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27 अक्टूबर 2024

23 अक्टूबर 2024

लला तुम फिरऊ न माने

कॉलेज टाइम की एक लय याद आ गई...

++++

लला के बब्बा बोले

होए

लला की दादी बोली

होए

लला की अम्मा बोली

होए

लला के बाप बोले

होए

लला बवाली से बचियो

होए

लला तुम रगड़े जैहो

होए

लला तुम फिरऊ न माने

होए

लला तुम अपनी पे अड़ गए

होए

लला तुमने अत्तई धर लई

होए

लला फिर बवाली न मानो

होए

लला वो अपनी पे आ गओ

होए

लला तुम गाली खा गए

होए

लला तुमाई कनपटी सिक गई

होए

लला तुम रगड़ के धर दए

होए

लला तुम चीं न कर पाए

होए

लला तुमाई ऐसी-तैसी

होए

लला अब जूते खैहो

होए

लला तुम अभऊँ मान जाओ

होए

लला तुम हार गए

होएएएएए

++++++++++++++

अब रगड़ाई रोज के रोज


20 जुलाई 2024

एक पौधा माँ के नाम

एक पौधा ‘माँ’ के नाम लगाकर, फ़ोटो-वीडियो बनवा कर, सोशल मीडिया में लाइव चलवा कर, हाथ-पैर फटकार कर महाशय जैसे ही आगे बढ़े वैसे ही हल्की-हल्की हवा चलने लगी. महाशय मुस्कुराए कि माँ ने पौधा स्वीकार लिया.


तभी कहीं से उड़ती हुई एक चप्पल उनकी पीठ पर पड़ी. हल्की हवा आँधी में बदलती सी लगी. आसमान में गड़गड़ाहट सी समझ आई. पलट कर अभी तुरंत लगाये पौधे की तरफ़ देखा.


पीठ पर पड़ी चप्पल की जलन, हवा की तेज़ी, बादलों की गड़गड़ाहट में जैसे ‘माँ’ की तेज आवाज़ सुनाई दी- “पौधा तो लगा दिया, पानी क्या तेरा ‘बाप’ डालेगा?”


पीठ को सहलाते हुए लपक कर पौधे में पानी डालते हुए महाशय अपने बचपन को याद करने लगे. साथ ही अग़ल-बग़ल देखते जा रहे थे कि कहीं से झाड़ू, डंडा तो आकर उन पर न चिपक जाए.

😄

#छीछालेदर_रस भरा मात्र व्यंग्य ही.

 


17 जनवरी 2024

खेलने-कूदने वाली यात्रा

हमारे शहर में किसी समय एक बहुत बड़े धनपति हुए थे. कहते हैं कि उनके यहाँ आगे की पीढ़ी में जब संपत्ति का, धन, जेवरात आदि का बँटवारा हुआ तो तौल कर हुआ था, कई दिन तक ये बँटवारा चला था. बहरहाल, सत्यता जो भी हो, हमने उस दौर को देखा नहीं था इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कह सकते हैं. संपत्ति, जायदाद के बँटवारे में भले एक परिवार के भीतर कई हिस्से बन गए हों मगर अब शहर में एक बड़े धनपति की जगह पर कई-कई बड़े धनपति हो गए थे. उन्हीं धनपतियों की आगे बढ़ती पीढ़ी में से परिचय भी हुआ, उनकी प्रतिष्ठा, वैभव, सम्पदा आदि को देखने का अवसर मिला. देखने के बाद कहा जा सकता है कि एक बड़े धनपति वाकई में बहुत बड़े धनपति रहे होंगे. 




उन बड़े धनपति की आगे आने वाली पीढ़ी के बहुत से लोगों का बाजार पर कब्ज़ा जैसा हुआ करता था. मीटरों क्या किलोमीटरों के हिसाब से बाजार का भाग उनका हुआ करता था. दुकानों की संख्या के बजाय इधर से उधर तक के रूप में गिना जाता था. ये उस दौर की कहानी है जबकि बाजार वैश्वीकरण के कब्जे में नहीं आया था, आर्थिक उदारीकरण का शिकंजा इस पर नहीं था. बाजार के साथ-साथ व्यवहार भी सुचारू रूप से चला करता था. तब धनपति के बच्चों और दुकानदार के बच्चों में फर्क महसूस नहीं हुआ करता था. सभी एकसमान रूप से सड़क पर निर्भीक, निर्द्वंद्व खेल-कूद में व्यस्त रहा करते थे. वाहन आज की तरह नहीं थे, भीड़ आज के जैसी नहीं थी, वैमनष्यता आज के जैसी नहीं थी इसलिए क्या घर का आँगन और क्या बाजार की सड़क, सब एक जैसे हुआ करते थे या कहें कि नजर आते थे.


इसी एक जैसे दिखने वाले वातावरण में कुछ की स्थिति ऐसी हुआ करती थी जो धनपतियों की निगाह में सबसे आगे रहना चाहते थे. उनकी आर्थिक स्थिति ऐसा करने पर मजबूर करती थी तो कभी-कभी धनपति का अति-विशेष होने का लोभ भी ऐसा करवाता था. इसी आगे रहने की कारगुजारी में उनके द्वारा धनपतियों के नन्हे-नन्हे बच्चों को वे अपने प्यार-दुलार के दायरे में लाया करते. उन नन्हे-मुन्नों के लिए वे कभी बाबा हुआ करते, कभी चाचा हुआ करते, कभी भैया हुआ करते. यही स्व-घोषित बाबा, चाचा, भैया कभी घोड़ा बनकर नन्हे-मुन्नों को सड़क पर सैर कराते दिखते, कभी किसी बच्चे का मुक्का खाकर बेहोश होने का नाटक रचते. कभी दौड़ लगाने के खेल में जानबूझकर हारते तो कभी बच्चों के मनपसंद खाद्य पदार्थों की पूर्ति के लिए दौड़ लगाते दिखते. यद्यपि इन सबके पीछे उद्देश्य धनपति की निगाह में आने का रहता तथापि किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं रहती.


अब देखने में आ रहा है कि आजकल भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. एक धनपति परिवार मिल गया है कुछ लोगों को, उस धनपति परिवार में से एक युवराज भी बना डाला है इन्हीं लोगों ने. अब ऐसे लोग मिलकर उसके साथ खेल-कूद में व्यस्त हैं. कभी वह नन्हा युवराज किसी जोड़-घटाने की यात्रा पर निकलता है तो कभी न्याय माँगने चल पड़ता है. यह सब धनपति परिवार में निगाह में बने रहने वाले दुकानदार आयोजित करते हैं. मासूम युवराज किसी बाबा, किसी चाचा, किसी भैया की पीठ पर बैठकर उसे घोड़ा समझ दौड़ाता है; कभी किसी के पेट पर मुक्का मारकर उसका झूठमूठ गिरता देखकर खुश होता है. ये समझना कठिन होता जा रहा है कि यहाँ ऐसी तमाम यात्राओं में युवराज खेलने का आनंद उठा रहा है या फिर वे कथित दुकानदार जो किसी भी चुनाव में आने के पूर्व सक्रिय हो जाते हैं?





 

03 दिसंबर 2023

डाइट का छीछालेदर रस

कम खाने के बाद भी वजन लगातार बढ़ने के कारण डॉक्टर से मिलकर बताया,

डॉक्टर साहब, दिन में दो-तीन बजे क़रीब भोजन करते समय सिर्फ़ एक ही रोटी खाता हूँ फिर भी वजन लगातार बढ़ रहा है.


डॉक्टर ने कहा,

दिन भर में एक ही रोटी खाना सही नहीं. सुबह नाश्ता किया करो. अन्यथा दिक़्क़त हो जाएगी.


इस पर डॉक्टर को बताया,

नाश्ता तो करते हैं. चार अंडे का आमलेट, दो पराठे, आधा लीटर दूध. पिछली बार आपने कम रोटी खाने को बोला था तो अब एक ही खाते हैं.

 

डॉक्टर भी इस डाइट के छीछालेदर रस को समझ न सका.


31 अगस्त 2022

मँहगाई को भी पचा लेंगे

आजकल सुबह आँख खुलने से लेकर देर आँख बंद होने तक चारों तरफ हाय-हाय सुनाई देती है. आपको भी सुनाई देती होगी ये हाय-हाय? अब आपको लगेगा कि आखिर ये हाय-हाय है क्या, किसकी? ये जो है हाय! ये एक तरह की आह है, जो एकमात्र हमारी नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से दो-चार हो रहा है. बाजार के कुअवसर ऐसे हैं कि न कहते बनता है और न ही सुनते. बताने का तो कोई अर्थ ही नहीं. इधर कोरोना के कारण ध्वस्त जैसी हो चुकी अर्थव्यवस्था का नाम ले-लेकर आये दिन बाजार का नजारा ही बदल दिया जाता है. आपको नहीं लगता कि बाजार का नजारा बदलता रहता है.

 

बाजार का नजारा अलग है और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना सबको दिखाई दे रहा है. सबको दिखाई देने वाला ये नजारा बस उनको नहीं दिखाई दे रहा, जिनको असल में दिखना चाहिए था. इधर सामानों के मूल्य दो-चार दिन ही स्थिर जैसे दिखाई देते हैं, वैसे ही कोई न कोई टैक्स उसके ऊपर लादकर उसके मूल्य में गति भर दी जाती है. यदि कोई टैक्स दिखाई नहीं पड़ता है तो जीएसटी है न. अब तो इसे एक-एक सामान पर छाँट-छाँट कर लगाया जा रहा है. ऐसा करने के पीछे मंशा मँहगाई लाना नहीं बल्कि वस्तुओं के मूल्यों को गति प्रदान करनी है. अरे! जब मूल्य में गति होगी तो अर्थव्यवस्था को स्वतः ही गति मिल सकेगी.

 



ऐसा नहीं है कि ऊपरी स्तर से मँहगाई कम करने के प्रयास नहीं किये गए. प्रयास किये गए मगर कहाँ और कैसे किये गए ये दिखाई नहीं दिए. आपने फिर वही बात कर दी. अरे आपको जीएसटी दिखती है, नहीं ना? बस ऐसे ही प्रयास हैं जो दिख नहीं रहे हैं. और हाँ, कोरोना के कारण देश भर में बाँटी जा रही रेवड़ियों की व्यवस्था भी उन्हीं के द्वारा की जानी है जो इन रेवड़ियों का स्वाद नहीं चख रहे हैं. अब तो आपको गर्व होना चाहिए मँहगे होते जा रहे सामानों को, वस्तुओं को खरीदने का. आखिर आप ही तो हैं जिन्होंने लॉकडाउन के बाद बहती धार से अर्थव्यवस्था को धार दी थी, अब आसमान की तरफ उड़ान भरती कीमतों के सहयोगी बनकर अर्थव्यवस्था को तो गति दे ही रहे हैं, रेवड़ियों को भी स्वाद-युक्त बना रहे हैं.

 

बढ़ते जा रहे दामों के कारण स्थिति ये बनी है कि बेचारे सामान दुकान में ग्राहकों के इंतजार में सजे-सजे सूख रहे हैं. वस्तुओं ने जीएसटी का आभूषण पहन कर खुद की कीमत बढ़ा ली है, अब वे अपनी बढ़ी कीमत से कोई समझौता करने को तैयार नहीं. इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों के ऊपर आसमान में जा बसने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों में कहा-सुनी हो गई हो. सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर कीमत है कि उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रही है. उस पर भी उन कीमतों ने विपक्षी जीएसटी से हाथ मिला लिया है. अब ऐसी हालत में सबसे ज्यादा मुश्किल में बेचारा उपभोक्ता है, ग्राहक है. इसमें भी वो ग्राहक ज्यादा कष्ट का अनुभव कर रहा है जो मँहगी, लक्जरी ज़िन्दगी को बस फिल्मों में देखता आया है.

 

ऐसे ही लक्जरी उपभोक्ताओं की तरह के हमारे सरकारी महानुभाव हैं. अब वे बाजार तो घूमते नहीं हैं कि उनको कीमतों का अंदाजा हो. अब चूँकि वे बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो होते नहीं हैं, इस कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है. अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे कीमतों को कम करने का कैसे सोच पाते? इस महानुभावों का तो हाल ये है कि एक आदेश दिया तो इनको भोजन उपलब्ध. गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर किसी वस्तु के लिए मारा-मारी करनी है. अब इतने कुअवसर खोने के बाद वे बेचारे कैसे जान सकते हैं कि कीमतों में वृद्धि हो रही है.


ये दोष तो उस बेचारे आम आदमी का है जो दिन-रात खटते हुए बाजार को निहारा करता है. वही बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है. वही लगातार मँहगाई की मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है. इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है. यह किसी जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है.


ऊपर बैठे महानुभाव भी भली-भांति समझते हैं कि आम आदमी की ऐसी ग्राह्य क्षमता है कि वह मँहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेगा. ऐसे में परेशानी कैसी? देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को लेकर. सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है. इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम सत्यता को ध्यान में रखते हुए सरकार की नादान कोशिशों को क्षमा किया जा सकता है. 




 

02 अगस्त 2022

नंगत्व के पीछे की तार्किकता

एक अगले ने बिना कपड़ों के कुछ फोटो क्या दिखा दीं, सबके आदर्श सामने आ गए. अरे समझो-सीखो कुछ. परिधानयुक्त समाज में परिधान-मुक्तता अपने आपमें एक आन्दोलन है. आदिमानव ने जितनी मेहनत के बाद वस्त्रों का निर्माण करके मनुष्य को परिधानयुक्त बनाया, मानव ने उतनी ही सहजता से स्वयं को वस्त्र-विहीन करने का कदम उठाया. इस वस्त्र-विहीनता को भी विभिन्न तरीके से, विभिन्न विद्वतजनों ने, विभिन्न परिभाषाओं में आबद्ध किया है. पूर्णतः वस्त्र-विहीन विचरण करने वालों को जानवर की संज्ञा से सुशोभित किया गया. 


इसी प्रकार से एक अन्य प्रजाति है, जो वस्त्र-युक्त होते हुए भी गाहे-बगाहे वस्त्र-विहीन होने की कोशिश करती है. कलाकारों की श्रेणी में विचरण करता यह नग्न प्राणी स्वयं वस्त्र-मुक्त होकर खुद को मॉडल के रूप में प्रदर्शित करता है. इन्हीं के बीच कभी-कभी एक ऐसी भी प्रजाति देखने को मिल जाती है जो परिधानों से सुसज्जित होने के बाद भी परिधान-विहीन दिखाई देती है. इस प्रजाति के लिए परिधानों का होना, न होना एक समान भाव में होता है. इसके परिधान कभी अपने आप ढलक जाते हैं, तो कभी-कभी इनके उठने-बैठने से इनको परिधान-विहीन बना देते हैं. ये अत्यंत उच्च श्रेणी की प्रजाति होती है जो पेज थ्री पर शोभायमान होती है. इसके लिए परिधान-विहीन होना स्टेटस सिम्बल माना जाता है.




वस्त्र-विहीनता की इन स्थितियों को सभ्यता का मुलम्मा चढ़ाकर नग्न, अर्द्ध-नग्न, टॉपलेस आदि-आदि के नामों से पुकारा-पहचाना जाता है, वहीं आम, अनौपचारिक बातचीत में ये सभी वस्त्र-विहीन प्रजातियाँ ‘नंगे’ ही कहे जाते हैं. कई बार लगता है कि वस्त्र-विहीन होने को आतुर प्रजातियों को, वे चाहे स्त्री हों या पुरुष, प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है. समाज का बहुत-बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो समूची देह को वस्त्रों के बंधन में रखता है. प्राकृतिक आबो-हवा से दूर रखना भी देह के साथ ज्यादती ही है और किसी भी देश का कानून किसी की भी देह के साथ ज्यादती करने की अनुमति नहीं देता है.


समस्या इनके वस्त्र-विहीन होने में नहीं बल्कि लोगों की सोच में है. कभी कुछ किया हो खुल्लमखुल्ला, तब तो उसका मजा समझें. अरे लोग क्या जानें खुलेआम कुछ भी करने का मजा. ये उस ज़माने की संतानें नहीं जो घनघोर बंदिश में रहती थीं. ये तो उस ज़माने में जन्मे हैं जहाँ खुलापन ही इसकी विशेषता है, जहाँ आधुनिकता में रचे-बसे दिखना ही इनकी महानता है, जहाँ पर्दों को फाड़ देना, बंदिशों को तोड़ देना इनकी खासियत मानी जाती है. ये समझे बिना लोगों को जब देखो शुरू हो जाना है सभ्यता, संस्कृति, शालीनता, अश्लीलता, आधुनिकता का लेक्चर देने. ये करना सही है, वो करना गलत है; ये करने से संस्कृति खतरे में पड़ेगी, वो करने से संस्कृति का विकास होगा; ये करना शोभा नहीं देता, वो करना सही है. क्या यार! हर बात में नुक्ताचीनी, हर काम में टांग अड़ाना, कभी तो फ्री होकर कुछ करने दिया करो.


अरे, बेवजह नुक्ताचीनी करते लोगों को इनके इस काम में नग्नता, अश्लीलता, नंगई दिखाई देती है. मैदान में, पार्क में, बाज़ार में, मॉल में, पार्टी में, पब में, बार में, स्कूल में, ऑफिस में, सड़क में, मेट्रो में, बस में, ट्रेन में, कार में, बाइक में... जहाँ भी जैसे भी हो इनको नंगई दिखाने का मौका मिल ही जाता है. अब ये मौके का इंतज़ार नहीं करते बल्कि मौके इनके इंतज़ार में बैठे होते हैं.


वैसे देखा जाये तो ये लोग कहीं न कहीं अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं. आखिर हम सभी लोग मानते हैं कि इंसान आधुनिक होते जाने के चलते अपनी जड़ों से कटता जा रहा है. ये तमाम प्रजातियाँ भले ही मॉडलिंग के नाम पर, भले ही कलाकारी के नाम पर, भले ही कलात्मकता के नाम पर वस्त्र-विहीन ही क्यों न हो रही हों किन्तु अपनी जड़ों से समाज के बहुसंख्यक वर्ग को जोड़ने का कार्य कर रही हैं. परिधान के बंधनों से परिधान-मुक्तता की ओर बढ़ता, आधुनिकता से अपनी जड़ों की ओर लौटता इनका आन्दोलन सफलता की राह पर अग्रसर है. आखिर इन्हीं जैसे चंद लोग संस्कृति, सभ्यता का नित्य ही बलात्कार कर पाशविकता को जन्म दे रहे हैं. काश! परिधान इनको बंधन का नहीं अलंकरण का पर्याय समझ आता?


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11 अक्टूबर 2020

तीन रुपए की उधारी ने रोका रिश्ते का रास्ता

फिल्मों के सीक्वेल बनने के दौर में बर्थडे का सीक्वेल बनाया जाना वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है. इसके लिए सारिका को और धर्मेन्द्र को ही श्रेय दिया जाना चाहिए. आपको आश्चर्य लग रहा होगा न? लगना भी चाहिए आखिर अवसर भी ऐसा है. अमिता दीदी के स्नेहिल सान्निध्य में सारिका की बर्थडे के अवसर पर धर्मेन्द्र द्वारा सप्रेम प्रदान किया गया गिफ्ट सभी के लिए सरप्राइज बना हुआ था. इस सरप्राइज को दूर करने के लिए ही बर्थडे का सीक्वेल बनाया गया.



अब पार्टी के नाम पर जो-जो होना था वो तो हुआ ही. लज़ीज़
, सुस्वादु व्यंजन की तस्वीरें भोजनात्मक हिंसा को रोकने की दृष्टि से सार्वजनिक नहीं की जा रही हैं. बस अदरख वाली मजेदार चाय की चुस्की, वो भी कुल्ल्हड़ की सोंधी महक और स्वाद के संग, वाली तस्वीरें ही सार्वजनिक करने के अधिकार दिए गए हैं. इस चुस्की के बीच तीन रुपये की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ना, चुहलबाजी करते हुए मित्र की ससुराल में देर रात अपने बेधड़क अंदाज़ से ग्रामवासियों में अनजाना सा भय भर आना, मित्र के सम्बन्धी संग षड्यंत्रकारी विवाह के अवसर को पैदा करवाने की असफल कोशिशों के साथ न जाने कितनी-कितनी कहानियों ने ड्राइंग रूम को ठहाकों से भर दिया.




सीक्वेल को सफल बनाने में मिलनसार
, हँसमुख विवेक जी अपने जोशीले-फुर्तीले अंदाज में उसका निर्देशन करने से नहीं चूके. मुन्नू भाईसाहब और चच्चू की जुगलबंदी सदैव की तरह माहौल को जीवंत बनाती रही. राकेश द्विवेदी जी और सत्येन्द्र पस्तोर जी उसमें अपना तड़का लगाकर वहाँ की फिजाओं में बिखरती कहानियों के क्रम को और विस्तार देते रहे. शेष लोग तो फोटो में दिख ही रहे हैं, जो नहीं दिख रहे वे इस सीक्वेल में अपनी-अपनी भूमिका निभा कर निकल लिए. इसमें अपने दायित्व बोध का ईमानदारी से निर्वहन करने वाले शिवेश भाईसाहब के साथ अंकुर शुक्ला का नाम लिया जा सकता है. धर्मेन्द्र भी अपनी भूमिका को निभाते हुए गायब हो गए. उनसे अगली पार्टी में आपसे मुलाक़ात करवाई जाएगी क्योंकि अभी तो पार्टी शुरू हुई है.


अब आज की सबसे अधिक पसंद की गई कहानियों में तीन रुपए की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ पाने की कुछ चर्चा. हम सबके बीच के, सबके चहेते भाईसाहब की युवावस्था के दिन थे. उरई के प्रसिद्द व्यंजन का स्वाद उनको किशोरावस्था में लग गया था. यह व्यंजन ऐसा है जिसका आनंद बहुतायत नागरिक उठा रहे हैं और बहुत से ऐसे हैं जो दीवारों, सड़कों, कपड़ों आदि को लाल भी करने की कलाकारी दिखाते रहते हैं.


फिलहाल, आगे की मूल चर्चा. उनकी उम्र हो गई थी विवाह योग्य सो एक परिवार खोजबीन करते हुए उनके घर तक पहुँचा. अब पता नहीं उनका सम्बन्ध वहाँ नहीं होना था अथवा हम लोगों को एक मजेदार संस्मरण प्राप्त होना था सो लड़की वालों की मुलाकात सीधे उन्हीं भाईसाहब से हो गई. घर में कोई और बड़ा न होने के कारण बातचीत का अगला क्रम चलता उसके पहले ही तीन रुपये की उधारी का धमाका हो गया.


मेहमाननवाजी के क्रम में पानी वगैरह के साथ बात आगे बढ़ने से पहले ही उरई के प्रसिद्द व्यंजन को खाने की इच्छा व्यक्त की गई. उनके खुद के और उनके अभिन्न मित्र के पास न तो वह व्यंजन पुड़िया निकली और न ही उसे मँगवाने के लिए समुचित धन निकला. समुचित धन से तात्पर्य आप लोग हजार-लाख रुपयों से न लगा लीजिएगा. व्यंजनविहीन और धनविहीन जेबों को देखने के बाद घर आये हुए सम्बन्धियों ने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाल कर व्यंजन मँगवाने की आतुरता दिखाई.


बस, अब आप समझे समुचित धन. ये उस दौर की बात चल रही है जबकि व्यंजन-पुड़िया चवन्नी-अठन्नी के भाव मिला करती थी. भावी दूल्हा बनने का ख्वाब आँखों में लगभग सजा चुके भाईसाहब ने अपने किसी चेले लला को रुतबे सहित आवाज़ दी. लला प्रकट हुए तो मेहमानों की जेब से निकले पाँच रुपये भाईसाहब के हाथों से गुजरते हुए लला की हथेलियों तक पहुँच गए. भावी दूल्हे ने लला को आदेश सुनाया, दुकान पर जाकर दो रुपइया के मौनी गुटका ले अइयो और तीन रुपइया उधार हैं बे चुका दइयो.


समझ सकते होंगे आप, मेहमान के पाँच रुपयों से ही उनके लिए व्यंजन-पुड़िया (अब तो आप समझ ही गए होंगे इसे, ये है गुटखा) मँगवाना और अपने तीन रुपए उधार चुका देना संबंधों को आगे न ले जा सका. हमें तो लगता है कि बेचारे लड़की वाले यहाँ चूक कर गए. उन भाईसाहब ने जिस अधिकार से पाँच रुपयों से खातिरदारी और अपनी उधारी को निपटा दिया, वैसा अधिकार जताने वाला लड़का मिलना गौरव की बात होती उन लड़की वालों के लिए. बहरहाल, वे लोग इस गौरव से वंचित रह गए और हम लोगों को एक रोचक संस्मरण के साथ ठहाके लगाने का मौका अवश्य दे गए.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

04 अक्टूबर 2020

ईर, बीर, फत्ते की सोशल मीडिया की कहानी

एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
बीर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
फत्ते बोले चलो शिकार कर आबें,
हमऊँ बोले हाँ चलो शिकार कर आबें.

ईर ने मारी एक चिरैया,
बीर ने मारी दो चिरैयाँ,
फत्ते मारे तीन चिरैयाँ,
और हम???? हम मारे एक चुखरिया.


हा हा हा....हा हा हा.... हा हा हा...
अबे चुप......... का समझे हो, चुखरिया मारबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.



समय बदलाईरबीरफत्ते की कहानी भी बदली. एक दिन ईरबीरफत्ते ने कुछ अलग ही कहानी गढ़नी शुरू कर दी. 


एक रहिन ईरएक रहिन बीरएक रहिन फत्तेएक रहिन हम.


ईर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
बीर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
फत्ते बोले चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
हमऊ कहा चलो सोशल मीडिया पर आया जाए.

ईर बनाए अपना प्रोफाइल,
बीर बनाए अपना प्रोफाइल,
फत्ते बनाए अपना प्रोफाइल,
और हम???? हम तो अभै साइनइन करबे में लगे रहे.

हा हा हा..... हा हा हा...... हा हा हा....
अबे चुप..........दूसरे की आई डी हैक कर साइन इन करबो आसान है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो कछु लिखो जाए,
बीर कहें चलो कछु लिखो जाए,
फत्ते बोले चलो कछु लिखो जाए,
हमऊ कहा चलो कछु लिखो जाए.

ईर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
बीर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
फत्तेऊ लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
और हम???? हम लिखे खाली टाइटिल.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप..........पूरी पोस्ट पढ़ता कौन है, सबईं टाइटिलई तो देखत हैं.


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
बीर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
फत्ते बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
हमऊ बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ.

ईर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
बीर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
फत्तेऊ ने बटोरी खूबईं लाइक-कमेंट,
और हम???? हमाई पोस्ट रह गई निपट खाली-छूँछी.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप.......बिना लाइक-कमेंट मिले भी बराबर लिखत रहबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 जुलाई 2020

मुंडी न मटके और काम भी हो जाए

कुछ लोग नमस्कार करते समय अपनी गर्दन, सिर को इतना ही हिलाते हैं कि बस उसके मन को मालूम चलता है कि नमस्कार की गई।


बेचारी गर्दन और बेचारे सिर को तो पता ही नहीं चल पाता कि उनके मालिक ने किसी को नमस्कार करने में उनका दुरुपयोग कर लिया।

जिसको नमस्कार की गई उसकी जानकारी की बस कल्पना करिए।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

(आज मूड नहीं कुछ लिखने का, गंभीर टाइप, सो बस इतना ही... शेष कल)

21 मई 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 


आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.


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20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया.

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है), पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँ, किसी को यदि कोई विशेष उपाधि, सम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.

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04 मई 2020

जलेबियाँ बनी लॉकडाउन काल की वायरस

आँख खुलते ही श्रीमती जी को चाय के लिए आवाज़ लगाई. सुबह से तीसरी बार आँख खुली है. लॉकडाउन के कारण न सुबह का समय रह गया और न रात का. रात को जल्दी सोने की कोशिश में देर रात तक बिस्तर पर जाना हो पाता है. जल्दी सोने की कोशिश इसलिए क्योंकि सुबह जल्दी उठकर फिर सोना होता है. लॉकडाउन कुछ और करवा ही नहीं रहा. बस सो जाओ, जाग जाओ, फिर सो जाओ, फिर जाग जाओ. इसी सोने-जागने के बीच में खाना-पीना भी हो जाता. समझने वाली बात है, पीना-खाना नहीं हो पा रहा था, बंदी के कारण. बस खाओ और पियो. कभी पानी, कभी चाय.


कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन में घरबंदी में दिन-रात आराम से गुजर रहे थे. लोगों को लग रहा था कि वे संक्रमण से बचे हुए हैं मगर ऐसा नहीं था. कोरोना से ज्यादा खतरनाक वायरस लॉकडाउन में भी घर के अन्दर घुस चुका था. यकीन नहीं आपको? देखिएगा अपने आसपास, कहीं आप भी तो उस वायरस की चपेट में तो नहीं आ गए? ये वायरस है जलेबियाँ बनाने का. चौंक गए न? आप भी संक्रमित हैं क्या इससे?


लॉकडाउन में घर के पलंग तोड़ते, सोफों का आकार बिगाड़ते, कुर्सियों को रुलाते हुए सोशल मीडिया का जमकर दोहन किया जा रहा है. इसी में जलेबी वायरस ने घुसकर सबको संक्रमित कर दिया. जिसे देखो वो जलेबियाँ बनाने में लगा हुआ है. अरे बनाने को और भी बहुत कुछ है. पूरी बना लो, रोटी बना लो, सब्जी बना लो, बहुत ज्यादा क्रिएटिव करने का मन है तो हलवा बना लो, खीर बना लो, रायता बना लो मगर नहीं, जनाब बनायेंगे तो जलेबी ही. समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा कैसा जलेबी-प्रेम है इनका कि महीने, दो महीने रुका न जा रहा. ऐसा लग रहा जैसे रोज जलेबी ही खाते रहे हैं. ठीक है भाई, बनाना है खूब बनाओ, खाना है खूब खाओ पर क्या जरूरी है उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने की. पर नहीं, खुद तो मौज ले नहीं रहे, दूसरों को मौज में जीने नहीं दे रहे.

समझ नहीं आ रहा था कि लोग संक्रमण से बचने के लिए अपने घरों में कैद हैं या दूसरों के घरों में कलह पैदा करने के लिए? लॉकडाउन में पकवान, व्यंजन बनाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो ये लॉकडाउन वीर हलवाइयों का, रेस्टोरेंट वालों का, छोटे-मोटे खोमचे वालों का व्यापार बर्बाद करवा के ही मानेंगे. अरे करमजलो, ध्यान रखो, ये लॉकडाउन तुमको कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लाया गया है हलवाइयों का व्यापार चौपट करने के लिए नहीं, लोगों की शांत ज़िन्दगी को तहस-नहस करने के लिए नहीं.

अभी तक तो ठीक था पर इस जलेबी वायरस ने आकर सब छिन्न-भिन्न कर दिया. घर में जलेबी वायरस ने अपनी घुसपैठ कर ली. कोरोना वायरस से बचाव का तरीका लॉकडाउन या फिर क्वारंटाइन तो है मगर इस जलेबी वायरस से बचने का कोई तरीका नहीं. इसका सोर्स भी हमने पता कर लिया. सोर्स भी अपने ख़ास हैं जो रोज पता नहीं किस तकनीक से जलेबी बनाकर अपनी भाभी जी को भेजकर हमारे जी का जंजाल बनाये देते हैं.

अब कोस रहे उस पल को जब हमने अपने दोस्तों को सपत्नीक एक ग्रुप से जोड़ते हुए सबके बीच प्रेम, समन्वय, स्नेह पैदा करने का विचार किया था. आज उसी ग्रुप में हमारे सबसे आलसी, नाकारा मित्र का वीडियो पड़ा था, जलेबी वायरस से संक्रमित होने का. जब तक ये वीडियो नहीं आया था तब तक तो इस जलेबी वायरस से किसी न किसी तरह खुद को बचा रखा था मगर आज इसने अपनी तीव्रता दिखा ही दी.

आँख खोलते ही जैसे चाय की माँग हुई वैसे ही धमाका हुआ पहले जलेबी बनाने का. पलंग से गिरते-गिरते बचे. ये कहो कि कुर्सी पर या सोफे पर नहीं थे वर्ना गिर ही जाते. सामान के न होने, खमीर न उठने की, तकनीक न जानने की तमाम दवाओं का सहारा लिया मगर जलेबी वायरस ने पूरी तरह से श्रीमती जी को अपनी गिरफ्त में ले रखा था. सब कुछ तैयार है, बस जलेबी बनाना भर है का फरमान सुनाया गया. इसके साथ ताना ये मारा गया कि जब आपके ये मित्र बना सकते हैं तो आप काहे सकुचा रहे?

हमें अपने मित्र की काबिलियत पर भरोसा था सो वीडियो को कई-कई बार देखा. याद आ गया कि पिछले साल उसके घर में किसी कार्यक्रम के दौरान जलेबी बनाते हलवाई को अलग कर उसने बनी-बनाई जलेबी के साथ अपना वीडियो बनवाया था. श्रीमती जी को हकीकत बताते हुए बहुत समझाया कि ये खाना बनाने आया हलवाई बना रहा है न कि हमारा दोस्त मगर जलेबी वायरस के संक्रमण ने उन्हें नहीं छोड़ा.

आज की चाय और भोजन जलेबी बनने के बाद ही के अल्टीमेटम के बाद तो हमें वेंटिलेटर पर चढ़ाने जैसे हालात बन गए. जलेबी वायरस से बचने के लिए, लॉकडाउन में एक और लॉकडाउन झेलने के तनाव से बचने के लिए हामी भर दी. किचन से श्रीमती जी के द्वारा चाय बनाने की खटर-पटर सुनाई देने लगी और हम गुस्से में मोबाइल के द्वारा उस नामाकूल मित्र को ग्रुप में कोडवर्ड के द्वारा और पर्सनल पर सीधे-सीधे भयंकर-भयंकर वाली गालियाँ टाइप करने लगे.

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26 अप्रैल 2020

फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?

कुछ लोगों की आदत होती है दूसरे की नक़ल करने की. उनके जैसी हरकतें करने की. दूसरों की देखा-देखी वैसे ही काम करने की. इस चक्कर में बहुत बार नकलची को मुँह की खानी पड़ जाती है. नकलचियों द्वारा जब ऐसा कदम उठा लिया जाता है, तब उन्हें आभास होता है कि वे कर क्या गए. बिना बिचारे काम कर जाना, कदम उठा जाना और फिर पछताना. इसका परिणाम यह होता है कि नकलचियों को भुगतना पड़ता है क्योंकि पछताने का कोई फायदा नहीं होता है.


इस बारे में आज कुछ कहने का विचार नहीं. एक चुटकुला जैसी कथा याद या गई, आप लघुकथा भी कह सकते हैं उसे. उसी को पढ़िए और आनंद लीजिये.


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एक हवाई जहाज आसमान में अपनी रफ़्तार से उड़ान भर रहा था. उसके अन्दर सभी सवारियाँ अपने-अपने में मगन गंतव्य तक पहुँचने का इंतजार भी कर रही थीं. उन्हीं सवारियों में एक तोता भी बैठा हुआ था. किसी बड़े रंगबाज़ का तोता था सो उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए हवाई यात्रा का सहारा लिया गया था.

बहुत देर से अन्दर बैठे-बैठे वह तोता ऊबने लगा. जब उसे कुछ समझ नहीं आया तो उसने सीट के सामने लगा स्विच दबा दिया. अगले ही पल एयर होस्टेस उपस्थित हुई और बोली, जी सर. क्या सेवा कर सकती हूँ?

तोता मुस्कुराया और बोला, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस को बुरा लगा मगर यात्री का सम्मान करते हुए वह वापस लौट गई. कुछ देर बाद उस तोते ने फिर से स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई, फिर वही सवाल किया. तोते ने भी वही जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस फिर वापस लौट गई.

तोते को ऐसा करते देख बगल वाले एक ठरकी यात्री ने पूछा, ये क्या कर रहे हो?

तोता बोला, बहुत मौज आती है. करके देखो.

अब उस ठरकी यात्री ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई और अपना सवाल दोहराया. अबकी यात्री ने तोते वाला जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ. एयर होस्टेस को बहुत गुस्सा आया.

अब वो तोता और ठरकी यात्री मिलकर ऐसा करने लगे. उन दोनों ने दो-तीन बार ऐसा फिर किया तो एयर होस्टेस ने पायलट से शिकायत की. पायलट ने कहा, अगली बार दोनों ऐसा करें तो जहाज के बाहर फेंक देना.

बस, फिर क्या था. जैसे ही तोते और ठरकी ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस के आने पर जवाब दिया कि कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहे. एयर होस्टेस ने दोनों को बाहर फिंकवा दिया.

अब वे दोनों जहाज से बाहर आसमान में थे, बिना पैराशूट के. तोता बहुत जोर से हँसा और बोला, क्यों प्यारे, उड़ लेते हो?

ठरकी यात्री बोला, नहीं.

तोता और तेज हँसा और बोला, फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?



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28 जनवरी 2020

दिल की नागरिकता के लिए भी बने एक नागरिकता कानून


अपने कॉलेज में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर होने वाले कार्यक्रम में विचार रखना हैं, इसी सन्दर्भ में नेट पर इधर-उधर कुछ वेबसाइट को उलटा-पलटा जा रहा था. कई-कई बिंदु एक जैसे ही मिले और उनका सार यही निकला कि 30 दिसम्बर 2014 तक जो अवैध प्रवासी देश में आ चुके हैं, यदि वे नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं तो उनके प्रार्थना-पत्र पर सरकार विचार करेगी. इसके साथ-साथ मुख्य रूप से जो बिंदु इसमें सर्वाधिक विवाद का विषय बना हुआ है वह है कि छह गैर-मुस्लिमों को ही देश में नागरिकता के लिए पात्र माना गया है. इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारत में नागरिकता नहीं दी जाएगी. संशोधनों में यह भी शामिल किया गया है कि अब ऐसे प्रवासी शरणार्थी बारह वर्ष की जगह मात्र छह वर्ष रहने के बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र हो जायेंगे. इसके अलावा और भी अनेकानेक बिंदु हैं जो इस कानून के साथ जुड़े हुए हैं.


नागरिकता संशोधन कानून के प्रावधानों को पढ़ते समय महसूस हुआ कि ऐसा कोई कानून दिल सम्बन्धी मामलों के लिए भी होना चाहिए. किसे दिल के मामले में घुसपैठ करनी है, कौन दिल के मामले में नागरिकता का आवेदन करेगा, कितने वर्ष दिल में रहने के बाद कौन आवेदन का पात्र होगा, किसे दिल सम्बन्धी मामलों के लिए आवेदन का, नागरिकता लेने का अधिकार नहीं होगा यह सबकुछ कानूनी रूप से निर्धारित होना ही चाहिए. दिल का हाल भी अपने देश के जैसा कर दिया है. जिसे देखो वह मुँह उठाये चला आता है और आने के बाद वह यहीं की नागरिकता का दावा भी करता है. ऐसे में समस्या दिल के मालिक को नहीं वरन उसे अवश्य होती है जो दिल की नागरिकता पहले से हासिल किये है. ऐसे में विवाद होना ही होना है. यहाँ एक बात और प्रमुख है जो सभी विवादों की जड़ में है और वो है पहली नजर का मिलना, उसका आकर्षण होना. दिल के मामले में आँखों को अहमियत देने का दुष्परिणाम यही होना था. आँखों का क्या है, सुबह से शाम तक सैकड़ों से मिलती-जुलती हैं, उनकी आँखों में आँखें डाल कर बातें करती हैं, ऐसे में पहली नजर का आकर्षण हो जाना कोई आश्चर्य नहीं.

अब जबकि पहली नजर के आकर्षण को, प्रेम को स्वीकारोक्ति मिली है तो इसका सीधा सा मतलब है कि उसके लिए किसी न किसी ने एक कानून बना रखा है. अब ऐसे कानून का लाभ उठाकर ये पहली नजर वाले सीधे दिल में अपनी नागरिकता के लिए सक्रिय हो जाते हैं. यहाँ मुश्किल तो ये हो जाता है कि जो वर्षों से दिल की नागरिकता लिए बैठा है उस पर ये पहली नजर वाले ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं. इसका कारण ये है कि जो स्थायी रूप से अपनी नागरिकता लेकर बैठा है वह संख्याबल में कम है और इसके उलट पहली नजर वालों की संख्या तो रोज ही बढ़ जाती है. ये संख्या घुसपैठिया रूप में बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में अराजकता फैलनी ही है. पहली नजर वालों को एकजुट होकर उपद्रव करना ही है. इस उपद्रव में रोज वे भी शामिल हो जाते हैं जो उस दिन के पहली नजर वाले होते हैं. ऐसे में दिल को किसी तरह के उत्पात से बर्बाद होने से बचाने के लिए कोई न कोई कानून अपेक्षित है. ऐसा इसलिए भी जल्दी किया जाना चाहिए क्योंकि देरी होने की स्थिति में कोई जहीन काण्ड, हसीन बाग़ हो गया तो स्थायी नागरिकता वालों को मुश्किल हो जाएगी. आखिर पहली नजर वाले घुसपैठिया रोज ही बढ़ते जा रहे हैं.

31 मार्च 2019

क्लोजिंग उत्सव का आयोजन


मार्च माह का अंतिम दिन है. देश भर में सभी कार्यालयों में अपनी तरह से क्लोजिंग मनाई जा रही है. देश में इसे भी एक उत्सव की तरह से मनाया जाता है. कई-कई कार्यालयों में, सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों में हफ़्तों पहले से इस आयोजन को मनाया जाने लगता है. लोगों की भागदौड़, व्यस्तता, शारीरिक-मानसिक हालत ऐसी दिखती है जैसे कि सम्पूर्ण देश के विभागों की क्लोजिंग का काम इन्हीं को दिया गया है. यह अस्त-व्यस्त भाव-भंगिमा किसी के सामने ही दिखती है, किसी जिम्मेवारी को उठाने से बचने के लिए दिखती है. आमतौर पर ऐसे लोग सुबह अपने उसी पूरे इत्मिनान से उठते हैं जैसे कि अन्य सामान्य दिनों में उठा करते हैं. उसी तरह की रेंगती-घिसटती दिनचर्या के साथ अपने ऑफिस के लिए निकलना होता है, जैसे कि आम दिनों में होता है. इन दिनों चूँकि क्लोजिंग के आयोजन का विशेष महत्त्व दर्शाना होता है, इस कारण इन्हें भी कुछ अलग सा दिखना होता है. ऐसा दिखाई देना मजबूरी भी कही जा सकती है क्योंकि क्लोजिंग आयोजन से जुड़े लोग विशेष ही होते हैं. हरेक के भाग्य में क्लोजिंग आयोजन से जुड़ना नहीं लिखा होता है.


क्लोजिंग का आयोजन उनके लिए महत्त्वपूर्ण होता है जो किसी न किसी रूप में आर्थिक क्षेत्र से जुड़े होते हैं. ऐसे लोगों में जिन-जिन की किस्मत में धन-सम्पदा जुड़ी होती है वे इन दिनों उसे खपाने के पूरे तरीके उपयोग में लाते दिखते हैं. वर्तमान में रहते हुए कैसे अतीत की यात्रा की जा सकती है, कैसे अतीत को वर्तमान में खड़ा किया जा सकता है, इसका उदाहरण इसी समय देखने को मिल जाता है. कैसे जो काम नहीं हुए वे भी कागजों में संपन्न हो जाया करते हैं. कैसे जिन कामों के लिए कोई लगाया तक नहीं गया उनके भुगतान हो जाया करते हैं. कैसे प्रकृति की चाल को रोकते हुए दिन-रात का भेद इन दिनों समाप्त कर दिया जाता है. क्लोजिंग आयोजन में बहुत से लोगों को महारथ हासिल होती है. वे न केवल अपने विभाग की वरन दूसरे कई अन्य विभागों तक की क्लोजिंग करवाने का ठेका अपने हाथ में लेते हैं. इस ठेके की गंभीरता देखिये कि वे न केवल अपने विभाग के क्लोजिंग उत्सव को सम्पूर्ण सफलता से आयोजित करते हैं बल्कि दूसरे सभी विभागों के क्लोजिंग उत्सव को भी सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ा आते हैं. इस तरह के उत्सवधर्मी लोगों का अपना ही महत्त्व होता है जो मार्च के महीने में ही सबके सामने आता है अन्यथा की स्थिति में ऐसे लोग वर्ष भर स्लीपर सेल की भांति सामान्य सा जीवन गुजारते रहते हैं.

अबकी क्लोजिंग उत्सव का आना बड़े ही शुभ मुहूर्त में हुआ है. ऐसे स्लीपर सेल इस समय बहुत ही शिद्दत से याद किये जा रहे हैं. इसका कारण है कि इसी समय देश अपने सबसे बड़े संवैधानिक आयोजन में व्यस्त है. चुनावी आयोजन के कारण सबके सभी प्रकार के उत्सवों पर ग्रहण सा लग जाता है मगर इस बार क्लोजिंग होने के कारण ऐसे सफेदपोश जिनकी निधियां अभी तक कुछ जीवित अवस्था में पड़ी-पड़ी कोमा का शिकार होने जा रही थीं, वे इस क्लोजिंग उत्सव में कुछ साँस लेती दिखाई देने लगी हैं. इस उत्सव के महारथियों ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र निकाल कर उमने धार लगाना शुरू भी कर दिया था. ऐसा उसी दिन से होने लगा था जैसे ही आदर्श आचार संहिता का लगना हुआ था. आखिर ऐसे समय में वर्तमान को, भविष्य को पीछे धकेलते हुए अतीत में ले जाना होता है. जाने कितने-कितने वे काम जो अब कागजों में ही समेटे जाने हैं उनको सम्पूर्ण करवाना होता है. पूरी ईमानदारी के साथ बेईमानी की क्लोजिंग करवानी होती है. चुनावी दौर में जहाँ एक तरफ निधिदार अपने-अपने प्रचार में लगे हैं तो उनके सिपहसालार उनके पीछे क्लोजिंग उत्सव के सफल आयोजन के लिए कृत-संकल्पित हैं. 

यही विशेषता है इस लोकतंत्र की. क्लोजिंग भी पूरी ईमानदारी से निपट जानी है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा आयोजन भी निपट जाना है. दोनों जगह सभी के खाते अपनी-अपनी तरह से निपटाए जाने हैं. दोनों जगह कुछ के खाते बंद किये जायेंगे, कुछ के खाते लाभ में रहेंगे, कुछ घाटे का शिकार हो जायेंगे. अंततः दोनों ही जगह फिर एक बार वही पुराना ढर्रा चालू हो जायेगा. लाभ वाला और लाभ के लिए मारा-मारी करने लगेगा. घाटा वाला लाभ की तरफ जाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाने लगेगा. खातों के एक-दूसरे में विलय होना शुरू हो जायेगा. सबकुछ फिर वैसे ही होने लगेगा, जैसे कि सामान्य दिनों में होता रहता है. बस इस क्लोजिंग के उत्सव के समय सक्रिय लोग फिर सुसुप्तावस्था में चले जायेंगे. वे फिर से क्लोजिंग उत्सव के समय ही याद आयेंगे, भले ही वो क्लोजिंग विभागों के आर्थिक खातों की हो या फिर देश की संवैधानिक व्यवस्था वाले खाते की.