पिताजी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पिताजी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

16 मार्च 2026

पिताजी के बाद का समय

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 

आज बहुत सी घटनाओं के समय लगता है कि समय ने बहुत कुछ दिया मगर उससे ज्यादा कष्ट दिया है. बावजूद इसके कोशिश यही रहती है कि कहीं से कमजोर न पड़ें. आपकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करते हुए जीवन में आई दिक्कतों, उलझनों से निपटने, निकलने का रास्ता बनाते रहते हैं. 

आपके श्रीचरणों में सादर नमन.

16 मार्च 2025

आपके बिना दो दशक का सफ़र

 दो दशक की यात्रा, आपके बिना. 

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 


17 मार्च 2024

पिताजी के जैसा बनने की कोशिश

उन्नीस साल का सफ़र, जिसमें सब लोग तो साथ थे बस एक आप ही न थे. आपके जाने के बाद बहुत कोशिश की जिम्मेवार बनने की, परिवार को साथ लेकर चलने की. आपके जाने वाली तारीख से लेकर आज तक की तारीख की अपनी यात्रा पर नजर डालते हैं तो लगता है कि हर स्थिति में असफल ही हुए हैं. आपके जैसा स्वभाव नहीं ही पा सके, यदि उसका शतांश भी पाया होता तो मिंटू को नहीं खोते.

 

कोशिश तो हर पल करते हैं आपके जैसे बनने की मगर आज तक नहीं बन सके. बहुत अच्छे से याद है आपके जाने के एक महीने बाद घर के लिए बाजार से लौटते समय पहली बार ककड़ी खरीद कर लाये थे. उस समय और घर आने के दौरान बहुत बार आँखें नम हुईं. समय को कुछ और ही मंजूर था, उसी दिन हम शाम को ट्रेन एक्सीडेंट का शिकार हो गए. साल भर तक वे सभी पारिवारिक जिम्मेवारियाँ, जो हमें उठानी थीं उनको पिंटू-मिंटू ने उठाया.

 

पता नहीं समय ख़राब रहा या फिर कुछ और ही. धीरे-धीरे जब लगा कि सबकुछ सही होने जा रहा है तो मिंटू हम सबको छोड़ आपके पास चल दिया. ये भी एक तरह से हमारी ही गैर-जिम्मेवारी है, इसे हम स्वीकारते हैं. सबसे बड़े भाई होने का दम भरते रहे मगर एक छोटे भाई की समस्या को,उसकी मनोदशा को न समझ सके.

 

पता नहीं समय क्या-क्या दिखाएगा? कोशिश यही है कि जो रास्ता आपने दिखाया है, जो शिक्षा आपने दी है उसका अनुपालन कर सकें. हार-जीत के संघर्च के बीच से खुद को निकाल कर आपकी नज़रों में खुद को साबित कर सकें. कोशिश यही है कि पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने में आपके जैसा बन सकें. 






 

16 मार्च 2023

पिताजी के साथ स्मृति यात्रा

कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनको लाख कोशिशों के बाद भी भुलाना संभव नहीं होता है. वे तारीखें अपने आप सम्बंधित घटनाओं को किसी चलचित्र की तरह आँखों के सामने रख देती हैं. हमारे अपने जीवन में ऐसी कोई एक-दो नहीं बल्कि बहुत सारी तारीखें हैं, जिनको चाह कर भुलाया नहीं जा सकता और यदि भूलने की कोशिश भी करते हैं तो उनको भूल नहीं पाते हैं. ऐसी ही अनेक तारीखों की तरह आज, 16 मार्च की तारीख है. आज के दिन हमारे सिर से पिताजी का साया हमेशा के लिए हट गया था. सामान्य परम्परा में यह मन को संतुष्टि देने वाली बात होती है कि पिताजी भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, पर वे आत्मिक रूप में हमारे साथ हैं. यह सोच, यह मानसिकता खुद को कमजोर होने से बचाती है.


बहरहाल, पिताजी का जाना हमारे लिए गहरी चोट जैसा था. खुद को नवजीवन की राह पर उतारे अभी महज एक वर्ष ही बीता था, अभी खुद ही जिम्मेवार होने जैसा कोई एहसास अपने में जगा नहीं पाए थे कि बहुत बड़ी जिम्मेवारी हमारे कंधों पर आ गई थी. विगत 18 सालों में कोई दिन ऐसा नहीं बीता कि पिताजी की कमी को महसूस न किया हो, इसके साथ ही किसी न किसी रूप में उनको अपने साथ बने रहने का भाव भी बनाये रखा है. उनके न होने के भाव ने जहाँ बहुत बार भावनात्मक रूप से कमजोर किया तो उनके साथ रहने के भाव ने आत्मविश्वास बनाये रखा.


बहुत कुछ सोचा था पिताजी के बारे में लिखने को मगर आँखों के धुँधलेपन ने ऐसा करने नहीं दिया. बैठे-बैठे तमाम एल्बम, अनेक फोटो देखकर बीते दिनों को याद कर लिया गया. अब फोटो के रूप में बस यही यादें शेष हैं, बस यही यादें ही साथ हैं. 




























 

16 मार्च 2022

जो जगह चले गए हो खाली छोड़ कर

समय कितनी तेजी से भाग रहा है, इसका अंदाजा सामान्य रूप में नहीं होता है. जैसे ही कोई अवसर विशेष की बात हो, किसी यादगार दिन की बात हो, किसी पारिवारिक घटना की चर्चा हो, किसी स्मृति के सम्बन्ध में कोई दिन याद किया जाये (भले ही ऐसा सुखद अथवा दुखद घटना के रूप में हो) तो समझ आता है समय का भागना, बहुत ज्यादा गति से भागना.


आज 16 मार्च है. इस तारीख को भुला पाना संभव ही नहीं है. आज काल-गणना में समझ आई काल की गति. देखते-देखते सत्रह वर्ष गुजर गए, और आँखों के सामने सबकुछ वैसे ही ताजा है जैसे वर्ष 2005 में था. एक-एक फोन, एक-एक शब्द, एक-एक घटना, एक-एक व्यक्ति सबकुछ. कुछ भी आँखों से ओझल नहीं है, सिवाय पिताजी के.


बहरहाल, किया भी क्या जा सकता था, अब किया भी क्या जा सकता है? किसी समय पिताजी को याद करते हुए चंद लाइन लिख गईं थीं, वे ही आज की पोस्ट में पिताजी को समर्पित हैं.



.

16 मार्च 2021

आशीर्वाद दीजिए कि हम कभी कमजोर महसूस न करें

साल को आना ही था क्योंकि विधि का विधान भी यही है. इस तारीख को भी आना था क्योंकि यह भी निश्चित है. इस बार यह तारीख कुछ ज्यादा ही दर्दनाक होकर आई. आपके जाने के दुःख के साथ मिंटू के न रहने की असह्य पीड़ा ने कष्ट बहुत ज्यादा बढ़ा दिया. वर्ष 2005 में आपके जाने के तत्काल बाद ही परिवार हमारी दुर्घटना के साथ ही अत्यंत विपत्ति जैसी स्थिति में आ गया था. आपके जाने के दुःख के साथ एक और दर्द जुड़ गया था. आपके जाने के बाद एकदम से घर में खुद के बड़े होने के एहसास हमारे प्रति दिखाई देने लगा. खुद में भी बड़े होने की जिम्मेवारी का भाव समेट कर खुद को इसके लिए तैयार करने लगे कि आपके द्वारा छोड़े गए कामों को कुछ हद तक पूरा कर सकें.


खुद को खुद के कष्ट से उभारते हुए कोशिश यही बनी रही कि परिवार में आपके द्वारा बनाई स्थिति बराबर बनी रही. इसमें कितना सफल रहे, कितना नहीं ये तो आप ही बता सकते हैं. कोशिश बराबर बनी रही कि कोई भी हमारे किसी कदम से, हमारे व्यवहार से निराश न हो. परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्यों के साथ समन्वित रूप को बनाये रखते हुए, लगातार सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास होता रहा. इस प्रयास में सभी लोग अपनी-अपनी स्थिति, प्रस्थिति में समाहित होते रहे. समय-समय पर सब लोग एक-दूसरे के प्रति सहयोग, प्रेम, स्नेह की भावना के साथ परिवार की अवधारणा को और पुष्ट करते रहे.


इस बीच लगने लगा था जैसे सबकुछ सही से चल रहा है. सामान्य सी उथल-पुथल जो आमतौर पर सबके साथ होती रहती हैं, वे आ रही थीं, सहज रूप में उनका समाधान हो रहा था और ज़िन्दगी की गाड़ी अपनी ही सुखमय रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी. इसी में मिंटू के अचानक चले जाने की घटना ने भीतर तक तोड़ कर रख दिया. विपत्ति की, परेशानियों की स्थिति में दिल-दिमाग में बहुत कुछ नकारात्मक बातें आती हैं मगर ऐसी नकारात्मक स्थिति तो कभी सोची भी नहीं गई थी. संभवतः किसी ने भी ऐसी घटना की कल्पना, आशंका भी नहीं की होगी. जनवरी में मकर संक्रांति की शाम वह दिल तोड़ देने वाली खबर लेकर आई. उस खबर ने भीतर तक न केवल तोड़ डाला बल्कि बहुत अकेला सा कर दिया.


मिंटू की घटना के बाद से लगातार आपको याद करते हुए विचार करते हैं कि ऐसी कौन सी परीक्षा ली जा रही है हमारी, हमारे अलावा अम्मा की, पिंटू की शेष परिजनों की यह समझ नहीं आ रहा है. शायद आपके न रहने पर आपकी अनुपस्थिति से उपजी तमाम जिम्मेवारियों को हम उस रूप में नहीं निभा पाए जिस तरह से उनको निभाया जाना था. आपके जाने के बाद परिवार की एक कड़ी के रूप में सबको जोड़े तो रहे मगर उस रूप में नहीं जोड़ सके जिससे कि सभी एक-दूसरे की ताकत बने रहते.


आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको सादर चरण स्पर्श करते हुए अपने लिए आशीर्वाद की कामना है कि आगे परिवार ऐसी किसी आपत्ति में, मुश्किल में न आये. आगे कभी किसी परेशानी में, किसी दुःख में हमें अकेला न रहने दे, कमजोर ने बनाये.


पिताजी, अम्माजी के साथ हम तीनों भाई 


.
वंदेमातरम्

15 दिसंबर 2020

फाउंटेन पेन की विरासत भी, दोस्ती भी

हमारा और कलम का जैसे पिछले जन्मों का सम्बन्ध है. बचपन से अभी तक साथ बना हुआ है. फाउंटेन पेन किसी भी तरह के हों, सस्ते हों या मँहगे, प्लास्टिक के हों या धातु के, फाउंटेन पेन हों या बॉल पेन सभी हमें बहुत पसंद हैं. किसी नए शहर में जाना होता है तो वहाँ का प्रसिद्द सामान एकबारगी भले ही न खरीदा जा सके परन्तु पेन की खरीद अनिवार्य रूप से होती है. हमने खुद में महसूस किया है कि पेन को लेकर एक तरह का नशा है. इस बारे में किसी तरह की कोई शर्म-लिहाज हम नहीं रखते हैं. बहुत बार ऐसा हुआ कि उम्र, अनुभव, रिश्ते में हमसे बड़े, सम्मानित लोगों ने अपने किसी काम के लिए हमसे पेन माँगा और यदि उनके द्वारा वापस करने में जरा भी चूक होती है तो हम उसे सुधार लेते हैं. जैसा कि बहुत से लोगों द्वारा ऐसा होता है कि अपना काम निपटाया और पेन वापस न देकर वे अपनी जेब की शरण में पहुँचा देते हैं, ऐसी स्थिति सामने आने पर हम निसंकोच, बिना इसका विचार किये कि कहीं सामने वाला इसे अन्यथा न ले ले, हम अपना पेन माँग लेते हैं.


(चित्र - 1)

फाउंटेन पेन के प्रति हमें विशेष लगाव सा है. इस पर कुछ लिखने का विचार बहुत दिनों से बन रहा था. आज इसी चक्कर में अपनी इस बगिया में टहलने निकल पड़े. कुछ यादों के साथ बहुत से मित्र सामने आ गए. अभी बस एक-दो विशेष फाउंटेन पेन आपके सामने. इसमें एक पेन हमारे पास है जिसमें दोनों तरफ निब है, इसके चलते इसे दोनों तरफ से लिखा जा सकता है. इस पेन में दोनों तरफ स्याही भरने की जगह है. इस कारण दो रंग की स्याही को एक ही पेन में उपयोग में लाया जा सकता है. इस पेन को हमने आज से करीब पच्चीस वर्ष पूर्व खरीदा था. (चित्र – 1)


(चित्र - 2)

ये जो दो फाउंटेन पेन आपको दिख रहे हैं, ये हमारे पिताजी के हैं. उनको भी फाउंटेन पेन से लिखने का शौक था. पिताजी के न रहने के बाद से ये हमारे खजाने की शोभा बने हुए हैं. पिताजी की तमाम सारी यादों और चीजों की तरह हम इनको सुरक्षित रखे हुए हैं. इसमें एक पेन (ऊपर वाले) की विशेषता यह है इसमें स्याही भरने के लिए एक तरह का लीवर लगा हुआ है. चित्र में इसे आप देख भी सकते हैं. फाउंटेन पेन की निब को स्याही की शीशी में डुबो कर इसी की सहायता से इसमें स्याही भरी जाती थी. इस पेन का उपयोग करने का हमें मौका कभी नहीं मिला. इसी चित्र में नीचे वाला दूसरा पेन सामान्य पेन है. यह हमारे लिए महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि बचपन में अपनी वार्षिक परीक्षाओं के दौरान इसका उपयोग करने की अनुमति हमें पिताजी की तरफ से मिल जाया करती थी. इन दोनों फाउंटेन पेन की एक विशेषता ये भी है कि ये दोनों पेन उम्र में हमसे बड़े हैं. अब इनको उपयोग में नहीं लाया जा रहा है, बस विरासत के तौर पर, पिताजी की स्मृति में ये दोनों फाउंटेन पेन हमारे पास सुरक्षित हैं. (चित्र – 2)


.
वंदेमातरम् 

28 नवंबर 2020

रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं

भारतीय राजनीति में राजमाता के रूप में सम्मानजनक रिश्ता बनाने वालीं विजयाराजे सिंधिया जी की आत्मकथा आज हमें आशीर्वाद देने को प्राप्त हुई. उनके यथार्थ का प्रतिबिम्ब बनती राजपथ से लोकपथ पर को देखकर बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जनमानस के लिए राजमाता हमारे लिए बुआ जी रहीं. यह रिश्ता भी ऐसा रहा जो किसी सम्बोधन से मुक्त समझा-माना जा सकता है. एक पल को सोचिए कि जिनको हम बुआ पुकारते हों, उनके भाई-भाभी को हम मामा-मामी कहते हों, कैसा महसूस होगा आपको? कुछ इसी तरह का रिश्ता बना हुआ है उस परिवार से.




आपकी राजमाता, हमारी बुआ जी जनपद जालौन से सम्बन्ध रखती हैं. उनका मायका यहीं है और परिजन उरई में निवास करते हैं. इस परिवार से हमारे परिवार का बहुत पुराना रिश्ता आजतक बना हुआ है. चलिए, पारिवारिक इतिहास-भूगोल के स्थान पर वो बात जो हम कहने यहाँ आये हैं. बुआ जी के भाई श्री सुरेन्द्र सिंह मोना उरई में ही सपरिवार रह रहे हैं. हम बचपन से उनका अपने घर आना-जाना देख रहे हैं. उनका आना हम छोटे बच्चों के लिए इसलिए भी सुखद होता था क्योंकि वे पिताजी से मुलाकात करने के बाद जब चलने को होते तो हम भाइयों सहित मोहल्ले के बच्चों को अपनी जीप में बिठाकर एक चक्कर लगवाते थे. पिताजी को वे अपने छोटे भाई की तरह मानते रहे और हम लोग तब उनको कभी मोना अंकल, कभी मोना ताऊजी कहते थे.


जब हम छोटे थे तो एकाधिक बार पिताजी के साथ अंकल के घर जाना हुआ, उस समय की बहुत याद नहीं है मगर एक बार उस समय जबकि हम इंटरमीडिएट में थे, किसी काम से घर गए. अंकल से अपनी धर्मपत्नी से हमारा परिचय करवाया. हमने अपने पारिवारिक रिश्तों के चलते मोना अंकल के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़कर जैसे ही आंटी के पैर छूने चाहे तो उन्होंने मना कर दिया. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हो गया हमसे कि आंटी ने पैर छूने से रोक दिया मगर अगले ही पल सारी बात समझ आ गई. असल में मोना अंकल हमारे ननिहाल के पास के गाँव के हैं, साथ ही हमारे एक मामाजी के अभिन्न मित्रों में रहे हैं. वे हमारे मामा लोगों को अपने सगे भाइयों तरह मानते रहे हैं. यह रिश्ता आंटी को ज्ञात था ऐसे में उन्होंने मोना अंकल से उस दिन साफ़-साफ़ कहा कि वे भले ही हमसे पैर छुवाएँ, अंकल कहलवाएं मगर वे न पैर छूने की, न आंटी कहने की अनुमति देंगीं. उस दिन से हम उनको मामी सम्बोधित करते रहे.


बचपन में जब भी पिताजी के साथ राजमाता से मिलना हुआ तो पिताजी उनको जिज्जी कहते थे और हम बुआ जी. वही सम्बोधन बराबर बना रहा. बुआ जी से स्वतंत्र रूप से मिलना उस समय हुआ जबकि हम ग्वालियर से बी०एससी० कर रहे थे. हमारे हॉस्टल वार्डन चंदेल साहब ने उनसे मिलवाया, पिताजी का परिचय दिया उसके बाद उनके ग्वालियर आने पर बुआ जी हमें बुलवा लेतीं. बहुत स्नेह के साथ मिलतीं, उरई की जानकारी लेतीं, अपने परिचित सभी लोगों के हालचाल लेतीं. उन्होंने कभी हमारे बुआ कहने पर कुछ नहीं कहा सो उनको बुआ ह कहते रहे. मोना अंकल ने भी अंकल कहने पर कोई आपत्ति न की तो उनको आजतक अंकल ही कहते हैं. उनकी धर्मपत्नी ने आंटी कहने पर अपनी असहमति व्यक्त की तो वे हमारे लिए आज भी मामी जी के रूप में स्मृतियों में बसी हैं.


आज उस घर में मोना अंकल की तीसरी पीढ़ी युवावस्था में है मगर हमें पहले जैसा ही स्नेह भाइयों, भाभियों, बच्चों से मिलता है. यह संबंधों, रिश्तों की पावनता, विश्वास और संस्कारों की बात होती है कि जहाँ खून का रिश्ता न हो वहाँ रक्त-सम्बन्धियों से अधिक मजबूत रिश्ता तीन-तीन पीढ़ियों तक चलता रहे. सच ही है कि रिश्तों का नाम सिर्फ पहचान के लिए होता है अन्यथा रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं, कोई सीमांकन नहीं.


.

07 अक्टूबर 2020

दादा से मिलकर चमक उठीं धुँधली यादें

घर-परिवार के, समाज के वरिष्ठजन अपने आपमें बेशकीमती खजाना होते हैं. उनके अनुभवों से एक तरफ सीख मिलती है तो दूसरी तरफ उनके समय की स्थितियों, परिस्थितियों, आचार-विचार, लोगों के बारे में जानकारी मिलती है. यह हमारा सौभाग्य रहा है कि बचपन से संयुक्त परिवार में रहने के कारण परिवार के वरिष्ठजनों का आशीर्वाद मिलता रहा है. सामाजिक प्रस्थिति में भी कुछ ऐसा संयोग रहा कि वरिष्ठजनों का साथ, आशीर्वाद सदैव प्राप्त होता रहा. घर-परिवार से हमेशा बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता रहा साथ ही पारिवारिक संबंधों को बनाने और उनके निर्वहन करने की सीख भी मिलती रही. बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके साथ दशकों पुराने सम्बन्ध हैं. पिताजी के समय से बनाये गए आत्मीय सम्बन्ध आज भी बने हुए हैं.


पिताजी के समय की मित्र-मंडली में आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अपने पुत्रवत स्नेह देते हैं, आशीर्वाद देते हैं, समय-समय पर कुशल-क्षेम पूछते रहते हैं. अधिवक्ता होने के साथ-साथ राजनीति में भी पिताजी का सशक्त हस्तक्षेप बना हुआ था. न केवल जनपद, प्रदेश के बल्कि राष्ट्रीय स्तर के अनेक राजनेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध बने हुए थे. जनपद में पिताजी के सहयोगीजनों में बहुत से लोग पिताजी की भांति ही अनंत यात्रा को प्रस्थान कर चुके हैं और अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो पारिवारिक सदस्य की तरह हम पर अपना स्नेह, आशीर्वाद बनाये हुए हैं. इस तरह का अपनत्व बनाये रखने वाले एक-दो व्यक्ति नहीं वरन परिवार हैं, जहाँ कि पुरानी पीढ़ी से लेकर नई पीढ़ी के सभी सदस्य आपस में एक-दूसरे से पारिवारिक सदस्य की तरह जुड़े हुए हैं. ऐसा ही एक परिवार है दादा का.


दादा के साथ हम 

जी हाँ, वे जगत दादा हैं. पेशे से अधिवक्ता श्री हरदास सिंह निरंजन न केवल अपनी मित्र-मंडली में दादा के नाम से जाने जाते हैं बल्कि जहाँ तक उनकी राजनैतिक गरिमा है वहाँ तक भी वे दादा के नाम से ही अपनी पहचान बनाए हुए हैं. आज नितांत पारिवारिक मेल-मिलाप के चलते दादा से मिलने घर जाना हुआ. दादा से मुलाकात की विशेष बात यह रहती है कि वे उम्र के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं. हमें बहुत अच्छी तरह से याद है कि उम्र में पिताजी से लगभग दस वर्ष बड़े होने के बाद भी दादा हम बच्चों के साथ एकदम बच्चे बनकर घुल-मिल जाया करते थे. पिताजी से बात करने में हम लोग जितना डरते थे, दादा से उतने ही सहज रहा करते थे. आज दादा से होती बातचीत अनेक बिन्दुओं से गुजरती हुई राजनीति पर भी पहुँच गई.


दादा से उनके आवास पर मुलाकात कर सम्मान करते अखिलेश कटियार (राष्ट्रीय सचिव समाजवादी पार्टी)



बाँए से - हरदास सिंह निरंजन 'दादा', अखिलेश कटियार, ज्ञानेन्द्र निरंजन 'ज्ञानू' (दादा के पुत्र)

यद्यपि दादा वर्तमान समय में राजनीति से बहुत दूरी बनाए हुए हैं तथापि वरिष्ठ समाजवादी या कहें कि खांटी समाजवादी होने के कारण उनके दल के पदाधिकारी उनसे मुलाकात करने आवास पर आते ही रहते हैं. अभी हाल ही में आये ऐसे अवसर की चर्चा हमने की, बात की बात में दादा ने अपने समय की बहुत सारी राजनैतिक गतिविधियों की, अपनी और पिताजी सहित अन्य मित्रों की अनेकानेक गतिविधियों की, सक्रियता की बातें हमारे साथ बाँटीं. न केवल अपने दल से जुड़े लोगों बल्कि अन्य राजनैतिक दलों के साथ पारिवारिक संबंधों की गंभीरता, गहराई को भी समझाया. अपने घर पर बचपन से राजनैतिक गतिविधियों को होते देखा है, बहुत से लोगों को आते देखा है उन बातों में से कुछ की धुँधली तो कुछ की स्पष्ट छाप अभी तक मन में है. 


आज भी पिताजी की पुरानी फाइल्स देखते हैं, पुराने पत्रों को देखते हैं, राजनीति से सम्बंधित कागजातों को देखते हैं तो उनके संबंधों की कहानी स्वतः बाहर आ जाती है. आज वे सब यादें दादा के साथ बातें करके पुनः ताजा हो गईं. जो यादें धुँधली सी थीं, वे भी स्पष्ट चमकने लगी हैं.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

29 सितंबर 2020

तकनीकी दौर में हस्तलिपि का सुखद एहसास

कहा जाता है कि जिसका हस्तलेख सुन्दर होता है, उसकी मनःस्थिति भी सुन्दर होती है. पता नहीं यह कितना सच है मगर एक बात अपने व्यक्तिगत अनुभव से अवश्य कह सकते हैं कि सुन्दर, स्वच्छ हस्तलेख व्यक्ति का आत्मविश्वास अवश्य बढ़ाता है. आज के दौर में जबकि कम्प्यूटर, मोबाइल आदि के आने से कागज, कलम का उपयोग लोगों ने कम कर दिया है जिससे सुन्दर हस्तलिपि से परिचय होना भी कम हो गया है. ऐसी स्थिति के बाद भी यदि आँखों के सामने से हस्तलिपि में कोई कागज़ गुजरता है तो सुखद एहसास जगा जाता है.


हमने स्वयं हस्तलिपि सुन्दर बनी रहे, इसके लिए लगातार अभ्यास किया है. पिछली पोस्ट में आपसे चर्चा भी हुई थी कि पिताजी के लिखे अक्षरों की नक़ल कर-कर के, उनका अभ्यास कर-कर के अपने हस्तलेख को सुधारने का प्रयास किया. यह प्रयास आज तक चल रहा है. बीच में कुछ स्थिति ऐसी बनी जिसके चलते कुछ अक्षरों को लिखने का ढंग बदल गया, लिखने की शैली में कुछ अंतर आ गया इसके बाद भी प्रयास यही है कि अक्षर पिताजी के बनाये हुए अक्षरों जैसे बनें.


आज इस पोस्ट में अपनी एक कविता, जो हमने आज ही लिखी है, का चित्र लगा रहे साथ ही पिताजी की हस्तलिपि का. देखकर साफ़ समझ आ रहा है कि आज भी पिताजी जैसी राइटिंग हम बना नहीं पाए.


ये हमारी हस्तलिपि में हमारी कविता 

ये पिताजी की हस्तलिपि 


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

28 सितंबर 2020

नया फाउंटेन पेन मिलने की ख़ुशी बदली सजा में

हस्तलिपि की चर्चा छिड़ी तो बचपन की एक घटना याद आ गई. उस समय हम कक्षा पाँच में पढ़ते थे. एक शाम पिताजी बाजार से वापस आने के बाद अपना लिखा-पढ़ी का कोई काम कर रहे थे. हमने देखा कि पिताजी अपने जिस फाउंटेन पेन से लिखते थे, उससे न लिख कर एक नए पेन से लिख रहे हैं. मैरून रंग का वह पेन बहुत अच्छा लग रहा था. यद्यपि रंगीन पेन हमारे लिए नया नहीं था क्योंकि पिताजी जिन फाउंटेन पेन का प्रयोग करते थे, वे रंगीन बॉडी के ही थे. उन पेन को छूने की हिम्मत भी नहीं होती थी.


उस शाम पता नहीं हमें क्या हुआ, शायद मैरून रंग का ज्यादा आकर्षण रहा कि जैसे ही पिताजी ने अपना काम बंद करके पेन रखा, हमने पिताजी से पूछा कि ये पेन हम ले लें? पिताजी की अनुमति मिलते ही ख़ुशी का ठिकाना न रहा. झटपट पेन उठाया, अपनी कॉपी निकाली. कॉपी के एक पेज पर बड़ी ही फुर्ती में अपना पूरा नाम (जैसा चित्र में लाल रंग में लिखा है) लिख कर पिताजी को दिखाने पहुँच गए.




उन्होंने पूछा कि कुमारेन्द्र कैसे लिखा जाता है?


हमारी फुर्ती, पेन पाने की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया. तुरंत इतना समझ आ गया कि लिखने में कुछ गलती कर गए. कॉपी पर लिखे अपने नाम को फिर से देखा तो समझ आ गया कि द्र की मात्रा गलत लगा गए. गलती समझ आई तो तुरंत सही तरीके से कुमारेन्द्र लिख कर दिखा दिया (जैसा कि चित्र में पीले रंग में लिखा है). पिताजी ने सिर हिलाते हुए उस सही को स्वीकार किया और गलत लिखने की सजा भी सुना डाली.


अब जाओ, सौ बार कुमारेन्द्र लिखो.


नए फाउंटेन पेन से लिखने के चक्कर में सजा पहले तो सजा जैसी न लगी मगर बीस-तीस बार कुमारेन्द्र लिखने के बाद नया पेन आफत लगने लगा. फिलहाल सजा तो पूरी करनी ही थी, सो करी. आज भी बरसों बरस बीत जाने के बाद भी कहीं भी जब अपना नाम लिखते हैं तो तुरंत यह सजा, वह मैरून फाउंटेन पेन याद आ जाता है.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 सितंबर 2020

प्रयास पिताजी की तरह की हस्तलिपि लेखन का

अपनी प्रशंसा सुनना किसे ख़राब लगता होगा? हमें भी नहीं लगता और खासतौर से उस प्रशंसा को अत्यंत सहज भाव से स्वीकार करते हैं जो हमारी हस्तलिपि (हैण्ड राइटिंग) को लेकर होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी इस राइटिंग को सुधारने के पीछे हमारे मन्ना चाचा (श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर) तथा पिताजी (श्री महेन्द्र सिंह सेंगर) का योगदान है.


मन्ना चाचा की बैंक में सेवाओं का बहुत सारा समय कालपी, कोंच, कानपुर में बीता. इस कारण उनका नियमित रूप से उरई आना होता था. वे हम लोगों को बॉल पेन से लिखते देख लेते तो बहुत गुस्सा होते थे. फाउंटेन पेन से लिखने की आदत उनके द्वारा ही डलवाई हुई है. हम लोगों के लिए वे सुन्दर से फाउंटेन पेन भी लाया करते थे. (पेन इकठ्ठा करने का हमें जो शौक लगा है वो भी उन्हीं की देन कहा जायेगा क्योंकि उनके पास भी बहुत बेहतरीन पेनों का संग्रह आज भी है. इसमें कुछ विदेशी पेन भी शामिल हैं)


इसके अलावा किसी अक्षर को कैसे लिखा जाएगा, इसका अभ्यास पिताजी का लिखा हुआ देख कर किया करते थे. वकालत पेशे से सम्बद्ध होने के कारण पिताजी को बहुत से कागजों को लिखना होता था. बहुत से लिखे हुए कागज़ उनके द्वारा फाड़कर रद्दी में फेंके जाते थे. हम उन्हीं फटे टुकड़ों को उठाकर चोरी-चोरी पिताजी के बनाये अक्षरों की घंटों नक़ल किया करते थे.


आज फेसबुक पर टहलते हुए एक चैलेंज (#handwritingchallenge) दिखाई दिया. हमारे अनेक मित्रों ने, जो हमारी हस्तलिपि से परिचित हैं, हमारे प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया. अपनी हस्तलिपि के पहले आज अपने पिताजी की हस्तलिपि के कुछ हिस्से आपके सामने. हमारा आज भी प्रयास रहता है पिताजी की तरह अक्षर बनाने का मगर बचपन से लेकर अभी तक सफल नहीं हो सके. कुछ अक्षर तो बन जाते हैं मगर कुछ अक्षर हमें मुँह चिढ़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं.





.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 अगस्त 2020

संबंधों के साथ खेल, सही सही है, गलत गलत है

सम्बन्ध का निर्वहन सबसे कठिन होता है, इसे सुना था मगर ज़िन्दगी में जान भी गए. कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जबकि समय से पहले कुछ अनुभव मिल जाया करते हैं. जनपद मुख्यालय में निवास स्थान होने के कारण गाँव से, ननिहाल से किसी भी समस्या से सम्बंधित लोगों के आने का एकमात्र माध्यम पिताजी हुआ करते थे. ऐसा इसलिए भी होता था क्योंकि वे वकालत से सम्बद्ध थे. पता नहीं आज वकीलों के बारे में आम राय क्या है मगर किसी समय वकीलों को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. उस दौर में जबकि सरकारी नौकरियाँ बहुत ही सहज थीं, पिताजी को कई-कई अच्छी सरकारी नौकरियों से बाबा जी ने महज इसीलिए रोक रखा था कि वे पारिवारिक मुकदमों को देख सकें, उनका निस्तारण कर सकें. कई बार बाबा जी से इस सन्दर्भ में बात होती तो बाबा गर्व के साथ बताते कि हमारे पिताजी का किस-किस नौकरी के लिए चयन हुआ मगर घर की स्थिति के कारण नहीं भेजा. उसके आगे वे कहते कि वकील साहब कहने में जिस साहब का भाव उभरता है वह डीएम के लिए साहब कहने में भी नहीं उभरता है. आज इस वाक्य का सत्य क्या है, ये तो आज के लोग जानें मगर हमने बाबा जी के इस वाक्य की सत्यता अपनी आँखों देखी है.



बहरहाल, संबंधों की सत्यता आज जैसी दिखती है, उस दौर में नहीं दिखती है. हमने कभी भी पिताजी के मुँह से इस सम्बन्ध में नकारात्मक टिप्पणी नहीं सुनी. पिताजी तो चलो अपने परिवार के लिए यह त्याग कर रहे थे, हमने आज तक अम्मा के मुँह से ऐसी स्थिति के लिए कभी नाराजगी नहीं देखी, नकारात्मक टिप्पणी नहीं देखी. पारिवारिक माहौल का प्रभाव ही कहा जायेगा कि हम संबंधों का ख्याल रखने की भरसक कोशिश करते हैं. हमारी कोशिश होती है कि किसी को भी हमारी तरफ से परेशानी का अनुभव न हो. हमसे जितनी संभव हो मदद उसे मिल जाये. ऐसा हम न केवल अपने परिचितों के साथ करते हैं बल्कि अपरिचितों के साथ भी ऐसा व्यवहार रहता है.

हमारे इसी व्यवहार के कारण कई बार हमें अपने घर में डांट भी पड़ी. स्वाभाविक है, कोई माता-पिता अपने पुत्र के लिए किसी स्थायित्व की बात पर विचार कर रहे हों, उनके मन में किसी बड़ी योजना की रूपरेखा बनी हुई हो और उनका वह पुत्र अनर्गल कार्य करते फिर रहा हो, तो नाराजगी स्वाभाविक है. हम अपनी योजनाओं के साथ आगे बढ़ते रहे, परिवार की अपनी योजनायें बनी रहीं. इन्हीं तमाम सारी योजनाओं में मित्रों की, परिचितों की योजनाओं ने भी अपना पाला संभाल लिया. कुछ को हम पूरा कर सके, कुछ में हम असफल रहे. बस यही हमारी ज़िन्दगी का सबसे ख़राब पहलू बनकर सामने आया. जहाँ हम सफल रहे वहाँ तो किसी ने क्रेडिट न दिया मगर जहाँ हम असफल रह गए वहाँ सभी ने हम पर दोषारोपण करना शुरू कर दिया. पता नहीं असल सत्य क्या है?

हमारे कुछ ख़ास मित्र, हमारे परिजन भी हमारी इस कार्यशैली से नाराज हैं. उनके वक्तव्य, उनके विचार हमारे प्रति इस तरह नकारात्मक बन चुके हैं कि कई बार तो हमें खुद में ऐसा आभास होता है कि कहीं हम वाकई नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति तो नहीं बनते जा रहे? बहरहाल, वे लोग बताते नहीं कि हम कहाँ गलत हैं और हमें समझ आता नहीं कि हम कहाँ गलत हैं. फ़िलहाल तो दोनों तरफ से गलत-गलत खेला जा रहा है, कौन सही है ये तो समय बताएगा.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 जुलाई 2020

संबंधों की अदालत के बीच अदालतों के सम्बन्ध

आजतक समझ नहीं सके कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, संबंधों का निर्वहन या संबंधों का बनाना? हो सकता है कि संबंधों की संकुचित अवधारणा में बहुत से लोगों के लिए संबंधों का कोई अर्थ ही न रह जाता हो. आज भी बहुत से लोगों के लिए संबंधों का अर्थ रक्त-सम्बन्धियों से नहीं बल्कि पति-पत्नी और बच्चों से लगाया जाता है.  को तैयार हो जाते थे कि वो उनके गाँव का है या फिर उनके ससुराल का है. हमारे सन्दर्भ में देखें तो हमारा  पैतृक गाँव और ननिहाल एक ही जिले में है. पिताजी के वकालत पेशे से जुड़े होने के कारण इन दो जगहों के केस आये दिन देखने को मिलते.


उस समय जबकि हम महज नौ-दस साल के थे, हमें अदालती मामलों की समझ न थी. हमारे लिए गाँव से ननिहाल से आने वाला कोई भी व्यक्ति किसी मेहमान की तरह, रिश्तेदार की तरह ही होता था. सत्तर-अस्सी के दशक में आज जैसी भौतिकता भी हावी न हुई थी. मुकदमा लड़ने वाले घर पर ही रुका करते और हमारी अम्मा उन सभी के भोजन, शयन आदि का ख्याल रखतीं. हम सभी भाई उन  के साथ किस्सों-कहानियों में,बाबा-अइया, नाना-नानी की कहानियों में उलझे रहते. इसी में दिन गुजरते रहते, लोग आते रहते, जाते रहते कोई हमारे चाचा होते कोई मामा, कोई भाई होते तो कोई जीजा मगर पिताजी समभाव रूप से सभी के केस निपटाने की कोशिश करते.

आज हम न्यायिक प्रक्रिया से अलग हैं. पिताजी ने लॉ का कोर्स न करने दिया और हमने उनका सम्मान करते हुए लॉ का कोर्स नहीं किया. इसके बाद भी पता नहीं कैसे गाँव में, ननिहाल में ये खबर है कि हम वकालत किये हैं, यह खबर अप्रत्यक्ष हमारे लिए ही लाभकारी है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया. ये और बात है कि प्रशासनिक संबंधों के चलते बहुत से मामले, मसले अपने स्तर पर ही निपटा लिए जाते हैं मगर इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि हम वकालत पेशे से सम्बद्ध हैं.

इन बातों को कहने का कोई अर्थ नहीं, ये सब इसलिए लिखा कि कोई भी पढ़ने वाला इस बात को समझे कि आज के दौर में भी संबंधों की अहमियत बहुत अधिक है. आज रक्त-सम्बन्धी भले ही मदद करने को आगे आयें या न आयें मगर एक बार सामाजिक रूप में आप जिससे भी सम्बन्ध बनाते हैं, वह आगे अवश्य ही आता है. ये भी संभव है कि सभी दशाओं में ये नियम काम न करे मगर आपने सम्बन्ध ही हमेशा काम आते हैं, इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकेगा.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

16 मार्च 2020

बिन आपके घर कैसे सँभला, ये आप ही जानें

ज़िन्दगी भर इस बात की टीस रहेगी कि कभी आपसे खुलकर बात भी न कर सके. पिता, पुत्र के बीच का जैसा सम्बन्ध आज देखने को मिलता है, उस समय सोचा भी नहीं जा सकता था. कई-कई महीने तो ऐसे निकल जाया करते थे जबकि हमारे और आपके बीच किसी तरह की कोई बातचीत नहीं होती थी. जबसे होश संभाला तबसे ऐसी कोई जरूरत समझ ही नहीं आई जो हमें पूरी करने के लिए कहना पड़ा हो. परिवार में जिस तरह का लालन-पालन, भरण-पोषण हो रहा था उसमें किसी तरह की भौतिकतावादी चीज की अपेक्षा कभी रखी भी नहीं गई. जीवन के लिए जो आवश्यक हुआ करता था वह सब अपने आप, बिना माँगे ही मिल जाया करता था. इसलिए कभी ऐसा भी नहीं हुआ कि आपसे कुछ माँगने के लिए ही आपसे बातचीत का माध्यम बनाया गया हो. यदा-कदा कुछ आवश्यकता भी हुई तो उसके लिए अम्मा एक माध्यम बनती थीं. 


एक समय के बाद हमारी अपनी घुमक्कड़ी की आदत, सामाजिक कार्यों में बिना किसी सोच-विचार के लगे रहने की आदत पर आपने अम्मा से क्या कहा होगा, इसका पता नहीं मगर आपने हमसे कभी कुछ नहीं कहा. हाँ, कभी-कभी देर रात, और वह भी ज्यादा देर नहीं महज नौ या साढ़े नौ बजने पर आपने बस इतना कहा कि कितना बज रहा है, हम समझ जाते थे कि आपका कहने का क्या मंतव्य है. आपके कुछ भी न कहने के बाद भी कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर सामने आई आर्थिक समस्या को आपने ही दूर किया. उन दिनों हम भी अपने सपनों की दुनिया में खोये हुए थे. स्नातक की और परास्नातक की शिक्षा के दौरान जो सपने देखे थे, वे सब बस अगले ही कदम में सच होते दिखते थे. उन्हीं सपनों के बीच सपना देखा करते थे आपके लिए कुछ करने का. बहरहाल, आपके सामने हम इस स्थिति में आ ही नहीं सके कि आपके लिए कुछ कर सकें. आपके लिए क्या, उस समय तक हम अपने लिए ही कुछ न कर सके. इसके लिए आप लोगों द्वारा एक जिम्मेवारी से बाँध देने के कारण भी कुछ न कुछ करने की भावना का निर्माण हो रहा था. उस भावना का विकास हो पाता, कुछ उसका स्थायी समाधान निकल पाता कि आप उस सुबह आशीर्वाद देकर और अब तुम घर सँभालना का अंतिम वाक्य कह कर चल दिए. उस समय कतई यह भान न था कि उसके बाद आपसे फोन पर आपकी तबियत के बारे में बात होगी. यह भी नहीं सोचा था कि अब आपको दोबारा आशीर्वाद देने के लिए अपने सामने साक्षात् नहीं पायेंगे.

आज आपके बिना पंद्रह वर्ष की जीवन-यात्रा पूरी हो गई है, आपका आशीर्वाद साथ है मगर लगता है जैसे घर सँभाल नहीं पाए. आपके जाने के अगले महीने ही परिवार पर, घर पर हम एक संकट बनके आये. उसके बाद लगातार अच्छे दिन भी आते रहे और संकट भी आते रहे. घर को सँभालने की कोशिश में बराबर लगे रहे. कोशिश यही रही कि कुछ बिगड़े नहीं. कोशिश यही रही कि कुछ टूटे नहीं, कुछ बिखरे नहीं. तमाम प्रयासों के बाद भी ऐसा कुछ होता रहा जहाँ कुछ न कुछ बिखरता रहा, कुछ न कुछ टूटता रहा, कुछ न कुछ बिगड़ता रहा. इन टूटती, बिखरती, बिगड़ती किरिचों के बीच लगातार, बराबर कोशिश यही है कि इनकी जो भी खरोंच लगे वह हमें लगे. आपने घर के एक रहने का, एकसूत्र में बंधे रहने का, संभले रहने का जो भी सपना देखा था, वह किसी न किसी तरह हम पूरा करते रहें. उस दिन की अपनी दुर्घटना के बाद भी आज आपके सपने को पूरा करने में अपने आपको लगे रहना देखते हैं तो एहसास होता है कि आप साथ हैं, आपका आशीर्वाद साथ है. आपका आज भी पन्द्रह सालों के बाद भी लगातार, नियमित रूप से हर दूसरे-तीसरे दिन हमारे सपने में आना, मार्गदर्शन देना यही साबित करता है.

इन पन्द्रह वर्षों में घर को, परिवार को सँभालने में जो चूक हुई हो उसके लिए क्षमा करियेगा. कोशिश यही है कि सबकुछ सँभला रहे, सबकुछ बना रहे. हाँ, एक कसक, एक तीस आपसे बातचीत न कर पाने की जो रह गई थी, वो अब सपने में दूर हो रही है. आपका आना, आपके साथ बातचीत करना, लगता ही नहीं कि आप हमसे कहीं दूर हैं. सनातन संस्कृति की मोक्ष और भटकने का दर्शन क्या कहता है, उसका क्या सत्य है इसकी जानकारी नहीं मगर आपके साथ होने का एहसास हमें सुखद लगता है, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.


सादर श्रद्धांजलि के साथ आपको सादर नमन. आपका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहे, घर-परिवार को एकजुट बनाये रहे, सँभाले रहे, यही कामना है. 

(पिताजी की पुण्यतिथि 16 मार्च पर विशेष)
(16.03.2005 - 16.03.2020)
.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 फ़रवरी 2020

पहला और आखिरी जन्मदिन

समूचे परिवार के लिए वह ख़ुशी का दिन था. परिवार की सबसे बड़ी बेटी के विवाह सम्बन्धी आयोजनों का शुभारम्भ हुआ था. बड़े-छोटे सभी प्रसन्न होने के साथ-साथ अत्यंत ऊर्जावान लग रहे थे. संयुक्त परिवार की यही विशेषता होती है कि आयोजन छोटा हो या बड़ा, सभी उसमें अपने अधिकाधिक अंश के साथ जुड़ कर अपना सम्पूर्ण देने का प्रयास करते हैं. बचपन से ही परिवार की संयुक्त अवधारणा देखते रहने के कारण वही ख़ुशी, प्रसन्नता, उल्लास, उमंग सभी बच्चों पर भी हावी था. दो दशक से अधिक समय के बाद परिवार में वैवाहिक मांगलिक कार्य का शुभारम्भ होने जा रहा था. सबसे छोटे चाचा के विवाह के बाद ये पहला अवसर था जबकि परिवार में ऐसा कोई आयोजन होने जा रहा था.


मांगलिक आयोजन का प्रथम चरण संपन्न करने के बाद हम सभी परिजन शाम को बैठे हँसी-ख़ुशी में बैठे थे. उसी समय चाचा की तरफ से लगभग धमाका सा किया गया. धमाका इसलिए क्योंकि हमने अपने जीवन के पच्चीस-छब्बीस वर्षों में ऐसा कुछ होते देखा नहीं था. बाकी सदस्यों के लिए क्या, कैसी स्थिति रही होगी मगर हमारे लिए एकदम से हतप्रभ करने वाली स्थिति थी. बातचीत के दौर चल रहे थे, बड़े अपनी भूमिका, आगे की क्या स्थिति बननी है, कैसे काम करना है आदि पर चर्चा करने में लगे थे, चाची लोग अपने-अपने स्तर की कार्यवाही को अंजाम दे रही थीं, हम बच्चे लोग अपने-अपने ढंग से हाहा-हीही करने में लगे थे. व्यक्तिगत हमारी स्थिति यहाँ, उस समय कुछ अलग से थी. यदि परिवार की सबसे बड़ी बिटिया के विवाह की तैयारियाँ चल रही थीं तो बिना बड़े बेटे के कैसे निपट सकती थीं. हमारे लिए गौरवान्वित करने वाला दिन था कि किसी और समय (स्नातक, परास्नातक होने के बाद भी) छोटे होने, बच्चों में शुमार होने की स्थिति से दो-चार होने वाले हम उस दिन पिताजी, चाचा लोगों के साथ बैठ कर विवाह सम्बन्धी कार्यों के बारे में चर्चा कर रहे थे. 


बातचीत के दौरान थोड़ा सा ब्रेक लगने के दौरान हमारे बच्चा चाचा उठे और अगले ही पल मिठाई के पीस के साथ जैसे प्रकट हुए. इसी प्रकट होने की अवस्था में उन्होंने आकाशवाणी की कि आज लल्ला (पिताजी का घर में पुकारा जाने वाला नाम) का जन्मदिन है, आज इसे सेलिब्रेट किया जायेगा. चाचा-चाची लोगों के बीच संभवतः इसकी चर्चा हो चुकी होगी क्योंकि सभी लोग इस आकाशवाणी के पहले ड्राइंग रूम में इकठ्ठा हो चुके थे. हमारे लिए तो ये एकदम से आश्चर्य वाली स्थिति थी क्योंकि इससे पहले पिताजी के जन्मदिन जैसा कोई दिन हमने सोचा ही नहीं था. पिताजी के तीनों छोटे भाई, यानि कि हमारे तीनों चाचा लोग एकसाथ आगे आये. एकसाथ पिताजी को मिठाई खिलाई. उसके बाद फोटोग्राफी का संक्षिप्त दौर चला. संक्षिप्त इसलिए क्योंकि तब आज की तरह डिजिटल कैमरे नहीं थे हमारे पास. रील को गिन-गिन कर खर्च करना पड़ता था. कुछ फोटो खींची गईं, कुछ पार्टी टाइप आयोजन किया गया, कुछ हँसी-मजाक जैसा हुआ.

हमारे लिए व्यक्तिगत तौर पर उस दिन आश्चर्यजनक था और आज तक आश्चर्यजनक बना हुआ है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो पहला और आखिरी दिन था जबकि हमने पिताजी का जन्मदिन मनाया. आज अचानक से पुराने फोटो देखने का मन कर गया. इसी में पिताजी के उस जन्मदिन के आयोजन की फोटो भी सामने आईं. संभव है कि आज 17 फरवरी होने के कारण ऐसा मन कर गया हो. पिताजी को हमसे दूर हुए ही पन्द्रह वर्ष हो चुके हैं मगर बीस साल पहले पिताजी का मनाया जन्मदिन आज भी आँखों के सामने ऐसे जीवंत है, जैसे आज, अभी की बात हो. आज, 17 फरवरी को पिताजी के जन्मदिन पर उनको सादर नमन.



16 मार्च 2019

कौन भरेगा इस जगह को


इतनी रात को मेरे आँसुओं का सबब,
कौन समझेगा देर रात में उठ-उठकर.

उसे भरेगा कौन, किस तरह ये बता दो,
जो जगह चले गए हो खाली छोड़ कर.

हम हैं नादान, मासूम पता है तुम्हें तो,
कैसे संभालें ये जिम्मेवारी इस कदर.

तुम कहीं भी रहो साथ रहना पड़ेगा,
चल रहे हैं तुम्हारी ही दिखाई डगर.


++
सादर नमन....
2005-2019
16 मार्च

12 मई 2018

वर्तमान जनप्रतिनिधियों के स्वभाव को आईना दिखाता पत्र


आज आपके साथ एक पत्र शेयर कर रहे हैं, जो सन 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रहे श्री ध्रुव नारायण सिंह वर्मा जी ने हमारे पिताजी श्री महेन्द्र सिंह सेंगर को लिखा था. पत्र दन की तरफ से जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जाने वाली डाक-सामग्री में लिखा गया था क्योंकि विधान परिषद् सदस्य होने सम्बन्धी उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी चिन्ह उस पर अंकित है.  यहाँ उस पत्र को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह नहीं कि उसे किसी विधान परिषद् सदस्य द्वारा हमारे पिताजी को लिखा गया था. यह किसी और के लिए भले ही विशेष हो किन्तु हमारे लिए इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि पिताजी के राजनैतिक रूप से सक्रिय रहने के कारण ऐसे अनेकानेक पत्रों से हमारा परिचय होता रहता था. इस पत्र को यहाँ देने के पीछे का उद्देश्य इस पत्र में विधान परिषद् सदस्य की मानसिकता का परिचय देना है, उनकी इसी विशेषता का परिचय देना है.


उन्होंने पत्र में तत्कालीन समाचार-पत्र स्वतंत्र भारत का जिक्र किया है. हम लोगों के घर में यह पत्र नियमित रूप से आया करता था. पिताजी समय-समय पर कभी खबरों के रूप में, कभी सम्पादक के पत्र के रूप में समाज की समस्याओं को उठाते रहते थे. जिस पत्र का जिक्र विधान परिषद् सदस्य ध्रुव नारायण जी ने किया उसमें भी पिताजी द्वारा एक समस्या को उठाया गया था. पिताजी ने स्वतंत्र भारत समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम पत्र में बेतवा नहर प्रखंड की कुठौंद शाखा की कैलोर माइनर की टेल-गूल सम्बन्धी समस्या को उठाया था, जिसे ध्रुव नारायण जी ने पढ़ा. यही इस पत्र की विशेष बात है कि वे उस समस्या को पढ़कर शांत नहीं रहे. उन्होंने उस समस्या, समाचार-पत्र को इंगित करते हुए पिताजी को लिखा कि वे उन्हें इस विषय में लिखें. इसके पीछे ध्रुव नारायण जी का उद्देश्य सम्बंधित समस्या को विधान परिषद् में उठाने की इच्छा रखना था.

आज कुछ कागजात खोजते समय जब इस पत्र को अचानक देखा तो लगा कि आज के और उस दौर के जनप्रतिनिधियों में कितना अंतर आ गया है. एक तबके ऐसे जनप्रतिनिधि थे जो समाचार-पत्र में सम्पादक के नाम पत्र कॉलम में प्रकाशित किसी समस्या का संज्ञान स्वतः लेकर उसे सदन में उठाने की इच्छा व्यक्त करते थे. एक आज के दौर के जनप्रतिनिधि हैं जो बार-बार ज्ञापन देने, प्रार्थना-पत्र देने, याद दिलाने के बाद भी समस्या के निस्तारण की पहल नहीं करते. आज के ऐसे जनप्रतिनिधियों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ मालूम होता है कि वे स्वयं किसी समस्या का संज्ञान लेकर उसे सदन में उठाएंगे. फ़िलहाल, ऐसे पत्र हमारी पीढ़ी की थाती तो हैं ही आज के जनप्रतिनिधियों के लिए कुछ सीख लेने का पाठ भी हैं. काश कि वे कुछ सीख पाते अपे वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों से.

17 मार्च 2018

...बस आप साथ न छोड़ियेगा

पिताजी, आपको पंचतत्त्व में विलीन हुए आज पूरे तेरह वर्ष बीत गए. इन तेरह वर्षों में परिवार ने बहुत कुछ खोयाबहुत कुछ पाया. परिवार में नए सदस्यों का आगमन हुआ. परिवार का विस्तार हुआ साथ ही बहुत कुछ क्षरण जैसा भी हुआ. हमारी दुर्घटना उसमें से एक है. पैतृक मकान के ध्वंस होने को भी उसमें शामिल किया जा सकता है. इन तेरह वर्षों में व्यक्तिगत रूप से हमने बहुत कुछ देखामहसूस किया है. अच्छा भीबुरा भी. अपना भीबेगाना भी. आप किस रूप में किस-किस के पास, किन-किन लोगों के आसपास होंगेहोंगे भी या नहीं कुछ पता नहीं मगर हमने व्यक्तिगत रूप से आपकी उपस्थिति को बराबर महसूस किया है. कभी जीवंत साक्षात् एहसास के रूप मेंकभी नींद में स्वप्न के रूप में. इसका जिक्र कभी इसलिए नहीं किया क्योंकि आपके नाम पर किसी तरह का तर्क-वितर्क हम नहीं चाहते हैं. 

बहरहाल, पता नहीं इन तेरह सालों में आपको कौन-कौन याद भी रखे होगा? हाँ, आपके बहुत सारे दोस्तों में एकमात्र दादा ऐसे हैं जो आज भी लगभग हर दस-पंद्रह दिन पर एक अभिभावक की तरह हमारी खबर लेने घर आते हैं या फिर फोन कर लेते हैं. आप तो हमारे मोबाइल का उपयोग बहुत कम पाए थे मगर दादा के पास मोबाइल है, वे उसी से हम सबकी खबर ले लेते हैं. घर में सभी लोग आपको भूले नहीं होंगे ऐसा हमारा विचार है. आखिर परिवार आज जिस रूप में है, उसे वैसा बनाने में आपकी भूमिका को कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. हालाँकि आपके जाने के बाद हमने बहुत कुछ सहा है और कोशिश की है कि जैसा आप छोड़ गए थे उससे बेहतर न हो सके मगर उससे बदतर न हो पाए. इसमें कितना सफल हुए, कितना नहीं ये आप ही देखिएगा. आपकी दी गई शिक्षाओं ने, आपकी दी गई हिम्मत ने, आपके दिए हुए विश्वास ने कभी टूटने नहीं दिया, हारने नहीं दिया मगर कई बार बहुत अकेलापन लगता है. बहुत बार लगता है कि हारने की स्थिति बन रही है, टूटने की स्थिति आ गई है मगर उस समय आपका साथ हिम्मत बढ़ाता है. आपके आशीर्वाद से कोशिश आज भी यही है कि कुछ बिगड़े नहीं, बस आप साथ न छोड़ियेगा. 

वैसे ये सारी बातें आपको पता तो हैं ही क्योंकि लगभग रोज ही हम आपको सारी खबर देते ही हैं. कौन-कौन आपको आज भी याद रखे है, कौन-कौन भूल गया इस पर आप विचार न करियेगा क्योंकि यदि कुछ भी आपके मनोनुकूल न हुआ तो आपको कष्ट होगा. इसके आकलन के लिए हम हैं न. आप बस जहाँ हैं वहां से हम सभी को आशीर्वाद देते रहिये कि कभी गलत काम न करें, कभी दुखी न रहें, कभी असफल न रहे, कभी आपस में ग़लतफ़हमी का शिकार न हों. समूचा परिवार सिर्फ आपका बनाया हुआ है, कोई माने या न माने. आपकी अमूल्य कुर्बानियों ने परिवार के वर्तमान रूप का निर्माण किया है, उसका विस्तार किया है. इसे संवारने का, संरक्षित करने का, पल्लवित-पुष्पित करने का दायित्व हमारा है और हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि आपको निराश नहीं होने देंगे.


कुछ विशेष आयोजनों के चित्र, जो आपकी उपस्थिति का एहसास कराते रहते हैं.

परिवार के साथ 

अम्मा-पिताजी 


पिताजी अपने माता-पिता और भाइयों संग 

होली का हुड़दंग 

होली का हुड़दंग 

अपनी बिटिया के वैवाहिक कार्यक्रम में - भोपाल में 

अपने दामाद और भाइयों संग - भोपाल में 

भोपाल में मना लिया जन्मदिन, पिताजी के भाइयों ने 

चारों भाई एक साथ 

अपनी बिटिया संग - भोपाल में 


हम सबने पहली बार पिताजी की आँखों में आँसू देखे - आखिर बिटिया की विदाई थी 

एक और वैवाहिक समारोह की शुरुआत 

पिताजी ने पहली बार मनाया जन्मदिन - अपनी बहू का