सड़क पर दौड़ता ज्ञान
27 अक्टूबर 2024
23 अक्टूबर 2024
लला तुम फिरऊ न माने
कॉलेज टाइम की एक लय
याद आ गई...
++++
लला के बब्बा बोले
होए
लला की दादी बोली
होए
लला की अम्मा बोली
होए
लला के बाप बोले
होए
लला बवाली से बचियो
होए
लला तुम रगड़े जैहो
होए
लला तुम फिरऊ न माने
होए
लला तुम अपनी पे अड़
गए
होए
लला तुमने अत्तई धर
लई
होए
लला फिर बवाली न मानो
होए
लला वो अपनी पे आ गओ
होए
लला तुम गाली खा गए
होए
लला तुमाई कनपटी सिक
गई
होए
लला तुम रगड़ के धर
दए
होए
लला तुम चीं न कर पाए
होए
लला तुमाई ऐसी-तैसी
होए
लला अब जूते खैहो
होए
लला तुम अभऊँ मान जाओ
होए
लला तुम हार गए
होएएएएए
++++++++++++++
अब रगड़ाई रोज के रोज
20 जुलाई 2024
एक पौधा माँ के नाम
एक पौधा ‘माँ’ के नाम लगाकर, फ़ोटो-वीडियो बनवा कर, सोशल मीडिया में लाइव चलवा कर,
हाथ-पैर फटकार कर महाशय जैसे ही आगे बढ़े वैसे ही हल्की-हल्की हवा
चलने लगी. महाशय मुस्कुराए कि माँ ने पौधा स्वीकार लिया.
तभी कहीं से उड़ती हुई एक चप्पल उनकी पीठ पर पड़ी. हल्की हवा आँधी में बदलती
सी लगी. आसमान में गड़गड़ाहट सी समझ आई. पलट कर अभी तुरंत लगाये पौधे की तरफ़
देखा.
पीठ पर पड़ी चप्पल की जलन, हवा की तेज़ी, बादलों की गड़गड़ाहट में जैसे ‘माँ’
की तेज आवाज़ सुनाई दी- “पौधा तो लगा दिया, पानी क्या तेरा
‘बाप’ डालेगा?”
पीठ को सहलाते हुए लपक कर पौधे में पानी डालते हुए महाशय अपने बचपन को याद
करने लगे. साथ ही अग़ल-बग़ल देखते जा रहे थे कि कहीं से झाड़ू, डंडा तो आकर उन पर न चिपक जाए.
#छीछालेदर_रस भरा मात्र
व्यंग्य ही.
17 जनवरी 2024
खेलने-कूदने वाली यात्रा
हमारे शहर में
किसी समय एक बहुत बड़े धनपति हुए थे. कहते हैं कि उनके यहाँ आगे की पीढ़ी में जब
संपत्ति का, धन, जेवरात आदि का बँटवारा हुआ तो तौल कर हुआ था, कई
दिन तक ये बँटवारा चला था. बहरहाल, सत्यता जो भी हो, हमने उस दौर को देखा नहीं था इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कह सकते हैं.
संपत्ति, जायदाद के बँटवारे में भले एक परिवार के भीतर कई
हिस्से बन गए हों मगर अब शहर में एक बड़े धनपति की जगह पर कई-कई बड़े धनपति हो गए
थे. उन्हीं धनपतियों की आगे बढ़ती पीढ़ी में से परिचय भी हुआ,
उनकी प्रतिष्ठा, वैभव, सम्पदा आदि को
देखने का अवसर मिला. देखने के बाद कहा जा सकता है कि एक बड़े धनपति वाकई में बहुत
बड़े धनपति रहे होंगे.
उन बड़े धनपति की
आगे आने वाली पीढ़ी के बहुत से लोगों का बाजार पर कब्ज़ा जैसा हुआ करता था. मीटरों
क्या किलोमीटरों के हिसाब से बाजार का भाग उनका हुआ करता था. दुकानों की संख्या के
बजाय इधर से उधर तक के रूप में गिना जाता था. ये उस दौर की कहानी है जबकि बाजार
वैश्वीकरण के कब्जे में नहीं आया था, आर्थिक उदारीकरण का शिकंजा इस पर नहीं था. बाजार के साथ-साथ व्यवहार भी
सुचारू रूप से चला करता था. तब धनपति के बच्चों और दुकानदार के बच्चों में फर्क
महसूस नहीं हुआ करता था. सभी एकसमान रूप से सड़क पर निर्भीक,
निर्द्वंद्व खेल-कूद में व्यस्त रहा करते थे. वाहन आज की तरह नहीं थे, भीड़ आज के जैसी नहीं थी, वैमनष्यता आज के जैसी नहीं
थी इसलिए क्या घर का आँगन और क्या बाजार की सड़क, सब एक जैसे
हुआ करते थे या कहें कि नजर आते थे.
इसी एक जैसे दिखने
वाले वातावरण में कुछ की स्थिति ऐसी हुआ करती थी जो धनपतियों की निगाह में सबसे
आगे रहना चाहते थे. उनकी आर्थिक स्थिति ऐसा करने पर मजबूर करती थी तो कभी-कभी
धनपति का अति-विशेष होने का लोभ भी ऐसा करवाता था. इसी आगे रहने की कारगुजारी में
उनके द्वारा धनपतियों के नन्हे-नन्हे बच्चों को वे अपने प्यार-दुलार के दायरे में
लाया करते. उन नन्हे-मुन्नों के लिए वे कभी बाबा हुआ करते, कभी चाचा हुआ करते, कभी भैया हुआ करते. यही स्व-घोषित बाबा, चाचा, भैया कभी घोड़ा बनकर नन्हे-मुन्नों को सड़क पर सैर कराते दिखते, कभी किसी बच्चे का मुक्का खाकर बेहोश होने का नाटक रचते. कभी दौड़ लगाने
के खेल में जानबूझकर हारते तो कभी बच्चों के मनपसंद खाद्य पदार्थों की पूर्ति के
लिए दौड़ लगाते दिखते. यद्यपि इन सबके पीछे उद्देश्य धनपति की निगाह में आने का
रहता तथापि किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं रहती.
अब देखने में आ
रहा है कि आजकल भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. एक धनपति परिवार मिल गया है कुछ लोगों को, उस धनपति परिवार में से एक युवराज
भी बना डाला है इन्हीं लोगों ने. अब ऐसे लोग मिलकर उसके साथ खेल-कूद में व्यस्त
हैं. कभी वह नन्हा युवराज किसी जोड़-घटाने की यात्रा पर निकलता है तो कभी न्याय
माँगने चल पड़ता है. यह सब धनपति परिवार में निगाह में बने रहने वाले दुकानदार
आयोजित करते हैं. मासूम युवराज किसी बाबा, किसी चाचा, किसी भैया की पीठ पर बैठकर उसे घोड़ा समझ दौड़ाता है; कभी किसी के पेट पर
मुक्का मारकर उसका झूठमूठ गिरता देखकर खुश होता है. ये समझना कठिन होता जा रहा है
कि यहाँ ऐसी तमाम यात्राओं में युवराज खेलने का आनंद उठा रहा है या फिर वे कथित
दुकानदार जो किसी भी चुनाव में आने के पूर्व सक्रिय हो जाते हैं?
03 दिसंबर 2023
डाइट का छीछालेदर रस
कम खाने के बाद भी वजन लगातार बढ़ने के कारण डॉक्टर से मिलकर बताया,
डॉक्टर साहब,
दिन में दो-तीन बजे क़रीब भोजन करते समय
सिर्फ़ एक ही रोटी खाता हूँ फिर भी वजन लगातार बढ़ रहा है.
डॉक्टर ने कहा,
दिन भर में एक ही रोटी
खाना सही नहीं. सुबह नाश्ता किया करो. अन्यथा दिक़्क़त हो जाएगी.
इस पर डॉक्टर को बताया,
नाश्ता तो करते हैं.
चार अंडे का आमलेट, दो पराठे,
आधा लीटर दूध. पिछली बार आपने कम रोटी
खाने को बोला था तो अब एक ही खाते हैं.
डॉक्टर भी इस डाइट
के छीछालेदर रस को समझ न सका.
31 अगस्त 2022
मँहगाई को भी पचा लेंगे
आजकल
सुबह आँख खुलने से लेकर देर आँख बंद होने तक चारों तरफ हाय-हाय सुनाई देती है.
आपको भी सुनाई देती होगी ये हाय-हाय?
अब आपको लगेगा कि आखिर ये हाय-हाय है क्या,
किसकी?
ये जो है हाय! ये एक तरह की आह है,
जो एकमात्र हमारी नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से
दो-चार हो रहा है. बाजार के कुअवसर ऐसे हैं कि न कहते बनता है और न ही सुनते.
बताने का तो कोई अर्थ ही नहीं. इधर कोरोना के कारण ध्वस्त जैसी हो चुकी
अर्थव्यवस्था का नाम ले-लेकर आये दिन बाजार का नजारा ही बदल दिया जाता है. आपको
नहीं लगता कि बाजार का नजारा बदलता रहता है.
बाजार
का नजारा अलग है और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना सबको
दिखाई दे रहा है. सबको दिखाई देने वाला ये नजारा बस उनको नहीं दिखाई दे रहा, जिनको असल में दिखना चाहिए था.
इधर सामानों के मूल्य दो-चार दिन ही स्थिर जैसे दिखाई देते हैं, वैसे ही कोई न कोई टैक्स उसके
ऊपर लादकर उसके मूल्य में गति भर दी जाती है. यदि कोई टैक्स दिखाई नहीं पड़ता है तो
जीएसटी है न. अब तो इसे एक-एक सामान पर छाँट-छाँट कर लगाया जा रहा है. ऐसा करने के
पीछे मंशा मँहगाई लाना नहीं बल्कि वस्तुओं के मूल्यों को गति प्रदान करनी है. अरे!
जब मूल्य में गति होगी तो अर्थव्यवस्था को स्वतः ही गति मिल सकेगी.
ऐसा
नहीं है कि ऊपरी स्तर से मँहगाई कम करने के प्रयास नहीं किये गए. प्रयास किये गए
मगर कहाँ और कैसे किये गए ये दिखाई नहीं दिए. आपने फिर वही बात कर दी. अरे आपको
जीएसटी दिखती है,
नहीं ना?
बस ऐसे ही प्रयास हैं जो दिख नहीं रहे हैं. और हाँ,
कोरोना के कारण देश भर में बाँटी जा रही रेवड़ियों की व्यवस्था भी उन्हीं के द्वारा
की जानी है जो इन रेवड़ियों का स्वाद नहीं चख रहे हैं. अब तो आपको गर्व होना चाहिए
मँहगे होते जा रहे सामानों को,
वस्तुओं को खरीदने का. आखिर आप ही तो हैं जिन्होंने लॉकडाउन के बाद बहती धार से
अर्थव्यवस्था को धार दी थी,
अब आसमान की तरफ उड़ान भरती कीमतों के सहयोगी बनकर अर्थव्यवस्था को तो गति दे ही
रहे हैं,
रेवड़ियों को भी स्वाद-युक्त बना रहे हैं.
बढ़ते
जा रहे दामों के कारण स्थिति ये बनी है कि बेचारे सामान दुकान में ग्राहकों के इंतजार
में सजे-सजे सूख रहे हैं. वस्तुओं ने जीएसटी का आभूषण पहन कर खुद की कीमत बढ़ा ली
है, अब वे अपनी बढ़ी कीमत से कोई
समझौता करने को तैयार नहीं. इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों
के ऊपर आसमान में जा बसने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों
में कहा-सुनी हो गई हो. सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर कीमत है कि
उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रही है. उस पर भी उन कीमतों ने विपक्षी
जीएसटी से हाथ मिला लिया है. अब ऐसी हालत में सबसे ज्यादा मुश्किल में बेचारा
उपभोक्ता है,
ग्राहक है. इसमें भी वो ग्राहक ज्यादा कष्ट का अनुभव कर रहा है जो मँहगी, लक्जरी ज़िन्दगी को बस फिल्मों
में देखता आया है.
ऐसे
ही लक्जरी उपभोक्ताओं की तरह के हमारे सरकारी महानुभाव हैं. अब वे बाजार तो घूमते
नहीं हैं कि उनको कीमतों का अंदाजा हो. अब चूँकि वे बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो
होते नहीं हैं, इस
कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है. अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे
कीमतों को कम करने का कैसे सोच पाते? इस महानुभावों का तो हाल ये है कि एक आदेश दिया
तो इनको भोजन उपलब्ध. गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी
नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर किसी वस्तु के लिए मारा-मारी करनी है. अब
इतने कुअवसर खोने के बाद वे बेचारे कैसे जान सकते हैं कि कीमतों में वृद्धि हो रही
है.
ये दोष तो उस बेचारे आम आदमी का है जो दिन-रात खटते हुए बाजार
को निहारा करता है. वही बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है. वही लगातार मँहगाई
की मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है. इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है. यह किसी
जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में
रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है.
ऊपर बैठे महानुभाव भी भली-भांति समझते हैं कि आम आदमी की ऐसी
ग्राह्य क्षमता है कि वह मँहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेगा. ऐसे में परेशानी
कैसी? देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे
वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को
लेकर. सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई
का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों
और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है. इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम
सत्यता को ध्यान में रखते हुए सरकार की नादान कोशिशों को क्षमा किया जा सकता है.
02 अगस्त 2022
नंगत्व के पीछे की तार्किकता
एक
अगले ने बिना कपड़ों के कुछ फोटो क्या दिखा दीं, सबके आदर्श सामने आ गए. अरे समझो-सीखो कुछ. परिधानयुक्त समाज में
परिधान-मुक्तता अपने आपमें एक आन्दोलन है. आदिमानव ने जितनी मेहनत के बाद वस्त्रों
का निर्माण करके मनुष्य को परिधानयुक्त बनाया, मानव ने उतनी ही सहजता से स्वयं को
वस्त्र-विहीन करने का कदम उठाया. इस वस्त्र-विहीनता को भी विभिन्न तरीके से, विभिन्न
विद्वतजनों ने, विभिन्न परिभाषाओं में आबद्ध किया है. पूर्णतः वस्त्र-विहीन विचरण
करने वालों को जानवर की संज्ञा से सुशोभित किया गया.
इसी
प्रकार से एक अन्य प्रजाति है, जो वस्त्र-युक्त होते हुए भी गाहे-बगाहे
वस्त्र-विहीन होने की कोशिश करती है. कलाकारों की श्रेणी में विचरण करता यह नग्न
प्राणी स्वयं वस्त्र-मुक्त होकर खुद को मॉडल के रूप में प्रदर्शित करता है. इन्हीं
के बीच कभी-कभी एक ऐसी भी प्रजाति देखने को मिल जाती है जो परिधानों से सुसज्जित
होने के बाद भी परिधान-विहीन दिखाई देती है. इस प्रजाति के लिए परिधानों का होना,
न होना एक समान भाव में होता है. इसके परिधान कभी अपने आप ढलक जाते हैं, तो
कभी-कभी इनके उठने-बैठने से इनको परिधान-विहीन बना देते हैं. ये अत्यंत उच्च
श्रेणी की प्रजाति होती है जो पेज थ्री पर शोभायमान होती है. इसके लिए
परिधान-विहीन होना स्टेटस सिम्बल माना जाता है.
वस्त्र-विहीनता
की इन स्थितियों को सभ्यता का मुलम्मा चढ़ाकर नग्न, अर्द्ध-नग्न, टॉपलेस आदि-आदि के
नामों से पुकारा-पहचाना जाता है, वहीं आम, अनौपचारिक बातचीत में ये सभी
वस्त्र-विहीन प्रजातियाँ ‘नंगे’ ही कहे जाते हैं. कई बार लगता है कि वस्त्र-विहीन
होने को आतुर प्रजातियों को, वे चाहे स्त्री हों या पुरुष, प्रोत्साहित करने की
आवश्यकता है. समाज का बहुत-बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो समूची देह को वस्त्रों के बंधन
में रखता है. प्राकृतिक आबो-हवा से दूर रखना भी देह के साथ ज्यादती ही है और किसी
भी देश का कानून किसी की भी देह के साथ ज्यादती करने की अनुमति नहीं देता है.
समस्या इनके वस्त्र-विहीन
होने में नहीं बल्कि लोगों की सोच में है. कभी कुछ किया हो खुल्लमखुल्ला, तब तो
उसका मजा समझें. अरे लोग क्या जानें खुलेआम कुछ भी करने का मजा. ये उस ज़माने की
संतानें नहीं जो घनघोर बंदिश में रहती थीं. ये तो उस ज़माने में जन्मे हैं जहाँ
खुलापन ही इसकी विशेषता है, जहाँ आधुनिकता में रचे-बसे दिखना ही इनकी महानता है,
जहाँ पर्दों को फाड़ देना, बंदिशों को तोड़ देना इनकी खासियत मानी जाती है. ये समझे
बिना लोगों को जब देखो शुरू हो जाना है सभ्यता, संस्कृति, शालीनता, अश्लीलता,
आधुनिकता का लेक्चर देने. ये करना सही है, वो करना गलत है; ये करने से संस्कृति
खतरे में पड़ेगी, वो करने से संस्कृति का विकास होगा; ये करना शोभा नहीं देता, वो करना
सही है. क्या यार! हर बात में नुक्ताचीनी, हर काम में टांग अड़ाना, कभी तो फ्री
होकर कुछ करने दिया करो.
अरे, बेवजह नुक्ताचीनी करते
लोगों को इनके इस काम में नग्नता, अश्लीलता, नंगई दिखाई देती है. मैदान में, पार्क
में, बाज़ार में, मॉल में, पार्टी में, पब में, बार में, स्कूल में, ऑफिस में, सड़क
में, मेट्रो में, बस में, ट्रेन में, कार में, बाइक में... जहाँ भी जैसे भी हो इनको
नंगई दिखाने का मौका मिल ही जाता है. अब ये मौके का इंतज़ार नहीं करते बल्कि मौके इनके
इंतज़ार में बैठे होते हैं.
वैसे
देखा जाये तो ये लोग कहीं न कहीं अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं. आखिर हम सभी लोग
मानते हैं कि इंसान आधुनिक होते जाने के चलते अपनी जड़ों से कटता जा रहा है. ये
तमाम प्रजातियाँ भले ही मॉडलिंग के नाम पर, भले ही कलाकारी के नाम पर, भले ही
कलात्मकता के नाम पर वस्त्र-विहीन ही क्यों न हो रही हों किन्तु अपनी जड़ों से समाज
के बहुसंख्यक वर्ग को जोड़ने का कार्य कर रही हैं. परिधान के बंधनों से
परिधान-मुक्तता की ओर बढ़ता, आधुनिकता से अपनी जड़ों की ओर लौटता इनका आन्दोलन सफलता
की राह पर अग्रसर है. आखिर इन्हीं जैसे चंद लोग संस्कृति, सभ्यता का नित्य ही
बलात्कार कर पाशविकता को जन्म दे रहे हैं. काश! परिधान इनको बंधन का नहीं अलंकरण
का पर्याय समझ आता?
11 अक्टूबर 2020
तीन रुपए की उधारी ने रोका रिश्ते का रास्ता
फिल्मों के सीक्वेल बनने के दौर में बर्थडे का सीक्वेल बनाया जाना वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है. इसके लिए सारिका को और धर्मेन्द्र को ही श्रेय दिया जाना चाहिए. आपको आश्चर्य लग रहा होगा न? लगना भी चाहिए आखिर अवसर भी ऐसा है. अमिता दीदी के स्नेहिल सान्निध्य में सारिका की बर्थडे के अवसर पर धर्मेन्द्र द्वारा सप्रेम प्रदान किया गया गिफ्ट सभी के लिए सरप्राइज बना हुआ था. इस सरप्राइज को दूर करने के लिए ही बर्थडे का सीक्वेल बनाया गया.
अब आज की सबसे अधिक पसंद की गई कहानियों में तीन रुपए की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ पाने की कुछ चर्चा. हम सबके बीच के, सबके चहेते भाईसाहब की युवावस्था के दिन थे. उरई के प्रसिद्द व्यंजन का स्वाद उनको किशोरावस्था में लग गया था. यह व्यंजन ऐसा है जिसका आनंद बहुतायत नागरिक उठा रहे हैं और बहुत से ऐसे हैं जो दीवारों, सड़कों, कपड़ों आदि को लाल भी करने की कलाकारी दिखाते रहते हैं.
फिलहाल, आगे की मूल चर्चा. उनकी उम्र हो गई थी विवाह योग्य सो एक परिवार खोजबीन करते हुए उनके घर तक पहुँचा. अब पता नहीं उनका सम्बन्ध वहाँ नहीं होना था अथवा हम लोगों को एक मजेदार संस्मरण प्राप्त होना था सो लड़की वालों की मुलाकात सीधे उन्हीं भाईसाहब से हो गई. घर में कोई और बड़ा न होने के कारण बातचीत का अगला क्रम चलता उसके पहले ही तीन रुपये की उधारी का धमाका हो गया.
मेहमाननवाजी के क्रम में पानी वगैरह के साथ बात आगे बढ़ने से पहले ही उरई के प्रसिद्द व्यंजन को खाने की इच्छा व्यक्त की गई. उनके खुद के और उनके अभिन्न मित्र के पास न तो वह व्यंजन पुड़िया निकली और न ही उसे मँगवाने के लिए समुचित धन निकला. समुचित धन से तात्पर्य आप लोग हजार-लाख रुपयों से न लगा लीजिएगा. व्यंजनविहीन और धनविहीन जेबों को देखने के बाद घर आये हुए सम्बन्धियों ने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाल कर व्यंजन मँगवाने की आतुरता दिखाई.
बस, अब आप समझे समुचित धन. ये उस दौर की बात चल रही है जबकि व्यंजन-पुड़िया चवन्नी-अठन्नी के भाव मिला करती थी. भावी दूल्हा बनने का ख्वाब आँखों में लगभग सजा चुके भाईसाहब ने अपने किसी चेले लला को रुतबे सहित आवाज़ दी. लला प्रकट हुए तो मेहमानों की जेब से निकले पाँच रुपये भाईसाहब के हाथों से गुजरते हुए लला की हथेलियों तक पहुँच गए. भावी दूल्हे ने लला को आदेश सुनाया, दुकान पर जाकर दो रुपइया के मौनी गुटका ले अइयो और तीन रुपइया उधार हैं बे चुका दइयो.
समझ सकते होंगे आप, मेहमान के पाँच रुपयों से ही उनके लिए व्यंजन-पुड़िया (अब तो आप समझ ही गए होंगे इसे, ये है गुटखा) मँगवाना और अपने तीन रुपए उधार चुका देना संबंधों को आगे न ले जा सका. हमें तो लगता है कि बेचारे लड़की वाले यहाँ चूक कर गए. उन भाईसाहब ने जिस अधिकार से पाँच रुपयों से खातिरदारी और अपनी उधारी को निपटा दिया, वैसा अधिकार जताने वाला लड़का मिलना गौरव की बात होती उन लड़की वालों के लिए. बहरहाल, वे लोग इस गौरव से वंचित रह गए और हम लोगों को एक रोचक संस्मरण के साथ ठहाके लगाने का मौका अवश्य दे गए.
04 अक्टूबर 2020
ईर, बीर, फत्ते की सोशल मीडिया की कहानी
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक
रहिन हम.
ईर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
बीर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
फत्ते बोले चलो शिकार कर आबें,
हमऊँ बोले हाँ चलो शिकार कर आबें.
ईर ने मारी एक चिरैया,
बीर ने मारी दो चिरैयाँ,
फत्ते मारे तीन चिरैयाँ,
और हम???? हम मारे एक चुखरिया.
हा हा हा....हा हा हा.... हा हा हा...
अबे चुप......... का समझे हो, चुखरिया मारबो सरल है का?
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक
रहिन हम.
समय बदला, ईर, बीर, फत्ते की कहानी भी बदली. एक दिन ईर, बीर, फत्ते ने कुछ अलग ही कहानी गढ़नी शुरू कर दी.
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.
ईर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
बीर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
फत्ते बोले चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
हमऊ कहा चलो सोशल मीडिया पर आया जाए.
ईर बनाए अपना प्रोफाइल,
बीर बनाए अपना प्रोफाइल,
फत्ते बनाए अपना प्रोफाइल,
और हम???? हम तो अभै साइनइन करबे में लगे रहे.
हा हा हा.....
हा हा हा...... हा हा हा....
अबे चुप..........दूसरे की आई डी हैक कर साइन इन
करबो आसान है का?
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक
रहिन हम.
ईर कहें चलो कछु लिखो जाए,
बीर कहें चलो कछु लिखो जाए,
फत्ते बोले चलो कछु लिखो जाए,
हमऊ कहा चलो कछु लिखो जाए.
ईर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
बीर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
फत्तेऊ लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
और हम???? हम लिखे खाली टाइटिल.
हा हा हा.....
हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप..........पूरी पोस्ट पढ़ता कौन है,
सबईं टाइटिलई तो देखत हैं.
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक
रहिन हम.
ईर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
बीर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
फत्ते बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
हमऊ बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ.
ईर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
बीर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
फत्तेऊ ने बटोरी खूबईं लाइक-कमेंट,
और हम???? हमाई पोस्ट रह गई निपट खाली-छूँछी.
हा हा हा.....
हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप.......बिना लाइक-कमेंट मिले भी बराबर लिखत
रहबो सरल है का?
एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.
06 जुलाई 2020
मुंडी न मटके और काम भी हो जाए
21 मई 2020
वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग
20 मई 2020
छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग
04 मई 2020
जलेबियाँ बनी लॉकडाउन काल की वायरस
.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
26 अप्रैल 2020
फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?
.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग















