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29 जुलाई 2025

समाज की कड़वी हकीकत है बाल श्रम

ऐसे दृश्य हम सबकी आँखों के सामने से आये दिन गुजरते ही होंगे जबकि छोटे-बड़े व्यापारिक संस्थानों, दुकानों, ढाबों आदि में बच्चे काम कर रहे हैं. कहीं कोई चाय-पानी पिलाने का काम कर रहा है, कहीं कोई झाड़ू-पोंछा करने का काम कर रहा है. सामान्य रूप में इस स्थिति को बाल श्रम के रूप में जाना जाता है. कृषिकार्य, पारिवारिक व्यापार में मदद, होटल, ढाबों आदि में बच्चों को जबरिया काम पर लगा दिया जाता है. कई बार इन बच्चों से बलपूर्वक भी काम लिया जाता है. ऐसा उस स्थिति में सहजता से होता दिख रहा है जबकि बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 पारित हो चुका है. इसके पश्चात् बाल श्रम के साथ-साथ किशोरों को भी श्रमिक सम्बन्धी कार्यों में लगाये जाने को प्रतिबंधित करने के सम्बन्ध में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन नियम 2017 पारित किया गया. यह संशोधन भारत में बाल और किशोर श्रम को समाप्त करने के उद्देश्य से कानूनी ढाँचे को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इसके द्वारा नियमों में बाल श्रम के स्थान पर बाल एवं किशोर श्रम शब्द जोड़ा गया तथा व्यापक आयु वर्ग को मान्यता दी गई. यहाँ बाल श्रम का सन्दर्भ ऐसे कार्यों से है जिसमें कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है. इसको कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने बच्चों का शोषण करने वाला माना है.

 



भारत में बाल श्रम की समस्या दशकों से प्रचलित है. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु चिन्तित दिखाई देती हैं. देश के संविधान का अनुच्छेद 23 खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है. भारत सरकार द्वारा बाल श्रम की समस्या को समाप्त करने हेतु नियमित रूप से क़दम उठाए गए हैं. 1986 में बाल श्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया गया. इसके अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसी तरह वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति बनाई गई थी. इसके बाद भी देश में बाल श्रमिकों की बड़ी संख्या है. इन बाल श्रमिकों में अधिकतर घरेलू नौकर, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्र में कार्य करते हैं. इन सामान्य से कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं. भारत की जनगणना 2011 के अनुसार 5-14 वर्ष की आयु वर्ग के लगभग एक करोड़ बच्चे कार्यरत हैं जिनमें से लगभग 80 लाख बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक और खेतिहर मजदूरों के रूप में कार्य करते हैं. 

 

किसी अधिनियम के अस्तित्व में आ जाने भर से बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में अनेकानेक परिवार ऐसे हैं जिनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए, अपने जीवन को बचाए रखने के लिए न चाहते हुए भी अपने बच्चों को श्रमिक के रूप में कार्य करवाना पड़ता है. ऐसे परिवारों के माता-पिता के लिए बाल श्रम एक सामान्य सी प्रक्रिया होती है. इस तरह की सोच का मुख्य कारण गरीबी को माना जा सकता है. आज के दौर का यह बहुत बड़ा सच है कि विकास के बहुत बड़े-बड़े दावे करने के बाद भी समाज से गरीबी को दूर नहीं किया जा सका है. आज भी बहुतायत में ऐसे परिवार हैं जिनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं. ऐसे परिवारों के सामने भोजन, पानी, वस्त्र, घर, शिक्षा, चिकित्सा आदि की समस्या विकराल रूप में होती है. ऐसी स्थिति में इन परिवारों को भरण-पोषण सहित अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने बच्चों को काम पर लगाना पड़ता है.  

 



देखा जाये तो बाल श्रम और गरीबी का सह-सम्बन्ध बना हुआ है. इसका दुष्प्रभाव निश्चित रूप से बच्चों के स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही पड़ता है, उनकी शिक्षा भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है. जहाँ एक तरफ कुपोषण और अन्य शारीरिक बीमारियाँ आये दिन बच्चों को घेरे रहती हैं वहीं दूसरी तरफ गरीबी और बाल श्रम में संलिप्त होने के कारण बच्चों में अवसरों, शिक्षा की कमी के कारण मानसिक परेशानियाँ देखने को मिलती हैं. बाल श्रम को रोकने के लिए सरकारों द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाये गए हैं. इसी तरह से बच्चों की शिक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान देते हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया. इस कानून के द्वारा 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है. इसके पीछे सोच यही रही है कि इस आयु-वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर खुद को बाल श्रम, गरीबी आदि के चंगुल से मुक्त कर सकें. इसके बाद भी स्थितियों को सुखद नहीं कहा जा सकता है.

 

एक कड़वा सच यही है कि सिर्फ कानूनों के द्वारा बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. इसके लिए जनजागरूकता भी आवश्यक है, परिवारों की गरीबी दूर होना आवश्यक है. ऐसे में बाल श्रम को समाप्त करने के लिए समाज और सरकार दोनों को सामूहिक रूप से सक्रिय होना होगा. प्रत्येक नागरिक को संकल्पित होना पड़ेगा कि वह बाल श्रम में संलिप्त लोगों को जागरूक करेगा. बाल श्रमिकों के अभिभावकों को बाल श्रम से होने वाले नुकसान के बारे में समझाना होगा. सरकार को ऐसे अभिभावकों की आय निर्धारण सम्बन्धी कदम उठाने होंगे. बच्चों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन की दिशा में भी प्रयास करने होंगे. समवेत प्रयासों से ही बाल श्रम को समाप्त करने की उम्मीद की जा सकती है.


12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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12 जून 2018

सिर्फ कानून समाधान नहीं बालश्रम का


बालश्रम को रोकने के लिए बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 सदन में पारित हुआ. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु कार्य करती हैं. देश का संविधान भी बाल श्रम उन्मूलन की बात करता है. इसके अनुच्छेद 23 में खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया गया है. भारत सरकार ने बाल श्रम को समाप्त करने हेतु 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया. कानून बनते रहे, उनमें संशोधन भी होते रहे. इन्हीं कानूनों का सहारा लेकर बहुत से लोग काम करते दिखे और बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त करते दिखे. इन सबके बाद भी देश में बालश्रम की समस्या ज्यों की त्यों है. इसके बाद भी होटलों, ढाबों, ऑटो रिपेयरिंग दुकानों के साथ-साथ घरेलू नौकरों के रूप में बच्चे कार्यरत दिखते हैं. इन कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं.


सड़क किनारे कूड़ा-करकट, खाली बोतलें, पॉलीथीन, रैपर आदि समेटते बच्चे किसी एक शहर में नहीं वरन लगभग सभी शहरों में मिल जायेंगे. बच्चों का कूड़ा बीनने के साथ-साथ भीख माँगने में, अनेक जगहों पर काम करने में लगा देखा जा सकता है. ये समस्या आज़ादी के बाद से ही एक प्रमुख समस्या के रूप में सामने रही है; विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर अनेक कार्य किये हैं, विभिन्न योजनायें संचालित की हैं किन्तु उनका यथोचित लाभ बच्चों को नहीं मिल सका है. पढने-लिखने, खेलने-कूदने की उम्र में ये बच्चे इस तरह की गतिविधियों में लिप्त रह कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने को मजबूर रहते हैं. अच्छे कपड़े, अच्छा भोजन, अच्छे खिलौने इन बच्चों के लिए स्वप्न समान ही रहते हैं. इन स्थितियों पर आज पुनः इस कारण विचार किये जाने, गंभीरता से विचार किये जाने की जरूरत है क्योंकि दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित और बड़ा पुरस्कार-सम्मान नोबल भारतीय समाजसेवी को साझा रूप में मिला है. ये साझेदारी का बँटवारा बच्चों के प्रति जिम्मेवारी को और भी बढ़ा देता है क्योंकि भारतीय समाजसेवी की साझीदार पाकिस्तानी बच्ची है जिसको बच्चियों की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाला बताया गया है. नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भारतीय समाजसेवी के पास तो अस्सी हजार बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त करवाने का आँकड़ा है, इसके बाद भी ऐसे हालात बने हुए हैं जो दर्शाते हैं कि बच्चे अभी भी कूड़ा-करकट में घिरे हैं, मजदूरी के शिकार हैं, कामकाजी जाल में फँसे हैं.


ऐसे हालातों में फंसे बच्चे पहले तो अपने बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं होते हैं और यदि किसी तरह से वे अपने बारे में बताते हैं तो उनका जीवन घनघोर अभावों-संघर्षों की गाथा समझ आता है. कहीं माता-पिता जीवित नहीं हैं और वे अपने किसी रिश्तेदार के सहारे हैं या फिर अनाथ हैं; किसी के पिता शराबी हैं तो किसी के माता-पिता दोनों ही नशा करते हैं; किसी के माता-पिता बीमार-असहाय हैं तो किसी के लिए यही काम परिवार के भरण-पोषण का सहारा है. यहाँ सरकारों के लिए, समाजसेवियों के लिए, बच्चों के हितार्थ ठेकेदार बनते लोगों को समझने की जरूरत है कि ऐसे बच्चों को ऐसे कार्यों से महज निकाल लेना, इन कार्यों को करने से महज रोक देना ही समस्या का समाधान नहीं है. वास्तविकता ये है कि इन बच्चों की प्राथमिकता परिवार का, अपना भरण-पोषण करना है; धनोपार्जन करना है; अपने आपको जीवित रखना है. ऐसे में इन बच्चों के लिए जबतक व्यावहारिक योजना नहीं बनाई जाती है तब तक किसी भी योजना का, किसी भी कार्यवाही का कोई अर्थ नहीं निकलता है.

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चित्रलेखक द्वारा स्वयं निकाले गए हैं... पहला चित्र उरई (जालौन) उ०प्र०, सितम्बर २०१४ माह का है तथा दूसरा (दो बच्चों वाला) चित्र छतरपुर, म०प्र०, अक्टूबर २०१४ माह का है....

02 अगस्त 2016

बाल श्रम का स्थायी समाधान नहीं है अधिनियम

तमाम विरोधों के बाद अंततः बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 सदन में पारित हो ही गया. बाल श्रम से तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिसको करने वाला व्यक्ति कानूनन निर्धारित उम्र से कम होता है. बाल श्रम को वैश्विक स्तर पर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है. भारत में बालश्रम की समस्या दशकों से है. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु कार्य करती हैं. देश का संविधान भी बाल श्रम उन्मूलन की बात करता है. इसके अनुच्छेद 23 में खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया गया है. भारत सरकार ने बाल श्रम को समाप्त करने हेतु 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया. इसके अनुसार, खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसके बाद भी एक अनुमान के अनुसार वैश्विक स्तर पर बाल श्रमिकों की संख्या भारत में सर्वाधिक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग दो करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार लगभग पाँच करोड़ है. इसमें भी लगभग साढ़े चार लाख बाल श्रमिक पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के हैं. इन बाल श्रमिकों में लगभग 19 प्रतिशत घरेलू नौकर हैं. वर्ष 1986 में बने बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम में 83 प्रकार के सूचीबद्ध खतरनाक एवं जोखिमयुक्त उद्योगों, व्यवसायों और व्यावसायिक प्रक्रियाओं में चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों का कार्य करना निषिद्ध था. होटलों, ढाबों, ऑटो रिपेयरिंग दुकानों के साथ-साथ घरेलू नौकरों के रूप में बच्चे कार्यरत दिखते हैं. इन कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं.

बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल लाने के पीछे सरकारी तंत्र का तर्क रहा है कि वर्ष 2009 में अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद चौदह वर्ष तक की आयु के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना अनिवार्य है. ऐसा तभी संभव है जबकि इस आयुवर्ग के बच्चों को कार्य करने से प्रतिबंधित किया जाये. संशोधन के अनुसार यदि कोई बच्चा अपने परिवार को अथवा पारिवारिक रोजगार में मदद कर रहा हो तो उस पर यह कानून लागू नहीं होगा. इसके साथ ही स्कूल के बाद खाली समय में कार्य करने को; छुट्टियों में किसी रोजगार में संलग्न होने को भी कानूनी परिधि से मुक्त रखा गया है. इसमें एक शर्त को जोड़ा गया है कि बच्चा जिस रोजगार में संलिप्त हो वह जोखिम भरा अथवा खतरनाक न हो. इसके साथ-साथ टीवी कार्यक्रमों, फिल्मों, विज्ञापनों आदि में कलाकार के रूप में कार्यरत बच्चों पर भी यह क़ानून लागू नहीं होगा बशर्ते उसके इन कार्यों से उसकी पढ़ाई बाधित न हो. बाल श्रम उन्मूलन के लिए आवाज़ उठाने वालों की माँग रही है कि चौदह वर्ष तक के बच्चों को किसी भी व्यवसाय में कार्य करने से रोका जाये ताकि वे अनिवार्य शिक्षा क़ानून का लाभ उठा सकें. इनका तर्क है कि कमाई के लालच में परिवार वाले बच्चों को विद्यालय न भेजें, भले ही औपचारिकतावश वे बच्चों का पंजीकरण विद्यालयों में करवा दें. संशोधन का एक विरोध इस बात पर भी है कि पूर्व में उपलब्ध कानून में जोखिमयुक्त, खतरनाक व्यवसायों, उद्योगों के रूप में 83 उद्योगों की व्यापक सूची थी जबकि वर्तमान सरकार ने इन्हें कम करके मात्र तीन उद्योगों यथा खदान, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक उद्योग तक सीमित कर दिया है.


सरकार द्वारा भले ही ये तर्क दिया जाये कि वर्तमान संशोधनों को गरीब परिवारों को राहत देने के औजार के रूप में लाया गया है किन्तु यह किसी भी रूप में बच्चों के हितार्थ नहीं है. सरकार को समझना चाहिए कि होटलों, ढाबों, गुमटियों आदि में बड़ी संख्या में बच्चे काम करते दिखते हैं. अब कानून की मदद लेकर इन बच्चों को छद्म रिश्ते में बाँध दिया जायेगा. इसके साथ-साथ पारिवारिक व्यवसाय नितांत अनौपचारिक तरीके से संचालित किये जाते हैं, जहाँ काम के घंटे निर्धारित नहीं होते हैं. ऐसे में यहाँ बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा कैसे  सुनिश्चित होगी

07 जुलाई 2016

वो आँखों के रास्ते दिल में उतर गई

रात का समय, घड़ी नौ से अधिक का समय बता रही थी. झमाझम बारिश हो जाने के बाद हल्की-हल्की फुहारें अठखेलियाँ करती लग रही थीं. स्ट्रीट लाइट के साथ-साथ गुजरते वाहनों की हेडलाइट भी सड़क को जगमग कर रही थी. गीली सड़क पर वाहनों और लोगों की आवाजाही के बीच मद्धिम गति से चलती बाइक पर फुहारों का अपना ही आनंद आ रहा था. घर पहुँचने की अनिवार्यता होते हुए भी पहुँचने की जल्दबाजी नहीं थी. दोस्तों का संग, हँसी-ठिठोली के बीच समय भी साथ-साथ चलता हुआ सा एहसास करा रहा था. सड़क किनारे एक दुकान के पास बाइक रुकते ही उतरा जाता उससे पहले उससे नजरें मिली. चंचलता-विहीन आँखें एकटक बस निहार रही थी. आँखों में, चेहरे में शून्य सा स्पष्ट दिख रहा था.  चेहरा-मोहरा बहुत आकर्षक नहीं था. कद-काठी भी ऐसी नहीं कि पहली नजर में ध्यान अपनी तरफ खींचती. आँखों में भी किसी तरह का निवेदन नहीं, कोई आग्रह नहीं, कोई याचना नहीं. इसके बाद भी कुछ ऐसा था जो उसकी नज़रों से अपनी नज़रों को हटा नहीं सका. ऐसा क्या था, उस समय समझ ही नहीं आया.

लंका, वाराणसी पर गुब्बारों के साथ शबनम 
बाइक से उतर कर खड़े होते ही वो उन्हीं नज़रों के सहारे नजदीक चली आई. चाल रुकी हुई सी थी मगर अनियमित नहीं थी. आँखों में बोझिलता थी मगर सजगता साफ़ झलक रही थी. चेहरे पर थकान के पर्याप्त चिन्ह थे मगर कर्मठता में कमी नहीं दिख रही थी. एकदम नजदीक आकर भी उसने कुछ नहीं कहा. अबकी आँखों में हलकी सी चंचल गति समझ आई. एक हाथ से अपने उलझे बालों की एक लट को अपने गालों से हटाकर वापस बालों के बीच फँसाया और दूसरे हाथ में पकड़े कुछेक गुब्बारों को हमारे सामने कर दिया. बिना कुछ कहे उसका आशय समझ आ गया. उस लड़की का आँखों ही आँखों में गुब्बारे खरीदने का अंदाज दिल को छू गया. गुब्बारे जैसी क्षणिक वस्तु बेचने का रिस्क और उस पर भी कोई याचना जैसा नहीं. कोई अनुरोध जैसा नहीं बस आँखों की चंचलता. उस चंचलता से झाँकता आत्मविश्वास जैसा कुछ. उस लड़की के हाव-भाव ने, आँखों की चपलता ने प्रभावित किया. लगा कि उसकी मदद की जानी चाहिए किन्तु घर जाने की स्थिति अभी बनी नहीं थी. मन में घुमक्कड़ी का भाव-बोध हावी था. मौसम भी आशिकाना रूप में साथ-साथ चल रहा था. इस कारण गुब्बारे न ले पाने की विवशता ने अन्दर ही अन्दर परेशान किया.

उस लड़की की दृढ़ता और एकबार पुनः गुब्बारों की तरफ देखने के अंदाज़ ने दोस्तों को भी प्रभावित सा किया. जेब में गया हाथ चंद रुपयों के साथ बाहर आया. भाव उभरा कि घर न जाने के कारण हम गुब्बारे नहीं ले पा रहे हैं पर ये कुछ रुपये रख लो. उस लड़की ने रुपयों की तरफ देखे बिना ऐसे बुरा सा मुँह बनाया जैसे उसे रुपये नहीं चाहिए बस गुब्बारे ही बेचने हैं. अबकी आँखों में कुछ अपनापन सा उभरता दिखाई दिया. उसके होंठों पर एक हल्की सी, न दिखाई देने वाली मुस्कराहट क्षण भर को उभरी और गायब हो गई. आँखों और होंठों की समवेत मुस्कराहट में गुब्बारे खरीद ही लेने का अनुरोध जैसा आदेश सा दिखा. हम दोस्तों ने अपने आपको इस मोहजाल से बाहर निकालते हुए गुब्बारे खरीद लिए. गुब्बारों के बदले रुपये लेते उभरी उस मुस्कान ने, आँखों की चमक ने, चेहरे की दृढ़ता ने, उसके आत्मसम्मान ने उसके प्रति आकर्षण पैदा किया.


आँखों आँखों में बने रास्ते पर चलकर नजदीक आई उस लड़की ने हमारे कुछ सवालों पर अपने होंठों को खोला. पता चला कि उस जगह से लगभग पन्द्रह किमी दूर उसका घर है. बड़े से शहर से दूर ग्रामीण अंचल तक उसे अकेले जाना है. कोई उसके साथ नहीं है. अकेले का आना, अकेले का जाना, सुबह से देर रात तक सिर्फ गुब्बारे बेचना, पूरे दिन में सत्तर-अस्सी रुपयों को जमा कर लेना, पेट की आग शांत करने के कारण पढ़ न पाना, चंद मिनट में उसने रुक-रुक कर बहुत कुछ बताया. उम्र, कर्मठता, जिम्मेवारी और आत्मविश्वास के अद्भुत समन्वय में फुहारों में भीगती ‘शबनम’ सुबह की बजाय रात को जगमगा रही थी. बाइक पर चढ़कर जाते समय गीली सड़क पर खड़ी बारह-तेरह वर्ष की वो बच्ची एकाएक प्रौढ़ लगने लगी. उसके नाजुक हाथों में गुब्बारे की जगह जिम्मेवारियाँ दिखाई देने लगी. स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट से उसका चेहरा चमक रहा था. लोगों के लिए इस चमक का कारण स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट हो सकती थी मगर हमारी निगाह में वो चमक उसकी कर्मठता की, उसके आत्मविश्वास की थी. 

14 नवंबर 2014

बच्चों के प्रति सकारत्मक जिम्मेवारी हो



आज सभी प्राणपण से बाल दिवस मनाने में लगे हैं, समझ से बाहर है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन मनाया जाता है या बच्चों से सम्बंधित समारोहों का आयोजन किया जाता है. अपने विद्यालयीन समय से लेकर अद्यतन सिर्फ और सिर्फ यही देखने को मिला है कि बाल दिवस पर बच्चों को प्रोत्साहित करने की योजनायें बनाई जाएँगी, चंद खेलकूद के आयोजन होंगे, कुछ मिष्ठान वितरण होगा और फिर सब जय हरिहर. यदि इस दिवस को महज जन्मदिन के रूप में मनाया जाना है, मनाया जाता है तो सब ठीक है अन्यथा की स्थिति में इसके पीछे बाल-विकास की वास्तविकता कहीं उलट है. ये सभी को ज्ञात है कि नेहरू जी को बच्चों का चाचा कहे जाने, बच्चों से लगाव होने के कारण उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाये जाने की परम्परा देश में है किन्तु बच्चों के प्रति वास्तविक क्रियाशीलता, धरातलीय जिम्मेवारी का निर्वहन करने से अभी तक सरकारें भी बचती रही हैं, प्रशासन भी बचता रहा है, सामाजिक संस्थाएं-व्यक्ति भी बचते रहे हैं. यदि हकीकत यही है तो बाल दिवस का आयोजन किसलिए और किसके लिए?
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संभवतः कोई एक शहर भी ऐसा नहीं होगा जहाँ आज भी हम बच्चों को कूड़ा बीनते, भीख मांगते, होटलों-ढाबों में काम करते, मिस्त्री के रूप में काम करते नहीं देखते हों. कमोबेश पूरे देश में यही स्थिति बनी हुई है. पढ़ने-खेलने की उम्र में ये नौनिहाल अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जुगाड़ में लगे रहते हैं. सरकारें, प्रशासन इस बात को जानते हुए भी अनभिज्ञ बना रहता है. शिक्षा देने के लिए तमाम जद्दोजहद की जाती है मगर उसका जमीनी स्वरूप तैयार नहीं किया जाता है. शिक्षा साधारण-सामान्य विद्यालयों से निकल कर कॉन्वेंट की शरण में पहुँच चुकी है. ज्ञान कम कीमत वाली किताबों के स्थान पर बड़े-बड़े प्रकाशकों की मँहगी रंगीन किताबों-सीडी में छिपा दिया गया है. एकरूपता की बात में अब सहज गणवेश न होकर मंहगे-मंहगे डिजायनर वस्त्रों को स्थान मिल रहा है. ऐसे में शैक्षिक संस्थाओं द्वारा भी वास्तविक रूप से बच्चों के हितार्थ कार्य नहीं किया जा रहा है. ले-देकर बचे हुए सरकारी संस्थान ही खानापूर्ति सी करते दिख रहे हैं. अध्यापकों की भीड़ और खालीपन के मध्य चंद लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं किन्तु वे भी मिड-डे-मील सहित अन्य कागजी कार्यों के भंवरजाल में फँस कर रह गए हैं.
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ये ध्यान रखना होगा कि १४ नवम्बर को भले ही बाल दिवस के रूप में बच्चों को समर्पित हो या फिर विशुद्ध नेहरू जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता रहा हो, मनाया जा रहा हो किन्तु बच्चों के प्रति सामाजिक जिम्मेवारी कदापि कम नहीं हो सकती. सरकारी प्रयास महज खानापूरी के लिए न हों, हम लोगों के काम भी भेदभाव से युक्त न हों, बच्चों के हाथों में चंद सिक्के रखकर हम उनका भला नहीं कर रहे हैं, बच्चों को वास्तविक मदद के द्वारा उनको आगे बढ़ने के रास्ते खोलें. जिस दिन हम बच्चों के परत सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेंगे उसी दिन से सभी दिन बाल दिवस के रूप में स्वतः ही मनाये जाने लगेंगे.
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चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं 

12 अक्टूबर 2013

गुब्बारों के फूटने में सुनाई दी बच्चे की हँसी




इसका कुछ भी नाम हो सकता है, कोई भी जाति हो सकती है, कोई भी धर्म हो सकता है. इस जैसे और भी बच्चे हो सकते हैं....हो सकते हैं क्या, ऐसी बहुत से बच्चे हैं जो अपना बचपन भूलकर पेट की आग शांत करने का जुगाड़ करने में लगे हैं. गुब्बारे बेचने का एक मन को छूने वाला आग्रह साथ ही घर जाने की आतुरता. किसी भी बच्चे का पेट के लिए काम करते दिखना अपने आपमें दुखद होता है किन्तु यदि काम हल्का-फुल्का सा होता है तो ये सुकून मिलता है कि कम से कम ये भीख तो नहीं माँग रहा, किसी की जेब तो नहीं काट रहा, कहीं चोरी-चकारी तो नहीं कर रहा है.
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तस्वीर लेते समय रात का आठ बजने को आया था और इस बच्चे को अभी लगभग पाँच-छह किमी दूर अपने गाँव जाना था. उरई शहर के पास के एक गाँव का निवासी वहीं के विद्यालय में कक्षा छह का विद्यार्थी ये बच्चा फोटो लिए जाने की बात से पुलक उठा. एक पल को भूल गया कि उसने गुब्बारे लेने का आग्रह किया था...पर पेट की आग कहाँ कुछ भूलने देती है, उसकी एक पल की ख़ुशी के पीछे प्रश्नवाचक शब्द निकले ‘और गुब्बारे’....उसको आश्वस्त किया तो उसके चेहरे पर फिरसे मुस्कान तैर गई.
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दो फोटो लेने के दरमियान उसने अपने बारे में बताया. विद्यालय जाना और फिर लौटकर गुब्बारे लेकर उरई आ जाना. दिनभर में कोई ३५-४० गुब्बारे बेचने के बाद रात को गाँव वापस पहुँच कर कुछ लिख-पढ़ लेना. कक्षा छह के विद्यार्थी को अनुशासित रूप में विद्यालय-परिवार, अध्ययन-व्यवसाय, घर-बाज़ार के साथ तालमेल बनाये देखना अपने आपमें अचरज में डाल गया. एकबारगी मन में आया कि इसकी मदद कुछ पैसे देकर की जाये..फिर लगा कि जो बच्चा खुद को कहीं न कहीं भीख माँगने से अलग रखे हुए है, उसे धन की मदद भिक्षावृत्ति को प्रेरित तो नहीं कर देगी? साथ ही लगा कि जो बच्चा पूरे अनुशासित रूप में अपना संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है, कहीं उसकी खुद्दारी, उसकी राह में व्यवधान उत्पन्न तो नहीं करेगा.
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इस दो-चार मिनट की उलझन के बाद जितना संभव हो सकता था, गुब्बारे लिए. गाड़ी-सामान के साथ हाथों की सीमित संख्या ने भी गुब्बारे खरीद पर अंकुश लगाया. बच्चा अपनी अतुलित प्रसन्नता के साथ गुब्बारे तोड़-तोड़ देता जा रहा था और हम उनको संभालने में लगे हुए थे. बाज़ार से घर तक की यात्रा में कुछ गुब्बारे देवी माता की झांकियां देख लौट रहे बच्चों में बंट गए तो कुछ गुब्बारे भीड़ की, हवा की चपेट में आकर फूट गए. फट-फट की आवाज़ लोगों में क्या सन्देश दे रही होगी ये तो पता नहीं पर हमें कहीं न कहीं उस ध्वनि में बच्चे की हँसी सुनाई दे रही थी. घर के बच्चे भी चहक-चहक कर बचे हुए कुछ गुब्बारों को फोड़ने-उड़ाने में लग गए.

19 नवंबर 2008

ये बच्चे हिंदुस्तान के हैं.......

"मैं नहीं जानता कि दिन क्या है?
मैं नहीं जानता कि रात क्या है?
मैं ये भी नहीं जानता कि क्या सुबह, क्या शाम?
मैं नहीं जानता रात के तारे-चांदनी?
मैंने नहीं देखी सुबह की ओस?
मैं नहीं जान सका कब उगा सूरज गुलाबी रंग में
और कब ढल गया फ़िर वो गुलाबी रंग में?
मैं नहीं जानता......??????????"
नहीं जनाब ये कोई कविता नहीं..........न ही किसी कवि की कल्पना है. ये हकीकत है आज के भारत देश में टहलते उन बच्चों की जो अपने बचपन को भुला कर किसी न किसी रूप में स्वयं को मजदूर की श्रेणी में शामिल कर दे रहे हैं. सुबह की टहल के बाद किसी जगह पर चाय पीने के लिए रुके आपके कदमों की आहात के नीचे किसी बालक का बचपन दबा होता है. शाम को दिन भर की थकान मिटाने के लिए किसी फास्ट-फ़ूड की दूकान पर खड़े होकर चटपटी जायकेदार चीजों के जूठे बर्तनों के नीचे किसी का बचपन सिसक रहा होता है.
क्या यही भारत का भविष्य है????? क्या यही हमारे भावी-भाग्य-विधाता हैं?????? सोचिये. बाल मजदूरों की बढ़ती संख्या से समाज को चिंतित होना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है. सबको स्वार्थ-पूर्ति में रत देखकर लगता है कि सरकार के क़ानून बनाने से पहले हमें ख़ुद एक तरह के क़ानून को अमल में लाना होगा. हमें अपने कामों के लिए बच्चों को मजदूर के रूप में तलाश करने की आदत को त्यागना होगा. घर के किसी भी काम के लिए काम वाली बाई के साथ उसके बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा. और भी बहुत है जो हम आसानी से कर सकते हैं और वो भी बिना किसी परेशानी के.
चलिए हम सब समाज सेवा का बीडा न उठाएं, किसी गरीब के बच्चों को पढ़ने-लिखाने या उनको जिम्मेवार नागरिक बनाने की कसम न खाएं, किसी बाल-मजदूर को मुक्त करने का जोखिम न लें पर क्या इतना भी करना हमारे लिए मुश्किल है कि हम ख़ुद किसी बच्चे से काम न लें?
ये तो मुश्किल नहीं बस मन में संकल्प लें और जुट जाएँ कि आज नहीं तो कल हमारा देश, समाज बाल-मजदूर के अभिशाप से मुक्त होगा। तब हम बड़ी ही शान से कह सकेंगे.............."ये बच्चे हिन्दुस्तान के हैं, ये बच्चे अपनी शान के हैं..................................."