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14 अप्रैल 2024

रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के साथ अन्याय



रानी लक्ष्मीबाई की यह प्रतिमा उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में उरई नगर में लगी हुई है. शहर के मध्य में स्थित टाउनहॉल के सामने स्थित इस प्रतिमा के साथ इस तरह का अन्याय, अशोभनीय हरकत लगभग प्रत्येक पर्व, त्यौहार, जयंती आदि पर की जाती है. सजावट के नाम पर कभी घोड़े का सहारा लिया जाता है तो कभी रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा सहारा बनती है. 

कई-कई बार इस बारे में सम्बंधित व्यक्तियों को जानकारी भी दी गई, सुधार भी करवाया गया मगर ये हर बार की कहानी बनी हुई है. ये नया हाल इसी 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के अवसर पर किया गया है. प्रतिमा सजाने के चक्कर में बिजली की झालर को घोड़े के कान से बाँध दिया गया है. 

अब इसके साथ-साथ आप लोग रानी लक्ष्मीबाई की तलवार को न देखने लगिएगा. अंग्रेजों द्वारा झुकाई न जा सकी तलवार को प्रशासन द्वारा बराबर झुकाए रखा गया है, तोड़े रखा गया है. इस बारे में कई बार लिखित रूप से शिकायत की जा चुकी है मगर प्रशासन के कानों में जूँ नहीं रेंगती है. 

स्वतंत्र देश में हम लोग अभिशप्त हैं शायद अपने महानुभावों की ये दुर्दशा, अपमान देखने को. 



 

22 जून 2020

रक्तवीर से सम्मानित रक्तदाता भी हो रहे अपमानित कोरोना जाँच में

सुबह-सुबह खबर मिलती है कि आपने जहाँ रक्तदान किया था वहाँ रक्तदान करने वाला एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव निकला है. इसके बाद भी हम संयम बनाये रखते हैं क्योंकि जो नाम हमें बताया गया वह हमारे रक्तदान करने के पहले नहीं था. दूसरी बात कि हमने वहाँ किसी से कोई संपर्क नहीं रखा था. ये बात बताने के बाद भी दोपहर दो बजे फोन पर खबर दी जाती है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर उन सभी को अपना सैम्पल देना है जिन्होंने रक्तदान किया है. अपने स्वास्थ्य और अपने पर विश्वास था इस कारण इस आदेश को स्वीकारते हुए विगत आठ दिनों के अपने संपर्कों पर निगाह दौड़ाई.


इसमें भी सबसे पहले अपने परिवार को ही देखा. न बिटिया को, न श्रीमती जी को खाँसी, बुखार अथवा किसी तरह की अन्य समस्या थी. इसके बाद अन्य लोगों पर भी गौर किया. माना कि एक हम ऐसे व्यक्ति हों जिस पर कोरोना के लक्षण प्रदर्शित न हों मगर ऐसा सबके साथ नहीं हो सकता था. दस जून से लेकर अठारह जून तक की अपनी संपर्क सूची को खुद से खंगाला. इसमें किसी भी एक व्यक्ति को नाममात्र का न तो बुखार आया और न ही जुकाम-खाँसी जैसी कोई स्थिति सामने आई. इस बारे में पूरी तरह से संतुष्ट थे कि हम पॉजिटिव नहीं हैं और न ही हमारे संपर्क में आया कोई व्यक्ति पॉजिटिव है. इसके बाद भी जैसा कि प्रशासन की मंशा थी, अपनी सैम्पलिंग के लिए जिला चिकित्सालय पहुँच गए. जिला स्वास्थ्य विभाग अथवा प्रशासन इस कारण भी इस मामले में तत्परता दिखा रहा था क्योंकि रक्तदान शिविर का आयोजन प्रशासन की अनुमति से हुआ था. इसके साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी का, मीडिया का, समाज के प्रबुद्धजनों का भी इसमें भी सम्मिलिन हुआ था.


शाम को लगी भीड़, सैम्पल देने के लिए 

निश्चित समय पर जिला चिकित्सालय पहुँचना हुआ. सैम्पल लेने के पहले पंजीकरण करवाना था. उस समय ऐसा लग रहा था जैसे सामने जानकारी लेने वाला व्यक्ति कोई अपार विद्वान हो और जानकारी देने वाला निपट निरक्षर. जानकारी लेने के आसपास लगी बाँस-बल्लियों को लेकर धमकी भरे स्वर में डराया भी जा रहा था. डराने के साथ-साथ लगभग धमकाने जैसा स्वर भी दिखाई दे रहा था. हम लोग प्रशासन की तरफ से सैम्पल के लिए भेजे गए थे इसके बाद भी वहाँ तैनात स्वास्थ्य कर्मियों की तरफ से ऐसा व्यवहार किया जा रहा था जैसे कि हम सभी कोरोना वायरस के सीधे कैरियर हैं. खड़े होने, बैठने, बातचीत करने आदि को लेकर जिस तरह से उपेक्षित रवैया वहाँ के कर्मियों का दिखा उससे लगा कि केन्द्र सरकार द्वारा फोन पर सुनाई जा रही कॉलर ट्यून का कोई मतलब नहीं जिसमें कहा जा रहा है कि बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं. यहाँ तो उस व्यक्ति को उपेक्षित किया जा रहा है जो अभी अपना सैम्पल देने आया है.

अति-सक्रिय स्वास्थ्य कर्मी 

इसके अलावा एक और दुखद बात सामने आई वो यह कि जिनको भी सैम्पल के लिए प्रशासन ने बुलाया था वे सब प्रशासन की शब्दावली में रक्तवीर थे. ऐसे लोगों को दो-तीन दिन पहले ही जिला प्रशासन ने सम्मानित भी किया था. इसके बाद भी प्रशासन और रक्तदान करवाने वाले तमाम स्वयंभू अपनी-अपनी जाँच जनपद में लगी ट्रू नेट मशीन से करवा कर फुर्सत पा गए, शेष लोगों को भटकने को छोड़ दिया गया. यहाँ भी पिछला दरवाजा मौजूद रहा. जुगाड़ वालों को इसी मशीन के सहारे जाँचने पर सहमति दिख रही थी मगर सबके लिए नहीं. ऐसे में सभी ने इसे नकारते हुए अपना सैम्पल देने का मन बनाया.

अपनी बारी का इंतजार करते रक्तवीर 

ये सुखद रहा कि दो दिन बाद सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई मगर यहाँ एक बात सोचने वाली है कि एक तरफ प्रशासन की मंशा से, स्वैच्छिक संस्थाओं की मंशा से लोग रक्तदान करने के लिए स्वेच्छा से सामने आते हैं, उसके बाद ऐसी किसी भी घटना पर ऐसे लोगों का साथ न मिलना मनोबल को तोड़ता है. उस दिन अनुभव किया कि सैम्पल देने वालों में कुछ लोग तो ऐसे थे जो मानसिक रूप से कमजोर थे. सोचने वाली बात है कि एक तरफ वे रक्तदान करके रक्तवीर बनते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक उपेक्षा के चलते दो दिन मानसिक रूप से पशोपेश में रहते हैं. आखिर प्रशासन को इस तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 अप्रैल 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.