैं जिसमें परिवार के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति को हम सबने खो दिया था. अपनी अइया को एक दिन पहले हमने अपनी आँखों के सामने अंतिम साँस लेते देखा था और आज अपनी आँखों के सामने ही उनको पंचतत्त्व में विलीन होते देखा था.

ये भी तारीखों का अपना मनोविज्ञान होता होगा. कल से ही मन कुछ उदास है. आज भी कुछ लिखने-पढ़ने का मन नहीं हुआ. पहले सोचा कि अपनी अइया के बारे में कुछ लिखें फिर इसका भी मन न हुआ. असल में व्यक्तिगत हमारे लिए अइया एक इन्स्टीट्यूट जैसी रहीं. उनकी शिक्षा-दीक्षा डिग्रियों के सापेक्ष बहुत नहीं रही हो मगर उनके व्यावहारिक अनुभव बहुत ही गंभीर और सीख देने वाले थे. उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. (इस बारे में फिर कभी)

बस, आज मन न किया तो इधर-उधर का पिटारा खोलकर बैठ गए. कई बार कुछ भी लिखने-पढ़ने का मन नहीं होता. उस समय हम अपने चित्रों को खोलकर बैठ जाते हैं. बहुत सुकून मिलता है. ऐसे ही सुकून के क्षणों में ये चित्र सामने आये. आप भी देखिये. 





31 दिसंबर 2019

आँखों की बारिश को आसमानी बारिश के आँचल में छिपा लौट आए


वो आज की ही तारीख थी, 31 दिसम्बर. तैयारियाँ ख़ुशी की स्थिति में चल रही थीं और उसी समय दुखद खबर का आना हुआ. जहाँ जाना था, जाना उसी दिशा में हुआ; उसी मंजिल को हुआ मगर अब जाते समय मन की स्थिति अलग थी. सबकुछ समझने के बाद भी न समझने जैसी स्थिति बनी हुई थी. हाथ से निकल चुकी स्थिति के बाद भी सबकुछ अपने हाथों से ही संभालने वाली स्थिति बनानी थी. एक पल में, एक फोन कॉल में सारी की सारी स्थिति बदल गई. रास्ते भर माहौल को हल्का बनाये रखने का प्रयास रहा मगर वातावरण स्वतः ही बोझिल हो जाता. मित्र सुभाष का आना हुआ रात की सर्दी की आवारगी करने के मूड के साथ और जाना हुआ एक बोझिल माहौल को जबरन खुशनुमा बनाये रखने की मानसिकता के साथ. परिवार के एक व्यक्ति के हमेशा-हमेशा के लिए चले जाने की खबर को बीमारी में बदलने की स्थिति को बनाये रखना आवश्यक भी था. इसी स्थिति को बनाये रखने की कठिनता के साथ काली रात को तय किया जा रहा था. 

31 दिसम्बर की रात थी. सामाजिकता के चलते और दुनिया भर में मनाई जाती परम्परा के कारण रास्ते में लोगों के शुभकामना सन्देश आते रहे, फोन भी आते रहे. खुद को नियंत्रित करते हुए सबके साथ तादाम्य बनाने का प्रयास किया जाता रहा. अगला दिन जैसे खुद भी भाव व्हिवल था. एक जनवरी की ठण्ड भरी सुबह और घर का माहौल भी परिजन के अचानक चले जाने से एकदम सर्द बना हुआ था. उसी सर्द माहौल में प्रकृति भी खुद पर नियंत्रण नहीं रख पा रही थी. परिजनों की आँखों से बारिश हो रही थी तो आसमान लगातार बारिश करने में लगा हुआ था. झमाझम बारिश के बीच अंतिम यात्रा शुरू हुई. अंतिम विदाई की उस संवेदनात्मक, भावनात्मक घड़ी में बारिश के बीच आँखों की बारिश और खुद को संयत करते हुए अपने परिवार के एक और परिजन का अचानक चले जाना आहत किये हुए था. हमारे श्वसुर साहब का अचानक चले जाना सबको हतप्रभ कर गया था. दोपहर ही बात हुई और उन्हीं से हुई इसके बाद उनके चले जाने की सूचना. जैसा कि घर का माहौल बना हुआ था, जैसा कि अपने पिता से एक संस्कारित रिश्ता बना हुआ था कुछ वैसा ही अपने श्वसुर साहब से भी था. आने-जाने के दौरान चंद शब्दों की बातचीत ही हुआ करती थी. जितना उनके द्वारा पूछा-बताया गया, उतना ही वार्तालाप हुआ. बहुत लम्बा समय भी उनके साथ नहीं बिताया गया था मगर संस्कारों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं के द्वारा उनके साथ एक रिश्ता तो बना ही था. परिवार में एक बड़े व्यक्ति के होने का भाव बना हुआ था. वह भाव, वह स्थान अब रिक्त सा लग रहा था.

फिलहाल, ईश्वरीय सत्ता के सामने किसी की चली नहीं है सो सब कुछ स्वीकारते हुए अंतिम नमन करके, अंतिम विदाई देकर हम सब वापस लौट आये. आँखों की बारिश को, आसमानी बारिश के आँचल में छिपा कर खाली हाथ लौट आये. 

आज, 31 दिसम्बर को पुण्यतिथि पर सादर नमन.

17 सितंबर 2019

बाबा जी के आशीर्वाद से निखरता आत्मबल


अपने गाँव बचपन से ही जाना होता रहता था. गर्मियों की छुट्टियाँ कई बार गाँव में ही बिताई गईं. इसके अलावा चाचा लोगों के साथ भी अक्सर गाँव जाना होता रहता था. हमारे गाँव जाने के क्रम में कोई न कोई साथ रहता था मगर उस बार अकेले जाना हो रहा था. बिना किसी कार्यक्रम के, बिना किसी पूर्व-निर्धारित योजना के. स्नातक की पढ़ाई के लिए हमारा ग्वालियर जाना निर्धारित हो गया था. जाने का दिन भी लगभग तय हो गया था. अचानक बैठे-बैठे दिमाग में आया कि ग्वालियर जाने के पहले अईया-बाबा से मिल आया जाये. उस समय अईया-बाबा गाँव में ही हुआ करते थे. उनका उरई आना दशहरे-दीपावली के आसपास होता था. इसके बाद होली के बाद खेती वगैरह के काम से गाँव चले जाया करते थे.

बहुत छोटे से लगातार अईया-बाबा के संपर्क में रहने के कारण लगाव भी था. बहरहाल, उस दिन दोपहर बाद घर पहुँच नीचे से जैसे ही आवाज़ लगाई, अईया ख़ुशी से चहक उठीं. बाबा भी आश्चर्य में पड़ गए कि हम अचानक कैसे आ गए, वो भी अकेले. आश्चर्य होने का कारण ये और था कि हम अकेले आये थे बिना किसी सूचना के. उस समय आज की तरह मोबाइल तो थे नहीं, फोन भी नहीं थे कि खबर कर दी जाती हमारे आने की. उस समय खबरों के आदान-प्रदान का स्त्रोत पत्र हुआ करते थे या फिर गाँव से आने-जाने वाले लोग. इसके साथ-साथ आश्चर्य का एक कारण हमारा नितांत अकेले आना भी था. परिवार में किसी समय लम्बे समय तक चलने वाली जमींदारी और गाँव क्षेत्र की अपनी अलग ही स्थितियों के चलते बाबा इस तरह की स्थितियों से बचाया करते थे. आज भी हम लोगों की ये स्थिति है कि गाँव आने-जाने के दौरान निश्चित समय, रास्ता कभी न बताया जाता है. 

दो-तीन गाँव में रुकना हुआ. उन दो-तीन दिनों में बाबा से बहुत सी बातें हुईं. वैसे तो बाबा का साथ हम भाइयों को बहुत छोटे से मिला, जिसके कारण उनके द्वारा बहुत सी जानकारियाँ, शिक्षाएँ हमें मिलती रहीं. जीवन जीने के ढंग, समस्याओं से निकलने के रास्ते, परेशानियों से बचने के तरीके, खुद पर नियंत्रण रखने की स्थिति, अनुशासन में रहने का मन्त्र, सामाजिक रूप से खुद को स्थापित करने की कार्यशैली आदि पर उनके द्वारा बड़े ही रोचक ढंग से लगातार हम लोगों को बताया जाता रहता.

गाँव में अपने अल्प-प्रवास के दौरान बाबा जी ने कई बातें समझाईं, घर से बाहर अकेले रहने के दौरान आने वाली समस्याओं, उनसे निपटने के तरीके आदि भी समझाए, बिना घबराए, संयम से काम लेटे हुए आगे बढ़ने के रास्ते भी बताए. बाबा जी स्वयं बहुत कम आयु में ही पढ़ने के लिए घर से बाहर निकल आये थे. अपनी पढ़ाई के दौरा उन्होंने स्वयं बहुत संघर्ष किया था. इसका जिक्र वे कई बार हम लोगों के सामने किया करते थे और उदाहरण के लिए समझाया भी करते थे. उनके पढ़ाई के दौरान के संघर्ष को महज ऐसे समझा जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में एक जमींदार परिवार के बेटे को पढ़ने के लिए बिठूर से उन्नाव ट्रक चलाना पड़ता था. बाबा जी अक्सर उस समय का बना हुआ ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया करते थे. असल में बाबा जी के बड़े भाई नहीं चाहते थे कि बाबा जी आगे की पढ़ाई करें. उनका कहना था कि मैट्रिक तक की पढ़ाई ठीक है अब घर वापस आकर खेती और अन्य कामों में सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी अपनी जिद से कानपुर में पढ़ाई कर रहे थे. बड़े बाबा जी घर से प्रतिमाह भेजी जाने वाली सामग्री में सबकुछ भेजते, बस रुपये नहीं भेजते थे. ऐसे में धन की कमी को बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी का ट्रक चलाकर पूरा किया करते मगर उन्होंने कभी घर में इसकी शिकायत न की.

उन्हीं बातों के दौरान बाबा जी की एक बात आज तक जैसे कंठस्थ है. उस बात ने या कहें कि जीवन की सबसे बड़ी सीख ने हमें व्यक्तिगत स्तर पर पारिवारिक तनाव, संघर्ष से बचाए रखा है. पिताजी के देहावसान और अपनी दुर्घटना के बाद की स्थितियों में भी यदि मनोबल कमजोर न हुआ तो बाबा जी की नसीहतों के चलते.

गाँव से वापस लौटने वाले दिन के ठीक पहले दोपहर में खाना खाने के बाद बाबा जी के पैर की उंगलियाँ चटका रहे थे. बाबा ने कहा कि स्नातक की पढ़ाई करने जा रहे हो, आगे भी खूब पढ़ना. शिक्षा ही एकमात्र ऐसी पूँजी है जिसके द्वारा संसार की किसी भी स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है. गाँव, खेती, जमीन, मकान आदि की चर्चा करते हुए उन्होंने समझाया कि हमेशा एक बात याद रखना कि गाँव की जमीन, मकान, खेत न हम लेकर आये थे, न तुम्हारे पिताजी. ये सब हमारे पुरखों के द्वारा कई पीढ़ियों से अगली पीढ़ी को स्वतः मिलता रहा है. ऐसे में इन्हें लेकर कभी लड़ाई नहीं करना. बाबा जी का कहना था कि गाँव की लड़ाई, मुक़दमेबाजी से दूर रखने के लिए तुम्हारे पिताजी-चाचा लोगों को बाहर निकाला है, तुम लोग इसके लिए लौटकर गाँव न आना. मुक़दमेबाजी, लड़ाई, पुलिस आदि झगड़ों से दूर ही रहना. दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो भी जाये कि कोई गाँव की जमीन, घर, खेत आदि पर कब्ज़ा कर ले तो अपने अधिकारों का पूरा उपयोग करो. अपनी संपत्ति को वापस लेने के लिए संघर्ष करो मगर इसके लिए खून-खराबा करने की, फौजदारी करने की आवश्यकता नहीं है. वापस गाँव लौटने की जरूरत नहीं है. शिक्षा तुमको इससे ज्यादा सम्मान, इससे ज्यादा संपत्ति प्रदान करवाएगी. पुरखों की इस संपत्ति की रक्षा करना तुम सबका दायित्व है मगर इसके लिए अपने भविष्य को, अपने परिवार को, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बिगाड़ देना समझदारी नहीं होगी.   

और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा बहुत गंभीरता से कही गईं. असल में हमारे बाबा जी स्वयं इस स्थिति के भुक्तभोगी रहे थे. अपनी सरकारी नौकरी को वे छोड़कर गाँव के घर, जमीन, खेत के लिए वापस गाँव आये थे. मुकदमेबाजी, आपसी तनाव, झगड़ों के बीच उन्होंने समय की, पढ़ाई की महत्ता को समझा-जाना था. उस समय तो बाबा जी की उन बातों सा न तो हम सन्दर्भ पकड़ पा रहे थे और न ही उनका आकलन कर पा रहे थे कि ऐसा क्यों बताया-समझाया जा रहा. बाबा जी उसके बाद बस एक वर्ष और हमारे बीच रहे, शायद वे समय की सीख देना चाह रहे थे. और यह संयोग ही कहा जायेगा कि कभी गाँव अकेले न जाने वाले हम उस दिन अचानक बिना किसी कार्यक्रम के बाबा-अईया के पास पहुँच गए.

लगभग तीन दशक का समय हो गया बाबा जी को हम लोगों से दूर गए हुए. कम नहीं होता इतना समय, इसके बाद भी लगता है जैसे उनका जाना कल की ही बात हो. उस दिन का समूचा घटनाक्रम आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में छाया हुआ है. उनकी बहुत सी बातें आज भी हम गाँठ बाँधे हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी नसीहतों ने कभी हमें परेशान न होने दिया, कभी हमें समस्या में न पड़ने दिया, कभी आत्मविश्वास न डिगने दिया. आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन.


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आज, 17 सितम्बर बाबा जी की पुण्यतिथि पर