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02 नवंबर 2009

सरदार पटेल और इंदिरा की याद मे विचार-गोष्ठी

31 अक्टूबर को सरदार बल्लभ भाई पटेल जी की जन्मतिथि तथा इन्दिरा गाँधी की पुण्य तिथि थी। लगभग सारे देश में अलग-अलग प्रकार से दोनों महान व्यक्तियों से सम्ब्न्धित इस दिन को मनाया गया।
हमारे शहर के स्थानीय महाविद्यालय दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में छोटी-छोटी गोष्ठियाँ, किसी तत्कालीन मुद्दे पर विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है। इसके पीछे विभागाध्यक्ष डा0 आदित्य कुमार जी का विशेष योगदान रहता है। वे हमेशा युवाओं को कुछ नया करने की प्रेरणा देते रहते हैं।

बाएँ से डॉ० अनिल कुमार श्रीवास्तव (प्राचार्य) तथा डॉ० आदित्य कुमार (विभागाध्यक्ष)


इस दिन भी उनके ही प्रोत्साहन और उत्साह के कारण एक छोटी सी विचार गोष्ठी विभाग में आयोजित कर ली गई। वैसे हम राजनीति विज्ञान विभाग में नहीं हैं पर डा0 आदित्य जी का पितातुल्य स्नेह हमारे ऊपर सदा रहता है और उसी के वशीभूत हम भी अचानक विभाग में पहुँच गये। हमने भी विचार-गोष्ठी का आनन्द उठाया।
एक विशेष बात वहीं जाकर पता चली कि विभाग में कार्यरत युवा प्रवक्ता डा0 नगमा खानम का 31 अक्टूबर को जन्मदिन भी है। बस विचार-गोष्ठी भी हुई और जन्मदिन की पार्टी भी उड़ा ली।
गोष्ठी को संक्षिप्त में आपके सामने भी चित्रों सहित रखने का प्रयास है----
गोष्ठी की शुरुआत नगमा ने ही की। उन्होंने इन्दिरा गाँधी के दृढ़ चरित्र के बारे में बताते हुए आज की महिलाओं को उनके व्यक्तित्व से कुछ सीख लेने की सलाह दी।

बाएँ से - रणविजय, डॉ० नगमा खानम (राजनीति विज्ञानं विभाग, बर्थडे बेबी) डॉ० पूनम निरंजन (इतिहास विभाग)

बैठे हुए - डॉ० कांति जी (संस्कृत विभाग)


राजनीति विज्ञान विभाग के ही रविकान्त ने सरदार पटेल के बारे में बताया तो इसी विभाग के रणविजय ने इन्दिरा गाँधी के बारे में बताया। दोनों ही राजनीति विज्ञान में रिसर्च कर रहे हैं।
संस्कृत विभाग की डा0 कान्ति जी ने इन्दिरा जी के बारे में एक पंक्ति के द्वारा महत्वपूर्ण बात कह दी कि संसार में इंदिरा गाँधी ही एकमात्र ऐसी महिला हैं जिन्होंने इतिहास बदलने के साथ-साथ भूगोल भी बदल दिया।
विभागाध्यक्ष डा0 आदित्य कुमार ने दोनों शख्सियतों के बारे में बताते हुए रियासतों के एकीकरण तथा इमरजेंसी की स्थितियों के बारे में समझाया।
रक्षाअध्ययन विभाग के डा0 आर0 के0 निगम ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के बारे में बताते हुए इंदिरा गाँधी की कूटनीतिज्ञ क्षमता को विश्व में सबसे अलग स्वीकारा।

खड़े हुए बाएँ से - डॉ० अतुल प्रकाश बुधौलिया (अंग्रेजी विभाग) डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव (हिन्दी विभाग)

बैठे हुए बाएँ से - डॉ० आर० के० निगम (रक्षा अध्ययन विभाग) डॉ० अनिल कुमार श्रीवास्तव (प्राचार्य)


महाविद्यालय के प्राचार्य डा0 अनिल कुमार श्रीवास्तव ने दोनों महान व्यक्तित्वों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमें इन लोगों की अच्छाइयों को सीखना होगा तथा बुराइयों को इस कारण याद रखना होगा कि हममें वे कमियाँ न आयें। उन्होंने पटेल को दृढ़ तथा दूरदर्शी बताया तो इंदिरा को जीवट महिला करार दिया। उन्होंने कहा कि एक यदि लौह पुरुष है तो दूसरी को लौह महिला कहा जा सकता है।
विचार-गोष्ठी में अंग्रेजी विभाग के प्रवक्ता डा0 अतुल प्रकाश बुधौलिया, हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव, इतिहास विभाग की प्रवक्ता डा0 पूनम निरंजन, अर्थशास्त्र विभाग के प्रवक्ता डा0 आशीष अग्रवाल तथा हमने भी अपने संक्षिप्त विचार रखे।

07 सितंबर 2008

काव्य-पंक्तियों के द्वारा

आज इप्टा के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. संवेदनाओं का सूखा और बुंदेलखंड का किसान विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन भी किया गया था. शहर के प्रबुद्ध वर्ग के लगभग सभी लोग वहां उपस्थित थे. अच्छे वक्ता, अच्छे कवि, अच्छे श्रोता भी अपनी उपस्थिति दर्शा रहे थे. ऐसे अवसर एक बार में मित्रों के मेल-मिलाप के मंच का निर्माण भी करते हैं. अपने साहित्यिक मित्रों, सांस्कृतिक साथियों और अन्य लोगों के साथ विविध विषयों पर चर्चा भी हुई.

बात-बात के बीच, गोष्ठी में वक्ताओं द्वारा, कवियों, शायरों द्वारा काव्य रचनाओं, पंक्तियों को भी सुनाया गया. कुछ ने अपनी लिखी सुनाईं, कुछ ने विषय के अनुरूप दूसरे रचनाकारों की रचनाएं सुनाईं. कुछ पंक्तियाँ ऐसी होतीं हैं कि दिल को छू जातीं हैं। यहाँ भी कुछ पंक्तियों ने दिल को छू लिया. ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ आपके साथ भी बाँटना चाह रहे हैं. गौर फरमाइयेगा-

एक मित्र ने आज के हालातों पर बात करते-करते कुछ पंक्तियाँ पढीं, आज के सन्दर्भ में बड़ी ही सार्थक लगीं-

राजा ने कहा रात है,
रानी ने कहा रात है,
प्रजा बोली रात है........
ये सुबह-सुबह की बात है।

जावेद की कविता गाँवों के किसानों, कुम्हारों, मजदूरों का मार्मिक चित्रण करती दिखी। उसकी कुछ पंक्तियाँ आपकी नजर हैं।

कोई लेता नहीं घडे, दीवाली के दिए।
अब किसानों ने सदा को चाक धोकर रख दिए।
पनघट सूने, पनिहारिन भी दिखती नहीं।
अब पथिक भी जा रहे हाथ में थर्मेस लिए।

किसानों की दशा को दिखाते एक मित्र की पंक्तियाँ थी कि

कोई नहीं आकर गाँवों की ख़बर है लेता,
भूखे पेट सोते उसी के बच्चे, जो सभी को अन्न है देता।

कार्यक्रम का सञ्चालन कर रहे युशुफ इश्तिहाक ने बीच-बीच में काव्य पंक्तियों से गोष्ठी को प्रभावी बना दिया। एक दो पंक्तियाँ उनकी भी अच्छी लगीं.

उनको तो अपना घर सजाना था,
मेरे घर का लुटना एक बहाना था।

इसके अतिरिक्त बहुत सारी पंक्तियों ने अपना रंग दिखाया। बाक़ी कभी बाद में। आज की अपनी पोस्ट का समापन बुन्देलखण्ड की गरिमा, उसके शौर्य आदि को दर्शाते एक गीत के मुखड़े से (ये पूरा गीत यहाँ गया गया, कभी आपको भी सुनवायेंगे, ये गीत बुन्देलखण्ड की अपनी अलग कहानी कहता है)

बुन्देलखण्ड की सुनो कहानी,
बुंदेलों की बानी में।
पानीदार यहाँ का पानी,
आग यहाँ के पानी में।