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07 फ़रवरी 2026

जेन ज़ी की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह

शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी' अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी घटी है.

 



किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी जीवन-चर्या, कार्य-शैली आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं, रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे रहते हैं.

 

अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना, संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.

 

सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के, पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.

 

डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद, मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है, बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.

 


26 सितंबर 2025

उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो


 

अरे साहब, जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती समझ आये तो उसे पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए.... ठीक वैसे ही जैसे खिलाड़ी मैदान में गिरने के बाद खुद को एकदम फ्री छोड़ देता है....

कानूनी आयु घटाने का सोचने से बेहतर है कि ये उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो... न उम्र, न सोचा-विचारी, बस सम्बन्ध ही सम्बन्ध....

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दैनिक जागरण, कानपुर

25.09.2025


23 जुलाई 2025

नशे की तरफ बढ़ते युवा-कदम

हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया, एक गीत की इस पंक्ति ने युवाओं को बहुत प्रभावित किया है. उनके लिए इस पंक्ति का सन्दर्भ उन्मुक्त रूप से धुँआ उड़ाना भर है. इसके वशीभूत युवाओं की बहुत बड़ी संख्या जगह-जगह कहीं छिपे रूप मेंकहीं उन्मुत भाव से धुआँ उड़ाती नजर आती है. ऐसे युवाओं को गीत की इस पंक्ति ने जितना प्रभावित किया है उतना इसके अगले भाग ने नहीं किया है. धुँए से खेलती इस पीढ़ी को मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गयावाला दर्शन याद नहीं है. रील बनाने में खोयी रहने वाली, अपने आपको स्वतंत्रता से उद्दंडता की तरफ ले जाती पीढ़ी को कतई भान नहीं है कि किसी भी गीत की पंक्तियों का अनुसरण करना और ज़िन्दगी की वास्तविकता को समझना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं. ज़िन्दगी को जीने के अंदाज, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाये रखने की कार्य-शैली से इतर आज का युवा नशे की दुनिया में हँसते-मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहा है. उसके लिए ये किसी खतरे का सूचक नहीं बल्कि एक तरह का एडवेंचर है, जिसे वह किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहता है.

 

सामाजिक रूप से यह स्थिति चिंताजनक है कि जिस उम्र में किशोरों, युवाओं को अपने दैहिक सौष्ठव की तरफ, बौद्धिक विकास की तरफ, अध्ययन की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए उस उम्र में वे नशे का शौक पालने में लगे हैं. शौक-शौक में कभी-कभी ही नशे की तरफ बढ़े कदम कब उनकी मजबूरी बन जाते हैं, उनको इसकी भनक तक नहीं लगती है. शौकिया उठाये गए कदम की मजबूरी में फँसकर वे इसे ज़िन्दगी जीने का तरीका समझने लगते हैं. अपनी मस्तीअपनी दुनियाअपनी स्वतंत्रता में इनको आभास ही नहीं होता है कि वे कब ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने लगे हैं.

 



ऐसी स्थितियों के लिए पूरी तरह से युवाओं को अथवा किशोरों को दोष देना भी उचित नहीं है. देखा जाये तो भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के अभिभावक भी शामिल हैं. आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अनुशासन का पाठ सिखाने वाले, जीवन की जिम्मेदारियों से परिचय कराने वाले अभिभावक अपने ही बच्चों के मित्र रूप में परिवर्तित हो गए. मैत्री भरे कथित वातावरण में अब बच्चों को किसी भी संसाधन की, उत्पाद की महत्ता समझाने के बजाय उसकी सहज उपलब्धता करवाई जा रही है. अनुशासन-मुक्त लाड़-प्यार में उपलब्ध संसाधनों के चलते ऐसे बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती हैन समय कीन कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. इसी मानसिकता के कारण समाज का बहुसंख्यक युवा वर्ग गैर-जिम्मेदारी का परिचय देते हुए उद्दंड नजर आने लगा है. इसी का दुष्परिणाम है कि अधिकांश बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति पनप रही है, वे गलत रास्तों की तरफ बढ़ जाते हैं, नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं.

 

नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. इसके बाद भीनशे के दुष्प्रभाव की जानकारी होने के बाद भी युवाओं में ही नहीं बल्कि समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोहकिसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होनायुवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. कहीं न कहीं समाज में इस तरह के नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. किसी भी तरह का आयोजन होछोटे-बड़े स्तर के क्लब या होटल हों सभी में किसी न किसी रूप में नशे की उपस्थिति देखने को मिलने लगी है. बहुत सी जगहों पर खुलेआम या चोरी-छिपे ड्रग्स पार्टियाँहुक्का बार आदि जैसी संकल्पना धरातल पर देखने को मिलती है. दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आयोजनों में बहुतायत में किशोरों का, युवाओं का सम्मिलन रहता है. आधुनिकता के परिवेश में लिपटी ऐसी पार्टियों में सिगरेट, शराब की आड़ में नशीले तत्त्वों, विभिन्न ड्रग्स की सहज पहुँच बनी होती है.  

 

नशा-मुक्त समाज की अवधारणा को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है; उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है; इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. इसके साथ-साथ यह भी समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा हैइसके लिए समाज में युवाओं कीकिशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरणवैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावनाजल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊँचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसाकम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में एक बार शामिल हो जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ केउन्नति केसमर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार कोसमाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फँस गया है उसको समझाने कीसँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सकेसामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सकेकर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 

 


26 मई 2024

अपराध की तरफ बढ़ते नौनिहाल कदम

विगत कुछ समय में बच्चों, किशोरों से संदर्भित जिस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, उनको देखकर ऐसा महसूस हो रहा है कि भले ही समाज में विकास का क्रम बना हुआ है मगर नैतिकता में, सामाजिकता में निरंतर गिरावट आ रही है. सामाजिक और नैतिक रूप से इस पीढ़ी को उस तरह से अनुशासित नहीं किया जा सका है, जैसी कि समाज में अपेक्षा होती है. इस पीढ़ी को नैतिक रूप से वैसा जिम्मेवार नहीं बनाया गया है जैसा कि किसी इंसान के लिए अपेक्षित होता है. सामाजिकता के नाम पर भी यह पीढ़ी संज्ञा-शून्य ही नजर आती है. ऐसा नहीं है कि वर्तमान समय के समस्त बच्चों, किशोरों के सन्दर्भ में ये सही है मगर बहुतायत में इस पीढ़ी के साथ यही समस्या बनी हुई है. उसके लिए नैतिकता, सामाजिकता से कहीं अधिक बड़ी बात उनका अपना मनोरंजन, अपना पैशन हो गया है. इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार बैठे होते हैं, बिना ये जाने-समझे कि उनका एक गलत कदम किसी की जान भी ले सकता है.

 



इस तरह से भाव-विहीन होती जा रही पीढ़ी के किशोरों, बच्चों द्वारा की गई हरकतों की संख्या उँगलियों में गिने जाने से बहुत आगे निकल चुकी है. बीते दिनों में हुई ऐसी कुछ घटनाओं को समाज अभी भूला नहीं होगा. पुणे का हालिया केस देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है जहाँ एक किशोर की तेज रफ़्तार कार से दो व्यक्तियों की मृत्यु हो गई. यहाँ गौरतलब ये है कि उस किशोर को जरा सा भी भय समाज का अथवा अपने परिवार का नहीं था कि उसके द्वारा नशे में कार को तेज रफ़्तार से चलाया जा रहा है, जबकि वह खुद नाबालिग है और अभी उसका कार ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं बना है. ऐसी गैर-कानूनी स्थिति से उस लड़के के भयभीत न होने की स्थिति उस समय स्पष्ट हो गई जबकि वह अपने अमीर पिता के रसूख के चलते न केवल जमानत पा गया बल्कि मेडिकल टेस्ट में भी एल्कोहल न होना पाया गया. इससे भी बड़ी बात ये हुई कि अदालत द्वारा उसको तीन सौ शब्दों का निबंध लेखन, कुछ दिनों यातायात पुलिस के साथ नियम-कानून सीखने का काम सजा के तौर पर मिला. एक और घटना के रूप में उत्तराखंड के एक स्कूल की घटना का जिक्र करना भी यहाँ आवश्यक हो जाता है जहाँ पर एक लड़के द्वारा अपनी ही कक्षा की चौदह वर्ष की लड़की का अश्लील वीडियो बनाकर वायरल कर दिया गया. बदनामी के डर से उस लड़की ने आत्महत्या कर ली. इस मामले में अदालत द्वारा उस लड़के को इस आधार पर जमानत नहीं दी गई क्योंकि अदालत ने उसे अनुशासनहीन माना और जमानत पर उसकी रिहाई को समाज के लिए खतरा बताया. 

 

ऐसी यही दो घटनाएँ ही नहीं हैं बल्कि लगभग रोज ही इस तरह की घटनाएँ हमारे आसपास हो रही हैं. यदि इन घटनाओं के मूल में देखें तो स्पष्ट रूप से समझ में आएगा कि जिस तरह की जीवन-शैली वर्तमान में होती जा रही है, उससे परिवार में, समाज में एक-दूसरे के लिए अब समय ही नहीं रह गया है. संयुक्त परिवारों के बिखरने के साथ-साथ सामाजिक ढाँचे में हुए विघटन ने भी अपने पड़ोसियों से संबंधों में मधुरता का, दायित्व का लोप करवा दिया है. इसके चलते भी मोहल्ले में, आसपास के घरों में बच्चों पर ध्यान दिए जाने की सामाजिकता समाप्त ही हो चुकी है. सामाजिक विकास के क्रम में अब जबकि ये पढ़ाया जाने लगा हो कि अभिभावक और बच्चे अब दोस्त हैं, बचपन की गोद में खेलते बच्चों को भी उनके स्टेटस का, उनकी इज्जत-बेइज्जती का पाठ सिखाया जाने लगा हो तो स्वाभाविक सी बात है कि बच्चों में, किशोरों में खुद में एक तरह का जिम्मेवार होने का भाव जागने लगता है. देखा जाये तो यह भाव-बोध उनको एक तरह की नकारात्मकता की तरफ ले जाता है. यही कारण है कि कम उम्र में नशे का शिकार हो जाना, तेज रफ़्तार से वाहन चलाना, शारीरिक संबंधों का बनाया जाना, रोमांचकता के लिए जीवन को खतरे में डालना, अपने शौक और थ्रिल के लिए आपराधिक कृत्य में संलिप्त हो जाना आदि सहजता से समाज में दिखने लगा है.

 

दरअसल कोरोनाकाल में लॉकडाउन के दौरान जिस तरह शिक्षा के लिए मोबाइल, कम्प्यूटर, इंटरनेट को बच्चों के लिए अनिवार्य सा बना दिया गया था, वह लॉकडाउन की समाप्ति के बाद यथावत बना हुआ है. इसका सुखद परिणाम सामने भले ही न आया हो मगर अनेकानेक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ मानसिक समस्याओं ने, सामाजिक समस्याओं ने, आपराधिक घटनाओं ने अवश्य ही जन्म ले लिया है. चौबीस घंटे इंटरनेट की, मोबाइल की उपलब्धता ने बच्चों, किशोरों को अपनी उम्र से पहले ही युवा कर दिया है. इसके इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, हैवानियत, नृशंसता, क्रूरता आदि का समावेश होता जा रहा है. इसकी दुखद परिणति हिंसक, आपराधिक घटनाओं के रूप में हम सभी आये दिन देख रहे हैं. समाज को जल्द से जल्द इस पर विचार करते हुए संस्कारित, सामाजिक वातावरण का निर्माण अपने ही परिवार से करना पड़ेगा. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा.


25 मार्च 2023

भावनात्मकता से दूर होता समाज

आये दिन खबरें आ रही हैं युवाओं की मौत की. बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार बन रहे युवाओं में बहुत कम ऐसे हैं जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए मौत की नींद सो गए. समाचारों, जानकारियों के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में अवसाद के कारण, किसी बीमारी के कारण, हार्ट अटैक के कारण, आत्महत्या करके युवा मौत का शिकार बन रहे हैं. इन युवाओं की उम्र बहुत अधिक नहीं है. इनमें से बहुत तो किशोरावस्था के होंगे. बहरहाल, इन युवाओं की उम्र कुछ भी रही हो, वह चिंता का विषय हो उससे बड़ी चिंता का विषय उनका असमय चले जाना होना चाहिए. किसी भी युवा की मौत पर कुछ दिन का मातम मना लिया जाता है, उसके कामों के कारण उसे याद कर लिया जाता है और फिर सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. इस तरफ ध्यान देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौत क्यों हो रही है? सभी युवा आत्महत्या नहीं कर रहे हैं मगर बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है हो हार्ट अटैक का शिकार बने हैं. ये भी सोचने का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसी किस तरह की जीवन शैली समाज में चलन में आती जा रही है कि तीस से चालीस वर्ष तक के युवा भी हृदयाघात का शिकार होने लगे हैं?




वैसे यदि हम सकारात्मकता के साथ अपने आसपास निगाह डालें, अपनी ही दिनचर्या पर विचार करें, अपने संपर्क और लोगों से मेल-मुलाक़ात पर ध्यान दें तो हमें खुद एहसास होगा कि किस तरह से हम सभी लगातार एकाकी जीवन जीने की तरफ बढ़ रहे हैं. दिन-दिन भर सोशल मीडिया पर आभासी संपर्क भले बना रहे मगर व्यक्तिगत रूप से हम लोग आपस में बहुत कम मिल रहे हैं. बातचीत तो लगभग बंद सी ही है. अब बातचीत का सहारा सोशल मीडिया के तमाम मंच बन गए हैं. सुबह-शाम के सन्देश पर उसी के अनुसार स्माइली भेजकर सामने वाले को जवाब भी दे दिया जाता है. जिस औपचारिकता से सन्देश भेजा गया होता है, उसी औपचारिकता से भेजी गई स्माइली को भी स्वीकार कर लिया जाता है. एक पल रुक कर यह भी विचार नहीं किया जाता है कि कम से कम एक बार सामने वाले को फोन लगाकर बात कर ली जाये, उसके हालचाल ले लिए जाएँ.


यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के मन का, उसकी मानसिकता का, हावभाव का पता मोबाइल पर भेजे जाने वाले, पाए जाने वाले संदेशों से, स्माइली से कदापि नहीं हो सकता है. सन्देश, फोटो, वीडियो या स्माइली आदि किसी भी तरह से व्यक्ति के तात्कालिक मनोभावों को नहीं बता सकते. इसका अंदाजा तो बस आपस में बातचीत के द्वारा हो सकता है. बात करने के लहजे से, सामने वाले के बोलने के अंदाज से समझ में आसानी से आता है कि वह खुश है या दुखी है. बातचीत को हम सभी लोग जैसे समाप्त ही कर चुके हैं. मोबाइल के युग में, इंटरनेट के युग में आज एक ही घर में आपस में बातचीत न के बराबर हो रही है. ऐसे में जाहिर है कोई युवा, किशोर यदि किसी भी तरह की समस्या में घिरा है तो इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अनेक तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ता है. किसी को पढ़ाई की समस्या है तो किसी के सामने कैरियर की दिक्कत है. कोई पारिवारिक समस्याओं से दो-चार हो रहा है तो कोई आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है. ऐसे में भावनात्मक सहारा, संबल न मिल पाने के कारण युवा, किशोर या तो अवसाद में ग्रसित हो जाते हैं या फिर वे हताशा में कोई गलत कदम उठा लेते हैं.


जीवन सिर्फ जिन्दा रहने के लिए नहीं है वरन खुलकर आनंद लेने के लिए है. हताशा, निराशा, असफलता के दौर तो सबके साथ आते जाते हैं मगर यदि उसको भावनात्मक संबल मिल जाये तो वह इन सबसे सहजता से उबर आता है. अपने युवाओं को, किशोरों को असमय मौत के मुँह में जाने से रोकने के लिए आइये हम सब फिर से उसी दुनिया को बनाने का प्रयास करें जहाँ मोबाइल, इंटरनेट ने हमारे रिश्तों को, संबंधों को, भावनात्मकता को नहीं खाया था. 







 

25 फ़रवरी 2023

गालियाँ देने का फैशन

बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका सर्वाधिक नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. तकनीकी भरे दौर में हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट के होने के कारण समूचा विश्व सबकी मुठ्ठी में समाहित है. मुठ्ठी में समाये इस विश्व में अब कुछ भी गोपन नहीं रह गया है. इसी अगोपन ने ओटीटी के बहुसंख्यक कार्यक्रमों, वेबसीरीज की अश्लीलता को भी सार्वजनिक कर दिया है. इन वेबसीरीज के पल-पल बदलते दृश्यों में, बात-बात पर गालियों भरे संवादों के आने ने बच्चों, किशोरों के दिल-दिमाग में गालियों के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा कर दिया है.


ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बनने वाले कार्यक्रम हों या फिर फ़िल्में, सभी में वास्तविकता दिखाने के नाम पर गालियों को जैसे ठूँसा जाने लगा है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर बने अनेकानेक चैनलों पर भी सार्वजनिक रूप से गालियों का दिया जाना होता है, अश्लील भाव-भंगिमा, शब्दों के साथ प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं. इनके इस तरह से सार्वजनिक होते रहने का दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि गालियों को लेकर, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. कम उम्र के युवाओं में बात-बात पर गालियाँ दिया जाना आम हो गया है. बच्चों में, किशोरों में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बातचीत में गालियों का प्रयोग करने के पीछे मानसिकता उनके साथ वैमनष्यता करने जैसी नहीं होती है. जरा-जरा सी बात पर अशालीन शब्दों का प्रयोग करने के पीछे उनकी मंशा सामने वाले को अपमानित करने की नहीं होती है. वे ऐसा महज उस आकर्षण के वशीभूत करते हैं, जिसे उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया के मंचों पर देखा होता है.  




समाज में एक सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि एक बच्चा आज्ञाकारी होगा. वह बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला होगा. युवावस्था आने तक वह अपने भीतर ऐसे गुणों को धारण कर चुका होगा जो समाज, परिवार के हित में होंगे. बहुतायत में ऐसा करने वाले बच्चे मिलते भी हैं. किशोरावस्था का दौर अत्यंत ही संवेदित और बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व विकास इसी दौर में होता है. इसी कारण से इस दौर में बच्चों का गालियों की दिशा में जाना, अश्लील शब्दावली की तरफ भटकना चिंतनीय है. बहुतेरे किशोर इन्हीं सबके चलते अनैतिक संबंधों के बनाने की हद तक चले जाते हैं. ऐसे में किशोर उम्र में उनकी तरफ विशेष ध्यान देना आवश्यक है.


ऐसे में सवाल यही उठता है कि बच्चों में, किशोरों में इस तरह के अशालीन व्यवहार को करने के पीछे उत्प्रेरक बने इन कार्यक्रमों से बचने का क्या रास्ता है? यह बात वर्तमान दौर में पूरी तरह से सही है कि वैश्विक खुलेपन के दौर में अब किसी विषय को, किसी जानकारी को परदे में रख पाना संभव नहीं रह गया है. तकनीक के बहाव भरे इस दौर में इन बच्चों की ऊर्जा को, उनके आकर्षण को उचित दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए. यह विचार करना अनिवार्य होना चाहिए कि जिस तरह के कार्यक्रम इस आयुवर्ग के बच्चों को उकसा रहे हैं, उनसे बच्चों को दूर कैसे रखा जाये. इस बिन्दु पर आकर स्वयं अभिभावकों को विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं उनके द्वारा तो इन बच्चों के लालनपालन में कोई कमी तो नहीं रह जा रही है?


वर्तमान में जिस तेजी से नगरीकरण तथा औद्योगिकरण ने हर व्यक्ति को अपने चपेट में लिया है, उसने सभी को धन कमाने की अंधी दौर में धकेल दिया है. इससे भी परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने में तथा उनको संस्कारित करने में लगभग असफल हुए हैं. समयाभाव में अपने ही बच्चों को उनकी वैयक्तिक स्वंतत्रता के नाम पर बच्चों को, किशोरों को समय से पूर्व बड़ा हो जाने दिया है. इसने बच्चों में नैतिक मूल्यों का क्षरण किया है. इस बात को परिवारों को, अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनका संस्कारवान होना, शालीन होना, सभ्य होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वे इस समाज की, इस देश की धरोहर हैं. किसी भी समाज और देश का भविष्य इन्हीं के कंधों पर अपनी विकासयात्रा को पूरा करता है. ऐसी स्थिति में न केवल सरकारों की जिम्मेवारी है बल्कि परिवार की, समाज की, अभिभावकों की भी जिम्मेवारी है कि वे बच्चों के, किशोरों के, युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्वस्थ्य सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण प्रदान करें. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से अशालीनता, अश्लीलता, गालियाँ, अनैतिक संबंधों का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जाये.