12 June 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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1 comment:

  1. इस संदर्भ में दो बातें हैं। छोटे बच्चों से बाल मज़दूरी अपराध है। परन्तु गरीब बच्चे जिनका पेट नहीं भर पाता उनके घरवाले ही उन्हें काम पर लगाते हैं ताकि बच्चों को खाना तो मिल सके। यह दुखद है पर यह सत्य है। यही हाल भिक्षावृति में भी देखने को मिलता है। बच्चों का खूब इस्तेमाल होता है। सरकार को कठोर और मानवीय कदम उठाना होगा। सभी 14 साल तक के बच्चों को एक समान मुफ़्त शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य की सुविधा मिलेगी तभी बाल मज़दूरी या बाल शोषण से मुक्ति मिलेगी।

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