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15 अप्रैल 2025

सकारात्मकता ही सफलता प्रदान करवाती है

विकास की दौड़ में अंधाधुंध भागते समाज में यदि मानसिकता की बात की जाये तो बहुतायत में ऐसे लोग मिलेंगे जो नकारात्मकता से भरे दिखते हैं. आपने अपने आसपास महसूस किया होगा कि सड़क पर चलते हुए लोग हों, बाजार के खरीददारी करती भीड़ हो, कार में बैठकर यात्रा पर निकले मुसाफिर हों, अपने काम के सम्बन्ध में दौड़ते-भागते लोग हों अथवा अन्य कोई और समूह, बहुतायत लोग परेशान से, विचारों में खोये, उदास से नजर आते हैं. बहुसंख्यक लोगों के चेहरों से एक तरह की मुस्कान, एक तरह की संतुष्टि, एक तरह की सकारात्मकता गायब मिलती है. यदि नकारात्मकता के सम्बन्ध में गणितीय नियमों पर ध्यान दें तो गणित के अनुसार दो नकारात्मक (निगेटिव) मिलकर धनात्मक (पॉजिटिव) की उत्पत्ति करते हैं. ऐसा निश्चित रूप से गणितीय संरचना में सम्भव है मगर सामाजिक रूप में, किसी व्यक्ति के जीवन में एक निगेटिव ही परेशानी पैदा कर देता है.

 

वर्तमान में समाज में बहुतायत में नकारात्मकता देखने को मिल रही है. काम करने का ढंगजीवन-शैलीसोचना-समझनातर्क-वितर्कसामाजिक सरोकार आदि में नकारात्मकता परिलक्षित हो रही है. विकासोन्मुख इन्सान अपने विकास के सापेक्ष नकारात्मक होता जा रहा है. इसके पीछे खुद इन्सान की ही बहुत बड़ी भूमिका है. किसी भी तरह की जरा सी परेशानी कोछोटे से कष्ट कोकिसी छोटी सी घटना को वह अपने दिल-दिमाग में इस कदर बैठा लेता है कि उसके सापेक्ष सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने लगता हैउन्हीं घटनाओं के सन्दर्भ में आने वाले समय की सफलताओं-असफलताओं को निर्धारित करने लगता है. अतीत की समस्याओंपरेशानियोंकष्टों को वर्तमान अथवा भविष्य के साथ जोड़कर कार्य करने से जहाँ एक तरफ कार्य-क्षमता प्रभावित होती है वहीं दूसरी तरफ अन्य विकासात्मक कार्यों में भी व्यवधान पड़ता है.

 



यह सच है कि परिस्थितियाँ किसी न किसी रूप में मनुष्य के सोचने-समझने को प्रभावित करती हैं किन्तु यह भी सच है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्थिर रखेसंयमित रखेनियंत्रित रखे तो निसंदेह वह अपनी सोच को भी नियंत्रित कर सकता है. इसी सोच के द्वारा जीवन में सकारात्मकतानकारात्मकता का निर्माण होता है. देखा जाये तो किसी के भी जीवन में सकारात्मकता हो या फिर नकारात्मकतावह कहीं बाहर से नहीं आती है. ये उसकी सोच और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है. यह मानवीय स्वभाव की बहुत बड़ी कमजोरी होती है कि किसी भी असामान्य स्थिति के उत्पन्न होने पर, किसी भी तरह की असहज स्थिति सामने आने पर व्यक्ति के मन-मष्तिष्क में सबसे पहले नकारात्मक विचार ही आते हैं. इस तरह की नकारात्मक स्थिति पर अंकुश नहीं लगाये जाने से ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में नकारात्मक लक्षणों की तीव्रता बढ़ती जाती है. इसके चलते वह अपने परिजनोंसहयोगियोंसामाजिक क्रियाकलापों में अकेलेपन का अनुभव करने लगता है. इससे उसके स्वभाव में भी बदलाव आने लगता है.

 

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आई नकारात्मकता को दूर नहीं किया जा सकता है. चूँकि यह स्थिति विशुद्ध सोच परमानसिकता पर आधारित हैइस कारण इससे छुटकारा भी पाया जा सकता है. नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है. इसके लिए सबसे पहले तो किसी भी व्यक्ति को अपने विश्वास कोअपनी सोच को कमजोर नहीं मानना चाहिए. आत्मविश्वास को सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखने वाले व्यक्ति किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते. ऐसे व्यक्ति जिनको छोटी-छोटी समस्याओंपरेशानियों के चलते नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं उन्हें सदैव ऐसे लोगों से मिलने से बचना चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातों को प्रश्रय देते हैंउन्हें बढ़ावा देते हैं. अक्सर देखने में आता है कि व्यक्ति आपसी वार्तालाप में नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता हैअपने साथ होने वाले कष्ट कोदुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता हैउसे ऐसा करने से बचना चाहिए. सकारात्मक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए. इसके साथ-साथ जीवन को निरुद्देश्य समझकर गुजारने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अपना महत्त्व है और वह उसी के अनुसार इस समाज में अपना योगदान दे रहा होता है. समाज में अपना योगदान से रहे ऐसे लोगों को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए साथ ही अपने किसी शौक को भी स्थापित करने की आवश्यकता है. बहुधा देखने में आता है कि व्यक्ति लगातार कार्य करने के बाद भी समाज मेंपरिवार में उस प्रस्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है जिसका हक़दार वह खुद को समझता है. इसके चलते भी उसमें नकारात्मक सोच का जन्म होने लगता है. ऐसे व्यक्तियों को अपने किसी न किसी शौक के द्वारा अपने व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करना चाहिए.

 

नकारात्मकता से दूर रहने के लिए अथवा नकारात्मकता को स्वयं से दूर रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को खुद को तनावमुक्त रखने की आवश्यकता है. वर्तमान जीवन-शैली जिस तरह से होती जा रही है, उससे जरा-जरा सी बात पर व्यक्ति तनावग्रस्त होने लगता है. इससे बचने का एक सूत्र सदैव याद रखना चाहिए कि जो कार्य व्यक्ति के नियंत्रण में, उसकी पहुँच में है उसको कर लेना चाहिए, उसके लिए तनाव लेने की आवश्यकता नहीं और कोई ऐसा कार्य है जो उसके वश में नहीं, उसके द्वारा उसका समाधान किया जा पाना सम्भव नहीं तो ऐसे विषय पर उसे तनाव लेने की आवश्यकता नहीं. गणितीय नियमों की तरह सामाजिक जीवन में भी निगेटिव भी पॉजिटिव में बदलता है किन्तु इसके लिए व्यक्ति को अपने कार्य से संतुष्टिअपनी सोच में विश्वासअपने रहन-सहन में नियंत्रणअपने जीवन में उद्देश्य बनाये रखना चाहिए. याद रखना होगा कि व्यक्ति की सकारात्मकता ही उसको सफलता प्रदान करवाती हैउसे मंजिल तक ले जाती है.

 


03 जुलाई 2023

हिंसा के मूल में मानवीय स्वभाव

फ्रांस में सत्रह वर्षीय किशोर नाहेल की मौत के बाद देश में हुई हिंसक घटनाएँ अभी भी जारी हैं. पुलिस के द्वारा अभी तक तीन हजार से अधिक लोगों की गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जो इन हिंसक घटनाओं में शामिल रहे हैं. बताया जा रहा है कि नाहेल पुलिस द्वारा की जा रही वाहन चेकिंग के लिए रुका नहीं. उसने अपनी कार आगे बढ़ा दी, इस पर पुलिसकर्मियों ने पॉइंट-ब्लैंक पर उसे गोली मार दी. इससे नाहेल की मौत हो गई. इस घटना ने फ्रांस को झकझोर कर रख दिया. इस घटना के बाद सही-गलत को एक पल के लिए हाशिये पर रखते हुए इसका आकलन किया जाये कि क्या मानवीय समाज इतना व्यग्र, संयमहीन हो चुका है कि ऐसी किसी भी घटना के लिए शासन-प्रशासन से न्याय की उम्मीद करने से बेहतर खुद ही हिंसा करना समझता है? क्या फ़्रांस में जिस तरह से विगत कई दिनों से हिंसक घटनाएँ हो रही हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, उससे क्या नाहेल को न्याय मिल गया?

 

असल में फ़्रांस की ये वर्तमान हिंसा हो अथवा ऐसी किसी भी घटना पर सम्पूर्ण विश्व में होती हिंसा हो, सभी के मूल में सम्बंधित व्यक्ति के लिए न्याय पाना नहीं होता है बल्कि ये समाज के द्वारा अपनी मानसिकता को सार्वजनिक करना होता है. इस तरह की हिंसक वारदातें, चाहे वे बड़े रूप में हों या फिर छुटपुट घटनाओं के रूप में, अपने देश में भी आये दिन होती हैं. किसी घटना का सहारा लेकर धर्म, जाति आदि के लोगों पर हमला बोल देना, सार्वजनिक संपत्ति को लूटना, उसका नुकसान कर देना आदि समाज की उस क्रूर मानसिकता के कारण होता है जिस पर लोगों का ध्यान बहुत कम ही जाता है.  

 



क्या हम लोगों ने कभी इस पर विचार किया कि इंसानी स्वभाव के मूल में क्या है? क्यों उसे सदियों से प्रेमसौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है? बावजूद इसके वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है. फ़्रांस जैसी व्यापक हिंसक घटना को छोड़ भी दें तो भी एक ऐसे समाज में जहाँ सड़क चलती महिलाओं, लडकियों, बच्चियों को छेड़ा जाता हो; जहाँ बेटी समाज के साथ-साथ गर्भ तक में असुरक्षित हो; जहाँ पल-पल में महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा हो; जहाँ डकैती, हत्याएँ, अपराध आम बात हो गई हो; जहाँ खुलेआम घरों में घुसकर कब्ज़ा ज़माने की प्रवृत्ति काम कर रही हो; जहाँ भेदभाव अपने चरम पर हो; जहाँ व्यक्ति-व्यक्ति में धार्मिक, क्षेत्रीय, जातीय भावनाएँ फूट डाल रही हों वहाँ पर सभ्य समाज की परिकल्पना बेमानी सी लगती है. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जा सकता. दरअसल हिंसाअत्याचारक्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. इसे किसी समाजविज्ञानीमनोविज्ञानी की दृष्टि से समझने की आवश्यकता तो है ही साथ ही सामान्य इंसान के रूप में भी इसे देखा-समझा जाना चाहिए. यदि इतने विस्तृत फलक को न देखते हुए हम पारिवारिक माहौल में देखें तो छोटे-छोटे बच्चों को अकारण ही जमीन पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़ों को मारते देखा जा सकता है. मोहल्ले की गलियों में जरा-जरा से बच्चों को गलियों में टहलते जानवरों के पीछे डंडा लेकर उन्हें भगानामारना सहज रूप में दिखाई देता है. इंसानी जीवनक्रम में मारपीटलड़ाईगाली-गलौज सहज रूप में उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिखाई देने लगती है. इस व्यवहार में कमी न होकर वृद्धि ही होती रहती है.

 

देखा जाये तो वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैंअपने आदर्श हैंअपने विचार हैंअपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारासबके आदर्श दूसरे की विचारधाराआदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठताहीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो चुकी हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. महज ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ बना लेने से, मँहगी-मँहगी कारों में सफ़र कर लेने से, उन्नत किस्म की तकनीकी के सहारे जीवन व्यतीत कर लेने मात्र से ही समाज की सभ्यता का पता नहीं लगता है. संवेदनाओं, सहयोग, समन्वय, परोपकार आदि भावनाएँ मृत सी दिख रही हैं. अपनी आने वाली पीढ़ी को हम बताना भूल गए कि जीवन-मूल्य क्या हैं. उसे हम बताना भूल गए कि इंसानी बस्ती में स्नेह, प्रेमभाव आदि ही वे भावनाएँ हैं जिनके द्वारा समाज सभ्य कहलाता है. जरा-जरा सी बात पर उग्र हो जाना, इंच-इंच भूमि के लिए हत्याएँ कर देना आदि हमें कबीलाई संस्कृति की तरफ ले जा रहे हैं. 

 

समाज अनादिकाल से शांति, अहिंसा, सौहार्द्र, स्नेह आदि-आदि सिखाने वाला रहा है और उसी के सापेक्ष समाज में अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का भी समावेश बना रहा है. यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. उसे सबके साथ प्रेम से रहना है. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया वह कार्य न केवल भली-भांति सीख रखा है वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं. विडम्बना ये है कि यही सब अपने हमलावर भी बने हुए हैं. 






 

20 जनवरी 2023

सुख से ज्यादा दुःख का स्थायी भाव है

आये दिन एक उदाहरण भरी कहानी सामने से गुजरती है, जिसमें एक व्यक्ति कुछ सीख देने का प्रयास कर रहा है. वह अपने सामने बैठे लोगों को एक बोर्ड दिखाते हुए पूछता है कि उनको क्या दिख रहा है? बोर्ड सफ़ेद रंग का है और उसमें छोटा सा एक काला बिन्दु बना हुआ है. भीड़ में से बहुसंख्यक लोग काला बिन्दु दिखाई देना बताते हैं. तब वह व्यक्ति इसे नकारात्मक मानसिकता का परिचायक बताते हुए कहता है कि किसी को भी इतना बड़ा सफ़ेद बोर्ड नहीं दिखाई दिया जबकि एक छोटा सा काला बिन्दु सबने देख लिया. संभव है कि उस व्यक्ति की दृष्टि में ऐसा सही हो, एक बहुत बड़े सफ़ेद बोर्ड के बीच एक छोटा सा काला बिन्दु ही देखना नकारात्मक मानसिकता का सूचक हो किन्तु यही एकमात्र सत्य हो, ऐसा नहीं है.




यह एक मानवीय स्वभाव है कि वह सकारात्मकता की जगह पर नकारात्मकता में बहुत जल्दी घिर जाता है. किसी भी व्यक्ति का मन, दिल-दिमाग सकारात्मक घटनाओं के प्रति उतनी तेजी से नहीं सोच पाता है जितनी तेजी से वह नकारात्मक घटनाओं के प्रति सोचने लगता है. यह लगभग सभी लोगों के साथ हुआ होगा, घर का कोई व्यक्ति किसी काम से यदि बाहर जाता है और यदि वह निश्चित समयावधि में वापस नहीं लौटता है तो मन बजाय सकारात्मक सोचने के नकारात्मक ही सोचने लगता है. इस सन्दर्भ में मन को, दिल को कितना भी समझाया जाये किन्तु वह नकारात्मकता की तरफ ही मुड़ जाता है. ऐसा अकेले सोचने के सन्दर्भ में ही नहीं होता है बल्कि हमारे दिल-दिमाग में दुखद घटनाएँ, दुःख भरी यादें ज्यादा गहराई से छाई रहती हैं. खुशियों से भरी बातें, सुख भरे समय की यादें स्थायी रूप से अपना स्थान नहीं बना पाती हैं जबकि दुखी करने वाली ऐसी बातें जैसे स्थायी रूप से दिल-दिमाग में बस जाती हैं.


ये बातें किसी भी रूप में नकारात्मकता को प्रदर्शित नहीं करती हैं बल्कि ये मानवीय स्वभाव का चित्र खींचती हैं. मानवीय स्वभाव में ही कुछ इस तरह की भावनात्मकता छिपी हुई है जो सुख के बजाय दुःख के प्रति जल्दी आकर्षित होती है. समाज में भी यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति, उसक सुख आकर्षित करता है तो उससे ज्यादा तेजी से किसी भी व्यक्ति का दुःख, उसका कष्ट ध्यान खींचता है. निश्चित ही यह नकारात्मकता का नहीं बल्कि करुणा का द्योतक है. दुखों के प्रति, कष्ट के प्रति सहज रूप में ध्यान चले जाने के रूप में ही सफ़ेद बोर्ड में एक छोटे से काले बिन्दु का ध्यान आकर्षित कर लेना है. यहाँ बजाय नकारात्मकता के इसे मानवीय स्वभाव के रूप में समझने की आवश्यकता है.   





 

13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये.